नक्सलवादी आन्दोलन और हिंदी की प्रमुख लघु पत्रिकाएं (1950 से 1980 के विशेष संदर्भ में) – डॉ. निकिता जैन

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नक्सलवादी आन्दोलन और हिंदी की प्रमुख लघु पत्रिकाएं (1950 से 1980 के विशेष संदर्भ में)

डॉ. निकिता जैन

अम्बेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली में अध्यापन।

फ़ोन नंबर -9953058803

ईमेल-nkjn989@gmail.com

शोध सारांश

प्रस्तुत शोधालेखनक्सलवादी आन्दोलन और हिंदी की प्रमुख लघु पत्रिकाएं (1950 से 1980 के विशेष संदर्भ में)’ में मुख्य रूप से उन लघु पत्रिकाओं को शामिल किया गया है जिनको नक्सलवादी आन्दोलन को हिंदी जगत से रूबरू कराने का श्रेय जाता है। प्रस्तुत शोधालेख में ‘लघु पत्रिकाओं’ का ज़िक्र किया गया है अर्थात ऐसी पत्रिकाएं जो व्यक्तिगत साधनों के आधार पर निकाली जा रही थीं जो किसी सरकारी या गैर सरकारी संगठन से जुड़ी हुई नहीं थी और जिनका केवल एक ही उद्देश्य था समाज और सत्ता में व्याप्त अनीतियों के खिलाफ जमकर लिखना जो उस समय की बड़ी पत्रिकाएं (सरकारी या गैर सरकारी संगठन से जुड़ी पत्रिकाएं ) नहीं कर पा रहीं थीं। यह शोधालेख केवल लघु पत्रिका के आईने से ‘नक्सलवाद’ का छोटा सा चित्र प्रस्तुत करने की कोशिश करता है। न तो इसमें तत्कालीन समय में निकलने वाली नक्सलवादी सम्बन्धी सभी पत्रिकाओं का ज़िक्र है न ही ये दावा पेश किया जा रहा है कि यह शोधालेख ‘नक्सलवाद’ की नयी व्याख्या प्रस्तुत कर रहा है अपितु इस शोधालेख द्वारा लघु पत्रिकाओं की महत्ता का आंकलन प्रस्तुत करने की कोशिश की गयी है कि कैसे वह सीमित संसाधनों के दायरों में रहते हुए भी अपनी सामाजिक एवं राजनीतिक भूमिका का निर्वाह भलीभांति कर रहीं थीं। प्रस्तुत शोधालेख में ‘फिलहाल’, ‘आमुख’ एवं अन्य पत्रिकाओं  का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि ‘नक्सलवाद’ को साहित्यिक आईने से किस तरह देखा जा रहा था और लघु पत्रिकाओं की उसमें क्या भूमिका थी।

बीज शब्द

नक्सलवाद, सामाजिक, राजनीतिक, लघु पत्रिका, संग

आमुख

नक्सलवादी आन्दोलन पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के एक छोटे से गाँव ‘नक्सलबाड़ी’ से शुरू हुआ था। सन् 1967 में इस आन्दोलन की शुरुआत  किसानों और मजदूरों की मुक्ति के लिए की गयी थी। सामन्तवाद के खिलाफ किसानों और मजदूरों के इस विद्रोह ने धीरे-धीरे बुद्धजीवियों को अपनी ओर आकर्षित करना शुरू किया| धीरे-धीरे शिक्षित युवा-वर्ग का समर्थन भी इस आन्दोलन को प्राप्त होने लगा । एक तरफ बंगला साहित्य को इस आन्दोलन ने प्रभावित किया तो दूसरी तरफ हिंदी साहित्य भी इस आन्दोलन के प्रभाव से अछूता न रहा। डॉ. गोपाल प्रधान अपने आलेख ‘नक्सलवाद और हिंदी साहित्य’ में इस पहलू पर और रोशनी डालते हुए लिखते हैं कि –“नक्सलवाद को आमतौर पर राजनीतिक आन्दोलन की हिंसक धारा के साथ जोड़ा है लेकिन असल में यह स्वातन्त्र्योतर भारत में किसानों-मजदूरों की मुक्ति का उग्रपंथी आन्दोलन है|……पहले बंगाल के साहित्यिक जगत पर इसका प्रभाव पड़ा। फिर हिंदी साहित्य भी इसके प्रभाव में आया| हिंदी कवि धूमिल की एक कविता में इसका सबसे पहले उल्लेख मिलता है।”1.  भले ही नक्सलवादी आन्दोलन का प्रभाव हिंदी साहित्य पर थोड़ी देर से पड़ा हो लेकिन यहाँ के प्रगतिवादी लेखक, कवि हमेशा से इस आन्दोलन को लेकर सजग एवं सचेत रहे हैं।  कुछ  लघु पत्रिकाएँ तो केवल इस आन्दोलन के समर्थन के लिए ही निकाली गयीं ताकि जनता और साहित्य जगत के अन्य लोगों को यह बताया जा सके कि वास्तव में ‘नक्सलवादी आन्दोलन’ है क्या और  क्यों शुरू किया गया है, क्यों किसान और मजदूर को अपने हल, खेत और औजार छोड़कर हाथ में हथियार लेने पर मजबूर होना पड़ा , क्यों एक मुक्ति आन्दोलन सरकार ने हिसंक धारा का रूप दे दिया।  प्रशासन के चेहरे से नकाब उतारने के लिए और नक्सलवादी आन्दोलन के समर्थन के लिए उस समय कई लेखक और साहित्यकार आगे आये और उन्होंने पत्रिकाओं के ज़रिये साहित्य में एक नयी चेतना को जन्म देने का प्रयास किया जो मजदूर और किसान की आवाज़ बन सके। इनमें सबसे चर्चित पत्रिका वीर भारत तलवार द्वारा सम्पादित ‘फिलहाल’ है। ‘फिलहाल’ नक्सलवादी आन्दोलन केन्द्रित पत्रिका थी। आन्दोलन से जुड़ने के उद्देश्य से यह पत्रिका निकाली गयी थी ताकि मजदूरों और  किसानों की आन्दोलन में वास्तविक भूमिका का क्या है, इसका पता लगाया जा सके, सरकार द्वारा उनका जो दमन किया जा रहा है उसकी सच्चाई से लोगों को रूबरू कराया जा सके तथा अधिक से अधिक युवाओं और बुद्धिजीवी वर्ग के साथ संपर्क स्थापित किया जा सके। यहाँ हम ‘फिलहाल’ में नक्सलवाद के परिप्रेक्ष्य में जो साहित्य प्रकाशित किया गया है उसका मूल्यांकन प्रस्तुत करेंगे ताकि यह पता लगाया जा सके कि साहित्य से जुड़े विद्वान किस प्रकार अपनी कलम के द्वारा इस आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे थे| इसके अलावा अन्य साहित्यिक लघु पत्रिकाओं में ‘नक्सलवाद’ को लेकर कोई चर्चा की गयी है या नहीं, इसका भी आंकलन प्रस्तुत किया जाएगा|

फ़िलहाल –  फिलहाल पत्रिका का प्रकाशन सन् 1972 से वीर भारत तलवार के संपादन में शुरू हुआ था। यह वे  दौर था जब नक्सलवादी आन्दोलन बंगाल के अलावा देश के अन्य हिस्सों में धीरे-धीरे फ़ैल रहा था और सरकार इस आन्दोलन के दमन के लिए भरसक प्रयास कर रही थी। नक्सलवादी आन्दोलन को सही दिशा देने के लिए और सरकारी नीतियों को विफल करने के उद्देश्य से ही ‘फिलहाल’ जैसी पत्रिकाएँ आगे आयीं और इन्होंने अधिक से अधिक लोगों को अपने साथ जोड़ने की ज़िम्मेदारी उठायी ताकि लोगों को ‘नक्सलवाद’ के बारे में जो भ्रांतियां हैं उनसे दूर रखा जा सके और इस आन्दोलन को गलत राह पर भटकने से बचाया जा सके। वीरभारत तलवार नक्सलवादी आन्दोलन के तहस-नहस होने की वजह को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं – “चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने अगर उस वक़्त चारू मजुमदार की एम.एल. पार्टी को अपनी मान्यता न दी होती तो कई ग्रुपों के लोग उसकी ओर उस तरह न लपकते। चारू मजुमदार अपने पत्र में लिखते थे कि जब तक तुम जमींदार का सिर नहीं काटते, तुम क्रांतिकारी नहीं हो सकते,जो जितना अध्ययन करता है, वह उतना बड़ा ही गधा है …… हमारा ग्रुप इस विचारों का सख्त विरोध करता था…..इन्हीं विचारों के कारण नक्सलवादी आन्दोलन सही रास्ते से भटककर तहस-नहस हो रहा था।”2.  उपर्युक्त कथन से स्पष्ट है कि नक्सलवादी आन्दोलन कहीं न कहीं अपनी राह भटक रहा था क्योंकि इस आन्दोलन का वास्तविक उद्देश्य यही था की उन नीतियों के खिलाफ लड़ना जो वर्षों से किसानों और मजदूरों का शोषण कर रही हैं। केवल जमींदार का गला काटने से यह समस्या हल नहीं होने वाली थी और हुई भी नहीं। लेकिन यह ज़रूर है कि 70 के दशक में किसानों और मजदूरों के इस सशस्त्र आन्दोलन का समर्थन करने वाली एक लेखकीय पीढ़ी ज़रूर तैयार हो गयी थी। डॉ. प्रधान के अनुसार सबसे पहले हिंदी में खासकर ‘गोली दागो पोस्टर’  कविता में किसान और मजदूर की सशस्त्र संघर्ष चेतना के दर्शन होते हैं।3.  यह कविता ‘फिलहाल’ में जुलाई 1972 में प्रकाशित हुई थी। इस कविता में किसान की उस संघर्ष यात्रा का वर्णन है जिस को न जाने वह कितनी सदियों से झेलता आ रहा है। लेकिन अब उसे ये एक तरफ़ा संघर्ष नहीं चाहिए। अब उसे उन लोगों को गोली मारने का अधिकार चाहिए जिन्होंने उससे उसकी आज़ादी, उसकी हंसी, उसका बचपन छीन लिया –

“बहन के पैरों के आसपास पीले रेंड़ के पौधों की तरह

उगा था जो मेरा बचपन-

उसे – दारोगा का भैंसा चर गया।

आदमियत को जीवित रखने के लिए अगर

एक दरोगा को गोली मारने दागने का अधिकार है

तो मुझे क्यों नहीं ?”4.

जो किसान दिन-रात एक करके जमींन में हल चला रहा है,बीज बो रहा है, अनाज पैदा कर रहा है उसी किसान की जमीन सूद के नाम पर जमींदार हड़प लें तो वो किसान कहाँ जाए क्या करे ? क्या अब भी सरकार और पुलिस की मिलीभगत के आगे घुटने टेक दे या फिर अपने हक़ के लिए  लड़े औए सशस्त्र विद्रोह करे –

“जिस जमींन पर मैं चलता हूँ,

जिस जमीन को मैं जोतता हूँ

जिस जमीन में मैं बीज बोता हूँ और

जिस जमीन से अन्न निकालकर मैं

गोदामों तक ढोता हूँ-

उस जमीन के लिए मुझे गोली दागने का अधिकार है या

दोगले जमींदारों को – जो इस पूरे देश को सूदखोर का कुत्ता बना चुके हैं ?”5.

पूरे देश को सूदखोर का कुत्ता बनाने के पीछे केवल जमींदार नहीं बल्कि वे नेता भी हैं जो अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए गरीब जनता का खून चूसते हैं और सामंतवादियों और जमींदारों के घर भरते हैं। शंकर शैलेन्द्र की कविता ‘नेता को न्यौता’ ऐसे ही ईमानदार नेताओं की पोल खोलती है जो खादी का कुर्ता पहनकर, हाथ जोड़कर किसानों और मजदूरों की बस्तियों में जाकर उनकी आज़ादी के नाम पर उनसे वोट मांगते हैं, लेकिन असलियत में किसानों और मजदूरों की आवाज़ को दबाने के लिए उन पर गोली भी यही चलवाते हैं –

“यह कैसी आज़ादी है,

वही ढाक के तीन पात हैं, बर्बादी है ;

तुम किसान मजदूरों पर गोली चलवाओ,

और पहन लो खद्दर, देश भक्त कहलाओ !

तुम सेठों के संग पेट जनता का काटो,

तिस पर आज़ादी की सौ-सौ बातें छांटो !

हमें न छल पाएगी यह कोरी आज़ादी,

उठ री, उठ; मजदूर किसानों की आबादी !”6..

दरअसल नक्सलवादी आन्दोलन गरीब मजदूर के भीतर वर्षों से पनप रहा वो आक्रोश है जो अब एक ज्वाला में तब्दील हो चुका है। यह आन्दोलन केवल ज़मींदारों के खिलाफ नहीं बल्कि उन सरकारी नीतियों और नेताओं के खिलाफ भी शुरू हुआ था जो किसानों मजदूरों को दो जून की रोटी तक मुहैया नहीं करवा पाते और जमीदारों का घर भरते जाते हैं। किसान-मजदूर नेताओं के झूठे वादों से, साहूकारों और जमीदारों के शोषण से तंग आ चुका था इसलिए उसने इस आन्दोलन की शुरुआत की ताकि वह यह बता सके कि उसे किसी की दया या रहम की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि यह दया और रहम दरअसल एक छलावा है, धोखा है किसान और मजदूर की आज़ादी को कैद करने का। लालसिंह दिल की कविता ‘शीशे की कैद’ में इस छलावे पर रोशनी डालते हुए एक साधारण मजदूर कहता है –

“किसी की दया पर

हमें कुछ भी स्वीकार नहीं

कोई स्वर्ग, किसी धर्मराज का राज्य

अथवा कोई ‘समाजवाद’

x-x-x

तुम्हें बहुत चिंता है

हमारे खून बहने की

तथा इस रक्त की सुरक्षा के लिए

जिस ‘मर्तबान’ का तुम संकेत करते हो

लोगों ने उन्हें ठोकरों से तोड़ देना है”7.

दरअसल किसान-मजदूर अब यह समझ चुके हैं कि उनकी चिंता न तो सरकार को है न ही समाज को। जिस झूठी आज़ादी के मर्तबान का लालच देकर उन्हें इस आन्दोलन से पीछे हटने को कहा जा रहा है वह भी एक चाल है। हथियार डालते ही उनसे शायद पहले से भी ज्यादा बदत्तर सलूक किया। पुलिस की गोली से मरना या जमींदार का क़र्ज़ चुकाते-चुकाते मरना अगर दोनों ही सूरतों में मरना है तो फिर आजीवन शोषण का शिकार होने ने क्या फायदा?

यह बात तय है कि किसानों और मजदूरों ने जिस आन्दोलन की शुरुआत की थी उसका उद्देश्य या लक्ष्य एक ही था अपने पर हो रहे ज़ुल्मों के खिलाफ विद्रोह ताकि उनकी आने वाली नस्लों को वो सब सहना न पड़े जो उनको सहना पड़ा। लेकिन आगे जाकर कुछेक लोगों ने अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए इस आन्दोलन का इस्तेमाल हिंसक रूप में करके पूरे विद्रोह के प्रारूप को ही बदल दिया। कोई भी आन्दोलन केवल हिंसा के आधार पर अपने उद्देश्य की प्राप्ति नहीं कर सकता, यही वजह है कि आज नक्सलवादी आन्दोलन अपने लक्ष्य से भटक चुका है और ऐसी अंधी गली में प्रवेश कर चुका है जहाँ से निकलने के लगभग सभी रास्ते बंद हैं। ‘फिलहाल’ पत्रिका में नक्सलवादी आन्दोलन के शुरू होने के पीछे जिन कारणों को स्पष्ट किया गया है उसे देखकर कहीं से भी यह एहसास तो नहीं होता कि इस आन्दोलन का मकसद गलत था। एक लोकतान्त्रिक देश में व्यक्तिगत स्वतंत्रता हर नागरिक का अधिकार है। लेकिन जब कुछेक एक वर्ग मिलकर दूसरे वर्गों की स्वतंत्रता को छिनने की कोशिश करें तो क्रांति होना लाज़मी है जो ‘नक्सलवाद’ के रूप में हुई। लेकिन इस क्रान्ति को कैसे सरकार के कुछ लोगों और जमींदारों ने मिलकर हिंसक आन्दोलन में परिवर्तित कर दिया इसका उदाहरण अरुण रंजन के नाटक ‘परदे के पीछे’ में प्रस्तुत किया गया है। दरअसल आम जनता के आगे तो नक्सलवादी आन्दोलन का आधा सच ही पाया है, आधा सच जो पूरे झूठ से अधिक खतरनाक होता है इसलिए नक्सलवाद का नाम सुनते ही आम जनता विद्रोह करने वालों को कसूरवार मानने लगती है लेकिन असल में परदे के पीछे की सच्चाई क्या है, कैसे जनता को सरकार गुमराह कर रही है और किसान-मजदूरों का खून चूस रही है यह नाटक इस सच्चाई से पाठकों को रूबरू करवाता है। प्रस्तुत नाटक में अकालग्रस्त राज्य की स्थिति का जायज़ा लेने के लिए प्रधानमंत्री पहुँचते हैं जहाँ उनके इंतज़ार में पहले से ही राज्य की मुख्यमंत्री, पुलिस फ़ोर्स और जमींदार स्वागत –सत्कार के लिए खड़े हैं। देश के प्रधानमंत्री जब मुख्यमंत्री से राज्य में अकाल की स्थिति के बारे में पूछते हैं तो मुख्यमंत्री का जवाब सरकार, पुलिस, सबकी पोल पट्टी खोलकर रख देता है – “ इधर भूखी जनता देशी-विदेशी विघटनकारियों के बहकावे में आकर विद्रोह करने पर उतारू है। (प्रधानमंत्री के कान के पास फुसफुसाकर) ‘डुमरी गाँव’ के वर्ग-संघर्ष को हमने बड़ी मुश्किल से पुलिस-नक्सलवादी भिड़ंत प्रचारित करके टाला है, लेकिन …..मालिक ! इन परिस्थितियों में मेरी गद्दी का क्या होगा ? सरकार ! मुझे बचा लीजिये। यह गद्दी आपकी दी हुई चीज़ है। इसकी हिफाज़त कीजिये हुजूर| मैं अभी की तरह आजन्म आपकी वफादार दासी बनी रहूंगी ! सबूत के तौर पर …….(फिर वह एक टांग पर उचक कर प्रधानमंत्री को नरमुंडों की एक माला पहना देती है|) गदगद स्वर में आई.जी. ने आपको किसानों की माला पहनाई। यह विद्यार्थियों की माला है ! खुशबूदार ! सूंघ कर देखिये।”8.  देश के आधे से अधिक नेताओं की सच्चाई यही है जो परदे के सामने कुछ और परदे के पीछे कुछ और हैं। नक्सलवाद को हिंसात्मक आन्दोलन का रूप देने में ऐसे ही राजनीतिज्ञों का हाथ है जो अपने स्वार्थ के लिए गरीब किसान का पेट और युवा विद्यार्थी की जुबान दोनों काट सकते हैं। देश में अकाल कैसे पड़ता है, अकाल के समय केवल गरीब जनता ही इसका शिकार क्यों बनती है, सारा अनाज कहाँ जाता है, अकाल के समय जमींदार, साहूकार और अमीर क्यों हो जाते हैं ? इन सब सवालों के जवाब प्रधानमंत्री और धन्ना सेठ के इन संवादों के द्वारा मिलते हैं –

“ प्रधानमंत्री : (धन्ना सेठ को गुरेर कर ) और कहो, खूब कमा रहे हो न धन्ना सेठ ! इस बार चुनाव-कोष में कितना दे रहे हैं आप लोग ? सुना है, राज्य में गेहूं, कोयला, डालडा, चीनी, किरासन तेल, बिजली, पानी, कुछ नहीं मिलता। आप लोग खूब कमा रहे हैं !

भयभीत धन्ना सेठ : आपकी कृपा रही तो क्या नहीं हो सकता माईबाप ? आप ज़रा एकांत में मुख्यमंत्री जी को समझा देंगे कि कम से कम एक साल यही स्थिति रहने दें ; तो हम पिछली बार से दुगना चुनाव फंड देंगे

मुख्यमंत्री : (उछल कर) बाप रे ! एक साल ? असंभव ! तब तक तो भूखी जनता हमें कच्चा खा जाएगी; वह भी बिना नमक लगाए ! फिर कहाँ चुनाव का खेला होगा। देखिये (आवाज़ दबाकर ) दो महीने में जो करना है, कर डालिए !

…………………..

धन्ना सेठ- (रोते हुए ) हमारा क्या होगा सरकार…. हमारा क्या होगा।

प्रधानमंत्री – (ऊब कर बीच-बचाव करते हुए ) चलिए ‘चार’ पर मामला पक्का रहा। चार महीने तक अकाल को जारी रहा जाएगा। बदले में नगरश्रेष्ठ दुगना नहीं, चार गुना चुनाव कोष देंगे।”9.

    सरकारी नेता जो अपने आपको जनता का सेवक कहते हैं असल में वह ही सबसे बड़े जनता के भक्षक हैं। चुनाव फंड के लिए राज्य में अकाल जैसी स्थिति उत्पन्न कर देना और गरीब जनता को भूखे मरने के लिए छोड़ देना, विद्रोह करने पर उसे पुलिस-नक्सलवादी भिड़ंत बताकर हिंसात्मक रूप देना यह सरकार की साजिश नहीं है तो और क्या है और ऐसी स्थिति में एक आम किसान हथियार न उठाये तो क्या करे ? सरकार की इन्हीं गैर-जिम्मेदाराना नीतियों का परिणाम हम सब के समक्ष नक्सलवादी आन्दोलन के रूप में प्रस्तुत है। दरअसल गौर से देखा जाए यह आन्दोलन केवल किसानों या मजदूरों पर हो रहे शोषण के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाता बल्कि यह उस ‘जनतंत्र’ पर भी सवाल उठाता है जिसका प्रयोग हम अपने देश के लिए बड़े गौरव के साथ करते हैं कि –‘यहाँ तो लोकतंत्र है, जनता जिसे अपना नेता चुनेगी वही जनता की सेवा के लिए आयेगा’ लेकिन क्या वाकई में जनता को पता भी है उसे किसे चुनना है और किसे नहीं चुनना ? और जनता द्वारा चुना हुआ नेता क्या वाकई में जनता की सेवा में लगा हुआ है या नहीं ? क्या वाकई में हम ‘जनतंत्र’ शब्द का वास्तविक अर्थ जानते हैं ? अज़गर वजाहत अपने लेख ‘चम्बल घाटी के डाकुओं से एक अपील’ में ‘जनतंत्र’ पर व्यंग्य करते हुए लिखते हैं कि – “आज़ादी के बाद एक विशेष प्रकार के हथियार का जन्म हुआ है जिसे जनतंत्र कहते हैं।…. मैं तुम्हें सच कहता हूँ कि मित्रों, यदि ‘जनतंत्र’ से मेरा सही परिचय न कराया गया होता तो मैं भी आज चम्बल घाटी में होता। तुमने परमाणु बम का नाम सुना होगा।…. ‘जनतंत्र’ और ‘परमाणु बम’ में अंतर केवल इतना है कि परमाणु बम से सभी  जीवित वस्तुएं समाप्त हो जाती हैं, जबकि ‘जनतंत्र’ का प्रभाव क्षेत्र केवल मनुष्य तक सीमित है। ‘जनतंत्र’जंगली जानवरों, पेड़-पौधों आदि पर अपना घातक प्रभाव छोड़ पाने में असमर्थ है।…. मैंने इस शस्त्र का यथासंभव और यथास्थान खूब प्रयोग किया है।”10.  अज़गर वजाहत यहाँ साफ़ तौर पर ‘लोकतंत्र’ पर कटाक्ष करते हुए यह कहने का प्रयास कर रहे हैं कि भारत में जिस जनतंत्र की बात की जाती है वास्तविकता में वह ‘जनतंत्र’ है ही नहीं बल्कि बड़े-बड़े नेता और अधिकारी अपनी मर्ज़ी से, अपनी सहूलियत के अनुसार इस जनतंत्र के हथियार का इस्तेमाल करके लाचार जनता को लूटने का काम करते हैं। और हैरानी की बात यह है कि उनकी यह लूट की प्रक्रिया सालों साल ऐसी ही चलती रहती ही। न कोई कानून, न कोई मुक़दमा। कभी-कभार फंस भी गए तो बीसियों साल लग जाते हैं अदालत को दोषी को सजा सुनाने में। डाकुओं को  ‘जनतंत्र’ के फायदे समझाते हुए अजगर वजाहत आगे लिखते हैं – “तुम लोग यदि चम्बल घाटी से निकल आओ तो मेरे साथ मिलकर आयात-नियात का कारोबार कर सकते हो……..यदि कुछ न हुआ तो निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव तो जीत ही सकते हो। डकैती का लम्बा अनुभव लड़ने में बहुत सहायक होगा। जिस तरह तुम लोग डकैती में गाँव को चारों ओर से घेर लेते हो, …… उसी तरह उम्मीदवार भी एक बड़े इलाके को चारों ओर से घेर लेता है। तुम लोग केवल सोना-चांदी लूटते हो, परन्तु उम्मीदवार इतना नादान नहीं होता। वह लोगों से उन पर शासन करने का अधिकार लूट ले जाता है और उम्मीदवार अपने क्षेत्र के वर्तमान और भविष्य को बांधकर अपने साथ ले जाता है।”11.  ज़ाहिर है कि यहाँ लेखक चम्बल घाटी के डाकुओं से अधिक देश के नेताओं को खतरनाक बता रहा है जो इंसान से उसकी स्वतंत्रता, उसके जीने का अधिकार, उसकी इंसानियत सब छीन लेता है और इसके बाद भी भारत विश्व का सबसे बड़ा ‘जनतांत्रिक’ देश कहलाता है। दरअसल लेखक ने चम्बल के डाकुओं से अपील के बहाने देश के युवा वर्ग को यह बताने का प्रयास किया है कि ‘जनतंत्र’ के नाम पर किस तरह देश के नेता, सरकारें आम जनता को बेवकूफ बना रहे हैं। असल डाकू तो वो हैं जिन्होंने इस पूरे देश को चम्बल घाटी में परिवर्तित कर दिया है। इसलिए लेखक अंत में चम्बल के डाकुओं से यह अपील करते हैं कि तुम्हें भी वहां रहने की कोई आवश्यकता नहीं है राजधानी आओ ‘जनतंत्र’ का इस्तेमाल करके संसार का सुख लूटो।

      ‘फिलहाल’ पत्रिका ने  कविताओं, नाटकों एवं लेखों के माध्यम से नक्सलवादी आन्दोलन की तत्कालीन तस्वीर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने के साथ-साथ उन गतिविधियों पर भी प्रकाश डालने का प्रयास किया जो इस आन्दोलन के दौरान चर्चा का विषय बनी हुईं थीं और जिन्होंने केवल साहित्य में ही नहीं बल्कि समाज में भी एक नयी बहस शुरू कर दी थी। नक्सलवादी आन्दोलन धीरे-धीरे शिक्षित युवा वर्ग पर अपना गहरा प्रभाव छोड़ रहा था। स्कूल-कॉलेजों में पढ़ने वाले विद्यार्थी भी अब सड़कों पर आकर किसान-मजदूरों के अधिकारों के लिए प्रशासन से लोहा ले रहे थे। पढ़ाई का बहिष्कार, पुलिस, प्रशासन आदि से छात्रों की मुठभेड़ आम बात हो गयी थी। लेकिन छात्रों का आक्रोश दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा था। इसी आक्रोश में आकर एक दिन कुछ छात्रों ने जाकर रवीन्द्रनाथ की मूर्ति को तोड़ दिया। इसके बाद केवल साहित्यिक गलियारों में ही नहीं बल्कि पूरे भारत वर्ष में यह चर्चा का विषय बन गया कि छात्रों के द्वारा रवीन्द्रनाथ की मूर्ति को तोड़ना सही था या गलत। ‘फिलहाल’ में ‘रवीन्द्रनाथ की मूर्ति’ के सम्बन्ध में सबसे पहला लेख प्रसिद्ध अभिनेता उत्पल दत्त का प्रकाशित हुआ। हालांकि उत्पल दत्त का यह आलेख, आलेख कम कहानी अथवा नाटक के अधिक निकट जान पड़ता है क्योंकि उत्पल दत्त पात्रों के माध्यम से पूरी परिस्थिति का विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। इस कहानी/नाटक में तीन पात्र हैं पहला, स्वयं उत्पल दत्त जिन्होंने रवीन्द्रनाथ को ज्यादा नहीं पढ़ा इसलिए मूर्ति भंजन के सम्बन्ध में उनकी कोई स्पष्ट राय नहीं है, दूसरे जपेन दा जो रवीन्द्रनाथ की मूर्ति टूटने से अचंभित हैं और उन्हें दुःख है कि आज के विद्यार्थी रवीन्द्रनाथ को केवल एक सामन्तवादी लेखक/विचारक के रूप में देख रहे हैं और तीसरा,राजेन जो उस विद्यार्थी वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है जिन्होंने उस मूर्ति को तोड़ा। राजेन जैसे विद्यार्थी वर्तमान शिक्षा प्रणाली से खुश नहीं हैं। उसे ऐसा लगता है किताबों में जो लिखा है वह झूठ है, शासन द्वारा हम पर थोपा हुआ है इसलिए वह शिक्षा प्रणाली को बदलना चाहता है। स्कूल-कॉलेज के आंगन में खड़ी रवीन्द्रनाथ या विद्यासागर की मूर्ति को विद्यार्थी केवल इसलिए नहीं तोड़ रहे क्योंकि वह पूंजीपति या जमींदार वर्ग से आ रहे हैं बल्कि वह पुराने आदर्शों और व्यवस्था को समाप्त करके नए का आह्वान करना चाहते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो राजेन रवीन्द्रनाथ की मूर्ति को तोड़कर उनके विचारों और सिद्धांतों से आज़ाद होना चाहता है जो उसे बरसों से कैद किये हुए हैं। इसलिए वो मूर्ति पर हुए आक्रमण को सही ठहराते हुए कहता है – “यह तो मार्क्सवाद में सत्य है कि साहित्य,दर्शन, कानून आदि उत्पादन के संबंधों की नींव पर ही खड़े हैं| अगर नींव बदलती है तो उस पर खड़े विचार भी बदलते हैं। नयी समाज-व्यवस्था में पुराने विचार नष्ट हो जाते हैं, इसलिए तो रवींद्रनाथ पर ऐसा आक्रमण है।”12.  लेकिन जपेन दा राजेन की बातों से सहमत नहीं हैं। वह राजेन को डांटते हुए कहते हैं कि –“नींव बदलने से पुराने विचारों की इमारत भी बदल जाती है ? भाषा विचारूपी इमारत का एक मुख्य खम्भा है। तो क्या क्रान्ति के बाद भाषा भी बदल जाती है? फ़्रांस की क्रांति के बाद क्या वहां भाषा बदल गयी ? अक्टूबर क्रांति के बाद क्या लेनिन रुसी भाषा में बात नहीं करते थे ? स्तालिन ने बताया था कि मनुष्य की रचना जो उस युग को प्रतिबिंबित करती है, हर युग के लिए होती है| इसलिए तो नींव बदलजाने पर भी शेक्सपीयर और होमर भुला नहीं दिए गए बल्कि और भी ज्यादा सामने आये|”13.  जपेन दा के द्वारा लेखक यहाँ यह कहना चाह रहा है कि नयी व्यवस्था की स्थापना के लिए यह आवश्यक नहीं कि पुरानी व्यवस्था को जड़ से मिटा दिया जाए। अर्थात रवीन्द्रनाथ के विचारों से लोगों का  व्यक्तिगत तौर पर विरोध हो सकता है यह भी हो सकता है कि समाज की बदलती हुई परिस्तिथियों के साथ उनके कुछ विचार मेल नहीं खाते हों या पुराने हो गए हों लेकिन इसका यह अर्थ तो नहीं कि रवीन्द्रनाथ की मूर्ति को तोड़कर या उन्हें जमींदार वर्ग का साहित्यकार घोषित करके आप उनके सम्पूर्ण साहित्य से मुंह मोड़ लेंगे। किसी भी विचारक या साहित्यकार का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि वह किस वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं बल्कि उनके सम्पूर्ण साहित्य का बारीकी से विश्लेषण करना भी आवश्यक है। रवीन्द्रनाथ की कुछ कविताओं का उदाहरण देते हुए जपेन दा राजेन से कहते हैं – “उनके लिखे हुए स्वदेशी गाने हमारी कीमती संपदा हैं : ऐसी सहज भाषा में जनता के दिल की बात क्रान्ति के लिए और कोई नहीं कह पाया।…..शान्ति और अहिंसा को भूलते हुए उन्होंने ही तो कहा –

भीषण प्रलय संगीत जगाओ

जगाओ रे, जगाओ इस भारत में

क्या तुम बहरे हो ? नहीं सुना तुमने ?

रिक्त है जो सर्वहारा

है विश्व में सर्वजयी,

गर्वमयी भाग्यदेवी के क्रीतदास नहीं।”14.

उत्पल दत्त ने अपनी इस नाटिका/ कहानी में रवीन्द्रनाथ की कविताओं के कई उदाहरण प्रस्तुत कर यह प्रमाणित करने का प्रयास किया है कि  नक्सलवादी आन्दोलन के दौरान रवीन्द्रनाथ के लेखन और व्यक्तित्त्व पर जो आरोप लगाये गए हैं वो निराधार हैं। जो लोग यह कहते हैं कि रवींद्रनाथ ने अपने साहित्य में कभी किसानों की या उनकी क्रान्ति की बात नहीं की दरअसल वह सभी न तो रवीन्द्रनाथ को समझ पाए और न ही उनके विचारों का सही रूप में मूल्यांकन कर पाए। जहाँ तक बात शिक्षा प्रणाली की है तो रवीन्द्रनाथ तो स्वयं इस परम्परागत शिक्षा प्रणाली के विरुद्ध रहे हैं| उन्होंने कभी-भी किताबी ज्ञान को पूर्ण शिक्षा माना ही नहीं, वह बेसिक शिक्षा-प्रणाली के खिलाफ थे और इसलिए उन्होंने विश्वभारती जैसे संस्थान की स्थापना की ताकि भविष्य में विद्यार्थी केवल किताबों पर आश्रित न रहें बल्कि व्यावहारिक ज्ञान के बल पर अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकें।

उत्पल दत्त के इस नाटिका/कहानी के सन्दर्भ में कुछ समीक्षाएं ‘फिलहाल’ में प्रकाशित हुईं थीं। इन समीक्षात्मक लेखों में लेखकों ने उत्पल दत्त के विचारों पर अपनी असहमति व्यक्त करते हुए रवीन्द्रनाथ के लेखन को और मूर्ति तोड़ने के आन्दोलन को एक अलग रूप में व्याख्यायित करने की कोशिश की है। एन. के. सेनगुप्ता अपने लेख ‘रवि ठाकुर की मूर्ति और उत्पल दत्त’ में मूर्ति तोड़ने के अभियान पर अपने विचार प्रकट करते हुए लिखते हैं –“जो लोग इन जन-विरोधी मनीषियों के प्रति एक भक्तिमूलक दृष्टिकोण रखते हैं, मूर्ति तोड़ने के आन्दोलन से और उसके साथ ही सूक्ष्म विश्लेषण और आलोचना और उसके प्रचारकार्य से उनके भी मन में भी एक प्रश्नचिह्न खड़ा हो जाएगा।”15.  उक्त कथन से स्पष्ट है कि रवीन्द्रनाथ या अन्य व्यक्तियों की मूर्तियों के भंजन के पीछे केवल विद्यार्थियों का आक्रोश नहीं था बल्कि इस अभियान का अपना एक अलग ही लक्ष्य था। जो लोग इस आन्दोलन का समर्थन कर रहे थे उनका मानना था कि समाज ने जिन मनीषियों को बड़ी-बड़ी पदवी देकर समाज-सुधारक घोषित किया है असल में वे सभी जन-विरोधी हैं क्योंकि ऐसे समाज-सुधारकों ने कभी-भी किसानों को क्रान्ति के लिए प्रेरित नहीं किया। इसके अलावा मूर्तिभंजन अभियान को बढ़ावा इसलिए दिया गया ताकि जो लोग इन जन विरोधियों को समाज-सुधारक मानते भी हैं उनके मन में भी यह प्रश्न उत्पन्न हो कि आखिर क्यों रवीन्द्रनाथ, राजा राममोहन राय, विद्यासागर जैसे व्यक्तियों की मूर्ति को तोड़ा जा रहा है ? और वजह का पता लगाने के लिए  उनके द्वारा किये गए कार्यों का विश्लेषण किया जाए, उसे नए रूप में व्याख्यायित किया जाए  ताकि नए तथ्य उभरकर सामने आयें और उनपर विचार-विमर्श के नए रास्ते खुलें और जो अंधभक्त इन समाज-सुधारकों की प्रशंसा में लिप्त रहते हैं उनकी आँखें भी सच्चाई देख सकें। ए.के सेनगुप्ता अपने लेख में राजा राम मोहन राय तथा विद्यासागर जैसे व्यक्तियों की छवि एवं कार्य पर प्रश्नचिह्न खड़े करते हुए कहते हैं – “भारत के प्रथम स्वातंत्र्य संग्राम में, जिसे उपनिवेशवादियों ने सिपाही विद्रोह कहा, ….उसमें ‘राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग’ के इन प्रतिनिधियों की क्या भूमिका थी? उस समय का इतिहास गवाही देता है कि उस समय इनकी भूमिका चरम विश्वासघातक और देशद्रोहपूर्ण थी।….. जपेन दा (उत्पल दत्त की नाटिका/कहानी के पात्र) जिस राजा राममोहन राय को भुलाने के लिए राजेन की भर्त्सना करते हैं, उसी राजा राम मोहन राय की रचनाओं से एक-दो उदाहरण देना निश्चय ही अप्रसांगिक नहीं होगा –

राममोहन के अनुसार – ‘किसान और ग्रामीण लोग नितांत मूर्ख होते हैं।’ इसलिए हमारे देश के अभिजात और व्यवसायी वर्ग के लोगों को ‘क्षमता और गुणों के अनुसार ऊँचे पद देकर उन्हें मर्यादा प्रदान करने से ब्रिटिश सरकार के प्रति उन लोगों की भक्ति और बढ़ेगी’। – Ram Mohan Ray works, pp.300.

‘भारतवासियों का सौभाग्य है कि भगवतकृपा से अंग्रेज उनकी देखभाल कर रहे हैं’|”16.

 

           ए. के. सेनगुप्ता राजा राम मोहन राय की तरह ही रवीन्द्रनाथ को भी जमींदार वर्ग का साहित्यकार घोषित करते हुए कहते हैं – “हम लोग क्या रवीन्द्रनाथ की किसी ऐसी रचना से परिचित हैं जो गरीब किसानों से उनके परिचय को ज़ाहिर करती हो ? अथवा रवीन्द्रनाथ का यह दावा, ‘एक समय जब मैं बंगलादेश की नदियों पर घूमते हुए उनके प्राणों की लीला का अनुभव कर रहा था, तब मेरी आंतरिक अनुभूतियों ने अपने आनंद से उन सबके सुख-दुःख के विचित्र आभास को अपने अंतर में संगृहीत करके महीने के बाद महीने लगाकर बंगाल के जिन ग्रामीण चित्रों की रचना की, वैसी पहले किसी ने नहीं की थी|’ (साहित्य-विचार,पृष्ठ-61)

               बेशक, जमींदार रवीन्द्रनाथ के मुंह से हम क्रांतिकारी किसानों की बात सुनेंगे –यह उम्मीद ही गलत है। स्वयंघोषित मानवतावादी जो व्यक्ति नदी-नदी घूमकर ही एक इलाके के लोगों के प्राणों की लीला को अनुभव करने की धृष्टता भरी बात कहता हो उसके मन को क्रांतिकारियों की गतिविधियां कैसे स्पर्श करेंगी ? क्योंकि क्रांतिकारी तो नदियों पर नहीं रहते हैं, वे रहते हैं जनसाधारण के बीच में, गरीब वर्गों के बीच में। अपनी इन सब धारणाओं से ही रवीन्द्रनाथ यह प्रकट कर देते हैं कि विचारों के क्षेत्र में वे किस वर्ग के प्रतिनिधि थे।”17.  ए.के. सेनगुप्ता ने जिस रूप में राजा राम मोहन राय एवं रवीन्द्रनाथ को व्याख्यायित किया है उससे स्पष्ट है कि वह इन दोनों विचारकों को सामंतवादी वर्ग के प्रतिनिधि से अधिक कुछ और नहीं मानते। लेकिन यह यहाँ सवाल उठता है कि उत्पल दत्त ने अपनी कहानी/नाटिका में रवीन्द्रनाथ की जिन कविताओं के अंश उद्धृत किये हैं- उनके संदर्भ में ए.के. सेनगुप्ता ने कुछ क्यों नहीं लिखा या उन कविताओं के अंशों को भी क्यों  व्याख्यायित करके यह साबित नहीं किया कि रवींद्रनाथ द्वारा रचित यह कवितायें भी किसान विरोधी हैं या इनमें भी किसान क्रान्ति की कोई बात नहीं है। ए.के. सेनगुप्ता रवीन्द्रनाथ और राजा राम मोहन राय के जिन पंक्तियों को उद्धृत करके उन्हें सामन्तवादी वर्ग का प्रतिनिधि घोषित कर रहे हैं वह पंक्तियाँ किस संदर्भ में लिखी गयी हैं इसकी विवेचना सेनगुप्ता अपने लेख में नहीं करते। किसी भी व्यक्ति का दृष्टिकोण तब तक स्पष्ट नहीं हो सकता जब तक उसके द्वारा विवेचित विचारों का मूल्यांकन सही संदर्भ में न किया जाए और यहाँ तो सेनगुप्ता कुछेक पंक्तियों का सहारा लेकर दो विचारकों की मानसिकता पर ही प्रश्नचिह्न खड़े कर रहे हैं। यहाँ यह नहीं कहा जा रहा है कि उत्पल दत्त ने जिस रूप में रवीन्द्रनाथ को प्रस्तुत किया है वह सही है और ए.के.सेनगुप्ता ने जिस तरह व्याख्यायित किया है वह गलत। यहाँ प्रश्न है स्पष्टता का। उत्पल दत्त की नाटिका/कहानी में रवीन्द्रनाथ को सीधे जनसाधारण का साहित्यकार घोषित नहीं कर दिया। लेखक ने स्वयं रवीन्द्रनाथ के विचारों को लेकर कई सवाल उठाये। उत्पल दत्त शुरुआत में रवीद्रनाथ को स्वयं एक बुर्जुवा कवि घोषित करते हैं उसके बाद बारी-बारी से रवीन्द्रनाथ की रचनाओं का उदाहरण देते हुए इस सच्चाई से पर्दा उठाते हैं । लेकिन सेनगुप्ता ने अपने समीक्षात्मक लेख की शुरुआत में ही रवीन्द्रनाथ और उन जैसे अन्य सामन्तवादी वर्ग से आने वाले विचारकों को सीधे-सीधे जन-विरोधी घोषित कर दिया जो किसी भी दृष्टि से सही इसलिए नहीं कहा जा सकता क्योंकि ‘जन’ में केवल मजदूर और किसान नहीं आते हैं। उनमें स्त्री.दलित हर वर्ग शामिल है। इसलिए यह कहना कि रवीन्द्रनाथ या राजा राम मोहन राय की मूर्ति इसलिए तोड़ी गयीं क्योंकि वह जन विरोधी थे या जन-साधारण के लेखक/विचारक नहीं थे, यह दृष्टिकोण पूरी तरह से एकांगी है। मूर्ति तोड़ो अभियान दो विचारधाराओं का आपसी टकराव है लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि इस टकराव में एक विचारधारा को पूरी तरह नष्ट करके उसे जन-विरोधी ही घोषित कर दिया जाए। टकराव कुछेक पहलुओं पर हो सकता है जो जायज़ है लेकिन कुछेक मुद्दों को लेकर पूरी विचारधारा या दृष्टिकोण को ही मिटा देना यह किसी भी से न्यायपूर्ण नहीं हो सकता।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि हिंदी साहित्य में नक्सलवादी आन्दोलन की सही एवं स्पष्ट तस्वीर प्रस्तुत करने में ‘फिलहाल’ पत्रिका का विशेष योगदान रहा है। ‘फिलहाल’ उन चुनिन्दा लघु पत्रिकाओं में से एक थी जिन्होंने पत्रिका को अपनी व्यक्तिगत उपलब्धि का साधन न बनाकर उसे जनमानस और साहित्य की सेवा के लिए उपयोग किया। जैसा कि विदित है ‘फिलहाल’ का उद्देश्य था अधिक से अधिक लोगों के साथ जुड़कर उनके सामने ‘नक्सलवादी आन्दोलन’ की वास्तविक तस्वीर पेश कर उन्हें जागरूक करना। जैसे ही ‘फिलहाल’ अपने इस लक्ष्य को साधने में सफल हुई उसका प्रकाशन बंद कर दिया गया।

अन्य लघु पत्रिकाओं में ‘नक्सलवादी आन्दोलन’ की तस्वीर –  ‘फिलहाल’ के अलावा हिंदी की कुछेक ऐसी पत्रिकाएं और थीं जो ‘नक्सलवादी आन्दोलन’ के परिप्रेक्ष्य में अपने विचारों को प्रस्तुत करने में पीछे नहीं थीं| इनमें से ही एक पत्रिका थी वाराणसी से कंचन कुमार के संपादन में निकलने वाली ‘आमुख’। आमुख की शुरुआत सन् 1965 में हुई थी। आमुख के पहले ही अंक में कंचन कुमार ने स्पष्ट तौर पर ज़ाहिर कर दिया था कि यह पत्रिका समाज, साहित्य एवं सभ्यता का अन्धानुकरण करने वाली पत्रिकाओं में से नहीं बल्कि उन प्रतिरोधी आवाज़ों का संकलन है जिनके स्वर को कभी समाज के नाम पर तो कभी सभ्यता के नाम पर हमेशा से कुचला गया है। ‘आमुख’ ने किसान-मजदूरों द्वारा शुरू की गयी क्रांति का पुरज़ोर समर्थन किया। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ‘आमुख’ ने नक्सलबाड़ी के किसान जन उभार के बाद मानो मकसद पा लिया था।18.   कंचन कुमार अपनी पत्रिका के ज़रिये ‘नक्सलवादी आन्दोलन’ का समर्थन करने वाली प्रतिरोधी आवाजों का चित्रण करके न केवल सरकार के खोखले जनतंत्र को बेनकाब कर रहे थे बल्कि  उनकी जनविरोधी नीतियों, आन्दोलन को दबाने के उनके प्रयासों का भी पर्दाफाश कर रहे थे। आमुख के सन् 1969 के अंक में सत्राजित मजुमदार का एक लम्बा नाटक प्रकाशित हुआ था जिसमें उन विद्यार्थियों और अध्यापकों की दशा का वर्णन किया गया जो ‘नक्सलवादी आन्दोलन’ का समर्थन कर रहे हैं। सरकार, विश्वविद्यालय प्रशासन तथा राज्य के पुलिस तीनों मिलकर किस प्रकार आन्दोलन का दमन कर रहे थे और बेकसूरों को गुंडों की संज्ञा देकर कैसे उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा था  इसका सशक्त चित्रण उप-कुलपति और अध्यापक के बीच हुए इन संवादों में हुआ है –

“अध्यापक : (उप-कुलपति से ) उस दिन उन्होंने (पुलिस ने) हमारे कॉलेज में घुसकर अध्यापकों को पीटते हुए बाहर निकाल दिया। उनमें से एक बूढ़े अध्यापक और अध्यापिका भी थीं।

पुलिस अधिकारी – आप भी कैसी बातें करते हैं। मेरी पुलिस कभी-भी इस तरह का काम नहीं कर सकती। भला, अध्यापक और गुंडों को नहीं पहचानते !

            (प्रॉक्टर ने उपकुलपति के कान में कुछ कहा )

अध्यापक – लेकिन वो बूढ़े अध्यापक और अध्यापिका अभी- भी अस्पताल में हैं।

उपकुलपति – देखो, यह मामला मैं अच्छी तरह समझ गया। ये अगर नहीं होते तो हमारा जाने क्या हाल होता ? मुझे विश्वस्तर-सूत्र से पता चला है कि वे सारे गुंडे लड़के पुलिस की वर्दी पहनकर तुम्हारे अध्यापकों को पीट आये हैं। यह बड़े दुःख की बात है, मगर क्या किया जाये ? इन गुंडों को मारने के लिए ही तो यह सब किया जा रहा है। और यह लोग इतना स्वार्थ त्याग कर रहे हैं। तुम लोग भी थोड़ा सा कर लो तो हर्ज़ क्या है।”19.

    स्पष्ट है कि ‘नक्सलवादी आन्दोलन’ की चिंगारी को दबाने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन और राज्य की पुलिस ने सच पर झूठ का मुखौटा चढ़ाकर सर्वप्रथम उन बेगुनाहों को अपना निशाना बनाया जिनका इस आन्दोलन से दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं था ताकि लोगों के मन में इस आन्दोलन का समर्थन करने वालों के प्रति संदेह उत्पन्न हो जाए और वह इस आन्दोलन की वास्तविकता को जाने बिना इससे दूर हो जाएँ। और ऐसा हुआ भी लेकिन ‘आमुख’ जैसे प्रतिरोधी संकलनों ने शिक्षित युवा वर्ग को ‘नक्सलवादी आन्दोलन’ के वास्तविक परिदृश्य से परिचित कराकर उनके मन में उत्पन्न कई भ्रांतियों को दूर कर उन्हें नयी राह प्रदान की।

‘आमुख’ के अलावा कुछेक पत्रिकाएँ ऐसी भी थीं जिन्होंने प्रत्यक्ष रूप से तो कभी ‘नक्सलवादी आन्दोलन’ के सम्बन्ध में अपने स्पष्ट विचार प्रस्तुत नहीं किये लेकिन साहित्य विशेषकर, कविताओ के ज़रिये नक्सल क्रांति को विवेचित करने का प्रयास किया है। इन पत्रिकाओं में प्रमुख हैं – युवा, लहर, नई धारा आदि। ‘युवा’ में प्रकाशित कविता का उदाहरण कुछ इस प्रकार है –

“कारागार में….

हथकड़ी पड़े हाथ आकाश में उठेंगे

अत्याचारी शासन के विरुद्ध

कारागार में

प्रकाश के गर्जन से तिमिर का होगा नाश

सबकी मुक्ति के लिए

कारागार में

अन्नहीन बच्चों के लिए

रोटी का युद्ध शुरू

भूख और रोग से ग्रस्त

बच्चों के लिए ….”20.

प्रस्तुत कविता जेलों में बंद उन आन्दोलनकारियों का आह्वान है जो अब मुक्ति के लिए एक नयी क्रांति की शुरुआत करने जा रहे हैं। दरअसल यह कविता एक क्रांतिकारी के उस संकल्प को दर्शा रही जो कभी प्रशासन के सामने घुटने नहीं टेकता बल्कि हर हालत में उसके खिलाफ लड़ने के लिए तैयार रहता है। यह कविता उन हजारों विद्यार्थियों, अध्यापकों के संघर्ष को प्रतिबिंबित कर रही है जिन्होंने जेल में रहते हुए प्रशासन के खिलाफ अपने आन्दोलन को जारी रखा।

 निष्कर्ष –  उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि नक्सलवादी आन्दोलन के प्रकृति से हिंदी पाठकों को अवगत कराने में हिंदी की कुछेक पत्रिकाओं (फिलहाल,आमुख, युवा) ने सराहनीय योगदान दिया है। लेकिन इस विश्लेषण के दौरान यह बात भी सामने आई कि लघु पत्रिका आन्दोलन के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली अधिकतर पत्रिकाओं (कल्पना, अणिमा, संचेतना आदि ) ने इस विषय पर अपनी चुप्पी को बनाये रखा। इस चुप्पी को बनाये रखने एक कारण यह हो सकता है कि यह पत्रिकाएं ‘नक्सल क्रान्ति’ के पीछे जो विचारधारा हो उससे सहमत न हों। लेकिन अगर यह पत्रिकाएं वाकई में ‘नक्सल क्रान्ति’ के किसी पहलू को लेकर आशंकित थीं या उससे असहमत थीं तो इन्हें उस असहमति से पाठकों को रूबरू कराना चाहिए था न कि उस पर चुप रहकर लघु पत्रिका आन्दोलन के विज़न पर सवालिया निशान खड़े करने चाहिए थे। कोई भी क्रान्ति या आन्दोलन एक विशेष वर्ग द्वारा शुरू अवश्य किया जाता है लेकिन उसकी चिंगारी पूरे देश को अपने में समेट लेती है इसलिए यह आवश्यक है कि पत्रिकाएँ खासकर लघु पत्रिकाएँ जो जनसाधारण के हित के लिए कार्य करने का दावा करती हैं वह अपनी भूमिका को निष्पक्ष तरीके से निभाएं। ज़ाहिर है कि समाज में होने वाली प्रत्येक गतिविधि की बात यहाँ नहीं की जा रही लेकिन जो गतिविधि पूरे राष्ट्र को प्रभावित कर रही है उन पर पत्रिकाओं में बात होना आवश्यक है|

संदर्भ

  1. http://gopalpradhan.blogspot.com/2016/03/blog-post.html
  2. तलवार,वीर भारत, ‘नक्सलबाड़ी के दौर में’, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण -2007, पृष्ठ संख्या – 15.
  3. http://gopalpradhan.blogspot.com/2016/03/blog-post.html
  4. तलवार,वीर भारत, ‘नक्सलबाड़ी के दौर में’, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण -2007, पृष्ठ संख्या – 564.
  5. वही.
  6. वही, पृष्ठ संख्या- 586.
  7. वही, पृष्ठ संख्या – 593.
  8. वही, पृष्ठ संख्या – 605.
  9. वही, पृष्ठ संख्या – 606-607.
  10. वही, पृष्ठ संख्या – 589-590.
  11. वही, पृष्ठ संख्या – 590.
  12. वही, पृष्ठ संख्या – 546.
  13. वही, पृष्ठ संख्या – 546-547.
  14. वही, पृष्ठ संख्या – 549-550.
  15. वही, पृष्ठ संख्या – 558.
  16. वही, पृष्ठ संख्या – 559.
  17. वही, पृष्ठ संख्या – 560-561.
  18. http://sanhati.com/wp-content/uploads/2015/08/aamukh_intro.pdf
  19. ‘आमुख’, संपा. कंचन कुमार, संकलन-6, वर्ष-1969, पृष्ठ संख्या – 8-9. (पत्रिका का लिंक-http://sanhati.com/wp-content/uploads/2015/10/vol006.pdf).
  20. उद्भ्रांत, ‘लघु पत्रिका आन्दोलन और युवा की भूमिका’, जवाहर पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण -2009, पृष्ठ संख्या –285

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मणिपुर में हिंदी पत्रकारिता- देवराज

2020-10-06 (1)-b0dba175

हिंदीतरभाषी क्षेत्रों में हिंदी पत्रकारिता
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मणिपुर में हिंदी पत्रकारिता

देवराज

पृष्ठभूमि :
मणिपुर में हिंदी पत्रकारिता की पृष्ठभूमि का गहरा संबंध ‘आज़ाद हिंद फौज’ के विजय अभियान और दूसरे विश्व-युद्ध से है। दक्षिण-पूर्व एशिया के जिस हिस्से में विश्व-युद्ध लड़ा गया, उसमें भारत का मणिपुर-अंचल भी आता है। आज़ाद हिंद फौज ने जापानी सेना के सहयोग से भारत को अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद से मुक्त कराने के लिए म्यांमार की ओर से अभियान शुरू किया था। सन 1944 में आज़ाद हिंद फौज के कर्नल शौक़तअली मलिक ने मणिपुर के प्रसिद्ध सांस्कृतिक नगर, मोइराङ् पहुँच कर स्वतंत्रता-ध्वज फहरा दिया था। भारत के किसी अंचल के, साम्राज्यवाद से मुक्त होकर स्वतंत्रता की वायु में साँस लेने की यह पहली घटना थी।
कहा जाता है कि साम्राज्यवाद से मुक्ति के अपने ऐतिहासिक-अभियान की जानकारी जनता तक पहुँचा कर सुभाषचंद्र बोस स्वतंत्रता-संग्राम का विस्तार करना चाहते थे। लेकिन उनके पास ऐसे लोग नहीं थे, जो मणिपुरी तथा जनजातीय भाषाओं में सामग्री निर्मित कर सकें। तब उन्होंने हिंदी भाषा में पर्चे छपवा कर बँटवाने का निश्चय किया। आज़ाद हिंद फौज के सैनिक अभियान के काफी पहले ही मणिपुर के दक्षिणी भू-भाग के गाँवों-नगरों में ये पर्चे पहुँच चुके थे। सुभाषचंद्र बोस की इस सूझबूझ का यह लाभ हुआ कि म्यानमार से सटे दक्षिण मणिपुर के गांवों और कस्बों में अनेक लोग आज़ाद हिंद फौज का सहयोग करने को तैयार हो गए। मणिपुर के लोगों द्वारा हिंदी का कामचलाऊ ज्ञान प्राप्त करने के मूल में कुछ रोचक कारण हैं।
हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग ने सन 1928 में मणिपुर में हिंदी प्रचार आंदोलन प्रारम्भ कर दिया था। उसके बाद सन 1939 में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की राज्य-शाखा के रूप में इम्फाल में मणिपुर राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की स्थापना हुई। इन दोनों संस्थाओं के भी बहुत पहले धार्मिक यात्राओं के कारण मणिपुर में हिंदी का प्रवेश हो चुका था। इस प्रकार आज़ाद हिंद फौज के आने के पूर्व ही मणिपुर के अधिकांश नगरों और गाँवों में हिंदी जानने वाले कुछ-न-कुछ लोग मिलने लगे थे। इन्होंने ही सुभाषचंद्र बोस के हिंदी पर्चों की सामग्री का मणिपुरी तथा जनजातीय भाषाओं में अनुवाद करके अपने आसपास के लोगों को स्वाधीनता-संग्राम की जानकारी दी। इससे जो जागरण आया, उसने साधारण जनता के मन में विश्वयुद्ध के समाचारों के लिए ललक भी जगाई, जिसने अद्भुत ढंग से हिंदी पत्रकारिता की पृष्ठभूमि का निर्माण किया। उस समय मणिपुरी पत्रों का क्षेत्र सीमित था, जबकि अँग्रेजी समाचारपत्र ब्रिटिश सत्ता के प्रभाव में होने के चलते निष्पक्ष समाचार नहीं दे पा रहे थे। इसका लाभ हिंदी को मिला। प्रारंभिक हिंदी-सेवी, पं. ललिता माधव शर्मा मुंबई से ‘श्रीवेंकटेश्वर समाचार’ मंगा कर लोगों को सुनाने लगे। जो हिंदी पूरी तरह समझ नहीं पाते थे, उनके लिए वे समाचारों का मणिपुरी में अनुवाद कर देते थे। मणिपुर में हिंदी पत्रकारिता के इतिहास की सामग्री की खोज में मैं पं. ललितामाधव शर्मा की सुपुत्री किरणमाला शर्मा से मिला था। उन्होंने प्रयाग में महादेवी वर्मा के घर रह कर हिंदी का अध्ययन किया था और मणिपुर लौट कर आजीवन हिंदी-शिक्षण से जुड़ी रही थीं। किरणमाला शर्मा ने बताया था कि श्रीवेंकटेश्वर समाचार डाक से आता था । शाम को आस-पास के अनेक लोग ललितामाधव शर्मा के घर एकत्र हो जाते थे और शर्माजी उन्हें समाचार पढ़कर सुनाते थे। प्रारंभ में उन्होंने अनुवाद पद्धति का सहारा लिया, थोड़े दिनों बाद अनुवाद करने की आवश्यकता नहीं रही। समाचार जानने की व्याकुलता ने हिंदी शब्दों के अर्थ आसानी से लोगों के मस्तिष्क में बैठा दिए। इससे लोगों ने हिंदी सीखने की प्रेरणा भी ली और हिंदी पत्रकारिता की भूमिका भी बनी।

इतिहास :
मणिपुर में हिंदी की पहली पत्रिका द्वितीय विश्वयुद्ध के अंतिम दिनों में प्रकाश में आई। यह हस्तलिखित रूप में प्रारंभ हुई थी । दुर्भाग्य का विषय है कि वर्षों की श्रमसाध्य खोज के पश्चात् भी न तो इस पत्रिका का नाम पता चल सका और न इसके संपादक का ही पूरा नाम ज्ञात हो सका। छोटी और महत्वहीन ही सही, लेकिन हमारा ध्यान हिंदी पत्रकारिता के इतिहास की एक त्रासदी की ओर जाना चाहिए। यह बताने की आवश्यकता नहीं कि विश्वयुद्ध के कारण मणिपुर का जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो गया था, जिसके चलते सैकड़ों घटनाओं के ठोस प्रमाण और संस्थाओं के पुराने अभिलेख पूरी तरह नष्ट हो गए। उन्हीं में, इस प्रथम हिंदी पत्रिका के अंक भी हमेशा के लिए काल के गाल में समा गए । इम्फाल के पाओना बाज़ार स्थित ठाकुरबाड़ी के स्वामी हिंदी और संस्कृत के प्रकांड विद्वान पं. पूर्णानंद सरस्वती उस पत्रिका के प्रकाशन में सहयोगी थे। मैं उनके जीवन की संध्या में उनसे मिल सका। नियति का यह क्रूर परिहास रहा कि तब तक पंडित जी पर वार्धक्य प्रहार कर चुका था और उनकी स्मृति बहुत क्षीण हो चुकी थी। मैं दिन-दिन भर उनके पास बैठता था। आशा थी कि उन्हें किसी न किसी क्षण मणिपुर में हिंदी पत्रकारिता का प्रारंभ करने वाली पत्रिका के संबंध में सही-सही और पूर्ण जानकारी की स्मृति हो आएगी, किंतु यह आशा पूरी तरह सफल नहीं हो सकी। किसी-किसी क्षण तड़ित-कौंध की तरह एक-एक कर जो बातें उन्हें याद आई, उनसे केवल इतनी ही इतिहास-शृंखला बन सकी कि द्वितीय विश्वयुद्ध के अंतिम वर्षों में इम्फाल से एक हस्तलिखित पत्रिका प्रकाशित होनी प्रारंभ हुई थी। उसके संपादक एक जैन सज्जन थे। वे पाओना बाजार, इम्फाल के जैन मंदिर में पुरोहित का कार्य करते थे। उन्होंने समाचार तथा सामाजिक पक्षों पर लोगों को जानकारी देने के लिए यह प्रयास किया था। पत्रिका के प्रथम अंक की केवल पच्चीस प्रतियाँ प्रकाशित की गई थीं। ठाकुरबाड़ी जैन मंदिर के एकदम निकट है, अत: पूर्णानंद सरस्वती का जैन-पुरोहित से परिचय होना स्वाभाविक था। दोनों की रुचियाँ भी समान थीं, इसलिए जब एक हिंदी पत्रिका प्रारंभ करने की योजना बनी, तो पूर्णानंद जी ने सामग्री संकलन के साथ-साथ हस्त-लिखित प्रतियाँ तैयार करने और वितरण के कार्य में सहयोग का दायित्व निभाया। पत्रिका के अंक भी सहयोग के आधार पर, अर्थात एक पाठक द्वारा दूसरे पाठक को देकर पढ़े जाते थे। विश्व-युद्ध और साम्राज्यवाद के विरुद्ध सामाजिक जागरण तथा हिंदी पत्रकारिता के इस संबंध को समझा जाना चाहिए।
मणिपुर से दूसरी हिंदी पत्रिका सन् 1954-55 में ‘साइक्लोस्टाइल्ड’ रूप में प्रकाशित हुई। इसके प्रकाशन का श्रेय मोहनबिहारी, सिद्धनाथ प्रसाद, रामनाथ प्रसाद और झाबरमल जैन को है। पत्रिका का अधिकांश भार श्री मोहनबिहारी के कंधों पर था, किंतु संपादन में मुख्य भूमिका सिद्धनाथ प्रसाद की थी। सामग्री एकत्र हो जाने पर साइक्लोस्टाइल्ड की जाती थी। मुखपृष्ठ कभी सिद्धनाथ प्रसाद और कभी रामनाथ प्रसाद बनाते थे। इस पत्रिका का नाम ‘’कामाख्या न्यूज एक्सप्रेस’’ था। मोहनबिहारी और सिद्धनाथ प्रसाद कविता-कहानियाँ रचते थे, जिन्हें इस पत्रिका में स्थान दिया जाता था। इसी के साथ समाचार और सामाजिक विषयों पर जानकारी रहती थी। पत्रिका के वितरण और भागदौड़ के कार्य मुख्यत: झाबरमल जैन के जिम्मे थे। ‘कामाख्या न्यूज एक्सप्रेस’ द्वि-भाषी (हिंदी-अंग्रेजी) साप्ताहिक पत्रिका थी। कभी-कभी इसमें अनूदित सामग्री का प्रकाशन भी होता था और कभी राजस्थानी (मुख्यत: मारवाड़ी) की सामग्री भी दी जाती थी। खोजकर्ता को झाबरमल जैन, सिद्धनाथ प्रसाद और रामनाथ प्रसाद ने पत्रिका की सामग्री की प्रकृति के साथ यह जानकारी भी दी थी कि इसके मुखपृष्ठ पर कभी ‘त्रिशूल’ और कभी ‘कामाख्या’ का रेखाचित्र भी दिया जाता था।
मणिपुर में प्रथम मुद्रित पत्रिका 15 अगस्त, सन् 1960 में नागरी लिपि प्रचार सभा द्वारा प्रकाशित की गई। ‘आधुनिक’’ नामक इस साप्ताहिक पत्रिका को तरूण प्रेस (स्वराज प्रेस, उरिपोक, इम्फाल) में छापे जाने का निश्चय किया गया। इसके संपादक बी. नयन शर्मा एवं सी-एच. निशान सिंह थे। प्रारंभ में प्रकाशन-संस्था और संपादक मंडल को आर्थिक कठिनाइयों का अनुमान नहीं था, किंतु जब धन की व्यवस्था नहीं हो सकी, तो इसका दूसरा अंक मासिक के रूप में और तीसरा त्रैमासिक के रूप में प्रकाशित किया गया। इन अंकों के धन की व्यवस्था निशान सिंह ने अपने प्रयास से की। शायद इसका प्रकाशन ही निशान सिंह ने अपने उत्साह के कारण, ‘घर फूँक तमाशा’ देखने की राह पर करवाया था, सो साप्ताहिक से त्रैमासिक तक आते-आते उन्होंने सचमुच अपना घर फूँक लिया और जब छावन भी बाकी न रहा, तो हताश निशान सिंह संपादकी छोड़कर हिंदी-मणिपुरी अनुवाद कार्य में जुटकर राष्ट्र और राष्ट्रभाषा की सेवा करने लगे। आधुनिक का एक अंक खोजकर्ता को मिला था, जिसे उसने सन 1985 में उत्तर प्रदेश के नजीबाबाद नगर में आयोजित लेखक-सम्मेलन के अवसर पर लगी प्रदर्शनी में बाबा नागार्जुन और सम्मेलन-संयोजक प्रेमचंद्र जैन के कहने पर दर्शनार्थ रखा था। वहाँ से कोई उत्साही पाठक वह अंक अपने साथ ले गया, जो संभवत: उसके व्यक्तिगत पुस्तकालय की शोभा बढ़ा रहा होगा।
सन् 1964 में ’मणिपुर शुध्दि संगठन शिक्षा सम्मेलन’’ द्वारा ‘’सम्मेलन गजट’’ नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन किया गया। इसके संपादक के. ब्रजमोहन देव शर्मा थे और इसका उद्देश्य हिंदी के माध्यम से मणिपुरी जीवन व संस्कृति को सारे भारत के सामने लाना था। ‘सम्मेलन गजट’ का प्रवेशांक तीन भाषाओं –हिंदी, मणिपुरी व अंग्रेजी में छापा गया था। कुछ अंक प्रकाशित होने के बाद यह पत्रिका भी बंद हो गई । के. ब्रजमोहन देव शर्मा ने ही सन् 1972 में ‘नागरिक-पंथ’ नाम से एक हिंदी-मणिपुरी दैनिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया। यह बी.डी. प्रेस उरिपोक, इम्फाल से प्रकाशित किया गया। काफी वर्ष तक वहाँ से प्रकाशित होने के बाद यह नाओरेमथोड़् इम्फाल से प्रकाशित होने लगा। नागरिक पंथ, दैनिक होने के कारण मणिपुर के जीवन में अपेक्षाकृत अधिक हस्तक्षेप कर सका। इसके माध्यम से थोड़ी मात्रा में ही सही, प्रतिदिन हिंदी की सामग्री पाठकों को मिलने लगी। इस लेखक ने अपने दीर्घकालीन मणिपुर प्रवास में सन् 1990 के पश्चात् मणिपुरी भाषा की फिल्मों की समीक्षा प्रारंभ की थी। इनमें से अधिकांश समीक्षाएँ नागरिक पंथ में प्रकाशित हुई थीं। हिंदी फिल्म-समीक्षा की तर्ज़ पर मणिपुरी फिल्मों के विषय में हिंदी में किया जानेवाला यह प्रथम प्रयास था। गुवाहाटी (असम) और अन्य स्थानों से प्रकाशित होने वाले सभी दैनिक समाचारपत्र सातवें दशक के बाद ही अस्तित्व में आए, अंत: नागरिक पंथ को पूर्वोत्तर भारत में दैनिक हिंदी पत्रकारिता के प्रारंभ का श्रेय भी दिया जाना चाहिए।
सन् 1973 में इम्फाल की साहित्यिक संस्था ‘चिंतना’ ने एक पत्रिका प्रकाशित की। इस पत्रिका का नाम ‘चिंतक’ था तथा इसके संपादक आकाशवाणी इम्फाल में कार्यरत डॉ. सुशीलकांत सिन्हा थे। इसके प्रकाशन का उद्देश्य राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ बनाना और एक वैचारिक आंदोलन की शुरुआता करना घोषित किया गया था। प्रथम अंक से इस दृष्टिकोण की पुष्टि भी होती है। आशा थी कि यह अभियान गति पकड़ेगा, किंतु एक अंक के पश्चात् यह पत्रिका आगे नहीं चल सकी।
सन् 1976 में राधागोविन्द थोङ्गाम के प्रयास से उन्हीं के संपादन में ‘हिंदी शिक्षक दीप’ नामक पत्रिका का प्रकाशन ‘’अखिल मणिपुर हिंदी शिक्षक संघ’’ ने किया। इस पत्रिका का मुद्रण ‘दि मणिपुर गीता प्रेस, शिङजमै बाजार, इम्फाल’ में होता था । इसका मुख्य उद्देश्य हिंदी भाषा का प्रचार और मणिपुर राज्य के हिंदी शिक्षकों की समस्याओं को प्रकाश में लाना था। मणिपुर से प्रकाशित हिंदी पत्रिकाओं में यह पहली थी, जिसमें पर्याप्त मात्रा में कविताएँ, भाषा संबंधी लेख, कला व संस्कृति संबंधी सामग्री और सामाजिक समस्याओं पर आलोचनात्मक सामग्री का प्रकाशन किया गया। प्रवेशांक की भव्यता के अनुरुप ही ‘हिंदी शिक्षक दीप’ का दूसरा अंक भी प्रकाशित हुआ, किंतु विपरीत परिस्थितियों के कारण तीसरा अंक प्रकाशित होने का अवसर नहीं आया । फिर भी इस पत्रिका ने उस सपने को एक सीमा तक अवश्य पूरा किया, जिसे ललितामाधव शर्मा ने बिना कोई पत्रिका निकाले और जैन मंदिर के पुरोहित उन अज्ञातनामा जैन सज्जन ने हस्तालिखित पत्रिका निकाल कर देखा था।
सन् 1977 में फुराइलातपम गोकुलानंद शर्मा के संपादन में ‘पर्वती वाणी’ नाम से एक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इसका प्रथम अंक दिसंबर, 1977 में छपा । प्रवेशांक का मुद्रण ‘मॉडर्न प्रिंटर्स, गांधी एवेन्यु, इम्फाल’ के लिए ‘आदिम जाति हिंदी प्रेस, मिनुथोड़् इम्फाल’ द्वारा किया गया। ‘पर्वती वाणी’ मणिपुर से प्रकाशित ऐसी पहली पत्रिका थी, जिसने अपना केंद्रीय लक्ष्य हिंदी भाषा का प्रचार घोषित किया। यह मणिपुर राज्य की जनजातियों और अनुसूचित जातियों के लोगों के मध्य हिंदी का प्रचार-प्रसार करना चाहती थी। उन दिनों इसके संपादक गोकुलानंद शर्मा ‘नागा हिंदी विद्यापीठ’ के माध्यम से हिंदी प्रचार अभियान में जुटे हुए थे। यह पत्रिका तीन अंको तक छापी जाती रही, किंतु भारत सरकार ने इसके नाम को स्वीकृत नहीं दी। शर्माजी पत्रिका निकालने का संकल्प कर चुके थे, अत: उन्होंने इसका नाम बदलकर अपने मार्ग पर बढ़ने का निश्चय किया। मार्च/अप्रैल 1978 से पर्वती वाणी के स्थान पर ‘पूर्वी वाणी’ नामक पत्रिका प्रकाशित होने लगी । संपादक, प्रकाशक, मुद्रक, उद्देश्य आदि वही के वही रहे। यह पत्रिका सन् 1980 तक छपती रही। इसके पश्चात किसी कारण इसका प्रकाशन स्थगित हो गया।
सन् 1980 में फुराइलात्पम गोकुलानंद शर्मा के संपादन में ‘युमशकैश’ नामक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। ‘मणिपुरी हिंदी शिक्षक संघ, इम्फाल’ द्वारा प्रकाशित यह पत्रिका हिंदी प्रचार के साथ-साथ साहित्य और संस्कृति के विकास को भी समर्पित थी। यह प्रवेशांक (1980) से लेकर संपादक के देहांत (2017) तक प्रकाशित होती रही। इस लेखक ने मणिपुर पहुँचने (1985) के बाद से ही इस पत्रिका के सलाहकार के रूप में कार्य किया। युमशकैश ने मणिपुर राज्य में हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में सैंतीस वर्सः तक निरंतर प्रकाशित होते रहने का कीर्तमान स्थापित किया। फुराइलात्पम गोकुलानंद शर्मा ने इसका नाम अपने जन्मवार (युमशकैश, अर्थात बुधवार) के आ्रधार पर रखा था। यह मासिक रूप में प्रकाशित होने वाली ऐसी पत्रिका बनी, जिसने भाषा-शिक्षण का कार्य भी किया। इस पत्रिका के माध्यम से पारिभाषिक शब्दावली तैयार करने की योजना पर भी कार्य किया गया। युमशकैश को मणिपुर की कुछ हिंदी प्रचार संस्थाओं में घुस आई अनियमितताओं और उन्हें विकसित करने में मुख्य भूमिका निभाने वाले केंद्र सरकार के हिंदी से जुडे अधिकारियों के विरुद्ध आंदोलन प्रारंभ करने का श्रेय भी प्राप्त है। हिंदी क्षेत्रों में युमशकैश को पर्याप्त सम्मान मिला और उसके संपादक को अंतरराष्ट्रीय कला एवं संस्कृति परिषद, नजीबाबाद, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ तथा केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा द्वारा सम्मानित किया गया।
सन् 1983 में ‘अखिल मणिपुर हिंदी शिक्षक संघ’ द्वारा ‘कुंदो परेङ’ नामक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया गया। कुंदो परेड़् का अर्थ है—कुंद पुष्प की माला। यह पत्रिका अपने नाम के अनुरूप भाषा रूपी पुष्पों की माला में हिंदी भाषा पुष्प को विशेष स्थान प्रदान करते हुए अपने मार्ग पर आगे बढ़ रही है। यह प्रारंभ में षट्मामिक थी। बाद में इसे त्रैमासिक कर दिया गया और कुछ वर्षों बाद यह अनियतकालीन हो गई। इसका कारण आर्थिक साधनों का अभाव है। ‘कुंदो परेङ’ के प्रवेशांक का संपादकीय मणिपुरी भाषा में प्रकाशित हुआ था। यह क्रम दो वर्ष तक चला। इस पत्रिका का ‘हिंदी सेवक समान अंक’ पर्याप्त चर्चित हुआ। कुंदो परेङ के पहले और दूसरे अंक का संपादन एस. कुलचंद्र शर्मा शास्त्री ने किया था। बाद में श्री बी. नोदियाचाँद सिंह इसका संपादन करने लगे।
14 सितंबर 1985 को ‘मणिपुर हिंदी परिषद पत्रिका’ (मासिक) के प्रकाशन के साथ मणिपुर राज्य की हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में एक नए युग की शुरुआत हुई । इसकी योजना इस लेखक सहित इबोहल सिंह काङजम, राधागोविन्द थोङाम और सिद्धनाथ प्रसाद ने तैयार की थी। राधागोविंद थोङाम इसके प्रथम संपादक बने। उनके सहयोग के लिए एक संपादक मंडल का भी गठन किया गया। ‘मणिपुर हिंदी परिषद पत्रिका’ ने हिंदी प्रचार के साथ-साथ हिंदी और मणिपुरी भाषाओं के साहित्य की उन्नति को अपना मूल उद्देश्य बनाया। इस पत्रिका के प्रत्येक अंक में मणिपुरी से हिंदी में अनुदित सामग्री प्रकाशित होने लगी। कभी-कभी कविताओं के हिंदी अनुवाद के साथ मूल-पाठ नागरी लिपि में भी प्रकशित किया जाने लगा। इस पत्रिका ने हिंदी और मणिपुरी के रचनाकारों पर केंद्रित विशेषांक प्रकाशित किए, जो पाठकों में चर्चित हुए। हिंदी के मैथिलीशरण गुप्त और तुलसीदास तथा मणिपुरी के लमाबम कमल, नीलवीर शास्त्री, हिजम अड़ाड़्ह, कवि चाओबा आदि पर केंद्रित अंक ऐसे ही हैं। इस पत्रिका के माध्यम से हिंदी और मणिपुरी भाषाओं का परिचय बढ़ा और साहित्यिक आदान-प्रदान को गति मिली । रचनाकारों पर केंद्रित विशेषांकों के अतिरिक्त यह पत्रिका विभिन्न रचनाकारों के साक्षात्कार और उनकी रचनाएँ भी प्रकाशित करती रहती है। इस पत्रिका ने मणिपुरी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की माँग को लेकर चल रहे आंदोलन के अवसर पर ‘मणिपुरी भाषा माँग विशेषांक’ प्रकाशित किया था। इससे सारे देश के सामने मणिपुरी भाषा व साहित्य का इतिहास तथा भाषा-माँग का औचित्य प्रस्तुत किया जा सका। ‘मणिपुर हिंदी परिषद पत्रिका’ मासिक के रूप में प्रकाशित हुई थी । सन् 1991 में इस लेखक को इसका संपादक बनाया गया, तब से यह ‘महिम पत्रिका’ नाम से त्रैमासिक के रूप में प्रकाशित होने लगी। सन 2001 से महिप का संपादन इबोहल सिंह काङजम द्वारा किया जाने लगा।
मई सन् 1988 में ‘मणिपुर महिला समाज’ नामक मासिक पत्रिका प्रकाशित हुई। इसका प्रकाशन ‘महिला विकास क्रेंद्र इम्फाल’ द्वारा किया गया। इस पत्रिका का उद्देश्य संपूर्ण महिला जागृति घोषित किया गया। इसका प्रवेशांक हिंदी व मणिपुरी में छपा। दूसरे अंक में अंग्रेजी भाषा को भी स्थान दिया गया। ‘मणिपुर महिला समाज’ में दहेज, विवाह-विच्छेद, नारी-उत्पीड़न और अन्य नारी समस्याओं को सुलझाने वाली सामग्री का प्रकाशन हुआ। इसके संपादन का भार फुराइलात्पम गोकुलानंद शर्मा ने सँभाला। इस लेखक ने मणीपुर महिला समाज के परामर्शदाता के रूप में कार्य किया।
एक जनवरी सन् 1991 को एस. गोपेन्द्र शर्मा के संपादन में ‘जगदम्बी’ नामक साप्ताहिक समाचार-पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। यह साप्ताहिक जनोपयोगी समाचारों का प्रकाशन करता था। दस अंकों तक गोपेन्द्र शर्मा ने इसे उत्साहपूर्वक प्रकाशित किया, किंतु आर्थिक दृष्टि से निश्चिंत न हो पाने के कारण उन्हें इसका प्रकाशन बंद करना पड़ा। बाद में वे इसे हिंदी के बदले मणिपुरी दैनिक के रूप में प्रकाशित करने लगे।
जुलाई सन् 1993 में ‘नगर राज-भाषा कार्यान्वयन समिति, इम्फाल’ द्वारा ‘नीलकमल’ नाम से एक अर्धवार्षिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया गया। इसे साइक्लोस्टाइल्ड रूप में निकाला गया। इसका संपादन-कार्य वेंकटलाल शर्मा, के.सी. शर्मा और ए.के. बक्सी ने सँभाला। इस पत्रिका का उद्देश्य मणिपुर के सरकारी कार्यालयों में राजभाषा के रूप में हिंदी के व्यवहार की जानकारी देने के साथ-साथ कार्यालय कर्मियों में लेखन व पठन की प्रवृत्ति का विकास करना भी था। इसके अतिरिक्त नीलकमल में स्थानीय साहित्यकारों की हिंदी रचनाओं व अनुवाद को भी स्थान दिया गया था।
अगस्त, सन् 1999 श्री एस. गोपेन्द्र शर्मा ने ‘चयोल-पाउ’ नामक हिंदी साप्ताहिक का प्रकाशन प्रारंभ किया। इसका मोटो लालबहादुर शास्त्री द्वारा निर्मित उद्घोष में अटलबिहारी वाजपेयी द्वारा किए गए परिवर्धन के फलस्वरूप नव-निर्मित उद्घोष के शब्दों का क्रम बदल कर ‘जय किसान जय जवान जय विज्ञान’ रखा गया। मुखपृष्ठ पर इस समाचार साप्ताहिक का नाम मीतैलिपि में छापा जाता था। इसमें ‘दिवा स्वप्न’ नाम से समसामयिक घटनाओं पर संक्षिप्त टिप्पणी करते हुए एक स्थायी स्तंभ भी प्रारंभ किया गया। समाचार साप्ताहिक होने के कारण इस पत्र में मणिपुरी जन-जीवन को प्रभावित करने वाली घटनाओं का विवरण मूल रूप से देना प्रारंभ किया गया। इसका एक पृष्ठ साहित्य को भी समर्पित किया गया, जिसके अंतर्गत मौलिक, अनूदित और समीक्षा सामग्री प्रकाशित की जाने लगी। दिनांक 9. 8. 2000 को इस पत्र की वर्षगाँठ पर इसका विशेषांक निकाला गया। एस. गोपेन्द्र शर्मा की मृत्यु के पश्चात् भी यह साप्ताहिक समाचार पत्र चलता रहा। अज्ञात कारणों से 3 जून सन् 2007 से चयोल-पाउ का नाम ‘मणिपुरी चायोल-पाउ’ कर दिया गया और डॉ. आर गोविन्द इसके मुख्य संपादक बन गए। गोपेंद्र शर्मा की पुत्री, एस. निर्मला देवी ने संपादक के रूप में कार्य करना प्रारंभ किया। परिवर्तित नाम वाले समाचार साप्ताहिक के प्रस्तुतीकरण में सभी विशेषताएँ चयोल पाउ जैसी ही रहीं।
‘नागरिक पंथ’ की परंपरा में सन् 2002 में मोइराङ से एक हिंदी दैनिक का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। मणिपुर की विश्व प्रसिद्ध झील, ‘लोकताक’ के नाम पर इसका नाम ‘लोकताक एक्सप्रेस’ रखा गया। इस दैनिक के संपादक और प्रकाशक रामानंद सिंह कैशाम थे। यह केवल एक पन्ने का था और इस दैनिक के कुछ ही अंक प्रकाशित हो सके। बाद में इसके प्रकाशन का अधिकार सीएच. निशान सिंह ने प्राप्त कर लिया, किंतु वे कोई अंक प्रकशित नहीं कर पाए।
सन् 2007 में ‘नागा हिंदी विद्यापीठ, इम्फाल’ द्वारा ‘लट-चम’ नाम से एक मासिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया गया। इसके प्रधान संपादक एस. खङ्मैदुन कबुई बने। लट-चम कबुई जनजाति की भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है भाषा-शिक्षण, संवाद, आपस की बातचीत या समाचार। मणिपुर के किसी जनजातीय व्यक्ति द्वारा संपादित यह प्रथम हिंदी पत्रिका है।
सन 2008 में चारहजारे नामक स्थान से मासिक पत्रिका ‘भारती’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इसके मुख पृष्ठ पर कोष्ठक में लिखा गया— “निष्पक्ष, निर्भीक एवं भ्रष्टाचार विरोधी मासिक पत्रिका”। भारती के संपादक हरिमोहन पोख्रेल थे। इसके प्रवेशांक (सितंबर, 2008) में भारत सरकार और भूमिगत कुकी वर्गों के बीच वार्ता के बारे में समाचार दिया गया, जिससे पत्रकारिता के बदलते स्वरूप का संकेत मिलता है।
25 सितंबर सन् 2011 को थोंड़ाम भारती ‘कविराज’ के संपादन में ‘मणि कुसुम’ नामक एक पत्रिका (त्रैमासिक) का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। जुलाई-सितंबर, 2011 के प्रवेशांक में यह लोक मंगल उद्बोधनी समिति, इम्फाल द्वारा स्थापित ‘हिंदी विश्व सेवा संघ’ की मुख पत्रिका बताई गई है।
मणिपुर की हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में मणिपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग का भी योगदान है। हिंदी विभाग द्वारा संचालित ‘हिंदी परिषद’ ने 30 नवंबर 1987 को एक हस्तलिखित दीवार-पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया। यह पत्रिका विद्यार्थियों द्वारा तैयार की जाती और परिषद के निर्देशक की स्वीकृति के बाद पाठकों के लिए दीवार पर चिपका दी जाती थी। यह क्रम तीन वर्ष तक चलता रहा। इसके पश्चात सन् 1992 में विभाग की हिंदी परिषद ने ‘प्रयास’ नाम से एक साइक्लोस्टाइल्ड पत्रिका प्रकाशित करनी प्रारंभ की। यह अनियतकालीन थी। इसके प्रवेशांक की एक सौ प्रतियाँ तैयार हुई थीं और अधिकांश सामग्री छात्रों द्वारा तैयार की गई थी। इस अंक में मणिपुर के समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचारों को एकत्र करके उमावती और इबेहाइबी नामक छात्राओं ने दो सर्वेक्षण प्रकाशित कराए थे। इनमें से एक सर्वेक्षण मणिपुरी समाज में व्याप्त समस्याओं/अपराधों और दूसरा साहित्यिक-सांस्कृतिक चेतना पर केंद्रित था। दोनों सर्वेक्षणों द्वारा तत्कालीन मणिपुर राज्य के यथार्थ को उजागर किया गया था। मणिपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा प्रकाशित सभी पत्रिकाओं का संपादन इस लेखक द्वारा किया गया था।

[खोजकर्ता की घोषणा : प्रस्तुत आलेख के लेखक ने सन 1985 में मणिपुर में हिंदी पत्रकारिता के इतिहास की खोज प्रारंभ की थी। बाद के वर्षों में संपूर्ण पूर्वोत्तर भारत तक इस खोज का विस्तार हुआ। मणिपुर की हिंदी पत्रकारिता के इतिहास पर केंद्रित इस लेखक का पहला आलेख राजेंद्र अवस्थी के संपादन में प्रकाशित कादम्बिनी पत्रिका (वर्ष 36, अंक 4, फरवरी 1996) में प्रकाशित हुआ था। यह आलेख कुछ नवीन तथ्यों के आधार पर परिवर्धित होकर सन 2001 में सुरेश गौतम और वीणा गौतम के संपादन में प्रकाशित ग्रंथ, भारतीय पत्रकारिता : कल, आज और कल (सत्साहित्य प्रकाशन, दिल्ली) में प्रकाशित हुआ। इस बीच खोज जारी रही और अन्य नवीन तथ्य उपलब्ध हुए। फलस्वरूप इसका एक परिवर्धित रूप सन 2014 में अरिबम ब्रजकुमार शर्मा की पुस्तक, हिंदी को मणिपुर की देन (यश पब्लिकेशंस, दिल्ली) में सम्मिलित किया गया। तब से अब तक जो तथ्य उपलब्ध हुए, उन्हें सम्मिलित करते हुए इस आलेख का नवीनतम परिवर्धित रूप प्रस्तुत किया जा रहा है। सूचनीय है कि खोजकर्ता को प्रारंभ से लेकर अब तक अपने खोजे मात्र एक तथ्य में संशोधन करना पड़ा है, शेष प्रत्येक परिवर्धन में नवीन तथ्य जोड़े गए हैं।]

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हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता-श्‍याम कश्‍यप

हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता हिन्दी साहित्य के विकास का अभिन्न अंग है। दोनों परस्पर एक-दूसरे का दर्पण हैं। इस दृष्टि से दोनों में द्वन्द्वात्मक (डायलेक्टिकल) और आवयविक (ऑर्गेनिक) एकता सहज ही लक्षित की जा सकती है। वस्तुतः हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता हमारे आधुनिक साहित्यिक इतिहास का अत्यंत गौरवशाली स्वर्णिम पृष्‍ठ है। स्मरणीय है कि हिन्दी के गद्य साहित्य और नवीन एवं मीलिक गद्य-विधाओं का उदय ही हिन्दी पत्रकारिता की सर्जनात्मक कोख से हुआ था।

यह पत्रकारिता ही आरंभकालीन हिन्दी समाचार पत्रों के पृष्‍ठों पर धीरे-धीरे उभरने वाली अर्ध-साहित्यिक पत्रकारिता से क्रमश: विकसित होते हुए, भारतेन्दु युग में साहित्यिक पत्रकारिता के रूप में प्रस्फुटित हुई थी।

भारतेन्दु हरिशचन्द्र (सन्1850-1885 ई0) की पत्रिकाओं कविवचनसुधा (1867ई0), हरिशन्द्र मैगज़ीन (1873ई0) और हरिशचन्द्र चंद्रिका (1874ई0) से ही हमें वास्तविक अर्थों में हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के दर्शन होते हैं। हिन्दी की आरंभकालीन साहित्यिक पत्रकारिता से ही हिन्दी गद्य का चलता हुआ रूप निखर कर सामने आया और भारतेन्दु युग से गद्य-विधाओं और गद्य साहित्य की अखंड परंपरा का अबाध आविर्भाव हुआ।

पृष्‍ठभूमि: छापेखानों की और पत्रों की शुरुआत

अठारहवीं शताब्दी में भारत के कई नगरों ,गोआ, बंबई, सूरत, कलकत्ता और मद्रास में अनेक छापेखाने (प्रिंटिंग प्रेस) कायम हो गए थे स हालाँकि, हालैंड में 1430 ई0 में पहले प्रिंटिंग प्रेस के लगभग सवा सदी बाद, गोआ में 1556 ई0 में भारत का पहला प्रेस कायम हुआ था। परमेश्‍वरन थंकप्पन नायर के शब्दों में न केवल, “हिन्दी और उर्दू की पत्रकारिता का जन्म कलकत्ता में हुआ,“ बल्कि “कलकत्ता को पूरे दक्षिण-पूर्व एषिया में पत्रकारिता का जन्म स्थान माना जा सकता है। कलकत्ता से ही 1765 ई0 में एक डच विलियम बोल्ट ने पत्रकारिता के आरंभिक प्रयास किए थे और अंततः 1766 में अपना पहला “नोटिस“ छापा था।

कुछ विद्वानों की मान्यता है कि, “भारत में पत्रकारिता का आरंभ 1774 ई0 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार की ओर से मुद्रित एवं प्रकाशित “कैलकेटा गज़ेट“ से हुआ था। जो कि सही नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह स्वतंत्र पत्रकारिता नहीं थी। इसलिए अधिकांश विद्वानों का मत है, जो प्रायः स्वीकार्य भी है, कि भारत में पत्रकारिता की शुरुआत एक आयरिश जेम्स ऑगस्टस हिकी ने 27 जून,1780 ई0 को अंग्रेज़ी में “बंगाल गज़ेट ऑफ कैलकेटा एडवरटाइज़र्स“ नामक साप्ताहिक निकाल कर की।

हिन्दी का स्वरूप और हिन्दी पत्रों का आरंभ

डॉ0 शिवमंगल राय के अनुसार ”सन्1779 आते-आते प्रथम भारतीय बाबू राम ने भी कलकत्ता में अपना प्रेस खड़ा कर लिया। हालाँकि प्रिओल्कर और नाइक ने देवनागरी में छपाई का समय 1796 में निर्धारित किया है, जबकि कुछ विद्वान इसे और भी पहले बताते हैं। लेकिन तथ्य यह है कि 1786 से पहले तक तो कलकत्ता में देवनागरी टाइप ही उपलब्ध नहीं था। परमेश्‍वरन नायर के अनुसार “देवनागरी लिपि में छपाई के काम की शुरुआत कलकत्ता से ही हुई थी“ और वहीं से आरंभकालीन हिन्दी का साहित्य भी प्रचुर मात्रा में लिखा गया था तथा “1827 तक पूरे उत्तर भारत में हिन्दी का स्वरूप उभर कर सामने आ गया था।

इससे स्‍पष्‍ट है कि अंग्रेज़ों द्वारा फोर्ट विलियम से हिन्दी गद्य के तथाकथित ”निर्माण” और देवनागरी लिपि में फारसी-बोझिज्ञ तथाकथित ”हिन्दुस्तानी” भाषा के ”विकास” एवं उसकी ”लोकप्रियता” के दावे निराधार और झूठे प्रमाणित होते हैं। श्रीरामपुर (सीरामपुर) के मिशनरियों के हिन्दी मासिक ”दिग्दर्शन” (1817-18) के दो माह के भीतर ”बेंगाल ग्याजेट” और ”समाचार दर्पण” दो बाँग्ला साप्ताहिक पत्र निकले तथा 30 मई, 1826 को पहला हिन्दी समाचार पत्र साप्ताहिक ”उदंतमार्त्तंड” उदित हुआ। इसके संपादक, मुद्रक और प्रकाशक पं0 युगलकोशोर शुक्ल स्वयं एक सहृदय कवि एवं सुलेक्जक थे; अतः आरंभ से ही इस पत्र का रुझान लगभग अर्ध- साहित्यिक था।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल भी अपने ”हिन्दी साहित्य का इतिहास” (मुद्रण: सं0 1995) में इसे हिन्दी का पहला पत्र बताते हुए लिखते हैं ”उदंतमार्त्तांडके बाद काशी के ”सुधाकर” और आगरा के ”बुद्धिप्रकाश” आदि के प्रयासों से “अदालती भाषा उर्दू बनाई जाने पर भी, वुक्रम की 20वीं शताब्दी के आरंभ के पहले से ही (यानी सन् 1840-45ई0 के पहले से ही) हिन्दी खड़ी बोली गद्य की परंपरा हिन्दी साहित्य में अच्छी तरह चल पड़ी ; उसमें पुस्तकें छपने लगीं, अखबार निकलने लगे। कहना ना होगा कि इन अखबारों के अर्ध-साहित्यिक रूप से ही क्रमश: साहित्यिक प्तरकारिता का विकास हुआ।

यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि इस पत्रकारिता, नवोदित गद्य-साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता का स्वरूप आरंभ से ही राजनीतिक और विचारधारात्मक रहा है। अर्थात उपनिवेशवाद- विरोधी और लोकोन्मुख भले ही उन पत्रकारों और लेखकों ने औपनिवेशिक विदेशी सत्ता, उसके कठोर सेंसरशिप और दमनकारी पेअशासन-तंत्र की आँखों में धूल झोंकते हुए कैसे भी संकेतात्मक, छद्म और प्रतीकवादी तरीके क्यों न अपनाएँ हो। हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के जनक भारतेन्दु हरिश्‍चन्द्र ने अपनी आँखों से सन् 1857 का ”गदर”, उसके असफल रहने पर उन प्रथम स्वाधीनता-संग्रामियों का निर्मम नरसंहार और सामान्य भारतवासियों का नृशंस दमन देखा था।

आचार्य शुक्ल 1857 के प्रथम स्वतंत्रता-संग्राम से गद्य-साहित्य की परंपरा का संबंध जोड़ते हुए ”इतिहास” में लिखते हैं कि “गद्य-रचना की दृष्टि से ……… संवत 1914 (अर्थात 1857ई0) के बलवे (गदर) के पीछे ही हिन्दी गद्य-साहित्य की परंपरा अच्छी चली“ । इस तरह हम देखते हैं कि हिन्दी पत्रकारिता से ही साहित्यिक पत्रकारिता और गद्य साहित्य का विकास होता है और दूसरे, आरंभकाल से ही जुझारू गद्य-साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता का संबंध हमारे साम्राज्यवाद-विरोधी संग्राम से भी बड़ा प्रत्यक्ष और गहरा था

हिन्दी गद्य का निर्माण

डॉ0 नामवर सिंह इसी तथ्य की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि “पत्रकारिता को ही लें। सही है कि हिन्दी गद्य का निर्माण स्वाधीनता संग्राम के जुझारु और लड़ाकूपन के बीच हुआ। संघर्ष के हथियार के रूप में निस्संदेह, साहित्य के पहले उसका यह रूप हिन्दी पत्रकारिता, सबसे पहले और सबसे ज़्यादा भारतेन्दु की पत्रकारिता में प्रस्फुटित और विकसित हुआ था।

अशोक वाजपेयी के शब्दों में, “गद्य के निर्माण में पत्रकारिता का भी कुछ न कुछ हाथ होता है। पुराने जमाने से ही था, जो बहुत अच्छे गद्यकार थे ,वे बहुत अच्छे पत्रकार भी थे। इन्हीं तथ्यों को उजागर करते हुए डॅा0 रामविलास शर्मा बहुत पहले यह लिख चुके थे कि “भारतेन्दु से लेकर प्रेमचन्द तक हिन्दी साहित्य की परंपरा में यह बात ध्यान देने योग्य है कि सभी बड़े साहित्यकार पत्रकार भी थे। पत्रकारिता उनके जीवन का अभिन्न अंग बन गई थी। यह पत्रकारिता एक सजग और लड़ाकू पत्रकारिता थी। प्रेमचंद भी “एक सफल संपादक थे और ”हंस” के ज़रिये उन्होंने साहित्यकारों की एक नई पीढ़ी को शिक्षित किया। कहना न होगा कि साहित्यिक पत्रकारिता की यह भी एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

भारतेन्दु और प्रेमचंद के अलावा यही बात पं0 महावीरप्रसाद द्विवेदी, निराला, मुक्तिबोध, यशपाल, हरिशंकर परसाई, नामवर सिंह और नंदकिशोर नवल के बारे में भी कही जा सकती है। साहित्य और पत्रकारिता के इन घनिष्‍ठ संबंधों की ओर संकेत करते हुए प्रो0 सूर्यप्रसाद दीक्षित लिखते हैं कि “हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास में पत्रकारिता की अनन्य देन रही है। पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से युग-प्रवृत्तियों का प्रवर्तन हुआ है, विभिन्न विचारधाराओं का उन्मेश हुआ है और विशिष्‍ट प्रतिबाओं की खोज हुई है। वस्तुतः साहित्य और पत्रकारिता परस्पर पूरक और पर्याय जैसे हैं। शायद इसीलिए लोग पत्रकारिता को ”जल्दी में लिखा हुआ साहित्य” और साहित्य को ”पत्रकारिता का श्रेष्‍ठतम रूप” भी कहते हैं। साहित्यिक पत्रकारिता के प्रसंग में तो यह मणि-काँचन-योग और भी प्रत्यक्ष है ।

एक रोचक घटना: संदर्भ यूरोप का — साहित्यिक पत्रकारिता का उदय

सेंट फॉक्स साहित्यिक पत्रकारिता के आरंभ का बड़ा दिलचस्प विवरण देते हुए बताते हैं कि रेनाडो नामक पेरिस के एक डॉक्टर अपने अस्पताल के रोगियों के मन-बहलाव के लिए अद्भुत घटनाओं, रोचक किस्सों, अलौकिक विवरणों और दिलचस्प खबरों को जमा करके बीमारों को पढ़ने देने लगे। डॉ रेनाडो का विशवास था कि ऐसे मनोरंजन से रोगियों को शांत और प्रसन्न रखा जा सकता है और उन्हें शीघ्र निरोग भी किया जा सकता है। कहना न होगा कि उन्हें इसमें आशातीत सफलता भी मिली।

इससे उत्साहित होकर, पेरिस प्रशासन की अनुमति से, रेनाडो ने 1632 ई0 से ऐसी सामग्री संकलित कर एक नियमित साप्ताहिक पत्रिका शुरु कर दी, जो आम लोगों में भी खासी लोकप्रिय हो गई। रेनाडो के अनुकरण पर पेरिस से ही सांसद डेनिस द” सैलो ने 1650ई0 में ”जर्नल द” सैवेंत्रास“ नामक एक साहित्यिक पत्र आरंभ किया। आइज़क डिज़रेज़ी के मतानुसार साहित्य और समालोचना की यही सबसे पहली पत्रिका है। ऐसी ही दूसरी पत्रिका 1684 में बेल ने निकाली इसका नाम “वावेत्स द“ ला रिपब्लिक द” लेटर्स“ था।

फॉअस के बाद इंग्लैंड से भी अनेक साहित्यिक पत्र निकलने लगे। इनमें डेनियल डेफो का ”द रिव्यू” पहला अंग्रेज़ी पत्र था, जिसके लिए उन्हें 1703 में जेल भी जाना पड़ा था। तत्पश्‍चात रिचर्ड स्टील का ”द टैटलर”, फिर स्टील और ऐडिसन द्वारा मार्च,1711 से मिलकर निकाला गया ”द स्पेक्टेटर” तथा साहित्य समालोचना की विख्यात पत्रिका ”द मंथली रिव्यूज़” के नाम विशेश उल्लेखनीय हैं। इनके अतिरिक्त, “जेंटिलमेन्स मैगज़ीन”, ”द क्रिटिकल” तथा डॉ0 सैम्युल जॉनसन की दोनों सुप्रसिद्ध पत्रिकाओं ”द रैम्बलर” और ”द आइडलर“ का भी विशेश ऐतिहासिक महत्तव है। अंग्रेज़ी साहित्य के विकास में इनका अमूल्य योगदान माना जाता है

वस्तुतः फ्राँसीसी क्रांति के बाद 1749-50 से तो यूरोप के प्रायः सभी देशों से अनेक साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित और लोकप्रिय होने लगीं सयूरोपीय ”रेनाँसाँ” (पुनर्जागरण), मध्य वर्ग के उदय और जातीय चेतना (नैशनेल्टी की चेतना के बोध) के विकास से इस साहित्यिक पत्रकारिता की शुरुआत का सीधा संबंध था, ठीक वैसे ही, जैसे कि कालांतर में भारतीय भाषाओं में —-

विशेष रूप से हिन्दी में, साहित्यिक पत्रकारिता का गहरा संबंध नवोदित भारतीय मध्य वर्ग की उत्तरोत्तर क्रमश: होती हुई लोकतांत्रिक चेतना, जातीय नवोन्मेश और साम्राज्य-विरोधी राश्ट्रीय मुक्ति-संग्राम से भलीभाँति परिलक्षित किया जा सकता है।

संदर्भ

1) ”हिन्दी नवजागरण: बंगीय विरासत” (खंड दो), सं0 शम्भुनाथ और रामनिवास द्विवेदी ;

प्रकाशक: कोल इंडिया लि0, कलकत्ता (1993), पृष्‍ठ 919

2) उपर्युक्त, पृ0 905

3) उपर्युक्त, पृ0 919

4) उपर्युक्त, पृ0 920

5) उपर्युक्त।

6) उपर्युक्त।

7) उपर्युक्त, 907

8) उपर्युक्त, 911

9) ”समाचारपत्रों का इतिहास”, अम्बिकाप्रसाद वाजपेयी ; ज्ञानमण्डल लि0, वाराणसी (द्वितीय सं0

1953), पृ0 33-34

10) ”हिन्दी साहित्य का इतिहास”, रामचन्द्र शुक्ल ; सं0 2005, प्रकाशन सण्स्थान, नयि दिल्ली, पृ0 309

11) उपर्युक्त, पृ0 312

12) उपर्युक्त, पृ0 307

13) ”पूर्वग्रह”,सं0 अशोक वाजपेयी, अंक 44-45 (मई-अगस्त,1981), नामवर सिंह

14) उपर्युक्त, पृ0 14

15) ”प्रेमचंद और उनका युग”, रामविलास शर्मा ; राजकमल प्रकाशन ;पृ0130

16) उपर्युक्त, पृ0159

17) ”हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता”, सं0 प्रो0 सूर्यप्रसाद दीक्षित , पृ0 3

18) यूरोप के उपरलिखित सभी विवरण, लखनऊ विश्‍वविद्यालय की ”जन-संचार एवं पत्रकारिता” के विशय कौ प्रथम पी0एच0डी0 डिग्री के षोध-प्रबंध (डॉ0ष्याम कष्यप) से लिए गए हैं।

हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता (2)

साहित्य में आधुनिक चेतना, स्वच्छंद आत्माभिव्यक्ति और व्यक्तिगत पाठक समुदाय के विकास के साथ ही साहित्यिक पत्रकारिता का उदय हुआ था। यूरोप ही नहीं, कुछ अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना में, हिन्दी में कतिपय विलंब से यहाँ तक कि अपनी सहोदर उर्दू की तुलना में भी कुछ विलंब से इसका कारण यह था कि अन्य भारतीय भाषाओं और उर्दू की तुलना में हिन्दी में गद्य का विकास देर से हुआ था। भारतेन्दु युग से पहले तक कविता की भाषा ब्रजभाषा और गद्य की भाषा खड़ी बोली हिन्दी के इस प्रचलित विभाजन से भी हिन्दी गद्य के स्वाभाविक विकास में बाधा नज़र आती है, लेकिन एक बार उन्नीसवीं षताब्दी के उत्तरार्ध में गति पकड़ लेने के बाद, हिन्दी गद्य और प्रकारांतर से हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता ने अभी हिन्दी के अतिरिक्त दुनिया की किसी भी भाषा में कभी भी ऐसा विभाजन नहीं था और न ही उसे ”धर्म” से जोड़ने की अवैज्ञानिक सोच अपने तीव्र विकास में सबको पीछे छोड़ दिया और वह उत्तरोत्तर प्रगति-पथ पर अग्रसित हो गई। शीग्र ही हम हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता को आधुनिक साहित्य के सर्जनात्मक विकास में प्रेरक भूमिका निभाते हुए देखते हैं।

यहाँ इस महत्वपूर्ण तथ्य को भी दृष्टिगत रखना चाहिए कि इस आधुनिक साहित्य और उसकी विविध विधाओं को लोकप्रिय बनाते हुए सामान्य पाठकों और जनसाधारण तक संप्रेशित करने में साहित्यिक पत्रकारिता की लगभग केंद्रीय भूमिका है, लोग एकदम ही साहित्यिक गद्य-विधाओं, विशेष रूप से ब्रजभाषा की तुलना में खड़ी बोली हिन्दी की आधुनिक कविता के पाठक नहीं बन गए थे, खास तौर से मुक्त-छंद और छंद-मुक्त कविता के, किताबों से पहले जनसाधारण, खासकर मध्यम वर्ग के पढ़े-लिखे लोग, साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के नियमित पाठक बने थे ; जैसे कि उपन्यासों के पाठक बनने से पहले वे साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाले छोटे-छोटे निबंधों, एकांकी नाटकों, प्रहसनों, टिप्पणियों,राजनीतिक व्यग्य-स्तंभों और छोटी कहानियों के नियमित पाठक बने थे स यह अनायास ही नहीं है कि राल्फ फाक्स उपन्यास को बुर्जुआ समाज में ”मध्य वर्ग का महाकाव्य” कहते हैं। इसकी शुरुआत, जैसा कि पहले भी संकेत किया जा चुका है, उन्नीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक (”उदंतमार्तंड ;1826ई0) में हो चुकी थी।

भारतेन्दु पूर्व की अर्ध-साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं से उभरने वाली रचनाओं ने खबरों के प्रति उत्सुकता के साथ ही, लोगों में मनोरंजक और साहित्यिक रूझान वाली रचनाओं में भी रुचि जाग्रत करने में बड़ी भूमिका निभायी थी। भारतेन्दु-युग की श्रेष्‍ठ साहित्यिक पत्रकारिता ने लोगों की रुचि पढ़ने की ओलृ अधिकाधिक मोड़ते हुए उन्हें हिन्दी साहित्य के जागरूक पाठक बनाया, लोगों ने गंभीर साहित्य पढ़ने की आदत डाल ली, उन्हें टीका-टिप्पणी करने की ओर प्रेरित करके सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से जागरूक बनाया।

साहित्य और पत्रकारिता

साहित्यिक पत्रकारिता और साहित्य की लोकरंजनकारी भूमिका के कारण हि सामान्य पत्र-पत्रिकाएँ भी साहित्यिक विषयों को बराबर स्थान देती थीं। बीसवीं शतब्दी के उत्तरार्ध में भूमंडलीकरण के दौर की शुरुआत से, खास तौर से 1995 के बाद से निजी टेलीविज़न चैनलों और चौबिसों घंटे के न्यूज़ चैनलों के विस्फोट और फलस्वरूप हिन्दी के दैनिक अखबारों द्वारा भी, उनकी रंगारंग अंधी दौड़ की फूहड़ नकल की प्रवृत्ति ने ज़रूर आज यह स्थिति बदल दी है, जिस पर हम आगे यथावसर चर्चा करेंगे स यहाँ यह समझने की आवश्‍यकता है कि अपने आरंभकाल से ही साहित्य और पत्रकारिता का चोली-दामन का संबंध रहा है।

पत्रकारिता का साहित्य के साथ अपने जन्मकाल से बहुत गहरा संबंध बताते हुए राकेश वत्स लिखते हैं कि मानव-यात्रा के “इसी पड़ाव पर (यानी मध्य-वर्गीय लोकतांत्रिक आंदोलनों, राजनीतिक और विचारधारात्मक विकास के पड़ाव पर) आकार साहित्य के संबल की ज़रुरत महसूस हुई स चूँकि पत्र-पत्रिकाएँ ही उसे पाठकों के उस वर्ग तक पहुँचा सकती थीं, ……. पत्रकारिता ने उसकी इस ज़रूरत को पूरा किया। वे आगे बताते हैं कि साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएँ तो मूलतः साहित्य के प्रति समर्पित होती ही हैं, बल्कि शायद ही कोई ऐसा पत्र या पत्रिका होगी जिसमें किसी न किसी रूप में साहित्य के लिए स्थान सुरक्षित नहीं किया जाता होगा। यानी, कविता, कहानी, गज़ल, गीत, निबंध, नाटक, एकांकी, संस्मरण, यात्रा-वृतांत, शब्दचित्र, रोपोर्ताज़, पुस्तक समीक्षा, आलोचना, उपन्यास- सभी कुछ प्रायः सभी पत्र-पत्रिकाओं में छपता रहा है। उनका रूप और आकार भले भिन्न-भिन्न रहा हो।

जिन गैर साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं का गंभीर साहित्य की ओर रूझान नहीं था, वे भी, खासकर दैनिक और साप्ताहिक या पाक्षिक अखबार और पत्रिकाएँ भी ”फिलर” के रूप में लघु-कथाएँ, क्षणिकाएँ और व्यंग्य के नाम पर चुटकुलेबाजी, यानी ”साहित्य” के नाम पर रची जाने वाली सारी सामग्री धड़ल्ले से छापते रहे हैं। यहाँ तक कि फिल्मी समाचार पत्र-पत्रिकाएँ भी इन सबको नज़रंदाज़ नहीं करतीं थीं। कहना न होगा कि साहित्य के नाम पर छपने वाला बड़े पैमाने का यह सारा कूड़ा और स्तरहीन रचनाओं का अंबार श्रेष्‍ठ साहित्य तथा स्तरीय और प्रभावि रचनाओं का स्थान नहीं ले सकता, क्योंकि हर छपा हुआ शब्द साहित्य नहीं होता! फिर भी इससे एक माहौल बनता है, एक वातावरण निर्मित होता है। इससे साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता की लोकप्रियता का विस्तार होता है। लोगों में कम-से-कम पढ़ने की ललक और पाठकीय संस्कृति विकसित होती है। लोगों में साहित्य पढ़ने की आदत पड़ती है।

साहित्यिक पत्रकारिता और ”मास-लिटरेचर” यह समझ लीजिए कि स्वयं श्रेष्‍ठ साहित्य न होते हुए भी ऐसी स्तरहीन रचनाओं का ढेर श्रेष्‍ठ रचनाओं के लिए खाद बनता है। ऐसा साहित्य खुद निकृष्‍ठ होते हुए भी पाठक-संस्कृति और साहित्यिक पत्रकारिता के विकास को गति प्रदान करता है। इसी श्रेणी में आप सस्ते और भावुकतापूर्ण रोमैंटिक उपन्यास तथा तिलिस्मी-ऐयारी और जासूसी उपन्यासों को भी शामिल कर सकते है। आचार्य शुक्ल भी इसी तथ्य को अपने ”हिन्दी साहित्य इतिहास” में रेखांकित करते हुए लिखते हैं कि, “हिन्दी साहित्य के इतिहास में बाबू देवकीनंदन (खत्री) का स्मरण इस बात के लिए सदा बना रहेगा कि जितने पाठक उन्होंने उत्पन्न किए उतने और किसी ग्रंथकार ने नहीं ”चंद्रकांता” पढ़ने के लिए न जाने कितने उर्दू जीवी लोगों ने हिन्दी सीखी ”चंद्रकांता” पढ़कर वे हिन्दी की और प्रकार की साहित्यिक पुसतकें भी पढ़ चले और अभ्यास हो जाने पर कुछ लिखने भी लगे इसीलिए प्रायः पत्र-पत्रिकाएँ धारावाहिक रूप से उपन्यास और ऐसी कहानियाँ बराबर छापते हैं। इस किस्म के साहित्य को ”मास-लिटरेचर” कहा जाता है और यूरोप तथा अमरीका के समाजशास्त्रियों ने इसकी उपयोगिता और लोकप्रियता पर अनेक दिलचस्प अध्ययन किए हैं।

पहले ”धर्मयुग”, ”साप्ताहिक हिन्दुस्तान”, ”कादंबिनी” और ”सारिका” या विभिन्न दैनिक और साप्ताहिक समाचारपत्रों के रविवारीय पृष्‍ठों में छपने वाली चालू और स्तरहीन रचनाओं तथा ”इंडिया टुडे” (हिन्दी)- जैसी समाचार पत्रिकाओं में छपने वाली बाज़ारू रचनाओं के नियमित पाठक ही, उनकी चेतना में धीरे-धीरे विकास और साहित्यिक रुचि के क्रमषः परिश्कार के अबाद ”कल्पना”, ”प्रतीक”, ”कवि”, ”कृति”, ”कहानी”, ”नई कहानियाँ”, ”लहर”, ”पहल”,”धरातल”, ” आलोचना”,”कथा”, ”समारम्भ”, ”पूर्वग्रह”, ”कसौटी”, ” बहुवचन”, ”समस”, और ”पुस्तकवार्ता” जैसी श्रेष्‍ठ साहित्यिक पत्रिकाओं के पाठक भी बनते हैं। कहना न होगा कि इस विशाल पाठक-समुदाय की चेतना में यह विकास और उनकी साघित्यिक रुचि में परिश्कार भी ऐसी साहित्यिक पत्रिकाओं के पठन-पाठन से ही आता है। यहाँ एक विशेश बात यह भी स्मरणीय है कि ”हिन्दी साहित्य का इतिहास” इन श्रेष्‍ठ साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाओं में से ही उभरकर सामने आता है। साहित्यिक पत्रकारिता की इस संदर्भ में ऐसी ही द्वंद्वात्मक भूमिका होती है।

साहित्यिक रचनाओं का मूल्यांकन

ध्यान रहे कि साहित्यिक पत्रकारिता, रुचि का यह परिश्कार कृतियों, रचनाओं और रचनाकारों के मूल्यांकन के माध्यम से ही करती है स इस प्रकार साहित्यिक पत्रकारिता रचनाओं का स्तर निर्धारित करते हुए, अच्छी और श्रेष्‍ठ रचनाओं को स्तरहीन बाज़ारू रचनाओं के भारी-भरकम कूड़े से अलगाती है। वास्तव में, यह छँटा हुआ श्रेणीकरण के बाद साहित्य का भावी इतिहास बनता है।

शॅापेन हॉवर ने साहित्यिक पत्रकारिता की इस अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका का उल्लेख करते हुए लिखा है कि “साहित्यिक पत्रों का कर्त्तव्य है कि वे युग की युक्तिहीन और निरर्थक रचनाओं की बाढ़ के विरुद्ध मज़बूत बाँध का काम करें। … यों कहें कि नब्बे फीसदी रचनाओं पर निर्दयतापूर्वक प्रहार करने की ज़रूरत है। साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएँ तभी अपने कर्त्तव्य का पालन कर सकेंगे। इसी प्रसंग में वे आगे लिखते हैं कि,“ अगर एक भी ऐसा पत्र है, जो उपर्युक्त आदर्शों का पालन करता हो, तो उसके डर के मारे प्रत्येक अयोग्य लेखक, हरेक बौड़म कवि, प्रत्येक साहित्यिक चोर, हरेक अयोग्य पद-लोभी, प्रत्येक छंद दार्शनिक और हरेक मिथ्याभिमानी तुक्कड़ काँपेगा ; क्योंकि उसे इस बात का डर रहेगा कि छपने के बाद उसकी घटिया रचना खरी आलोचना की कसौटी पर ज़रूर कसी जाएगी और उपहासास्पद सिद्ध होगी। शॅापन हॉवर की यह मान्यता है निकीक इससे घटिया लेखकों को, जिनकी उँगलियों में लिखने की खुजली उठती है, लकवा मार जाएगा। इससे साहित्य का बड़ा हित होगा, क्योंकि साहुत्य में जो चीज़ बुरी है, वह केवल निरर्थक ही नहीं, बल्कि सचमुच बड़ी हानिकारक भी है, कहना न होगा कि हिन्दी की श्रेष्‍ठ साहित्यिक पत्रिकाओं और हमारे श्रेष्‍ठ समालोचकों ने ठीक यही भूमिका निभाई है।

साहित्य का इतिहास और पत्रकारिता इस प्रकार, साहित्यिक पत्रकारिता, जो आज साहित्य के इतिहास की स्रोत-सामग्री और कल का साहित्येतिहास है, दृढ़तापूर्वक अच्छी और बुरी रचनाओं, प्रवृत्तियों तथा साहित्यिक आंदोलनों के बीच निर्णायक फर्क दिखाकर साहित्य के इतिहास के निर्माण में भी अपनी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, साहित्यिक पत्रकारिता, इस तरह, स्तरहीन रचनाओं से स्तरीय और अप्रासंगिक कृतियों से प्रासंगिक लेखन को अलग करती है।

वस्तुतः युग-विशेश की साहित्यिक पत्रकारिता से ही उस युग के साहित्यिक आंदोलनों, बहस-मुबाहिसों, साहित्यिक समस्याओं, प्रश्‍नों और चुनौतियों तथा इन सबके फलस्वरूप उस युग की नई-से-नई साहित्यिक प्रवृत्तियों के उभरने, उनके क्रमश: विकास तथा विभिन्न साहित्यिक प्रवृत्तियों के आपसी अंतर्विरोधों और अंतर्द्वंद्वों का भी अंतरंग परिचय हम पा सकते हैं। यह युग-विशेश की साहित्यिक पत्रकारिता ही है, जो हमारे समक्ष उस युग-विशेश का भरा-पूरा और कलात्मक प्रतिबिंब प्रस्तुत करती है। इससे हमें अपनी समकालीन समस्याओं और चुनौतियों को समझने में मदद मिलती है तथा भविष्‍य के सर्जनात्मक संघर्षों का परिप्रेक्ष्य भी।

संदर्भ:–

1) ”उपन्यास और लोकजीवन”, राल्फ फाक्स ; पीपीएच, नई दिल्ली, पृ0 31

2) ”जनसंचार”, (सं0) राधेष्याम शर्मा ; राकेश वत्स का लेख ; हरियाणा साहित्य अकादमी, पृ0 201

3) उपर्युक्त , पृ0 205-06

4) उपर्युक्त, पृ0 206

5) ”हिन्दी साहित्य का इतिहास”, रामचन्द्र शुक्ल ; प्रकाशन संस्थान, नयी दिल्ली, प्र0 356-57

6) ”हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता”, शीर्षक लखनऊ विश्‍वविद्यालय की जन-संचार एवं पत्रकारिता

विषय की प्रथम पी-एच0डी0 डिग्री के शोध-प्रबंध (प्रो0 श्‍याम कश्‍यप) से।

7) उपर्युक्त

8) उपर्युक्त

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हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता (3)

साहित्यिक पत्रकारिता का सामान्य पत्रकारिता से अंतर और उसका विशिष्‍ट स्वरूप अब तक कुछ उभर आया होगा। समाचारपत्र (या समाचार पत्रिकाएँ) जहाँ सूचना पर बल देते हुए सामान्य ज्ञान प्रेषित करते हैं, वहीं साहित्यिक पत्रकारिता का उद्देष्य सांस्कृतिक चेतना और परिवेश में परिश्कार लाते हुए पाठक को विषिश्ट ज्ञान प्रशिष्‍ट करना होता है। इसलिए इस क्षेत्र में प्रशिष्‍ट साहित्य-विवेक और विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सूक्ष्म एवं अंतरंग परिचय की आवश्‍यकता होती है। साहित्य और पत्रकारिता का अंतर रेखांकित करते हुए नेमिशरण मित्तल बताते हैं कि, “साहित्य का मूल लक्षण उसका शास्वत स्वरूप तथा चिरंतन तत्व है, किन्तु पत्रकारिता तात्कालिकता, सामयिकता और क्षणभंगुरता के आयामों में कैद होती है, वैसे तो साहित्य में भी सरसता और सुबोधता पर बल दिया जाता है, लेकिन उसके प्रशिष्‍ट काला-चरित्र के कारण जटिलता तथा दुर्बोधता और अनेकार्थकता को भी दुर्गुण नहीं माना जाता, साहित्यिक पत्रकारिता की भाषा शैली पर इसका कुछ-न-कुछ असर तो पड़ता ही है।

सामान्य पत्रकारिता जहाँ लोकमत के निर्माण और उसकी अभिव्यक्ति का माध्यम होती है, वहीं साहित्यिक पत्रकारिता लोकरंजन, लोक-शिक्षण और जनरुचि के परिश्कार का प्रयास करती है स इसीलिए उसका स्वरूप वैचारिक, संवेदनात्मक और मनोरंजनपरक होता है, लेकिन यहाँ ”संवेदनात्मक” का अर्थ तथाकथित ”शुद्ध साहित्य” के झंडावरदारों की समाज-निरपेक्ष और विचारधारा से परहेज प्रचारित करने वाली कृत्रिम और रहस्यात्मक संवेदना से नहीं है। इसी तरह ”मनोरंजन” का अर्थ व्यावसायिक और बाजारू पत्रिकाओं के फूहड़ और विकृतिपूर्ण समाज-विरोधी और सस्ते मनोरंजन से नहीं है। कहना न होगा कि साहित्यिक पत्रकारिता का उद्देश्‍य मुक्तिबोध की ”ज्ञानात्मक संवेदन और संवेदनात्मक ज्ञान” की अवधारणा को अपना आदर्श मान कर चलना चाहिए स श्रेष्‍ठ-साहित्य के आदर्शों और उद्देश्‍यों से भिन्न आदर्श और उद्देश्‍य साहित्यिक पत्रकारिता के हो ही नहीं सकते। दोनों एक न होते हुए भी अन्योन्याश्रित हैं।

साहित्यिक पत्रकारिता का चरित्र स्वरूप

साहित्यिक पत्रकारिता के चरित्र-निरूपण और उसके प्रशिष्‍ट स्वरूप पर विचार करेत हुए हमें गंभीर साहित्यिक पत्रिकाओं को फिल्म, संगीत, राजनीति और धर्म आदि की तरह ”साहित्य” का भी धंधा करने वाली व्यावसायिक पत्रिकाओं से अलगाकर देखना चाहिए। यह अंतर आज़ादी के पहले से रहा है। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि ऐसा अंतर साहित्यिक पत्रकारिता के जन्म के समय से ही रहा है। शुरु से ही साहित्यिक पत्रिकाएँ सदैव सत्ता-तंत्र और व्यवसाय-तंत्र से जुड़ी या उनकी हितपोशक प्रतिष्‍ठानी और सेठाश्रित पत्रिकाओं से अलग, बल्कि विरोधी रही हैं, भले ही इस विरोध तथा प्रतिरोध की शैली उसका स्वरूप कितना ही भिन्न-भिन्न क्यों न हो।

यह अंतर ”उदंतमार्तंड”. ”सुधाकर”, ”प्रजाहितैशी” या ”पयाम-ए-आज़ादी” का ”बनारस अखबार” जैसे पत्रों से साफ झलकता है। यह अंतर भारतेन्दु की ”कविवचनसुधा” और धड़फले के हाथ में जाने के बाद की स्तरहीन और पतित ”कविवचनसुधा” में और भी प्रत्यक्ष है। यह अंतर ”सरस्वती” (महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन-काल की), ”माधुरी”, ”मतवाला”, ”सुधा”, ”चाँद”, ”हंस”(प्रेमचंद के संपादन-काल से लेकर अमृत राय-रामविलास शर्मा-शिवदानसिंह चौहान के प्रगतिवादी-काल तक का), ”विप्लव”, ”नय साहित्य”, ”रूपाभ” सहित ऐसी ही अनेक छोटी-बड़ी साहित्यिक पत्रिकाओं तथा बाजारू और व्यावसायिक पत्रिकाओं के बीच सदैव रहा है। कहना न होगा कि हमारा ” हिन्दी साहित्य का इतिहास” इन महत्वपूर्ण पत्रिकाओं से ही अस्तित्व में आया है।

आज़ादी के बाद यह अंतर ”कल्पना”, (बदरी विशाल पित्ती एवं अन्य), ”समालोचक” (रामविलास शर्मा), ”प्रतीक” (अज्ञेय), ”नया पथ” (यशपाल एवं अन्य), ”कृति” (श्रीकांत वर्मा), ”आलोचना” (नामवर सिंह), ”वसुधा” (हरिशंकर परसाई), ”कहानी” (श्रीपत राय), ”लहर” (प्रकाश जैन और मनमोहिनी) और ”नई कहानियाँ” (कमलेश्‍वर, फिर भीष्‍म साहनी) जैसी श्रेष्‍ठ साहित्यिक पत्रिकाओं तथा व्यावसायिक घरानों की प्रतिष्‍ठानी और सेठाश्रयी पत्रिकाओं –”धर्मयुग”, ”साप्ताहिक हिन्दुस्तान”, ”ज्ञानोदय”, ”सारिका”, ”निहारिका” और ”कादम्बिनी” आदि के बीच बड़ा स्पष्‍ट रहा है। यह अंतर सारी दुनिया में और विश्‍व की प्रायः अभी भाषाओं की साहित्यिक पत्रिकाओं और राजसत्ता (भले ही उसे ”जनसत्ता” का झूठा नाम दें) या धनसत्ता की होतपोशक प्रतिष्‍ठानी पत्रिकाओं में रहा है। इस अंतर के कारण ही दुनिया-भर में साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में ”लघुपत्रिका” या ” लिटिल मैगज़ीन” आंदोलन होते रहे हैं।

लघु-पत्रिका आंदोलन

हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के संदर्भ में जब उपर्युक्त अंतर और फलस्वरूप विचारधारात्मक संघर्ष बहुत तीव्र हो गया तो सन् 60 के बाद साहित्यिक और व्यावसायिक पत्रिकाएँ एक-दूसरे के विरुद्ध एक बड़ी लड़ाई में भिड़ गईं, यह लड़ाई कमोबेश आज भी जारी है, इस सातवें दशक के मध्य में ही हिन्दी में ”लघु-पत्रिका” आंदोलन के रूप में ऐसा जबर्दस्त साहित्यिक विस्फोट हुआ कि सेठाश्रयी और व्यावसायिक प्रतिष्‍ठानी पत्र-पत्रिकाओं का पूरी तरह भट्ठा बैठ गया। उनमें श्रेष्‍ठ रचनाओं और श्रेष्‍ठ साहित्यकारों का टोटा पड़ गया।

हिन्दी के युवा और युवतर लेखकों-कवियों और आलोचकों ने इन पत्रिकाओं के खिलाफ सफल्क और ज़ोरदार ”बहिष्‍कार” अभियान चलाया, यहाँ तक कि प्रतिष्ठित बुजुर्ग कवि-लेखक भी इन पत्रिकाओं में छपने से हिचकिचाने लगे, इनमें छपने वाले लेखक साहित्यिक मान्यता और साहित्यिक प्रतिष्‍ठा के लिए तरसते रह गए, जो प्रतिष्ठित और लोकप्रिय लेखक इनमें छपता था, उसे पूरे साहित्य-जगत का विरोध और बहिष्‍कार झेलना पड़ता था।

हिन्दी का यह लघु-पत्रिका आंदोलन इतना लोकप्रिय और प्रभावी सिद्ध हुआ कि प्रायः सभी भारतीय भाषाओं में साहित्यिक लघु-पत्रिकाओं का ज्वार आ गया। स्मरणीय है कि ऐसे ही विचारधारात्मक और सर्जनात्मक संघर्ष में से ही यूरोप में ”प्रोटेस्ट मूवमेंट” उभरकर सामने आए थे तथा विश्‍व-भर में छा गए थे, हिन्दी में उभरा यह ”लघु-पत्रिका आंदोलन” अब तो एक तरह से साहित्येतिहास और साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास का भी अंग बन चुका है। कालांतर में साहित्यिक पत्रिकाओं के च्वरूप में भारी परिवर्तनों के बाद भी उनके लिए ”लघु-पत्रिका” या ”अव्याओकर लोक-प्रचलितवसायिक” पत्रिका नाम ही सर्वमान्य और रूढ़ होकर लोक-प्रचलित हो चुका है। वास्तव में, ऐसी पत्रिकाएँ ही साहित्यिक पत्रिकाएँ हैं, मानी जाती हैं।

नया दौर: ”वाम वाम वरम दिशा …….”

सन् साठ के बाद एक जबर्दस्त आंदोलन की तरह आरंभ हुआ लघु-पत्रिकाओं का यह अभियान अनेक उतार-चढ़ावों के बाद, सत्तर और अस्सी के दशकों में प्रगतिशील और वामपंथी रुख अख्तियार कर लेता है। इसकी परिणति इस रूप में होती है कि एक ओर जहाँ उपर्युक्त प्रतिष्‍ठानी पत्रिकाएँ या तो बंद हो जाती हैं अथवा अप्रासंगिक होकर अपना प्रभाव खो देती हैं, वहीं ” आलोचना” (नामवर सिंह एवं नंद किशोर नवल) के अलावा ”पहल” (ज्ञानरंजन), ”लहर” (प्रकाश जैन और मनमोहिनी), ”प्रगतिशील वसुधा” (कमला प्रसाद), ”उत्तरार्ध” (सव्यसाची), ”कथा” (मार्कण्डेय), ”कलम” (चंद्रबली सिंह), ” ओर” (विजेन्द्र्), ”क्यों” (मोहन श्रोत्रिय और स्वयं प्रकाश),” आरम्भ” (नरेश सक्सेना और विनोद भारद्वाज),”धरातल” (नंदकिशोर नवल), ”कथा” (मार्कण्डेय), ”समासम्भ” (भैरवप्रसाद गुप्त),”इसलिए” (राजेश जोशी) और ”कसौटी” (नंदकिशोर नवल)– जैसी श्रेष्‍ठ साहित्यिक पत्रिकाएँ अपने दौर की साहित्यिक पत्रकारिता का प्रतिनिधित्व करती हैं। कुछ पुरानी और प्रतिष्ठित लघु-पत्रिकाएँ तथा कई नई पत्रिकाएँ चंद अविस्मरणीय विशेषांक प्रकाशित कर धीरे-धीरे पृष्‍ठभूमि में चली गईं।

दैनिक समाचारपत्रों में साहित्यिक पत्रकारिता

प्रायः सभी दैनिक, पाक्षिक और साप्ताहिक अखबारों में हमें छिट-पुट साहित्यिक रूझान उनके रविवारीय संसकारणों में तो दिखता है, लेकिन इस क्षेत्र में उनका कोई महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय योगदान नहीं दिखता, अपवाद स्वरूप, प्रमुख प्रगतिशील दैनिक ”जनयुग” में न केवल यह साहित्यिक-विचारधारात्मक रूझान स्पशष्‍ट नज़र आता है, बल्कि उसका रविवारीय परिशिष्‍ट मुख्यतः साहित्य को ही समर्पित होता था, कुल चार पृष्‍ठों के इस परिषिष्‍ट में एक विचारधारत्मक अग्रलेख और छोटे से बच्चों के कोने के अलावा शेष प्रायः तीन-साढ़े तीन पृष्‍ठ साहित्य को ही समर्पित होते थे।

”जनसत्ता” ने भी अपने रविवारीय परिषिश्ट में इस परंपरा का मंगलेश डबराल के संपादन में निर्वाह किया। इसीतरह जब तक राजेंद्र माथुर रहे ”नवभारत टाइम्स” ने भी कुछ स्थान साहित्यिक पत्रकारिता के लिए दिया। लेकिन कालांतर में इस श्रेष्‍ठ परंपरा का अवसान हो गाया, नब्बे के दशक के मध्य तक भूमंडलीकरण की आँधी में साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता के पैर उखड़ने लगे स धीरे-धीरे आज हम एक ऐसे विचार-शून्य — या कहें प्रायोजित मीडिया के प्रायोजित विचारों में डूबते -उतराते अपढ़ समाज और सांस्कृतिक-शून्‍यता की ओर बह रहे हैं, एक ऐसा समाज जहाँ उपभोक्तावाद के दलदल की ओर ढकेलती अपसंस्कृति की गहरी ढलान है।

अंतिम उल्लेखनीय प्रयास

इस स्थिति से निकलने की कोशिश में देश भर के उत्तर भारत के हिन्दीभाषी, प्रमुख साहित्यकारों-संपादकों की 29-30 अगस्त,1992 को कलकत्ता में साहित्यिक लघु-पत्रिकाओं की पहली राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठी हुई। इसी कड़ी में 14-15 मई, 1991 को जमशेदपुर में राष्‍ट्रीय समन्वय समिति गठित की गई। लेकिन साहित्यिक पत्रकारिता को पुनः उसके श्रेष्‍ठ और उच्चतर धरातलों पर प्रतिष्ठित कर पाने के सभी प्रयास आशातीत रूप में फलप्रद नहीं हो पाए।

मुख्य बात यह है कि ये सभी साहित्यिक पत्रिकाएँ अपने कलेवर, आकार और साज-सज्जा में भले ही ”लघु” पत्रिकाएँ थीं, अपने प्रभावी साहित्यिक मूल्यांकन, श्रेष्‍ठ रचनाओं के प्रकाशन और प्रतिभाशाली नए लेखकों की नई से नई पीढ़ियाँ तैयार करके उन्हें प्रशिक्षित करने की दृष्टि से बिल्कुल भी लघु या छोटी नहीं कही जा सकतीं स ये अपनी अंतर्वस्तु (कन्टेन्ट) और वैचारिक प्रतिबद्धता की दृष्टि से निस्संदेह बड़ी- बहुत बड़ी पत्रिकाएँ ही कही जाएँगी। अपने युग की प्रतिनिधि और भावी साहित्येतिहास का कच्चा माल, एक तरह से साहित्य रचना और मूल्यांकन के प्रशिक्षण के संस्थान, विश्‍वविद्यालय !!

वास्तव में, ये सभी पत्र-पत्रिकाएँ सत्ता-तंत्र और व्यवसाय-तंत्र की तथाकथित ”बड़ी” और रंगीन, सेठाश्रयी, बाजारू पत्रिकाओं से भिन्न, यथार्थ में साहित्यिक पत्रिकाएँ हैं, चाहे इन्हक पत्रिकाएँ ”गैर-व्यावसायिक पत्रिकाएँ” कहा जाए या ”प्रतिष्‍ठान-विरोधी” और ”श्रमजीवा पत्रिकाएँ” कहा जाए अथवा लोक-प्रचलित ”लघु-पत्रिकाएँ” , साहित्यिक पत्रकारिता के श्रेष्‍ठ और सच्चे प्रतिमान हमें इन्हीं पत्र-पत्रिकाओं में दृष्टिगोचर होते हैं।

संदर्भ:-

1) ”पत्रकारिता और संपादन कला”, (सं0 डॉ0 रामप्रकाश) में नेमिशरण का लेख, पृ0 116

हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता (4)

अब तक के विवेचन से यह तो स्पष्‍ट हो ही जाता है कि साहित्यिक पत्रकारिता मात्र तकनीक नहीं, बल्कि भाषिक और विचारधारात्मक चेतना भी है। भाषिक संवेदना और वैचारिक चेतना के साथ ही वह साहित्य और अन्य ललित कलाओं की तरह खुद भी एक सर्जनात्मक और कलात्मक रूप है।

कला भी और विज्ञान भी

जैसा कि ऊपर कहा गया है, साहित्यिक पत्रकारिता एक कला है— एक ऐसी कला जो अपने सर्वोच्च स्तरों पर सर्जनात्मक साहित्य से होड़ करती है। कह सकते हैं कि कला और सर्जनात्मक संगठन का समन्वित प्रयास लेखक अगर लिख कर सृजन करता है, तो एक श्रेष्‍ट साहित्यिक पत्रकार अपनी संगठनात्मक क्षमता, संपादन सामर्थ्य और वस्तुनिष्‍ट आलोचनात्मक विवेक से साहित्य को कलात्मक गतिशील रूप, नवोन्मेश की चेतना और लोकोन्मुख प्रगतिशील दिशा दे सकता है। कहना न होगा कि इन कलात्मक और संगठनात्मक साहित्यिक प्रयासों को भी व्यापक अर्थ में सर्जनात्मक ही कहा जाएगा।

इस दृष्टि से देखें तो भारतेन्दु हरिश्‍चन्द्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, निराला, रामविलास शर्मा, यशपाल, हरिशंकर पएासाई और नामवर सिंह की साहित्यिक पत्रकारिता किस लेखक के सर्जनात्मक और कलात्मक प्रयासों से कम है, इसीलिए, और ठीक इन्हीं अर्थों में, श्रेष्‍ठ साहित्यिक पत्रकारिता एक विज्ञान भी है। कहना न होगा कि अपने खास अर्थों में आज के संचार क्रांति के उत्तर-औद्योगिक परिदृश्‍य में साहित्यिक पत्रकारिता भी— सामाजिक चेतना को एक सुनिश्चित रूप एवं दिशा देने में तथा साथ ही लोकमत की सूक्ष्म प्रक्रिया को प्रभावित करने में अपना विशेष योगदान देती है। सामान्य पत्रकारिता की तुलना में साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता की यह भूमिका, प्रक्रिया के स्तर पर, अधिक जटिल एवं सूक्ष्म तथा प्रभाव की दृष्टि से अधिक स्थायी किन्तु लगभग अदृश्‍य होती है। साहित्यिक पत्रकारिता लोकमत-निर्माण और लोक-शिक्षण का कार्य भी परोक्ष ढंग से करती है। इस प्रकार वह समाज की विचार-चेतना के विकास में और व्यापक सांस्कृतिक एवं सामाजिक जनरुचि के परिश्कार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है स वह भी संचार-क्रांति की कार्य प्रणाली और नियमों – अवधारणाओं का कमोबेश अनुसरण करती है।

एक सामान्य पत्रकार और संपादक की तरह साहित्यिक पत्रकार और संपादक को भी आज की अधुनातन प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी, कलात्मक रूप-सज्जा और मूल्यांकन में वैज्ञानिक वस्तुपरकता का अभ्यस्ज्ञान की जात तथा विज्ञान की जानकारी से लैस होना चाहिए। एक कुशल साहित्य संपादक और साहित्यिक पत्रकार के पास वैज्ञानिक की वस्तुनिष्‍ठता और सर्जक कलाकार की अंतष्चेतना, दोनों का होना लगभग अनिवार्य है।

साहित्यिक पत्रकारिता के विविध रूप और भेद

साहित्यिक पत्रकारिता के इस स्वरूप-विस्लेशण और चरित्र-निरुपण के बाद, उसके उन प्रमुख भेदों पर भी विचार करना प्रासंगिक होगा जिनके आधार पर हम उसकी विभिन्न शाखाओं अथवा अलग- अलग क्षेत्रों के आधार पर उसका विभाजन इस प्रकार किया जा सकता है —-

1) प्रस्तुतिकरण के आधार पर ;(2) अवधिपरक विभाजन ; (3) विधापरक विभाजन ; (4) भाषिक आधार पर ; (5) प्रकाशकीय आधार पर ; तथा (6) विचारधारापरक विभाजन

1)प्रस्तुतिकरण के आधार पर विभाजन

यह सुज्ञात है कि आज समूची पत्रकारिता का विभाजन प्रस्तुति के आधार पर, दो अलग- अलग सर्वथा स्वतंत्र क्षेत्रों में हो चुका है: (क) प्रिंट मीडिया ; और (ख) इलेक्ट्रॉनिक मीडिया। इसी तरह, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी, इसी आधार पर तीन भिन्न क्षेत्रों में सक्रिय है: (क) रेडियो (ख) टेलीविज़न और वेब-मीडिया (न्यू-मीडिया)। समग्र जनसंचार और पत्रकारिता का ही एक अभिन्न अंग होने के कारण साहित्यिक पत्रकारिता का भी प्रस्तुतिकरण के आधार पर इन स्वतंत्र क्षेत्रों में विभाजन किया जा सकता है। इन क्षेत्रों में प्रस्तुत की जाने वाली श्रव्य ( ऑडियो) और दृश्‍य-श्रव्य (ऑडियो- विज़ुअल) साहित्यिक सामग्री साहित्यिक पत्रकारिता है।

इनके अंतर्गत विभिन्न साहित्यिक कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं। पहले यह सामग्री पत्र-पत्रिकाओं में छपती थी ; अब रचना पाठ और पुस्तक समीक्षा से लेकर साहित्यिक सभा-सम्मेलनों की रपटें, साहित्यकारों के बीच वाद-विवाद या संवाद और बहस या विमर्ष तहा प्रतिष्ठित बड़े लेखकों से साक्षात्कार, उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर कार्यक्रम आदि रेडियो, टेलीविज़न और इंटरनेट पर प्रसारित होते हैं। यू-ट्यूब आदि पर स्थायी रूप से भी उपलब्ध रहते हैं।

2) अवधिपरक विभाजन:

इसी तरह साहित्यिक पत्रकारिता का अवधिपरक विभाजन भी किया जा सकता है। दैनिक और साप्ताहिक समाचारपत्रों के विपरीत साहित्यिक पत्रिकाएँ प्रायः मासिक, द्विमासिक, त्रैमासिक और कभी छमाही या सालाना संकलनों के रूप में ही होती हैं। साप्ताहिक ”मतवाला”- जैसे कुछ अपवाद भी होते हैं, जैसे कि पहले दैनिक ”जनयुग” और अब ”जनसत्ता” के साप्ताहिक साहित्यिक परिशिष्‍टों के रूप में दैनिक अखबारों में भी हमें अपवाद-स्वरूप गंभीर साहित्यिक पत्रकारिता के दर्शन होते हैं। अवधि के आधार पर साहित्यिक पत्रिकाओं और साहित्यिक पत्रकारिता का विभाजन मुख्यतः तीन तरह से किया जा सकता है: मासिक, द्विमासिक और त्रैमासिक।

लेकिन यह विभाजन केवल नियमित रूप से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिकाओं पर ही लागू हो सकता है। लघु-पत्रिका आंदोलन के दौरान जो हज़ारों नहीं भी , तो सैंकड़ों साहित्यिक पत्रिकाएँ निकलीं, वे प्रायः ”अनियतकालीन” ही निकलीं स जो निश्चित अवधि वाली नहीं थीं, वे भी आगे चलकर अनियतकालीन बन गईं और अंततः बंद भी हो गईं स जो निश्चित अवधि में अब भी नियमित रूप से निकल रही हैं, उनमें मासिक ”हंस” (हाल ही में मृत्यु से पूर्व तक सं0 राजेन्द्र यादव) तथा ”पखी” (सं0 प्रेम भारद्वाज) तथा द्विमासिक ”पुस्तकवार्ता” (सं0 भारत भारद्वाज) और त्रैमासिक ” आलोचना”(प्र0सं0 नामवर सिंह)–जैसी प्रतिनिधि पत्रिकाओं का उल्लेख किया जा सकता है। उसी तरह अनियतकालीन पत्रिकाओं के प्रतिनिधित्व में ”पहल” (सं0 ज्ञानरंजन) और ”दस्तावेज़” (सं0 विस्वनाथ प्रसाद तिवारी) का ज़िक्र अकिया जा सकता है। इनमें से ”पहल” का हाल ही में 98 वाँ अंक आया है और ”दस्तावेज़” का 145 वाँ।

3) विधापरक विभाजन:

विापरक विभाजन के अंतर्गत साहित्यिक का विभाजन मुख्यतः चार तरह से किया जा सकता है: (अ) कहानी पत्रिका, (ब) कविता संबंधी पत्रिका, (स) आलोचना और पुस्तक समीक्षा संबंधी पत्रिका तथा (द) सर्वविशय- संग्रह परक पत्रिका। आजकल साहितय की सभी विधाओं को कम या ज़्यादा स्थान देने वाली पत्रिकाएँ ही अधिक हैं। फिर भी, किसी एक मुख्य विधा को प्रमुखता देने के साथ थोड़ी बहुत अन्य सामग्री या कसी दूसरी विधा की चंद रचनाओं को भी शामिल करने वाली साहित्यिक पत्रिकाएँ भी खासी बड़ी संख्या में हैं। लेकिन पुस्तक समीक्षाएँ तो प्रायः प्रत्येक पत्रिका का अनिवार्य अंग हैं।

किसी एक ही विधा दृढ़ता से केंद्रित पत्रिकाएँ अपवादस्वरूप ही कही जा सकती हैं ; जेसे कि पुस्तक समीक्षाओं की पत्रिकाएँ, ”समीक्षा” (सं0 गोपाल राय) और ”पुस्तकवार्ता” तथा कहानी की पत्रिकाएँ ”कहनी” और ”नई कहानियाँ”। कमलेश्‍वर के संपादन में निकलने वाली ”सारिका” भी कहानी-केंद्रित पत्रिका ही थी, जो बंद हो चुकी है। इसी तरह कविता-केंद्रित पत्रिका ”कविता” (सं0 जुगमिंदर तायल और भगीरथ), नेमिचंद्र जैन की ”नटरंग” नाटक” केंद्रीय पत्रिका में थी। आलोचना” है तो मुख्यतः समालोचनाओं और पुस्तक समीक्षाओं की पत्रिका, लेकिन उसमें प्रायः साहित्य, संस्कृति और राजनीति से संबंधित देशी-विदेशी विद्वानों के लेख ( अनुवाद भी) तथा कभी-कभार कोई साक्षात्कार या चंद मौलिक अथवा अनूदित कविताएँ भी स्थान पा जाती हैं।

4) भाषिक आधार पर विभाजन:

कुछ साहित्यिक पत्रिकाएँ हिन्दी के साथ हिन्दी के साथ ही उसकी जनपदीय बोलियों, यथा बुंदेली, छत्तीसगढ़ी, अवधी, बघेली, भोजपुरी, मैथिली, ब्रज, नेमाड़ी, पहाड़ी, हरियाणवी, मारवाड़ी और राजस्थानी आदि की रचनाएँ भी छपती हैं। कुछ पत्रिकाएँ इन जनपदीय उपभाषाओं-बोलियों में निकलती हैं, जिन्हें हम विशाल हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता की व्यापक परिधि में गिन सकते हैं। कुछ पत्रिकाएँ हिन्दी के साथ ही उर्दू और अंग्रेज़ी के भी हिस्सों के साथ द्विभाषी निकलती हैं। पहली मिसाल ”शेष” (सं0 और दूसरी महात्मा गाँधी अंतर्राष्‍ट्रीय हिन्दी विश्‍वविद्यालय की पत्रिका ”हिन्दी: ”भ्प्छक्प्” (सं0 ममता कालिया) कही जा सकती हैं।

5) प्रकाशकीय आधार पर विभाजन:

प्रकाशकीय आधार पर भी साहित्यिक पत्रिकाओं का विभाजन इस तरह किया जा सकता है:

अ) दृढ़्तापूर्वक पूर्णतः साहित्य को समर्पित पत्रिकाएँ, जो मुख्यतः प्रायः ”लघु पत्रिकाओं” की श्रेणी में

आती हैं और इन पर विस्तार से चर्चा की भी जा चुकी है।

ब) प्रकाशकों, विश्‍वविद्यालयों, साहित्यिक संस्थाओं या ऐसे ही प्रतिष्‍ठानों से निकलने वाली साहित्यिक

पत्रिकाएँ। मिसाल के लिए ”आलोचना” (राजकमल प्रकाशन), ”पुस्तक वार्ता” और ”बहुवचन” (म0गाँ0

अं0 वि0वि0वर्धा), ”माध्यम” (हिन्दी साहित्य सम्मेलन) तथा ”नटरंग (नटरंग मटरंग प्रतिश्ठान)- जैसी

पत्रिकाएँ,।

स) उद्योग के स्तर पर व्यावसायिक इज़ारेदार घरानों की मिल्कियत ( ओनरशिप) में निकलने वाली

पत्रिकाएँ, मिसाल सपम ”ज्ञानोदय” ( अब ”नया ज्ञानोदय” नाम से सारिका और ”धर्मयुग” (साहू

जैन का ”टाइम्स गु्रप”), ”साप्ताहिक हिन्दुस्तान” (बिड़ला गु्रप) तथा

द) सरकारी पत्रिकाएँ, लेकिन इस श्रेणी में प्रायः निकृष्‍ट किस्म की पत्रिकाएँ होती है। फिर भी जब कोई अच्छा साहित्यकार उनका संपादक बन जाता है तो कुछ अंक अच्छे निकल जाते हैं। मिसाल के लिए ”पूर्वग्रह” (सं0 अषोक वाजपेयी), ”साक्षात्कार” (सं0 सोमदत्त) और ”आजकल” (सं0 पंकज बिष्‍ट) का नाम उल्लेख किया जा सकता है। साहित्य अकादमी की ”समकालीन भारतीय साहित्य” भी

6) विचारधारापरक विभाजन:

विचारधारा के आधार पर भी साहित्यिक पत्रिकाओं का विभाजन दो तरह का विभाजन है —-

1) राजनीतिक तौर पर ; जैसे कि भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी से जुड़े लेखकों की ”पहल”, ”वसुधा”, ”क्यों”, ” ओर”, आदि पत्रिकाएँ माकपा से जुड़ी ”उत्तरार्ध”, ”कलम” और ”नया पथ” बहुत पहले भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (अविभाजित) ने हिन्दी, उर्दू और अंग्रेज़ी में ”नया साहित्य”, ”नया अदब” और ”इंडियन लिटरेचर” नाम से अत्यंत श्रेष्‍ठ साहित्यिक पत्रिकाएँ प्रकाशित की थीं। लेकिन ये सभी अल्पायु ही साबित हुईं।

दूसरी तरफ, (ख) साहित्यिक आंदोलनों के आधार पर भी विभाजन किया जा सकता है। जैसे कि प्रगतिवादियों का ”हंस” ( अमृत राय), ”विप्लव” (यशपाल), ”वसुधा” (हरिशंकर परसाई) और समालोचक (रामविलास शर्मा)–जैसी साहित्यिक पत्रिकाएँ तो थीं, तो प्रगति-विरोधिायों की ”प्रतीक” (अज्ञेय्), ”निकश” (धर्मवीर भारती) और अन्य परिमलीय, ”नयी कविता” (जगदीश गुप्त एवं अन्य परिमलीय गुट) आजकल विचारधारात्मक आधार पर साहित्यिक पत्रिकाओं का विभाजन पाश्‍चात्‍य अस्तित्ववादी, विखंडनवादी, रूपवादी–जैसी तमाम विचारधाराओं और आंदोलनों से प्रभावित और उनकी प्रचारक पत्रिकाओं तथा प्रगतिशील वामपंथी और भूमंडलीकरण की विरोधी तथा प्रतिबद्ध और प्रतिरोध की संघर्षधर्मी साहित्यिक पत्रिकाओं के बीच किया जा सकता है।

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हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता (5)

हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता की शुरुआत, जैसा कि पहले भी उल्लेख किया जा चुका है, भारतेन्दु हरिश्‍चंद्र की पत्रिका ”कविवचनसुधा” के 15 अगस्त, 1861 ई0 से, बनारस से प्रकाशन के साथ होती है। भारतेन्दु न केवल आरंभकर्ता थे, बल्कि उन्होंने अपनी नेतृत्वकारी प्रतिभा से साहित्य और पत्रकारिता के बिखरे हुए सारे सूत्रों को समेट कर एक नए युग का सूत्रपात किया। भारतेन्दु की साहित्यिक पत्रकारिता से ही हिन्दी साहित्य की नई-से-नई गद्य-विधाओं की शुरुआत हुई। ”भारतेन्दु-समग्र” के संपादक हेमंत शर्मा ने यह ठीक लिखा है कि, “आज की पत्रकारिता का ऐसा कोई रूप नहीं जिसका बीज भारतेन्दु में न हो’’। उन्होंने साहित्य को देशहित से जोड़कर, अपनी पत्रकारिता के माध्यम से, भाषा-शैली और लोकप्रियता के ऊँचे तथा कलात्मक मानदंड स्थापित किए।

साहित्यिक पत्रकारिता के हमारे अब तक के विवेचन से, सबसे महत्वपूर्ण बात यह उभरकर सामने आती है कि वह प्राचीनकाल के यूनानियों की उस दोधारी कटार की तरह पैदा हुई थी जिसे ग्रीक भाषा में ”स्तिलुस” (STILUS) कहा जाता था। यह लिखने और घोंपने, दोनों कामों में प्रयुक्त होती थी। हमारे 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की क्रांतिकारी चेतना के साथ विकसित इस साहित्यिक पत्रकारिता की एक धार यदि देश को गुलाम बनाने वाले ब्रिटिश साम्राज्यवाद की ओर तनी थी, तो दूसरी धार उनके पिट्ठुओं, देषी रजवाड़ों, ज़मींदारों, महाजनों और धर्म के ठेकेदार पाखंडियों, रूढ़ियों तथा सामाजिक कुरीतियों की ओर तनी थी। हमारे अब तक के वर्णन, विश्‍लेषण और विवेचना से साहित्यिक पत्रकारिता का स्वरूप, उसके क्षेत्र और वर्गीकरण के साथ ही, उसके इतिहास की भी एक हल्की सी रूपरेखा उभरती हुई दृष्टिगोचर हुई होगी। वस्तुतः हमारे इस प्रबंध के प्रस्तुत पाँचवें और अंतिम खंड की विषय-वस्तु भी यही है।

साहित्यिक पत्रकारिता का इतिहास

साहित्यिक पत्रकारिता का इतिहास हमरे साहित्य के इतिहास का अभि का अभिन्न अंग है ; और साहित्य का इतिहास हमारे समग्र साँस्कृतिक और सामाजिक इतिहास का अंग है। इनमें उठने वाली परिवर्तनों की लहरें एक-दूसरे से प्रभावित होती हैं और परस्पर एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं। लेकिन साहित्य के इतिहास की कुछ धीमी गति की तुलना में साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास की गति कुछ तीव्रतर होती है। इसीतरह सा से उस पर तामान्य पत्रकारिता के इतिहास का एक हिस्सा होने की वजह से उस पर तात्कालिकता और एक हद तक समसामयिक दवाबों का भी तुलनात्मक रूप से अधिक असर दिखता है, फिर भी अपने खास चरित्र के कारण साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास, उसके काल-विभाजन, भाषा-शैलीगत विविध परिवर्तनों और प्रवृत्तियों के टकराव या सामंजस्य आदि का अपना वैशिष्‍टय तो होता ही है, मोटे तौर पर हम हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास को मुख्यतः दो बड़े कालखंडों में विभाजित कर सकते हैं: (क) आज़ादी से पहले की साहित्यिक पत्रकारिता ; और (ख) आज़ादी के बाद की साहित्यिक पत्रकारिता, भारत्येन्दु युग से आरंभ करते हुए, हम भारतेन्दु-युग से पहले के कालखंड को इस इतिहास की पृश्ठभूमि भी मान सकते हैं अर्थात ”उदंतमार्त्तांड” के प्रकाशन (30 मई, 1826) से लेकर ”कविवचनसुधा” के प्रकाशन (15 अगस्त, 1867) तक ”भारतेन्दु-पूर्व युग या हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास की ”पृष्‍ठभूमि” से आगे के दोनों प्रमुख युगों के भीतर भी हम इस प्रकार कालविभाजन कर सकते हैं —-

क) स्वतंत्रता पूर्व की साहित्यिक पत्रकारिता (1867-1947 ई0)

1) भारतेन्दु-बालमुकुन्द गुप्त युग ; (1867-1902)

2) द्विवेदी-प्रेमचंद युद ; (1900-1935)

3) प्रगतिवादी युग ; तथा (1936-1950-53)

ख) स्वातंत्र्योत्तर साहित्यिक पत्रकारिता (1947 से लेकर आज तक)

1) प्रगति-प्रयोग का द्वंद्व तथा प्रगति-विरोधी विचारधराओं का दौर (1947-1964)

2) लघु पत्रिका आंदोलन का दौर ; (1964- 1974)

3) आपात्काल और उसके बाद का दोर ; तथा (1975-1995)

4) भूमंडलीकरण और उसके प्रतिरोध अन औरका समकालीन दौर (1995 …….)

कालविभाजन का वैज्ञानिक आधार

हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के संदर्भ में छिट-पुट काम तो हुए हैं, लेकिन उसके समग्र विवेचन, वैज्ञानिक काल विभाजन और प्रामाणिक दस्तावेज़ीकरण के आधार पर कोई बड़ा काम अभी तक नहीं हुआ है। कहना न होगा कि इस लिहाज़ से हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता का अभी तक कोई इतिहास है ही नहीं ! लेकिन ”इतिहास” न होने पर भी साहित्यिक पत्रकारिता तो रही है और अब भी अस्तित्व में है ; सक्रिय है, गतिशील है। दरअसल, इसे वस्तुनिष्‍ठ ढंग से और प्रामाणिक तथ्यों एवं कालविभाजन की वैज्ञानिक पद्धति से कालक्रमानुसार (क्रॉनोलौजिकली) लिपि-बद्ध करने की ज़रुरत है। मौजूदा पतनशील दौर में तो और भी ज़रूरत है ; ताकि इस ”इतिहास” की क्रांतिधर्मी चेतना से प्रेरणा लेकर एक नए वनजागरण की मशाल जलाई जा सके।

इतिहास में हम एक नए युग की समाप्ति और नए युग के आरंभ की कोई तिथि निर्धारित करते हैं तो उसका अर्थ यह नहीं कि ठीक उसी दिन से युग बदल गया और तदनुरूप उसकी प्रवृत्तियाँ भी एक से दूसरे युग के दरम्यान एक संक्रमणकाल (ट्राँज़ीशनल पीरियड) होता है ; और कभी-कभी तो यह दौर खासा लंबा खिंच जाता है। दूसरे, एक युग के दौरान ही आगे आने वाले युग की कतिपय प्रवृत्तियाँ, कुछ लक्षण उभरने लगते हैं। इसी तरह युग परिवर्तन हो जाने पर भी पिछले युग या युगों की कुछ-न-कुछ प्रवृत्तियाँ जारी रहती हैं ; धीरे-धीरे तिरोहित होती हैं फिर भी, हम किसी ऐतिहासिक घटना, किसी खास आंदोलन, साहित्यिक पत्रिका या युगांतरकारी व्यक्ति-विशेष और उनकी किन्हीं निश्चित तिथियों को आधार बनाकर कालविभाजन करते हैं ; यथा, स्वाधीनता-पूर्व और स्वातंत्र्योत्तर से इसी तरह ”कविवचनसुधा” की प्रकाशन-तिथि या ”सरस्वती” का वह अंक जिससे पं0 महावीर प्रसाद द्विवेदी ने संपादन संभाला अथवा आपात्काल और उसमें सेंसरशिप लागू होने का वर्श या देश में तथाकथित ”नयी आर्थिक नीति” लागू होने से बदली हुई परिस्थितियाँ आदि से इन सबका आधार सामाजिक- आर्थिक परिवर्तन और उनसे प्रभावित राजनीतिक, साँस्क्रतिक और साहित्यिक परिवर्तन आदि होते हैं।

अब हम ”हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास” की अत्यंत संक्षिप्त रूपरेखा, उपर्युक्त सात शीर्षकों के अंतर्गत प्रस्तुत करते हुए, युगानुरूप प्रवृत्तियों, आंदोलनों, प्रतिनिधि पत्रिकाओं और इन परिवर्तनों के प्रेरक या वाहक युगांतरकारी व्यक्तियों की भूमिका रेखांकित करने का प्रयास करेंगे। स्मरणीय है कि कोई भी ”इतिहास” पत्र-पत्रिकाओं और व्यक्तियों की नामावली की लंबी-चौड़ी ”सूचि” नहीं होती, ऐसा होने पर वह ”इतिहास” नहीं, रेलवे टाइमटेबल या टेलीफोन डायरेक्टरी बन कर रह जाएगा।

1) भारतेन्दु-बालमुकुन्द गुप्त युग (1867-1902)

”कविवचनसुधा” से हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता का सूत्रपात करते हुए, भारतेन्दु ने 15 अक्टूबर, 1873 से पाक्षिक ”हरिश्‍चंद्र मैगज़ीन” का प्रकाशन शुरु किया। ”सुधा” 15 अगस्त, 1867 में मासिक निकली थी। प्रकाशन के दूसरे वर्ष से वह पाक्षिक, फिर 5 सितंबर, 1873 से साप्ताहिक रूप में निकलने लगी थी। ”मैगज़ीन” भी पाक्षिक थी तथा 8 अंकों के बाद जनवरी, 1874 से उसका नाम ”हरिश्‍चंद्र चंद्रिका” हो गया। भारतेन्दु ने स्त्रियों के लिए भी एक पत्रिका ”बाला-बोधिनी” निकाली थी। डॉ0 रामविलास शर्मा ने ”सुधा” को ”एक युग का सजीव इतिहास” और “भारतेन्दु युग का दर्पण” निरूपित करते हुए लिखा है कि वह सच्चे अर्थों में “जनता के हितों के लिए लड़ने वाले निर्मम सैनिक की तरह थी। कहने की आवश्‍यकता नहीं कि ”सुधा” के बाद यही काम ”मैगज़ीन” और ”चन्द्रिका” ने किया। हिन्दी साहित्य की सभी गद्य-विधाएँ इसी युग में प्रस्फुटित हुईं।

डॉ0 शर्मा ने लिखा है कि भारतेन्दु की पत्रिकाओं का “मूल स्वर देशोन्नति और अंग्रज़ी शासन की नुक्ताचीनी का था और उन्होंने “विभिन्न साँस्कृतिक विषयों को एक ही जगह समेटकर पत्रिका की ऐसी पद्धति चलाई जिसका अनुसरण आगे चलकर हिन्दी की अधिकांश पत्रिकाएँ करती रहीं। भारतेन्दु की पत्रिकाओं के अलावा ”आनंदकादंबिनी” (प्रेमघन), ”भारतेन्दु” (राधाचरण गोस्वामी), ”ब्राह्मण” (प्रतापनारायण मिश्र), ”हिंदी प्रदीप” (बालकृष्‍ण भट्ट), ”सारसुधानिधि” (दुर्गाप्रसाद मिश्र और सदानंद मिश्र) तथा ”भारतमित्र” (बालमुकुन्द गुप्त) इस युग के प्रतिनिधि पत्र-पत्रिकाएँ और उनके यशस्वी संचालक और संपादक हैं, जो भारतेन्दु की इस राह पर दृढ़तापूर्वक जीवनपर्यन्त चले परदेशी वस्तु और परदेशी भाषा का भरोसा मत रखो। अपने देश में अपनी भाषा में उन्नति करो।

बाबू बालमुकुंद गुप्त, पं0 महावीर प्रसाद द्विवेदी के समकालीन थे। डॉ0 शर्मा के अनुसार वे भारतेन्दु युग के ऐसे सिपाही थे जिन्होंने हरिश्‍चंद्र की मृत्यु के बाद सेनापति की कमान संभाली। वे बताते हैं कि ”भारतमित्र” के साथ गुप्त जी का नाम वैसे ही जुड़ा है जेसे ”सरस्वती” के साथ द्विवेदी जी का। डॉ0 शर्मा लिखते हैं कि गुप्तजी “हिन्दी-उर्दू की बुनियादी एकता के प्रबल समर्थक थे। अपनी उग्र राजनीतिक चेतना के कारण वे भारतेन्दु से अधिक बालकृष्‍ण भट्ट के निकट हैं। उनका गद्य ललित और सरस है, इस दृष्टि से वे भारतेन्दु हरिश्‍चंद्र और प्रतापनारायण मिश्र की शैली के अनुवर्ती हैं। किन्तु उनका-सा व्यंग्य उस युग के किसी अन्य लेखक में नहीं है। वाद-विवाद को कलात्मक बना देने में वे अनुपम थे। गुप्त जी इस क्षेत्र में आधुनिक हिन्दी साहित्य के इतिहास में हास्य-व्यंग्य के सिरमौर हरिशंकर परसाई के पूर्वज कहे जा सकते हैं।

2) द्विवेदी-प्रेमचंद युग (1900-1935)

द्विवेदी जी के संपादन काल की ”सरस्वती” को “आधुनिक हिन्दी साहित्य का ज्ञान-कांड“ बताते हुए डॉ0 शर्मा ने इस युग की साहित्यिक पत्रकारिता का उच्च मूल्यांकन किया है। वे लिखते हैं कि ”सरस्वती मर्यादा तथा हिन्दी की अन्य पत्र-पत्रिकाओं में इस समय जो सामग्री निकली, उससे यदि सुधा और हंस में निराला और प्रेमचंद के लेखों की तुलना करें तो यह तथ्य स्पष्‍ट हो जाएगा कि प्रेमचंद की यथार्थवादी धारा और निराला की छायावादी धारा, दोनों द्विवेदी युग से जुड़ी हुई हैं। इसी तरह भाई के भारतेन्दुकालीन लेखकों के भावबोध से द्विवेदी जी के भाव-बोध का अंतर दिखाई देता है। अंतर विचारधारा में नहीं है, अंतर है भाषा और साहित्य की परख में महावीर प्रसाद द्विवेदी और उनकी ”सरस्वती” का मह्त्व यह है कि उन्होंने हिन्दी नवजागरण की बिखरी हुई असंगठित शक्ति को एक जगह एकताबद्ध और संगठित किया।

स्मरणीय है कि ”सरस्वती” द्वारा द्वेवेदी जी के संपादन में 1903 ई0 से यह ऐतिहासिक युगांतर शुरु करने से पहले यह भूमिका माधवराव सप्रे के संपादन में ”छत्तीसगढ़ मित्र” (सन 1900से) आरंभ कर चुका था। डॉ0 नारद के शब्दों में, “माधवदास सप्रे का कृतित्व हिन्दी लेखकों की एक पूरी पीढ़ी तैयार कर देने के लिए भी दृष्‍टव्‍य रहेगा। पं0 महावीर प्रसाद द्विवेदी, पं0 श्रीधर पाठक, पं0 कामताप्रसाद गुरु, पं0 गंगाप्रसाद अग्निहोत्री, पं0 जगन्नाथ प्रसाद शुक्ल, पं0 रामदास गौड़ तथा पं0 नागीश्‍वर मिश्र प्रभुति अन्य अनेक लेखक ऐसे थे जिनकी प्रारंभिक रचनाओं को ”छत्तीसगढ़ मित्र” ने बड़े ही उत्साह से प्रकाशित किया। कहना न होगा कि सप्रे जी बाद में भी ”सरस्वती” में द्विवेदी जी के एक नियमित सहयोगी लेखक के रूप में हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता और हिन्दी नवजागरण में अपना बहुमूल्य योगदान देते रहे। आलोचक रामचन्द्र शुक्ल का ”इतिहास” और उपन्यासकार और पत्रकार प्रेमचंद तथा हिन्दी कविता में छायावाद, नए यथार्थवाद और छन्द-मुक्त प्रगतिवादी नयी कविता का सूत्रपात करने वाले, साथ ही एक प्रखर पत्रकार सूर्यकान्त त्रिपाठी ”निराला” इसी युग की देन हैं। प्रेमचंद के संपादन काल की ”माधुरी” भी (जिसके संपादक मंडल में प्रेमचंद थे) इस हिन्दी नवजागरण के ”ज्ञान कांड” में ”सरस्वती” और ”छत्तीसगढ़ मित्र” की सहोदर पत्र-पत्रिकाएँ थीं।

इनके अलावा, इस युग की अन्य महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में पं0 चंद्रधर शर्मा गुलेरी का अल्पायु ”समालोचक” (1901-02) जयशंकर प्रसाद की ”इंदु” पहले माखनलाल चतुर्वेदी, फिर गणेश शंकर विद्यार्थी, बालकृष्‍ण शर्मा ”नवीन” के संपादन में ”प्रभा”, ”रामरख सहगल की क्रांतिकारी पत्रिका ”चाँद ” (जिसमें छ: नामों, यथा बलवंत सिंह, से भगतसिंह लिखते थे और जिसके जब्तषुदा ”फाँसी” अंक को उन्होंने ही तैयार किया था), अल्पायु ”साहित्य”, ”साहित्य समालोचक”, ”श्री शारदा” और वीणा के नाम उल्लेखनीय हैं। इन साहित्यिक पत्रिकाओं और साहित्यिक पत्रकारों-लेखकों के अलावा दैनिक ”वर्तमान” के संपादक रमाशंकर अवस्थी, शिवपूजन सहाय, राधामोहनद गोकुल जी, सत्यभक्त, इतिहासज्ञ काशीप्रसाद जायसवाल, श्‍यामाचरण राय, जनार्दन भट्ट, डॉ0 बेनीप्रसाद, बैरिस्टर मन्निलाल, रामनारायण शर्मा, नाथूराम प्रेमी, कृष्‍णानंद जोशी, गंगाधर पंत, ईश्‍वरदास मारवाड़ी, नवजादिकलाल श्रीवास्तव, शिवप्रसाद गुप्त, त्रिमूर्ति शर्मा, गिरिजा प्रसाद द्विवेदी, देवीप्रसाद गुप्त, सुंदरराज, सत्यदेव, जगन्नाथ खन्ना, गिरीन्द्रमोहन मिश्र, मधुसूदन शर्मा, वीरसेन सिंह, बदरीदत्त पांडे, संतराम, सीताराम सिंह, शिवप्रसाद शर्मा, धनीराम बख्‍शी, द्वारिकानाथ मैत्र, सिद्धेश्‍वर शर्मा, पृथ्वीपाल सिंह, गुलजारीलाल चतुर्वेदी, श्‍यामसुंदर वर्मा, प्रेम वल्लभ जोशी, रामनारायण मिश्र, कामताप्रसाद गुरु और मिश्र बंधु के नाम उल्लेखनीय हैं। डॉ0 बेनीप्रसाद और राधामोहन गोकुल जी अपने नामों के अलावा ”सत्यशोधक” और ”प्रत्यक्षदर्शी” के नामों से भी लिखते थे।

अंत में, जैसे हम भारतेन्दु-युग के बारे में डॉ0 रामविलास शर्मा की पुस्तकों ”भारतेन्दु हरिश्‍चंद्र और हिन्दी नवजागरण” तथा ”भारतेन्दु-युग और हिन्दी भाषा की विकास परंपरा” से जान सकते हैं, ठीक उसी प्रकार, द्विवेदी-प्रेमचंद युग का भरा-पूरा जीवंत चित्र हमें डॉ0 शर्मा की ”महावीरप्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण” तथा ”प्रेमचंद और उनका युग” पुस्तकों में मिलेगा। ये चारों कालजयी कृतियाँ हिन्दी साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास की अमूल्य धरोहर तथा अनिवार्यतः पठनीय हैं।

3) प्रगतिवादी युग (1936-1950-53)

साहित्य के इतिहासकार प्रगतिवादी के युग को अप्रैल, 1936 से 1953 तक मानते हैं। इसका आधार प्रेमचंद की अध्यक्षता में 9-10 अप्रैल, 1936 को लखनऊ में सम्पन्न प्रगतिशील लेखक संघ (PWA) का स्थापना सम्मेलन है। कुछ लोग 1949-50 तक तो कुछ 1953 तक इसकी कालावधि मानने के पीछे यह तर्क देते हैं कि आज़ादी के बाद कम्युनिस्टों और प्रगतिशील लेखकों के सरकारी दमन और पार्टी की रणदिवे लाइन के संकीर्णवादी दौर में आंतरिक कलह तथा गुटबाजी की वजह से प्रलेसं0 का निष्क्रिय हो जाना स दूसरे लोग, इसके विपरीत मार्च,1953 में दिल्ली सम्मेलन में रामविलास शमजार्ने के नेतृत्व और महासचिव पद से हट जाने के बाद संगठन वास्तव में समाप्त हो गया था और सभी प्रगतिशील पत्र-पत्रिकाएँ भी एक-एक करके बंद हो गईं थीं। अपवाद स्वरूप, सिर्फ हरिशंकर परसाई की ”वसुधा” अवश्‍य 1958 तक निकलती रही।

इसमें कोई संदेह नहीं कि साहित्यिक पत्रकारिता का सबसे क्रांतिकारी, तेजस्वी और साथ ही कलत्मक रूप हमें प्रगतिशील दृष्टिकोण वाली पत्र-पत्रिकाओं और उनके लेखकों-संपादकों के कृतित्व में ही नज़र आता है। ऐसी पत्र-पत्रिकाएँ भारतेन्दु की पत्रिकाओं से लगातार प्रलेसं0 की स्थापना (1936) तक बराबर निकलती रही हैं। इनकी मुख्य विषयवस्तु ब्रिटिश उपनिवेशवादियों की गुलामी से देश की आज़ादी और स्वतंत्र भारत को एक जनवादी, धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी गणतंत्र बनाने के उद्देश्‍य से मज़दूरों, किसानों और तमाम मेहनतकशों से प्रतिबद्धता तथा उनकी समस्याओं को उठाना रही। शोषण-विहीन समाज के स्वप्न और हर तरह के शोषण और दमन का यथार्थ चित्रण करते हुए उसका प्रतिरोध तथा फासीवाद एवं युद्ध के विरोध में शांति और सोवियत संघ का समर्थन ”प्रगतिवादी” साहित्य तथा पत्रकारिता का उद्देश्‍य रहा है। इस दृष्टि से जिन महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं का नामोल्लेख किया जा सकता है, उनमें ”हंस” (प्रेमचंद, उनकी मृत्यु के बाद अमृतराय), ”विप्लव” (यशपाल), ”रूपाम” (पंत), ”नया साहित्य” ,”लोकयुद्ध”, ”जनयुग”, (तीनों कम्युनिस्ट पार्टी), ”चकल्लस”, ”उच्छृंखल” (दोनों अमृतलाल नागर), ”जनता”, ”संघर्ष”, ”नया सवेरा” ,”उदयन” ”वसुधा” (परसाई), ”समालोचक” (राम विलास शर्मा), ”नया पथ” (यशपाल एवं अन्य) और मुक्तिबोध के संपादन में सोख्ताजी का साप्ताहिक ”नया खून” आदि प्रमुख हैं। सभी पत्र-पत्रिकाएँ ठेठ प्रगतिवादी थीं।

4) प्रगति का द्वंद्व तथा प्रगति-विरोधी विचारधाराओं का दौर (1947-1964)

दूसरे विश्‍वयुद्ध के बाद यूरोप और अमेरिका में अंध-कम्युनिस्ट विरोध के साथ ही अस्तित्ववाद, रूपवाद, नयी समीक्षा, संरचनावाद और ऐसी ही तरह-तरह की दार्शनिक, साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में भी आज़ादी के बाद इन आंदोलनों और विचारधाराओं का खासा असर दिखाई देने लगा था। साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में ”प्रगति” और ”प्रयोग” का द्वंद्व तो 1943 में अज्ञेय के संपादन में ”तारसप्तक” के प्रकाशन से ही परिलक्षित होने लगा था ; लेकिन 1947 से अज्ञेय के ”प्रतीक” के प्रकाशन के साथ ही इस संघर्श का स्वरूप भी बदलने लगा था।

पहले जहाँ (”तारसप्तक” और कुछ बाद तक) एक ही प्रगतिवादी परिधि में दो विरोधी दृष्टिकोणों में टकराव था ; जिसे ”प्रगति” बनाम ”प्रयोग” के द्वंद्व का नाम दिया जाता है। इस टकराव का केंद्र आलोचना और कविता के क्षेत्र बने स बाद में नयी कहानी भी षामिल हो गई स एक ही प्रगतिशील धारा के अंतर्गत एक ओर जहाँ रामविलास शर्मा, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन आदि थे ; तो दूसरी ओर ”प्रगतिवाद” की रूढ़ समझ के विरोध में मुक्तिबोध, शमषेर बहादुर सिंह, हरिषंकर परसाई और नामवर सिंह थे, जो नए-नए प्रयोगों को ज़ोरदार वकालत करते थे ।

आज़ादी के बाद अज्ञेय ने ”दूसरा सप्तक” और ”तीसरा सप्तक” के माध्यम से नए ”प्रयोगों” की वकालत को खींचकर ”प्रयोगवाद” के सिद्धांतों और आंदोलन में बदल दिया। दुनिया भर में जिस शीत युद्ध की अंध-कम्युनिस्ट-विरोधी लहर का प्रभाव छाने लगा था, हिन्दी में भी कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम” के प्रवक्ता के तौर पर ”प्रतीक” और ” अज्ञेय” के नेतृत्व में इसकी गोलबंदी होने लगी। जल्दी ही ”नयी कविता” पत्रिका (सं0 जगदीश गुप्त) और ”परिमल” संस्था ( अज्ञेय, जगदीश गुप्त, धर्मवीर भारती, लक्ष्मीकांत वर्मा, विजयदेव नारायण साही आदि) ने भी इस मोर्चे में शामिल होकर ज़ोरदार प्रगति-विरोधी अभियान छेड़ दिया।

प्रगतिशील लेखक संघ, उसकी विचारधारा से जुड़े मंचों, पत्र-पत्रिकाओं के अवसान के बाद इन प्रगति-विरोधियों को खुला मैदान मिल गया। राजनीतिक सत्ता और धनसत्ता के परोक्ष और प्रत्यक्ष समर्थन तथा तमाम प्रतिष्‍ठानी सेठाश्रयी पत्र-पत्रिकाओं के विशाल मंच उपलब्ध होने पर एकबारगी तो साहित्यिक पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्रों में इनकी ही सर्वत्र विजय-पताका लहराने लगी। लेकिन तब भी सतह के नीचे प्रगतिशील साहित्य की एक शक्तिशाली सृजनात्मक अंतर्धारा प्रवाहित रही जो समय पाकर कालांतर में एक बार फिर उभरी।

5) लघु-पत्रिका आंदोलन का दौर (1964-74)

भारत पर 1962 में चीन के हमले और 1964 में नेहरू जी कि मृत्यु के बाद एक ओर जहाँ हरेक क्षेत्र में स्वतंत्र्योत्तर व्यामोह से मोह-भंग हो रहा था, वहीं दूसरी ओर नेहरूवादी एकछत्र सत्ता के बुर्जुआ लोकतंत्र में अंतर्विरोध और दरारें पड़ने लगी थीं तथा समाजवाद, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की विरोधी तमाम तरह की दक्षिणपंथी और मध्यमार्गी- अवसरवादी ताकतें, मुख्यतः साम्प्रदायिक और हिह्दुत्ववादी-पुराणपंथी शक्तियाँ गोलबंद होकर शक्तिशाली हो रही थीं। उन्हें अमरीका के नेतृत्व में पश्चिमी साम्राज्यवादी ताकतों, उनकी बहुराष्‍ट्रीय पूंजी तथा देशी इज़ारेदार पूंजीपति घरानों और उनकी पत्र-पत्रिकाओं का भरपूर समर्थन था। इसका असर तमाम साँस्कृतिक क्षेत्रों और साहित्यिक पत्रकारिता पर भी प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा था। सरकारी, अर्ध-सरकारी और प्रतिष्‍ठानी पत्र-पत्रिकाओं के साथ ही ”धर्मयुग”, ”सारिका”, ”साप्ताहिक हिम्दुस्ताम”, ”ज्ञानोदय” जैसी सेठाश्रयी पत्रिकाओं ने प्रगतिशील सोच के लेखकों, विशेष रूप से नए लेखकों के लिए प्रकाशन के अपने सभी दरवाज़े बंद कर दिए। इसी के विरोध में हिन्दी सहित सभी भारतीय भाषाओं में 1964-65 से जबर्दस्त लघु-पत्रिका आंदोलन चला; जिसकी विस्तृत चर्चा पिछले पृष्‍ठों में की जा चुकी है।

इस दौर में विशेष बात यह हुई कि 1967 में नक्सलवादी आंदोलन के साँस्कृतिक क्षेत्रों खासकर साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में उसका ज़ोरदार असर देखा गया। लघु-पत्रिकाओं का खासा बड़ा हिस्सा तथा नौजवान लेखकों-संस्कृतिकर्मियों का बहुमत इस ओर आकर्शित होने लगा। उधर कम्युनिस्ट पार्टी में 1964 में विभाजन के बाद माकपा और भाकपा से जुड़े लेखकों-पत्रकारों की पत्र-पत्रिकाओं ने भी नए सिरे से अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाया। फलस्वरूप 1969-70 से लघु-पत्रिका आंदोलन के इस दूसरे दौर ने एक शक्तिशाली नामपंथी मोड़ ले लिया। इस दौर की परिणति मई,1975 में गया में ”राष्‍ट्रीय प्रगतिशील लेखक महासंघ” के नाम से देश की सभी भाषाओं के प्रगतिशील लेखकों के मंच का पुनर्गठन हुआ। इसके बाद तो प्रायः 1995 तक मुख्यतः और प्रायः 2000 तक प्रायः साहित्यिक पत्रकारिाता में मार्क्सावादी विचारधारा तथा व्यापकतथा प्रगतिशील और वामपंथी दृष्टिकोण से प्रतिबद्ध लेखकों, संपादकों तथा पत्र-पत्रिकाओं का ही वर्चस्व कायम रहा। इस दौर की साहित्यिक पत्रकारिता का विस्तृत उल्लेख भी हम पिछले पृष्‍ठों में कर चुके हैं।

6) आपात्काल और परवर्ती दौर (1975-95)

देश में जून, 1975 में आपातकाल और फलस्चरूप कठोर ”सेंसरशिप” लागू होने के बाद हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता ने एक बार फिर भारतेन्दु युगीन पत्रकारिता की कलात्मक संकेतधर्मिता, प्रतीकवाद और कूटनीति का सहारा लिया। इसमें भी मुख्यतः तीन धाराएँ दिखाइ देती हैं। एक तो उन दक्षिणपंथी-साम्प्रदायिक पक्ष के लेखकों-पत्रकारों की धारा, जो आपात्काल, सेंसरशिप औएा इंदिरा-विरोध के तेवरों के साथ मुख्यतः अंध-कम्युनिस्ट विरोध और सोवियत-विरोध की नीतियों की प्रचारक थी।

दूसरी धारा कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े लेखकों, पत्रकारों और संपादकों की थी, जो आपात्काल, सेंसरशिप और तत्कालीन सत्ता के विरोध के साथ ही दक्षिणपंथी, साम्प्रदायिक और सत्ता-लोलुप फासिस्ट शक्तियों को भी बेनकाब कर रही थी। लेकिन सबसे ज़्यादा तादाद उन अवसरवादी लेखकों-पत्रकारों और साहित्यिक पत्रिकाओं की थी जो सत्ता की चापलूसी और जी-हज़ूरी में झुक गईं थीं। तमाम प्रतिष्‍ठानी और सेठाश्रयी पत्र-पत्रिकाएँ इसी रीढ़-विहीन तीसरी धारा में थीं। उनके लेखकों में भी ऐसे ही अवसरवादी तत्वों का बहुमत था।

स्मरणीय है, कि हर तरफ से चौतरफा हमलों की शिकार भाकपा से जुड़ी पत्रिका ”पहल” ही हुई स उधर ”जनयुग” ने ”प्री-सेंसरशिप” को मानने से इनकार कर दिया तथा सेंसरशिप के विरोध में कोरे पृष्‍ठों और काली पट्टियों के साथ सारिका” छापने की वजह से भाकपा से जुड़े संपादक कमलेश्‍वर को टाइम्स ऑफ इंडिया ने बर्खास्त कर दिया। यही नहीं, इससे कुछ अर्सा पहले, प्रगतिशील लेखक संघ के राष्‍ट्रीय अध्यक्ष तथा भाकपा से जुड़े महान व्यंग्यलेखक और पत्रकार हरिशंकर परसाई पर राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ ( आर0एस0एस) के हुदुत्व सैनिकों ने उनके घर में घुसकर दिन-दहाड़े लाठियों से संघातक हमला किया था। इस प्रकार हम देखते हैं कि तमाम तरह के अवसरवादियों , पाखंडी कायरों और नकली शहादत का मुखौटा पहनने वाले नौटंकीबाज़ लेखक-पत्रकारों तथा साहित्यिक पत्रिकाओं के विपरीत, वामपंथी और प्रगतिशील क्षेत्रों की साहित्यिक पत्रकारिता ने ही, इस दौर में भी अपनी सच्ची संघर्शशील भूमिका निभाई !

7) भूमंडलीकरण और उसके प्रतिरोध का समकालीन दौर (1995 ……)

आज हमारा समाज भूमंडलीकरण के ऐसे दोर से गुज़र रहा है जहाँ, मनुष्‍य एक श्रोता या पाठक से बदलकर मात्र उपभोक्ता और साथ ही स्वयं उपभोग की ”वस्तु” में …. वह भी बाज़ार की एक ”पण्य-वस्तु” के रूप में बदल चुका है। इसके विस्तार में न जाते हुए, यहाँ हम यही कहना चाहेंगे कि अब संस्कृति की जगह पतित अप-संस्कृति ने ले ली है और ज्ञान की जगह ”सूचना” मात्र में से वह भी वही सूचना, जो दुनिया में ”सूचना-नियंत्रण” करने वाली बहुराष्‍ट्रीय सूचना-सत्ताएँ तय करती हैं। दूसरे, सूचना की जगह ”गलत सूचना” (डिस-इन्फोरमेशन) और दुश्‍प्रचार तथा प्रायोजित आम-राय और विश्‍व- अभिमत से इस तरह अब आपके मस्तिष्‍क को, आपके विचारों को भी नियंत्रित किया जा रहा है और फूहड़ मनोरंजन की आदत डाली ज रही है। इस तरह धीरे-धीरे हम एक अपढ़ समाज की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसे में साहित्यिक पत्रकारिता के आगे सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह लोगों में सांस्कृतिक विवेक, स्वतंत्र कला-चेतना और विचारोत्तेजक,किन्तु संवेदनात्मक साहित्य के प्रति रुचि पैदा करे। इसके लिए वह प्रिंट ही नहीं, बल्कि ”इलेक्ट्रॉनिक” विशेष रूप से ”न्यू मीडिया” के वैकल्पिक साधनों के प्रयोगात्मक अवसर तलाश करे। भूमंडलीकरण और बाज़ारवाद के इस दौर में साहित्यिक पत्रकारिता को भी संगठित और व्यापक वैकल्पिक शक्ति बनकर प्रतिरोधाओं का शस्त्र बनना होगा। एक नए नवजागरण का लोकप्रिय अग्रदूत !!

संदर्भ:–

1) ”पत्रकारिता और संपादन कला”, (सं0 रामप्रकाश), में नेमिशरण मित्तल का लेकह, पृ0 116

2) ”भारतेन्दु-समग्र”,(सं0 हेमन्त शर्मा), की भारतेन्दु को पढ़ने के बाद शीर्षक ”भूमिका”

3) उपर्युक्त

4) ”परंपरा का मूल्यांकन”, रामविलास शर्मा ; राजकमल प्रकाशन, पृ0110

5) ”महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण, रामविलास षर्मा ,राजकमल प्रकाशन, पृ0 381

6) उपर्युक्त, पृ0 72

7) उपर्युक्त, पृ0 281

8) उपर्युक्त, पृ0 366

9) म0 प्र0 में हिन्दी पत्रकारिता: एक शताब्दी, डॉ0 कैलाश नारद, पृ0 39

10) भूमंडलीकरण और बाज़ार के बारे में विस्तृत अध्ययन के लिए प्रो0 (डॉ0) कमल नयन काबरा तथा

प्रो0 (डॉ0) पुष्पेश पंत की पुस्तकें देखिए

[लेख साभार एवं स्रोत: न्यूज़ राईटर]

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मीडिया में राष्ट्रवाद की बहस- राकेश कुमार

सारांश :-

प्रस्तुत शोध आलेख मीडिया में मौजूदा राष्ट्रवाद, देशद्रोही, देशभक्त और हिंसा की बहस और उसके विभिन्न पहलुओं को मौजूदा समय से व्याख्यायित करने की पहल करता है। राष्ट्र और राष्ट्रवाद दो ऐसे विचार रहे है जिन पर कई सालों से हर अलगअलग देश में विचारविमर्श हुआ है। राष्ट्र और राष्ट्रवाद का उदय हर देश में एक समान नहीं रहा है और न ही राष्ट्रवाद के परिणाम। भारत में राष्ट्रवाद का उदय उपनिवेशी सत्ता के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन के लिए हुआ था। राष्ट्रवाद ने भारत की स्वतंत्रता में एक महत्वपूर्ण योगदान दिया था। स्वतंत्रता के इतने सालों बाद मीडिया में एक बार फिर राष्ट्रवाद और इसका विमर्श केंद्र में है। प्रस्तुत शोध आलेख इसी विमर्श और बहस का आलोचनात्मक परीक्षण करने का प्रयास करता है।

प्रमुख शब्द :- राष्ट्रवाद, मीडिया, आन्दोलन, वर्तमान राष्ट्रवाद, देशद्रोही, देशभक्त और हिंसा।

परिकल्पना :- राष्ट्रवाद एक नकारात्मक विचार है।

शोध प्रविधि:- प्रस्तुत शोध आलेख में द्वितीयक स्रोतों का प्रयोग किया गया है जिसमे पुस्तकें एवं अखबार शामिल है।

 शोध विस्तार

राष्ट्रवाद:-

राष्ट्र एक लगातार निर्माण की प्रक्रिया है। एक राष्ट्र का अपना एक इतिहास, संस्कृति, सभ्यता, प्रतीक, गान इत्यादि होते है। जब उस राष्ट्र का व्यक्ति या नागरिक अपने राष्ट्र के इतिहास, संस्कृति, सभ्यता, प्रतीकों और गान के प्रति एक सम्मान की भावना रखते है तो उसे राष्ट्रवाद कहा जा सकता है। सरल अर्थों में अपने राष्ट्र के प्रति सम्मान की भावना राष्ट्रवाद है।

राष्ट्रवाद को लेकर विभिन्न-विभिन्न विचारकों के अलग-अलग मत रहे है। अर्नेस्ट गैलनर ने राष्ट्रवाद को एक ऐसी विचारधारा के रूप में देखा जिसका जन्म और आगमन आधुनिक काल में हुआ है। वे कहते है कि “जहां सामंतवादी समाज अपने सामंतवादी बंधनो एवं संबंधो से जुड़े होते है, वहीं आधुनिक औद्योगिक समाज में कोई बंधन नहीं बन पाता क्योंकि यह समाज अधिक गतिशील एवं प्रतिस्पर्धी होता है इसलिए कुछ मूल्यों और विचारधाराओं का होना जरूरी है,

जो समाज की सांस्कृतिक साम्यता को बनाए रखे। जिसका आधार राष्ट्रवाद है।” (अभय प्रसाद सिंह, “भारत में राष्ट्रवादपृष्ठ3)

औद्योगिक समाज एक ऐसा समाज होता है जिसका संबंध हर तबके के व्यक्ति से होता है और यह संबंध हमेशा से ही अपने स्वभाव में प्रतिस्पर्धी और प्रयोगकर्ता होते है। ऐसी अवस्था में हमे एक ऐसे सन्तुलित आधार की जरूरत होती है जो इन संबंधो में एक समानता बनाए रखे और यही समानता का आधार राष्ट्रवाद होता है।

इरिक हॉब्सवॉम राष्ट्रवाद को राजनीतिक विचार के रूप में देखने की कोशिश करते है। उनका मानना था कि किसी भी राष्ट्र की कोई पुरानी नृजातीय परंपरा नहीं होती। वे कहते है कि “प्राचीन परंपरा में विश्वास, सांस्कृतिक शुद्धता, ऐतिहासिक निरंतरता सब एक झूठी कल्पना है, जो स्वयं राष्ट्रवाद द्वारा ही बनाई गई है। यह तो राष्ट्र था जिसने अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए राष्ट्रवाद को जन्म दिया।” (अभय प्रसाद सिंह, “भारत में राष्ट्रवादपृष्ठ4)

हम पुराने समाजों को देखे तो हम पाएंगे कि पुराने समाजों में एक नृजातीय परंपरा होती थी। यह नृजातीय परंपरा कबीलाई समाज के रूप में होती थी। पुराने दौर में मानव जीवन एक-दूसरे पर निर्भर था। यह वह दौर था जब मानव समाज कबीलों में रहा करता था। जीवनयापन और सुरक्षा की दृष्टि से लोग कबीलें बनाकर रहा करते थे। हर कबीलें के लोगों में एक दूसरे के प्रति विश्वास की भावना होती थी, जो कबीलों का मुख्य आधार हुआ करती थी। यही संबंध लगातार विकसित होते गए और जिसने आधुनिक युग में राष्ट्रवाद का रूप लिया।

बेनेडिक्ट एंडरसन राष्ट्रवाद पर लिखते हुए कहते है कि “राष्ट्रवाद को लोग आवश्यकता से अधिक महत्व दे रहे है। क्या ही अच्छा हो कि हम इसे लोगों की आयु और लिंग के समान अध्ययन और विवेचन का कारक भर माने, राष्ट्रवाद को फासीवाद या उदारवाद जैसी किसी विचारधारा से जोड़ने से बेहतर है इसे सामाजिक व्यवहार या धर्म जैसा ही एक तत्व माना जाए और आवश्यकता से अधिक महत्त्व नहीं दिया जाए।” ( Benedict Anderson, “Imagined Communities”, Page no.5) 

इतिहास में कई ऐसे उदहारण है जब राष्ट्रवाद अपने स्वभाव में उग्र हुआ और दो राष्ट्रों के बीच या राष्ट्र के भीतर दो समुदायों के बीच हिंसा के माहौल ने जन्म ले लिया इसलिए एंडरसन का मानना था कि ‘हमें राष्ट्रवाद को आवश्यकता से अधिक महत्व नहीं देना चाहिए।’

एंडरसन कहते है कि “मैं राष्ट्रवाद की मानक सम्बन्धी यह परिभाषा देना चाहूंगा कि यह एक काल्पनिक राजनैतिक समुदाय भर है और काल्पनिक तौर पर ही यह आरंभ से सीमित और स्वायत्त दोनों रहा है।” (Benedict Anderson, “Imagined Communities”, Page no.5-6) 

एंडरसन राष्ट्रवाद को एक काल्पनिक विचार इसलिए मानते है क्योंकि किसी भी राष्ट्र में ऐसे कई लोग या नागरिक होते है जो एक ही राष्ट्र के भीतर वास करते है लेकिन वास्तविक रूप में कभी एक दूसरे को देख या जान नहीं पाते लेकिन तब भी वह यह मानते है कि वह एक ही राष्ट्र के सदस्य है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि राष्ट्रवाद की कोई अंतिम परिभाषा नहीं हो सकती है । यह एक ऐसी भावना है जो काल, देश, समय के अनुसार लगातार बदलती रहती है और स्वभाव में परिवर्तनशील होती है।

मीडिया और राष्ट्रवाद की मौजूदा बहस :- 

मीडिया में राष्ट्रवाद पर जो मौजूदा विमर्श हुआ, उसकी शुरुआत शैक्षणिक संस्थान से हुई। नौ फरवरी 2016 को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से राष्ट्रवाद पर बहस शुरू हुई । इस बहस में कई बिंदु थे जैसे भाषा, धर्म, अभिव्यक्ति की आज़ादी, असहमति का अधिकार, समानता का अधिकार, देशभक्त बनाम देशद्रोही आदि। 

मीडिया ने शैक्षणिक संस्थान की इस बहस को व्यापक पटल पर रखा और टीवी चैनल्स, पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से राष्ट्रवाद की इस बहस को विमर्श में तब्दील कर इसके सभी बिंदुओं और आधारों पर एक व्यापक बातचीत की।

मीडिया में राष्ट्रवाद पर जो विमर्श हुआ, उनमें एक मुद्दा भाषा का भी था। निवेदिता मेनन जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में राष्ट्रवाद पर अपने भाषण के दौरान कहती है कि “प्रोफ़ेसर आयशा किदवई के लेक्चर के बाद किसी ने यह सवाल उठाया था कि एक राष्ट्र बनने के लिए एक भाषा होनी चाहिए, तो वह भाषा कौन सी भाषा होगी? कौन-सी ज़ुबान होगी?” (Azad.R, Nair.J, Singh.M, & Roy.M.S, (Edited) “What The Nation Really Needs To Know; The JNU Nationalism Lectures”) 

अगर हम भारतीय राष्ट्रवाद को देखे तो हम पाते है कि आज़ादी की लड़ाई में सभी वर्गों और समुदायों के लोगों ने अपना समान योगदान दिया था, इन वर्गों के लोग भिन्न-भिन्न भाषा बोलने वाले लोग थे। ज़ाहिर सी बात है कि भारतीय राष्ट्रवाद के मूल में भाषाई विविधता भी है। भारतीय राष्ट्रवाद ने भाषाई विविधता के साथ जन्म लिया था इसलिए भारतीय राष्ट्र के सन्दर्भ में किसी एक भाषा को ज्यादा महत्व नहीं दिया जा सकता है।

आनंद कुमार अपने वक्तव्य में कहते है कि “हमारे मुल्क में नेशनलिज़्म को बनाने और पहचानने के लिए जो विमर्श चला उनमें से एक विचार तो यह वाला था कि बिना एक प्रभुत्व पहचान के राष्ट्र निर्माण कैसे होगा।” (Azad.R, Nair.J, Singh.M, & Roy.M.S, (Edited) “What The Nation Really Needs To Know; The JNU Nationalism Lectures”) 

भारत जब उपनिवेशी सत्ता के विरुद्ध अपनी आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा था, तब सभी वर्गों ने उस लड़ाई में अपना बहुमूल्य योगदान दिया था। ऐसे में हमें इस बात की आवश्यकता थी कि हम एक ऐसे राष्ट्र का निर्माण करें जहाँ सभी वर्गों के लोगों को समान दर्जा, समान अवसर और समान लाभ मिले। हमें जरुरत एक ऐसे विचार और पद्धति को अपनाने की थी जिसमें बिना किसी एक प्रभुत्व पहचान और बिना किसी एक पहचान को विशेष दर्जा देते हुए समावेशी पहलू से राष्ट्र निर्माण हो सके। आज़ादी के बाद हमने एक ऐसे संविधान को अपनाया जिसमें सभी के लिए समान दर्जा और समान अवसर थे। आने वाले दिनों में भाषा के आधार पर राज्य बने और भाषाई विविधता होते हुए भी सभी राज्य एकजुटता के साथ भारतीय संविधान के दायरे में रहे।

योगेंद्र यादव कहते है कि ” राष्ट्रवाद पर जो विमर्श हुआ है, उसका सबसे दुःखद पहलू इसकी फ्रेमिंग है। यह सारा विमर्श दो पक्षों में विभाजित है। दोनों पक्षों का एक भी वर्ग भारतीय राष्ट्रीयता का सच्चा वारिस नहीं है।” ( योगेंद्र यादव, “राष्ट्रवाद की चुनौतियाँअदहन पत्रिका।)

एक देश की राजनीतिक व्यवस्था एक मज़बूत व्यवस्था होती है और इस व्यवस्था की पहुँच समाज में सबसे ज्यादा गहरे और व्यापक स्तर तक होती है। राजनीतिक बदलाव देश में नई परिस्थितियों को जन्म देता है। अगर हम भारत में उपनिवेशी शासन को देखे तो हम पाते है कि आजादी की लड़ाई के दौरान भारतीयों ने अंग्रेजों के खिलाफ कई आंदोलन छेड़े और इन्हीं आंदोलनों के कारण उस समय की राजनीतिक व्यवस्था में अनेक परिवर्तन हुए और यही परिवर्तन अपने आप में भारतीय राष्ट्रवाद के जन्म का आधार बना लेकिन वर्तमान दौर को देखा जाए तो कहीं न कहीं आंदोलनों के प्रयोग पर भी सवाल खड़े हुए है। मीडिया में राष्ट्रवाद का जो मौजूदा विमर्श हुआ। उस विमर्श ने इस सवाल को तो खड़ा किया ही कि एक लोकतंत्र में आंदोलनों की बेहद बड़ी भूमिका होती है लेकिन यह विमर्श साथ में ये भी बताता है कि आंदोलनों का सही प्रयोग बेहद ही आवश्यक है।

” स्वाधीनता प्राप्ति के लक्ष्य ने जिस प्रकार की राष्ट्रीयता को जन्म दिया उसमें विषम आर्थिक विकास और जाति व्यवस्था पर टिके समाज के विभिन्न समुदायों की विशिष्ट जरुरतों को अलग-अलग सुनना और उनके लिए संघर्ष करना प्रमुख नहीं था। अतः बहुत से जरूरी मुद्दे जिनमें स्त्रियों, दलितों, अल्पसंख्यकों और आदिवासियों के मुद्दे महत्त्वपूर्ण थे- फर्श के नीचे खिसका दिए गए। राष्ट्रवाद के भीतर जिस मनुष्यता की रक्षा करने की जरूरत थी, वह न हो सका।” (सुधा सिंह, “राजनीति: समावेशी राष्ट्रवाद बनाम प्रतीकवाद” , जनसत्ता।)

राष्ट्रवाद का समकालीन विमर्श जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से शुरू हुआ और जाधवपुर विश्वविद्यालय और दिल्ली के रामजस महाविद्यालय जैसे कई पड़ाव से गुजरा। मीडिया में राष्ट्रवाद के इस समकालीन विमर्श में दो शब्द मुख्य रूप से केंद्र बिंदु में घूमते रहे, पहला “देशभक्त” और दूसरा “देशद्रोही” । 

विचारधारा के स्तर पर ये विमर्श दो वर्गों में विभाजित था। एक वर्ग मुख्य रूप से वामपंथ विचारधारा से जुड़ा था और दूसरा वर्ग राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (दक्षिणपंथ) से जुड़ा हुआ था। 

वामपंथ विचारधारा का मानना था कि संविधान के अनुसार चलना ही देशभक्ति है, इसके समर्थनकारी यह भी बोलते कि भारत का संविधान हमें अभिव्यक्ति की आज़ादी प्रदान करता है और इस अभिव्यक्ति की आज़ादी को दबाना सही नहीं है।

वहीं दूसरी ओर जो वर्ग राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (दक्षिणपंथ) से जुड़ा हुआ था, उसका मानना था कि यह सही है कि भारत का संविधान अभिव्यक्ति की आज़ादी प्रदान करता है लेकिन यह सही नहीं है कि हम उस अभिव्यक्ति की आज़ादी का ग़लत इस्तेमाल करे और उसका प्रयोग देश की एकता को तोड़ने में करे। हर वह अभिव्यक्ति की आज़ादी जो देश को तोड़ने की बात करती हो वह निश्चित रूप से गलत ही है। अभिव्यक्ति की आज़ादी का प्रयोग तो देश की एकता को बनाए रखने और देश के विकास में होना चाहिए।

राष्ट्रवाद के इस विमर्श, रामजस महाविद्यालय प्रकरण और अभिव्यक्ति की आज़ादी के मुद्दे पर बोलते हुए राकेश सिन्हा कहते है कि ” घटना आधारित विमर्श और विचार आधारित विमर्श में अंतर होता है। अभी जो घटना घटी, ऐसी दस घटनाएं दस-पाँच दिन में शांत हो जाएगी। यह घटना आधारित विमर्श है। कोई आया, उसे रोका गया, धरना दिया गया ऐसी घटनाएं घटती रहती है। मैं अभिव्यक्ति की आज़ादी को बड़े परिप्रेक्ष्य में देखता हूँ।” (राकेश सिन्हा, “बारादरी” , रविवारीय स्तंभ, जनसत्ता)

राष्ट्रवाद के इस समकालीन विमर्श में हर पहलू थे, राष्ट्रवाद के इस समकालीन विमर्श ने सभी मुद्दों को समेटने की कोशिश की। अगर अभिव्यक्ति की आज़ादी को देखा जाए तो हम सब मानते है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी एक लोकतंत्र का प्राणतत्व होती है। एक लोकतंत्र के मज़बूत होने का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वह लोकतंत्र अपने नागरिकों को या अपनी जनता को अभिव्यक्ति की कितनी आज़ादी प्रदान करता है। 

दूसरी तरफ यह भी जरूरी है कि हम लोकतंत्र में संविधान द्वारा दिए गए अपने समस्त अधिकारों का एक उचित प्रयोग सही और सकारात्मक दिशा में करे। हमें चाहिए कि हम अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग संविधान के ही दायरे में करे। यदि संविधान द्वारा दिए गए किसी अधिकार का गलत प्रयोग होता है तो आखिरकार वह गलत प्रयोग हमारे लोकतंत्र और राष्ट्र की एकता को ही नुक़सान पहुंचाएगा और साथ में यह भी सही नहीं कि हम किसी को उसके विचारों और इच्छाओं को अभिव्यक्त करने से रोके। अभिव्यक्ति की आज़ादी का सकारात्मक प्रयोग इस तरीके से होना चाहिए जिससे एक राष्ट्र की बुनियाद और उसके संविधान की मजबूती बनी रहे।

राष्ट्रवाद के इस विमर्श में एक मुख्य बिन्दु ऐसा भी था जिसने उपनिवेशी सत्ता के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई में एक महत्वपूर्ण योगदान दिया था, वह मुख्य बिंदु था “भारत माता की जय” का नारा राष्ट्रवाद के इस समकालीन विमर्श में “भारत माता की जय” के नारे को कुछ लोगों ने हिंदुत्ववादी नारा कहा और इसे बोलने से इंकार कर दिया। 

योगेंद्र यादव कहते है कि ” भारत माता की जय, कोई राइट विंग हिन्दुत्व राष्ट्रवादियों का स्लोगन नहीं था, इस देश में “भारत माता की जय”, हमारे राष्ट्रीय आंदोलन का बिल्कुल मैनस्ट्रीम स्लोगन था।” (योगेंद्र यादव, “राष्ट्रवाद की चुनौतियांअदहन पत्रिका) 

उपनिवेशी सत्ता के खिलाफ हमारे भारत राष्ट्र की जनता ने अनेक आंदोलन किये थे। उन आंदोलनों में जनता ने कई नारों का उपयोग किया था। इन नारों ने विविधता से भरी हुई जनता का एकबद्ध किया और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अपना बहुमूल्य योगदान दिया। ये नारे किसी खास धर्म, जाति और राजनीतिक पार्टी के नहीं थे। ये सभी नारे भारतीय जनता की एकजुटता की उपज थे इसलिए इन नारों को संकीर्ण दायरे में देखना गलत है। ये समस्त नारे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की बहुमूल्य धरोहर हैं।

निष्कर्ष:-

 राष्ट्रवाद के कुछ देशों में नकारात्मक परिणाम ही रहे है पर कुछ देशों में इसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिले है। कई देशों में एक सकारात्मक विचार के रूप में राष्ट्रवाद ने लोगों को एकजुट करने का काम भी किया है। उपनिवेशी सत्ता के खिलाफ भारत में राष्ट्रवाद ने लोगों को एकरूपता में बांधा है जिसके कारण लोगों में एक दूसरे के प्रति विरोध और नफ़रत की भावना  काफी हद तक समाप्त हो गयी। इस रूप में राष्ट्रवाद ने मानवता को एक सूत्र में बांधने का कार्य किया है। मीडिया में राष्ट्रवाद की मौजूदा बहस को इन्हीं मुद्दों के साथ आगे बढ़ाना चाहिए और एक सकारात्मक विमर्श के साथ राष्ट्रवाद का प्रयोग राष्ट्र के विकास में करना चाहिए।

संदर्भग्रन्थसूची

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http://www.jansatta.com/politics/inclusive-nationalism-versus-symbolism/76634/

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http://www.jansatta.com/sunday-column/rss-thinker-rakesh-sinha-interview-over-students-union-vs-rss-ideology/268022/

राकेश कुमार

पीएच.डी

विभाग- प्रौढ़ सतत शिक्षा एवं प्रसार विभाग

(Department of Adult, Continuing Education & Extension)

विश्वविद्यालय- दिल्ली विश्वविद्यालय

संपर्क सूत्र- 7503518676 ईमेल- mr.rakeshkumar11@gmail.com

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हिंदी की लघु पत्रिकाएं और बांग्ला साहित्य: एक नज़र-डॉ. निकिता जैन

शोध सारांश प्रस्तुत शोधालेख में हिंदी की लघु पत्रिकाओं में प्रकाशित बांग्ला भाषा के अनुवादित (हिंदी में) साहित्य का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। इस विश्लेषण के ज़रिये न केवल ये पता लगाने की कोशिश की गयी है कि हिंदी की लघु पत्रिकाओं का अन्य क्षेत्रीय या प्रादेशिक भाषाओं का प्रति क्या दृष्टिकोण था बल्कि यह भी मूल्यांकित करने का प्रयास भी किया गया है कि किस तरह यह पत्रिकाएं हिंदी के पाठकों के समक्ष अन्य भाषाओं के अनुवादित साहित्य (हिंदी में) को प्रस्तुत कर रही थीं ताकि वह अन्य भाषाओं की साहित्यिक प्रवृत्तियों से न केवल परिचित हों बल्कि उन्हें आत्मसात करने के पथ पर भी अग्रसर हों। प्रस्तुत शोधालेख में बांग्ला साहित्य को तत्कालीन स्थितियों (1950 से लेकर 1980 तक के विशेष संदर्भ में ) के अनुसार अलगअलग भागों और संदर्भों में विवेचित करने प्रयास किया गया है जैसे बांग्लादेश मुक्ति आन्दोलन, हंगरीजेनरेशन मूवमेंट आदि का बांग्ला साहित्य पर क्या प्रभाव पड़ा और उसे किस प्रकार लेखकों ने अपनी रचनाओं के द्वारा प्रस्तुत किया इन सभी पहलुओं को इस लेख में विवेचित किया गया है

मुख्य शब्द लघु पत्रिका (सीमित संसाधनों के अंतर्गत निकलने वाली पत्रिका), अणिमा,उत्कर्ष,कल्पना, संचेतना,नई धारा  (पत्रिकाओं के नाम)

शोधविस्तार

बांग्ला:प्रतिरोध का साहित्य  – हिंदी पर बंगला साहित्य की छाप स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है| शरतचन्द्र का देवदास हो या रविन्द्रनाथ टैगोर की चोखेर बाली, इन अविस्मरणीय रचनाओं को कौन भूल सकता है, न जाने कितनी बार हिंदी में इन रचनाओं का रूपांतरण हो चुका है, कितनी हिंदी फिल्मों में इनका चित्रांकन किया जा चुका है। बंगला साहित्य हमेशा से अपनी दृष्टि और कला द्वारा हिंदी साहित्य को समृद्ध करता आ रहा है। इसके अतिरिक्त कितने ही ऐसे हिंदी साहित्यकार हैं जिनका सम्बन्ध बंगाल से है, जो बांग्ला  और हिंदी दोनों में सक्रिय रूप से लिखते रहे हैं। बांग्ला  साहित्य आज भी हिंदी के मुकाबले बहुत समृद्ध माना जाता है क्योंकि बंगाल में ही सबसे पहले नवजागरण का आवागमन हुआ। स्वतंत्रता से पूर्व और उसके पश्चात भी बंगाल राजनीतिक, साहित्यिक, शैक्षिक

एवं सामाजिक सभी दृष्टि से अधिक सक्रिय रहा है। साहित्य की किसी भी नयी प्रवृत्ति या विधा की शुरुआत अधिकतर बंगाल से ही हुई है। लघु पत्रिकाओं की बात की जाए तो भारत में लघु पत्रिका आन्दोलन की शुरुआत भी सर्वप्रथम बंगाल से हुई थी। दरअसल बंगाल शुरू से ही अंग्रेजी एवं अन्य विदेशी भाषाओं के साहित्य के प्रति आकर्षित रहा और यही वजह है कि धीरे-धीरे साहित्य प्रेमियों ने विदेशी भाषाओं के साहित्य का अनुवाद करना शुरू कर दिया। इसी कारण साहित्य की नयी-नयी प्रवृत्तियों और आन्दोलन से ये लोग परिचित होने लगे और इनको अपने साहित्य में आकार देने लगे। हिंदी की लघु पत्रिकाओं का झुकाव बांग्ला  साहित्य की ओर स्पष्ट रूप से दिखलाई पड़ता है। इसका एक कारण यह भी है कि बांग्ला  साहित्य प्रतिरोध का साहित्य है| विद्रोह छोटा हो या बड़ा बांग्ला  भाषा हमेशा से अपनी संस्कृति,कला के प्रति सजग और आक्रमक रही है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो बांग्ला  साहित्य ने कभी-भी पुरानी परम्पराओं को छोड़ने और नए को अपनाने में वक़्त नहीं लगाया। यही वजह है कि 1920 के आस-पास ही बंगाल में लेखकों की एक नयी पीढ़ी तैयार हो गयी थी जबकि हिंदी में नए प्रयोग करने वाले लेखक सन् 1950 के बाद आते हैं।

विद्रोह के तीखे तेवर लिए बांग्ला साहित्य के विकास का एक कारण वहां की राजनीतिक परिस्थितियां भी रहीं हैं। 1905 में बंग-विभाजन का होना, पश्चिमी और पूर्वी बंगाल में परिस्थितियों का बदलना, देश की आज़ादी के बाद पूर्वी बंगाल का पाकिस्तान में शामिल होना, अपने अस्तित्व एवं भाषा की गौरवशाली परम्परा को बनाये रखने के लिए पूर्वी बंगाल का पाकिस्तान को करारा जवाब देना इत्यादि घटनाओं ने प्रतिरोध की ऐसी ज़मीन तैयार की, जिसने आगे चलकर केवल भारतीय इतिहास में ही नहीं बल्कि विश्व इतिहास में अपनी उपस्थिति दर्ज करायी ।

सन् 1971 के दशक को कौन भूल सकता है ? जिसने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया था। बंगपिता शेख मुजीबुर्र रहमान ने एक स्वतंत्र बांग्लादेश की परिकल्पना की और कुछ महीनों के भीतर ही इस कल्पना ने हकीकत का रूप ले लिया। किसी भी देश की जीत के पीछे सबसे बड़ा हाथ उन बुद्धिजीवियों का होता है जिन्हें ये ज्ञात हो कि आने वाली परिस्थितियां किस करवट बैठेंगी। लेखक इस सूची में सबसे आगे रहते हैं। बंगाल के लेखकों की यह सबसे बड़ी खासियत है कि वह विपरीत परिस्थितियों में कभी हथियार नहीं डालते। पूर्वी बंगाल पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ पश्चिमी बंगाल के कथाकारों,शिक्षकों,कवियों आदि ने भी सख्त तेवर अपना रखे थे। पूर्वी बंगाल के लेखकों की तरह ही पश्चिमी

बंगाल के साहित्यकारों ने यह ठान लिया था कि ‘बांग्लादेश’ को एक स्वतंत्र देश बनाकर ही छोड़ेंगे। तत्कालीन बंगाली कहानी, कविता एवं उपन्यासों में केवल बांग्लादेश के मुक्ति आन्दोलन की चर्चा ही मिलती है। बात चाहे बांग्ला देश छोड़कर भारत में आने वाले शरणार्थियों की हो या फिर उस जनता की जो बिना हथियार के भी इस स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़ी या उन स्त्रियों की जिनकी अस्मत को सरेआम बेआबरू किया गया फिर भी वह अपनी अंतिम साँस तक जय बांग्ला  का नारा लगाती रहीं-इन सभी पहलुओं को बंगाली कथाकारों ने बड़ी बारीकी से चित्रित किया। केवल बंगाल में ही नहीं बल्कि हिंदी प्रान्त में भी कुछेक लघु पत्रिकाओं ने ‘बांग्लादेश’ के तत्कालीन मुक्ति आन्दोलन को अपनी पत्रिका में आवाज़ प्रदान की। ऐसी ही पत्रिकाओं में से एक है ‘अणिमा’। शुरुआत में यह पत्रिका कलकत्ता से ही प्रकाशित होती थी। लेकिन नवम्बर 1971 का ‘बंगलादेश कथा विशेषांक’ जयपुर से प्रकाशित हुआ। इस विशेषांक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसने पूर्वी बंगाल की तत्कालीन परिस्थितियों के हर पहलू पर रोशनी डालने की कोशिश की है। उन कथाओं को विशेषांक में जगह दी गयी जो उस समय के हालातों को सही रूप से चित्रित करने में सक्षम थीं। जितनी भी कहानियां इस अंक में प्रकाशित हुईं  सभी भोगे हुए यथार्थ पर आधारित थीं। बांग्लादेश पर केन्द्रित यह अंक केवल इसलिए महत्त्वपूर्ण नहीं है कि यह वहां की घटनाओं का सिलसिलेवार वर्णन प्रस्तुत कर रहा है। बल्कि यह विशेषांक इस बात का प्रमाण है कि- किसी भी राष्ट्र या समाज में होने वाली परिघटनाएं सबसे पहले वहां के कला माध्यमों पर ही असर डालती हैं और ऐसी सूरत में इन माध्यमों का यह कर्तव्य होता है कि वह ऐसे साहित्य की रचना करें जो समाज और राष्ट्र के केवल हित में ही न हों बल्कि उन्हें जुझारू भी बनाएं। बांग्लादेश की मुक्ति में कलम के सिपाहियों का भी उतना ही बड़ा योगदान है जितना कि बन्दूक के सिपाहियों का। लेखक या कलाकार सही वक़्त पर अपनी कला का इस्तेमाल करे तो क्या हो सकता है यह ‘बांग्लादेश’ के रूप में हमारे सामने है।

प्रस्तुत विशेषांक की पहली कहानी ताराशंकर वन्द्योपाध्याय के उपन्यास एकटि कालो मेयेर कथा का एक अंश है। ‘वे दो काल रात्रियाँ’ शीर्षक से छपी यह कहानी अपने अंदर हजारों प्रश्नों को समाये हुए है। कहानी का हर पड़ाव अपने साथ एक नया प्रश्न लेकर आता है कि क्या जो उस समय हुआ वो होना ज़रूरी था ? अगर ज़रूरी था भी तो क्या इस रूप में, जहाँ लाखों लोगों को दो गज ज़मीन भी नसीब नहीं हुई ? प्रस्तुत कहानी केवल दो रातों पर केन्द्रित है। 25 और 26 मार्च 1971 की दो रातें किस तरह भयानक काल रात्रि में बदल गयीं, लोगों को कैसे उनके घरों में जिंदा जला

दिया गया, लड़कियों को खींच-खींच कर सड़कों पर लाया गया और उनके साथ वो सलूक किया गया, जिसे सुनने से पहले लोग मरना पसंद करेंगे – ऐसे हालातों में तीन शख्स कैसे एक जले हुए मकान के अन्दर अपनी जान बचाने के लिए बैठे हुए हैं और पाकिस्तानी सेना एवं याहिया खान के खूनी दरिंदों का यह नंगा नाच देख रहे हैं। इस पूरी कथा को एक एंग्लो –इन्डियन शरणार्थी के द्वारा कहलवाया गया है –जो कि इस पूरे काण्ड का प्रत्यक्षदर्शी है। कहानी का सबसे मर्मस्पर्शी पहलू वो है जहाँ औरतों की आबरू को लूटा जा रहा है लेकिन घरों में छिपे हुए लोग केवल मूक दर्शक बने हुए हैं। उन स्त्रियों की चीखें सुनकर पास पड़ा कुत्ता भी काँप रहा है लेकिन इंसानी ज़मीर मर चुका है और जिनका जिंदा है वो भी मजबूर हैं – “वे कह रही थीं, तुम लोगों के पाँव पड़ते हैं हमें छोड़ दो अल्ला की दुहाई है|………….मैं अपने बालों को दोनों हाथों से नोचता हुआ किसी जानवर की करुण मूक चीत्कार की तरह चीख पड़ना चाहता था……..मिस्टर सेन ने कहाइधर जाइये भूल जाइये कि आप जिंदा है|”1.  कहानी का यह अंश ये सोचने पर मजबूर कर देता है कि ‘बांग्लादेश’ को मुक्ति तो मिली लेकिन किस कीमत पर ? यह सही है कि स्वतंत्रता बलिदान मांगती है लेकिन क्या उस त्याग की भी कोई सीमा निश्चित है ? बांग्लादेश के लोगों ने भी अपने खून से इस आन्दोलन को सींचा। लेकिन क्या बांग्लादेश इतिहास के इस काले पन्ने को कभी भूला पायेगा ? यह सभी प्रश्न कहानी अपने पीछे छोड़ जाती है। दो रातों का चित्र इतना भयानक था तो आगे के नौ महीनों में क्या हुआ होगा यह सोचकर ही रूह काँप उठती है। बांग्ला  कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वहां के लेखक  सच को प्रदर्शित करने के लिए किसी आडम्बर का सहारा नहीं लेते, अपनी सधी हुई भाषा के माध्यम से वह यथार्थ को ज्यों का त्यों आपके सामने रख देते हैं। प्रस्तुत कहानी भले ही पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों को व्याख्यायित कर रही हो लेकिन अगर गौर से देखा जाए तो यह कथा प्रतिरोध की एक ज़मीन भी तैयार कर रही है – कहानी में ‘सेन’ अपने साथी से पूछता है कि तुम तो एंग्लो इन्डियन हो, तो तुम्हें किस बात का डर ? प्रत्युत्तर में एंग्लो इन्डियन कहता है –“मिस्टर सेन, इससे बेहतर तो मर जाना है मेरी मां बंगाली है तथा मैं क्रिश्चियन हूँ जानवरों का मित्र बनकर उनसे अपने प्राण बचाने की ख्वाहिश भी नहीं है2.   एंग्लो इन्डियन के ये शब्द इस बात का प्रमाण हैं कि ऐसी परिस्थितियों में हर शख्स जो बांग्लादेश के साथ था, अपने स्तर पर इस अमानवीय व्यवहार का विरोध कर रहा था। ये मायने नहीं रखता कि आप विरोध कैसे कर रहे हैं, मायने ये रखता है कि आप विरोध कर रहे हैं। हर शख्स आन्दोलन में बन्दूक लेकर नहीं उतर सकता। लेकिन जो

अपनी जान की बाजी लगाकर इस पथ पर निकल पड़े हैं उनका साथ कैसे दिया जाये,यही भावना किसी भी क्रांति को आगे बढ़ाने के लिए काफी होती है। कहानी का अंत भी इसी आशा के साथ होता है जहाँ मिस्टर सेन यह मन बना लेते हैं कि “वे यह लड़ाई अब देखकर ही जायेंगे” इसलिए नहीं कि उन्हें अब अपनी मृत्यु का डर नहीं है बल्कि इसलिए कि जिन हजारों लोगों ने इस आशा में अपने प्राण त्याग दिए हैं कि कभी न कभी दुनिया के नक़्शे में बांग्लादेश का स्वतंत्र अस्तित्व होगा, उनकी इस आशा को पूरा होते हुआ देखने वाला कोई तो हो।

‘अणिमा’ के इस विशेषांक की हर कहानी केवल ‘बांग्लादेश’ की कथा को ही रेखांकित नहीं करती बल्कि बंगाली साहित्यकारों की विचारधारा को भी व्याख्यायित करती है। बंगाली रचनाकारों ने जिस सूक्ष्मता के साथ ‘कहानी’ के प्लाट का चुनाव किया है उससे यह प्रदर्शित होता है कि उन्होंने कितने करीब से उन परिस्थितियों को महसूस किया होगा कि वह उतने ही जीवंत रूप में उसे पन्नों पर उतार पाए| मनोज बसु की कहानी गोरिल्ला भी इसी जीवंतता का उदाहरण है। प्रस्तुत कहानी में निहत्थी जनता के आक्रोश का चित्रण किया गया है जो पाकिस्तानी सेना द्वारा किये गए कत्लेआम को देखकर उठ खड़ी होती है और गोरिल्ला युद्ध द्वारा सेना के नाक में दम कर देती है। छोटे-छोटे कस्बों और गांवों में गोरिल्ला युद्ध कितना महत्त्वपूर्ण था तथा एक आम जनता उसे कैसे अंजाम दे रही थी इसका सजीव चित्रण प्रस्तुत किया गया है – नरम मिट्टी वाले बांग्लादेश देश में यह कैसा आश्चर्यजनक काण्ड हो रहा है ! लड़केलड़कियां अविजीत सैनिक हो गए हैं सिर्फ अपने हृदय की शक्ति से बांग्ला  देश की मूर्ति और असाधारण से हथियारों द्वारा गोरिल्ला सेना का गठन किया है खान लोगों की कदमकदम पर नींद हराम कर रहे हैं3. एक ओर मन्मथ पाल जैसे युवक हैं जो साधारण हथियारों से देश की रक्षा करने के लिए संघर्षरत हैं तो दूसरी ओर जावेद अली जैसे स्वार्थी व्यक्ति हैं जो अपनी जान बचाने के लिए देश के साथ गद्दारी कर रहे हैं। लेकिन पाक सैनिक जावेद अली जैसे शुभचिंतकों के साथ भी कैसा अमानवीय व्यवहार करते हैं –इसका सशक्त चित्रण ही इस कहानी का केन्द्रीय बिंदु है – सूबेदार डबल मार्च करता हुआ आंगन पार करके शयनकक्ष में जा घुसा……कमरे में जावेद की तीसरी शादी की हुई नई दुल्हन थी……जावेद भी पीछेपीछे कमरे में घुसने जा रहा था कि शॉटगन का निशाना साध आँखें तरेरकर सूबेदार बोला, ‘हट जाओ’ ! भड़ाक से सूबेदार ने

दरवाज़ा बंद कर भीतर से कुंडी लगा ली कमरे से आर्तनाद सुनाई दिया…..जावेद अली चिल्ला रहा था – ‘अल्लाह की दुहाई हुज़ूर, मेरी बीवी को छोड़ दो’|”4. इस प्रसंग के पश्चात् ज़ेहन में एक ही बात कौंधती है कि इंसानियत के दुश्मन क्या कभी किसी के सगे हुए हैं ? धर्म और मज़हब के नाम पर कत्लेआम करने वालों और उनका साथ देने वालों को, उनका अल्लाह कभी माफ़ कर पायेगा ? जावेद अली ने देश के वफ़ादारों की मुखबरी करने से पहले शायद ये सोचा नहीं होगा अगर सोचा होता तो जावेद अली को कहानी के अंत में अपनी ही मौत की भीख मांगने की ज़रूरत नहीं पड़ती –“कहाँ हैं गोरिल्ले छोकरे ? …..मेरे नाककान काट लें आँखें निकाल लें जो कुछ मैंने उन्हें कहते सुना था उसमें से आज वे कुछ भी कर लें तो शायद मेरे हृदय को शान्ति मिले5.  बंगाली साहित्य को पढ़कर यह महसूस होता है कि अवश्य ही हिंदी साहित्य को इससे बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है। ऐसा कतई नहीं कि हिंदी कहानियों में गंभीरता नहीं है या उनमें समसामयिक घटनाओं का विवेचन नहीं मिलता। लेकिन हिंदी कहानी में बंगाली कहानियों जैसा फ़ोर्स नहीं है। सन् 1971 के दौरान हिंदी में कई कहानी आन्दोलनों की शुरुआत हो चुकी थी। नयी कहानी, सचेतन कहानी, अकहानी जैसे आन्दोलनों  के दौरान कई तरह के नए प्रयोग हिंदी कहानी में किये गए। कई बेहतर कहानियाँ भी लिखी गयीं लेकिन कुछेक साहित्यकारों की रचनाओं को छोड़ दें तो उस समय की अधिकतम कहानियों में केवल आधुनिक युग के पुरुष-स्त्री संबंधों की व्याख्या ही नज़र आती हैं । क्या ? हिंदी भाषी क्षेत्र बांग्लादेश के हालातों से अनजान थे या वो इस बात से वाकिफ नहीं थे कि लाखों लोग बंगलादेश छोड़कर पश्चिमी बंगाल में शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं ? उनकी पीड़ा और स्थिति का वर्णन केवल बंगाली समाचार पत्रों में छपता था ? पश्चिमी बंगाल भारत से अलग था ? और अगर इन सभी प्रश्नों का जवाब नहीं है तो फिर क्यों हिंदी लेखकों की कहानियों में, कविताओं में, उपन्यासों में इतिहास की इस घटना का चित्रण न के बराबर मिलता है। ‘अणिमा’ के इस महत्त्वपूर्ण विशेषांक में एक भी कहानी किसी हिंदी लेखक की नहीं छपी और न ही संपादक ने यह ज़हमत उठाई कि वह इस बात का स्पष्टीकरण करें कि उन्होंने केवल बांग्ला  कथाकारों की ही कहानियों को क्यों  शामिल किया ? बात चाहे जो भी रही हो लेकिन एक हिंदी भाषी पत्रिका में जिसमें अनुवादित बंगाली कहानियां प्रकाशित की जा रही हैं और वो भी उस मुद्दे को केंद्र में रखकर जिसमें भारत की

अहम भूमिका है – ऐसे मुद्दों पर हिंदी लेखक चुप्पी साधे क्यों बैठे थे ? और इसके बाद भी अन्य किसी पत्रिका ने ये प्रयास क्यों नहीं किया कि बांग्लादेश के मुद्दे पर अन्य भाषाओं के लेखकों की राय ली जाए। न ही इस दिशा में तत्कालीन स्थापित हिंदी लेखकों का कोई ठोस पक्ष सामने आया।  वजह चाहे कुछ भी रही हो लेकिन एक बात स्पष्ट है कि बांग्लादेश के संदर्भ में बांग्ला  साहित्य में जिस तरह का विरोध दर्ज है ऐसा विरोध आपातकाल के समय में भी साहित्य में नज़र नहीं आता। हिंदी साहित्य में गिनी-चुनी कहानी -उपन्यास ही इस संदर्भ में लिखे गए वो भी काफी बाद में। जहाँ तक बांग्ला साहित्यकारों की बात है तो चाहे अचिन्त्यकुमार सेनगुप्त हों या जरासंध या फिर बांग्ला  की प्रतिष्ठित लेखिका महाश्वेता देवी सभी ने उस महत्त्वपूर्ण समय को अपनी कहानियों में कैद कर हमेशा के लिए अमर कर दिया है|

महाश्वेता देवी की कहानी जनक राजा के धान खेत भी एक ऐसी कथा है जिसमें बांग्लदेश के उन किसानों की पीड़ा को दिखाया गया है जो अपने खेतों से वैसे ही प्यार करते थे जैसे राजा जनक अपनी पुत्री सीता से। अपने देश को छोड़कर चले जाने का दर्द क्या होता है –इस दर्द को शायद एक किसान से बेहतर कोई और नहीं समझ सकता जो अपनी देश की मिट्टी को सींच-सींच कर उसमें खेती करता है। जिस खेत में कभी फसलें लहलाहतीं थीं आज उसी में लोगों की लाशें सड़ रही हैं। एक आम किसान को यह भी नहीं पता कि वह अपने ही देश में अपने ही लोगों से क्यों लड़ रहे हैं ? एक स्वतंत्रता की लड़ाई अंग्रेजों से लड़ी थी क्योंकि वो विदेशी थे लेकिन अपनों से कैसा युद्ध ? क्या ये वाकई में युद्ध था या उससे भी भीषण कुछ और – सभी इसे युद्ध क्यों कहते हैं ? ……घरघर में आग लगाना, बाज़ारों और हाटों को लूटना, क्या इसी का नाम युद्ध है ? आंच लगने से मिट्टी को फोड़कर चीटियों का झुंड जिस प्रकार निकलता है, उसी प्रकार मनुष्य अपने घरद्वार छोड़कर निकल रहे हैं क्या इसी का नाम युद्ध है6.   जनक के मन में यह प्रश्न रह-रहकर आते हैं कि जिस युद्ध की वजह से उसका पोता मर गया, जिस युद्ध के कारण उसके पोते की बहू पागल हो गयी उस युद्ध से किसी को हासिल क्या होगा ? और अंत में जाकर उसे अपने सभी सवालों का जवाब मिल जाता है –‘जो काम जिस के लिए है उसे करते रहना भी एक युद्ध है।’ किसान का एक ही काम है अपने खेतों का ध्यान रखना, उसे बीमारी से बचाना – इसी कार्य को करने के लिए जनक बीच रास्ते में ही शरणार्थी कैंप को

छोड़कर अपने खेतों की तरफ लौट आता है –“जनक अपने खेत में खड़ा हुआ|…जेठ के महीने में धान के खेत का चारा सब्ज रहता है निराई नहीं हुई इसीलिए बीचबीच में घासफूस भी उगे हुए हैं……जनक पागलों की तरह घासफूस को उखाड़कर फेंकने लगा|…..बड़बड़ाता हुआ वह घासफूस को गालियाँ देने लगा मानो वो युद्ध कर रहा हो मिट्टी की गंध से उसे उत्तेजना मिल रही थी जिसका जो काम है वह उसे नहीं करने दिया जाए तो मनुष्य जिंदा कैसे रह सकता है…… मिट्टी की गंध और धानचारे की खुशबू में जनक अँधा हो गया बहरा हो गया इसलिए वह लोगों का चिल्लाना सुन नहीं सका देख नहीं सका कि सामने कौन हैं जो उस पर बन्दूक तान रहे हैं|”7.  बांग्लादेश की लड़ाई केवल सत्ता के लिए नहीं थी ये लड़ाई हर कोई अपने लिए लड़ रहा था – किसान अपने खेतों के लिए, बच्चे अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए, युवा अपने देश के लिए , सभी अपनी –अपनी इच्छाओं को जिंदा रखना चाहते थे। अपनी इच्छाओं को मरने नहीं देना यह भी तो एक युद्ध ही है| महाश्वेता देवी की यह कहानी भले ही बांग्लादेश की पृष्ठभूमि पर लिखी गयी हो लेकिन गौर से देखा जाए तो ये कथा हर उस देश की है जहाँ युद्ध जैसी भीषण परिस्थितियां बनी हुईं हैं। दरअसल ‘अणिमा’ के इस अंक में प्रकाशित हर कहानी आज भी प्रासंगिक है केवल इसलिए नहीं कि ये युद्ध में मारे गए उन लाखों लोगों की शहादत की याद दिलाती है बल्कि इसलिए कि वर्तमान समय में जो देश के हालात हैं उनसे लड़ने की शक्ति प्रदान करती है। ‘नील फूल’ जैसी कहानियां आज भी बंगलादेशी शरणार्थियों की स्थिति का वर्णन करती हैं जो अपने देश से दूर दूसरे देश में लोगों की दया के पात्र बने हुए हैं। जिनके मन में एक आशा आज भी जिंदा है कि कभी न कभी वह अपने बांग्लादेश के नील फूल ज़रुर देख सकेंगे।

अतीन वन्द्योपाध्याय की कहानी बांग्लादेश के लोग में धर्म और भाषा के नाम पर लोगों को मारने वालों पर करारा व्यंग्य किया गया है| धर्म और भाषा की लड़ाई में पिसने वाले बंगलादेशी लोग यह नहीं समझ पा रहे थे कि आखिर उन्हें मारा क्यों जा रहा है। क्यों उन्हें अपने ही देश में परदेसी बना दिया गया है| केवल इसलिए कि उनका धर्म इस्लाम है लेकिन भाषा बंगाली ? या इसलिए कि वह अपने अल्लाह के साथ-साथ माँ दुर्गा का भी नाम लेते हैं ? जो परिस्थितियां उस समय बांग्लादेश के समक्ष थीं वह आज भारत के सामने कश्मीर को

लेकर हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि उस समय धर्म के ठेकेदार अब्दुल वारी (कथा का नायक) के कपड़े उतारकर उसके मुस्लिम होने का सबूत मांगते हैं और आज के ठेकेदार फतवा जारी करके यह कहते हैं कि मुस्लिम औरतों के लिए बुर्का पहनना ज़रूरी है। समय ज़रुर बीत गया है लेकिन हालात ज्यों के त्यों बने हुए हैं।           

बांग्लादेश की गाथा को अपने कथा विशेषांक में जगह देकर अणिमा ने बांग्ला  साहित्य के महत्त्व को प्रतिपादित करने की कोशिश की है। निश्चित तौर पर यह कथा विशेषांक केवल बांग्ला  साहित्य की विशिष्टताओं को ही उजागर नहीं करता बल्कि साहित्य-सृजन की कला क्या और कैसी होनी चाहिए- इसकी भी प्रेरणा प्रदान करता है।

          अणिमा के इस कथा-विशेषांक से पूर्व ‘उत्कर्ष’ पत्रिका ने मई और सितम्बर 1971 के अंक में बांग्लादेशी कविताओं को प्रकाशित किया था। इन कविताओं की खासियत यह थी कि ये केवल  बांग्लादेश की पृष्ठभूमि पर ही आधारित नहीं थीं बल्कि बंगलादेशी कवियों द्वारा रचित थीं। इसके अतिरिक्त इस अंक में हिंदी कवियों की उन रचनाओं को भी शामिल किया गया जो बांग्लादेश की स्थितियों पर अपना मत स्पष्ट करते हैं। वेणु गोपाल, गोपी डढूला, वीर राजा, अप्रसाद दीक्षित जैसे कवियों ने यह साबित कर दिया कि केवल पश्चिम बंगाल ही नहीं बल्कि भारत के अन्य राज्य भी बांग्लादेश की क्रांति में उनके साथ हैं।  बांग्लादेश के कवियों की पंक्तियों को अपनी पत्रिका में आवाज़ देकर ‘उत्कर्ष’  ने  उन सोये हुए कवियों को जगाने की कोशिश की जो अभी भी क्रांति एवं स्वतंत्रता जैसे शब्दों से अनजान थे। जिनकी कविता अभी –भी प्रेयसी के केशों में उलझी हुई थी। दरअसल 1971 के बांग्लादेश पर केन्द्रित साहित्य हर उस लेखक, कवि एवं कलाकार के लिए एक प्रेरणा हैं जो सच को बाहर लाने से कतराता है। यह कवितायें केवल बांग्लादेश के लोगों को ही नहीं पुकार रही हैं बल्कि हर उस देश के नागरिक को जगा रही हैं जो अभी-भी परतंत्रता की ज़जीरों में जकड़ा हुआ है –

महाप्रलय की पुकार आई है

आगे बढ़ने की

शपथ लेने की

घरघर में।

खून में आया है आदिम ज्वार

उसी के प्रवाह में

हमने ली नई सौगंध

कोई भी बाधा का प्राचीर हम नहीं मानेंगे

कुंठित है, हम दुर्बल।

हम हैं भयंकर :

तोड़ेंगे हम

शत्रुओं का सारा बंधा

रचेंगे दूसरा

नया फंदा।8.

काजी हिमायातुल्ला की यह कविता क्रांति का आह्वान कर रही है। देश के हर नागरिक को उसके कर्त्तव्य की याद दिला रही है कि अब एक स्वतंत्र देश बनाने का वक्त आ गया है,इसलिए यह आवश्यक है कि हम सब मिलकर यह शपथ लें कि अब मरेंगे ही नहीं, मारेंगे भी। शत्रु-पक्ष का फंदा उसी के गले में डाला जाएगा और उसी के खून से बांग्लादेश का नया इतिहास लिखा जाएगा। ज़ाहिर है कि ऐसी कविता करना उस समय की मांग थी – क्रान्ति के आह्वान के लिए ज़रूरी है कि कवि आम-जनता के दिलों से मौत का डर निकाल फेकें क्योंकि सड़क पर पड़ी अपने देशवासियों की लाशों को देखकर कोई भी इंसान कमज़ोर पड़ सकता है। ऐसे हालातों में उसके अन्दर दबे आक्रोश को क्रान्ति का रूप दे देना ही कवि का कर्म था। शमसुर रहमान की कविता ‘लाश’ इसी कवि कर्म को निभाते हुए नज़र आती है –

यह लाश हम रखें तो कहाँ

भला इस लायक कब्र कहाँ

x-x-x-

चूं आज यह लाश नहीं रखता

मिट्टी में, पहाड़ में, सागर में

हर दिल में है ठांव इसका|”9.

बांग्लादेश की लड़ाई में शामिल हर शख्स अपने दिलो-दिमाग में इन लाशों के ढेर को सहजे बैठा है। सड़क पर पड़ी लाशें चीख रही हैं कि अब पीछे मत हटना। इन लाशों को पर्वत, पहाड़,मिट्टी दफ़न नहीं कर सकती क्योंकि अभी भी यह बंगवासियों के दिलों में जिंदा हैं, उनकी लड़ाई में उनके साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर लड़ रही हैं, उन्हें प्रेरित कर रही हैं कि बिना रुके आगे बढ़ते चलो, मंज़िल करीब है।

हुमांयू आज़ाद की कविता ‘ब्लड बैंक’ भी देशवासियों के मनोबल को बढ़ाती हुई प्रतीत होती है। बांग्ला देश में बंगवासियों के खून की जो नदियाँ बह रही हैं दरअसल वो खून मातृभूमि के लिए ब्लड बैंक का काम कर रहा है। प्रस्तुत कविता में हुमायूँ आज़ाद बंगवासियों की शहादत को संबोधित करते हुए कह रहे हैं कि स्वतंत्रता की लड़ाई को खून से सींचना ही पड़ेगा अगर ऐसा नहीं किया तो तुम्हारा खून अस्पताल की बोतलों में पड़ा-पड़ा गन्दा हो जाएगा। इसलिए आवश्यक है कि तुम अपना खून इस धरती पर बह जाने दो। धरती पर पड़ी तुम्हारे रक्त की एक बूँद दस गुना होकर तीव्र गति से शत्रु-पक्ष का सफाया कर रही है इसलिए आवश्यक है कि अपने इस ब्लड बैंक को स्वतंत्रता मिलने तक खाली न होने दो –

बंगाल की धरती पर रोज़ाना कैसा रक्तपात हो रहा है

हर बटोही कुछ लोहू दे जाता

ब्लड बैंक में : बंगाल की धरती पर……….

हर मजदूर अपनी मंजिल के पथ पर बिखेरता रक्त सूर्य बीज

स्कूल के बच्चे छात्र युवतीयुवक…….

सब लोग खून छोड़ जाते ब्लड बैंक में।

कौन भला अब ब्लडबैंक अस्पताल में रखे

वह लाल खून गन्दला जाता है

कांच शीशी और दवा के जहरीले स्पर्श से

बंगाल की धरती जैसा ब्लडबैंक कहीं नहीं

बूँद भर लाल खून

दस बूँद बन जाता उस बैंक में रखते ही

इसलिए अब कोई ब्लड बैंकअस्पताल जाता नहीं।10.

बांग्ला देश की हवा में अब मुक्ति की महक आने लगी है। मुक्ति की कल्पना भयभीत चेहरों पर मुस्कान के फूल खिलाने लगी है। स्वतंत्र देश की शुद्ध परिकल्पना कैसे बंगवासियों को भाव-विभोर कर रही है इसका चित्रण हसन हाफिसुर रहमान की इस कविता में मिलता है –

निसर्ग के गले में बंधे रंगगर्ती टाई की नाई

अनगिनत कनकौवे उड़ रहे हैं

सारे देश भर में एक भी अमरीकी झंडा नहीं

बे रोक टोक हवा के शुद्ध आवागमन से

बच्चों के ताज़े चेहरों पर मानों भिनसारे खिले फूल हों11

उपर्युक्त पत्रिकाओं में प्रकाशित बंगला साहित्य के विवेचन से यह स्पष्ट है कि बांग्ला  साहित्य में समसामयिक घटनाओं का चित्रण कितने मुखर रूप में हुआ है। बात भले ही देश की हो या देश के बाहर की बांग्ला  लेखक हर राजनीतिक एवं सामाजिक गतिविधि पर अपनी पैनी दृष्टि रखते है और उसे बड़ी ही बारीकी के साथ साहित्य में व्याख्यायित करते हैं। लेकिन तत्कालीन समय में बांग्ला  साहित्य में और किस प्रकार की साहित्यिक प्रवृत्तियां विद्यमान थीं – कैसी कहानी और कविता लिखी जा रही थीं, राजनीतिक मुद्दों के अलावा बंगला साहित्य और किन मुद्दों की ओर केन्द्रित था, इन प्रश्नों के जवाब जाने बिना तत्कालीन बंगला साहित्य को पूर्ण रूप से विवेचित नहीं किया जा सकेगा।ऊपर जिन कहानियों या कविताओं का ज़िक्र किया गया है वह एक विशेष दृष्टिकोण के अंतर्गत लिखी गयीं थीं लेकिन इसके अलावा बंगला कहानी या कविता का क्या स्वरुप है यह जानने के लिए कुछेक और पत्रिकाओं में प्रकाशित कहानियों, कविताओं और लेखों का मूल्यांकन करना आवश्यक होगा –

बंगला कहानी   साहित्यिक प्रवृतियों के दृष्टि से देखा जाए तो 1950 से लेकर 1980 तक का समय काफी महत्त्वपूर्ण था। विशेषत: कहानी और कविता जैसी विधाओं के विकास की दृष्टि से। बंगला कहानी की बात करें तो इन तीस वर्षों में बंगला कहानी के स्वरुप में काफी परिवर्तन आया था।  ऐसा माना जाता है कि 50 के दशक में बंगाली कहानीकार मूलत: कथा के लिए या तो किस्सा-गोई की शैली पसंद करते थे या फिर पाठक के सामने चमत्कारिक शैली में कोई रोमांचकारी घटना का विवेचन कर देते थे। लेकिन 70 के दशक तक आते-आते लेखकों के दृष्टिकोण में परिवर्तन आया। अब कहानीकार न तो किस्सागोई की शैली पसंद करते थे न ही उन्हें चमत्कारिकता में विश्वास था। संचेतनाके अप्रैलजुलाई 1967 के अंक में प्रकाशित लेख आज की बंगला कहानी में आलोक सरकार पूर्ववती एवं समकालीन बंगला कहानीकारों में अंतर स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि -” वर्तमान बंगला कहानी के चिंताशील एवं संचेतन रचयिताओं ने कहानीरचना के दायित्व को नितांत भिन्न अर्थ में ग्रहण किया है|……आज के कहानीकार कहानी तत्त्व को निकाल, चरित्र का निषेध कर, किसी भी प्रकार के उद्देश्य को वर्जित कर,कहानी को एकांत, एकमात्र शिल्पपरिणत का अर्थ देना चाहते हैं|…पच्चास के दशक के कहानीकार कहानी और कविता में अभिन्नता स्थापित करना चाहते थेबहुधा इसका सुपरिणाम होने पर भी अधिकांशत: यह आवेगपूर्ण रहा और किशोर भावुकता में सीमाबद्ध हो गया ….कुछ लेखक यौनआवेग के खुलासा वर्णन को ही आधुनिकता मानते हैं……जबकि आज के कहानीकार यौनविषय के बचकाने वादविवाद पर बहस नहीं करना चाहते ही समाजसुधार एवं उन्नयन का दायित्व ग्रहण करना चाहते हैं ये केवल कहानी लिखना चाहते हैं|”12. ज़ाहिर है कि नये कहानीकार एक नया तरह का प्रयोग साहित्य में करना चाह रहे थे – उद्देश्य विहीन कहानी लिखना जिसमें पात्रों या कहानी तत्व की प्रधानता न होकर केवल शिल्प का आधिपत्य हो, यह भी तो एक तरह का नया प्रयोग ही हुआ। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि 50 के दशक के कहानीकार केवल किस्सागोई शैली में ही रचनाएँ करते थे या उनकी कहानी में कौरी भावुकता थी।  यहाँ पर ताराशंकर वन्द्योपाध्याय की कहानी मोतीलाल की चर्चा करना आवश्यक है जो कल्पना के फ़रवरी 1953 के अंक में प्रकाशित हुई थी। 50 के दशक में लिखी गयी ये कहानी हर लिहाज़ से उत्कृष्ट है। यह कहानी हाशिये पर पड़े उस आदमी की स्थिति का वर्णन कर रही है जो दलित होने के साथ –

साथ अपनी कुरूपता का मूल्य भी प्रतिदिन समाज के ठेकेदारों को देता है। कहानी में मोतीलाल और उसकी पत्नी देखने में आम इंसानों जैसे नहीं हैं।उनकी कुरूपता को लेकर गाँव भर में चर्चा है। यही वजह है कि मोतीलाल नुक्कड़ नाटकों में रूप बदल-बदलकर हर प्रकार की भूमिकाएं निभाता है। लेकिन उसकी पत्नी भुवन को यह बात पसंद नहीं है वो चाहती है कि उसका पति कोई काम पकड़ ले ताकि आगे चलकर बच्चे हों तो उनका पालन-पोषण भी अच्छे से हो। लेकिन मोतीलाल इससे इक्तिफाक नहीं रखता। उसे लगता है कि उसका रूप ही उसकी पहचान है अत: वो जो कार्य कर रहा है वो ही ठीक है। इसी उधेड़बुन में कहानी आगे बढ़ती है और एक दिन गाँव के किसी माननीय व्यक्ति की बेटी मोतीलाल का रूप देखकर बेहोश हो जाती है। मोतीलाल लड़की का स्वास्थ्य जानने की नीयत से उसके घर जाता है जहाँ उसका स्वागत लात और घूंसों से किया जाता है। मोतीलाल किसी तरह घर पहुँचता है और अपनी पत्नी से कहता है -“हम लोगों का लड़का हम लोगों की तरह ही काला और कुत्सित होगा भुवन ! ज़रूरत नहीं है हमें बालबच्चों की|”13. कहानी का अंत समाज के घिनौने चेहरे से पर्दा उठाता है जो मानवीय संवेदना को महत्त्व न देकर जाति एवं रंग-रूप पर जोर देता है। हाशिये पर पड़े व्यक्ति में न तो इतनी हिम्मत है और न ही इतना धैर्य कि वह इन रुढ़िवादी परम्पराओं के खिलाफ लड़े। इसलिए इसे ही अपनी नियति मानकर ये अपने हालातों के साथ समझौता कर लेते हैं। यह कहानी समाज की एक समस्या की ओर ध्यान आकर्षित अवश्य करती है लेकिन कहानी कोई उपदेश नहीं देती। पूरी कहानी का शिल्प-विधान भी बेजोड़ है। शुरू से लेकर अंत तक कहानी की भाषा पाठकों को बांधे रखती है। कहानी में चित्रित परिस्थितियां एक के बाद एक स्वयं ही कहानी की गति को आगे बढ़ाती हैं। हाँ यह ज़रुर है कि इस कहानी का एक उद्देश्य है। लेकिन एक बात गौर करने लायक है कि अगर साहित्य में से उद्देश्य तत्त्व का ही लोप कर दिया जाएगा तो साहित्य का अर्थ ही क्या रह जाएगा ? नये कहानीकारों का नया प्रयोग हैकेवल कहानी लिखना है- लेकिन क्या कोई कहानीकार उद्देश्य विहीन कहानी लिखा सकता है ? किसी नयी रचना का सृजन करना अपने आप में एक उद्देश्य है इसलिए भले ही कोई कहानीकार ये मानकर चले कि उसने एक उद्देश्यहीन कहानी की रचना की है लेकिन पाठक उस कहानी के लिए कोई न कोई उद्देश्य ढूंढ ही लेगा। जहाँ तक बात नए कहानीकारों की है तो उन्होंने ज़रुर ऐसी कथाओं की रचना की जिसमें कहानी तत्त्व और चरित्र प्रधानता दोनों का ही लोप था। संचेतनाके अप्रैलजुलाई 1967 के अंक में रमानाथ राय की बंगला कहानी दरवाज़ाप्रकाशित हुई। सन् 60 के बाद जिस नयी चाल की कहानी की चर्चा शुरू हुई ये उसमें

बिलकुल फिट बैठती है। इस कहानी में प्रधान पात्र है एक ‘पुराना दरवाज़ा’ जिसे लक्ष्य करके कहानी लिखी गयी है| दरवाज़े के पीछे से सीढ़ियाँ उतरते आदमियों की कुछ-कुछ आवाजें आती हैं और ऐसा लगता है कि ये दरवाज़ा टूट जाएगा।लेकिन वह दरवाज़ा ज्यों का त्यों यूँ ही खड़ा है। कहानी का मूल्यांकन करने के पश्चात् ऐसा लगता है कि जो आवाजें दरवाज़े के पीछे से सीढ़ियाँ उतरते हुए लोगों की आ रही हैं वो केवल सहायक पात्र हैं, जिनका उपयोग उस दरवाज़े की महत्ता को प्रतिपादित करने के लिए किया गया है। कितने ही वर्षों से यह दरवाज़ा खड़ा है। हजारों लोग सीढ़ियों से उतरते –चढ़ते हैं दरवाज़ा उन सभी को देखता है, उनकी बातें सुनता है लेकिन कोई उस दरवाज़े की ओर ध्यान नहीं देता। दरवाज़ा हर अच्छी-बुरी बात को ध्यान से सुन रहा है लेकिन चाहकर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दे पा रहा क्योंकि उसकी मजबूरी है, वो निर्जीव है, उसकी आवाज़ कोई सुन नहीं सकता। लेकिन आज का मनुष्य तो बोल सकता है  सुन सकता है,  देख सकता है फिर भी जानबूझकर अँधा,बहरा,गूंगा बना हुआ है ?  ऐसा लगता है यह कहानी आधुनिक मनुष्य की प्रवृत्ति को विवेचित कर रही है जो अच्छे-बुरे में भेद तो जानता है लेकिन सही को सही और गलत को गलत कहने से कतराता है। कहानी के अंत में दरवाज़े की पीछे से आ रही आवाजों से ऐसा लगता है जैसे कि इस बार दरवाज़ा ज़रूर टूट जाएगा –पैरों की धम-धम से नहीं बल्कि मनुष्य के गिरते हुए व्यवहार से जिसे एक दरवाज़ा तो महसूस कर रहा है लेकिन इंसान नहीं – और ? /एक मंथली था /और ?/सिनेमा का टिकट था / और ?/ कुछ रुपए थे / और?/एक ब्लेड था /और?/…….और किसी के घर का पता था / और ?/……..दरवाज़े के भीतर से आवाज़ आने लगी धम..धम ….दरवाज़ा इस बार टूटकर गिर पड़ेगा14.  प्रस्तुत कहानी के शिल्प-विधान से स्पष्ट है कि 60 के दशक का लेखक किस तरह की कहानियां लिखना चाह रहा था। केवल नया प्रयोग ही नहीं बल्कि कहानी के स्वरुप को ही नया आकार देने में लगा हुआ था। ‘नई धारा’ पत्रिका में प्रकाशित सभी बंगला कहानियां नए प्रयोग पर ही आधारित हैं । समरेश बसु की कहानी ‘अनजाने’ जहाँ एक ओर आधुनिक –पति और पत्नी के संबंधों को नए रूप में व्याख्यायित करती है वहीं मिहिर आचार्य की कहानी ‘तीर्थ यात्रा’ प्रतीकात्मक रूप में अन्धविश्वास और विश्वास के बीच के भेद को स्पष्ट करती है। ‘नई धारा’ पत्रिका में प्रकाशित अधिकतर बंगला कहानी प्रतीकात्मकता एवं रहस्यवाद का आभास कराती हैं जिससे लेखक की परिकल्पना पर कभी-कभी आश्चर्य  होता है तो कभी-कभी खीझ भी चढ़ती है कि कहानी को इतना दुरूह बनाने की क्या आवश्यकता थी। इसका स्पष्टीकरण देते हुए आलोक सरकार कहते हैं कि – आज के

लेखक मानते हैं कि उनकी कहानी प्रधानत: ऑब्जेक्टिव होगी….ओब्जेक्टिविटी से उनका तात्पर्य है कि कहानी को किसी चरित्र के दृष्टिकोण से रचने की प्रक्रिया मान्य नहीं होगी……लेकिन अधिकतर कहानीकार जिस वस्तुनिष्ठ कहानी की बात करते हैं वे प्राय: उसे कार्यान्वित नहीं कर पाते। उनकी कहानियां पढ़कर, उनकी आत्मनिष्ठता (subjectivity) स्पष्ट हो जाती है….कोई भी साहित्य पूर्णत: वस्तुनिष्ठ हो ही नहीं सकता क्योंकि उसके प्राणउत्स में रहता है एक सब्जेक्ट अर्थात लेखक15.  आलोक सरकार का यह कथन पुराने और नए कहानीकारों के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए नये लेखकों के विज़न को पूर्णत:रेखांकित करता है। हालाँकि इस बिना पर ये नहीं कहा जा सकता कि नए कहानीकार अपने इस प्रयोग में सफल नहीं हुए। एक ओर जहाँ रमानाथ राय, शेखर बसु, कल्याण सेन जैसे लेखकों ने अपने नए विज़न में कहानी को ढालकर बंगला साहित्य को समृद्ध किया है। वहीं दूसरी ओर 50 के दशक के बुद्धदेव बसु,ताराशंकर वन्द्योपाध्याय जैसे कहानीकारों की चर्चा किये बिना बंगाली कहानी का इतिहास अधूरा ही रहेगा।

बंगला कविता – लघु पत्रिकाओं में जितना स्पेस बंगला कहानी को दिया गया है उतना किसी अन्य विधा को नहीं दिया गया। यहाँ तक कि बंगला कविता भी इन लघु पत्रिकाओं की नज़रों से ओझल ही रही। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि 50 के दशक में जितना महत्त्व &