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साहित्यिक विमर्श

परसाई : उत्पीड़ित शोषित अवाम की आवाज

परसाई ने अपने लेखन से एक बड़ी आबादी गरीब मजदूर और उत्पीड़ित और शोषित आबादी को बड़े पैमाने पर प्रभावित करने में सफल हुए कि ये आजादी मुकम्मल आजादी नहीं है. परसाई ने अपने लेखन में व्यंग्य को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया और व्यंग्य से उन्हें स्पिरिट मिलने लगी

सत्ता, साम्प्रदायिकता और ध्रुवीकरण की राजनीति बनाम समकालीन हिंदी कविता

‘सत्ता’ यह एक ऐसी शक्ति जिसे हर कोई पाकर शक्तिशाली बन जाता है और जो जीवन के सभी क्षेत्रों को प्रभावित करती है। सत्ता प्राप्ति के लिए साम,दाम दंड,भेद आदि का प्रयोग करना जायज माना जाता है। दरअसल, वह ‘फूट डालो और राज करो’ की कूटनीति से अपने आप को बनाये रखने की नापाक कोशिश करती है।

हिंदी की आरम्भिक आलोचना का विकास (तुलनात्मक आलोचना के विशेष संदर्भ में )-रवि कुमार

आधुनिक युग का उदय साहित्य में अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ है। जिसमें भारतेंदु और उनके युग के लेखकों ने विशेष भूमिका निभाई हैं। हिंदी आलोचना का उदय इसी साहित्यिक भूमिका की देन है। वैसे तो हिंदी आलोचना का आरंभ बाल्मीकि के कंठ से निकले पहले पद्य से ही हो जाता है परन्तु आधुनिक युग में गद्य के विकास से हिंदी आलोचना को गति प्रदान होती है। आरंभिक हिंदी आलोचना का विकास पत्र-पत्रिकाओं से आरंभ होता है। इन्हीं आरंभिक पत्र-पत्रिकाओं में आलोचना की बहसों के साथ तुलनात्मक आलोचना भी विकसित होती है। वैसे तो तुलनात्मक आलोचना के सूत्र हमें संस्कृत साहित्य में सूक्तियों के रूप में मिलते है और ये सूक्तियां ही आगे चल कर हिंदी आलोचना में भी विकसित होती हैं। इस लेख में हिंदी की इसी आरम्भिक तुलनात्मक आलोचना के स्वरूप, बहसों, एक-दूसरे रचनाकार को बड़ा दिखने की प्रतिस्पर्धा और तुलनात्मक आलोचना के विकसित होने के कारण हिंदी आलोचना में आयी गिरावट को दिखाया गया है।

हिन्दी कविता की परम्परा में ग़ज़ल-डा. जियाउर रहमान जाफरी

गजल हिंदी की बेहद लोकप्रिय विधा है. यह जब उर्दू से हिंदी में आई तो इसने अपना अलग लहजा अख्तियार किया. उर्दू का यह प्रेम काव्य हिंदी में जन समस्याओं से जुड़ गया. ग़ज़ल की परंपरा भले खुसरो कबीर या भारतेंदु होते हुए आगे बढ़ी हो, लेकिन ग़ज़ल को एक विधा के तौर पर स्थापित करने का काम दुष्यंत ने किया. आलोचना के स्तर पर भी आज ग़ज़ल को स्वीकारा जा रहा है. हिंदी के कई गजलगो दुष्यंत के बाद की इस परंपरा को संभाले हुए हैं.

विभिन्न कविता आंदोलनों की अनिवार्यता और अवधारणात्मकता-ऋषिकेश सिंह

आधुनिक काल में भारतेंदु, द्विवेद्वी, छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता, अकविता, तथा समकालीन कविता जैसे काव्यान्दोलनों का उभार हुआ जिसे स्वतंत्रता पूर्व और पश्यात दो भागों में भी बाँट सकते हैं। इन काव्यान्दोलनों के उद्भव में सबसे प्रमुख भूमिका नवजागरण एवं आधुनिकता के विचारधारा की उत्पत्ति का है।

हिन्दी-उर्दू का अन्तर्संबंध और निदा फ़ाज़ली की कविता-ग़ज़ल: डॉ. बीरेन्द्र सिंह

हिन्दी-उर्दू का भेद है नहीं, उसे बनाया जाता है । प्रेमचंद भी यही मानते थे और उनका तो लेखन भी इस बात का गवाह है कि अगर बोलचाल की भाषा का ही प्रयोग लेखन में भी किया जाये तो हिन्दी उर्दू में कहीं कोई भेद है ही नहीं । फिर हिन्दी-उर्दू के बीच यह भेद की दीवार कैसे खड़ी हो गई, इसके पीछे का इतिहास क्या है, अब आइए इस पर भी ज़रा निगाह डालते हैं ।

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