कोरोना संक्रमण और आपदाओं के संकट में आत्मनिर्भर भारत- सामाजिक संस्कृति के परिवर्तित परिप्रेक्ष्य में: रजनी

शोध सार

वर्तमान में, दुनिया कोरोना (कोविद -19) महामारी की समस्या से जूझ रही है। जिसके कारण दुनिया के कई देशों को तालाबंदी का आदेश जारी करना पड़ा है। इस ताले के प्रभाव को प्रकृति पर देखें तो वायु शुद्ध, जल शुद्ध, पृथ्वी शुद्ध, आकाश शुद्ध और अग्नि शुद्ध। कहने का आशय यह है कि पूरी दुनिया का पर्यावरण शुद्ध है। प्रकृति प्रदूशण की गुलाम थी। मनुष्य इस लॉक डाउन की स्थिति में स्वतंत्र प्रकृति का आनंद ले रहा है। इतिहास हमेशा हमें जितना हो सके उतना विकसित होने की चेतावनी देता रहा है की विकास से संस्कृति और प्रकृति पर आधात पहुंचाया जा रहा है जो की पतन की ओर मार्ग प्रश स्त करता है। गौतम बुद्ध ने कहा कि वीणा के तार को उतना ही कसो जितना कि मधुर ध्वनि निकलती है। वीणा के तार को इतना तंग करें कि वह टूट जाए। यही है, विकास के तार को उतना ही कस लें जितना आवश्यक हो, अन्यथा विकास के दौरान, विकास के तार टूट जाएंगे।

मुख्य शब्द संस्कृति, लॉकडाउन, प्रकृति, आत्मनिर्भर भारत।

शोध विस्तार

भारत जैसे विशाल  संस्कृतियों भरे देश  को एकता का प्रतीक माना जाता है जिसे कभी प्रश्न  के कटघरे में किसी ने खड़ा करने का प्रयास नहीं किया। यहां कि संस्कृति और परंपरा ही एकता का सबसे बड़ा स्रोत है। इस परंपरा को जो अब तक न हिला सका उसे एक संक्रमण ने हिला कर रख दिया। यह परिस्थिति केवल भारत में ही नहीं अपितु यह पूर्ण विष्व में एक महामारी के रूप में उभरी है जिसका प्रारंभ चीन से होकर भारत तक पहुंचा। जहां इसने भारत की व्यवस्था को जड़ से हिला दिया, इसने आर्थिक व्यवस्था के साथ-साथ राजनीतिक और सामाजिक, धार्मिक व्यवस्था को भी झुकने पर विवश  कर दिया है। इसका सबसे अधिक प्रभाव भारत में मंदिर, मस्जिद, चर्च के साथ लोकप्रिय उत्सव के रूप में मनाएं जाने वालों त्यौंहारों पर भी देखने को मिला जैसे नवरात्रे, हनुमान जयंती, श ब्ब-ए-रात, रोज़े इत्यादि। जिसे सरकार द्वारा दिषा-निर्देषों के उपरांत बंद करने के आदेश  के साथ भक्तों का दौरा करने पर भी पाबंदी लगा दी गयी, कन्या भोजन, ईद पर मिलने को निशिद्ध किया गया।

परंतु इस प्रकार के आदेश  के अंतराल में जनता के द्वारा किए जाने वाले पालन में कुछ ऐसे भी असामाजिक तत्व शामिल  थे जिन्होने अपने धार्मिक प्रकारों को राजनीतिक रंग चढ़ाने का कार्य करने में कोई कमी नहीं छोड़ी। जिसका सबसे बड़ा उदाहरण है तब्लीगी जम़ात। 13-15 मार्च को इस समूह द्वारा आयोजित एक धार्मिक सभा ने भारत में सबसे बड़ा कोरोना वायरस फैलाने करने में अहम भूमिका निभाई है, उसी प्रकार जैनो द्वारा भी कुछ परिस्थितियां उत्पन्न की गई, परंतु इस पर सरकार द्वारा निंयत्रण करने के प्रसासों मे काफी सीमा तक सफलता प्राप्त की है।

भारत की प्रकृति, संस्कृति को संरक्षण  प्रदान करने का कार्य इतिहास ने भरपूर किया है, वहीं दार्शनिको ने भी अपने तरीको से समझाने का प्रयत्न किया है- जैसे हॉब्स द्वारा एक कथन में कहा गया कि व्यक्ति पशु  की भांति और स्वार्थी होता है जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को हानि पहुंचा सकता है और वैष्वीकरण के युग की हानि को रूसों ने अपने शब्दों में स्पश्ट किया कि विज्ञान और विवके ने समाज को क्श ति की ओर प्रेरित किया है तो वहीं भारतीय दार्शनिक स्वामी विवेकानंद का वेदों की ओर लौटो की ओर संकेत करते है। यह सभी कथन और विचार आज यर्थाथ प्रतीत होते है इन्हे वर्तमान युग में मान्य देखा जा सकता है जिसका आशय प्रकृति और मानव से लगाया जा सकता है। कहा जाता है की प्रकृति से सब की रचना है जिसमें मानव भी शामिल  है परंतु इसी मानव ने उसी प्रकृति को नष्ट  करने का भरपूर प्रयास किया है। भारतीय दर्शन जो सत्य की खोज के साथ अध्यात्म पर बल देता है वह नैतिकता और कर्मो की भाषा  को भी दर्शाता  है जिसका साक्ष्य वर्तमान युग में आने वाले जैसे कोरोना संक्रमण और उसके साथ में आने वाली आपदाओं के रूप में देखा जा सकता है जो इस बात का साक्ष्य है कि प्रकृति को जो हानि मानव द्वारा पहुंचाई गई है उसकी भरपाई अब प्रकृति स्वयं मानव से ही करने लगी है और यह प्रकृति का संकेत प्रथम बार नहीं है जो मानव को दिया गया है मानव सभ्यता को इस बात पर चेताया भी गया है, इसे तीन रूपों में देखा जा सकता है-

1.         संक्रमण के रूप में- संक्रमण के रूप से आशय जब कोई भी बीमारी कम समय में तीव्र गति से फैलने लगे तो महामारी कहा जाता है इसका प्रारूप प्राकृतिक और निर्मिती के आधार पर देखा जा सकता है और आज इसका रूप कोरोना के रूप में जाना जा रहा है। इस प्रकार के संक्रमण भारत या पूर्ण विश्व में प्रथम सूची में नहीं देखें जा सके यह आज के समय में 114 देषों से अधिक में फैला है जिसे डब्लू. एच. ओ. ने इसे महामारी घोशित किया है, परंतु इसका आगमन पुराने समय से विभन्न रूपों में देखा जा सकता है। महामारियों का अपना ही इतिहास है जिसने 14वीं शताब्दी में यूरोप के 70 प्रतिश त लोगो को प्रभावित कर जान ले ली थी। अंग्रेजी में महामारी के लिए 2 भिन्न श ब्द का प्रयोग होता है- प्रथम बिडेमिक अर्थात वो बिमारी जो किसी एक क्षेत्र या देश  में तीव्र गति से फैले परंतु जैसे ही कोई बीमारी किसी देश  की सीमाओं से बाहर निकलकर दूसरे देश  में फैलने लगती है तो उसे पेनेडेमिक कहा जाता है और यह प्रथम बार नहीं है कि किसी बीमारी को महामारी घोशित किया गया हो। इससे प्रथम वर्ष  2009 में इसे महामारी घोषित किया जा चुका है तब पूर्ण विष्व में 200000 से अधिक लोग स्वाइन फ्लू की चपेट में आने से मारे गए थे। ऐसे ही भारत में स्वाइन फ्लू और कोरोना वायरस से पहले भी तीन महामारियां वर्ष  1940, 1970, 1995 में घोशित की जा चुकी है। 1994 में सितंम्बर के माह में गुजरात के सूरत में प्लेग से एक व्यक्ति की मृत्यु के उपरांत इस मृत्यु के आकड़ों में वृद्धि हुई और स्वतंत्रता के उपरांत 25 प्रतिश त जनसंख्या ने पलायन किया जिसे स्वतंत्रता के बाद का का सबसे बड़ा पलायन कहा गया। जहां बिहार और उत्तर प्रदेश  की बड़ी संख्या रह रही थी जिसके पलायन से प्लेग अन्य स्थानों पर फैला और गांव के गांव समाप्त हो गए। सत्या्रह की एक रिर्पोट के अनुसार देश  में 108 हजार करोड़ की हानि हुई, लंदन में इण्डिया के प्लेन को ’’प्लेग प्लेन’कहा  गया वहीं ब्रिटिश  समाचार पत्रों में इसे मध्यकालिन श्राप की संज्ञा दी गई। गुजरात के बाद यह अहमदाबाद और हैदराबाद में फैला। प्लेग फैलने का कारण चूहों को बताया गया। 1853 में इसके लिए एक जांच कमीश न नियुक्त किया गया यह 1876,  1898, फैला। वहीं 1940 के दश क में फैला कॉलरा जिसे हैजा कहा जाता है जिसका मुख्य कारण दूषित  जल रहा। जिस पर बाद में 1975 में और 1990 के दशक में टीके के कारण इस पर नियंत्रण पाया गया। 1960 के आस-पास भारत में फैलने वाले चेचक से 18 वी. शताब्दी के प्रारंभ में ही हर वर्ष  4 लाख लोग मृत्यु को प्राप्त हो जाते थे और 20वी. सदी में विष्व में करोड़ो लोगो की मौत हुई है।

2.         आपदा के रूप में- सूखा, बाढ़, चक्रवाती तूफानों, भूकम्प, भूस्खलन, वनों में लगनेवाली आग, ओलावृष्टि, टिड्डी दल और ज्वालामुखी फटने जैसी विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता है, न ही इन्हें रोका जा सकता है, लेकिन इनके प्रभाव को एक सीमा तक कम अवष्य किया जा सकता है, जिससे कि जान-माल की कम से कम हानि हो। यह कार्य तभी किया जा सकता है, जब सक्श म रूप से आपदा प्रबंधन का सहयोग मिले। प्रत्येक वर्ष   प्राकृतिक आपदाओं से अनेक लोगों की मृत्यु हो जाती है। परंतु इन आपदाओं का वर्तमान युग में एक विशेष  स्थान है जिसका कारण कोरोना संक्रमण को कहा जा सकता है इसे कुछ विशेष ज्ञों द्वारा ईष्वर की मानव पर दोहरी मार भी कहा जा रहा है क्योंकि जहां अभी विष्व में कोरोना जैसी बीमारी से सुरक्षा प्राप्त नहीं हुई है कि अन्य प्रकार की घटनाएं अपना प्रकोप दिखाने लगी है-उदाहरणस्वरूप भूकम्प जो भारत में 2 मई और फिर 15 मई और फिर इसकी संख्या में बढ़ोतरी देखने को मिली। अप्रैल और मई में चिली, मैक्सिको, इंडोनेषिया, कोलंबिया, ग्रीस, जापान, ब्रिटेन, साउथ कोरिया आदि में यह देखने को मिला। इसी प्रकार बिना मौसम के होने वाली निंरतर बारिश  जो मानवता को नष्ट  करने की ओर अग्रसर है जिसका हाल ही में उदाहरणस्वरूप इम्फान और निसर्ग जैसे तूफानों का दस्तक देना तो दूसरी ओर लोक्ट्स टिड्डी का आक्रमण रहा है।

3.         मानव निर्मित संकट- अभी हाल ही में भारत के विषाखापत्ट्नम और साउदी अरब में होने वाला गैस रिसाव, साउदी अरब जैसे कई देषो के कुछ इमारतों में लगने वाली भंयकर आग और भूख तथा लॉकडाउन के चलते लोगो का अपने वाहनों में गति के नियंत्रण में न होने के कारण दुर्घटनाओं का होना और रेल द्वारा लोगो की मृत्यु इत्यादि घटनाओं का होना मानव नियंत्रण में है जिसे रोका जा सकता है, परंतु यह सब राजनीति की चपेट में है।

  1. अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भरता

वैसे तो समकालीन दुनिया ने 2008 की मंदी का दौर भी देखा था, जब कंपनियां यकसाथ बंद हुईं थीं और एक साथ कई सौ-हजार लोगों को बेरोजगार भी होना पड़ा था। परंतु यह समय उससे भी अधिक खराब हो सकता है। क्योंकि उस समय तो एयर कंडिशन जैसी चीजों पर टैक्स कम हुए थे। तब, सामान की कीमत कम होने पर भी लोग उसे खरीद रहे थे, लेकिन लॉकडाउन में सरकार यदि अपना टैक्स जीरो भी कर दे तो भी उसे कोई खरीदने वाला नहीं है। लिहाजा, विशेष  ज्ञ मौजूदा स्थितियों को सरकार के लिए भी बहुत ही चुनौतीपूर्ण मान रहे हैं। क्योंकि अचानक ही उसके सामने कोरोना त्रासदी से उपजे लॉकडाउन जैसी एक विशाल समस्या आ खड़ी हुई है। यहां यह स्पष्ट कर दें कि 2008 के दौर में तो कुछ कंपनियों को आर्थिक सहायता देकर संभाला गया था। लेकिन, आज यदि सरकार ऋण भी दे तो उसे सभी को देना पड़ेगा। क्योंकि हर सेक्टर में उत्पादन और खरीदारी प्रभावित हुई है। किंतु सरकार सबको लोन देने का जोखिम कितना उठा पाएगी, यह समय बताएगा। बहरहाल, इस बात में कोई दो राय नहीं कि कोरोना वायरस का प्रभाव पूर्ण विष्व पर पड़ा है। चीन-अमेरिका जैसे बड़े देश और मजबूत अर्थव्यवस्थाएं भी इसके सामने लाचार दिखाई दे रहे हैं। इटली-फ्रांस की हालत से सभी वाकिफ ही हैं। इस कोरोना त्रासदी से भारत में विदेशी निवेश के जरिए अर्थव्यवस्था सुदृढ़ करने की कोशिशों को भी बड़ा धक्का पहुंचेगा। क्योंकि जब विदेशी कंपनियों के पास भी पैसा ही नहीं होगा तो वो निवेश में भी रूचि नहीं दिखाएंगी। हालांकि, जानकारों का यह भी कहना है कि अर्थव्यवस्था पर इन स्थितियों का कितना गहरा असर पड़ेगा, यह निकट भविष्य में घटित होने वाली दो बातों पर निर्भर करेगा। पहला तो ये कि आने वाले समय में कोरोना वायरस की समस्या भारत में और कितनी गंभीर होती है, और दूसरा ये कि कब तक इस पर काबू पाया जाता है। अब जो भी हो, लेकिन किसी भी नेतृत्व के लिए यह स्थिति किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। परंतु इस समस्या से निपटने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार देश के सामने ‘आत्मनिर्भर भारत’ का खाका पेश किया। सीआईआई की 125वीं सालगिरह पर पीएम मोदी ने कहा कि भारत को फिर से तेज विकास के पथ पर लाने के लिए, और अर्थव्यवस्था संभालने के लिए आत्मनिर्भर भारत बनाने के लिए 5 चीजें बहुत जरूरी हैं. ये हैं- Intent,  Inclusion,  Investment,  Infrastructure, InnovationA इन सभी की झलक लिए गए अब तक सभी निर्णयों में मिल जाएगी। महिलाएं हों, दिव्यांग हों, बुजुर्ग हों, श्रमिक हों, हर किसी को इससे लाभ मिला है। लॉकडाउन के अंतर्गत सरकार ने गरीबों को  8 करोड़ से ज्यादा गैस सिलेंडर उपलब्ध कराए हैं। साथ ही प्रवासी श्रमिकों के लिए भी मुफ्त राशन पहुंचाया जा रहा है। कोरोना के खिलाफ अर्थव्यवस्था को फिर से मजबूत करना, हमारी पहली प्राथमिकता में से एक है। अधिक कमाई के रास्तों को जैसे मदिरा के ठेके, दुकानों, रेस्टरॉन को पुनः प्रारंभ किया गया।

  • सामाजिक व्यवहार और संस्कृति

जिस प्रकार भारत की अर्थव्यवस्था चरमराई है, उसी प्रकार इसका विपरित रूप सामाजिक व्यवहार में संबंधो को लेकर देखने को मिला है उदाहरणस्वरूप विवाह, षोक समारोह, जन्म समाहरोह या अन्य कोई भी पार्टी। इस प्रकार के समारोंह में जहां कोरोना से पूर्व दिखावे के जलसे अधिक देखनें को मिलते थे, लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती थी, सबसे बड़ी समस्या मध्यमवर्गीय के लिए उत्पन्न होती थी कि उसे अपनी हैसियत से अधिक देने के लिए विवश  होना पड़ता था, फिर भले ही विवाह हो या जन्म का समारोह। परंतु इस कोरोना के काल ने इस प्रकार की दिखावी परंपरा को तोड़ कर रख दिया है जिसका वर्णन हमारे षास्त्र भी नहीं करते। वहीं सबसे बड़ी राहत दहेज प्रथा पर बहुत हद तक रोक देखने को मिली है जिसके कारण कई लोग कर्जे के षिकार होते तो कई षोशण और अत्याचार और घरेलू हिंसा के तो कई आत्महत्या के षिकार होते थे। दहेज प्रथा को जिसे अब तक सरकार के लाख प्रयासों के बावजूद नियंत्रित न किया जा सका उसे इस कोरोना ने नियंत्रित कर दिया। वहीं सरकार के निर्देषो अनुसार 20 से 50 तक लोगो की संख्या सीमित कर दी गई। वहीं इसने पारिवारिक महत्वता की समझ को बढाया है जहां मनुष्य  अपने फोन, मोबाईल, ऑफिस जैसे कार्य और रोजगार के लिए परिवार से अलग होना महत्वपूर्ण समझता था वहीं आज उसे अपने परिवार तक पहुंचने के लिए प्रयास करना पड़ रहा है। अपने जीवन की चिंता किए बिना अपने परिवार के पास लौटने के लिए ललायित है। सामाजिक जीवन से अत्यंत प्रिय अब परिवार का साथ लगने लगा है। सनातन संस्कृति जो हाथ जोड़कर प्रणाम करना अपनी विरासत समझती थी, वह भी पश्चिम की नकल कर आलिंगन में ही आधुनिक होने की तस्वीर देख रही थी, ऐसे में जब विश्व गुरु कहलाने वाले विभिन्न देश ही हमारी संस्कृति की अनुगामी बनने को तैयार खड़ी हो।

  • आलोचनात्मक मूल्यांकन

21वीं सदी की दुनिया को लॉकडाउन किया गया है। जिस प्रकार प्रकृति खिलकर अपने यौवन को प्रदर्शित कर रही है, उसी प्रकार कोरोना की मार वैश्विक स्तर पर काफी व्यापक है। कोरोना की त्रासदी संग मानव जाति जीने की जीवंतता भी अभिव्यक्त कर रही, वह सुखद पहलू है। इन सब के बीच प्रकृति जैसे-जैसे अपने यौवन का श्रृंगार कर रही, ऐसे में वह कहीं न कहीं मानव समाज से अपने प्रतिशोध की खुशी व्यक्त कर रही है।

आज मनुष्य  घरों में प्रकृति के बंदी है, इंसानी गतिविधियाँ ठप्प हैं। इन सब के बीच आसपास का वातावरण और अन्य जीव-जन्तु कलरव कर यह संदेश दे रहे कि मानव मस्तिश्क भले कोरोना को “चीनी-वायरस” या अन्य नाम देकर अपनी कर्तव्यों से दूर भागने की कोशिश कर लें, लेकिन वास्तव में यह प्रकृति द्वारा ली गयी अंगड़ाई है। परंतु सामाजिक व्यवहार में होने वाले परिवर्तन ने कहीं न कहीं पष्चिमीकरण की ओर भी रूख किया है-जैसे व्यक्तिगत जीवन जीना जो हमारी संस्कृति में हमारे वेदो में नहीं देखने को मिलता। मानव से दूरी बनाए रखना जिसका परिणाम मनुष्य  ने मानवता से भी दूरी बना ली है। सामाजिक दूरी से मानवता से दूरी की ओर उन्मुख हुआ है, पिता, मां, भाई पत्नि की मृत्यु पर सहारा देने के बजाए उनसे मुंह मोड़ने लगे है, वहीं लोगो को भूखमरी, दरिद्रता, और आपदाओं जैसे संकट का सामना करना पड़ रहा है।

  • निष्कर्ष

निष्कर्षतः कहा जा सकता है की कोरोना का संक्रमण न किसी धर्म से समाप्त हो सकता और न ही किसी राजनीति के धृणित खेल से, इसे समाप्त करने हेतु आवष्यकता है कि समाज को हिंदू-मुस्लिम जैसे साम्प्रदायिक श ब्दों में न जकड़कर पुनः एकता के साथ लोकतंत्र को बचाएं रखने का प्रयास करना आवष्यक है जिसे  सरकार के द्वारा दिए गए दिषा-निर्देषो का पालन करने के उपरांत ही प्राप्त किया जा सकता है। साथ ही इसके नकारात्मक प्रभाव के साथ इसके सकारात्मक प्रभाव देखने को मिले- प्रथम इसने परिवार षैली को अधिक बढ़ावा दिया जहां लोग परिवार से दूर रहने के लिए तत्पर रहते थे वह अब परिवार के पास लौटने के लिए जान की बाजी लगाने को भी तत्पर है। दूसरी ओर इसने वेदों की ओर लौटो जैसे मोदी जी द्वारा दिए गए ’दीये जलाने’ के संदेश  को  जो की ऊर्जा के स्रोत का प्रतीक है, वहीं तीसरा धार्मिक मान्यताएं जो लोगो में थी वह सभी परंपराओं को कोरोना घर पर बंद करके भी समाप्त नहीं कर पाया। नियमित होने वाले कार्यो में सभी कार्यो को भली-भांति संपन्न कि गया, चौथा कार्य कट्टर धार्मिकता को समाप्त कर समाज सेवा की ओर लोगो को अग्रसर होते देखा गया है। वहीं कुछ अस्पतालों और चिकित्सकों के साथ होने वाला दुश्कर्म जिसे मुसलमानों द्वारा जो तब्लीगी जमात से जुड़े हुए थे द्वारा होने वाली घटना जिसके कारण यह आरोंपो के घेरे में आए है उन्हें नकारा नहीं जा सकता।

वहीं इस प्रकार की होने वाली घटनाएं जो प्रकृति की मार के साथ मानव की ही मार मानव को नष्ट  करने पर उतारू है। कोरोना जैसा संक्रमण अपने साथ प्राकृतिक और मानव आपदा दोनो को ही साथ लेकर आया है। जहां प्रकृति ने स्वयं की भरपाई मानवता से करने का प्रयास किया है उदाहरणस्वरूप वर्तमान में होने वाली सभी प्रकार की नदियों का जल षुद्धता में गुणवत्ता को प्राप्त करने में अधिक सफल रहा है, वहीं दूसरी ओर प्रकृति की वायु में फैली विशैली वायु ने स्वयं को स्वच्छता प्रदान की है। इसी प्रकार अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए गांवों को सशक्त किया जाएँ। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती दी जाएँ। इससे दो फायदे होंगें- आगामी भविष्य में कभी संकट काल आएगा तो सम्पूर्ण देश एकाएक बन्द नहीं होगा और दूसरा लोगों को अपने आसपास के क्षेत्रों काम मिल पाएगा। चौथी बात हमें ही नहीं सम्पूर्ण विश्व को विकास के साथ प्रकृति के संरक्श ण की बात को हमेशा जेहन में रखनी होगी। इसके अलावा जिस दिन मानव समाज ईमानदारी के साथ पर्यावरण के प्रति वफादारी और शाकाहार के साथ अपने पुरातन संस्कार को आत्मार्पित कर लेगा, कोरोना जैसी विपदा से डरकर घर में छिपने की नौबत नहीं आएगी।

संदर्भ

  • शेख, नोवुल; राबिन, रोनी कैयर्न (10 मार्च 2020)। “द कोरोनावायरस: वैज्ञानिकों ने अब तक क्या सीखा है”। न्यूयॉर्क टाइम्स। 24 मार्च 2020 को लिया गया।
  • रेगन, हेलेन; मित्रा, एशा; गुप्ता, स्वाति (23 मार्च 2020)। “भारत कोरोनोवायरस से लड़ने के लिए लाखों लोगों को बंद कर देता है”। सीएनएन।
  • “कोरोनोवायरस आशंकाओं के बीच भारत में 100 मिलियन से अधिक लोग बंद हैं”। अल जज़ीरा। 23 मार्च 2020।
  • “भारत के कोरोनावायरस लॉकडाउन: यह कैसा दिखता है जब भारत के 1.3 बिलियन लोग घर रहते हैं”। Ndtv.com। 22 फरवरी 2019। 11 अप्रैल 2020 को लिया गया।
  • “17 मई तक लॉकडाउन विस्तारित: क्या खुलेगा, बंद रहेगा”। Livemint। 1 मई 2020. 14 मई 2020 को लिया गया।
  • रे, देवराज; सुब्रमण्यन, एस।; वांडेवेल, लोर (9 अप्रैल 2020)। “भारत का तालाबंदी”। भारत मंच।

रजनी,

शोधार्थी, 

राजनीति विज्ञान विभाग, 

दिल्ली विश्वविद्यालय ,

 ईमेल  riya7116@gmail.com,

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भारतीय समाज में दिव्यांगों का महत्व-अनिल कुमार पाण्डेय

अनिल कुमार पाण्डेय

मेवाड़ वि.वि. चित्तौड़गढ़ (राजस्थान)

शोध सार:

भारतीय संस्कृति अनादि काल से ही मानवतापूर्ण रही है। जहाँ पर ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’’ का आदर्शवाक्य जपा जाता था क्योंकि इस परम पवित्र भूमि पर सबको समाप रूप से जीने और रहने का अधिकार है। चाहे वह किसी धर्मजाति वर्ग या स्तर का हो। मानवतापूर्ण संस्कृति में सभी समान है दिव्यांग हो या अनाथ यह सबको साथ लेकर चलने वाली संस्कृति है। क्योंकि अनेक दिव्यांगों और अनाथों ने देश तथा समाज को नई दिशा देकर भारत ही नही दुनिया को रास्ता दिखाया है इसलिए सभी को सम्मान दें चाहे वह अनाथ हो या दिव्यांग प्रतिभा और प्रखरता सबमें पाई जाती है चाहे वह जिस रूप में हो।

बीज शब्द: दिव्यांग, लोकतंत्र, संस्कृति, प्रतिभा

शोध विस्तार:

भारतीय लोकतंत्र में दिव्यांगों की सामाजिक दशा

तन्त्र और समाज में त्रासित दिव्यांग

दिव्यांगता कोई अभिशाप या पूर्व जन्मों की सजा या परिवार के पापों का शाप नही वरन् शरीरिक अंगों में कुछ कमी का कारण है जो कि ज्यादातर लोगों में होती है। कुछ कमियों का प्रभाव समझ में नही आता तथा कुछ कमियाँ हमारे जीवन को प्रभावित कर देती है किसी का एक अंग बेकार होने से वो निःशक्त नही हो जाता है।

दिव्यांगता क्या है? निःशक्त व्यक्ति अधिनियम 1995 के अनुसार चिकित्सीय दृष्टि से किसी प्रकार की शरीरिक कमी का प्रतिशत 40 से अधिक होता है तो वह दिव्यांगता की श्रेणी में आता है।

दिव्यांगता ऐसा विषय है जिसके बारे में समाज और व्यक्ति कभी गंभीरता से नहीं सोचते। क्या हमने सोचा होगा कि कोई छात्र या छात्रा अपने पिता के कंधे पर बैठकर भाई के साथ साईकिल चलाकर ज्ञान लेने स्कूल जाता है किन्तु सीढ़ियों पर ही रूक जाता है क्योंकि रैम्प नहीं है। वो कैसे अपनी व्हील चेयर की सीढ़ियों पर चढ़ाये।

उसके मन में एक कसक उठती है कि क्या उसके लिये ज्ञान के दरवाजे बन्द हैं? क्या शिक्षण संस्था में उसके लिये जगह नहीं मिल सकती? शौचालय तो दूर उसके लिये एक रैम्प वाला शिक्षण कक्ष भी नहीं है। जहाँ वह स्वाभिमान के साथ वह अपनी व्हील चेयर चलाकर ले जा सके एवं ज्ञान प्राप्त कर सके।

कोई दफ्तर, बैंक, ए.टी.एम., पोस्ट ऑफिस, पुलिस थाना कचेहरी, नहीं है जहां पर दिव्यांगों की सुविधाएँ उपलब्ध हों। सामान्य दिव्यांगो की तो छोड़िए यहाँ के दिव्यांग कर्मचारियों को भी कोई सुविधाएं नहीं है। अगर दिव्यांगों को बराबर का अधिकार है तो नजर कहाँ आता है?

ट्रेन की बात कर लेते हैं क्या ट्रेनों में दिव्यांग अकेले यात्रा कर सकते है। यहाँ तक कि टेªनों में चढ़ने के लिये भी दिव्यांगों को दूसरों की सहायता चाहिए। उनके लिये कई मूलभूत सुविधायें नही है किसी तरह डिब्बे में चढ़ भी जाये तो ट्रेनों में दिव्यांगों के लिये शौचालय की कोई व्यवस्था नहीं है। घर में बैठकर सभी सामान्य लोग ऑनलाइन टिकट की बुकिंग कर सकते है लेकिन दिव्यांगों के लिये प्लेटफार्म पर लाईन में लगकर ही टिकट लेनी पड़ती है।

मतदान केन्द्रों पर भी दिव्यांग लोगो को कोई अलग से सुविधा नहीं दी जाती है अधिकांश मतदान केन्द्रों पर रैम्प न होने के कारण दिव्यांग मताधिकार से वंचित हो जाते हैं यह तंत्र एवं समाज के लिये सोचनीय और शर्मनाक बात है।

हर साल दिव्यांगों के लिये भारी सहायता राशि की घोषणा बजट में की जाती है। कागज पर योजनाएँ एवं सुविधाएँ उकेरी जाती हैं लेकिन क्या अभी तक कोई भी तंत्र उन्हें उनके मौलिक अधिकार एवं सुविधाएँ दे सका है। ताकि वे स्वाभिमान के साथ स्कूल-कॉलेज, दफ्तर या सार्वजनिक स्थल पर जा सकें। उसपर शायद कोई नहीं दे सकता है।

हमारा समाज तमाशे का बड़ा शौकिन है जहाँ हटकर कुछ देखा कि तमाशबीन बन गये। दिव्यांगता भी हमारे समाज में तमाशा है। थोथी संवेदनाओं का केन्द्र है। विकलांगों से सभी सहानुभूति रखते हैं। लेकिन उन्हें दोयम दर्जे का व्यक्ति मानते हैं। बेचारे, पंगु, निर्बल, निःशक्त ऐसे ही न जाने कितने संवेदना सूचन शब्दों से लोग अपने को श्रेष्ठ कर लेते हैं।

कितनी ही सरकारी योजनाएँ विभाग बन गये लेकिन क्या दिव्यांगों को हम सबल बना पाये है? क्या उनको राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़कर राष्ट्र निर्माण में उनका योगदान ले पाये है? शायद नही? इसके जिम्मेवार हम सभी है। हम एक भीड़ है जो तमाशा देखती है। अभी इंसान नही बन पाये हैं क्योंकि इंसान में संवदेनाए होती है।

दिव्यांगों के अधिकारों को आवाज देता ‘‘संयुक्त राष्ट्र दिव्यांगता समझौता’’ विश्वव्यापी मानवाधिकार समझौता है। यह समझौता स्पष्ट रूप से दिव्यांगों के अधिकारों एवं विभिन्न देशों की सरकारों द्वारा निर्बाध रूप से विकलांगों के पुनर्वास एवं बेहतर सुविधा की पैरवी करता है।

भारतीय संसद में दिव्यांगों के पुनर्वास एवं उन्हें देश की मुख्य धारा से जोड़ने के लिये दिव्यांग व्यक्ति समाज अवसर अधिकारों का संरक्षण, पूर्ण भागीदारी अधिनियन 1995 दिव्यांगता अधिनियम पारित किया गया। स्वाभाविक तौर पर आसक्त लोगों के अधिकारों को प्रतिपादित करते हुये भारत में संयुक्त राष्ट्र संघ के Rights of persons with disabilities (CRPD) कन्वेंशन में कही गयी बातों को 2007 में अंगीकार किया एवं दिव्यांग व्यक्तियों के लिये बने अधिनियम 1995 संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा पारित कन्वेन्शन जिस पर 2008 में अमल शुरू हुआ। के आधार पर बदलों की बात कही।

‘‘दिव्यांग व्यक्ति (समान अवसर, अधिकारों संरक्षण पूर्ण भारीदारी अधिनियम 1995’’ के अनुसार निःशक्त व्यक्तियों के निम्न अधिकार हैं।

1. अदिव्यांग व्यक्तियों की तरह समान अवसर का अधिकार।

2. जीवन के कार्यों में सामान्य व्यक्ति के बराबर पूर्ण भागीदारी का अधिकार।

3. दिव्यांग जनों को कानूनी मान्यता का अधिकार।

4. दिव्यांग जनों को कानूनी सुरक्षा का अधिकार।

5. दिव्यांग जनों की देखभाल, पुनर्वास एवं जीवन की मुख्यधारा में शामिल करने के लिये प्राधिकारणों का यह दायित्व है कि वे प्रावधानों के अन्तर्गत दिव्यांगजनों के प्रति कर्तव्यों का निर्वहन करें।

6. केन्द्र एवं राज्य सरकार का यह दायित्व है कि वे दिव्यांगता को रोकने के लिये तमाम संसाधनों को जुटाये ताकि दिव्यांगता की रोकथाम हो सके।

7. प्रत्येक दिव्यांग बच्चे को 18 वर्ष तक निःशुल्क शिक्षा का अधिकार है। सरकार को विशेष शिक्षा प्रदान करने वाले स्कूलों क स्थापना करनी चाहिए एवं दिव्यांग बच्चों को प्रशिक्षण के अवसर मुहैया करानी चाहिए।

8. पाँचवी तक पढ़ाई कर चुके बच्चे मुफ्त स्कूलों एवं विश्वविद्यालयों में अपनी शिक्षा जारी रख सकेंगे एवं उन्हें विशेष पुस्तकें व निःशुल्क उपकरण प्राप्त करने का अधिकार है।

9. सरकार का कर्तव्य है कि वो दिव्यांग छात्रों के लिये विशेष शिक्षा संबंधी योजनाएँ, पाठ्यक्रम एवं शिक्षक प्रशिक्षण के स्थान स्थापित करें।

10. सभी श्रेणियों के दिव्यांगों को सरकारी नौकरियों के पदों में आरक्षण होना चाहिए।

11. दिव्यांजनों को रोजगार देने के लिये विशेष रोजगार केन्द्र होने चाहिए।

12. आवास पुनर्वास के लिये रियायती दरों में जमीन का आवंटन निःशक्त लोगों के लिये होना चाहिए।

13. दिव्यांगों के लिये विशेष परिवहन सुविधाओं का विस्तार किया जाना चाहिए एवं यात्रा में विशेष रियायती छूट देनी चाहिए।

14. गंभीर दिव्यांग व्यक्ति के संस्थानों की मान्यता निर्धारित होंगी।

15. मुख्य आयुक्त एवं राज्य आयुक्त दिव्यांग व्यक्ति के अधिकारों से सम्बन्धित मामलों की जाँच करेंगे।

16. गैर सरकारी संगठनों के साथ मिलकर स्थानीय प्राधिकरण दिव्यांग व्यक्ति के लिये बीमा योजनाएँ बेरोजगारी भत्ता की योजना बनायेंगे।

17. छलपूर्वक तरीके से दिव्यांग व्यक्तियों के लाभ लेने वालों को दो वर्ष की सजा या 20,000 रूपये का अर्थदंड लगेगा।

राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण के 58 चक्रों के अनुसार देश में लगभग 1,85,00000 दिव्यांग हैं। जबकि रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया की ओर से जारी रिपोर्ट में देश में दिव्यांगों की संख्या दो करोड़ 68 लाख है। 75 प्रतिशत दिव्यांग ग्रामीण क्षेत्रों में हैं 49 प्रतिशत दिव्यांग साक्षर है एवं 34 प्रतिशत दिव्यांग रोजगार प्राप्त हैं।

मध्य प्रदेश में कुल 11 लाख 31 हजार 405 लोग दिव्यांग हैं।

1. 4,12,404 लोग दिव्यांग बेरोजगार हैं।

2. 2,87,052 दिव्यांग दैनिक रूप से आय अर्जित कर जीवन यापन करते हैं।

3. 2,81,670 दिव्यांग स्वयं का धंधा करते हैं।

4. 1 हजार रूपये से कम कमाने वाले दिव्यांगों की संख्या 5,05,472 है।

5. सरकारी क्षेत्र में केवल 15,955 दिव्यांग कार्य करते हैं।

6. प्रदेश में कुल सर्वेक्षित दिव्यांग जनसंख्या के 80 प्रतिशत यानि 8,89,755 दिव्यांग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करते है।

7. केवल 19,667 दिव्यांग व्यक्तियों को स्वरोजगार हेतु सरकारी सहायता मिलती है।

8. सिर्फ 66,962 दिव्यांगों को ही सामाजिक सुरक्षा पेंशन का लाभ मिल सकता है।

सेटर फार इंटरनेट एण्ड सोसायटी द्वारा कुछ वेबसाइड का सर्वेक्षण कराया गया कि कितनी वेबसाइटों की पहुँच दिव्यांगों तक है इनमें से 95 प्रतिशत वेबसाइट विकलांगों की पहुँच से बाहर है जिसमें चुनाव आयोग की वेबसाइट भी शामिल है। ये आंकड़े दर्शाते है कि ये स्थिति कितनी भयावह है। समाज एवं तंत्र दिव्यांगों के प्रति कितना असंवेदनशील है। शिक्षा एवं रोजगार ही दिव्यांगता से लड़ने के मुख्य अस्त्र हैं किन्तु इन दोनों की स्थिति इतनी दयनीय है कि दिव्यांग व्यक्तियों का आत्मबल दम तोड़ देता हैं। फिलहाल करीब 40 कम्पनियाँ दिव्यांगों को नौकरयाँ दे रही हैं। गैर सरकारी संस्थानों की यह पहल निश्चित रूप से दिव्यांगों के जीवन में नये रंग भर सकती हैं।

            आज आवश्यकता है कि दिव्यांगों के समान अधिकार देने, सम्मानपूर्वक व्यवहार करने एवं उन्हें जीवन की मुख्य धारा से जोड़ने कि ताकि वे देश के निर्माण में अपना योगदान दे सकें। उन्हें दया से ज्यादा हमारे साथ एवं संवेदनाओं की जरूरत है।

संदर्भ

1. दिव्यांगता अधिनियम 1995।

2. संयुक्त राष्ट्र संघ दिव्यांगता अधिनियम 2000।

3. भारतीय जनगणना 2011।

4. सेंटर फार इंटरनेट सोसायटी।

5. रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इण्डिया की रिपोर्ट के अनुसार।

6. राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण।

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 राज्य-हिंसा पर विचार: क्या भारत एक हिंसक राज्य है?-अम्बिकेश कुमार त्रिपाठी

                                                                         राज्य-हिंसा पर विचार: क्या भारत एक हिंसक राज्य है?

अम्बिकेश कुमार त्रिपाठी
सहायक प्राध्यापक (राजनीति विज्ञान विभाग)
राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, द्वाराहाट
अल्मोड़ा, उत्तराखंड
मो. न.- 9450308057

 
राज्य-हिंसा पर विचार करने से पहले हम मुख्यरूप से हिंसा की तीन स्थितियों की कल्पना कर राज्य की भूमिका का स्थापन करने का प्रयास करते हैं।

पहला, कुछ व्यक्तियों का समूह उनके निवास-स्थल के नजदीक लग रहे परमाणु संयंत्र के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रतिरोध कर रहा है, क्योंकि इस परमाणु संयंत्र से होने वाले रेडियोएक्टिव खतरे उनके सुरक्षित जीवन-यापन के विरूद्ध गंभीर खतरा उत्पन्न कर सकते हैं। राज्य की पुलिस ने उस जनसमूह के खिलाफ लाठीचार्ज किया और लोग गंभीर रूप से घायल हो गए है। दूसरा, बहुसंख्यक वर्ग के लोग सांप्रदायिक उन्माद में अल्पसंख्यक वर्ग के खिलाफ हथियार लेकर सड़कों पर उतर गए हैं और बड़ी मात्रा में अल्पसंख्यक वर्ग के लोगों की हत्या कर रहे हैं और राज्य की मशीनरी अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करने में अनिच्छुक और उदासीन दिखाई पड़ रही है। तीसरा, राज्य में निवास करने वाले किसी खास वर्ग या जाति समूह को उनके मानवाधिकारों से योजनाबद्ध तरीके से वंचित किया जा रहा है तथा दैनिक जीवन की आधारभूत जरूरतों को उनकी पहुँच से दूर रखा जा रहा है, जिसके परिणामस्वरूप वह जाति-समूह मानव-विकास सूचकांक के सभी पैमानों में पिछड़ रहा है और उनकी औसत जीवन-प्रत्याशा राष्ट्रीय औसत जीवन-प्रत्याशा से बेहद नीचे है। 
ये राज्य-हिंसा के आयाम हैं। हिंसा की दशाओं का निरूपण हिंसा की अनुभूति से स्वतंत्र नहीं हो सकता है। समाज में सहज रूप से प्रचलित हिंसा (इंटेर्पेर्सोनल वायलेंस) के अनुपात में राज्य द्वारा की गई हिंसा ज्यादा मात्रात्मक होती है और इसका प्रभाव गुणात्मक होता है। ‘राज्य जीवन के लिए अस्तित्व में आता है और अच्छे जीवन के लिए इसका अस्तित्व बना रहता है; राज्य के समर्थन में अरस्तू का यह कथन राज्य के ऊपर कुछ उत्तरदायित्व भी आरोपित करता है। संभवतः यह लोककल्याणकारी राज्य के विचार का प्रस्थान-बिन्दु था; ऐसा राज्य जो कि अपने नागरिकों के कुशल-क्षेम के लिए उत्तरदायी हो। आधुनिक लोकतान्त्रिक राज्य मुख्य रूप से लोककल्याणकारी राज्य है और संविधान द्वारा यह सुनिश्चित किया गया है कि राज्य अपने नागरिकों को उनकी सुरक्षा और गरिमा को ध्यान में रखते हुए उन्हें अपनी कल्याणकारी सेवाएँ प्रदान करेगा। यदि राज्य ऐसी सेवाएँ अपने नागरिकों को नहीं देता है या लोगों की वास्तविक जरूरतों का ख़्याल नहीं रखता या नागरिक-अधिकारों का अतिक्रमण करता है और अपने बलमूलक-संस्थाओं का प्रयोग लोकप्रिय मांगों को दबाने में करता है, तो यह राज्य द्वारा की जाने वाली हिंसा माना जाएगा। ‘जब हम हिंसा के बारे में विचार करते हैं तो जो तस्वीर सामान्यतः दिमाग में उभरती है वह गुंडों, बलात्कारियों, हत्यारों और अपराधियों आदि की होती है और राज्य हमें इनसे सुरक्षा प्रदान करता है। फिर भी, हिंसा की सम्पूर्ण परिघटना में पारस्परिक हिंसा का योगदान तुलनात्मक रूप से कम ही है। जब हम पारस्परिक हिंसा से आगे संस्थातगत हिंसा और संरचनात्मक हिंसा पर विचार करते हैं तो हिंसा का क्षेत्र और अनुपात बढ़ता जाता है’; दुर्भाग्य से हिंसा के ये उच्च स्वरूप अकादमिक विमर्शों में कम ही आते हैं और इन्हें हिंसा के रूप में परिभाषित करने के बजाए गैर-समस्यागत और राज्य द्वारा कानून एवं व्यवस्था बनाए रखने के लिए किए जाने वाले दैनिक घटनाक्रम के रूप में देखा और समझा जाता है। लेकिन, अगर हिंसा आधुनिक राज्यों का अविभाज्य गुण है तो इसका आलोचनात्मक परीक्षण किया जाना चाहिए, क्योंकि आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य का मुख्य उद्देश्य व्याप्त हर प्रकार की हिंसाओं का उन्मूलन है लेकिन आज दुनियाभर में लोकतंत्र और हिंसा के बीच, जबकि दोनों विरोधाभासी संकल्पनाएँ हैं, गहरी निकटता देखी जा रही है।   

राज्य-हिंसा का परिचय:
1648 की वेस्ट्फेलिया की संधि के बाद राज्य बेहद शक्तिशाली संस्था के रूप में उभरा जिस पर किसी अन्य संस्था का किसी भी प्रकार का नियंत्रण नहीं है। राज्य-हिंसा का विचार दरअसल उसकी इसी असीम संप्रभुता में निहित है, किन्तु इसका यह अर्थ बिल्कुल भी नहीं हैं कि राज्य के संप्रभुता की अवधारणा को खारिज कर दिया जाए। ‘राज्य के पास राजनीतिक नियंत्रण के दो यंत्र हैं; पहला, ‘संप्रभुता’, जिसका प्रयोग राज्य द्वारा किया जाता है, और दूसरा, ‘कानून’, जिसके द्वारा पहला यंत्र प्रयोग में लाया जाता है’। एक लोकतान्त्रिक-संप्रभु राज्य व्यवस्था बनाने के लिए कानून का निर्माण और उनका क्रियान्वयन करता है। कानून-निर्माण की यह शक्ति ही दरअसल राज्य के हिंसा को जन्म देती है; जब राज्य के कानून नागरिकों के साथ भेदभाव करते हैं, जब जन-असंतोष के प्रति संप्रभु हिंसक बल प्रयोग करता है या फिर जब राज्य नागरिकों के कुशल-क्षेम को बढ़ाने के प्रति अनिच्छुक होता है।

वही समाज सभ्य समाज कहा जाएगा जो न्यायपूर्ण हो, और इसके लिए कानून का शासन होना जरूरी है। अतः एक सभ्य और न्यायपूर्ण समाज के लिए कानून आवश्यक हैं और कानून बनाने के लिए राज्य नामक संस्था जरूरी है। यहाँ प्रश्न यह उठता है कि ‘कानून कैसे होने चाहिए?’, ‘उनकी प्रकृति कैसी हो?’ चूंकि समाज में न्याय की स्थापना के लिए ये प्रश्न जरूरी हैं और राज्य कानून बनाता है इसलिए राज्य की भूमिका का इस संदर्भ में बेहद सूक्ष्म परीक्षण किया जाना चाहिए। कानून ऐसे हों जो नागरिकों के कुशल-क्षेम को ठीक ढ़ंग से संज्ञान में रखें, क्योंकि लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली में राज्य और कानून की वैधता इसी में निहित होती है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि जो राज्य ऐसे क़ानूनों का सहारा लेता हो जिनसे नागरिक-अधिकारों का अतिक्रमण हो रहा है, या राज्य शांतिपूर्ण प्रतिरोधों को दबाने के लिए बल प्रयोग करता हो, अथवा किसी समाज या समुदाय को योजनाबद्ध रूप से अधिकारों से वंचित कर उनके हाशिएकरण में संलिप्त हो, हिंसक राज्य कहा जाएगा।

वाल्टर बेंजामिन (1986) लिखते हैं कि, ‘कानून-निर्माण शक्ति-निर्माण है, और उस हद तक, हिंसा का अव्यवहित प्रत्यक्षीकरण’; राज्य-हिंसा कानून के व्यवस्थापन और क्रियान्वयन के क्षेत्र में जन्म लेती है- ‘राज्य की एजेंसियों द्वारा कानून का उपयोग और दुरुपयोग’ के संदर्भ में। राज्य की मशीनरी द्वारा हत्या, उत्पीड़न, अपावर्तन, बलात्कार, अभिरक्षी मृत्यु, फर्जी मुठभेड़ और निवारक अवरोध आदि आज सामान्य परिघटना हो गईं हैं। यद्यपि असामाजिक घटकों और विध्वंसकारी तत्वों से निपटने के लिए निवारक अवरोध राज्य के हाथ में एक महत्वपूर्ण हथियार है किन्तु दुनियाभर के राज्यों द्वारा इस प्रावधान के दुरूपयोग के कम उदाहरण नहीं मिलते।

वास्तव में ऐसे किसी राज्य की कल्पना करना मुश्किल है जहां किसी प्रकार की हिंसा मौजूद न हो। अपनी सीमाओं की सुरक्षा तथा कानून का शासन बनाए रखने के लिए सभी राज्य एक सीमा तक हिंसा का प्रयोग करते हैं। किन्तु ऐसा नहीं है कि राज्य की बलमूलक संस्थाएं केवल राष्ट्रीय सुरक्षा और पब्लिक सेफ़्टी का ही ध्यान रखती हैं, इसके साथ ही ये वास्तव में विषमता को जन्म देती हैं, भेदभाव को बढ़ाती हैं और विस्थापन तथा वंचना को प्रेरित करती हैं। जबकि अरस्तू राज्य को अच्छे जीवन के लिए आवश्यक मानते हैं, प्रश्न यह उठता है कि किस प्रकार राज्य सामाजिक-आर्थिक विषमता का जन्मदाता बन जाता है? इसका जवाब अराजकतावादी और मार्क्सवादी चिंतन में मिलता है। वास्तव में राजनीतिक चिंतन के ये स्कूल ही राज्य-हिंसा की दार्शनिक मीमांसा करते है। अराजकतावादी चिंतक प्रूधों कहते हैं कि ‘संपत्ति चोरी है’; अतः निजी संपत्ति बनाने के लिए किया गया किसी भी तरह का प्रयास अराजकतावादियों की दृष्टि में हिंसा है। मार्क्सवादी एक भिन्न दृष्टिकोण से राज्य की हिंसा को देखते है। उनके लिए ‘राज्य शोषण का यंत्र’ है। यद्यपि, उदारवादी तर्क है कि, नागरिकों के जीवन एवं संपत्ति की सुरक्षा के लिए राज्य का अस्तित्व है, फिर भी दुनिया भर में शोषित वर्ग के प्रतिरोधों का इतिहास राज्य के संदर्भ में मार्क्सवादी तर्क को स्थापित करता है कि उदारवादी राज्य कॉर्पोरेट बुर्जुआ के हितों के लिए कार्य करता है। पूंजीपति वर्ग के ऊपर राज्य के इस वरदहस्थ का दूसरा पहलू दबे-कुचले सर्वहारा के उत्पीड़न की कहानी है। स्टीनर (1995) लिखते हैं कि, ‘राज्य श्रम की दासता पर आधारित होता है, अगर श्रम आज़ाद हो जाता है तो राज्य समाप्त हो जाता है’। अतः राज्य द्वारा पूंजी संचयन की प्रक्रिया हिंसा के प्रकटीकरण की प्रक्रिया है। ‘20वीं सदी के उत्तरार्द्ध से राज्य द्वारा [पूरी दुनिया में] कॉर्पोरेट-पूंजीपति हितों के लिए लोगों के जमीन की चोरी जारी है, चाहे कोई भी दल सत्ता में हो’।

राज्य-हिंसा का दायरा सिर्फ सीधी हिंसा तक सीमित नहीं है, जिसमें वह अपने बलमूलक संस्थाओं का प्रयोग करता है। एंडरसन एवं अन्य (2007) ने सही कहा है कि, ‘एक स्थिर और प्रभावी राज्य मानव-विकास एवं मानव-सुरक्षा की पूर्वशर्त है; और जो राज्य अपने नागरिकों को विकास और सुरक्षा प्रदान कर पाने में असमर्थ हैं वे न तो मजबूत और न ही स्थिर राज्य हो सकते हैं। वे कमजोर राज्य है’। आधुनिक लोकतान्त्रिक शासन प्रणालियों के दौर में राज्य की एजेंसियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। जब ये घटिया तरीके से कार्य करती हैं तो गरीब और पिछड़े लोग सर्वाधिक मात्रा में नकारात्मक रूप में प्रभावित होते है। अतः कहा जा सकता है कि राज्य-हिंसा की संकल्पना के दायरे में कमजोर राज्य या ‘राज्य की अनुपस्थिति’ भी आती है। सुरक्षा संबंधी नए विमर्श, जिसमें व्यक्ति केंद्र में है, ने राज्य की भूमिका पर सवालिया निशान लगाए हैं। राज्य की अनुपस्थिति वास्तव में उन तमाम संरचनात्मक हिंसाओं का कारण बनती है जो चिरस्थायी हिंसा की चक्र शुरू करती हैं। अतः मानव-स्वातंत्र्य और सुरक्षा को राज्य से अलग नहीं किया जा सकता है। राज्य की अनुपस्थिति में समाज के हॉब्स की प्राकृतिक अवस्था में पहुँचने की प्रबल संभावना रहती है जहां मानव जीवन ‘अकेला, गरीब, अप्रिय, पशुवत और संक्षिप्त’ है। अतः राज्य की जरूरत है, लेकिन किस प्रकार के राज्य की? उसके कार्य क्या होने चाहिए? चेनोय और चेनोय (2010) लिखते हैं कि, ‘राज्य का सर्वोच्च कार्य है कि वह ऐसी राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और अन्य संरचनाएं विकसित करे और उन्हें बनाए रखे जिसमें नागरिक अपने अधिकारों के साथ बेहतर जीवन जी सकें’।

राज्य-हिंसा की संकल्पना:
जर्मन समाजशास्त्री मैक्स वेबर (1958) ने कहा है कि राज्य ‘हिंसा के वैध प्रयोग का एकाधिकार’ रखता है। हमें राज्य-हिंसा को समझने के लिए वेबर के इस कथन पर गंभीरता से विचार करना होगा। दरअसल वेबर राज्य को एक ऐसी राजनीतिक संस्था मानते हैं जो शक्ति का प्रयोग करती है और राज्य की यह विशेषता उसे अन्य संघों और संस्थाओं से भिन्न करती है। इस तरह राज्य एक विशिष्ट संस्था है जो किन्ही अन्य संस्थाओं या संघों के नियंत्रण में नहीं बल्कि उनको नियंत्रित करती है। हिंसा के वैध प्रयोग की एकाधिकारिता राज्य को समाज में व्यवस्था बनाए रखने के लिए नागरिकों द्वारा प्रदान की जाती है। किन्तु राज्य द्वारा प्रयोग किए गए हिंसा की प्रकृति की वैधता का निर्धारण कैसे किया जाए? कौन तय करेगा कि राज्य द्वारा प्रयोग की गई हिंसा वैध है या अवैध? यह कार्य तब और भी कठिन हो जाता है जब हिंसा के वैध और अवैध प्रयोग के बीच के अंतर का आवरण बहुत झीना हो। ‘कानूनी और गैर-कानूनी के दरम्यान जो फासला है वो पता नहीं चलता कि कब कानून गैर-कानूनी काम कर रहा है। राज्य की इस प्रकार की असंगति में यह पहचान पाना मुश्किल हो जाता है कि यह कानूनी तरीके से या गैर-कानूनी तरीके से काम कर रहा है’।

मिचलोवस्की (1985) लिखते हैं कि, ‘यह हकीकत है कि किसी निश्चित राजनीतिक संदर्भ में राज्य-हिंसा कानूनी है… फिर भी इस वास्तविकता को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए कि यह हिंसा ही है’। अतः व्यावहारिक ढंग से हम ये कह सकते हैं कि हिंसा हिंसा ही है, चाहे वह वैध हो या फिर अवैध। अवैध हिंसा तो अकादमिक जगत में विमर्श का विषय रहा है लेकिन तथाकथित वैध हिंसा बहुत कम चर्चा के केंद्र में होती है। बड़ा प्रश्न यह है कि कौन हिंसा की वैधानिकता तय करेगा? पुनः, हिंसा की वैधता तय करने में राज्य एकाधिकारी स्थिति में होता है; वह अपनी हिंसा को कानून-व्यवस्था की स्थापना के संदर्भ में वैध ठहरा सकता है। लेकिन इस कानून-व्यवस्था के नाम पर होने वाली हिंसा को किस परिप्रेक्ष्य में देखा और समझा जाए? इसी स्थिति को मनीषा सेठी (2015) वैधता और अवैधता के बीच परस्पर विरोधाभासी अतिव्यापन कहती हैं। ‘राज्य द्वारा प्रभुत्व प्राप्त करने के लिए अपने नागरिकों के विरूद्ध भौतिक, संरचनात्मक या सांस्कृतिक हिंसा का प्रयोग राज्य-हिंसा कहलाता है’। चूंकि प्रभुत्व राज्य के प्रकृति में अंतर्निहित है अतः हिंसा राज्य की प्रकृति का अविभाज्य अंग बन जाता है। स्टीनर (1995) लिखते हैं कि, ‘राज्य का एक मात्र उद्देश्य व्यक्ति को, सीमित, दब्बू और अधीन बनाना है… राज्य सभी स्वतंत्र क्रियाकलापों में अपने सेंसरशिप, अपने निरीक्षण, अपनी पुलिस के माध्यम से बाधा डालता है और इस तरह की बाधाओं को बनाए रखता है क्योंकि ये बाधाएँ उसके आत्मरक्षा के लिए जरूरी हैं’।

राज्य-हिंसा की अवधारणा में सबसे पहली जरूरत यह होगी कि हम अपने सरोकार को स्पष्ट करें। अर्थात हम किन मूल्यों पर अपना ध्यान केन्द्रित करे जिनसे ‘राज्य-हिंसा’ की परिधि का निर्धारण हो सके। सरोकारों को स्पष्ट किए बिना हम राज्य-हिंसा की वैध एकाधिकारिता और अवैध प्रयोग के बीच अंतर नहीं कर पाएंगे। निश्चय ही हिंसा किसी-न-किसी के विरूद्ध होती या की जाती है। राज्य-हिंसा का नजदीकी निशाना निश्चित ही ‘व्यक्ति’ होंगे। यहाँ पर राज्य-हिंसा की अवधारणा से कुछ प्रश्न उठते हैं: (1) क्या राज्य-हिंसा के शिकार सिर्फ गरीब और अल्पसंख्यक हैं? (2) क्या यह अमीरों और बहुसंख्यकों के हितों से संबंधित है? यह बहुत दुखद बात है कि हम राज्य-हिंसा के अपने अध्ययन में ज़्यादातर बार इसे कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए राज्य द्वारा किए जाने वाले रोज़मर्रा की कार्यवाई के रूप में देखते हैं; और यही तर्क राज्य को गरीबों, पिछड़ों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों के लिए विद्रुप और निरर्थक बना देता है। आश्चर्यजनक रूप से प्रतिनिधिमूलक लोकतांत्रिक शासन प्रणाली अपने 300 वर्षों के इतिहास में पिछड़ों, गरीबों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों का विश्वास जीत पाने में नाकाम रही है। यहाँ हम कम-से-कम तीन ऐसे क्षेत्र चिन्हित कर सकते हैं जिनसे राज्य-हिंसा की अवधारणा की परिधि तय होती है:

  1. राष्ट्रवाद और जातीयता के नाम पर हिंसा;
  2. आंतरिक सुरक्षा के नाम पर हिंसा;
  3. व्यक्ति-अधिकारों के निषेध के रूप में हिंसा

हिंसा के ये प्रारूप आधुनिक राष्ट्र-राज्यों द्वारा अपने प्रभुत्व को स्थापित करने के लिए प्रयोग में लाए जाते हैं। राज्य-हिंसा के इन तीनों प्रारूपों में एक बात यह समान है कि राज्य द्वारा निहत्थी और निरीह जनता पर व्यवस्थित रूप से घातक बलों का प्रयोग किया जाता है। हिंसा के उपरोक्त प्रथम दो प्रारूपों के संदर्भ में कोई यह तर्क दे सकता है कि राष्ट्रवाद का विचार राज्य की भौगोलिक एकता और अखंडता के लिए जरूरी है अतः इस प्रकार की हिंसा वैध हिंसा मानी जानी चाहिए। इसी प्रकार जब कोई जातीय समूह या विद्रोहियों का समूह राज्य के विरूद्ध उठ खड़ा हो जाए और राज्य-अधिष्ठान की आंतरिक सुरक्षा को चुनौती दे तो निश्चय ही राज्य पलटकर जवाब देगा और अपने हिंसक बलों का प्रयोग करेगा। लेकिन पहले दोनों प्रारूपों की हिंसा के पक्ष में ये तर्क नाकाफी हैं।

आधुनिक बहुसांस्कृतिक समाजों में पहले प्रारूप की हिंसा वैध नहीं समझी जाएगी, क्योंकि राज्य की वैधता राष्ट्रवादी विचारों या प्रभुत्वशाली जातीयता के भाषा, संस्कृति और धर्म के अनुरूपता पर निर्भर नहीं करती। राज्य के प्रति निष्ठा को वैचारिक के बजाय व्यावहारिक संदर्भों में परिभाषित किया जाना चाहिए। राष्ट्रवाद का विचार, जो कि राज्य की शक्ति के वैधता का मुख्य आधार बन जाता है, बहुसांस्कृतिक लोकतंत्रों में केवल अल्पसंख्यक वर्गों में असुरक्षा की भावना को जन्म देता है और राज्य की बहुल अस्मिता हमेशा खतरे में रहती है। कई बार तो राज्य राष्ट्रवाद या जातीयता के नाम पर हो रही हिंसा के विरूद्ध, वेबेरियन संदर्भ में, अपनी वैध हिंसा के प्रयोग के एकाधिकार का भी उपयोग नहीं करता है, बल्कि इसके विपरीत यह ऐसी हिंसाओं को सहन करता है या फिर इन्हे बढ़ावा देता है जिसे हम ‘सामाजिक हिंसा’ के रूप में परिभाषित कर सकते हैं। सांप्रदायिक शक्तियों के विरूद्ध राज्य द्वारा हिंसा के एकाधिकार का उपयोग कर पाने में अक्षमता उसके कमजोर राज्य होने का परिणामस्वरूप नहीं है बल्कि ऐसा राजनीतिक प्रतिस्पर्धाओं में लाभ पाने के लिए भी किया जाता है।

राज्य-हिंसा का दूसरा प्रकार राष्ट्रीय-सुरक्षा की संकल्पना से वैधता प्राप्त करता है और इस आधार पर उचित भी ठहराया जाता है। जब कभी विद्रोहियों या अलगाववादियों द्वारा राज्य की एकता और अखंडता को चुनौती दी जाती है तो राज्य उन्हें दबाने और कानून-व्यवस्था को बनाए रखने के लिए अपने बलमूलक संस्थाओं का प्रयोग (वैध हिंसा का प्रयोग) करने के लिए मजबूर हो जाता है। लेकिन सिक्के का एक दूसरा स्याह पहलू भी है जो की भयावह है और राज्य के नृशंस और बर्बर चरित्र को सामने लाता है। राज्य अक्सर स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों मे परिवर्तित कर देता है। एक बार राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला बन जाने के बाद स्थानीय मुद्दा राजनीति से ऊपर और गंभीर विषय बन जाता है और राज्य अपनी बलमूलक संस्थाओं के प्रयोग के लिए खुली छुट प्राप्त कर लेता है। राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर, जैसा की पैसिफ़ीकी (2009) कहते हैं कि, ‘राज्य हिंसा करता है और उसे आवश्यक तथा अहानिकारक बताता है’।

जहां तक तीसरे प्रकार की राज्य-हिंसा का सवाल है, इसे अधिकारों के निषेध के रूप में समझा जा सकता है- चाहे व्यक्ति-अधिकारों या फिर सामुदायिक अधिकारों का निषेध। हिंसा के प्रारूप-वर्गीकरण पर गहन अध्ययन करने वाले शांति अध्ययन के प्रमुख विद्वान गाल्टुंग (1990) हिंसा को ‘मानव की मूलभूत आवश्यकताओं में सहने की क्षमता तक कमी करने, और जीवन को निम्नतम स्तर पर लाने जहां आवश्यकताओं की संतुष्टि का वास्तविक स्तर संभावित स्तर से नीचे हो’ के रूप में परिभाषित करते है। इस प्रकार की हिंसा ‘सापेक्ष वंचना’ (रेलेटिव डेप्रीवेशन) को जन्म देता है जो कि वास्तविक और संभावित के बीच अंतर में स्पष्ट होती है। किसी समाज में सामाजिक विकास के तमाम सूचकांकों में मौजूद सापेक्षिक भिन्नता को संरचनात्मक हिंसा कहा जाता है। इस संरचनात्मक हिंसा के लिए उत्तरदायी कौन है? वास्तविक और संभावित के मध्य अंतर के लिए जिम्मेदार कौन है- व्यक्ति, समाज या राज्य? प्रो. प्रियंकर उपाध्याय (1995) लिखते हैं कि, ‘आज बहुत से समाज मूलभूत अधिकारों के राज्य द्वारा अतिक्रमण किए जाने से जूझ रहे है’, जबकि द्वितीय और तृतीय पीढ़ी के अधिकारों के संरक्षण और उन्हे बढ़ावा देने के लिए राज्य के सकारात्मक हस्तक्षेप की जरूरत है। उदारीकरण, निजीकरण और वैश्विकरण के वाहक के रूप में 20वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और 21वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में उभरे नव-उदारवादी राज्यों में मानवाधिकारों का अतिक्रमण गंभीर मुद्दा है। राज्य द्वारा सामाजिक-आर्थिक अधिकारों, पर्यावरणीय अधिकारों, सांस्कृतिक और सामुदायिक अधिकारों के अतिक्रमण के विरूद्ध अनेक मानवाधिकारवादी आंदोलन ग्लोब पर अलग-अलग जगहों पर देखने को मिल रहे हैं। जबकि दूसरी और तीसरी पीढ़ी के अधिकार राज्य की प्रभावी भूमिका की मांग करते हैं और केवल कानून के शासन में ही सुरक्षित रह सकते हैं, दुनियाभर में चल रहे मानवाधिकारवादी आंदोलन इस मुद्दे के प्रति लोगों की व्यग्रता और राज्य की नकारात्मक भूमिका को प्रकट करते है।

उपरोक्त तीन संकल्पनात्मक परिधि में राज्य-हिंसा को समझा जा सकता है। ऐसा नहीं है की राज्य-हिंसा सदैव प्रभुत्व स्थापना के लिए ही होती है। कई बार ऐसी परिस्थितियाँ बन जाती हैं जब राज्य हिंसा करने के लिए मजबूर हो जाता है। अतः हम इन्ही तीन संकल्पनात्मक परिधि में रहते हुए राज्य-हिंसा के अभिप्रेरित और अनभिप्रेरित प्रारूप देख सकते हैं। अनभिप्रेरित हिंसा को वैध हिंसा और अभिप्रेरित हिंसा को अवैध हिंसा की श्रेणी में रखा जा सकता है। अगर कोई जातीय समूह बिना किसी खास वजह के राज्य के खिलाफ खड़ा हो जाए और उसकी अखंडता कोई चुनौती दे तो राज्य ऐसे आंदोलनों को हिंसा का प्रयोग करते हुए दबा सकता है और यह अनभिप्रेरित हिंसा होगी। लेकिन यदि राज्य राष्ट्रवाद या संप्रदायवाद के आधार पर किसी जाति या धार्मिक समूह के विरूद्ध हिंसा करता है तो यह अभिप्रेरित हिंसा कही जाएगी। इसी प्रकार आंतरिक सुरक्षा को यदि चुनौती मिल रही है तो राज्य को हिंसा का प्रयोग स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए करना चाहिए। इन परिस्थितियों से निपटने के लिए राज्य के पास हिंसा के प्रयोग का वैध एकाधिकार है। किन्तु यदि कुछ लोग अपने अधिकारों को प्राप्त करने के लिए हिंसक मार्ग का चुनाव करते हैं और राज्य उनके ‘वैध’ मांगों पर विचार करने के बजाए उनके आंदोलन या संघर्ष को आंतरिक सुरक्षा के लिए चुनौती मानकर उनके विरूद्ध अपने बलमूलक संस्थाओं का प्रयोग करता है तो इस प्रकार की राज्य-हिंसा अवैध होगी। इसी क्रम में, यदि राज्य के पास संसाधन कम है, लोगों के जीवन का स्तर सामान्य से नीचे है तथा स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवनयापन की परिस्थितियाँ विकट हैं और दैनिक जीवन में हिंसा का स्पष्ट प्रदर्शन हो रहा हो, यह अनभिप्रेरित हिंसा होगी। लेकिन राज्य को इन परिस्थितियों से शीघ्रातिशीघ्र निपटने की कोशिश करनी चाहिए। इसके विपरीत, यदि राज्य में समृद्धि है किन्तु किसी खास वर्ग या जाति समुदाय का योजनाबद्ध तरीके से अपवर्जन या बहिष्करण किया जा रहा है तो यह अभिप्रेरित राज्य-हिंसा की श्रेणी में आएगा। अकालों पर किए गए अपने अध्ययन में प्रख्यात अर्थशास्त्री प्रो. अमर्त्य सेन (1981) ने यह सिद्ध किया है कि अकाल पड़ते नहीं बल्कि अकाल की स्थिति कृत्रिम रूप से तैयार की जाती है। हिंसा का सहारा लिए बिना राज्य चल ही नहीं सकता, क्योंकि प्रत्येक से न्यायपूर्ण होने की उम्मीद नहीं की जा सकती। अतः राज्य को कुछ ऐसे कठोर कानूनों एवं उनका पालन करने वाली बलमूलक संस्थाओं की जरूरत होती है ताकि शांतिपूर्ण व्यवस्था बनी रहे। इस तरह हिंसा राज्य की प्रकृति में निहित है, किन्तु ऐसी हिंसा जो अनभिप्रेरित होती है, वैध हिंसा होगी। लेकिन अभिप्रेरित और योजनाबद्ध तरीके से की गई हिंसा को वैध नहीं ठहराया जा सकता।

क्या भारत एक हिंसक राज्य है?

एक औपनिवेशिक राज्य के रूप में भारतीय राज्य द्वारा की गई हिंसाओं से इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं। जॉन मिर्डल (2012), लिखते हैं कि, ‘भारत कभी भी ‘अहिंसक’ नहीं रहा, चाहे शासकों की ओर से या शासितों की ओर से। शोषकों के खिलाफ आंदोलन के रूप में हिंसा… उत्पीड़ित जनता हमेशा से ही संघर्षरत रही है, उस समय भी और आज भी’। भारत में औपनिवेशिक शासन हिंसा की क्रूर गाथाओं से भरा है। 1857 के समय हिंदुओं को गाय की चर्बी और मुसलमानों को सूअर की चर्बी युक्त कारतूस, जिसे मुंह से खोला जाना होता था, देने जैसी सांस्कृतिक हिंसा से शुरू होकर लगान बढ़ाने और बंधुआ मजदूरी के लिए गिरमिटिया मजदूर के रूप में समुद्र पार भेजने की संरचनात्मक हिंसा और जलियाँवाला बाग कांड जैसी सीधी हिंसाओं के कम उदाहरण भारतीय इतिहास में मौजूद नहीं हैं।

स्वतंत्रता के साथ ही लोगों को यह उम्मीद बंधी कि गुलामी और हिंसा का वह दौर अब दुबारा नहीं आएगा। 15 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि, जब दुनिया सो रही थी, भारत अपनी नियति से मिलने का वादा करके एक नई यात्रा प्रारम्भ कर रहा था। इस यात्रा का प्रस्थान बिन्दु तो लोगों की आज़ादी से था लेकिन डगर बड़ी कठिन थी, ऊंच-नीच, छुआछूत, सामाजिक गैरबराबरी, अशिक्षा, गरीबी और वंचना के खतरनाक मोड़ वाले इस ऊबड़-खाबड़ सड़क पर सत्तर वर्ष से चल रही भारतीय लोकतंत्र की यात्रा का इतिहास और वर्तमान कभी एकरेखीय नहीं रहा। अपनी पुस्तक ‘इंडिया टुड़े’ के 1970 के संस्करण की भूमिका में रजनी पामदत्त (1977) लिखते हैं कि, ‘भारत की नई सरकार द्वारा प्रकाशित सरकारी आंकड़ों के अनुसार 15 अगस्त 1947 से 1 अगस्त 1950 तक यानि अपने शासन के तीन वर्षों के अंदर उसकी पुलिस या सेना ने कम से कम 1982 बार जनता के प्रदर्शनों पर गोली चलाई, 3,784 व्यक्तियों को भून डाला और लगभग 10,000 व्यक्तियों को घायल किया, 50,000 लोगों को जेल के अंदर डाला और 82 कैदियों को जेल के अंदर गोली मार दी गई’। दुर्भाग्य से यही स्थिति अभी तक बनी हुई है या यूँ कहें तो हालात और नाज़ुक हुए हैं।

‘दुनिया का सबसे बड़ा साम्यवादी विद्रोह, दुनिया का सबसे पुराना नस्लीय विद्रोह। दुनिया भर के इस्लामिक विद्रोहों में से एक सबसे जटिल। दुनिया के टोस्ट, भारत, जहां हर पाँचवाँ नागरिक हथियारबंद विद्रोहों के साये में रहता है, में स्वागत है’। मिश्रा और पंडिता (2010) के ये शब्द हालात के प्रति सपाट बयानी का अच्छा उदाहरण है। 16 अगस्त 1946 ‘डाइरैक्ट एक्शन डे, और आज़ादी के चौखट पर विभाजन की हिंसा, जिसमें हजारों लोग मौत के घाट उतार दिये गए, की त्रासदी से दोनों मुल्क, भारत और पाकिस्तान, अब तक उबर नहीं पाए हैं, हिंसा इन राजनीतिक व्यवस्थाओं का आवश्यक हिस्सा बन गईं है। पाकिस्तान में अबतक लोकतांत्रिक संस्थाएं जड़ तक नहीं जमा पाई हैं। इसके विपरीत भारत में लोकतांत्रिक संस्थाएं मजबूत तो हुई हैं लेकिन राज्य-हिंसा का दायरा भी बढ़ा है। ‘भारतीय राज्य चार्ल्स डिकेन्स के उपन्यासों के चरित्रों की तरह है, जहाँ एक ओर इंसाफ दशकों तक चले वाली कानूनी जंग के अनावश्यक शब्दजालों में फंसा रहता है, तो दूसरी ओर राज्य किसी भी कानूनी सीमा से बंधा हुआ नहीं है। एकाएक उसके क्रूर एवं खुली वर्गीय हिंसा के दांत बाहर निकल आते हैं’। यह फ्रेंच काफ्का के उपन्यासों के चरित्रों सा भी है, जहाँ कानूनी और गई-कानूनी के दरम्यान फ़ासला खत्म सा होता जाता है। एक आंकड़े के अनुसार भारत के कुल 80 प्रतिशत संसाधनों पर मात्र 20 प्रतिशत लोगों का हक़ है। आज के भारतीय समाज के अंतर्विरोध को हम इसी अंतर से समझ सकते हैं। ‘आधिकारिक तौर पर भारत एक स्वतंत्र देश है और भारत के उच्च माध्यम वर्ग के नीचे रहने वाली आबादी आज भी उसी तरह की गरीबी से त्रस्त जीवन जी रही है, जिसके बारे में रजनी पामदत्त ने कहा था, “ऐसी गरीबी जो पश्चिमी दुनिया की स्थितियों से वाकिफ किसी भी व्यक्ति की कल्पना से परे होगा”। लेकिन अमीर लोग पहले की तरह और अमीर होते जा रहे हैं। 36 भारतीय अरबपतियों की संपदा पूरे भारत की सकल घरेलू उत्पाद का एक तिहाई है’। भारत में उत्पीड़ित और भूखे जब अपने अधिकार की मांग करते हैं तब राज्य घृणित रूप से इन कुछ मुट्ठी भर पूंजीपतियों के हितों के पक्ष में खड़ा हो जाता और शोषण की इस व्यवस्था को बनाए रखने के लिए सेना, अर्द्ध-सैनिक बलों, पुलिस, और गैर-कानूनी निगरानी समितियों के सहयोग से इनके मांगों को दबा देता है।

भारत में हर साल बड़ी संख्या में लोग सांप्रदायिक हिंसा के शिकार होते हैं। इन हिंसाओं में राज्य की परोक्ष भूमिका से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है। हालांकि, सैद्धांतिक तौर पर आज़ादी के बाद से ही पंथनिरपेक्षता के विचार को बढ़ावा दिया गया और संप्रदायवाद का विरोध किया गया तथा राज्य को धार्मिक राज्य के रूप में परिभाषित नहीं किया गया, परंतु यह कहना जरा कठिन है कि सांप्रदायिक सौहार्द कभी अस्तित्वमान सच्चाई भी रही है। भारत का राजनीतिक अभिजन अपने राजनीतिक लाभों के लिए धर्म के दुरुपयोग से जरा भी हिचके नहीं, परिणामस्वरूप सांप्रदायिकता देश के अंदर हिंसा का सबसे बड़ा स्रोत बन गया है। एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2004 से वर्ष 2010 तक पुलिस की गोलीबारी से 2,337 लोगों की जानें जा चुकी हैं। इसी रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2006 से 2010 तक सांप्रदायिक दंगों में मरने वालों की संख्या 287 है जबकि इसी समायावधि में पुलिस कस्टडि में 442 लोग मरे।

इसके अलावा आंतरिक सुरक्षा के नाम पर भारत में राज्य-हिंसा लगातार बढ़ रही है। माओवादियों के खिलाफ चल रहे राज्य बनाम माओवादी छ्दम युद्ध में अबतक करीब 6000 लोगों की जानें जा चुकी हैं। लाल गलियारे में सुरक्षा बलों द्वारा फर्जी मुठभेड़ में निर्दोष आदिवासियों की हत्या, महिलाओं के साथ बलात्कार, लूट आदि की घटनाएँ दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। राज्य द्वारा संसाधनों की खुली लूट और आदिवासियों की उनके ज़मीन से बेदख़ली बड़े पैमाने पर जारी है। दक्षिणी छत्तीसगढ़ में सरकार द्वारा आदिवासियों की ज़मीनें लूटकर पूँजीपतियों को सौंपने के संबंध में एक कमेटी ने रिपोर्ट ने बड़ा ही दिलचस्प निष्कर्ष लिखा है कि, ‘यह कोलंबस के बाद जमीन हड़पने की सबसे बड़ी घटना है’। इतने बड़े पैमाने पर ज़मीन की हड़प से बेदखल हुए आदिवासियों के पुनर्वास के लिए कोई ठोस व्यवस्था सरकार द्वारा नहीं की गई है, जिसके परिणामस्वरूप विस्थापन का दंश झेल रहे आदिवासी समुदाय की जीविका ही नहीं बल्कि जीवन-संस्कृति भी खतरे में पड़ गई है। मानव-विकास के लगभग सभी महत्वपूर्ण सूचकांकों, मसलन शिक्षा, स्वास्थ्य, शिशु मृत्यु दर, मातृ-मृत्यु दर, बीएमआई सूचकांक आदि में ये आदिवासी समुदाय राष्ट्रीय औसत से बहुत पीछे हैं। राज्य इन क्षेत्रों में काम कर उनके जीवन स्तर को सुधारने के बजाए उनके अधिवास स्थानों में दबे खनिज और महत्वपूर्ण अयस्कों के निर्बाध दोहन में लगी है।

सापेक्षिक वंचना का स्तर इतना नीचा नहीं होना चाहिए कि लोगों को उनसे घिन आने लगे, या वे समाज की शांति पर चोट करने लगे। समाज में अमीरी और गरीबी का ऐसा स्पष्ट विभाजन गरीबों के लिए नहीं बल्कि अमीरों के लिए उस सीमा तक चिंतनीय है जहां से मुर्दा शांति के खिलाफ गरीबों की जिंदा अशांति शुरू हो जाती है। जॉन मिर्डल लिखते हैं कि, ‘गरीबों के खिलाफ अमीरों के इस लंबे अत्याचार में भारतीय जनता कभी भी सिर्फ निष्क्रिय शिकार नहीं रही है। उन्होने पलटकर जवाब दिया है। यह उन्होने अंग्रेजों के भारत आने से पहले भी किया। अंग्रेजों के समय में भी किया और आज भी कर रहे हैं’।

अंत में, भारत कभी भी पूर्णतः सहिष्णु और अहिंसक राज्य नहीं रहा है। प्राचीन वर्ण व्यवस्था से लेकर आधुनिक लोकतंत्र के अपने लंबे इतिहास में भारत में शोषक-शोषित सम्बन्धों की स्पष्ट पड़ताल की जा सकती है। भारत एक लोक-कल्याणकारी राज्य होने के साथ-साथ प्रशमन राज्य (काउंटर-इंसर्जेंसी स्टेट) भी है। निश्चित रूप से भारत ने आर्थिक क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है और दुनिया की महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्थाओं में से एक है लेकिन भारत-उदय के इन शानदार आख्यानों के समानान्तर ही उत्तरजीवी-भारत का भी लंबा-चौड़ा आख्यान है। ऐसा नहीं है कि सत्तर वर्षों के जनतांत्रिक इतिहास में भारतीय राज्य सिर्फ हिंसक ही रहा है; विकास के नए आयाम भी तय किए गए है। इस दौरान भारतीय राज्य अपने समक्ष आने वाली हिंसक चुनौतियों के लिए कभी भी सहिष्णु राज्य नहीं रहा, जैसा कि पहले ही कहा भी गया है कि कोई भी राज्य हिंसा से अलग नहीं हो सकता, और हो भी नहीं सकता। लेकिन आधुनिक भारतीय राज्य में अभिप्रेरित हिंसाओं के भी आख्यान पटे पड़े हैं। जरूरी है कि अभिप्रेरित हिंसाओं को गंभीर अकादमिक विमर्श का मुद्दा बनाए ताकि भारत को तमाम अस्मिताओं, जतियों और नस्लों के लिए सुलभ और सहिष्णु बना सकें।

आभार: इस शोध आलेख के लेखन में उज्जयी तिवारी, एम. ए. शांति अध्ययन, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, के सहयोग के लिए मैं उनके प्रति आभारी हूँ। सुश्री तिवारी के साथ हिंसा पर हुए विमर्श इस आलेख की रूपरेखा तैयार करने में उल्लेखनीय रूप से महत्वपूर्ण है। इस क्रम में मैं अपने कॉलेज के हिन्दी विभाग के प्राध्यापक, जिन पर ग्रंथालय सम्हालनें का अतिरिक्त दायित्व है, डॉ. प्रकाश भट्ट जी का भी आभारी हूँ, जिन्होने सीमित संसाधनों के बावजूद भी ग्रंथालय को बेहतरीन और अपडेट बनाए रखा है।                   

संदर्भ-सूची:                

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अंतरराष्ट्रीय वेबिनार मुख्य विषय :- किन्नर विमर्श : इतिहास , समाज , साहित्य के संदर्भ में

मुख्य विषय :- किन्नर विमर्श : इतिहास , समाज , साहित्य के संदर्भ में
आयोजक :-
हिन्दी विभाग टांटिया विश्वविद्यालय श्री गंगा नगर, राजस्थान
किन्नर अधिकार ट्रस्ट रजि. एवं विलक्षणा एक सार्थक पहल समिति रजि. के सहयोग से
दिनांक 31 मई 2020 को आयोजित किया जायेगा।

विशेष

  1. वेबिनार में भाग लेने वाले प्रतिभागी अपना नाम अंग्रेजी के कैपिटल अक्षर मे लिख कर अपना वट्स एप्प नंबर 9996737200 पर दिनांक 29 मई 2020 तक भेजकर पंजीकरण करवा लें।
  2. वेबिनार के लिए प्रस्तुत आलेखों का निःशुल्क प्रकाशन बोहल शोध मंजूषा जर्नल के वेबिनार E विशेषांक में किया जाएगा।
    उपविषय :
    1 किन्नर अर्थ , परिभाषा
  3. किन्नर समाज मे आर्थिक संकट
  4. किन्नर समाज और राजनीतिक
  5. किन्नर समाज मे जाति एक समस्या
  6. किन्नर समाज और बेरोजगारी
  7. किन्नर साहित्य और समाज
  8. सिनेमा और किन्नर समाज
  9. इतिहास लेखन और किन्नर समाज
    9 किन्नर समाज उत्थान में साहित्य का योगदान
    10 समाज का पिछड़ा वर्ग किन्नर समुदाय
  10. किन्नर संस्कृति
  11. वैश्विक साहित्य और किन्नर समाज
  12. प्राचीन संस्कृति और किन्नर समाज
  13. किन्नर समाज मे परिवर्तन
  14. आत्म कथा और किन्नर समाज
  15. मानवाधिकार और किन्नर
  16. भारतीय संविधान और किन्नर समाज
  17. किन्नर समुदाय की सामाजिक समस्याएं
  18. संस्कृत साहित्य और किन्नर समुदाय । उक्त शीर्षकों के अतिरिक्त मुख्य विषय से जुड़े अन्य विषयों पर भी शोधालेख भेजे जा सकते हैं। विषय चयन से पूर्व संयोजक से विचार करना उचित होगा।

वेबिनार E विशेषांक के लिए शोध आलेख आमंत्रित हैं-

आप अपने मौलिक
15 जून 2020 तक कृतिदेव, मंगल , यूनीकोड , वॉकमैन चाणक्य 901-95 अथवा यूनिकोड में वर्ड फाइल में भेज सकते हैं।

पी.डी.एफ. एवं स्कैन फाइल स्वीकार नहीं की जायेंगी ।
शोधालेखों में सन्दर्भ आलेख के अंत में दिए जायें।

● लेख कम से कम 2000 शब्दों का हो।

● आलेख हिन्दी अग्रेजी दोनों भाषा में स्वीकार किए जाएंगे।
● जर्नल में आलेख प्रकाशन आपकी इच्छा पर होगा अनिवार्य नहीं है।
● वेबिनार सर्टिफिकेट आपको आपकी मेल पर ही भेजा जाएगा।
● वेबिनार सर्टिफिकेट के लिए आप अपना नाम अंग्रेजी के केपिटल अक्षर में मेल करे ।
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पंजीकरण शुल्क

29 मई 2020 तक जमा करे ।

प्राध्यापक तथा अन्य : 101/-

शोधार्थी : 51/-

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Paytm, google : 9996737200

संरक्षक :
माई मनीषा महंत

आयोजन समिति
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डॉ नरेश सिहाग एडवोकेट विभागाध्यक्ष एवं शोध निर्देशक 8708822674,
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संपादक :
बोहल शोध मंजूषा ISSN 2395:7115

डॉ.मोहिनी दहिया
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