‘हिन्द स्वराज’ की पृष्ठभूमि- मृत्युंजय पाण्डेय

‘हिन्द स्वराज’ की पृष्ठभूमि

मृत्युंजय पाण्डेय

काल मार्क्स की प्रसिद्ध उक्ति है- “दार्शनिकों ने केवल विभिन्न रूपों में दुनिया की व्याख्या ही की है, लेकिन असली काम तो उसे बदलने का है।”1 पर गांधी ऐसे दार्शनिक हैं जिन्होंने दुनिया की व्याख्या करने के साथ ही उसे बदलने की कोशिश भी की। गांधी का सारा जीवन सामाजिक अन्याय, आर्थिक विषमता, शोषण, गरीबी और उंच-नीच के भेद-भाव को खत्म करने की कोशिश में बीत गया। “उन्होंने भारत की हजारों वर्ष की जिंदगी की धड़कन को, उसकी लय को, उसकी सोच और संस्कृति को, उसके सम्पूर्ण सारतत्व को बड़ी गहराई से आत्मसात् किया और अपने जीवन में उसी को मूर्त किया। उन्हें देखकर कहा जा सकता था कि यह आदमी ‘भारत’ है।”2

आज से 106-7 वर्ष पहले गांधी ने “अंतर्राष्ट्रीय समुद्र कि छाती पर बैठकर”3 ‘हिन्द स्वराज’ कि रचना की। समुद्र की लहरों के समान ही गांधी के दिमाग में भी उथल-पुथल मची हुई थी। गांधी अपनी इस आंतरिक बेचैनी को दस दिनों में शब्द-बद्ध करते हैं। जबकि अज्ञेय को अपनी ‘घनीभूत वेदना’ को शब्द-बद्ध करने में दस वर्षों का समय लगा था। गांधी और अज्ञेय दोनों यातना में थे इसलिए वे ‘द्रष्टा’ हो गए।

13 नवम्बर से 22 नवम्बर 1909 के दौरान गांधी लंदन से दक्षिण-अफ्रीका एक पानी के जहाज से लौट रहे थे। गांधी ने ‘हिन्द स्वराज’ को इन्हीं दस दिनों के अंदर लिखा। 11 और 19 दिसम्बर 1909 को दक्षिण-अफ्रीका से निकलने वाले साप्ताहिक अखबार ‘इंडियन ओपीनियन’ के गुजराती संस्करण में यह पुस्तक प्रकाशित हुई थी। जनवरी 1910 में यह पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित हुई। मार्च 1910 में भारत की ब्रिटिश सरकार ने पुस्तक को जब्त कर लिया था। गांधी ने ‘हिन्द स्वराज’ को अपनी मातृभाषा गुजराती में ही लिखा, क्योंकि- “अपना विचार अपनी भाषा में ही व्यक्त हो सकता है।”4 (नामवर सिंह) गांधी जी अपने विचारों से एक साथ आठ हजार लोगों की सोच को झंकृत करते हैं। गांधी जी के ही शब्दों में- “ ‘इंडियन ओपीनियन’ के गुजराती ग्राहक आठ सौ के करीब हैं। हर ग्राहक के पीछे कम-से-कम दस आदमी दिलचस्पी से यह अखबार पढ़ते हैं, ऐसा मैंने महसूस किया है।”5

सौ पन्नों की छोटी-सी पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ गांधी के कई वर्षों के चिंतन का परिणाम है। इस बात को स्वीकार करते हुए वे कहते हैं- “जिस तरह हृदय के भर आने पर कोई व्यक्ति बोले बिना नहीं रह सकता। उसी तरह मेरा हृदय भर आने के कारण मैं यह पुस्तक लिखे बिना नहीं रह सका।”6 22॰11॰1909 की प्रास्तावना में भी गांधी जी ने लिखा था- “मुझसे जब रहा नहीं गया तभी मैंने यह लिखा है।”7 इस पुस्तक के बारे में गांधी जी की राय थी- “मेरी राय में यह किताब ऐसी है कि वह बालक के हाथ में दी जा सकती है। वह द्वेषधर्म की जगह प्रेमधर्म सिखाती है; हिंसा की जगह आत्मबल को खड़ा करती है।”8 जबकि गोखले की प्रतिक्रिया थी कि गांधी एक साल भारत में रहने के बाद खुद ही इस पुस्तक को नष्ट कर देंगे। गांधी जी के उत्तराधिकारी पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इसे पढ़कर कहा कि यह ‘यथार्थ से परे’ है। नेहरू ‘हिन्द स्वराज’ के कट्टर आलोचक थे। निर्मल वर्मा के शब्दों में कहें तो “दोनों (नेहरू-गोखले) ने ही ‘हिन्द स्वराज’ को एक सनकी दिमाग की उपज कहा और इसे अप्रासंगिक समझ कर निरर्थक घोषित कर दीया था।”9 ‘हिन्द स्वराज’ की कटु आलोचना से आहत होकर निर्मल वर्मा ने लिखा कि- “यह देश जो गांधी के आदर्शों से दूर-दूर चला गया है, आज भी एक जरूरत महसूस करता है, एक दबाव, एक अनिवार्यता महसूस करता है कि एक ऐसी पुस्तक जिसके हम अधिकारी नहीं थे, उसके अक्षर को ढूंढें। शब्दों को याद करें, अर्थ और भाव को समझें तथा उन्हें अपने जीवन में जिस रूप में ग्रहण कर सकते हो, उसे समझें।”10 ‘हिन्द स्वराज’ के अर्थ और भाव को समझे बिना ही गोखले तथा नेहरू ने उसे अप्रासंगिक घोषित कर दिया। दूसरी तरफ टॉल्सटॉय ने ‘हिन्द स्वराज’ के अँग्रेजी अनुवाद को पढ़कर अपनी डायरी में लिखा “अद्भुत”। टॉल्सटॉय की यह टिप्पणी भारतीय सोच को प्रश्नचिन्हित करती है।

गांधीजी अपने राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और शैक्षिक आदि विचारों को व्यक्त करने के लिए संवाद शैली का सहारा लेते हैं। ऐसा कहा जाता है कि ‘हिन्द स्वराज’ के पाठक लंदन और दक्षिण-अफ्रीका में रह रहे भारतीय हैं और संपादक, विचारक गांधी हैं। लेकिन यह विश्वास के साथ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इस रहस्य का उद्घाटन गांधी कर चुके हैं। बकौल कनक तिवारी- “सेवा संघ की बैठक में 21 फरवरी, 1940 को भाषण देते हुए गांधी ने यह रहस्योद्घाटन किया कि ‘हिन्द स्वराज’ उन्होंने मूलतः अपने प्रिय मित्र स्वर्गीय डॉ॰ प्रणजीवन मेहता के लिए लिखी थी क्योंकि ‘हिन्द स्वराज’ में व्यक्त सभी तर्क और विचारों को लेकर उनका डॉ॰ प्रणजीवन मेहता से पहले ही बहस-मुबाहिसा हो चुका था।”11 कनक तिवारी यहाँ तक संभावना जता देते हैं कि “ ‘हिन्द स्वराज’ के पाठक की भूमिका भी प्राणजीवन मेहता की है जो छात्र जीवन से ही गांधी से इन्हीं विषयों पर तार्किक बहस-मुबाहिसा किया करते थे।”12 यह कहना ज्यादा उपयुक्त होगा कि पाठक की भूमिका में हर एक वह भारतीय है, जो पश्चिमी नीतियों का समर्थक है, जिसके दिमाग में यह बात घर कर गई है कि पश्चिमी सभ्यता ही सबसे उत्तम सभ्यता है। ‘हिन्द स्वराज’ लिखने से पहले ही गांधी के दिमाग में पश्चिमी सभ्यता का एक स्पष्ट खाका था। 30 अक्टूबर 1909 को गांधीजी ने पश्चिमी सभ्यता का पर्दाफाश करते हुये लॉड एम्टहिल को एक पत्र लिखा। ‘इस पत्र को हम ‘हिन्द स्वराज’ कि ‘कुंजी’ कह सकते हैं।’

लॉड एम्टहिल को गांधीजी ने पत्र में लिखा था- “भारत का शोषण विदेशी पूंजीपतियों के स्वार्थ के लिए किया जाता है और केवल इसी कारण भारत अतिरिक्त कष्ट पाता है। मेरी नम्र सम्मति में इसका सच्चा उपाय यह है कि इंग्लैंड आधुनिक सभ्यता का, जो स्वार्थ और भौतिकता की भावना से भरी होने की वजह से उद्देश्यहीन और निरर्थक है और जो ईसाईयत के विरुद्ध है, परित्याग कर दे। लेकिन यह एक दुराशा है। तब यह भी संभव हो सकता है कि भारत के ब्रिटिश शासक कम-से-कम भारतियों की तरह व्यहार करें और उन पर आधुनिक सभ्यता को तो न थोपें। रेलें, मशीनें और उनके साथ बढ़ी हुई आरामतलबी की आदतें यूरोपियों की भांति ही भारतियों के लिए भी दासता के सच्चे चिह्न हैं। इसलिए शासकों से मेरा कोई झगड़ा नहीं है। हाँ, उनके तरीकों से मेरा पूरा विरोध है। मैं पहले मानता था कि लॉड मैकाले ने अपनी शिक्षा-संबंधी रिपोर्ट लिखकर भारत का हित-साधन किया है, लेकिन अब नहीं मानता। मेरा ख्याल यह भी है कि ब्रिटेन ने अपने अधीनस्थ देशों को जो शांति-सुव्यवस्था दी है, उसका बहुत ज्यादा ढिंढोरा पीटा जाता है। मेरे ख्याल से कलकत्ता और बंबई जैसे शहरों का बनना दुख की बात है, बधाई देने की नहीं। भारत को ग्राम-प्रथा के आंशिक उन्मूलन से हानी हुई है। उनकी तरह मुझमें भी राष्ट्रीय भावना है; इसलिए गर्मदलियों या नर्मदलियों के तरीकों से मेरा पूरा मतभेद है। इसका कारण यह है कि दोनों ही दल आखिरकार हिंसा में विश्वास करते हैं। हिंसात्मक तरीकों का अर्थ है आधुनिक सभ्यता को और इस तरह उसी विनाशकारी स्पर्धा को अंगीकार करना, जिसे हम यहाँ देखते हैं। इसका अर्थ है अंत में सच्ची नैतिकता का ध्वंस। कौन शासन करता है, इस बात में मेरी दिलचस्पी नहीं है। मैं तो चाहूँगा कि शासक मेरी इच्छा के अनुसार शासन करें, अन्यथा मैं उन्हें अपने ऊपर शासन करने में सहायता न दूंगा। मैं उनके विरुद्ध अनाक्रामक प्रतिरोध करूंगा। अनाक्रामक प्रतिरोध शरीर-बल के विरुद्ध आत्मबल का प्रयोग है- दूसरे शब्दों में घृणा पर विजय प्राप्त करनेवाले प्रेम का।”13 जब इंग्लैंड की आधुनिक सभ्यता स्वार्थ और भौतिकता से भरी पड़ी है, ऐसी स्थिति में वह सभ्यता भारत तथा भारतवासियों के लिए प्रेरणा स्रोत कैसे हो सकती है। गांधी की दृष्टि में आधुनिक सभ्यता के लिए शरीर-बल की अपेक्षा आत्म-बल पर अधिक ज़ोर देते हैं, क्योंकि शरीर का बल समय के साथ कम होता जाता है, जबकि आत्मा का बल दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जाता है।

कनक तिवारी के अनुसार- “ ‘हिन्द स्वराज’ लिखने के पहले अपने एक और मित्र हेनरी पोलॉक को लंदन से 14 अक्टूबर 1909 को गांधी ने लिखा था कि उनके अंदर विचार खदबदा रहे हैं। ये विचार यधपि नए नहीं हैं, लेकिन उन्होंने एक ठीक स्वरूप ग्रहण कर लिया है और उन पर जबरिया कब्जा कर लिया है।”14 हेनरी पोलॉक को लिखे पत्र में गांधी 16 मुद्दों पर चर्चा करते हैं। ये सभी मुद्दे ‘हिन्द स्वराज’ में हैं। ‘हिन्द स्वराज’ की पृष्ठभूमि जानने के लिए यहाँ इन सभी मुद्दों को दिया जा रहा है। पत्र में गांधीजी ने लिखा था- “मुझसे किए गए प्रश्नों की झड़ी में मेरा उद्देश्य खो गया और तफसील की बातों पर ही गरमा-गरम बहस होती रही। उससे प्राप्त निष्कर्ष इस प्रकार हैं-

(1) पूर्व और पश्चिम के बीच भेद की कोई दुर्लंध्य दीवार नहीं है।

(2) पश्चिम या पूर्वी सभ्यता-जैसी कोई चीज नहीं है। हाँ, एक आधुनिक सभ्यता अवश्य है और वह सर्वथा भौतिकतावादी है।

(3) आधुनिक सभ्यता से प्रभावित होने के पूर्व-यूरोप के लोग बहुत-सी बातों में पूर्व के लोगों से, या कम-से-कम भारतियों से, काफी मिलते-जुलते थे; और आज भी जो यूरोपीय आधुनिक सभ्यता के प्रभाव से अछूते हैं, वे उस सभ्यता के सपूतों की तुलना में भारतियों से बहुत ज्यादा आसानी से घुलमिल सकते हैं।

(4) भारत पर राज्य ब्रिटिश लोग नहीं कर रहे हैं, बल्कि रेल, तार, टेलीफोन और सभ्यता के विजय-भूषण माने जाने वाले लगभग सारे आविष्कारों के माध्यम से यही आधुनिक सभ्यता कर रही है।

(5) बंबई, कलकत्ता औए भारत के अन्य प्रमुख नगर मुसीबत के असली स्थान हैं।

(6) अगर कल ब्रिटिश शासक का स्थान आधुनिक तौर-तरीकों पर आधारित भारतीय शासक ले ले, तो इससे भारत की स्थिति अच्छी नहीं हो जाएगी। तब भारतीय भी यूरोप या अमरीका के दूसरे या पांचवें संस्कारण बनकर रह जाएँगे। हाँ, इतना जरूर होगा कि जो धन बहकर इंग्लैंड चला जाता है, उसका कुछ अंश देश में ही रह जाएगा।

(7) पूर्व और पश्चिम वास्तविक रूप में तभी मिल सकते हैं, जब पश्चिम आधुनिक सभ्यता का लगभग पूर्ण रूप से परित्याग कर दे। दिखावे में तो वे तब भी मिल सकते हैं; जब पूर्व भी आधुनिक सभ्यता को स्वीकार कर ले, लेकिन यह मिलन सशस्त्र-शांति के समान होगा-ऐसी शांति के समान, जैसे उदाहरण के लिए, जर्मनी और इंग्लैंड के बीच है। ये दोनों ही देश एक दूसरे द्वारा लील लिए जाने के खतरे से बचने के लिए मृत्यु के गढ़ में अपने दिन काट रहे हैं।

(8) यदि कोई एक व्यक्ति या व्यक्तियों का संगठन सारी दुनिया को सुधारना शुरू करे या उसकी बात भी सोचे तो यह हिमाकत की होगी। ऊंचे दर्जे की कारीगरी से बने और तेज चलनेवाले वाहनों के सहारे भी ऐसा करने का प्रयत्न असंभव को संभव बनाने का प्रयत्न होगा।

(9) सामान्यत: यह कहा जा सकता है कि भौतिक सुविधाओं की वृद्धि होने से नैतिक विकास में किसी तरह कोई सहायता नहीं मिलती।

(10) चिकित्सा-विज्ञान इस काले जादू का सार है; जिसे उच्च चिकित्सा-कौशल मानते हैं, उससे तो नीमहकीमी लाख दर्जे अच्छी है।

(11) अस्पताल वे साधन हैं जिनका उपयोग शैतान अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए, अपने साम्राज्य पर अपना अधिकार बनाए रखने के लिए करता है। वे दुराचार, दुख, गिरावट और वास्तविक दास्ता को स्थायी बनाते हैं।

(12) जब मैंने चिकित्सा-शास्त्र की शिक्षा लेने की सोची थी तब मैं बिलकुल बहक ही गया था। अस्पताल की घृणित प्रक्रियाओं में भाग लेना मेरे लिए हर तरह से एक पापपूर्ण कृत्य होगा। अगर यौन रोगों के लिए, या क्षय-रोगियों के लिए भी अस्पताल न होते तो हमारे बीच क्षय रोग कम और यौन पाप भी इतने न होते।

(13) भारत की मुक्ति इसी बात में है कि उसने पिछले पचास वर्षों में जो कुछ सीखा है, उसे भूल जाये। रेले, तारे, अस्पताल, वकील, डॉक्टर आदि सबको जाना होगा; और तथाकथित उच्च वर्गों के लोगों को इस बोध के साथ कि किसान का सादा जीवन ही सच्चा सुख देने वाला है, अंतरात्मा को साक्षी बनाकर, धर्म मानकर और मन को वश में करके वह जीवन बिताना सीखना होगा।

(14) भारतियों को मिल के कपड़े नहीं पहनने चाहिए, चाहे वे यूरोपीय मिलों में तैयार हुये हों या भारतीय मिलों में।

(15) इंग्लैंड इसमें भारत का सहायक हो सकता है, और तभी वह भारत पर अपने अधिकार का औचित्य सिद्ध कर पाएगा। आज इंग्लैंड में भी ऐसा सोचनेवाले बहुत लोग दिखाई देते हैं।

(16) पुराने ऋषियों में सच्चा ज्ञान था। तभी तो उन्होंने समाज की व्यवस्था ऐसी की थी कि लोगों की भौतिक स्थिति मर्यादित हो जाए। शायद पाँच हजार साल पुराना आदिम हल आज भी किसान के लिए उपयुक्त हल है। हमारी मुक्ति उसी से होगी। ऐसी हालातों में लोग ज्यादा जीते हैं या ज्यादा शांति से रहते हैं। उसकी तुलना में आधुनिक उद्योगवाद को अपनाने के बाद यूरोप के लोगों की उतनी शांति नहीं मिलती है। मुझे लगता है कि प्रत्येक प्रबुद्ध व्यक्ति चाहे तो इस सत्य को सीख सकता है और उसके अनुसार आचरण कर सकता है; प्रत्येक अंग्रेज़ भी अवश्य ही ऐसा कर सकता है।

लिखने के लिए बाते बहुत हैं। आज आपको उतना नहीं लिख सकता। लेकिन ऊपर दी गई सामग्री विचार के लिए काफी है। जब आप यह देखें कि मैं गलत कहता हूँ, तो मुझे रोक सकते हैं।”15

हेनरी पोलॉक को लिखे पत्र में गांधी रेल, तार, अस्पताल, डॉक्टर, वकील, मिल आदि सभी की आलोचना करते हैं। वे अस्पताल के साधन को शैतानी साधन कहते हैं। उदय प्रकाश की चर्चित लंबी कहानी ‘…और अंत में प्रार्थना’ के नायक डॉ॰ दिनेश मनोहर वाकणकर के कुछ विचार गांधी के विचारों से मेल खाते हैं। जैसे- डॉक्टर, चिकित्सा और टेकनॉलाजी के संदर्भ में डॉक्टर वाकणकर का मानना है कि- “जिस तरह कुछ धर्मग्रंथ, दर्शन या विचारधाराओं का उपयोग दरअसल शासन व्यसाय या तंत्र को चलते रहने के लिए होता है, उसी तरह मेडिकल साइंस या चिकित्साशास्त्र का भी इस्तेमाल शासन, व्यवसाय और तंत्र को चलते रहने के निमित्त होता है। वे कहते हैं कि सैनिक विज्ञान, रसायनशास्त्र, जैवरसायन या टेकनॉलाजी का ज़्यादातर प्रयोग मनुष्यों की हत्या के लिए होता आया है। भौतिक, इलेक्ट्रानिक्स, गतिकी और अंतरिक्ष विज्ञान या नाभिकीय क्षेत्रों में लगातार होनेवाले अनुसंधानों के फलस्वरूप अब हम ज्यादा व्यापक, प्रभावी और अपेक्षाकृत आसान तरीके से हत्याएं कर सकते हैं। मेडिकल साइंस भी ऐसा ही एक अनुशासन है।”16 उदय प्रकाश की कहानी इस बात की तरफ संकेत करती है कि गांधी 1909 में ही भारत के भविष्य को या यंत्रों के दुस्परिणाम को भली-भांति समझ रहे थे। पर अफसोस उस दुस्परिणाम को उनके उत्तराधिकारी नेहरू ने नहीं समझा और आज सौ वर्ष बाद भी हम उस दुस्परिणाम को समझते हुए भी समझना नहीं चाहते हैं।

20 अध्यायों वाली पुस्तिका ‘हिन्द स्वराज’ में व्यक्त विचार गांधी के मूल-विचार हैं भी और नहीं भी हैं। गांधी के ही शब्दों में – “वे मेरे हैं, क्योंकि उनके मुताबिक बरतने की मैं उम्मीद रखता हूँ; वे मेरी आत्मा के गढे-जुड़े हैं। वे मेरे नहीं हैं, क्योंकि सिर्फ मैंने ही उन्हें सोचा हो सो बात नहीं। कुछ किताबें पढ़ने के बाद वे बने हैं। दिल के भीतर-ही-भीतर मैं जो महसूस करता था, उसका इन किताबों ने समर्थन किया।”17 ‘हिन्द स्वराज’ के अंत में ‘परिशिष्ठ-2’ में गांधी ने 20 पुस्तकों के नाम बताए हैं। इन्हीं पुस्तकों ने गांधी के विचारों का समर्थन किया। या इन्हें पढ़कर गांधी के विचार बने। ‘हिन्द स्वराज’ के अध्याय को आगे बढ़ाने के लिए गांधीजी निम्नलिखित पुस्तकों को पढ़ने की सिफारिश पाठकों से करते हैं- (1) दि किंग्डम ऑफ गॉड इज़ विदिन यू – टॉल्सटॉय (2) व्हाट इज़ आर्ट – टॉल्सटॉय (3) द स्लेवरी ऑफ अवर टाइम्स – टॉल्सटॉय (4) द फस्टॅ स्टेप – टॉल्सटॉय (5) हाऊ शैल वी एस्केप – टॉल्सटॉय (6) लेटर टु ए हिन्दू – टॉल्सटॉय (7) द व्हाइट स्लेट्स ऑफ इंग्लैंड – शेराडॅ (8) सिविलाइजेशन, इट्स कॉज एंड क्योर – कापेंटर (9) द फैलेसी ऑफ स्पीड – टेलर (10) ए न्यू क्रूसेड – ब्लांट (11) आन द ड्यूटी ऑफ सिविल डिसओबेडियेंस – थोरो (12) लाइफ विदाउट प्रिंसिपल – थोरो (13) अन टु दिस लास्ट – रस्किन (14) ए जॉय फॉर एवर – रस्किन (15) ड्यूटीज़ ऑफ मैन – मैजिनी (16) डिफेंस एंड डेथ ऑफ सोक्रेटीज़ – फ्रॉम प्लेटो (17) पैरेडॉक्सेज़ ऑफ सिविलाइजेशन – मैक्स नार्दू (18) पॉवर्टी एंड अन ब्रिटिश रूल इन इंडिया – नौरोजी (19) इकॉनामिक हिस्टरी ऑफ इंडिया – दत्त (20) विलेज कम्युनिटीज़ – मेन।

उपरोक्त 20 पुस्तकों में से मात्र 2 पुस्तकें भारतीय विद्धानों की हैं। पहली दादाभाई नौरोजी की ‘पॉवर्टी एंड अन ब्रिटिश रूल इन इंडिया’ और दूसरी रमेशचन्द्र दत्त की ‘इकॉनामिक हिस्टरी ऑफ इंडिया’। इसके अतिरिक्त 18 पुस्तकें यूरोपीय विद्धानों की हैं। जिसमे अकेले टॉल्सटॉय की छ: पुस्तकें हैं।

गांधी टॉल्सटॉय के विचारों से बहुत अधिक प्रभावित थे। ‘हिन्द स्वराज’ में टॉल्सटॉय और रस्किन जैसे कुछ प्रमुख यूरोपीय विद्धानों के नाम तो हैं लेकिन- “उनमे विलियम मॉरिस, जॉज बर्नाड शॉ, एनी बेसेंट, जार्ज और मॉरिस हिंडमैन वगैरह के नाम नहीं है, लेकिन वे गांधी के विचारों में समाहित थे। ये वे बुद्धिजीवी थे जो पश्चिम की मुख्य भागमभाग की दौड़ को किनारे बैठकर न केवल देख रहे थे, बल्कि उसके खिलाफ अपनी मानवतावादी राय भी दर्ज कर रहे थे।”18 कनक तिवारी की माने तो गांधी विलियम मॉरिस, जॉज बर्नाड शॉ, एनी बेसेंट वगैरह के विचारों से प्रभावित थे या यूं कहें वे गांधी के विचार में समाहित थे, लेकिन गांधी ने उनका नाम नहीं लिया है।

किल्डोनन कैसल नामक पानी के जहाज पर बैठकर गांधी ने ‘हिन्द स्वराज’ जैसी पुस्तक की रचना की। “दरअसल उनकी जलयात्रा साथ-साथ उस मानसिक पनडुब्बी में बैठकर की जा रही थी, जो ब्रिटिश साम्राज्य के महासागर के नीचे उसकी बुनियाद में विस्फोट करने का बारूद भी बना रही थी।”19 निश्चय ही गांधी ब्रिटिश साम्राज्य की बुनियाद में बारूद लगाने में सफल होते हैं।

गांधी ने यह स्वीकार किया है कि ‘हिन्द स्वराज’ लिखने की प्रेरणा उन्हें मूलतः टॉल्सटॉय के प्रसिद्ध पत्र ‘लेटर टु ए हिन्दू’ से मिली। किल्डोनन कैसल नामक पानी के जहाज पर ‘हिन्द स्वराज’ के अतिरिक्त गांधी ने टॉल्सटॉय के प्रसिद्ध पत्र ‘लेटर टु ए हिन्दू’ का गुजराती अनुवाद भी किया था। परिशिष्ठ की 20 पुस्तकों में से यह छठी पुस्तक है। वस्तुतः टॉल्सटॉय का पत्र हिंसा और अराजकता-समर्थक तारकनाथ दास को संबोधित था। यह युवा बंगाली केनेडा में बस गया था और वैक्कुअर से उसने भारत की आजादी के लिए ‘फ्री हिंदुस्तान’ नामक समाचार पत्र का प्रकाशन किया था।”20 गांधी ने अहिंसा का सिद्धांत यहीं से ग्रहण किया। कनक तिवारी के शब्दों में- “गांधी ने अपनी अहिंसा की थ्योरी को टॉल्सटॉय की थ्योरी से समानान्तर और अनुप्राणित माना है। लेकिन टॉल्सटॉय के रूस में उनकी थ्योरी और गांधी के भारत में उनकी भी थ्योरी को पाश्चातवर्ती पीढ़ियों ने खारिज कर दिया।”21 गांधी टॉल्सटॉय को गुरु के रूप में देखते हैं। अपने जीवन के अंतिम दिनों में गांधी ने टॉल्सटॉय का आभार स्वीकार करते हुये कहा कि- “रूस ने मुझे टॉल्सटॉय के रूप में शिक्षक दिया जिनसे मुझे अपनी अहिंसा के लिए युक्तिसंगत आधार प्राप्त हुआ।”22 “टॉल्सटॉय ने अपने पत्र में (लेटर टु ए हिन्दू) भारतियों को यह सलाह दी थी कि वे अंग्रेजों से अहिंसा के आधार पर ही लड़े, क्योंकि मनुष्य जाति को एक नए तरह का संघर्ष-बोध पैदा करना चाहिए।”23 टॉल्सटॉय से प्रेरणा लेकर ही गांधी ने कहा कि- “अंग्रेजों ने भारतियों को गुलाम नहीं बनाया है। यह तो भारतीय खुद हैं जिन्होंने अंग्रेजों को आमंत्रण दिया है।”24 इस संदर्भ में टॉल्सटॉय ने अपने पत्र में लिखा था- “भारतियों को अंग्रेजों ने गुलाम नहीं बनाया बल्कि वे स्वयं गुलाम बने हैं।”25 क्योंकि 20 करोड़ शक्तिशाली, बुद्धिमान, बलिष्ठ और स्वतंत्रता प्रिय लोगों को एक व्यापारी कंपनी कैसे गुलाम बना सकती है। यह एक रहस्य से कम नहीं है। भारत पर अंग्रेजों ने हिंसा के द्वारा अधिकार नहीं किया, इसलिए उन्हें हिंसा के माध्यम से हटाया भी नहीं जा सकता।

7 सितम्बर 1910 को टॉल्सटॉय ने गांधी को एक पत्र लिखा था। जिसमे “टॉल्सटॉय ने गांधी के द्वारा ट्रांसवाल में चलाए जा रहे अहिंसक आंदोलन की प्रशंसा की थी। 20 नवम्बर 1910 को अपनी मृत्यु से पहले टॉल्सटॉय ने गांधी को अपना आध्यात्मिक उताराधिकारी घोषित कर दिया था। गांधी ने भी इसके दाय स्वरूप अपना पहला सत्याग्रह जिस आश्रम से शुरू किया उसका नाम ‘टॉल्सटॉय आश्रम’ रखा।”26 टॉल्सटॉय के बाद गांधी उसके अहिंसा के सिद्धांत को अपनाते हैं।

प्रसिद्ध कवि विलियम वर्ड्सवर्थ के प्रपौत्र राबर्ट हारबारो शेरार्ड की पुस्तक ‘द व्हाइट स्लेट्स ऑफ इंग्लैंड’ में “इंग्लैंड के औसत औधोगिक मजदूर की जिंदगी का त्रासद चित्रण है। चाहे वे कीलें बनाते हों या चप्पलें या दर्जीगिरी करते हों अथवा ऊन के कारीगर हों या शीशा उधोग के। उनकी हॉरर कथा शेराड ने अद्भुत मानवीय संवेदना के साथ लिखी और मिल मालिकों तथा जमींदारों के अत्याचार बेहद न्यूनतम वेतन से उत्पन्न आर्थिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक परिस्थितियों और स्वास्थ सुविधाओं के अभाव वगैरह का ग्राफिक चित्रण किया है। विशेषकर महिला मजदूरों की भयावह स्थिति का जो चित्रण शेरार्ड ने किया उसने करुणामय गांधी को अत्यधिक विचलित किया। शेरार्ड का मुख्य तर्क यही था कि जब तक उधोगपतियों और फैक्टरी मालिकों में नैतिकता का दृष्टिकोण नहीं होगा, तब तक औधोगिकरण की बांग देना अजान फूंकना नहीं मर्सिया गाने की तरह है। … गांधी ने इन मानवतावादी व्याख्याओं को अपने व्यापक चिंतन का केंद्रीय बिन्दु बनाया और उसे भविष्य के भारत के लिए भी आवृत्त किया।”27 हम देख सकते हैं, गांधी में शेरार्ड रचे-बसे हैं।

एडवर्ड कारपेंटर की पुस्तक ‘सिविलाइजेशन, इट्स कॉज एंड क्योर’ का उल्लेख ‘हिन्द स्वराज’ के छठे अध्याय ‘सभ्यता का दर्शन’ में किया गया है। पश्चिमी सभ्यता की व्याख्या करते हुए गांधी पाठक से कहते हैं- “मेरे हिसाब से ही नहीं, बल्कि अंग्रेजी लेखकों के हिसाब से भी यह सभ्यता बिगाड़ करने वाली है। उसके बारे में बहुत किताबें लिखी गयी हैं। वहाँ सभ्यता के खिलाफ मण्डल भी कायम हो रहे हैं। एक लेखक ने ‘सभ्यता उसके कारण और उसकी दवा’ नाम की किताब लिखी है। उसमें उसने यह साबित किया है कि यह सभ्यता एक तरह का रोग है।”28 यह पुस्तक कारपेंटर की है। गांधी के यहाँ भी आधुनिक सभ्यता एक रोग के रूप में आता है।

थॉमस की पुस्तक ‘द फैलेसी ऑफ स्पीड’ को गांधीजी ने संक्षिप्त करके ‘इंडियन ओपीनियन’ में प्रकाशित किया था। यंत्रों के संबंध में गांधी के जो विचार हैं वे टेलर की अवधारणाओं से मेल खाते हैं। इस अवधारणाओं को मिलाते हुए कनक तिवारी ने लिखा है- “तीन अध्यायों की पुस्तक (द फैलेसी ऑफ स्पीड) में ‘गति और जनसंख्या’, ‘गति और मुनाफा’, और ‘गति और सुख’ में टेलर इस अवधारणा पर हमला करते हैं कि तेज गति से चलना ही बेहतर होना है। गांधी ने रेलगाड़ी के खिलाफ ‘हिन्द स्वराज’ में जो कुछ भी लिखा उसके पीछे थॉमस टेलर की अवधारणाओं की प्रेरणा दिखाई देती है क्योंकि गांधी की तरह टेलर भी मानते थे कि यांत्रिक वाहनों के जरिए ग्रामीण आबादी को शहरों में ढोया जा रहा है। इस बात की किसी को परवाह नहीं है कि इतनी तेज गति से जीवन को संचालित करने में क्या-क्या खतरे उठाने पड़ेंगे। टेलर ने तो यहाँ तक निराशा में कहा कि कुल मिलाकर गति से तो राज्य में स्वस्थ स्थिति तो बनती ही नहीं है जो कि धीमी गति से जीवन में उपलब्ध होती है। टेलर ने भी सवाल पूछा था कि क्या संचलनशील यंत्रों के जरिए जीवन को विश्राम मिल रहा है या वह नष्ट ही किया जा रहा है?”29 गांधी का मानना था कि रेल, वकील और डॉक्टर इन सभी ने मिलकर हिंदुस्तान को कंगाल बनाया। हिंदुस्तान को कंगाल बनाने में यांत्रिक मशीनों की भी विशेष भूमिका रही। गांधी ने ‘हिन्द स्वराज’ में लिखा भी है- “अगर रेल न हो तो अंग्रेजों का काबू हिंदुस्तान पर जितना है उतना तो नहीं ही रहेगा। रेल से महामारी फैली है। … रेल से अकाल बढ़े हैं, क्योंकि रेलगाड़ी की सुविधा के कारण लोग अपना अनाज बेच डालते हैं। जहां महंगाई हो वहाँ अनाज खींच जाता है, लोग लापरवाह बनते हैं और उससे अकाल का दुख बढ़ता है। रेल से दुष्टता बढ़ती है। बुरे लोग अपनी बुराई तेजी से फैला सकते हैं।”30

गॉडफ्रे क्लांट की पुस्तक ‘ए न्यू क्रूसेड’ को भी गांधीजी ने उसके संक्षिप्त रूप में 1905 में ‘इंडियन ओपीनियान’ में प्रकाशित किया था। कनक तिवारी का मानना है कि- “सादगी, कला और महत्वकांक्षा क्लांट के उद्देश्य थे जिन्हें गांधी ने बहुत पसंद किया था। क्लांट कहता था कि समाज की बेहतरी व्यक्ति की बेहतरी पर निर्भर है। ग्रामीण जीवन हमारे समाज का सबसे अच्छा हिस्सा है। हस्तकलाएँ और कृषि मनुष्य मात्र की भलाई के लिए सबसे जरूरी हैं। मशीनें तो शैतान का हथियार हैं। राजनीति सामाजिक सुधारों को बंद कर सकती है, शुरू नहीं कर सकती। काम करना तो पूजा के बराबर है। क्लांट से प्रभावित होकर गांधी ने अपने खादी आंदोलन को अग्रसर किया।”31 क्लांट के विचारों ने गांधी की अवधारणाओं को पुष्ट किया। स्वदेशी के संबंध में गांधी के जो विचार हैं वह क्लांट के ऋणी हैं।

हेनरी डेविड थोरो की पुस्तक ‘आन द ड्यूटी ऑफ सिविल डिसओबेडियेंस’ का गांधी के ऊपर गहरा प्रभाव है। थोरो का सिद्धांत था कि- “राजनीतिक दृष्टि से क्या सही है और क्या गलत-इसका फैसला विवेक को करना चाहिए, बहुमत को नहीं। उसने यह भी कहा की यधपि हर व्यक्ति का दायित्व नहीं है कि वह बुराई का नाश कर दे, लेकिन इतना तो वह कर ही सकता है कि दुष्कर्मों का समर्थन न करे। उसने यह भी कहा कि हालत ऐसी है कि सही व्यक्ति की जगह जेल में हो जाती है जबकि सही व्यक्तियों की स्थापनाएं राज्य सत्ता के लिए आदेशात्मक होनी चाहिए।”32 गांधी के सत्याग्रह का सिद्धांत थोरो के सिद्धांत से मेल खाता है।

थोरो की ही पुस्तक ‘लाइफ विदाउट प्रिंसिपल’ का सिद्धांत है कि- “सद्गुण के बिना राजनीति केवल घास-पात है और नागरिक सद्गुणों की जगह चिकना-चुपड़ा व्यवहार नहीं ले सकता।”33 कहना न होगा कि गांधी इस सिद्धांत के घोर समर्थक हैं। गांधी राजनीति में नीति की बात करते हैं।

19वीं सदी के कई ब्रिटिश आलोचक आधुनिक सभ्यता एंव मशीनी सभ्यता के खिलाफ थे। रस्किन भी इनमें से एक थे। वह मशीनी सभ्यता या औधोगिक सभ्यता का घोर विरोधी था। उसकी पुस्तक ‘ए जॉय फॉर एवर एंड इट्स प्राइस इन दि मार्केट’ तथा ‘दि पोलिटिकल इकोनॉमी ऑफ आर्ट’ का गांधी के ऊपर गहरा असर पड़ा था। “इन पुस्तकों में रस्किन ने औधोगिक सभ्यता की आलोचना की है। उसने कहा कि अपनी तमाम विसंगतियों के साथ-साथ औधोगिक सभ्यता का जीवन के कलात्मक सौंदर्य से कुछ लेना-देना नहीं है। उसने यह भी प्रतिपादित किया कि देश की श्रम शक्ति के प्रबंधन में केवल वैभव को ही लक्ष्य नहीं बनाया जा सकता। उसमें उसकी जन-उपयोगिता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। मसलन श्रमिकों के लिए भोजन, आवास, वस्त्र और जीवन के आमोद-प्रमोद, स्वास्थ और शिक्षा वगैरह की प्राथमिकता के आधार पर आवश्यकता होगी। लेकिन नई राजनीतिक अर्थव्यवस्था तो मुट्ठी भर लोगों के वैभव के प्रति प्रतिबद्ध है। उसे अनगिनत लोगों के जीवन स्तर से कुछ लेना-कर पाए, तब तक अमीरों के जूतों में रेशमी फीते क्यों बंधने चाहिए। ऐसा वैभव जो आम आदमी की आवश्यकताओं की कब्र पर खड़ा होकर अट्टाहास कर रहा हो, उसे जीवन संगीत गाने का कोई अधिकार नहीं है। लोगों को तन ढकने को कपड़े नहीं हैं। उनके पास विस्तर नहीं हैं। कंबल नहीं हैं। तब औधोगिक सभ्यता के नाम पर अमीरों को कितना अमीर बनाया जाय।”34 रस्किन के विचारों का गांधी के ऊपर आश्चर्यजनक असर पड़ा है। गांधी के अर्थशास्त्र के कई सूत्र रस्किन के यहाँ से लिए गए हैं। गांधी भी रस्किन की तरह ही मानते हैं कि औधोगिक सभ्यता गरीबों का शोषण करने का माध्यम है।

गांधी ने अपने ‘सर्वोदय’ के सिद्धांत को रस्किन की ‘अन टु दिस लास्ट’ पुस्तक से ग्रहण किया है। इस पुस्तक का गांधी के ऊपर ज्यादा प्रभाव दिखता है। 1904 में इस पुस्तक को पढ़कर गांधी ने लिखा – बक़ौल कनक तिवारी – “मैं ‘सर्वोदय’ के सिद्धांत को इस प्रकार समझता हूँ-

(1) सबकी भलाई में हमारी भलाई निहित है।

(2) वकील और नाई दोनों के काम की कीमत एक-सी होनी चाहिए, क्योंकि आजीविका का अधिकार सबको समान है।

(3) सादा, मेहनत-मजदूरी का – किसान का जीवन ही सच्चा जीवन है।

पहली बात मैं जानता था, दूसरी को धुंधले के रूप मैं देखता था। तीसरी का मैंने कभी विचार नहीं किया था। ‘सर्वोदय’ ने मुझे दिए की तरह दिखा दिया कि पहली चीज में दूसरी दोनों चीजें समाई हुई हैं। सवेरा हुआ और मैं इन सिद्धांतों का अमल करने के प्रयत्न में लग गया।”35 यहाँ ‘सर्वोदय’ दो अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। पहला जो गांधी का ‘सर्वोदय’ है और दूसरा गांधी ने रस्किन की पुस्तक ‘अन टु दिस लास्ट’ के आधार पर ‘सर्वोदय नाम का एक ट्रेक्ट ही निकाला’ था। रस्किन ‘सर्वोदय’ ने गांधी के मार्ग में दिए का काम किया। उसने गांधी को ‘सर्वोदय’ तक पहुँचने का रास्ता दिखाया।

‘सर्वोदय’ के अतिरिक्त भी अन्य संदर्भों में ‘अन टु दिस लास्ट’ पुस्तक का असर गांधी के ऊपर पड़ा था। जैसे “पहला तो यह कि गांधी ने ‘फीनिक्स सेटेलमेंट’ की स्थापना की जो एक आश्रम की प्रतिकृति या पूर्व पीठिका थी। उसके बाद में जोहानिसवर्ग के टॉल्सटॉय फॉर्म, अहमदाबाद के साबरमती आश्रम और वर्धा के सेवाग्राम आश्रम के रूप में मूर्तिमान होने का अवसर मिला।”36 गांधी में रस्किन एक और जगह मिलते हैं। रस्किन ने “उन्नत औधोगिक समाज में भी हस्तकलाओं के महत्व का वैचारिक आग्रह किया था। गांधी ने उसे अपेक्षाकृत अधिक गरीब भारत में चरखे से विकल्पित किया।”37 गांधी और ‘हिन्द स्वराज’ को गढ़ने में

रस्किन की विशेष भूमिका है।

‘हिन्द स्वराज’ में मैजिनी की पुस्तक ‘ड्यूटीज़ ऑफ मैन’ को भी जगह दी गई है। इस पुस्तक के माध्यम से गांधी ने “हिंसा और अराजकता में विश्वास रखानेवाले आप्रवासी भारतियों को चुनौती और संभावना भी प्रेषित की थी कि मैजिनी के राजदर्शन की संभवत: ज्यादा सुसंगत और स्थायी प्रकृति की व्याख्या नैतिक और अहिंसात्मक प्रकृति की है।”38

‘हिन्द स्वराज’ के परिशिष्ट में गांधी ने मैक्स नार्दू को ‘पैरेडॉक्सेज़ ऑफ सिविलाइजेशन’ नामक पुस्तक का लेखक बताया है। कनक तिवारी की माने तो मैक्स नार्दू ने इस शीर्षक से कोई पुस्तक ही नहीं लिखी है। नार्दू ने ‘कान्वेंशनल लाइफ ऑफ सिविलाइजेशन’ (1895) और ‘पैराडॉक्सेस’ (1906) नामक पुस्तकें लिखी है। संभावना यह कि “गांधी ने दोनों पुस्तकों को पढ़ा हो और शीर्षक गड्डमड्ड हो गए हों।”39 सभ्यता के संदर्भ में गांधी के जो विचार हैं वह में प्राचीन भारतीय जीवन की सादगी को लेकर जो स्मरण या प्रलाप हैं, उसे मैक्स नार्दू की किताब से भी भारत के बदले यूरोपीय संदर्भ में और इसलिए वैश्विक संदर्भ में बखूबी समझा जा सकता है। पहले के जीवन में लोग मोटा-झोटा कपड़ा पहनते थे। मकान सर्व सुविधा सम्पन्न नहीं होते थे। खानपान प्राथमिक मनुष्य-वृत्तियों के आसपास था और प्रर्याप्त वर्तन भांडे भी नहीं होते थे। मैक्स नार्दू ने कहा कि आज की शहरी सभ्यता गांवों की कुर्बानी करके विकसित हुई है और वह श्रमरत मनुष्य को ही सभ्यता का केन्द्रबिन्दु मनाने को तैयार नहीं है। गांधी ने इसीलिए नार्दू के सुर-में-सुर मिलाते हुए कहा कि डॉक्टर और वकील जैसे पेशे बहुत महत्वपूर्ण कैसे हो गए, जबकि वे अमीर और गरीब दोनों तरह के लोगों पर पराश्रयी हैं।”40 मैक्स नार्दू की तरह गांधी का भी मानना था कि शहरों की उन्नति गांवों की कुर्बानी पर ही हुई है। गांधी ने लिखा भी है कि “मैंने पाया है कि शहरवासियों ने आमतौर पर ग्रामवासियों का शोषण किया है; सच तो यह है कि वे गरीब ग्रामवासियों की ही मेहनत पर जीते हैं।”41 गांधी का मानना था कि भारत अपने चंद शहरों में नहीं बल्कि सात लाख गांवों में बसा हुआ है।

‘हिन्द स्वराज’ के परिशिष्ट की अंतिम पुस्तक हेनरी समर मेन की ‘विलेज कम्युनिटीज़ इन द ईस्ट एंड वेस्ट’ है। इस पुस्तक से गांधी ने दो उद्देश्य हासिल किए। “पहला तो यक कि उन्होंने दक्षिण-अफ्रीका में निवास कर रहे भारतीयों के लिए मतदान का अधिकार मांगा क्योंकि भारतीय सदियों से प्रजातांत्रिक संस्थाओं को समझते और विकसित करते रहे हैं। दूसरी प्रेरणा उन्होंने यह ग्रहण की कि ग्रामोद्वार को उन्होंने अपने जीवन का सबसे बड़ा ध्येय बना लिया।”42 गांधी का मानना था कि सच्ची आजादी गांवों की आजादी में निहित है।

‘हिन्द स्वराज’ की रचना में इन सभी पश्चिमी विद्वानों की विशेष भूमिका रही है। “पश्चिम के उन सभी विचारकों से गांधी ने अपने तर्कमहल के लिए खुलकर वैचारिक ऋण लेना स्वीकार किया है, जिनका गांधी के जीवन में अंततः स्थायी सरोकार और सहकार बना।”43 हम देखते हैं कि गांधी ने अपने विचारों को पुष्ट करने के लिए न जाने कितने पश्चिमी विद्वानों को बार-बार और ध्यान से पढ़ा है। ‘हिन्द स्वराज’ के जीतने भी विचार हैं वह मूलतः और मूलतः गांधी के अपने ही हैं।

……….

संदर्भ-सूची :

(1) विश्वनाथ प्रसाद तिवारी (संपादक), महात्मा गांधी : सहस्त्राब्द का महानायक, लेख– कर्मयोगी महात्मा – विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, सस्ता साहित्य मण्डल, नयी दिल्ली, संस्करण- 2009 ई॰ पृष्ठ संख्या- 7

(2) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 10

(3) कनक तिवारी, हिन्द स्वराज का सच, सस्ता साहित्य मण्डल, नयी दिल्ली, संस्करण- 2010 ई॰ पृष्ठ संख्या- 16

(4) दर्पण (हिन्द स्वराज विशेष), संपादक- प्रियंकर पालीवाल, वर्ष : 11, अंक : 8-11, सितम्बर 2009, केंद्रीय काँच एंड सिरामिक अनुसंधान संस्थान, कोलकात्ता, पृष्ठ संख्या- 55

(5) गांधी, हिन्द स्वराज, अनुवादक – अमृतलाल ठाकोरदास नाणावटी, सर्व सेवा संघ प्रकाशन, आठवाँ संस्करण, जून 2009 ई॰ पृष्ठ संख्या- 3

(6) कनक तिवारी, हिन्द स्वराज का सच, सस्ता साहित्य मण्डल, नयी दिल्ली, संस्करण- 2010 ई॰ पृष्ठ संख्या- 31

(7) गांधी, हिन्द स्वराज, अनुवादक – अमृतलाल ठाकोरदास नाणावटी, सर्व सेवा संघ प्रकाशन, आठवाँ संस्करण, जून 2009 ई॰ पृष्ठ संख्या- 3

(8) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 6

(9) दर्पण (हिन्द स्वराज विशेष), संपादक- प्रियंकर पालीवाल, वर्ष : 11, अंक : 8-11, सितम्बर 2009, केंद्रीय काँच एंड सिरामिक अनुसंधान संस्थान, कोलकात्ता, पृष्ठ संख्या- 51

(10) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 51

(11) कनक तिवारी, हिन्द स्वराज का सच, सस्ता साहित्य मण्डल, नयी दिल्ली, संस्करण- 2010 ई॰ पृष्ठ संख्या- 32

(12) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 32

(13) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 27-28

(14) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 29

(15) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 29-30-31

(16) उदय प्रकाश, …और अंत में प्रार्थना, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण, 2006 ई॰, पृष्ठ संख्या- 104

(17) गांधी, हिन्द स्वराज, अनुवादक – अमृतलाल ठाकोरदास नाणावटी, सर्व सेवा संघ प्रकाशन, आठवाँ संस्करण, जून 2009 ई॰ पृष्ठ संख्या- 3

(18) कनक तिवारी, हिन्द स्वराज का सच, सस्ता साहित्य मण्डल, नयी दिल्ली, संस्करण- 2010 ई॰ पृष्ठ संख्या- 127

(19) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 127

(20) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 131-132

(21) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 132

(22) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 133

(23) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 135

(24) गांधी, हिन्द स्वराज, अनुवादक – अमृतलाल ठाकोरदास नाणावटी, सर्व सेवा संघ प्रकाशन, आठवाँ संस्करण, जून 2009 ई॰ पृष्ठ संख्या- 3

(25) गिरिराज किशोर, हिन्द स्वराज : गांधी का शब्द – अवतार, सस्ता साहित्य मण्डल, नयी दिल्ली, संस्करण, 2010 ई॰, पृष्ठ संख्या- 53

(26) कनक तिवारी, हिन्द स्वराज का सच, सस्ता साहित्य मण्डल, नयी दिल्ली, संस्करण- 2010 ई॰ पृष्ठ संख्या- 135-136

(27) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 143

(28) गांधी, हिन्द स्वराज, अनुवादक – अमृतलाल ठाकोरदास नाणावटी, सर्व सेवा संघ प्रकाशन, आठवाँ संस्करण, जून 2009 ई॰ पृष्ठ संख्या- 37

(29) कनक तिवारी, हिन्द स्वराज का सच, सस्ता साहित्य मण्डल, नयी दिल्ली, संस्करण- 2010 ई॰ पृष्ठ संख्या- 141-142

(30) गांधी, हिन्द स्वराज, अनुवादक – अमृतलाल ठाकोरदास नाणावटी, सर्व सेवा संघ प्रकाशन, आठवाँ संस्करण, जून 2009 ई॰ पृष्ठ संख्या- 47-48

(31) कनक तिवारी, हिन्द स्वराज का सच, सस्ता साहित्य मण्डल, नयी दिल्ली, संस्करण- 2010 ई॰ पृष्ठ संख्या- 141

(32) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 144

(33) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 144

(34) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 137-138

(35) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 138

(36) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 139

(37) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 139

(38) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 145

(39) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 142

(40) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 142-143

(41) गांधी, मेरे सपनों का भारत, राजपाल, दिल्ली, संस्करण, 2008 ई॰, पृष्ठ संख्या- 80

(42) कनक तिवारी, हिन्द स्वराज का सच, सस्ता साहित्य मण्डल, नयी दिल्ली, संस्करण- 2010 ई॰ पृष्ठ संख्या- 141

(43) उपरोक्त, पृष्ठ संख्या- 145-146

मृत्युंजय पाण्डेय, 25/1/1, फकीर बागान लेन, पिलखाना,हावड़ा-711101, मोबाइल- +91 9681510596, प्रवक्ता : विद्यासागर कॉलेज फॉर वीमेन, कोलकाता। Email id : pmrityunjayasha@gmail.com

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 राज्य-हिंसा पर विचार: क्या भारत एक हिंसक राज्य है?-अम्बिकेश कुमार त्रिपाठी

                                                                         राज्य-हिंसा पर विचार: क्या भारत एक हिंसक राज्य है?

अम्बिकेश कुमार त्रिपाठी
सहायक प्राध्यापक (राजनीति विज्ञान विभाग)
राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, द्वाराहाट
अल्मोड़ा, उत्तराखंड
मो. न.- 9450308057

 
राज्य-हिंसा पर विचार करने से पहले हम मुख्यरूप से हिंसा की तीन स्थितियों की कल्पना कर राज्य की भूमिका का स्थापन करने का प्रयास करते हैं।

पहला, कुछ व्यक्तियों का समूह उनके निवास-स्थल के नजदीक लग रहे परमाणु संयंत्र के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रतिरोध कर रहा है, क्योंकि इस परमाणु संयंत्र से होने वाले रेडियोएक्टिव खतरे उनके सुरक्षित जीवन-यापन के विरूद्ध गंभीर खतरा उत्पन्न कर सकते हैं। राज्य की पुलिस ने उस जनसमूह के खिलाफ लाठीचार्ज किया और लोग गंभीर रूप से घायल हो गए है। दूसरा, बहुसंख्यक वर्ग के लोग सांप्रदायिक उन्माद में अल्पसंख्यक वर्ग के खिलाफ हथियार लेकर सड़कों पर उतर गए हैं और बड़ी मात्रा में अल्पसंख्यक वर्ग के लोगों की हत्या कर रहे हैं और राज्य की मशीनरी अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करने में अनिच्छुक और उदासीन दिखाई पड़ रही है। तीसरा, राज्य में निवास करने वाले किसी खास वर्ग या जाति समूह को उनके मानवाधिकारों से योजनाबद्ध तरीके से वंचित किया जा रहा है तथा दैनिक जीवन की आधारभूत जरूरतों को उनकी पहुँच से दूर रखा जा रहा है, जिसके परिणामस्वरूप वह जाति-समूह मानव-विकास सूचकांक के सभी पैमानों में पिछड़ रहा है और उनकी औसत जीवन-प्रत्याशा राष्ट्रीय औसत जीवन-प्रत्याशा से बेहद नीचे है। 
ये राज्य-हिंसा के आयाम हैं। हिंसा की दशाओं का निरूपण हिंसा की अनुभूति से स्वतंत्र नहीं हो सकता है। समाज में सहज रूप से प्रचलित हिंसा (इंटेर्पेर्सोनल वायलेंस) के अनुपात में राज्य द्वारा की गई हिंसा ज्यादा मात्रात्मक होती है और इसका प्रभाव गुणात्मक होता है। ‘राज्य जीवन के लिए अस्तित्व में आता है और अच्छे जीवन के लिए इसका अस्तित्व बना रहता है; राज्य के समर्थन में अरस्तू का यह कथन राज्य के ऊपर कुछ उत्तरदायित्व भी आरोपित करता है। संभवतः यह लोककल्याणकारी राज्य के विचार का प्रस्थान-बिन्दु था; ऐसा राज्य जो कि अपने नागरिकों के कुशल-क्षेम के लिए उत्तरदायी हो। आधुनिक लोकतान्त्रिक राज्य मुख्य रूप से लोककल्याणकारी राज्य है और संविधान द्वारा यह सुनिश्चित किया गया है कि राज्य अपने नागरिकों को उनकी सुरक्षा और गरिमा को ध्यान में रखते हुए उन्हें अपनी कल्याणकारी सेवाएँ प्रदान करेगा। यदि राज्य ऐसी सेवाएँ अपने नागरिकों को नहीं देता है या लोगों की वास्तविक जरूरतों का ख़्याल नहीं रखता या नागरिक-अधिकारों का अतिक्रमण करता है और अपने बलमूलक-संस्थाओं का प्रयोग लोकप्रिय मांगों को दबाने में करता है, तो यह राज्य द्वारा की जाने वाली हिंसा माना जाएगा। ‘जब हम हिंसा के बारे में विचार करते हैं तो जो तस्वीर सामान्यतः दिमाग में उभरती है वह गुंडों, बलात्कारियों, हत्यारों और अपराधियों आदि की होती है और राज्य हमें इनसे सुरक्षा प्रदान करता है। फिर भी, हिंसा की सम्पूर्ण परिघटना में पारस्परिक हिंसा का योगदान तुलनात्मक रूप से कम ही है। जब हम पारस्परिक हिंसा से आगे संस्थातगत हिंसा और संरचनात्मक हिंसा पर विचार करते हैं तो हिंसा का क्षेत्र और अनुपात बढ़ता जाता है’; दुर्भाग्य से हिंसा के ये उच्च स्वरूप अकादमिक विमर्शों में कम ही आते हैं और इन्हें हिंसा के रूप में परिभाषित करने के बजाए गैर-समस्यागत और राज्य द्वारा कानून एवं व्यवस्था बनाए रखने के लिए किए जाने वाले दैनिक घटनाक्रम के रूप में देखा और समझा जाता है। लेकिन, अगर हिंसा आधुनिक राज्यों का अविभाज्य गुण है तो इसका आलोचनात्मक परीक्षण किया जाना चाहिए, क्योंकि आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य का मुख्य उद्देश्य व्याप्त हर प्रकार की हिंसाओं का उन्मूलन है लेकिन आज दुनियाभर में लोकतंत्र और हिंसा के बीच, जबकि दोनों विरोधाभासी संकल्पनाएँ हैं, गहरी निकटता देखी जा रही है।   

राज्य-हिंसा का परिचय:
1648 की वेस्ट्फेलिया की संधि के बाद राज्य बेहद शक्तिशाली संस्था के रूप में उभरा जिस पर किसी अन्य संस्था का किसी भी प्रकार का नियंत्रण नहीं है। राज्य-हिंसा का विचार दरअसल उसकी इसी असीम संप्रभुता में निहित है, किन्तु इसका यह अर्थ बिल्कुल भी नहीं हैं कि राज्य के संप्रभुता की अवधारणा को खारिज कर दिया जाए। ‘राज्य के पास राजनीतिक नियंत्रण के दो यंत्र हैं; पहला, ‘संप्रभुता’, जिसका प्रयोग राज्य द्वारा किया जाता है, और दूसरा, ‘कानून’, जिसके द्वारा पहला यंत्र प्रयोग में लाया जाता है’। एक लोकतान्त्रिक-संप्रभु राज्य व्यवस्था बनाने के लिए कानून का निर्माण और उनका क्रियान्वयन करता है। कानून-निर्माण की यह शक्ति ही दरअसल राज्य के हिंसा को जन्म देती है; जब राज्य के कानून नागरिकों के साथ भेदभाव करते हैं, जब जन-असंतोष के प्रति संप्रभु हिंसक बल प्रयोग करता है या फिर जब राज्य नागरिकों के कुशल-क्षेम को बढ़ाने के प्रति अनिच्छुक होता है।

वही समाज सभ्य समाज कहा जाएगा जो न्यायपूर्ण हो, और इसके लिए कानून का शासन होना जरूरी है। अतः एक सभ्य और न्यायपूर्ण समाज के लिए कानून आवश्यक हैं और कानून बनाने के लिए राज्य नामक संस्था जरूरी है। यहाँ प्रश्न यह उठता है कि ‘कानून कैसे होने चाहिए?’, ‘उनकी प्रकृति कैसी हो?’ चूंकि समाज में न्याय की स्थापना के लिए ये प्रश्न जरूरी हैं और राज्य कानून बनाता है इसलिए राज्य की भूमिका का इस संदर्भ में बेहद सूक्ष्म परीक्षण किया जाना चाहिए। कानून ऐसे हों जो नागरिकों के कुशल-क्षेम को ठीक ढ़ंग से संज्ञान में रखें, क्योंकि लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली में राज्य और कानून की वैधता इसी में निहित होती है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि जो राज्य ऐसे क़ानूनों का सहारा लेता हो जिनसे नागरिक-अधिकारों का अतिक्रमण हो रहा है, या राज्य शांतिपूर्ण प्रतिरोधों को दबाने के लिए बल प्रयोग करता हो, अथवा किसी समाज या समुदाय को योजनाबद्ध रूप से अधिकारों से वंचित कर उनके हाशिएकरण में संलिप्त हो, हिंसक राज्य कहा जाएगा।

वाल्टर बेंजामिन (1986) लिखते हैं कि, ‘कानून-निर्माण शक्ति-निर्माण है, और उस हद तक, हिंसा का अव्यवहित प्रत्यक्षीकरण’; राज्य-हिंसा कानून के व्यवस्थापन और क्रियान्वयन के क्षेत्र में जन्म लेती है- ‘राज्य की एजेंसियों द्वारा कानून का उपयोग और दुरुपयोग’ के संदर्भ में। राज्य की मशीनरी द्वारा हत्या, उत्पीड़न, अपावर्तन, बलात्कार, अभिरक्षी मृत्यु, फर्जी मुठभेड़ और निवारक अवरोध आदि आज सामान्य परिघटना हो गईं हैं। यद्यपि असामाजिक घटकों और विध्वंसकारी तत्वों से निपटने के लिए निवारक अवरोध राज्य के हाथ में एक महत्वपूर्ण हथियार है किन्तु दुनियाभर के राज्यों द्वारा इस प्रावधान के दुरूपयोग के कम उदाहरण नहीं मिलते।

वास्तव में ऐसे किसी राज्य की कल्पना करना मुश्किल है जहां किसी प्रकार की हिंसा मौजूद न हो। अपनी सीमाओं की सुरक्षा तथा कानून का शासन बनाए रखने के लिए सभी राज्य एक सीमा तक हिंसा का प्रयोग करते हैं। किन्तु ऐसा नहीं है कि राज्य की बलमूलक संस्थाएं केवल राष्ट्रीय सुरक्षा और पब्लिक सेफ़्टी का ही ध्यान रखती हैं, इसके साथ ही ये वास्तव में विषमता को जन्म देती हैं, भेदभाव को बढ़ाती हैं और विस्थापन तथा वंचना को प्रेरित करती हैं। जबकि अरस्तू राज्य को अच्छे जीवन के लिए आवश्यक मानते हैं, प्रश्न यह उठता है कि किस प्रकार राज्य सामाजिक-आर्थिक विषमता का जन्मदाता बन जाता है? इसका जवाब अराजकतावादी और मार्क्सवादी चिंतन में मिलता है। वास्तव में राजनीतिक चिंतन के ये स्कूल ही राज्य-हिंसा की दार्शनिक मीमांसा करते है। अराजकतावादी चिंतक प्रूधों कहते हैं कि ‘संपत्ति चोरी है’; अतः निजी संपत्ति बनाने के लिए किया गया किसी भी तरह का प्रयास अराजकतावादियों की दृष्टि में हिंसा है। मार्क्सवादी एक भिन्न दृष्टिकोण से राज्य की हिंसा को देखते है। उनके लिए ‘राज्य शोषण का यंत्र’ है। यद्यपि, उदारवादी तर्क है कि, नागरिकों के जीवन एवं संपत्ति की सुरक्षा के लिए राज्य का अस्तित्व है, फिर भी दुनिया भर में शोषित वर्ग के प्रतिरोधों का इतिहास राज्य के संदर्भ में मार्क्सवादी तर्क को स्थापित करता है कि उदारवादी राज्य कॉर्पोरेट बुर्जुआ के हितों के लिए कार्य करता है। पूंजीपति वर्ग के ऊपर राज्य के इस वरदहस्थ का दूसरा पहलू दबे-कुचले सर्वहारा के उत्पीड़न की कहानी है। स्टीनर (1995) लिखते हैं कि, ‘राज्य श्रम की दासता पर आधारित होता है, अगर श्रम आज़ाद हो जाता है तो राज्य समाप्त हो जाता है’। अतः राज्य द्वारा पूंजी संचयन की प्रक्रिया हिंसा के प्रकटीकरण की प्रक्रिया है। ‘20वीं सदी के उत्तरार्द्ध से राज्य द्वारा [पूरी दुनिया में] कॉर्पोरेट-पूंजीपति हितों के लिए लोगों के जमीन की चोरी जारी है, चाहे कोई भी दल सत्ता में हो’।

राज्य-हिंसा का दायरा सिर्फ सीधी हिंसा तक सीमित नहीं है, जिसमें वह अपने बलमूलक संस्थाओं का प्रयोग करता है। एंडरसन एवं अन्य (2007) ने सही कहा है कि, ‘एक स्थिर और प्रभावी राज्य मानव-विकास एवं मानव-सुरक्षा की पूर्वशर्त है; और जो राज्य अपने नागरिकों को विकास और सुरक्षा प्रदान कर पाने में असमर्थ हैं वे न तो मजबूत और न ही स्थिर राज्य हो सकते हैं। वे कमजोर राज्य है’। आधुनिक लोकतान्त्रिक शासन प्रणालियों के दौर में राज्य की एजेंसियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। जब ये घटिया तरीके से कार्य करती हैं तो गरीब और पिछड़े लोग सर्वाधिक मात्रा में नकारात्मक रूप में प्रभावित होते है। अतः कहा जा सकता है कि राज्य-हिंसा की संकल्पना के दायरे में कमजोर राज्य या ‘राज्य की अनुपस्थिति’ भी आती है। सुरक्षा संबंधी नए विमर्श, जिसमें व्यक्ति केंद्र में है, ने राज्य की भूमिका पर सवालिया निशान लगाए हैं। राज्य की अनुपस्थिति वास्तव में उन तमाम संरचनात्मक हिंसाओं का कारण बनती है जो चिरस्थायी हिंसा की चक्र शुरू करती हैं। अतः मानव-स्वातंत्र्य और सुरक्षा को राज्य से अलग नहीं किया जा सकता है। राज्य की अनुपस्थिति में समाज के हॉब्स की प्राकृतिक अवस्था में पहुँचने की प्रबल संभावना रहती है जहां मानव जीवन ‘अकेला, गरीब, अप्रिय, पशुवत और संक्षिप्त’ है। अतः राज्य की जरूरत है, लेकिन किस प्रकार के राज्य की? उसके कार्य क्या होने चाहिए? चेनोय और चेनोय (2010) लिखते हैं कि, ‘राज्य का सर्वोच्च कार्य है कि वह ऐसी राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और अन्य संरचनाएं विकसित करे और उन्हें बनाए रखे जिसमें नागरिक अपने अधिकारों के साथ बेहतर जीवन जी सकें’।

राज्य-हिंसा की संकल्पना:
जर्मन समाजशास्त्री मैक्स वेबर (1958) ने कहा है कि राज्य ‘हिंसा के वैध प्रयोग का एकाधिकार’ रखता है। हमें राज्य-हिंसा को समझने के लिए वेबर के इस कथन पर गंभीरता से विचार करना होगा। दरअसल वेबर राज्य को एक ऐसी राजनीतिक संस्था मानते हैं जो शक्ति का प्रयोग करती है और राज्य की यह विशेषता उसे अन्य संघों और संस्थाओं से भिन्न करती है। इस तरह राज्य एक विशिष्ट संस्था है जो किन्ही अन्य संस्थाओं या संघों के नियंत्रण में नहीं बल्कि उनको नियंत्रित करती है। हिंसा के वैध प्रयोग की एकाधिकारिता राज्य को समाज में व्यवस्था बनाए रखने के लिए नागरिकों द्वारा प्रदान की जाती है। किन्तु राज्य द्वारा प्रयोग किए गए हिंसा की प्रकृति की वैधता का निर्धारण कैसे किया जाए? कौन तय करेगा कि राज्य द्वारा प्रयोग की गई हिंसा वैध है या अवैध? यह कार्य तब और भी कठिन हो जाता है जब हिंसा के वैध और अवैध प्रयोग के बीच के अंतर का आवरण बहुत झीना हो। ‘कानूनी और गैर-कानूनी के दरम्यान जो फासला है वो पता नहीं चलता कि कब कानून गैर-कानूनी काम कर रहा है। राज्य की इस प्रकार की असंगति में यह पहचान पाना मुश्किल हो जाता है कि यह कानूनी तरीके से या गैर-कानूनी तरीके से काम कर रहा है’।

मिचलोवस्की (1985) लिखते हैं कि, ‘यह हकीकत है कि किसी निश्चित राजनीतिक संदर्भ में राज्य-हिंसा कानूनी है… फिर भी इस वास्तविकता को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए कि यह हिंसा ही है’। अतः व्यावहारिक ढंग से हम ये कह सकते हैं कि हिंसा हिंसा ही है, चाहे वह वैध हो या फिर अवैध। अवैध हिंसा तो अकादमिक जगत में विमर्श का विषय रहा है लेकिन तथाकथित वैध हिंसा बहुत कम चर्चा के केंद्र में होती है। बड़ा प्रश्न यह है कि कौन हिंसा की वैधानिकता तय करेगा? पुनः, हिंसा की वैधता तय करने में राज्य एकाधिकारी स्थिति में होता है; वह अपनी हिंसा को कानून-व्यवस्था की स्थापना के संदर्भ में वैध ठहरा सकता है। लेकिन इस कानून-व्यवस्था के नाम पर होने वाली हिंसा को किस परिप्रेक्ष्य में देखा और समझा जाए? इसी स्थिति को मनीषा सेठी (2015) वैधता और अवैधता के बीच परस्पर विरोधाभासी अतिव्यापन कहती हैं। ‘राज्य द्वारा प्रभुत्व प्राप्त करने के लिए अपने नागरिकों के विरूद्ध भौतिक, संरचनात्मक या सांस्कृतिक हिंसा का प्रयोग राज्य-हिंसा कहलाता है’। चूंकि प्रभुत्व राज्य के प्रकृति में अंतर्निहित है अतः हिंसा राज्य की प्रकृति का अविभाज्य अंग बन जाता है। स्टीनर (1995) लिखते हैं कि, ‘राज्य का एक मात्र उद्देश्य व्यक्ति को, सीमित, दब्बू और अधीन बनाना है… राज्य सभी स्वतंत्र क्रियाकलापों में अपने सेंसरशिप, अपने निरीक्षण, अपनी पुलिस के माध्यम से बाधा डालता है और इस तरह की बाधाओं को बनाए रखता है क्योंकि ये बाधाएँ उसके आत्मरक्षा के लिए जरूरी हैं’।

राज्य-हिंसा की अवधारणा में सबसे पहली जरूरत यह होगी कि हम अपने सरोकार को स्पष्ट करें। अर्थात हम किन मूल्यों पर अपना ध्यान केन्द्रित करे जिनसे ‘राज्य-हिंसा’ की परिधि का निर्धारण हो सके। सरोकारों को स्पष्ट किए बिना हम राज्य-हिंसा की वैध एकाधिकारिता और अवैध प्रयोग के बीच अंतर नहीं कर पाएंगे। निश्चय ही हिंसा किसी-न-किसी के विरूद्ध होती या की जाती है। राज्य-हिंसा का नजदीकी निशाना निश्चित ही ‘व्यक्ति’ होंगे। यहाँ पर राज्य-हिंसा की अवधारणा से कुछ प्रश्न उठते हैं: (1) क्या राज्य-हिंसा के शिकार सिर्फ गरीब और अल्पसंख्यक हैं? (2) क्या यह अमीरों और बहुसंख्यकों के हितों से संबंधित है? यह बहुत दुखद बात है कि हम राज्य-हिंसा के अपने अध्ययन में ज़्यादातर बार इसे कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए राज्य द्वारा किए जाने वाले रोज़मर्रा की कार्यवाई के रूप में देखते हैं; और यही तर्क राज्य को गरीबों, पिछड़ों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों के लिए विद्रुप और निरर्थक बना देता है। आश्चर्यजनक रूप से प्रतिनिधिमूलक लोकतांत्रिक शासन प्रणाली अपने 300 वर्षों के इतिहास में पिछड़ों, गरीबों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों का विश्वास जीत पाने में नाकाम रही है। यहाँ हम कम-से-कम तीन ऐसे क्षेत्र चिन्हित कर सकते हैं जिनसे राज्य-हिंसा की अवधारणा की परिधि तय होती है:

  1. राष्ट्रवाद और जातीयता के नाम पर हिंसा;
  2. आंतरिक सुरक्षा के नाम पर हिंसा;
  3. व्यक्ति-अधिकारों के निषेध के रूप में हिंसा

हिंसा के ये प्रारूप आधुनिक राष्ट्र-राज्यों द्वारा अपने प्रभुत्व को स्थापित करने के लिए प्रयोग में लाए जाते हैं। राज्य-हिंसा के इन तीनों प्रारूपों में एक बात यह समान है कि राज्य द्वारा निहत्थी और निरीह जनता पर व्यवस्थित रूप से घातक बलों का प्रयोग किया जाता है। हिंसा के उपरोक्त प्रथम दो प्रारूपों के संदर्भ में कोई यह तर्क दे सकता है कि राष्ट्रवाद का विचार राज्य की भौगोलिक एकता और अखंडता के लिए जरूरी है अतः इस प्रकार की हिंसा वैध हिंसा मानी जानी चाहिए। इसी प्रकार जब कोई जातीय समूह या विद्रोहियों का समूह राज्य के विरूद्ध उठ खड़ा हो जाए और राज्य-अधिष्ठान की आंतरिक सुरक्षा को चुनौती दे तो निश्चय ही राज्य पलटकर जवाब देगा और अपने हिंसक बलों का प्रयोग करेगा। लेकिन पहले दोनों प्रारूपों की हिंसा के पक्ष में ये तर्क नाकाफी हैं।

आधुनिक बहुसांस्कृतिक समाजों में पहले प्रारूप की हिंसा वैध नहीं समझी जाएगी, क्योंकि राज्य की वैधता राष्ट्रवादी विचारों या प्रभुत्वशाली जातीयता के भाषा, संस्कृति और धर्म के अनुरूपता पर निर्भर नहीं करती। राज्य के प्रति निष्ठा को वैचारिक के बजाय व्यावहारिक संदर्भों में परिभाषित किया जाना चाहिए। राष्ट्रवाद का विचार, जो कि राज्य की शक्ति के वैधता का मुख्य आधार बन जाता है, बहुसांस्कृतिक लोकतंत्रों में केवल अल्पसंख्यक वर्गों में असुरक्षा की भावना को जन्म देता है और राज्य की बहुल अस्मिता हमेशा खतरे में रहती है। कई बार तो राज्य राष्ट्रवाद या जातीयता के नाम पर हो रही हिंसा के विरूद्ध, वेबेरियन संदर्भ में, अपनी वैध हिंसा के प्रयोग के एकाधिकार का भी उपयोग नहीं करता है, बल्कि इसके विपरीत यह ऐसी हिंसाओं को सहन करता है या फिर इन्हे बढ़ावा देता है जिसे हम ‘सामाजिक हिंसा’ के रूप में परिभाषित कर सकते हैं। सांप्रदायिक शक्तियों के विरूद्ध राज्य द्वारा हिंसा के एकाधिकार का उपयोग कर पाने में अक्षमता उसके कमजोर राज्य होने का परिणामस्वरूप नहीं है बल्कि ऐसा राजनीतिक प्रतिस्पर्धाओं में लाभ पाने के लिए भी किया जाता है।

राज्य-हिंसा का दूसरा प्रकार राष्ट्रीय-सुरक्षा की संकल्पना से वैधता प्राप्त करता है और इस आधार पर उचित भी ठहराया जाता है। जब कभी विद्रोहियों या अलगाववादियों द्वारा राज्य की एकता और अखंडता को चुनौती दी जाती है तो राज्य उन्हें दबाने और कानून-व्यवस्था को बनाए रखने के लिए अपने बलमूलक संस्थाओं का प्रयोग (वैध हिंसा का प्रयोग) करने के लिए मजबूर हो जाता है। लेकिन सिक्के का एक दूसरा स्याह पहलू भी है जो की भयावह है और राज्य के नृशंस और बर्बर चरित्र को सामने लाता है। राज्य अक्सर स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों मे परिवर्तित कर देता है। एक बार राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला बन जाने के बाद स्थानीय मुद्दा राजनीति से ऊपर और गंभीर विषय बन जाता है और राज्य अपनी बलमूलक संस्थाओं के प्रयोग के लिए खुली छुट प्राप्त कर लेता है। राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर, जैसा की पैसिफ़ीकी (2009) कहते हैं कि, ‘राज्य हिंसा करता है और उसे आवश्यक तथा अहानिकारक बताता है’।

जहां तक तीसरे प्रकार की राज्य-हिंसा का सवाल है, इसे अधिकारों के निषेध के रूप में समझा जा सकता है- चाहे व्यक्ति-अधिकारों या फिर सामुदायिक अधिकारों का निषेध। हिंसा के प्रारूप-वर्गीकरण पर गहन अध्ययन करने वाले शांति अध्ययन के प्रमुख विद्वान गाल्टुंग (1990) हिंसा को ‘मानव की मूलभूत आवश्यकताओं में सहने की क्षमता तक कमी करने, और जीवन को निम्नतम स्तर पर लाने जहां आवश्यकताओं की संतुष्टि का वास्तविक स्तर संभावित स्तर से नीचे हो’ के रूप में परिभाषित करते है। इस प्रकार की हिंसा ‘सापेक्ष वंचना’ (रेलेटिव डेप्रीवेशन) को जन्म देता है जो कि वास्तविक और संभावित के बीच अंतर में स्पष्ट होती है। किसी समाज में सामाजिक विकास के तमाम सूचकांकों में मौजूद सापेक्षिक भिन्नता को संरचनात्मक हिंसा कहा जाता है। इस संरचनात्मक हिंसा के लिए उत्तरदायी कौन है? वास्तविक और संभावित के मध्य अंतर के लिए जिम्मेदार कौन है- व्यक्ति, समाज या राज्य? प्रो. प्रियंकर उपाध्याय (1995) लिखते हैं कि, ‘आज बहुत से समाज मूलभूत अधिकारों के राज्य द्वारा अतिक्रमण किए जाने से जूझ रहे है’, जबकि द्वितीय और तृतीय पीढ़ी के अधिकारों के संरक्षण और उन्हे बढ़ावा देने के लिए राज्य के सकारात्मक हस्तक्षेप की जरूरत है। उदारीकरण, निजीकरण और वैश्विकरण के वाहक के रूप में 20वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और 21वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में उभरे नव-उदारवादी राज्यों में मानवाधिकारों का अतिक्रमण गंभीर मुद्दा है। राज्य द्वारा सामाजिक-आर्थिक अधिकारों, पर्यावरणीय अधिकारों, सांस्कृतिक और सामुदायिक अधिकारों के अतिक्रमण के विरूद्ध अनेक मानवाधिकारवादी आंदोलन ग्लोब पर अलग-अलग जगहों पर देखने को मिल रहे हैं। जबकि दूसरी और तीसरी पीढ़ी के अधिकार राज्य की प्रभावी भूमिका की मांग करते हैं और केवल कानून के शासन में ही सुरक्षित रह सकते हैं, दुनियाभर में चल रहे मानवाधिकारवादी आंदोलन इस मुद्दे के प्रति लोगों की व्यग्रता और राज्य की नकारात्मक भूमिका को प्रकट करते है।

उपरोक्त तीन संकल्पनात्मक परिधि में राज्य-हिंसा को समझा जा सकता है। ऐसा नहीं है की राज्य-हिंसा सदैव प्रभुत्व स्थापना के लिए ही होती है। कई बार ऐसी परिस्थितियाँ बन जाती हैं जब राज्य हिंसा करने के लिए मजबूर हो जाता है। अतः हम इन्ही तीन संकल्पनात्मक परिधि में रहते हुए राज्य-हिंसा के अभिप्रेरित और अनभिप्रेरित प्रारूप देख सकते हैं। अनभिप्रेरित हिंसा को वैध हिंसा और अभिप्रेरित हिंसा को अवैध हिंसा की श्रेणी में रखा जा सकता है। अगर कोई जातीय समूह बिना किसी खास वजह के राज्य के खिलाफ खड़ा हो जाए और उसकी अखंडता कोई चुनौती दे तो राज्य ऐसे आंदोलनों को हिंसा का प्रयोग करते हुए दबा सकता है और यह अनभिप्रेरित हिंसा होगी। लेकिन यदि राज्य राष्ट्रवाद या संप्रदायवाद के आधार पर किसी जाति या धार्मिक समूह के विरूद्ध हिंसा करता है तो यह अभिप्रेरित हिंसा कही जाएगी। इसी प्रकार आंतरिक सुरक्षा को यदि चुनौती मिल रही है तो राज्य को हिंसा का प्रयोग स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए करना चाहिए। इन परिस्थितियों से निपटने के लिए राज्य के पास हिंसा के प्रयोग का वैध एकाधिकार है। किन्तु यदि कुछ लोग अपने अधिकारों को प्राप्त करने के लिए हिंसक मार्ग का चुनाव करते हैं और राज्य उनके ‘वैध’ मांगों पर विचार करने के बजाए उनके आंदोलन या संघर्ष को आंतरिक सुरक्षा के लिए चुनौती मानकर उनके विरूद्ध अपने बलमूलक संस्थाओं का प्रयोग करता है तो इस प्रकार की राज्य-हिंसा अवैध होगी। इसी क्रम में, यदि राज्य के पास संसाधन कम है, लोगों के जीवन का स्तर सामान्य से नीचे है तथा स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवनयापन की परिस्थितियाँ विकट हैं और दैनिक जीवन में हिंसा का स्पष्ट प्रदर्शन हो रहा हो, यह अनभिप्रेरित हिंसा होगी। लेकिन राज्य को इन परिस्थितियों से शीघ्रातिशीघ्र निपटने की कोशिश करनी चाहिए। इसके विपरीत, यदि राज्य में समृद्धि है किन्तु किसी खास वर्ग या जाति समुदाय का योजनाबद्ध तरीके से अपवर्जन या बहिष्करण किया जा रहा है तो यह अभिप्रेरित राज्य-हिंसा की श्रेणी में आएगा। अकालों पर किए गए अपने अध्ययन में प्रख्यात अर्थशास्त्री प्रो. अमर्त्य सेन (1981) ने यह सिद्ध किया है कि अकाल पड़ते नहीं बल्कि अकाल की स्थिति कृत्रिम रूप से तैयार की जाती है। हिंसा का सहारा लिए बिना राज्य चल ही नहीं सकता, क्योंकि प्रत्येक से न्यायपूर्ण होने की उम्मीद नहीं की जा सकती। अतः राज्य को कुछ ऐसे कठोर कानूनों एवं उनका पालन करने वाली बलमूलक संस्थाओं की जरूरत होती है ताकि शांतिपूर्ण व्यवस्था बनी रहे। इस तरह हिंसा राज्य की प्रकृति में निहित है, किन्तु ऐसी हिंसा जो अनभिप्रेरित होती है, वैध हिंसा होगी। लेकिन अभिप्रेरित और योजनाबद्ध तरीके से की गई हिंसा को वैध नहीं ठहराया जा सकता।

क्या भारत एक हिंसक राज्य है?

एक औपनिवेशिक राज्य के रूप में भारतीय राज्य द्वारा की गई हिंसाओं से इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं। जॉन मिर्डल (2012), लिखते हैं कि, ‘भारत कभी भी ‘अहिंसक’ नहीं रहा, चाहे शासकों की ओर से या शासितों की ओर से। शोषकों के खिलाफ आंदोलन के रूप में हिंसा… उत्पीड़ित जनता हमेशा से ही संघर्षरत रही है, उस समय भी और आज भी’। भारत में औपनिवेशिक शासन हिंसा की क्रूर गाथाओं से भरा है। 1857 के समय हिंदुओं को गाय की चर्बी और मुसलमानों को सूअर की चर्बी युक्त कारतूस, जिसे मुंह से खोला जाना होता था, देने जैसी सांस्कृतिक हिंसा से शुरू होकर लगान बढ़ाने और बंधुआ मजदूरी के लिए गिरमिटिया मजदूर के रूप में समुद्र पार भेजने की संरचनात्मक हिंसा और जलियाँवाला बाग कांड जैसी सीधी हिंसाओं के कम उदाहरण भारतीय इतिहास में मौजूद नहीं हैं।

स्वतंत्रता के साथ ही लोगों को यह उम्मीद बंधी कि गुलामी और हिंसा का वह दौर अब दुबारा नहीं आएगा। 15 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि, जब दुनिया सो रही थी, भारत अपनी नियति से मिलने का वादा करके एक नई यात्रा प्रारम्भ कर रहा था। इस यात्रा का प्रस्थान बिन्दु तो लोगों की आज़ादी से था लेकिन डगर बड़ी कठिन थी, ऊंच-नीच, छुआछूत, सामाजिक गैरबराबरी, अशिक्षा, गरीबी और वंचना के खतरनाक मोड़ वाले इस ऊबड़-खाबड़ सड़क पर सत्तर वर्ष से चल रही भारतीय लोकतंत्र की यात्रा का इतिहास और वर्तमान कभी एकरेखीय नहीं रहा। अपनी पुस्तक ‘इंडिया टुड़े’ के 1970 के संस्करण की भूमिका में रजनी पामदत्त (1977) लिखते हैं कि, ‘भारत की नई सरकार द्वारा प्रकाशित सरकारी आंकड़ों के अनुसार 15 अगस्त 1947 से 1 अगस्त 1950 तक यानि अपने शासन के तीन वर्षों के अंदर उसकी पुलिस या सेना ने कम से कम 1982 बार जनता के प्रदर्शनों पर गोली चलाई, 3,784 व्यक्तियों को भून डाला और लगभग 10,000 व्यक्तियों को घायल किया, 50,000 लोगों को जेल के अंदर डाला और 82 कैदियों को जेल के अंदर गोली मार दी गई’। दुर्भाग्य से यही स्थिति अभी तक बनी हुई है या यूँ कहें तो हालात और नाज़ुक हुए हैं।

‘दुनिया का सबसे बड़ा साम्यवादी विद्रोह, दुनिया का सबसे पुराना नस्लीय विद्रोह। दुनिया भर के इस्लामिक विद्रोहों में से एक सबसे जटिल। दुनिया के टोस्ट, भारत, जहां हर पाँचवाँ नागरिक हथियारबंद विद्रोहों के साये में रहता है, में स्वागत है’। मिश्रा और पंडिता (2010) के ये शब्द हालात के प्रति सपाट बयानी का अच्छा उदाहरण है। 16 अगस्त 1946 ‘डाइरैक्ट एक्शन डे, और आज़ादी के चौखट पर विभाजन की हिंसा, जिसमें हजारों लोग मौत के घाट उतार दिये गए, की त्रासदी से दोनों मुल्क, भारत और पाकिस्तान, अब तक उबर नहीं पाए हैं, हिंसा इन राजनीतिक व्यवस्थाओं का आवश्यक हिस्सा बन गईं है। पाकिस्तान में अबतक लोकतांत्रिक संस्थाएं जड़ तक नहीं जमा पाई हैं। इसके विपरीत भारत में लोकतांत्रिक संस्थाएं मजबूत तो हुई हैं लेकिन राज्य-हिंसा का दायरा भी बढ़ा है। ‘भारतीय राज्य चार्ल्स डिकेन्स के उपन्यासों के चरित्रों की तरह है, जहाँ एक ओर इंसाफ दशकों तक चले वाली कानूनी जंग के अनावश्यक शब्दजालों में फंसा रहता है, तो दूसरी ओर राज्य किसी भी कानूनी सीमा से बंधा हुआ नहीं है। एकाएक उसके क्रूर एवं खुली वर्गीय हिंसा के दांत बाहर निकल आते हैं’। यह फ्रेंच काफ्का के उपन्यासों के चरित्रों सा भी है, जहाँ कानूनी और गई-कानूनी के दरम्यान फ़ासला खत्म सा होता जाता है। एक आंकड़े के अनुसार भारत के कुल 80 प्रतिशत संसाधनों पर मात्र 20 प्रतिशत लोगों का हक़ है। आज के भारतीय समाज के अंतर्विरोध को हम इसी अंतर से समझ सकते हैं। ‘आधिकारिक तौर पर भारत एक स्वतंत्र देश है और भारत के उच्च माध्यम वर्ग के नीचे रहने वाली आबादी आज भी उसी तरह की गरीबी से त्रस्त जीवन जी रही है, जिसके बारे में रजनी पामदत्त ने कहा था, “ऐसी गरीबी जो पश्चिमी दुनिया की स्थितियों से वाकिफ किसी भी व्यक्ति की कल्पना से परे होगा”। लेकिन अमीर लोग पहले की तरह और अमीर होते जा रहे हैं। 36 भारतीय अरबपतियों की संपदा पूरे भारत की सकल घरेलू उत्पाद का एक तिहाई है’। भारत में उत्पीड़ित और भूखे जब अपने अधिकार की मांग करते हैं तब राज्य घृणित रूप से इन कुछ मुट्ठी भर पूंजीपतियों के हितों के पक्ष में खड़ा हो जाता और शोषण की इस व्यवस्था को बनाए रखने के लिए सेना, अर्द्ध-सैनिक बलों, पुलिस, और गैर-कानूनी निगरानी समितियों के सहयोग से इनके मांगों को दबा देता है।

भारत में हर साल बड़ी संख्या में लोग सांप्रदायिक हिंसा के शिकार होते हैं। इन हिंसाओं में राज्य की परोक्ष भूमिका से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है। हालांकि, सैद्धांतिक तौर पर आज़ादी के बाद से ही पंथनिरपेक्षता के विचार को बढ़ावा दिया गया और संप्रदायवाद का विरोध किया गया तथा राज्य को धार्मिक राज्य के रूप में परिभाषित नहीं किया गया, परंतु यह कहना जरा कठिन है कि सांप्रदायिक सौहार्द कभी अस्तित्वमान सच्चाई भी रही है। भारत का राजनीतिक अभिजन अपने राजनीतिक लाभों के लिए धर्म के दुरुपयोग से जरा भी हिचके नहीं, परिणामस्वरूप सांप्रदायिकता देश के अंदर हिंसा का सबसे बड़ा स्रोत बन गया है। एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2004 से वर्ष 2010 तक पुलिस की गोलीबारी से 2,337 लोगों की जानें जा चुकी हैं। इसी रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2006 से 2010 तक सांप्रदायिक दंगों में मरने वालों की संख्या 287 है जबकि इसी समायावधि में पुलिस कस्टडि में 442 लोग मरे।

इसके अलावा आंतरिक सुरक्षा के नाम पर भारत में राज्य-हिंसा लगातार बढ़ रही है। माओवादियों के खिलाफ चल रहे राज्य बनाम माओवादी छ्दम युद्ध में अबतक करीब 6000 लोगों की जानें जा चुकी हैं। लाल गलियारे में सुरक्षा बलों द्वारा फर्जी मुठभेड़ में निर्दोष आदिवासियों की हत्या, महिलाओं के साथ बलात्कार, लूट आदि की घटनाएँ दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। राज्य द्वारा संसाधनों की खुली लूट और आदिवासियों की उनके ज़मीन से बेदख़ली बड़े पैमाने पर जारी है। दक्षिणी छत्तीसगढ़ में सरकार द्वारा आदिवासियों की ज़मीनें लूटकर पूँजीपतियों को सौंपने के संबंध में एक कमेटी ने रिपोर्ट ने बड़ा ही दिलचस्प निष्कर्ष लिखा है कि, ‘यह कोलंबस के बाद जमीन हड़पने की सबसे बड़ी घटना है’। इतने बड़े पैमाने पर ज़मीन की हड़प से बेदखल हुए आदिवासियों के पुनर्वास के लिए कोई ठोस व्यवस्था सरकार द्वारा नहीं की गई है, जिसके परिणामस्वरूप विस्थापन का दंश झेल रहे आदिवासी समुदाय की जीविका ही नहीं बल्कि जीवन-संस्कृति भी खतरे में पड़ गई है। मानव-विकास के लगभग सभी महत्वपूर्ण सूचकांकों, मसलन शिक्षा, स्वास्थ्य, शिशु मृत्यु दर, मातृ-मृत्यु दर, बीएमआई सूचकांक आदि में ये आदिवासी समुदाय राष्ट्रीय औसत से बहुत पीछे हैं। राज्य इन क्षेत्रों में काम कर उनके जीवन स्तर को सुधारने के बजाए उनके अधिवास स्थानों में दबे खनिज और महत्वपूर्ण अयस्कों के निर्बाध दोहन में लगी है।

सापेक्षिक वंचना का स्तर इतना नीचा नहीं होना चाहिए कि लोगों को उनसे घिन आने लगे, या वे समाज की शांति पर चोट करने लगे। समाज में अमीरी और गरीबी का ऐसा स्पष्ट विभाजन गरीबों के लिए नहीं बल्कि अमीरों के लिए उस सीमा तक चिंतनीय है जहां से मुर्दा शांति के खिलाफ गरीबों की जिंदा अशांति शुरू हो जाती है। जॉन मिर्डल लिखते हैं कि, ‘गरीबों के खिलाफ अमीरों के इस लंबे अत्याचार में भारतीय जनता कभी भी सिर्फ निष्क्रिय शिकार नहीं रही है। उन्होने पलटकर जवाब दिया है। यह उन्होने अंग्रेजों के भारत आने से पहले भी किया। अंग्रेजों के समय में भी किया और आज भी कर रहे हैं’।

अंत में, भारत कभी भी पूर्णतः सहिष्णु और अहिंसक राज्य नहीं रहा है। प्राचीन वर्ण व्यवस्था से लेकर आधुनिक लोकतंत्र के अपने लंबे इतिहास में भारत में शोषक-शोषित सम्बन्धों की स्पष्ट पड़ताल की जा सकती है। भारत एक लोक-कल्याणकारी राज्य होने के साथ-साथ प्रशमन राज्य (काउंटर-इंसर्जेंसी स्टेट) भी है। निश्चित रूप से भारत ने आर्थिक क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है और दुनिया की महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्थाओं में से एक है लेकिन भारत-उदय के इन शानदार आख्यानों के समानान्तर ही उत्तरजीवी-भारत का भी लंबा-चौड़ा आख्यान है। ऐसा नहीं है कि सत्तर वर्षों के जनतांत्रिक इतिहास में भारतीय राज्य सिर्फ हिंसक ही रहा है; विकास के नए आयाम भी तय किए गए है। इस दौरान भारतीय राज्य अपने समक्ष आने वाली हिंसक चुनौतियों के लिए कभी भी सहिष्णु राज्य नहीं रहा, जैसा कि पहले ही कहा भी गया है कि कोई भी राज्य हिंसा से अलग नहीं हो सकता, और हो भी नहीं सकता। लेकिन आधुनिक भारतीय राज्य में अभिप्रेरित हिंसाओं के भी आख्यान पटे पड़े हैं। जरूरी है कि अभिप्रेरित हिंसाओं को गंभीर अकादमिक विमर्श का मुद्दा बनाए ताकि भारत को तमाम अस्मिताओं, जतियों और नस्लों के लिए सुलभ और सहिष्णु बना सकें।

आभार: इस शोध आलेख के लेखन में उज्जयी तिवारी, एम. ए. शांति अध्ययन, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, के सहयोग के लिए मैं उनके प्रति आभारी हूँ। सुश्री तिवारी के साथ हिंसा पर हुए विमर्श इस आलेख की रूपरेखा तैयार करने में उल्लेखनीय रूप से महत्वपूर्ण है। इस क्रम में मैं अपने कॉलेज के हिन्दी विभाग के प्राध्यापक, जिन पर ग्रंथालय सम्हालनें का अतिरिक्त दायित्व है, डॉ. प्रकाश भट्ट जी का भी आभारी हूँ, जिन्होने सीमित संसाधनों के बावजूद भी ग्रंथालय को बेहतरीन और अपडेट बनाए रखा है।                   

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