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पुस्तक समीक्षा – द्वारा भारती संजीव श्रीवास्तव – सपनों के करीब...

जीवन का मर्म है 'सपनों के क़रीब हों आंखें' 'कविता होगी तो ' हर लड़ाई के बाद/सिर्फ मनुष्य बच रहेगा/मनुष्य के कुछ स्वप्न होंगे/जिसमें होगी अधिक चहचहानेवाली चिड़िया/और चिड़िया...

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