‘हिन्द स्वराज’ की पृष्ठभूमि- मृत्युंजय पाण्डेय

काल मार्क्स की प्रसिद्ध उक्ति है- “दार्शनिकों ने केवल विभिन्न रूपों में दुनिया की व्याख्या ही की है, लेकिन असली काम तो उसे बदलने का है।”1 पर गांधी ऐसे दार्शनिक हैं जिन्होंने दुनिया की व्याख्या करने के साथ ही उसे बदलने की कोशिश भी की। गांधी का सारा जीवन सामाजिक अन्याय, आर्थिक विषमता, शोषण, गरीबी और उंच-नीच के भेद-भाव को खत्म करने की कोशिश में बीत गया। “उन्होंने भारत की हजारों वर्ष की जिंदगी की धड़कन को, उसकी लय को, उसकी सोच और संस्कृति को, उसके सम्पूर्ण सारतत्व को बड़ी गहराई से आत्मसात् किया और अपने जीवन में उसी को मूर्त किया। उन्हें देखकर कहा जा सकता था कि यह आदमी ‘भारत’ है।”2

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 राज्य-हिंसा पर विचार: क्या भारत एक हिंसक राज्य है?-अम्बिकेश कुमार त्रिपाठी

राज्य-हिंसा पर विचार करने से पहले हम मुख्यरूप से हिंसा की तीन स्थितियों की कल्पना कर राज्य की भूमिका का स्थापन करने का प्रयास करते हैं।

पहला, 
कुछ व्यक्तियों का समूह उनके निवास-स्थल के
 
नजदीक
 
लग रहे परमाणु संयंत्र के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रतिरोध कर रहा है
,
 क्योंकि इस परमाणु संयंत्र से होने वाले
 
रेडियोएक्टिव खतरे उनके सुरक्षित जीवन-यापन के विरूद्ध गंभीर खतरा उत्पन्न कर सकते हैं। राज्य की पुलिस ने उस जनसमूह के खिलाफ लाठीचार्ज किया और लोग गंभीर रूप से घायल हो गए है।
 दूसरा, 
बहुसंख्यक वर्ग के लोग सांप्रदायिक उन्माद में अल्पसंख्यक वर्ग के खिलाफ हथियार लेकर सड़कों पर उतर गए हैं और बड़ी मात्रा में अल्पसंख्यक वर्ग के लोगों की हत्या कर रहे हैं और राज्य की मशीनरी अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करने में अनिच्छुक और उदासीन दिखाई पड़ रही है।
 तीसरा, 
राज्य में निवास करने वाले किसी खास वर्ग या जाति समूह को उनके मानवाधिकारों से योजनाबद्ध तरीके से वंचित किया जा रहा है तथा दैनिक जीवन की आधारभूत जरूरतों को उनकी पहुँच से दूर रखा जा रहा है

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