विभिन्न कविता आंदोलनों की अनिवार्यता और अवधारणात्मकता-ऋषिकेश सिंह

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विभिन्न कविता आंदोलनों की अनिवार्यता और अवधारणात्मकता

ऋषिकेश सिंह
पीएच. डी. (हिंदी)
जामिया मिल्लिया इस्लामिया
सम्पर्क 9911115885

हिंदी साहित्येतिहास के आरंभिक 750 वर्षों का इतिहास प्रायः कविता का ही इतिहास है। जिसे आदिकाल, भक्तिकाल, व रीतिकाल के रूप में बांटकर देखा जाता है, परंतु इस दौर की काव्य प्रवृत्तियां साहित्यिक युगों का निर्माण करती हैं न कि आंदोलनों का, क्योंकि इस काल की कविताओं का सम्बन्ध युगीन परिस्थितियों की संप्रेषणीयता में अधिक रहा है विचारधारा के अभिव्यक्ति की यहाँ अनुपस्थिति है, इसीलिए ये काल का निर्धारण अधिक करती हैं। हालांकि इसके अपवाद के रूप में भक्तिकालीन काव्य को देखा जा सकता है,परंतु पूर्ण रूप से आंदोलनों को केंद्र में रखकर काव्य निर्माण का श्रेय आधुनिककाल को ही जाता है। यहाँ यह भी ध्यान रखने योग्य है कि विचारधारा को केंद्र में रखने वाले आंदोलन का कालिक स्वरूप सीमित होता है और वह युग की सीमा में समाहित हो जाता है, इसी कारण एक युग में कई आंदोलन हो सकते हैं किंतु एक आंदोलन में कई युग नहीं।

आधुनिक काल और कविता आंदोलन

आधुनिक काल में भारतेंदु, द्विवेद्वी, छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता, अकविता, तथा समकालीन कविता जैसे काव्यान्दोलनों का उभार हुआ जिसे स्वतंत्रता पूर्व और पश्यात दो भागों में भी बाँट सकते हैं। इन काव्यान्दोलनों के उद्भव में सबसे प्रमुख भूमिका नवजागरण एवं आधुनिकता के विचारधारा की उत्पत्ति का है। औद्यौगिक क्रांति और पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान के परिचय से 19वीं शताब्दी में भारत में नवजागरण की लहर आई जिससे भारत के प्रत्येक क्षेत्र में बुद्धिवाद, मानवतावाद, व्यक्तिवाद, लोकतंत्र, समानता, स्वतंत्रता, न्याय जैसे मूल्यों को महत्त्व दिया जाने लगा, जो रीतिकालीन राज्याश्रय और रीतिवादी मानसिकता से बिल्कुल विपरीत था। डॉ. नगेन्द्र के शब्दों में कहें तो “आधुनिक काल अपने ज्ञान-विज्ञान और प्रविधियों के कारण मध्यकाल से अलग हुआ। यह काल औद्योगीकरण, नगरीकरण, और बौद्धिकता से सम्बद्ध है, जिससे नवीन आशाएं उभरी और भविष्य का नया स्वप्न देखा जाने लगा।”1 परंतु यह दौर भारत के लिए औपनिविशेविक भी था अर्थात एक तरफ तो स्वतंत्रता आंदोलन का चरण दर चरण विकास हो रहा था वहीं दूसरी ओर इसके समानांतर नवजागरणकालीन मूल्य विकसित हो रहे थे इनके सांक्रमणिक समन्वय में ही हिंदी काव्यांदोलनों का विकास हुआ है, और इसी की पृष्ठभूमि में ही इसके अनिवार्यता और अवधारणात्मकता को समझ जा सकता है।

इन काव्यान्दोलनों में सर्वप्रथम भारतेंदु युग है जिसके प्रणेता भरतेंदु हरिश्चन्द्र स्वयं हैं। 1850-1900ई. का यह दौर कंपनी शासन के अंत, ब्रिटिश सरकार द्वारा शासन की शुरुआत के रूप में देखा जाता है, अतः इस काल की कविता की अनिवार्यता के केंद्र में उपरोक्त नवजागरणकालीन औपनिवेशिक परिस्थितियां ही हैं परंतु अवधारणा के रूप में इस युग का साहित्य अंतर्विरोधों का ही साहित्य है जैसे- राजभक्ति बनाम राष्ट्रभक्ति, राजभक्ति बनाम राजविरोध, ब्रज भाषा बनाम खडी बोली आदि। रामविलास शर्मा के शब्दों में कहें तो “ अंग्रजों ने भारतीयों को राजभक्ति सिखाई, उनके अंदर फुट की आग सुलगाई……एक ऐसे आदमी की जरूरत थी जो अंग्रेजी शासकों और उनके मुसाहिबों की झूठी लफ्फाजी का पर्दाफाश करके उनकी असलियत बयां कर दे, जो जनता के उभरते हुए असन्तोष को प्रकट करे और जिन्हें अंग्रेजी राज्य से बहुत बड़ी आशाएं थीं उनकी आँखे खोल दे।”2 इसके उपरांत काव्यान्दोलन का अगला चरण 1900-1920ई. का है जिसे द्विवेद्वी युग के रूप में जाना जाता है, इस युग में जहाँ एक तरफ स्वदेशी आंदोलन, असहयोग आंदोलन से पूरे राष्ट्र में स्वाधीनता की चेतना की एक लहर आई जिससे सांस्कृतिक पुनरूत्थान की प्रकिया को बल मिला वहीं नवजागरणकालीन मूल्यों से एक लोकोन्मुखी दृष्टि पनपी और साथ ही महावीर प्रसाद द्विवेद्वी के भाषाई द्वैत को समाप्त करने में भाषा के परिमार्जन और परिष्करण के साथ विषयों के वैविध्य पर जोर देने जैसे प्रयासों ने कविता के स्वरूप को बदला लोगों ने विचार करना शुरू किया कि “हम कौन थे क्या हो गए और क्या होंगे अभी/ आओ मिलकर विचारें ये समस्याएं सभी।” गणपति चंद्र गुप्त ने उचित ही कहा है “काव्यपरम्पराओं की दृष्टि से यह युग पूर्ववर्ती युग से अविभाज्य है, पूर्ववर्ती युग की ही परंपराओं एवं प्रवृत्तियों का विकास इस युग में हुआ। परिवर्तन केवल दो क्षेत्रों में हुआ- एक नेतृत्व में और दूसरे रचना पद्धति और काव्यभाषा में।”3

आर्दशवाद एवं अनुशासनबद्ध धारा के प्रतिक्रिया के रूप में स्वच्छंदतावादी तौर पर छायावादी काव्यान्दोलन का विकास हुआ, रामस्वरूप चतुर्वेदी के शब्दों में कहें तो “स्वछंदतावाद की प्रमुख विशेषताओं में है- वन का महत्त्व, प्रकृति पर्यवेक्षण, प्रेम का स्वच्छंद भंगिमाओं में चित्रण और बैलैड या कथा गीत का प्रयोग, और काव्यभाषा के रूप में खड़ी बोली की स्वीकृति। सबसे बड़ी बात यह कि इस स्वच्छंदतावादी काव्य धारा ने जीवन से लगाव की एक भूमिका तैयार की जो आगे चलकर छायावाद में और गहरी हो जाती है।”4 इस काव्यान्दोलन की अनिवार्यता के रूप में जहाँ एक तरफ पश्चिम में उदित स्वच्छंतावाद को देखा जा सकता है वहीं दूसरी ओर भाषा, छंद, बिम्ब आदि शिल्पगत रूपों में परम्परावादी ढांचे के विखंडन को भी शामिल किया जा सकता है। इस अनिवार्यता से उपजी अवधारणा के अनुरूप इस धारा का कवि “तोड़ो तोड़ो तोड़ो कारा, निकले फिर गंगाजल धारा” कहकर परिवर्तन की चाह के रूप में स्वातन्त्र्य चेतना को प्रकट करता है, इसके लिए शक्ति की मौलिक कल्पना पर भी जोर देता है, और साथ ही ‘मैंने मैं शैली अपनाई’ कहकर स्वातन्त्र्य चेतना में वैयक्तिकता को प्रमुखता भी देता है। उसकी सौंदर्य चेतना इतनी उदार है कि वह मानव के साथ-साथ प्रकृति को भी इसमें शामिल करते हुए कहता है “सुन्दर हैं सुमन,विहग सुंदर, मानव तुम सबसे सुन्दरतम”। कुल मिलाकर यह काव्यान्दोलन मानव मुक्ति की प्रबल भावना से निर्मित है जिसके बारे में नामवर सिंह ने ठीक कहा है “छायावाद उस राष्ट्रीय जागरण की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है जो एक ओर पुरानी रूढ़ियों से मुक्ति चाहता है और दूसरी ओर विदेशी पराधीनता से।”5

अब तक के उपरोक्त तीनों काव्यान्दोलनों में अनिवार्यता और अवधारणात्मकता को प्रवृत्तिगत विकास के रूप में ही देखा जा सकता है क्योंकि इनमें आंदोलन के प्रमुख तत्व विचारधारा की अनुपस्थिति ही रही है परंतु परंपरा के रूप में इन्हें नाकारा भी नहीं जा सकता है। वास्तविक रूप में काव्यांदोलन की शुरुआत प्रगतिवाद के रूप में देखी जा सकती है। मार्क्सवाद को केंद्र में रखने वाली इस धारा की उत्पत्ति भारत में ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के साथ मानी जाती है जो1936-43 का दौर है। इस काव्यान्दोलन की अनिवार्यता को वैश्विक स्तर पर व्याप्त मार्क्सवाद के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद, वर्ग संघर्ष, तथा अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत के रूप में समझा जा सकता है जो साहित्य को उत्पादन प्रणाली का एक उपउत्पाद मनाता है जिसका उद्देश्य शोषितों को शोषण के प्रति जागरूक बनाना है इस रूप में वह रचना के कथ्य पर ज्यादा जोर देता है शिल्प के बजाय। अवधारणा के रूप में यह काव्यान्दोलन आध्यात्मिकता के बजाय भौतिकतावाद पर अधिक जोर देता है इस रूप में यह समाजवादी यथार्थवाद पर बल देते हुए कहता है “दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद, चमक उठीं घर भर की आँखे कई दिनों के बाद”। साम्यवाद को आदर्श मानते हुए इस धारा का कवि मार्क्सवाद में विश्वास रखते हुए मजदूरों एवं क्रांति करने वाली सेना के स्त्री पुरुषों को लाल सलाम कहता है, वह पूंजीवादी व्यवस्था से घृणा करते हुए उसे मरण, रिक्त और व्यर्थ कहता है और शोषितों के प्रति सहानुभूति रखते हुए उसे लोहे के रूप में निरूपित करते हुए कहता है “मैंने उसको जब जब देखा, लोहा देखा, लोहा जैसे तपते देखा, ढलते देखा”। सहज भाषा, साफगोई, और लोक धुनों और बिम्बों को आधार बनाने वाली इस धारा के बारे में रेखा अवस्थी ने उचित टिप्पणी की है “प्रगतिवाद ने रचनाकारों की सौन्दर्यवृत्ति, विचारदृष्टि और रचना सामर्थ्य को उन अवरोधों से मुक्त किया जो आध्यात्मवाद, रहस्यवाद, आदर्शवाद, कलावाद आदि के नाम पर उन्हें कुंठित कर रहे थे। नए यथार्थवादी सौंदर्य, समाजवादी विचारधारा, मानववाद और जनसंस्कृति के उपादानों से कविता को समृद्ध करने के प्रयास आरम्भ हुए।”6

जिस प्रकार स्थूल के प्रति सूक्ष्म के विद्रोह से छायावाद आया उसी प्रकार वैचारिक प्रतिबद्धता के विरोध में स्वानुभूति की प्रामाणिकता को केंद्र में रखकर प्रयोगवाद आया। तारसप्तक की भूमिका में अज्ञेय ने इसे जीवन सत्यों के अन्वेषण का माध्यम माना है। बच्चन सिंह के शब्दों में कहें तो “तारसप्तक की निषेधात्मक प्रवृति है छायावाद से मुक्ति पाने का प्रयास और प्रयोगों के द्वारा नए राग सत्य की अभिव्यक्ति।”7 अवधारणा के रूप में इस धारा में भावुकता और बौद्धिकता के संश्लेषण पर जोर देते हुए कवि कहता है “सुनो कवि, भावनाएं नहीं हैं सोता, भावनाएं खाद हैं केवल”। नवीन राहों का अन्वेषण करते हुए वह प्रदत्त सत्यों को नकारते हुए टूटने के सुख को महसूस करता है, नदी के द्वीप के रूप में व्यक्ति को महत्त्व देता है तो “बस उतना ही क्षण अपना, तुम्हारी पलकों का कँपना” कहकर क्षण की महत्ता को भी उजागर कर देता है। प्रयोगवादी कवि शहरी है उसका प्रेम बौद्धिक है, जीवन की एक जरूरत है इसीलिए वह फूल को प्यार करने को तो कहता है लेकिन उसको झड़े तो झड़ जाने देने को भी कहता है। कथ्य के बजाय वः शिल्प पर जोर देता है और मानता है कि जितनी हमारी भाषा होती है, हम उतना ही सोच सकते हैं इसी कारण उपमान और प्रतीक उसे प्रिय हैं।

प्रयोगवादी काव्य अंदोलन के निर्माण में स्वतंत्रता पूर्व के अकाल, आंदोलन, विश्वयुद्ध आदि की प्रमुख भूमिका रही है और उतना ही योगदान स्वतंत्रता पश्चात की परिस्थितियों का भी है इसी की अगली कड़ी के रूप में स्वतंत्रता प्राप्ति के आरंभिक दौर में नई कविता आंदोलन का जन्म हुआ जिसके केंद्र में भी प्रयोगवादी प्रेरणा स्रोत की तरह मनोविश्लेषणवाद, निर्वैयक्तिकता सिद्धांत, क्षणवादी मानसिकता, नई समीक्षा आंदोलन, और अस्तित्ववाद की प्रमुख भूमिका रही है। रामविलास शर्मा के शब्दों में कहें तो “हिंदी के अधिकांश नई कविता लिखने वालों का हाल रोकान्तै जैसा है। ऊब, ऊबकाई, अकेलापन, बुरे बुरे सपने, त्रास, आत्महत्या की चाह…… आदि आदि लक्षण इनमे मिलाता हैं।”8 दरअसल इस काव्यान्दोलन के अनिवार्यता के पीछे आजादी के बाद पैदा विषमता, मशीनीकरण, शहरीकरण, यांत्रिकता, अकेलापन और आत्मनिर्वासन का भाव प्रमुख है। इससे उतपन्न अवधारणा के फलस्वरूप नया कवि लघुमानव की धारणा पर जोर देता है, वह भोगे हुए यथार्थ पर बल देते हुए कहता है कि “मैं नया कवि हूँ, इसीसे जानता हूँ, सत्य की चोट कितनी गहरी होती है” आधुनिक भावबोध के इस कवि की संवेदना भी आधुनिक है वह महानगरीय जीवन की विषंगतियां और त्रासदियां बताते हुए कहता है कि “आदमी से ज्यादा लोग पोस्टरों को पहचानते है, वे आदमी से बड़े सत्य हैं” नामवर सिंह ने इस बदलते काव्य स्वरूप पर उचित टिप्पणी की है कि “नई कविता ने कविता के नए मूल्यों को प्रतिष्ठित करने के साथ ही कविता पढ़ने की नई पद्धति की आवश्यकता भी प्रदर्शित की है।”9 शिल्प के तौर पर इस धारा का कवि भाषा पर अधिक बल देता है नए भाव बोध के लिए वह नए नए उपमानों का प्रयोग करता है, जगदीश गुप्त नई कविता के इस पक्ष पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि “नया कवि छंद को संवारने की अपेक्षा वस्तु तत्व को व्यवस्थित करने, उसके रूप को उभारने और अनभूति के मूल ढांचे को सशक्त बनाने का विशेष प्रयत्न करता है।”10

नई कविता के बाद के समय को काव्यान्दोलन के तौर पर समकालीन कविता के रूप में जाना जाता है वैसे छठें दशक से लेकर वर्तमान तक को समेटने वाले इस काव्यांदोलन का निर्माण आजादी से प्राप्त मोहभंग, आपातकाल, नक्सलबाड़ी आंदोलन, तथा 90 के बाद आए उदारीकरण, वैश्वीकरण, तथा निजीकरण जैसी परिस्थितियों में हुआ है इस कारण इसके अंतर्गत कई प्रकार की प्रवृत्तियों का विकास हुआ जिससे इस काव्यान्दोलन के भीतर भी कई काव्य धाराओं का विकास हुआ जिसे अकविता, जनवादी कविता, नवगीत, आज की कविता, युयुत्सुवादी कविता आदि नामों से पुकारा गया वास्तविक रूप में समकालीन कविता इन्हीं का ही समुच्चय है, जिसमें अकविता का कवि अवधारणा के रूप में अवांगार्द तथा एंटी पोएट्री आंदोलन से प्रभावित होकर सभी विचार और आदर्शों का विध्वंस करता हुआ कहता है कि “पर जब सभी कुछ, ऊल ही जुलूल है, सोचना फिजूल है”। वह मानवीय सम्बन्धों के प्रति अनास्था को प्रकट करते हुए प्रेम को रोग कहता है और उसे भट्टी में झोंक देने का आपेक्षी है। वहीं जनवादी कवि में संसदीय लोकतंत्र के प्रति तीव्र आक्रोश है वह संसद को आधे तेल और आधे पानी मिश्रित तेली की घानी घोषित करता है। वह आमूलचूल परिवर्तन के लिए हंगामे के बजाय सूरत बदलने वाली कोशिश पर भी जोर देने की बात करता है, साथ ही नवगीत के रूप में वह क्रांतिकारी मानसिकता को प्रदर्शित करते हुए लोहे की छड़ों में बंद युग के सवेरे के मुक्ति की बात भी करता है और उसके साथ-साथ भीड़तंत्र में तब्दील होती जा रही लोकतान्त्रिक व्यवस्था के प्रति भी असन्तोष का भाव प्रकट करता है। रामविलास शर्मा के शब्दों में कहें तो “यह मूल्यों के विघटन का युग है। हर चीज टूट रही है, कवि टूट रहा है, कविता टूट रही है। फासिस्ट तानाशाही के पनपने के लिए वह हवा बहुत मुफीद होती है जिसमें मनुष्य के लिए हत्या और आत्महत्या में ज्यादा फर्क न रहे।”11 वहीं आठवें और नवें दशक की कविता में कवि उत्तराधुनिकता से पैदा उपभोक्तावादी संस्कृति, अस्मितापरक मूल्यों, और नव उदारीकरण के तत्वों की गहनता से निरन्तर पड़ताल कर रहा है। मदन कश्यप के शब्दों में कहें तो “नए कवियों के पाथेय की चर्चा तो पिछले प्रश्न में ही विस्तार से कर चुका हूँ। मैं उसमें साम्राज्यवाद, साम्प्रदायिकता, और उदारीकरण से पैदा हुई बाजार की तानाशाही के विरोध को भी शामिल करना चाहूंगा।”12

इस प्रकार विभिन्न काव्यान्दोलनों की अनिवार्यता और अवधारणात्मकता को समझा जा सकता है और यह भी कहा जा सकता है कि साहित्य की विधाओं और समाज के आंदोलनों के बीच एक अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है जो एक दूसरे के स्वरूप निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं ।

सन्दर्भ परिचय

1. पृ.स.- 416, हिंदी साहित्य का इतिहास, डॉ. नगेन्द्र

2. पृ.स.- 65, भारतेंदु हरिश्चन्द्र और हिंदी नवजागरण की समस्याएं,रामविलास शर्मा

3. पृ.स.- 40, हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास, गणपति चंद्र गुप्त

4. पृ.स.- 94, हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी

5. पृ.स.- 17, छायावाद, नामवर सिंह

6. पृ.स.- 114, प्रगतिवाद और समानांतर साहित्य, रेखा अवस्थी

7. पृ.स.- 258, आधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास, बच्चन सिंह

8. पृ.स.- 115, नयी कविता और अस्तित्ववाद, रामविलास शर्मा

9. पृ.स.- 35, कविता के नए प्रतिमान, नामवर सिंह

10. पृ.स.- 23, नई कविता सैद्धांतिक पक्ष, जगदीश गुप्त

11. पृ.स.- 120, नयी कविता और अस्तित्ववाद, रामविलास शर्मा

12. पृ.स.- 20, हिंदी कविता 80 के बाद (वागर्थ), सं.- एकांत श्रीवास्तव

संदर्भ ग्रन्थ परिचय

1. डॉ. नगेन्द्र, हिंदी साहित्य का इतिहास, मयूर पेपरबैक्स, पैंतीसवां पुनर्मुद्रण, 2009

2. रामविलास शर्मा, भारतेंदु हरिश्चंद्र और हिंदी नवजागरण की समस्याएं, राजकमल प्रकाशन, पहली आवृत्ति, 2014

3. गणपति चंद्र गुप्त, हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास, लोकभारती प्रकाशन, बारहवां संस्करण, 2010

4. रामस्वरूप चतुर्वेदी, हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, लोकभारती प्रकाशन, तेइसवां संस्करण, 2010

5. नामवर सिंह, छायावाद, राजकमल प्रकाशन, ग्यारहवीं आवृति, 2011

6. रेखा अवस्थी, प्रगतिवाद और समानांतर साहित्य, राजकमल प्रकाशन, पहला संस्करण, 2012

7. बच्चन सिंह, आधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास, लोकभारती प्रकाशन, संशोधित संस्करण, 2005

8. रामविलास शर्मा, नयी कविता और अस्तित्ववाद, राजकमल प्रकाशन, आवृति, 2010

9. नामवर सिंह, कविता के नए प्रतिमान, राजकमल प्रकाशन, नौवीं आवृति, 2010

10. जगदीश गुप्त, नयी कविता सैद्धांतिक पक्ष, लोकभारती प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 2010

11. एकांत श्रीवास्तव और कुसुम खेमानी(सं.), वागर्थ (अंक-209) (हिंदी कविता : 80 के बाद), भारतीय भाषा परिषद, दिसम्बर 2012

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हिंदी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, एम.ए. (हिंदी) पाठ्यक्रम

एम.. (हिंदी) पाठ्यक्रम

पाठ्यक्रमों का सत्रानुसार विवरण

एम00 (हिंदी) प्रथम वर्ष

पहला सत्र (पावस सत्र)

पहला प्रश्नपत्र                   –           छायावादी काव्य

दूसरा प्रश्नपत्र                   –           निबंध और नाटक

तीसरा प्रश्नपत्र                  –           भाषा विज्ञान एवं हिंदी भाषा

चैथा प्रश्नपत्र                    –           हिंदी साहित्य का इतिहास (आरंभ से रीतिकाल तक)

दूसरा सत्र (शीतकालीन सत्र)

पांचवाँ प्रश्नपत्र                 –           छायावादोत्तर काव्य

छठा प्रश्नपत्र                    –           कथा-साहित्य

सातवां प्रश्नपत्र                 –           हिंदी साहित्य का इतिहास (भारतेंदु युग से अब तक)

आठवां प्रश्नपत्र (वैकल्पिक)-           कोई एक मूलभाषा (संस्कृत/प्राकृत/पालि/अपभ्रंश) अथवा आधुनिक भारतीय भाषा (बंगला/मराठी/तेलुगु/ कन्नड़/उर्दू/ तमिल)।

एम00 (हिंदी) द्वितीय वर्ष

तीसरा सत्र (पावस सत्र)

नवाँ प्रश्नपत्र                                 –           आदिकालीन एवं निर्गुणकाव्य

दसवाँ प्रश्नपत्र                               –           सगुण भक्ति काव्य

ग्यारहवां प्रश्नपत्र                           –           संस्कृत काव्यशास्त्र

बारहवाँ प्रश्नपत्र                            –           आधुनिक भारतीय साहित्य

चैथा सत्र (शीतकालीन सत्र)

तेरहवाँ प्रश्नपत्र                 –           रीतिकाव्य

चैदहवाँ प्रश्नपत्र                –           पाश्चात्य साहित्य-सिद्धांत

पन्द्रहवाँ प्रश्नपत्र                –           हिंदी समीक्षा

सोलहवाँ प्रश्नपत्र (वैकल्पिक)-         किसी एक साहित्यकार (जायसी/सूर/तुलसी/भारतेन्दु

हरिश्चन्द्र/प्रेमचंद/प्रसाद/निराला/ रामचन्द्र शुक्ल/ हजारीप्रसाद द्विवेदी/ अज्ञेय/ मुक्तिबोध/ यशपाल/जैनेन्द्र/ अमृतलाल नागर) अथवा किसी एक साहित्य प्रवृत्ति (संतकाव्य/रीतिकाव्य/ आधुनिक  हिंदी साहित्य 1919- 1947/ स्वातंत्र्योत्तर हिंदी साहित्य) अथवा किसी एक भाषापरक या अन्य विषय (हिंदी भाषाशिक्षण /अनुवाद: सिद्धांत एवं प्रयोग/प्रयोजनमूलक हिंदी/ बोली विज्ञान एवं सर्वेक्षण पद्धति/हिंदी पत्रकारिता – इतिहास, सिद्धांत और प्रयोग/हिंदी नाटक एवं रंगमंच/हिंदीतर एवं देशांतर क्षेत्रों का हिंदी साहित्य/भारतीय साहित्य/लोक साहित्य) का विशेष अध्ययन ।

एम. ए. (हिंदी) प्रथम वर्ष

पहला प्रश्नपत्र: छायावादी काव्य

पाठ्यांश:

1- कामायनी: जयशंकर प्रसाद (चिंता, आशा एवं श्रद्धा सर्ग)

2- अनामिका: निराला (राम की शक्तिपूजा, सरोजस्मृति)

3- तारापथ: सुमित्रानंदन पंत (बादल, भावी पत्नी के प्रति, नौका विहार, अनामिका के कवि के प्रति, आः धरती कितना देती है)

4- दीपशिक्षा: महादेवी (पंथ होने दो अपरिचित, सब बुझे दीपक जला लूँ, जब यह दीप थके तब आना, यह मंदिर का दीप, जो न प्रिय पहचान पाती, मोम सा तन घुल चुका, सब आँखों के आँसू उजले, मैं पलकों में पाल रही हूँ, पूछता क्यों शेष कितनी रात, अलि मैं कण कण को जान चली)

 

अनुशंसित ग्रंथ:

1- जयशंकर प्रसाद – नंददुलारे वाजपेयी, भारती भंडार, इलाहाबाद

2- कामायनी – एक पुनर्विचार – मुक्तिबोध, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली

3- निराला की साहित्य साधना (तीन भाग) – रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली

निराला की साहित्य साधना खंड 1, निराला की साहित्य साधना खंड – 2, निराला की साहित्य साधना खंड 3

4- सुमित्रानंदन पंत: डॉ. नगेन्द्र

5- छायावाद: नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली

6- महादेवी वर्मा: जगदीश गुप्त, नई दिल्ली, 1994

7- छायावाद की प्रासंगिकता: रमेशचन्द्र शाह, नई दिल्ली, 1973

8- छायावाद और नवजागरण: महेन्द्रनाथ राय, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली

 

दूसरा प्रश्नपत्र

निबंध और नाटक

पाठ्यांश:

अनुशंसित ग्रंथ:

 

तीसरा प्रश्नपत्र

भाषा विज्ञान एवं हिंदी भाषा

पाठ्यांश:

  1. भाषा: परिभाषा, तत्त्व, अंग, प्रकृति और विशेषताएं । भाषा परिवर्तन के कारण एवं दिशाएं ।
  2. भाषाविज्ञान – परिभाषा एवं स्वरूप, अंग, प्रमुख अध्ययन-पद्धतियाँ ।
  3. स्वनविज्ञान – परिभाषा, स्वन, संस्वन और स्वनिम । औच्चारणिक स्वनविज्ञान (स्वनयंत्र और स्वन उत्पादन प्रक्रिया), स्वनभेद, मानस्वर, स्वनपरिवर्तन के कारण एवं दिशाएं ।
  4. स्वनिमविज्ञान – परिभाषा, स्वनिम के भेद – स्वनिम और उपस्वनिम, स्वनिमवितरण के सिद्धांत ।
  5. रूपिमविज्ञान – शब्द और रूप (पद), संबंध तत्त्व और अर्थतत्त्व, रूप, संरूप, रुपिम और स्वनिम, रूपिमों का स्वरूप, रूपिमों का वर्गीकरण ।
  6. वाक्यविज्ञान – वाक्य की परिभाषा, संरचना, निकटस्थ अवयव, वाक्य के प्रकार, वाक्य-रचना में परिवर्तन – कारण एवं दिशाएं ।
  7. अर्थविज्ञान – शब्दार्थ सम्बन्ध विवेचन, अर्थपरिवर्तन के कारण एवं दिशाएं
  8. भाषाविज्ञान की प्रमुख शाखाएं – समाजभाषा विज्ञान, शैलीविज्ञान और कोशविज्ञान का सामान्य परिचय ।
  9. संपर्क भाषा एवं राजभाषा के रूप में हिंदी
  10. नागरी लिपि का मानकीकरण । 

अनुशंसित ग्रंथ:

  1. भाषा विज्ञान की भूमिका – देवेन्द्र नाथ शर्मा, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली
  2. भाषा विज्ञान – भोलानाथ तिवारी, किताब महल, इलाहाबाद ।
  3. सामान्य भाषाविज्ञान- बाबूराम सक्सेना, हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग
  4. हिंदी भाषा का उद्भव और विकास – उदयनारायण तिवारी, भारती भंडार, इलाहाबाद ।
  5. भाषा और समाज – रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली
  6. राष्ट्रभाषा हिंदी: समस्याएं और समाधान – देवेन्द्रनाथ शर्मा, लोकभारती, इलाहाबाद ।
  7. भारत की भाषा समस्या – रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली
  8. संपर्क भाषा हिंदी – सं0 सुरेश कुमार, ठाकुर दास, केन्द्रीय हिंदी संस्थान, आगरा ।
  9. राजभाषा हिंदी: प्रचलन और प्रसार – डॉ. रामेश्वर प्रसाद, अनुपम प्रकाशन, पटना
  10. नागरी लिपि: हिंदी और वर्तनी – अनंत चैधरी, दिल्ली माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय, दिल्ली
  11. समसामयिक हिंदी में रूपस्वानिमिकी – सुधाकर सिंह

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हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय

एम.ए. हिंदी पाठ्यक्रम

सत्रप्रश्न पत्र शीर्षक 
प्रथम सत्र101- हिंदी साहित्य का इतिहास (आदिकाल से रीतिकाल तक) 
 102- आदिकालीन हिंदी काव्य 
 103- भक्तिकालीन हिंदी काव्य 
 104- हिंदी कथा साहित्य 
 105- भारतीय काव्यशास्त्र 
द्वितीय सत्र201- रीतिकालीन हिंदी काव्य 
 202- आधुनिक हिंदी काव्य-1 
 203- हिंदी नाटक 
 204- सामान्य भाषाविज्ञान 
तृतीय सत्र301- आधुनिक हिंदी काव्य- 2 
 302- हिंदी आलोचना 
 303- हिंदी के अनेक गद्य रूप 
 304- हिंदी साहित्य का इतिहास (आधुनिक काल) 
 305- पाश्चात्य काव्यशास्त्र 
 202- आधुनिक हिंदी काव्य-1 
 203- हिंदी नाटक 
 204- सामान्य भाषाविज्ञान 

प्रथम सत्र [प्रश्न पत्र- 1] [101- हिंदी साहित्य का इतिहास (आदिकाल से रीतिकाल तक)]

इकाई – 1: इतिहास-दर्शन

 इतिहास और आलोचना, इतिहास और अनुसंधन

 साहित्येतिहास-दर्शन के समकालीन सिद्धान्त

 साहित्येतिहास-लेखन की प्रमुख अवधरणाएँ: मध्ययुगीनता, पुनर्जागरण और आधुनिकता

 हिंदी साहित्य के इतिहासों का इतिहास

 काल-विभाजन और उसकी समस्याएँ

इकाई – 2: आदिकाल

 नामकरण की समस्या, पृष्ठभूमि: विभिन्न परिस्थितियाँ

 रासोकाव्य-परंपरा, प्रमुख प्रवृत्तियाँ

 प्रमुख कवि (चंदबरदाई, जगनिक, अमीर खुसरो, विद्यापति)

इकाई – 3: भक्तिकाल

पृष्ठभूमि एवं प्रवृत्तियाँ

प्रमुख एवं गौण कवि तथा उनका काव्य (कबीर, रविदास, दादू, सुंदरदास, कुतुबन, मंझन, जायसी,

तुलसीदास, सूरदास, नंददास )

निर्गुण एवं सगुण काव्यधराएँ: प्रमुख विशेषताएँ

इकाई – 4: रीतिकाल

नामकरण की समस्या

पृष्ठभूमि एवं प्रवृत्तियाँ

प्रमुख एवं गौण कवि तथा उनका काव्य (केशव, बिहारी, देव, मतिराम, घनानंद, बोध, आलम, ठाकुर,

गुरुगोविंद सिंह, रज्जब)

रीतिबद्ध और रीतिमुक्त काव्यधराओं की विभेदक विशेषताएँ

प्रस्तावित पुस्तकें-

हिंदी साहित्य का इतिहास: रामचंद्र शुक्ल

हिंदी साहित्य की भूमिका: हजारीप्रसाद द्विवेदी

रीतिकाव्य की भूमिका: डॉ. नागेंद्र

हिंदी साहित्य का इतिहास: संपादक डॉ. नागेंद्र

साहित्य का इतिहास दर्शन: नलिन विलोचन शर्मा

हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास: रामकुमार वर्मा

अन्य सहायक पुस्तकें

साहित्य और इतिहास दृष्टि: मैनेजर पाण्डेय

मध्यकालीन बोध् का स्वरूप: हजारीप्रसाद द्विवेदी

हिंदी साहित्य का अतीत (भाग 1, 2): विश्वनाथ प्रसाद मिश्र

हिंदी साहित्य का इतिहास: पूरनचंद टंडन, विनीता कुमारी

अप्रभ्रंश साहित्य: हरिवंश कोछड़

आदिकालीन हिंदी साहित्य की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि: राममूर्ति  त्रिपाठी

हिंदी साहित्य के इतिहास पर कुछ नोट्स: रसाल सिंह

प्रथम सत्र [प्रश्न पत्र- 2] [102- आदिकालीन हिंदी काव्य]

इकाई 1: दोहाकोश: (सं.) राहुल सांकृत्यायन

षड्दर्शन खंडन-ब्राह्मण: दोहा 1, 2

करुणा सहित भावना: दोहा-17

चित्त: दोहा-24, 25

सहज, महासुख: दोहा-42, 43, 44

परमपद: 49

देह ही तीर्थ: 96

(कुल: 10)

इकाई 2; गोरखबानी: (सं) पीतांबरदत्त बड़थ्वाल

पद-1 से 20 तक

इकाई 3:  पृथ्वीराज रासो: (सं) माता प्रसाद गुप्त

कयमासवध् (संपूर्ण)

इकाई 4: विद्यापति की पदावली: (सं) रामवृक्ष बेनीपुरी

पद: 1, 2, 5, 10, 18, 23, 27, 29, 36, 42 (कुल;10 पद)

प्रस्तावित पुस्तकें

हिंदी साहित्य का आदिकाल: हजारी प्रसाद द्विवेदी

अपभ्रंश साहित्य: हरिवंश कोछड़

नाथ संप्रदाय: हजारीप्रसाद द्विवेदी

हिंदी के विकास मे अपभ्रंश का योग: नामवर सिंह

पृथ्वीराज रासो की भाषा: नामवर सिंह

अन्य सहायक पुस्तकें

प्राकृत-अपभ्रंश साहित्य और उसका हिंदी पर प्रभाव: राम सिंह तोमर

सिद्ध-साहित्य: धर्मवीर भारती

अपभ्रंश भाषा और साहित्य: राजमणि शर्मा

विद्यापति: शिव प्रसाद सिंह

आदिकालीन हिंदी साहित्य: अध्ययन की दिशाएँ: अनिल राय

गोरखनाथ और उनका युग: रांगेय राघव

प्रथम सत्र [प्रश्न पत्र- 3] [103- [भक्तिकालीन हिंदी काव्य]

इकाई – 1: कबीर

कबीर: हजारीप्रसाद द्विवेदी

पद स संख्या: 35, 108, 112, 123, 126, 134, 153, 168, 181, 206, 250 (कुल 11)

साखी स संख्या: 103, 113, 139, 157, 190, 191, 199, 200, 201, 231, 237 (कुल 11)

इकाई – 2: जायसी

जायसी-ग्रंथावली: रामचन्द्र शुक्ल (सं.)

नागमती वियोग खंड

इकाई – 3: सूरदास

भ्रमरगीतसार: रामचन्द्र शुक्ल (सं.)

पद संख्या: 3, 4, 7, 9, 11, 16, 18, 21, 22, 24, 30, 34, 37, 42, 45, 52, 62, 75, 85, 100,

 125, 133 (कुल 22)

इकाई – 4: तुलसीदास

विनय पत्रिका: (सं.) वियोगी हरि

पद स संख्या: 90, 101, 102, 105, 111, 112, 115, 116, 117, 119, 120, 121, 123, 124, 162,

 167, 172, 174, 198, 201 (कुल 20)

प्रस्तावित पुस्तकें

गोस्वामी तुलसीदास: रामचंद्र शुक्ल

तुलसी आधुनिक वातायन से: रमेश कुंतल मेघ

लोकवादी तुलसीदास: विश्वनाथ त्रिपाठी

तुलसी काव्य-मीमांसा: उदयभानु सिंह

गोसाईं तुलसीदास: विश्वनाथ प्रसाद मिश्र

सूरदास: रामचन्द्र शुक्ल

सूर साहित्य: हजारी प्रसाद द्विवेदी

अन्य सहायक पुस्तकें

महाकवि सूरदास: नंद दुलारे वाजपेयी

सूर और उनका साहित्य: हरवंशलाल शर्मा

सूरदास: ब्रजेश्वर वर्मा

कबीर: हजारी प्रसाद द्विवेदी

कबीर की विचारधरा: गोविंद त्रिगुणायत

कबीर साहित्य की परख: परशुराम चतुर्वेदी

त्रिवेणी: रामचन्द्र शुक्ल

जायसी: विजयदेव नारायण साही

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महादेवी वर्मा जी की रचनाएँ एवं उनपर आधारित आलोचनात्मक पुस्तकें

रचनाएँ

 रश्मि

शृंखला की कड़ियाँ

नीरजा

यामा

अतीत के चलचित्र 

दीप शिखा

स्मृति की रेखाएँ

नीहार 

मेरे प्रिय निबंध 

मेरे प्रिय संभाषण

वंग-दर्शन 

क्षणदा

सहायक ग्रंथ 

महादेवी: विचार और व्यक्तित्व- शिवचंद्र सागर 

महादेवी का विवेचनात्मक गद्य 

महादेवी वर्मा अभिनंदन ग्रंथ 

महादेवी: रामचंद गुप्त

महादेवी: हर्षनंदिनी भाटिया 

महादेवी वर्मा: गंगा प्रसाद पाण्डेय, संत कुमार वर्मा 

महादेवी वर्मा: शचीरानी गुर्टू

महादेवी की काव्य साधना: शिवमंगल सिंह सुमन 

महादेवी का काव्य: सुमीत्रानंदन पंत 

महादेवी की रहस्य साधना 

महादेवी का काव्य वैभव: रमेशचन्द्र गुप्त

महादेवी का काव्य परिशीलन: भगवतीप्रसाद सिहानिया 

महादेवी के काव्य में वेदना: डॉ. प्रभा खरे 

महादेवी संस्मरण ग्रंथ: सुमीत्रानंदन पंत 

महादेवी नया मूल्यांकन: डॉ. गणपती चंद गुप्त 

महादेवी और उनका आधुनिक कवि: तारकनाथ बाली 

महादेवी काव्य के विविध आयाम: असीम मधुपुरी

पुस्तक खरीदने हेतु 

यामा

मेरा परिवार

अतीत के चलचित्र 

महादेवी वर्मा पर राजकमल प्रकाशन की पुस्तकें 

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साभार: पब्लिक लाईब्रेरी ऑफ इंडिया, इन्टरनेट आर्काइव, ई-पुस्तकालय 

[नोट: सभी पुस्तकें ओपन सोर्स माध्यम से ली गयी है जिसका लिंक दिया गया है। ]

यदि कोई पुस्तक कॉपीराइट के दायरे में आती हो तो उसे हटा दिया जाएगा

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हिंदी विभाग, बीएनएमयू (मधेपुरा)

सामग्री साभार: अजय आनंद, सहायक प्राध्यापक

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