dalit sahitya

दलित स्त्री लेखन की उपलब्धियां और सम्भावनाएँ

दलित महिलाओं का शोषण सर्वाधिक हुआ है लेकिन साहित्य की मुख्यधारा में उनका जीवन अनुपस्थित रहा है, मुख्यधारा की बात छोडिए दलित साहित्य में भी वह पर्याप्त प्रतिनिधित्व की भागीदार नहीं बन पाई है।

 47 total views,  1 views today

silhouette of woman near window blinds

दलित महिला रचनाकारों की आत्मकथाओं में अभिव्यंजित व्यथा- विजयश्री सातपालकर

महिला आत्मकथाकारों में कौशल्या बैसंत्री की ‘दोहरा अभिशाप’ एवं सुशीला टाकभौरे की ‘शिकंजे का दर्द’ उल्लेखनीय है। पुरुष लेखक की तुलना में दलित लेखिकाओं की आत्मकथाएं उतनी मात्र में उपलब्ध नहीं है। भारतीय वर्ण व्यवस्था के तले दलित स्त्रियाँ ने मानसिक एवं शारीरिक पीड़ा की दोहरी मार सही है। प्रस्तुत लेख में कौशल्या बैसंत्री कृत ‘दोहरा अभिशाप’ और सुशीला टाकभौरे कृत ‘शिकंजे का दर्द’ आत्मकथाओं में अभिव्यक्त व्यथा का चित्रण किया गया है।

 13 total views,  1 views today

assorted books on wooden table

हिंदी दलित आत्मकथाओं में अभिव्यक्त समकालीन प्रश्न-बृज किशोर वशिष्ट

समकालीन हिंदी साहित्य में दलित और स्त्री साहित्य की दो ऐसी धाराएँ प्रवाहित हो रही हैं जो हमारे समाज के मूलभूत और पुरातन प्रश्नों के उत्तर देने का प्रयत्न कर रही हैं। बहुत हद तक दलितों के सामने वही चुनौतियाँ हैं जिनका ग्रामीण और शहरी भारत के निर्धन सामना करते हैं। जीवनयापन की समस्या का सामना प्रत्येक जाति और वर्ग के निर्धन को करना पड़ता है लेकिन साथ ही साथ यह भी तथ्य हमारे सामने है कि अन्य जातियों के मुकाबले दलित जातियों में निर्धनता ज्यादा गहराई से पैठी हुई है। गरीबी के अलावा छुआछूत, आंतरिक सोपानीकरण, नव-ब्राह्मणवाद, रूढि़वादी मानसिकता, भाग्यवाद इत्यादि कुछ ऐसे केंद्रीय समस्याएँ हैं जिन्हें दलित समाज के समग्र विकास में प्रमुख अवरोधक माना जा सकता है।

 12 total views,  2 views today