गोदान और मैला आँचल

गोदान और मैला आँचल की तुलना करते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि प्रेमचंद और रेणु के अपने अपने युग संदर्भ रहे। प्रेमचंद के किसान-मजदूर खासकर किसान, साम्राज्यवादी और सामंती दोनों ताकतों से पीड़ित होने की वजह से दोहरे शोषण का शिकार हैं तो वहीं रेणु के किसान-मजदूरों को साम्राज्यवादी शक्तियों का शिकार नहीं होना पड़ता।

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कोश विज्ञान की उपादेयता

कोश विज्ञान सिर्फ शब्दों का बेतरतीब भंडार या संग्रह नहीं है बल्कि उसे व्यवस्थित बनाकर ही संपूर्ण भाषा को जाना जा सकता है। अतः कोश निर्माण भी अपने आप में अत्यंत श्रमसाध्य प्रक्रिया है अंग्रेजी में केाश विज्ञान को (lexicology) कहा जाता है । कुछ विद्धान इसे (lexicography) भी कहते है।

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आत्मकथा : हिंदी साहित्य लेखन की गद्य विधा- डॉ. प्रमोद पाण्डेय

आत्मकथा हिंदी साहित्य लेखन की गद्य विधाओं में से एक है। आत्मकथा यह व्यक्ति के द्वारा अनुभव किए गए जीवन के सत्य तथा यथार्थ का चित्रण है। आत्मकथा के केंद्र में आत्मकथाकार या किसी भी व्यक्ति विशेष के जीवन के विविध पहलुओं तथा क्रिया-कलापों का विवरण होता है। आत्मकथा का हर एक भाग मानव की जिजीविषा तथा हर एक शब्द मनुष्य के कर्म व क्रिया-कलापों से जुड़ा हुआ होता है। “न मानुषात् श्रेष्ठतर हि किंचित्” अर्थात मनुष्य से बढ़कर कुछ भी नहीं है। आत्मकथा के अंतर्गत आत्मनिरीक्षण, आत्मपरीक्षण, आत्मविश्लेषण, आत्माभिव्यक्ति यह आत्मकथा के द्वारा की जाती है।

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२१वी सदी की ‘सुशीला’ को चाहिए ‘अनंत असीम दिगंत…..’-प्रो. डॉ. सौ. रमा प्र. नवले

मेहतर समाज की एक छोटी सी लड़की ‘सुशीला’ का अदम्य साहस अचंभित करता है| अत्यंत दरिद्र और सात भाई-बहनों के साथ एक बड़े परिवार में जीनेवाली यह लड़की, पिता के पढ़ाई बंद करने के निर्णय के विरुद्ध उपोषण करती है| एक ओर दरिद्रता और दूसरी ओर निम्न जाति में भी निम्न समझी जानेवाली मेहतर जाति के दंश की पीड़ा लगातार वह भुगतती रही है | ना वह अपनी सहेलियों के साथ बैठ पाई न खेल पाई और ना ही पीएच. डी. जैसी उच्चतम उपाधि पाने के बाद भी ‘झाडूवाली’ शब्द से छुटकारा पा सकी; पर ताज्जुब यह है कि जाति और लिंग भेद के अंधे कुँए के अँधेरे को चीरकर सतरंगी सपने बराबर वह देखती रही है|

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लोकप्रिय साहित्‍य की अवधारणा- सुशील कुमार

साहित्‍य के दो रूप मिलते हैं- एक, लोकप्रिय साहित्‍य और दूसरा, कलात्‍मक साहित्‍य। कलात्‍मक साहित्‍य को गंभीर साहित्‍य माना जाता है, जबकि लोकप्रिय साहित्‍य को सतही साहित्‍य। साधारणत: माना जाता है कि जो साहित्‍य व्‍यापक जनसमुदाय के बीच सहज रूप में स्‍वीकृत और ग्राह्य हो, वह लोकप्रिय साहित्‍य है। सहजता, सरलता और सुबोधता ऐसे साहित्‍य के अनिवार्य गुण माने जाते हैं। लेकिन कोई साहित्‍य व्‍यापक जनसमुदाय के बीच सिर्फ सहजता, सरलता और सुबोधता के कारण लोकप्रिय नहीं होता। वह साहित्‍य व्‍यापक जनसमुदाय के बीच लोकप्रिय तभी होगा, जब उसका जुड़ाव आम जन से होगा।

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तेजेन्द्र शर्मा की कहानियों का विशिष्ट एवं नवीन अनुभव संसार

समकालीन हिन्दी लेखको में तेजेन्द्र
शर्मा अपनी अलग पहचान बनाने में सफल रहे है। उनकी कहानियों की विशिष्टता का कारण सिर्फ
उनका प्रवासी परिवेश से युक्त होना ही नहीं, बल्कि विदेश प्रवासरत आम लोगों के जीवन को नए दृष्टिकोण से देखना है।

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लेखन और साहित्य

लिखना और पढ़ना दोनों एक ही सिक्का के दो भाग है एक ही पन्ना के दो पेज है, अगर एक …

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वैश्विक महामारी कोरोना के संदर्भ में: साहित्य की भूमिका- सारिका ठाकुर

वर्तमान समय में फैली वैश्विक महामारी(कोरोना) ने न केवल वर्तमान बल्कि भविष्य को भी प्रभावित किया है,  इसके प्रभाव का ही परिणाम है कि आज देश-विदेश की आर्थिक,  सामाजिक,  राजनीतिक,  धार्मिक,  पारिवारिक व शैक्षिक स्थिति चरमरा गई है| दो कदम आगे बढ़ने की बजाय दो सौ कदम पीछे जा चुके हैं हम| ऐसे में जब हर वर्ग, हर समुदाय अपने स्तर पर इस समस्या के समाधान हेतु निरंतर प्रयासरत हैं, ऐसे में साहित्य भी  प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से अपनी भूमिका का निर्वहन कर रहा है।

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महामृत्युंजयी कविताएं

हिमकर श्याम की कविताएं /लक्ष्मीकांत मुकुल “युद्धरत हूँ मैं” युवा कवि हिमकर श्याम का एक बहुरंगी कविता संकलन है, जिसमें …

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डॉ. रामविलास शर्मा के पत्रों में विविध सामाजिक पक्ष -राहुल श्रीवास्तव

हिन्दी साहित्य के विकास की एक समृद्ध परम्परा रही है, जिसमें विविध विधाओं का विकास समयानुसार होता रहा है और उन साहित्यिक विधाओं में विभिन्न सामाजिक पक्षों का वर्णन किया गया है, जो साहित्यकार की लेखनी को सामाजिक दृष्टि से समृद्ध करता है। इसी क्रम में पत्र विधा भी हिन्दी साहित्य जगत में अपना विशिष्ट स्थान रखती है, जिसमें लेखक और उसके मित्रों के मध्य हुऐ सम्वाद जो विभिन्न विषयों से सम्बन्धित होते हैं, समाहित रहते हैं। हिन्दी साहित्य के अन्तर्गत डॉ. रामविलास शर्मा का पत्र-साहित्य अपना एक विशेष स्थान रखता है। उनके पत्रों में वे अपने मित्रों के साथ विभिन्न साहित्यिक विषयों के साथ-साथ सामाजिक और समसामयिक विषयों पर भी मंत्रणाएँ करते नजर आते हैं और इस आलेख के माध्यम से उन सामाजिक विषयों पर डॉ. रामविलास शर्मा की दृष्टि को समझने और उस विषय के सम्बन्ध में उनके सरोकार को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर डॉ. रामविलास शर्मा की बेबाक राय उनके पत्र-साहित्य में देखने को मिलती है।

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