हिंदी कहानी का नाट्य रूपांतरण – कथानक के स्तर पर: चंदन कुमार

people standing on stage with lights turned on during nighttime

हिंदी कहानी का नाट्य रूपांतरण – कथानक के स्तर पर

चंदन कुमार

शोधार्थी

हिंदी विभाग

गोवा विश्वविद्यालय

संपर्क: 8390122193

ईमेल: chandankumar3491@gmail.com

सारांश

कहानियों में भाव बोध को अपनी भाव भंगिमा के साथ प्रस्तुत करना उसका नाट्य रूपांतरण है । विभिन्न प्रकार से घटना, कथा अथवा कहानी कहने की शैली रूपांतरण की जननी है । वर्तमान समय में रूपांतरण एक अनूठी कला की तरह है जो वर्तमान समय में खूब हो रहा है । कविताओं और कहानी का नाटक में, कहानी और नाटक का फिल्मों में रूपांतरण तेज़ी से हो रहा है । अभिव्यक्ति और कथानक को नए रूप में परिवर्तित कर के मंच पर लाया जा रहा है । ध्यातव्य हो कि एक विधा से दूसरी विधा में परिवर्तित होने पर भाषा, काल, दृश्य, संवाद भी बदल जाते हैं । यह बदलने के साथ मर्म को उसी अभिव्यक्ति से साथ प्रस्तुत करना ही नाट्य रूपांतरण को सही अर्थ देता है ।

बीज शब्द

कहानी, रूपांतरण, भाव, भंगिमा

आमुख

हिंदी कहानी का इतिहास साहित्य की दृष्टी से लगभग दो सौ पचास का है किन्तु कहानी कहने और सुनने की प्रथा अति प्राचीन है । किस्सागोई की परम्परा प्रायः बैठकों में होती ही रहती है । किसी घटना या बात को कहने की शैली से बात का महत्व और अधिक हो जाता है । जितना अधिक प्रभावशाली वक्तव्य होता है उसे उतनी अधिक रुचि से सुना जाता है । “कहानी सुनाने की एक सुदीर्घ परम्परा हमारे देश में रही है लेकिन आज जब एक प्रशिक्षित अभिनेता मंच पर कहानी करना चाहता है तो कई सवाल उठ खड़े होते हैं क्या रंगमंच पर लाने के कहानी के अपने अस्तित्व को बदलना होगा…”[1] कहानियों में भाव बोध को अपनी भाव भंगिमा के साथ प्रस्तुत करना उसका नाट्य रूपांतरण है । विभिन्न प्रकार से घटना, कथा अथवा कहानी कहने की शैली रूपांतरण की जननी है । विश्व साहित्य की अनेक विधाओं का अलग-अलग स्वरूप होता है, न केवल उनकी रचना प्रक्रिया अलग होती है बल्कि उनके तत्व भी एक दूसरे से बिल्कुल पृथक होते हैं । उनके भीतर संवेदना का स्तर भी अलग होता है । किसी विधा में रची गई रचना के मर्म को अभिव्यक्त करना रूपांतरण के लिए सबसे जरूरी अंग है । इसके साथ-साथ यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि साहित्यिक विधाओं का स्वरूप, समय और आवश्यकता के अनुसार बदलता रहता है । वर्तमान समय में रूपांतरण एक अनूठी कला की तरह है जो वर्तमान समय में खूब हो रहा है । कविताओं और कहानी का नाटक में, कहानी और नाटक का फिल्मों में रूपांतरण तेज़ी से हो रहा है । अभिव्यक्ति और कथानक को नए रूप में परिवर्तित कर के मंच पर लाया जा रहा है । ध्यातव्य हो कि एक विधा से दूसरी विधा में परिवर्तित होने पर भाषा, काल, दृश्य, संवाद भी बदल जाते हैं । यह बदलने के साथ मर्म को उसी अभिव्यक्ति से साथ प्रस्तुत करना ही नाट्य रूपांतरण को सही अर्थ देता है ।

कहानी का नाटक में रूपांतरण करने के लिए सबसे पहले कहानी और नाटक में वैविध्य तथा समानताओं को समझना आवश्यक है । जहाँ कहानी का संबंध लेखक और पाठक से जुड़ता है वहीं नाटक का नाटककार, निर्देशक, पात्र, दर्शक, श्रोता एवं अन्य लोगों को एक दूसरे से जोड़ता है । सुनने से अधिक दृश्य का स्मृतियों से गहरा संबंध होता है इसलिए नाटक एवं फिल्म को लोग देर तक याद रखते हैं । कथा साहित्य से जितना रंगमंच ने लिया है उससे कहीं ज्यादा सिनेमा से कथा साहित्य से रचनाएँ ली हैं और उसे नए आयाम दिए हैं । सिनेमा के पास मंच से अतिरिक्त अवकाश होता है यही कारण है कि गोदान, पंचलाइट, तीसरी कसम, देवदास, उसने कहा था, चीफ की दावत, दोपहर का भोजन, चंद्रकांता, सद्गति आदि के रूपांतरण कई बार और कई तरह से हुए हैं । ‘कथा’ अंतर्गत कार्यव्यापार की योजना को ‘कथानक’ (P।ot) कहते हैं । अंग्रेजी में ‘कथावस्तु’ को ‘प्लाट’ कहा जाता है । ‘प्लाट’ अरस्तु के ‘माइथास’ का अंग्रेजी रूपान्तरण है ।”[2] ‘कथानक’ और ‘कथा’ दोनों ही शब्द संस्कृत ‘कथ’ धातु से उत्पन्न हैं । संस्कृत साहित्यशास्त्र में ‘कथा’ शब्द का प्रयोग एक निश्चित काव्यरूप के अर्थ में किया जाता रहा है किंतु “कथा शब्द का सामान्य अर्थ है- वह जो कहा जाए ।”[3] यहाँ कहने वाले के साथ-साथ सुनने वाले की उपस्थिति भी अंतर्भुक्त है कयोंकि ‘कहना’ शब्द तभी सार्थक होता है जब उसे सुनने वाला भी कोई हो । श्रोता के अभाव में केवल ‘बोलने’ या ‘बड़बड़ाने’ की कल्पना की जा सकती है, कहने की नहीं । इसके साथ ही, वह सभी कुछ जो कहा जाए कथा की सीमाओं में नहीं सिमट पाता है । साधारणतः कथा का तात्पर्य किसी ऐसी कथित घटना के कहने या वर्णन करने से होता है जिसका एक निश्चित क्रम एवं परिणाम सामने नजर आ रहे हों । “घटनाओं के कालानुक्रमिक वर्णन को कथा (स्टोरी) की संज्ञा दी है जैसे ‘नाश्ते के बाद मध्याह्न का भोजन’, ‘सोमवार के बाद मंगलवार’, यौवन के बाद वृद्धावस्था आदि ।”[4] कहानी कही जाती है या पढ़ी जाती है । वर्तमान दौर में कहानी और उपन्यास की गिनती नाटकों की अपेक्षा अधिक है कारण स्पष्ट है कि आज के लगातार जटिल होते यथार्थ को पूरी गहराई, सूक्ष्मता और तीव्रता से व्यक्त करने में अपने ख़ास फार्म के कारण नाटक समर्थ नहीं हो पा रहे हैं । उसके मर्म को दिखाने के लिए कहानी के रूपांतरण को छोटे-छोटे संवादों, संगीत, प्रकाश के सहयोग से दिखाया जाता है । कहानी को मंच पर प्रस्तुत करने के लिए दो प्रक्रियाओं का सहारा लिया जाता है, अव्वल कहानी को भावों के साथ संवादों के उतार-चढ़ाव के साथ पढ़ दी जाए जिससे वह बोरियत सी न लगे ।  दूसरा उसे नाटक में परिवर्तित कर के अनेक पात्रों की सहायता से विधिवत प्रस्तुत किया जाए । भारतीय रंगमंच ‘भरत’ के ‘नाट्यशास्त्र’ पर आधारित है लेकिन नाट्य रूपांतरण ने उस शास्त्रीयता को लाँघ कर अपनी अस्मिता बनाई है । मंचन के रूप में कहानी का रूप परिवर्तित होता है किन्तु संवेदना के साथ किसी तरह का कोई समझौता नहीं होता है, किसी कारण ऐसा होता है तो वह कहानी के मर्म की हत्या होती है । नाटक में किसी भी पात्र, पात्र के संवाद और दृश्य की कटौती करने से पूरे नाटक का संतुलन बिगड़ सकता है किन्तु कहानी के मंचन में यह सुविधा रहती है कि सूत्रधार की सहायता से पात्रों की संख्या घटाई जा सकती है, मंच पर कम से कम चीज़ों से काम चलाया जा सकता है और इस तरह करने से नाटक की प्रोडक्शन लागत बहुत कम हो जाती है । किसी नाटक के मंचन के लिए अभिनय, मंच सज्जा, संगीत, प्रकाश व्यवस्था होती है । नाटकीयता साहित्य की अधिकतर विधाओं में विधमान रहती है । कविता और कहानी में नाटकीयता अन्य विधाओं के मुकाबले अधिक होती है । कहानी और नाटक दोनों में एक कहानी होती है, पात्र होते हैं, परिवेश होता है, कहानी का क्रमिक विकास होता है, संवाद होते हैं, द्वंद्व होता है, चरम उत्कर्ष होता है । इस तरह हम देखते हैं कि नाटक और कहानी की आत्मा के कुछ मूल तत्व एक ही हैं । यह अवश्य है कि कुछ मूल तत्व जैसे ‘द्वंद्व’ नाटक में जितना और जिस मात्रा में आवश्यक है उतना संभवतः कहानी में नहीं है ।

कहानी को नाटक में रूपांतरित करने के लिए सबसे पहले कहानी की विस्तृत कथावस्तु को समय और स्थान के आधार पर विभाजित किया जाता है । कथावस्तु उन घटनाओं का लेखा-जोखा है जो कहानी में घटती है । प्रत्येक घटना किसी स्थान पर किसी समय में घटती है । ऐसा भी संभव है कि घटना स्थान तथा समय विहीन हो । “कहानी किसी घटना या स्थिति का किया गया वर्णन है । जिसमें वह वर्मान में अतीत की सूचना बनती है इसके विपरीत नाटक घटित हो रही या होते रहने की क्रिया की दृश्यात्मक प्रस्तुति है ।”[5] ऐसा हो सकता है कि कुछ ऐसे दृश्य बनते हों जिन में लेखक ने केवल विवरण दिया हो और उसमें कोई संवाद न हो । ऐसे दृश्यों का भी पूरा खाका तैयार किया जाता है । दृश्य निर्धारित करने के बाद दृश्यों और मूल कहानी को पढ़ने से यह अनुमान लग सकता है कि मूल कहानी में ऐसा क्या है जो दृश्यों में नहीं आया है । ऐसे समय में नाट्य रूपांतरणकर्ता पर बड़ी जिम्मेदारी होती है कि कथा अथवा कहानी को किसी प्रकार से हानि न हो । लेखक द्वारा परिवेश का विवरण या परिस्थितियों पर टिप्पणियाँ प्रायः दृश्यों में नहीं ढल पाती है । कई ऐसे कथाकार हैं जिनकी कहानियों में कई-कई पैराग्राफ दृश्य संयोजन और वस्तुस्थिति बताने में निकल जाते हैं जिन्हें मंचित करना संभव नहीं हो पाता है । यह देखना आवश्यक है कि परिस्थिति, परिवेश, पात्र, कथानक इत्यादि से संबंधित विवरणात्मक टिप्पणियाँ किस प्रकार की हैं । विभिन्न प्रकार के विवरणों को नाटक में स्थान देने के अलग-अलग तरीके होते हैं । कथा को सामान्य भाषा में लिख दी गई हैं किन्तु कथानक में उसके पूरे विवरणात्मक रूप को दिखाया जाता है ।

साहित्य में विधाओं का आदान प्रदान होता रहता है किन्तु विधा बदलने से काव्य प्रभाव और आस्वाद में भी बदलाव आता है । कहानी के नाट्य रूपांतरण का एक दृश्य की कथावस्तु, कथानकद्ध को सामने रखकर एक-एक घटना को चुन-चुनकर निकाला जाता है और उसके आधार पर दृश्य बनता है तात्पर्य यह कि यदि एक घटना, एक स्थान और एक समय में घट रही है तो वह एक दृश्य होगा । स्थान और समय के आधार पर कहानी का विभाजन करके दृश्यों को लिखा जाता है । यह देखना आवश्यक है कि प्रत्येक दृश्य का कथानक के अनुसार औचित्य हो और  प्रत्येक दृश्य का कथानुसार तार्किक विकास हो रहा है या नहीं । यह सुनिश्चित करने के लिए दृश्य विशेष के उद्देश्य और उसकी संरचना पर विचार आवश्यक है । प्रत्येक दृश्य एक बिंदु से प्रारंभ होता है कथानुसार अपनी आवश्यकताएँ पूरी करता है और उसका ऐसा अंत होता है जो उसे अगले दृश्य से जोड़ता है । इसलिए दृश्य का पूरा विवरण तैयार किया जाता है । कहीं ऐसा न हो कि दृश्य में कोई आवश्यक जानकारी छूट जाए या उसका क्रम बिगड़ जाए । नाटक ही में नहीं बल्कि नाटक के प्रत्येक दृश्य में प्रारंभ, मध्य और अंत होता है स्पष्ट है एक दृश्य कई काम एक साथ करता है ।

कथानक की गतिशीलता सीधी रेखा में नहीं चलती उसमें उतार चढ़ाव आते हैं । कथानक में जीवन की इसी गतिमान संघर्षशील रूप की अवतारणा की जाती है । एक ओर वह कथानक को आगे बढ़ाता है तो दूसरी ओर पात्रों और परिवेश को संवादों के माध्यम से स्थापित करता है । इसके साथ-साथ दृश्य अगले दृश्य के लिए भूमिका भी तैयार करता है । कहानी में छपे लंबे संवाद को पाठक पढ़ सकता है लेकिन मंच पर बोले गए लंबे संवाद से तारतम्य बनाए रख पाना कठिन होता है । एक कहानी को मंच पर लाना और साथ ही उसके भाव बोध का सही सम्प्रेषण कथाकार को रोमांचित कर देता है । “यह निर्णय दर्शकों और आलोचकों पर ही छोड़ना होगा । स्वयं मेरे लिए यह बात कि कहानियों को सुनने पढ़ने के अलावा देखा भी जा सकता है, एक विस्मयकारी अनुभव था । जिन कहानियों को अरसा पहले मैंने अपने अकेले कमरे में लिखा था उन्हें खुले मंच पर दर्शकों के बीच देखना कुछ वैसा ही था जैसे टेपरिकॉर्डर पर अपनी आवाज़ सुनना जो अपनी होने पर भी अपनी नहीं जान पड़ती ।”[6] कहानी में चरित्र-चित्रण अलग प्रकार से किया जाता है और नाटक में उसकी विधि कुछ बदल जाती है । रूपांतरण करते समय कहानी के पात्रों की दृश्यात्मकता और नाटक के पात्रों में उसका प्रयोग किया जाता है । संवाद को नाटक में प्रभावशाली बनाने का अगला तरीका अभिनय है जो प्रायः निर्देशक का काम है पर लेखक भी इस ओर संकेत करता है । पात्र की भाव भंगिमाओं, तौर तरीको और उसके मैनरिस्म से प्रभाव उत्पन्न किया जाता है । कहानी के लंबे संवादों को छोटा-छोटा कर के उन्हें अधिक नाटकीय बनाया जाता है । लम्बे संवाद मंच पर अधिक कारगर नहीं हो पाते कभी कभी वो बोझिल से लगने लगते हैं । दो पात्रों के संवाद को इस तरह लिखा जाता है जिससे वह कटे हुए न लगे अपितु कहानी के उस हिस्से को भरे जिनमें केवल दृश्य और वातावरण का जिक्र है ।

जब कभी कहानी के रंगमंच की चर्चा होती है तब देवेन्द्र राज अंकुर का नाम सर्वोपरि आता है । “इस दिशा में देवेन्द्र राज अंकुर ने बहुत पहले 1975 में ‘तीन एकांत’ के शीर्षक से निर्मल वर्मा की तीन कहानियों ‘डेढ़ इंच ऊपर’, ‘धूप का एक टुकड़ा’, ‘वीक एंड’ को मंचित करके जो नया मुहावरा अर्जित किया था, उसमें रंगमंच की एक नई ऊर्जा से साक्षात्कार हुआ था अभीनय और वाचन की नई चुनौतियों और आयामों की ओर संकेत करने वाला यह प्रयोग बाद में ‘कहानी का रंगमंच’ नाम से चर्चित हुआ ।”[7] कहानी का रंगमंच और कहानी का नाट्य रूपांतरण दोनों में एक महीन रेखा खिंची हुई है । कथा और कथानक की दृष्टी से दोनों में परिवर्तन संभव हैं इन दोनों ही में भाव-बोध की समझ अतिआवश्यक है । हिंदी कहानी के नाट्य रूपांतरण की वास्तविक जड़ें ‘तीन एकांत’ के प्रदर्शन से लेकर वर्तमान तक हैं और निश्चित रूप से भविष्य में इसी तरह फूलेंगी । कहानी के मंचन में रचना और अभिव्यक्ति की जितनी शैलियाँ दिखाई पड़ती है, उन्हें पारम्परिक किस्सागोई की हल्की झलक के साथ आधुनिक रंगशैली के कलात्मक संयोजन द्वारा मंचित करते हुए दृश्यात्मक सम्प्रेषण की नई दिशाओं को उकेरा गया है । कहानियों के टेक्स्ट को सुरक्षित रखने के लिए निर्देशक ने अपनी ओर से कुछ भी कहने का प्रयास न करके उसे मूल रूप में ही स्वीकार किया है । “आज के लेखन में इस तरह की बुनावट को छोड़ा जा रहा है । झटके वाली कहानी आज कल कम लिखी जाती है इस तरह आलोचकों का कहना है कि कहानी लेखन पत्रकारिता के निकट आया है । जिस भांति पत्रकार किसी घटना का ब्यौरा सहज स्वाभाविक ढंग से, अपनी ओर से कुछ भी जोड़े या ओढ़ाए बिना पाठक के सामने रख देता है वैसे ही लेखक भी रखने लगा है ।”[8] कुछ वाक्यों को आगे पीछे करने या कहानी के दोहराव को छोड़ने के अतिरिक्त कुछ भी सम्पादित या बदलने की कोशिश नहीं की । ये भी उन स्थानों पर हुआ है, जहाँ कहानी के पात्रों का तनाव, गुस्सा, अकेलापन या संघर्ष आदि है और जिन्हें कार्य व्यापार से व्यंजित किया जाता था । इस रंग प्रयोग की अधिसंख्य प्रस्तुतियों को देखने के बाद कहानी-रंगमंच की दृष्टि से अभिनय शैली की नवीनता पर बातचीत करना दिलचस्प और सार्थक लगता है । कहानी पढ़ते समय पाठक जिस अनुभूति का साक्षत्कार करता है और सूक्ष्म रूप से छिपा हुआ, जो दृश्य संसार उसके सामने बनता संवरता है, उन दृश्यों को रचना के भीतर से तलाश करके मंच पर प्रदर्शित करने से ही ‘कहानी के रंगमंच’ का रूप बनता है ।  एक पाठक जब कहानी को पढ़ता या सुनता है, उसी समय, कहानी के पाठक के समांतर वह कहानी को दृश्यताम्क रूप से भी देखता चलता है ।

निर्मल वर्मा की तीन कहानियों ‘धूप का एक टुकड़ा’, ‘डेढ़ इंच ऊपर’ और ‘वीकएंड’ की मंच-प्रस्तुति ‘तीन एकांत’ शीर्षक से 1975 में देवेंद्र राज अंकुर के निर्देशन में की गई थी । तीनों कहानियों की भावभूमि और शैली लगभग एक-जैसी है । तीनों कहानियों में एक-एक पात्र है जो शुरू से लेकर अन्त तक एक लम्बा संवाद बोलता है, पूरा संवाद एक कथा के रूप में है । कहानी का मंचन इस प्रकार से किया गया है कि एक अहसास भी बना रहता है कि संवाद की शुरूआत किसी दूसरे पात्र के साथ होती है लेकिन यहाँ उसकी स्थिति का कोई अर्थ नहीं रहता है क्योंकि न जाने कब यह संवाद मात्र स्व-केन्द्रित होकर रह जाता है । उपस्थित पात्र इस प्रकार से संवादों को सुपुर्द करता है जैसे उसकी बात को सुनकर कोई उसे उत्तर देगा । कहानियों के रूप कई तरह के होते हैं ऐतिहासिक, पौराणिक, सामाजिक, मोनोलॉग इत्यादि । “मध्ययुगीन लोकनाट्य परम्परा में प्रचलित नाट्य रूपों के साथ-साथ किस्सागोई की परम्परा रही है…मुग़ल बादशाह जहाँगीर के समय क़िस्साख़्वाब का वर्णन मिलता है । आज भी आल्हा, पंडवानी या पाबूजी की पड़ आदि पारम्परिक वाचन शैली के नाटकीय तत्वों से इनकार नहीं किया जा सकता मगर समकलीन कहानी रंगमंच किस्सागोई के इन रूपों से अलग अपना स्वतंत्र रूप बना रहा है…उन्हें तोड़कर या बदलकर प्रस्तुत करने से वह मूल रचना की प्रस्तुति नहीं रहती ।”[9] मोनोलॉग से सम्बंधित प्रकार की कहानियां भारत में विदेशी प्रभाव के कारण आई हैं, मोनोलॉग एक प्रकार से एकालाप होता है जिसमें एक आदमी बोलता रहता है जैसे नाटकों में स्वगत कथन होता है । इस प्रकार ये कहानियाँ अकेलेपन के कुछ क्षणों में पात्रों के स्वयं अपने से साक्षात्कार की कहानियाँ हैं ।

निर्मल वर्मा की कहानियों में विदेशी प्रभाव अधिक है । कहानी का परिवेश, पात्रों की मानसिक स्थिति, उनके संवाद इत्यादि । ‘धूप का एक टुकड़ा’ कहानी का दृश्य एक पब्लिक पार्क से शुरू होता है जहाँ कई बेंचें हैं, पृष्ठभूमि में एक चर्च है और जहाँ-तहाँ फैले धूप के कुछ टुकड़े हैं । एक बूढ़ा है जो एक पैरेम्बुलेटर के सामने बैठा है और संयोग से उसी बेंच पर आकर बैठ जाता है जहाँ एक औरत (नायिका) रोज़ाना आकर बैठती है । इस प्रकार एक मौन, बूढ़े और अपने में ही व्यस्त पात्र की उपस्थिति ने इस औरत के अकेलेपन को भी ज़्यादा रेखांकित करती है । एक पार्क से शुरू होकर भी कहानी का दृश्य-जगत औरत के लम्बे संवाद में उसके अतीत के प्रसंगानुसार बदलता रहता है । उन दोनों बेंचों में किसी तरह का चेंज किए बिना ही मात्र प्रकाश द्वारा रेखांकित कुछ विशेष क्षेत्रों अथवा संगीत और अन्ततः एकल अभिनेत्री द्वारा ही कहानी की पूरी यात्रा को पकड़ने की कोशिश की गई है । नायिका के सम्वादानुसार दृश्य बदलते रहते हैं कभी प्रकाश द्वारा कभी संगीत द्वारा तो कभी नायिका के ‘मूव्स’ द्वारा दृश्यों के संकेत दिए गए हैं । कहानी के मूल फॉर्म को बिगड़ने नहीं दिया गया वहां मूलतः अंतर्द्वंद का चित्रण हैं । जैसा निर्मल वर्मा ने लिखा वैसा ही मंचित किया गया । इस संदर्भ में ‘तीन एकांत’ के निर्देशक देवेन्द्र राज अंकुर ने कहा “एक निर्देशक के नाते यह बात शुरू से ही मेरे सामने थी कि मुझे कहानियों के नाटकीय रुपान्तरण की ओर नहीं बढ़ना है वरन कहानी के अपने मूल फॉर्म में निहित कथ्य शब्द और दृश्य को ही मंच पर स्थापित करना है ।”[10] अर्थात कहानी के मूल रूप को बिना कोई ठेस पहुंचाएं उसे मंच पर प्रस्तुत किया गया । कहानी में घटित घटनाओं को नायिका अपने अतीत को बताती रहती है कहानी पढ़ने पर पाठक उसे समझ सकता है कि ये कहानी उसके अतीत की हैं । एक कहानी में कितने भी दृश्य हो सकते हैं और पाठक उन्हें अपनी दृष्टी से दृश्य की कल्पना कर सकता है किन्तु दर्शक के पास केवल एक दृश्य है और उसी पर कई तरह की क्रिया हो रही है । वैसे मूलतः इस कहानी में पब्लिक पार्क का एक ही दृश्य है किन्तु नायिका के संवादों में एक दर्जन दृश्य हैं जिनमे गिरजाघर से लेकर मोहल्ला, सड़क, पब, सारा शहर इत्यादि । कहानी इन्हीं दृश्यों के इर्द-गिर्द घूमती रहती है फिर भी इसका केंद्र पब्लिक पार्क है जहाँ नायिका बेंच पर बैठी हुई है और अपने संवादों से सभी दृश्यों का वर्णन कर रही है ।

प्रत्येक घटना के वर्णन में संवादों की अहम भूमिका होती है । संवाद में भी एक क्रम है कहानी के पहले संवाद में सुबह का दृश्य है नायिका का एकालाप शाम तक चलता है । ऐसा मंच पर प्रकाश व्यवस्था से संभव है, ऐसे ही संवादों का क्रम जारी रहता है । एक संवाद के बाद दूसरे संवाद के बीच अधिक समय नहीं है जैसा अधिकतर फ़्लैशबैक की शैली में होता है । चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी ‘उसने कहा था’ में एक संवाद से दूसरे संवाद में जाने में पच्चीस वर्ष का समय बीत गया “…कल देखते नहीं यह रेशम से कढ़ा हुआ…राम राम यह भी लड़ाई है…”[11] कहानी को पढ़ते समय एक पंक्ति में ये वर्ष निकल जाते हैं किन्तु मंच पर इसे दिखाने में अभिनेता और निर्देशक को अधिक परिश्रम करना पड़ता है । नाट्य रूपांतरण और कहानी के मंचन में संवादों का क्रम चलता रहता है । इस क्रम में कहानी की संवेदना को किसी प्रकार की ठेस नहीं पहुंचती । संवादों को थोडा परिवर्तित भी किया गया है “…यह पत्ता मेरा है और वह उसका…”[12] मंचन में यही संवाद “…यह पत्ता आपका है दूसरा किसी दूसरे का…”[13] है । ऐसा करने से संवाद को और अधिक बल मिलता है और ‘कहानी की थीम’ पर किसी प्रकार से कोई हानि नहीं पहुँचती है । अपवाद रूप में एक स्थान पर दो शब्दों को मात्र बदला गया है । दृश्यों को मंचित करने के लिए रंगमंच में कई संकेत दिए गए हैं । मंच पर अँधेरा, प्रकाश की योजना, मंच सज्जा इत्यादि का भी विस्तृत वर्णन है । “कहानी को तोड़कर, शब्दों को बदलकर, फॉर्म को चोट पहुंचाकर…नाट्य मंचन से वह कहानी के बहाने नए नाटक का मंचन होगा । इसकी अपेक्षा अभिनेता कहानी का हाव-भाव, स्वर के उतार चढ़ाव तथा संकेतों को नाटकीय ढंग से पढ़े तो वह ठीक होगा ।”[14] नई भाव भंगिमा और नए कलेवर के साथ कहानी का मंचन नए काव्य स्वाद को जन्म देता है । संस्कृत काव्यशास्त्रों में नाटक को ‘काव्य’ ही कहा जाता है । कहानी के मंचन के संदर्भ में निर्मल वर्मा भी कहते हैं कि “कहानी के मूल स्वभाव को विकृत किए बिना उसे मंच पर प्रस्तुत किया जाए, जहाँ एक ही समय में नाटक का ‘इल्यूजन’ दे सके और दूसरी ओर कहानी का आंतरिक फॉर्म और लय को अक्षुण्ण रख सके ।”[15] कहानी के मंचन द्वारा उसके नाटकीय तत्वों को उजागर करना है । वास्तव में कहानी रंगमंच की अभिनय प्रक्रिया एक पात्र से दूसरे पात्र को प्रतिबिंबित करने की यात्रा जैसी है । जिसमें अभिनेता कभी एक पात्र को मूर्त करता है और फिर उसे छोड़ कर दूसरे या तीसरे पात्रं की तलाश में चल पड़ता है । पात्रों की नाटकीय गतियों, कहानी-वाचन अभिनय, दृश्य परिकल्पना और प्रकाश संयोजन परस्पर घुलती मिलती हुई कहानी को नया रूप देती हैं । ऐसे मंचन में दूसरे उपकरण मौजूद नहीं होते इसीलिए अभिनेता अपनी वाणी और अपने शारीरिक हाव-भाव से दर्शकों को बांधे रखता है ।

निर्मल वर्मा की तीनों कहानियों का मूल विषय अकेलापन है । इन कहानियों के पात्र वर्तमान में रहते हुए अतीत की घटनाओं को जीते हैं । ‘डेढ़ इंच ऊपर’, ‘धूप का एक टुकड़ा’ जैसे फ्रेम की कहानी होते हुए भी अपने अन्तिम स्वरूप में यह उससे बिल्कुल ही अलग होती गई । इसमें भी दो पात्र हैं- एक बोलने वाला और दूसरा सुनने वाला । शुरू में पहली कहानी की तरह यहाँ भी सुनने वाले पात्र की परिकल्पना की गई लेकिन ज्यों-ज्यों कहानी आगे बढ़ती गई, सुनने वाला पात्र बिलकुल ही अनुपस्थित हो जाता है । कहानी का बूढ़ा पात्र बियर पीते हुए खुद ब खुद ही खुलता चलता है । कहानी का स्थान ‘पब’ है किंतु संवादों से कई स्थानों का भ्रमण किया गया है । प्रस्तुतिकरण के बीच-बीच में उसे बीयर ‘सर्व’ करने के लिए एक बेयरा है जो मुख्य पात्र की आवाज़ पर जब-जब बीयर का मग रखने को आता तो अनायास ही कहानी के दृश्य को पुनः ‘पब’ से जोड़ देता है । कहानी में जो घटना है अर्थात ‘पब’ की उस घटना को वैसे ही प्रस्तुत किया है इस कहानी में भी ‘फ़्लैशबैक’ की सहायता नहीं ली गई । मंच पर नीचे ऊपर दो विभिन्न कोनों पर दो मेजें और चार कुर्सियां मात्र है । कहानी में दृश्यों का आरम्भ ‘पब’ से होता है, अन्य दृश्यों को दिखाने के लिए प्रकाश व्यवस्था है जो उसकी रौशनी में बनते मिटते रहते हैं, इनमें कुल मिलकर नौ दृश्य हैं । कहानी के मंचन के आरम्भ में इस प्रकार के दृश्य निर्मित किए गए हैं जिससे स्थिति का पता चलता है । कहानी में दो पात्र हैं मंचन में केवल एक पात्र लिया गया है उस पात्र की उपस्थिति दर्ज कराने के लिए कुछ बातें कही जा रही है । “अपुस्थित श्रोता मानो उसके सामने वाली कुर्सी पर आकर बैठ गया है ।”[16] यहाँ श्रोता से अर्थ कहानी के दूसरे पात्र से है जिसे यहाँ दर्शाया नहीं गया सिर्फ उसके होने का अहसास कराया जा रहा है । दृश्यों में नाटकीयता के लिए तरह-तरह की क्रियाएं कर रहे हैं, ओवरकोट उतार कर रखना, कुर्सी से उठाना फिर बैठ जाना, सिगार जलाना इत्यादि कहानी में इस तरह की कोई क्रिया नहीं है । कहानी को नाटक से जोड़ने की कोशिश की जा रही है । अतिरिक्त पात्र रखा गया है जो बीयर ‘सर्व’ कर रहा है इस पात्र का कहानी से कोई सरोकार नहीं है किन्तु उसके होने से मंच पर चहल-कदमी हो रही है और मंचन की दृष्टी से अतिआवश्यक क्रिया है । कहानी को मंचित करने के लिए निर्देशक ने अपनी ओर से पात्र रखा और अपनी ओर से हटा भी दिया । देवेन्द्र राज अंकुर ने दो पात्र रखें जबकि शिवलकर ने एक ही पात्र से प्रस्तुति दी । इससे प्रयोग से कहानी के मर्म की कोई हानि नहीं हुई । इसी कहानी को अभिनेता राजेश विवेक द्वारा अभिनीत बूढ़ा व्यक्ति एक पात्र भी है और वाचक की भूमिका में वह खुद है । कभी वह स्वयं से बात करता है और कभी सीधे दर्शकों से संबोधित होता है । इसी प्रक्रिया में कभी खाली कुर्सी से मुखातिब होकर अपने एकालाप को संवाद में बदल देता है । यह मंचन करने वाले की खूबी है की वह वर्णनों को व्यावधान न बनाते हुए स्थितियों और बिखड़ी हुई कड़ियों को जोड़ता है ।

निर्मल वर्मा की तीसरी कहानी वीकएंड भी पूरी की पूरी नायिका के ‘स्वचिन्तन’ से सम्बन्धित दिखाई गई है । नायिका का एकालाप होता है किन्तु उससे पहले शारीरिक क्रिया है जिससे दर्शक उसकी ओर आकर्षित हो जाएँ और उसके संवाद से जुड़े । कहानी की शुरूआत सुबह के भूरे आलोक में नायिका की ‘टेपरिकॉर्डर ’ पर आती आवाज़ से की गई ‘‘यह में याद रखूँगी, ये चिनार के पेड़, यह सुबह का भूरा आलोक और क्या याद रहेगा ? पेड़ों के बाद बदन में भागता यह हिरन, आइसक्रीम का कोन, घास पर धूप में चमकता हुआ एक साफ़ धुली पीड़ा की फाँक, जैसा मानो अकेला अपने को टोह रहा हो ।’’[17] मंचन में प्रकाश की व्यवस्था से अँधेरे से शुरू होकर उजाले की तरफ जाना । फिर मुँह अँधेरे में अलार्म की आवाज़ सुनकर ही उसके मुँह से पहले संवाद निकलते हैं । कहानी में संवाद हैं किन्तु उनका कोई उतार-चढ़ाव नहीं है लेकिन मंचन के समय नायिका की चीख, उसका विषाद, उसका अकेलापन सब उसके अभिनय से उसके चरित्र में नज़र आने लगते हैं । नायिका एक ‘वीकएंड’ की समाप्ति पर सुबह-सुबह अपने कमरे पर जाने के लिए तैयार हो रही है, उसका प्रेमी अभी तक पलंग पर सोया हुआ है । इसी बीच पिछले दिन की घटनाओं पर पुनर्विचार करने लगती है और कहानी कमरे से निकलकर एक पार्क में पहुँच जाती है । उस कमरे में कोई नहीं है लेकिन उसकी भाव भंगिमा से यह आभास होता है कि उसके साथ कोई है जिससे वह मिलती है । यह कहानी भी अकेलेपन का एक रूप है नायिका का एकालाप अतीत के पन्नो को फिर से जिन्दा कर देता है । संगीत नायिका के जागने से लेकर उसके प्रस्थान तक धीमी आवाज़ में चलता रहता है । उसके चीखने पर संगीत तेज़ और शांत होने पर मद्धम गति में चलता है । यह संगीत कर्णप्रिय रहता है ताकि दर्शक उससे खुद को जोड़ पाए । इस प्रकार देवेन्द्र राज अंकुर ने निर्मल वर्मा की कहानियों के साथ ऐसा सृजनात्मक परिवेश रचते हैं जिससे अभिनेता मुक्त होकर क्रियाशील हो सकें ।

तीन एकांत की कहानियों को बहुत से रंगकर्म के विद्वानों ने कहानी का रंगमंच कहा है क्योंकि इन कहानियों में सूत्रधार या संवादों का आदान प्रदान नहीं है वह इसीलिए मोनोलॉग है । महत्वपूर्ण बात यह है कि “इस रंग प्रयोग में देखी सुनी जा रही कहानी अपने उप-पाठ की आंतरिक ले की पुनर्रचना बनती है । दरअसल इस प्रयोग में कहानी के उस अदृश्य मर्म को पकड़ने की कोशिश है जो कहीं एक दो शब्दों या वाक्यों के बीच उपस्थित रहता है । इस प्रक्रिया में कहानी की दुनिया छोटी होती हुई भी उन कई अर्थ छायाओं को उजागर करनी है जिनको केवल पढ़ने से अनुभव नहीं किया जा सकता ।”[18] कह सकते हैं की कहानी की प्रस्तुति सम्पूर्ण कहानी को संवाद बनाते हुए उसके कथ्य, निजी रूप, शब्द और उनसे उभरते संगीत एवं ध्वनियों के माध्यम से उसके श्रव्य की अभिव्यंजना होती है । कहानी के मंचन की अभियक्ति इस प्रकार से होती है जिससे दर्शक उन हिस्सों को भी जीता है जो कहानी में लिखी हुई नहीं होती है । कहानी की कई अमूर्त घटनाओं को भी मंचन से नाटक में शामिल कर लिया जाता है जिससे कहानी और भी प्रभावशाली हो जाती है ।

कहानी के रंगमंच से जब हम कहानी के नाट्य रूपांतरण की तरफ बढ़ते हैं तब मंच और भी सक्रीय हो जाता है । जहाँ एकालाप था वह अब पूर्ण रूप से संवाद स्थापित होने लगा है । कथानक, पात्र योजना, संवाद, दृश्यों का संयोजन, प्रकाश व्यवस्था, वेशभूषा में तब्दीली, मुख सज्जा, मंच सज्जा, प्रवेश-प्रस्थान इत्यादि सब बदल जाता है । कहानी के दृश्यकाव्य में संवाद होते हैं लेकिन ठीक उसी तरह नहीं होते जैसे नाटकों में होते हैं । संवाद कहानी से ही प्राप्त होते हैं लेकिन क्रमानुसार नहीं होते है उन्हें अन्वेषित करना पड़ता है । हिंदी साहित्य की प्रारंभिक कहानियों में संवाद काफी संख्या में हुआ करते थे बल्कि बहुत सी कहानियां नाटक की तरह संवादों में ही आगे बढ़ती थी । प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, भीष्म साहनी, फणीश्वरनाथ रेणु, भगवतीचरण वर्मा इत्यादि कथाकारों की कहानियों में अच्छे संवाद की कोई कमी नहीं होती है । नाट्य क्रियाओं की दृष्टी से कुछ कहानियां सम्पन्न होती हैं । ज्यादातर कहानियों में नाट्य क्रिया सीधे साफ़ दिखाई नहीं देती पर उनमें जरुर रहती हैं । प्रेमचंद की सौ कहानियों से अधिक का नाट्य रूपांतरण और मंचन हुआ है । उनकी प्रसिद्द कहानी ‘ईदगाह’ को बहुत सी संस्थाओं ने मंच पर उतारा है । इस कहानी में संवाद, दृश्य, समय, भाव, परिवेश सब मौजूद है फिर भी प्रेमचंद ने ईदगाह में मेला जाते समय हामिद के कपड़ों का जिक्र नहीं किया है और न ही अन्य लड़को के बारे में कुछ लिखा है परंतु मंचन करने वाले को यह स्वयं अनुमान लगाना होगा कि हामिद नंगे पैर होगा, उस के कुरते में पैबंद लगे होंगे जबकि अन्य लड़कों के अच्छे कपड़े उनकी अच्छी आर्थिक स्थिति के सूचक होंगे । ईदगाह का वह हिस्सा जहाँ हामिद इस द्वंद्व में है कि क्या-क्या खरीदे या जहाँ वह यह सोचता है कि अम्मा का हाथ जल जाता है उसका रूपांतरण कठिन है । रूपांतरण में इस तरह के विवरण प्रस्तुत करने के लिए ‘स्वगत’ कथन का प्रयोग किया जाता है जिसमें अभिनेता मंच के कोने में जाकर अपने आप से यह संवाद बोलता है लेकिन आजकल ‘वायस ओवर’ अर्थात ऐसी ध्वनि जो दर्शकों को सुनाई देती है पर पात्र नहीं बोलता के माध्यम से संभव है । अम्मा वाले अंश के लिए फ़्लैशबैक शैली का उपयोग किया गया है । इसी प्रकार हामिद की ललचाई आँखो, होठों पर जीभ फेरते और बाद में भारी कदमों से दुकान से दूर जाने का दृश्य बनाया जाता है । यही दूसरी ओर रामायण कथा का ‘नाट्य रूपांतरण (रामलीला)’ स्थानीय रंग में संवादों को रंग कर चरित्र-चित्रण को परिमार्जित किया जाता है । जहाँ भाषा का रूप परिवर्तित हो जाता है । ध्वनि और प्रकाश भी चरित्र-चित्रण करने तथा संवेदनात्मक प्रभाव उत्पन्न करने में कारगर सिद्ध होते हैं । रूपांतरण में एक समस्या पात्रों के मनोभावों को कहानीकार द्वारा विवरण के रूप में व्यक्त किए प्रसंगों या मानसिक द्वंद्व के दृश्यों की नाटकीय प्रस्तुति में आती है ।

निष्कर्ष

            स्पष्ट है कि कहानी के मंचन में कथानक की अभिव्यक्ति अभिनेता और निर्देशक के ऊपर निर्भर है । वह उसकी मार्मिकता को किस स्तर पर ले जाना चाहता है । लिखित कथा को मंच पर प्रस्तुत करने पर कथा की भावभूमि और उसका प्रभाव दोनों ही में सामंजस्य बैठाना ही नाट्य रूपांतरण का मूल आधार है ।

सहायक ग्रन्थ सूची

  • मेरी प्रिय कहानियां – निर्मल वर्मा,  राजकमल प्रकाशन
  • तीन एकांत (धूप का एक टुकड़ा, डेढ़ इंच ऊपर और वीक एन्ड कहानियों का नाट्य रूपांतरण) – निर्मल वर्मा, राजकमल प्रकाशन, संस्करण 1990
  • नाटक और रंगमंच – सम्पादक – ललित कुमार शर्मा ‘ललित’, डॉ भानु शंकर मेहता  प्रभा प्रकाशन, संस्करण 1985
  • कथा कोलाज़ (भाग 1-2) – दिनेश खन्ना, राष्टीय नाट्य विद्यालय, संस्करण 1994
  • रंग दर्शन – नेमिचंद्र जैन, राधाकृष्ण प्रकाशन, संस्करण 1983
  • समकालीन हिंदी नाटक और रंगमंच – संपादक डॉ. विनय, भारतीय भाषा प्रकाशन, संस्करण 1981
  • अभिव्यक्ति और माध्यम – एन. सी. ई. आर. टी. दिल्ली (कक्षा 11-12) संस्करण 2006
  • कहानी का रंगमंच – संपादन – महेश आनंद, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2001
  • कहानी का रंगमंच और नाट्य रूपांतरण – डॉ. करन सिंह उत्वाल, गोविन्द पचौरी जवाहर पुस्तकालय मथुरा, संस्करण 2008
  • रंग प्रक्रिया के विविध आयाम – संपादक – प्रेम सिंह, सुषमा आर्य, राधाकृष्ण प्रकाशन, संस्करण 2007

पत्रिकाएं

  • वागर्थ – मई 2013, संपादक – एकान्त श्रीवास्तव, कुसुम खेमानी
  • समकलीन भारतीय साहित्य – वर्ष 40अंक 204 जुलाई अगस्त 2019 संपादक मंडल – चंद्रशेखर कंबार, माधव कौशिक, के श्रीनिवासराव, अतिथि संपादक ब्रजेन्द्र त्रिपाठी
  • इन्द्रप्रथ भारती – संपादक – जीतराम भट्ट, नवम्बर दिसम्बर 2018
  • समीक्षा – संपादक – सत्यकाम, अंक जनवरी मार्च 2018, वर्ष 50 अंक 4
  • बहुवचन – प्रधान संपादक गिरीश्वर मिश्र, संपादक अशोक मिश्र महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा
  • अनभै सांचा – जनवरी जून 2018, सम्पादक – द्वारका प्रसाद चारुमित्र

[1] कहानी का रंगमंच : संपादन – महेश आनंद, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ संख्या 45

[2] हिंदी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली – डॉ अमरनाथ, पृष्ठ संख्या 110

[3] हिंदी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली – डॉ अमरनाथ, पृष्ठ संख्या 109

[4] ई.एम. फ़ार्स्टर – एस्पेक्ट्स ऑव द नावेल, पृष्ठ संख्या 29

[5] कहानी का रंगमंच : संपादन – महेश आनंद, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ संख्या 15                                                                           

[6] तीन एकान्त की भूमिका –  निर्मल वर्मा, पृष्ठ संख्या 03

[7] कहानी का रंगमंच – महेश आनंद, पृष्ठ संख्या 14

[8] कहानी-रंगमंच का अनुभव – भीष्म साहनी,  कहानी का रंगमंच – महेश आनंद, पृष्ठ संख्या 31

[9] नया मुहावरा – कहानी का रंगमंच – महेश आनंद, पृष्ठ संख्या 124 

[10] तीन एकांत – निमल वर्मा, पृष्ठ संख्या 11

[11] उसने कहा था – चंद्रधर शर्मा गुलेरी, पृष्ठ संख्या 65

[12] धूप का एक टुकड़ा – निर्मल वर्मा, पृष्ठ संख्या 31

[13] धूप का एक टुकड़ा –  तीन एकांत, निमल वर्मा, पृष्ठ संख्या 12

[14] कहानी का रंगमंच और नाट्य रुपान्तरण – करण सिंह उत्वल, पृष्ठ संख्या 67

[15] तीन एकांत – निर्मल वर्मा, पृष्ठ संख्या 08

[16] डेढ़ इंच ऊपर- तीन एकांत, निर्मल वर्मा, पृष्ठ संख्या 39

[17] वीक एंड- तीन एकांत, निर्मल वर्मा, पृष्ठ संख्या 55

[18] रंग प्रक्रिया के विविध आयाम – संपादक प्रेम सिंह, सुषमा आर्य, पृष्ठ संख्या 134

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नाट्यशास्त्रोक्त लक्षण एवं नाटक में उसकी उपादेयता: आशुतोष कुमार

red and white chairs inside room

नाट्यशास्त्रोक्त लक्षण एवं नाटक में उसकी उपादेयता

आशुतोष कुमार

पी. एच. डी., शोधार्थी

संस्कृत विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय

दिल्ली – 110007

मो० – 9013271218

Email:  ashutoshjnu64@gmail.com

 

सारांश

नाट्य में वाचिक अभिनय का महत्त्वपूर्ण स्थान है इसे नाट्य का शरीर कहा गया है, क्योंकि नाटककार इसी के माध्यम से अपनी कथावस्तु को दर्शकों के सम्मुख प्रस्तुत करता है। नाट्यशास्त्र में  वाचिक अभिनय के अन्तर्गत ही षट्त्रिंशत् लक्षण वर्णित है। इनकी संयोजना से वाणी में वैचित्र्य की सृष्टि होती है, जिससे प्रेक्षागृह में बैठे दर्शक विस्मित तथा आनन्द विभोर हो जाते हैं। भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र के 16 वें अध्याय में 36 लक्षण बताया है। इन्हीं लक्षणों से परवर्ती काल में अलंकारों का भी विकास हुआ। अलंकार काव्य के बाह्य सौन्दर्य को बढाता है तो लक्षण उसके आन्तरिक सौन्दर्य में वृद्धि करता है। प्रस्तुत शोध प्रपत्र के माध्यम से नाट्यशास्स्त्र में निरूपित लक्षण एवं इसके स्वरूप तथा नाट्य में इसकी उपयोगीता को बताया गया है।

 

कूटशब्द

वाचिकाभिनय, लक्षण, काव्यबन्ध, भूषणसम्मित, भावार्थगत

 

आमुख

नाट्यशास्त्र काव्य एवं कला कला का विश्वकोश है साथ ही सिद्धान्त एवं व्यवहार दोनों पक्षों की विराट चेतना का अप्रतिम संग्रह है। नाट्यशास्त्र कोपंचम वेदभी कहा जाता है।[1] इसमें नाट्य सम्बन्धी ज्ञान के अतिरिक्त प्राचीन भारत की कला एवं संस्कृति का विस्तृत परिचय प्राप्त होता है। नाट्य में प्रयुक्त अभिनय , संगीत, नृत्य, वाद्य, वास्तु, मूर्ति, चित्र, पुस्तक आदि विविध कलाओं एवं अनेक प्रकार के शिल्पों का भी परिनिष्ठित एवं व्यापक विवेचन नाट्यशास्त्र में हुआ है। साथ ही प्रसंगानुसार नाट्याभिनय एवं नाट्यलेखन के साधनभूत, सौन्दर्यशास्त्र, काव्य तथा व्याकरण इन विषयों पर भी विचार हुआ है। भरतमुनि कृत नाट्यशास्त्र में चार प्रकार के अभिनय[2] बताये गये हैं- (i) आङ्गिक, (ii) वाचिक, (iii) सात्त्विक तथा (iv) आहार्य।[3] इनमें वाचिक अभिनय के प्रसङ्ग में ३६ लक्षण वर्णित हैं। नाट्य में वाणी के माध्यम से संवादों का कथन और काव्य की प्रस्तुति को वाचिक अभिनय कहते हैं। यह अभिनय पूरी अभिनय कला का प्राण है। वाचिक अभिनय काव्यार्थ या नाट्यार्थ की सम्पूर्ण अभिव्यक्ति में सहायक होता है। आचार्य भरतमुनि का कथन है कि कवि के द्वारा काव्यादि निर्माण तथा अभिनेता के द्वारा प्रयोग के अवसर पर शब्दों पर विशेष प्रयत्न करना चाहिए क्योंकि यही सम्पूर्ण नाट्य प्रदर्शन का कलेवर है। अंग, नेपथ्य रचना तथा सत्वाभिनय वाक्यार्थों को ही अभिव्यक्त करते हैं। वाचिक अभिनय में रस और भावों के अनुरूप वाणी का अनुकरण किया जाता है। भरतमुनि ने वाचिक अभिनय के सन्दर्भ में पाठ्य पर विशेष ध्यान दिया है। उन्होंने वाचिक अभिनय के आरम्भ में दो प्रकार के पाठ्य बताया है- i) संस्कृत पाठ्य एवं ii)  प्राकृत पाठ्य। संस्कृत पाठ्य के अन्तर्गत वर्ण निरूपण, व्यञ्जन और उनके स्थान स्वर तथा उनका परिमाण, शब्दों के विभेद, छन्द, अलङ्कार, नाट्य रचना के अङ्गीभूत छत्तीस लक्षण और काव्य के गुण, दोष का विस्तृत विवेचन किया गया है। वाचिक अभिनय के प्रसंग में ही काव्यबन्ध के स्वरूप का विवेचन किया है। काव्यबन्ध का तात्पर्य नाट्यकृति से है, जिसे पाठ्य नाम से भी अभिहित किया जाता है। यह पाठ्य (नाट्यकृति) वस्तुत: कविकृत एक प्रसिद्ध या कल्पित वर्णन होता है, जिसे संवाद के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। दर्शकदीर्घा (Auditorium) में बैठे हुए प्रेक्षकवर्ग (Audience) का इस पाठ्य (नाटक) के प्रति अनुराग हो, अथवा पाठ्य के माध्यम से उनके हृदय में आनन्दातिरेक की सृष्टि की जा सके, उसके लिए पाठ्य का सुसज्जित एवं सुसंगठित होना अत्यावश्यक है। पाठ्य को सुसज्जित एवं उत्कृष्ट बनाने के लिए काव्य के उत्कर्षक तत्त्वों का निर्देश दिया गया है। ये संख्या में मुख्यत: तीन बताये गये हैं- (i) लक्षण, (ii) अलंकार एवं (iii)गुण।

नाट्यशास्त्रकार आचार्य भरतमुनि की दृष्टि में काव्यलक्षण काव्यबन्ध के अति महत्त्वपूर्ण तत्त्व हैं। काव्यबन्ध अर्थात् नाटक को लक्षणों से युक्त होना ही चाहिए।[4] उन्होंने काव्यलक्षण की कोई निश्चित परिभाषा प्रदान नहीं की, किन्तु नाट्यशास्त्र के 16 वें अध्याय के आरम्भ में षट्त्रिंशत् लक्षणों के नाम परिगणना के पश्चात् इसे “भूषणसम्मित” एवं “भावार्थगत” कहकर इसके रसानुकूल प्रयोग का प्रतिपादन किया है।[5] अर्थात् ये लक्षण नाटक में रस मे बाधक न हों अपितु रसनिष्पत्ति में सहायक हों।

नाट्यशास्त्र के टीकाकार आचार्य अभिनवगुप्त काव्यलक्षण की महत्ता बताते हुए कहते हैं कि- “लक्षण काव्यरूपी भवन की भित्तियां हैं। छन्दोयोजना इस भवन की आधार भूमि है, गुण और अलंकार इस भित्ति के चित्र हैं तथा दशरूपक इसकी खिडकियां हैं।”[6] उनके अनुसार लक्षण काव्यभवन के भित्तिस्वरूप हैं। इस पर गुण एवं अलंकार भित्तिचित्र की भांति हैं। स्पष्ट है कि लक्षण का अलंकार से पूर्व वर्णन किया जाना, लक्षण की प्रमुखता को प्रदर्शित करता है। आधुनिक संस्कृत विद्वान प्रो० रेवाप्रसाद द्विवेदी ने अभिनवगुप्त के विचार की समीक्षा करते हुए कहा है कि “लक्षण को भित्ति न मानकर भित्ति पर किया गया सुधालेप मानना चाहिए। यह लेप ही चित्र का मूल आधार होता है। इसके बिना चित्र फलक चित्र रचना के योग्य नहीं बन पाता है”।[7]

जिस प्रकार अलंकार से सुसज्जित रमणी सुन्दर एवं आकर्षक होती है उसी प्रकार इन लक्षणों से युक्त काव्य सुन्दर एवं रोचक होता है। इनकी संयोजना से वाणी में वैचित्र्य की सृष्टि होती है, जो सामाजिक को विस्मित और आनन्द विभोर कर देता है। नाट्यशास्त्रकार ने वाचिक अभिनय के इन्हीं विशेषताओं को ध्यान में रखकर नाट्यशास्त्र के 14 से 19 वें अध्याय तक वाचिक अभिनय का वर्णन किया है। पूरे 16वें (कतिपय संस्करणों में 17 वें) अध्याय में सिर्फ लक्षण ही वर्णित है। नाट्यशास्त्र में वर्णित षट्त्रिंशत् लक्षण निम्नलिखित हैं[8]

1.विभूषण, 2.अक्षरसंघात, 3.शोभा, 4.अभिधान, 5.गुणकीर्तन, 6.प्रोत्साहन, 7.उदाहरण, 8.निरुक्त, 9.गुणानुवाद, 10.अतिशय, 11.हेतु, 12.सारूप्य, 13.मिथ्याध्यवसाय, 14.सिद्धि, 15.पदोच्चय, 16.आक्रन्द, 17.मनोरथ, 18.आख्यान, 19.याञ्चा, 20.प्रतिषेध, 21.पृच्छा, 22.दृष्टांत, 23.निर्भासन, 24.संशय, 25.आशी:, 26.प्रियवचन, 27.कपटसंघात, 28.क्षमा, 29.प्राप्ति, 30.पश्चाताप, 31.अनुवृत्ति, 32.उपपत्ति, 33.युक्ति, 34.कार्य अर्थापत्ति, 35.अनुनीति तथा 36.परिवेदन।

शोभा’ नामक लक्षण

सिद्धैरर्थै:   समं कृत्वा ह्यसिद्धोऽर्थ: प्रसाध्यते।

यत्र श्लक्ष्णविचित्रार्था: सा शोभेत्यभिधीयते॥[9]

अर्थात् जहां सिद्ध पदार्थों से तुलना कर असिद्ध पदार्थ को भी सिद्ध किया जाता है, तदनन्तर उससे जो आह्लादक व विचित्र अर्थ निकलता है वह शोभा नामक लक्षण है। जैसे अभिज्ञानशाकुन्तलम् नाटक के द्वितीय अङ्क में मृगयाविहार के अवसर पर सेनापति राजा दुष्यन्त से कहता है-

मेदश्छेदकृशोदरं        लघु भवत्युत्थानयोग्यं   वपु:,

सत्त्वानामपि    लक्ष्यते  विकृतिमच्चितं  भयक्रोधयो:

उत्कर्ष: स च धन्विनां यदिषव: सिध्यन्ति लक्ष्ये चले,

मिथ्यैव व्यसनं  वदन्ति  मृगयामीदृग्विनोद: कुत:[10]

अर्थात् (मृगया के श्रम से) व्यक्ति चर्बी कम हो जाने के कारण पतले उदर वाला शरीर हल्का और फुर्तीला होकर उद्योग करने योग्य हो जाता है। जीवों के भय और क्रोध में विकृत हुये मन का भी परिज्ञान हो जाता है(अर्थात् निरन्तर देखते रहने से जीवों की चेष्टाओं को देखकर उनकी भय युक्त अथवा क्रोध युक्त अवस्था का ज्ञान हो जाता है)। धनुर्धारियों के लिये यह उत्कर्ष की बात है कि उनके बाण चल लक्ष्य पर भी सफल होते हैं अर्थात् चुकते नहीं (और यह निपुणता मृगया के अभ्यास से ही आती है)। अत: लोग व्यर्थ ही मृगया को व्यसन कहते हैं; भला ऐसा मनोरञ्जन अन्यत्र कहां। परिश्रम से लाभ सिद्ध है, उसके योग से मृगया रूप व्यसन को भी सिद्ध रूप में दिखलाया गया है। इस प्रकार यहां परिश्रम सिद्ध कर्म से मृगया (शिकार करना) असिद्ध (त्याज्य) कर्म की तुलना करके असिद्ध को भी सिद्ध किया गया है। यहां किसी अलंकार के कारण नहीं अपितु कवि ने शब्द-व्यापार योजना इस प्रकार की है जिससे मनोरम हृदय आह्लादक अर्थ निष्पन्न हो रहा है।[11] अतएव स्पष्ट है कि उक्त पद्य में शोभा नामक लक्षण के अनुप्रयोग से ही चारूता उत्पन्न हुई हैं।

            आचार्य भरतमुनि के उक्त विवेचन से स्पष्ट है कि लक्षण काव्य और नाट्य दोनों के महत्त्वपूर्ण अङ्ग थे। ये काव्यलक्षण प्रारम्भ में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण थे किन्तु शनै: – शनै: अलंकार, गुण, रीति, वृत्ति आदि के प्रभाव में धूमिल होते चले गये। अभिनवगुप्त के अनुसार रीति, वृत्ति, गुण, अलंकार  आदि जिस रूप में काव्य के अंग है लक्षण उस रूप में नहीं आते हैं। भोज, शारदातनय, शिंगभूपाल, विश्वनाथ, और राघवभट्ट जैसे अनेक प्रमुख काव्याचार्यों ने भी इन लक्षणों के महत्त्व को स्वीकार किया है, इनसे भरतोक्त छत्तीस काव्य लक्षणों का महत्त्व और अधिक बढ जाता है। आचार्य अभिनवगुप्त ने अपने पूर्ववर्त्ती दस आचार्यों का मत इस सम्बन्ध में उद्धृत किया है[12], जो  संक्षेप में इस प्रकार हैं-

  • लक्षण काव्य का शरीर है। इनके द्वारा कथावस्तु के शरीर में वैचित्र्य का प्रादुर्भाव होता है। ये लक्षण गुण और अलंकार के बिना ही अपने सौभाग्य से सुशोभित होते हैं। यह अलंकार के समान सौन्दर्य के अधायक तत्त्व है। यही काव्य शरीर की निसर्ग सुन्दरता है। लक्षण अलंकार की निरपेक्ष सौन्दर्य का प्रसार करते हैं।
  • नाट्यकथा के संध्यंग रूप अंश ही ये काव्यलक्षण हैं। लक्षण का संबन्ध नाटकादि के इतिवृत्त से है, काव्य मात्र से नहीं।
  • अभिधा का त्रिविध व्यापार ही लक्षण का विषय होता है। कवि किसी विशिष्ट विचार और कल्पना को दृष्टि में रखकर काव्य की रचना करता है। यह आवश्यक नहीं कि काव्य का भरत सम्मत प्रत्येक लक्षण प्रत्येक दशा में या प्रत्येक काव्य रचना का लक्षण बने। क्योंकि नारी के स्तनों की स्थूलता उसका सौन्दर्यधायक लक्षण है, किन्तु जब यही मोटाई कटि में हो तो वह कुलक्षणा हो जाती है।

आगे इन छत्तीस लक्षणों पर विचार करते हुए अभिनवगुप्त ने कहा है कि ये लक्षण काव्य या नाट्य के अंगभूत हैं। जैसे महापुरुष के अंगों में महानता के लक्षण होते हैं उनसे पुरुष का स्वाभाविक सौन्दर्य निखरता है, जो पुष्पमाला आभूषणादि से भिन्न होते हैं।

            इस प्रकार स्पष्ट है कि नाट्यशास्त्र मे  बताये गये 36 लक्षण काव्य या नाट्य के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। इसी के द्वारा काव्य में सौन्दर्य की वृद्धि होती है जो नाटक को सहृदय आह्लादकारी बनाती है। वर्तमान नाट्ककार या काव्यकार के लिए भी आज उतना ही प्रासङ्गिक है यदि इन ३६ लक्षणों को ध्यान में रखकर नाटकादि लिखा जाए तो अवश्य ही विशिष्ट रचना होगी जिससे पाठक अथवा दर्श आनन्द-विभोर होंगे। अतएव भरतमुनि द्वारा प्रतिपादित ३६ लक्षण वर्तमान में भी अत्यन्त उपयोगी है।

सन्दर्भ ग्रन्थसूची

  • कुमार, कृष्ण. अलंकारशास्त्र का इतिहास. मेरठ: साहित्य भण्डार, 2010
  • द्विवेदी, दशरथ, संस्कृत काव्यशास्त्र में अलंकारों का विकास. नई दिल्ली: राधा पब्लिकेशन्स, 2003
  • दीक्षित, सुरेन्द्रनाथ. भरत और भारतीय नाट्य परम्परा. दिल्ली: नेशनल पब्लिशिंग हाउस, 1973
  • नारायण, जयप्रकाश. नाट्यशास्त्र में काव्यलक्षण. दिल्ली: अमर ग्रन्थ पब्लिकेशन्स, 2014
  • भरतमुनि, नाट्यशास्त्र. सम्पा. रविशंकर नागर, दिल्ली: परिमल पब्लिकेशन्स, 1984
  • भरतमुनि, नाट्यशास्त्र. सम्पा. बाबुलालशुक्ल शास्त्री, वाराणसी: चौखम्बा संस्कृत सीरिज, 1978
  • भरतमुनि, नाट्यशास्त्र. अभिनवभारती टीका सहित. सम्पा. पारसनाथ द्विवेदी, वाराणसी: सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, 2001
  • विश्वनाथ, साहित्यदर्पण. हिन्दी व्या. शालिग्राम शास्त्री, दिल्ली: मोतीलाल बनारसी दास, 1977

[1] न वेद व्यवहारोऽयं संश्राव्य: शूद्रजातिषु।

  तस्मात् सृजापरं वेदं पञ्चमं सार्ववर्णिकम्॥ नाट्यशास्त्र, १.९२

[2] अभिपूर्वस्य णीञ् धातुराभिमुख्यार्थनिर्णये।

 यस्मात् प्रयोगं नयति तस्मादभिनय: स्मृत:॥ नाट्यशास्त्र, 8.6

[3] आङ्गिको वाचिकश्चैव ह्याहार्य: सात्विकस्तथा।

  चत्वारोऽभिनया ह्येते विज्ञेया नाट्यसंश्रया:॥ वही, 6.24

[4] काव्यबन्धास्तु कर्त्तव्या: षट्त्रिंशल्लक्षणान्विता:।

[5] षट्त्रिंशदेतानि तु लक्षणानि प्रोक्तानि भूषणसम्मितानि।

  काव्येषु भावार्थगतानि तज्ज्ञै: सम्यक् प्रयोज्यानि यथारसं तु॥ नाट्यशास्त्र, 16.42

[6] नाट्यशास्त्र, अभिनवभारती टीका, 15.227

[7] नारायण, जयप्रकाश, नाट्यशास्त्र में काव्यलक्षण, पृ० 54

[8] विभूषणञ्चाक्षरसंहितश्च शोभाभिमानौ गुणकीर्तनञ्च।

प्रोत्साहनोदाहरणे निरुक्तं गुणानुवादोऽतिशय: सहेतु:॥१॥

सारूप्य-मिथ्याध्यवसायसिद्धि-पदोच्चयाक्रन्दमनोरथाश्च।

आख्यानयाञ्चाप्रतिषेधपृच्छादृष्टान्तनिर्भासनसंशयाश्च॥२॥

आशी: प्रियोक्ति: कपट: क्षमा च प्राप्तिश्च पश्चात्तपनं तथैव।

अथानुवृत्तिर्ह्युपपत्तियुक्ती कार्योऽनुनीति: परिवेदनञ्च॥३॥

षट्त्रिंशदेतानि तु लक्षणानि प्रोक्तानि वै भूषणसम्मितानि।

काव्येषु भावार्थगतानि तज्ज्ञै: सम्यक्प्रयोज्यानि यथारसं तु॥४॥नाट्यशास्र् १६.१-४

[9] नाट्यशास्त्र, 16.6

[10] अभिज्ञानशाकुन्तलम्, 2.5

[11] न चात्रालङ्कार: कश्चिदपि तु कविव्यापारेण य: शब्दार्थव्यापारादेवार्थघटनात्मा तत्कृतं हृद्यं लक्षणमेव। अशोभनोऽप्यर्थोऽमुना न्येन शोभेत इति शोभेयमुक्ता। अभिनवभारती, 16.7

[12] नाट्यशास्त्र, अभिनवभारती टीका- 16.1

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उषा गांगुली से साक्षात्कार

उषा गांगुली, जन्म- 1945, जोधपुर आप कोलकाता में रहकर हिंदी रंगकर्म करती हैं। आपने 1976 में ‘रंगकर्मी’नामक अपनी नाट्य –संस्था की स्थापना की। उषा गांगुली द्वारा अभिनीत एवं निर्देशित प्रमुख नाटकों में महाभोज, लोककथा, होली,खोज, वामा, बेटी आई, मय्यत, रुदाली, मुक्ति और काशीनामा इसके अलावा आपने ब्रेख्त के नाटक ‘मदर करेज’ को ‘हिम्मतमाई’ के नाम से निर्देशित एवं स्वयं माँ की भूमिका को निभाया। ‘माँ’ की सजीव भूमिका के लिए 1982 -83 में सरकार द्वारा आपको ‘लेबदेब’ पुरस्कार से नवाजा गया। आपको 1998 में आपको संगीत नाटक अकादमी ने श्रेष्ठ निर्देशक के रूप में पुरस्कृत किया साथ ही उ.प्र.संगीत नाटक अकादमी ने सफ़दर हाशमी पुरस्कार से नवाजा।

सुरभि: आप ब्रेख्तीय थियेटर की तकनीक और वैचारिकी के विशेषज्ञ रहीं हैं, उनपर काम करते समय आपकी खुद की अंतःप्रक्रिया के अनुभवों को साझा कीजिये।

उषा गांगुली: मैं करीबन 45 वर्षों से थियेटर से जुड़ी हुई हूँ हर दौर से कुछ सीखा है, आज भी मैंकितना परिपक्व हुई हूँ पता नहीं। ये जो आप ब्रेख्त की तकनीक की बात कर रहीं हैं तो मैंने ब्रेख्त को खूब पढ़ा है, उनके नाटक देखें हैं और मैंने खुद भी किया है। ब्रेख्त का जो सबसे बड़ा थियेटर करने का तरीका था वह था लोगो से जुड़ने का, वह मानवीय राजनीति और human roots पर बहुत विश्वास करते थे। लेकिन जब हम थियेटर की बात करते हैं तो सामूहिकता एवं जन माध्यम की बात करते हैं कि नाटक जन माध्यम का सबसे सशक्त साधन है। लेकिन आज हम इस जन माध्यम से जन को छोड़ते जा रहें हैं। ब्रेख्त ने पहली बार उस जगह को पकड़ने की कोशिश की है। ब्रेख्त को किसी भी वैचारिकी से बांध नहीं सकते वह खुले हुये हैं। कभी -कभी दिक्कत तब होती है जब ब्रेख्त को करते समय उनकी शैली को हम भूल जाते हैं। जैसे ढेर सारा साज–सज्जा, आलीशान सेट इत्यादि के बीच कहानी घुट कर रह जाती है। सही मायने में ब्रेख्त ने सब कुछ जन को केंद्र में रखकर किया है। मैंने शुरू से तो नहीं लेकिन बाद में जब ब्रेख्त के नाटक को देखा और पढ़ा तब से कहीं न कहीं उन्हें अपने नाटकों का हिस्सा मानने लगी।मैंने लगभग 50 लोगों को लेकर पहला नाटक ‘महभोज’ किया था, उसकी साज-सज्जा में इतनी सादगी थी मैं खुद भी कभी-कभी सोचने की कोशिश करती हूँ कि मेरे अंदर ये कला कहाँ से आ गई। चूंकि मैं नृत्य सीखी हूँ इसलिए मैं स्पेस का इस्तेमाल समझती हूँ, मैं चित्र समझती हूँ,इसलिए आप मेरे अधिकतर नाटकों में देखेंगी कि संगीत, नृत्य, लय आपको दिखेगा साथ ही साथ अभिनेता के शरीर का प्रयोग भी अभिव्यक्त होगा। जिससे वे सीधे-सीधे दर्शक से जुड़े।‘रंगकर्मी’ नाट्य दल अब तक जितने भी नाटक किए सभी अलग-अलग रहें उनमें से किसी भी नाटक को दोहराया नहीं है। हर नाटक नया मुद्दा कभी युवा की समस्या है तो कभी रुदाली जैसे नाटक जो बिल्कुल भिन्न हैं। मैं सच बोलू तो ब्रेख्त को करने की मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी मैं अपने नाटकों में अंदर ही अंदर ब्रेख्त की शैली को अपना रही थी। लेकिन सीधे तौर पर उनकी स्क्रिप्ट को नहीं कर पा रही थी। एम.के. रैना ने जब ‘माँ’ नामक नाटक किया तो मैंने उसमें माँ का चरित्र निभाया, उस चरित्र ने मुझे अंदर से आंदोलित कर दिया था, जिसका प्रभाव आगे चलकर दिखता है। फिर मैंने ‘Mother Courage’ ‘हिम्मतमाई’ जिसे नीलाभ जी ने अनुवाद किया है, उसे करने की ठानी और एक बेहतर प्रोडक्शन तैयार हुआ। जिसकी प्रस्तुति ढाका से लेकर कई देशों में हुई। उसमें भी ब्रेख्त की सादगी को बरकरार रखा।

 

सुरभि: आपने जब ‘हिम्मतमाई’ को मंचित किया तो उसमें ब्रेख्तीय शैली को कितना लागू किया?

उषा गांगुली: मैं ऐसा नहीं सोचती हूँ कि ये ब्रेख्त की तकनीक है या ब्रेख्त की शैली है या मुझे इसी ढांचे में बंध कर करना चाहिए। मेरे ख्याल से ब्रेख्त भी ऐसा नहीं चाहते थे। मेरे नाटक को फ्रिट्ज़ बेनेविच ने देखा। मैंने उनसे कहा कि ब्रेख्त को पढ़ा है, उनकी तकनीक को जाना है, जो मेरे नाटक की सहजता में दिखाई देता है। मैं अपने नाटकों से समाज में एक प्रश्न खड़ा करती हूँ और दर्शकों को धक्का देती हूँ। अपने नाटकों के विषय से, उद्देश्य से उन्हे डिस्टर्ब करती हूँ कि वे भी सोचें।

सुरभि: आपके अनुसार ब्रेख्त का वैश्विक रंगमंच पर क्या प्रभाव पड़ा ?

उषा गांगुली:मुझे ऐसा लगता है कि प्रगतिशील खेमे के व्यक्ति जो ब्रेख्त थे, उन्होने व्यवस्था के खिलाफ धक्का देने की कोशिश की।इस सच को कोई भी झुठला नहीं सकता। सारी दुनिया के मनुष्य में प्रगतिशीलता का चिंतन नहीं रह सकता तब तक ब्रेख्त को नहीं समझा जा सकता है। इसीलिए आप सारी दुनिया में देखिये जहां-जहां ब्रेख्त के नाटक गंभीरता से हुए हैं, वहाँ-वहाँ तीर की तरह प्रभाव डाला है और जहां सिर्फ संगीत पक्ष को लिया गया है वहाँ सिर्फ मनोरंजन बनकर रहा गया है। दर्शकों का सिर्फ मनोरंजन करना ब्रेख्त नहीं है, मैं बहुत ही खरी और सच बात कहती हूँ। ट्रीटमेंट में बहुत कुछ निर्भर करता है। ब्रेख्त के नाटक दुनिया को सर्वाधिक प्रभावित करते हैं। कई लोग ये भी कहते है कि ब्रेख्त का जमाना गया, मैं कहती हूँ नहीं थियेटर की यात्रा सागर की तरह होता है जो लहर की तरह आती और जाती है इसी तरह आज जिस तरह बजारवाद सारी दुनिया पर हावी है इस पर कौन प्रहार कर सकता है, कौन अपनी बात कह सकता है? सिर्फ ब्रेख्त के नाटकों में छिपे हुये तथ्य ही है जो इन सब पर प्रहार कर सकते हैं। वही अस्त्र की तरह लड़ सकते हैं। बशर्ते यदि कोई उन्हे अच्छे तरीके से प्रस्तुत कर सके। ब्रेख्त का एलियनेशन क्या है? जो द्वन्द्वात्मक सत्ता हमारे भीतर है, उस भीतरी मुखौटे को वे निकालने की कोशिश करते हैं। जिससे समाज का सत्य है और मैं भी ऐसी ही हूँ मुझे हेपोक्रेसी पसंद नहीं है। मैं दो रूप नहीं देख सकती। मेरे साथ ब्रेख्त के चिंतन में कहीं न कहीं बहुत मेल है जो मेरे हर नाटक में उभर कर आया है।

विगत 40 सालों से थियेटर करते हुये मुझे लगा है कि थियेटर की भाषा क्या होती है? क्या वह जर्मन होती है, या हिन्दी, गुजरती, मराठी, या बंगला होती है? मुझे लगता है थियेटर की अपनी भाषा होती है। मैं जब जर्मनी में ‘काशीनामा’ नाटक लेकर गई थी कुछ देर बाद दर्शकों ने subtitle देखना छोड़ दिया था और सिर्फ नाटक को ही देख रहें थे जबकि जर्मनी में लोग हिन्दी नहीं समझते हैं। फिर भी सभी ने बहुत सराहा। जहां तक बंगाल की बात है मेरे नाटकों के दर्शक हिन्दी से ज्यादा बंगाली हैं इसलिए मुझे लगता है की भाषा की रुकावट नहीं होती।

सुरभि: ब्रेख्त का प्रभाव पूरे भारत में पड़ा, आप इसे बांग्ला रंगमंच के संदर्भ में कैसे देखती हैं?

उषा गांगुली:बंगाल में तो 60,70,80 में भयानक रूप से ब्रेख्त हो रहे थे, ब्रेख्त की लहर थी। उस समय ‘गुड वुमेन ऑफ सेत्जुवन’ के तीन तरह की प्रस्तुति देखी है। बंगाल में रुद्र बाबू, विभाष दा, अजितेश बंधोपाध्याय एवं सोहाग सेन ने भी ब्रेख्त को खूब किया।

सुरभि: ब्रेख्त को विचार और शैली के रूप में आप कैसे देखती हैं?

उषा गांगुली: ब्रेख्त के नाटक कथ्य,वैचारिक और शैलीगत रूप से मानवीय अनुप्रेरणा के लायक हैं। ब्रेख्त जिस तरह उधेड़ देते थे वैसे ही उधेड़ना आना चाहिए।

सुरभि: ब्रेख्त से प्रभावित भारतीय नाटककार,निर्देशक कौन हैं /

उषा गांगुली:भारत में बहुत सारे निर्देशक हैं जैसे एम. के. रैना, बंसी कौल, हबीब तनवीर, विजया मेहता, जब्बार पटेल, रुद्र दा, विभाष दा आदि सभी ने ब्रेख्त को किया है। और आज भी कर रहे हैं।

सुरभि:वर्तमान भारतीय सामाजिक,राजनीतिक,आर्थिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्य में ब्रेख्त की उपयोगिता के विषय में बताएं।

उषा गांगुली:भारत वर्ष का वर्तमान सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक ढांचा जब तक रहेगा लोग ब्रेख्त के नाटक करते रहेंगे और कामयाब होते रहेंगे। क्यों कि यह सीधे-सीधे इस पर प्रहार करता है। कहानी की तरह सहजता से ब्रेख्त ने जब एशिया के लोक से सब कुछ लिया चाहे वह चीन हो,वर्मा हो तो जहां से उन्होने लोक तत्व लिया वहाँ तो ब्रेख्त को तो सफल होना ही था। और सबसे ज्यादा सफल जर्मनी के बाहर हुये। पूरे विश्व ने ब्रेख्त को स्वीकारा और अपनी-अपनी भाषा में किया।

सुरभि:आप मेरा शोध विषय-‘ब्रेख्त का भारतीय रंगमंच पर प्रभाव, विशेष संदर्भ हिन्दी, बांग्ला और मराठी’ को कैसे देखती हैं?

उषा गांगुली: आप इस विषय पर शोध कर रही हैं, यह बहुत ही बड़ा काम है, नहीं तो थियेटर पर लिखा कहाँ जाता है, कौन थियेटर की बात करता है, प्रकाश की बात करता है? क्योंकि कई बच्चे नाटक अच्छा करते हैं लेकिन सैद्धांतिकी उन्हें पता नहीं होती है। यह जानकारी यदि आप से मिले तो बहुत ही अच्छी बात है। आपको बहुत-बहुत धन्यवाद जो अपने इस विषय को लिया।अब तक मेरे पास बहुत सारे लोग साक्षात्कार लेने आए लेकिन यह पहला विषय है जो ब्रेख्त से संबन्धित है। आप इतना गहन विषय पर शोध कर रहीं है मुझे बहुत अच्छा लगा।यह काम नयी पीढ़ी के लिए लाभकारी होगा। आपको बहुत-बहुत बधाई।

सुरभि:1976 से लेकर अब तक आपने जितने भी नाटक किए, किसी न किसी छोर पर ब्रेख्त से मिलती हैं?

उषा गांगुली:मैं यह कहना चाहती हूँ कि मैं सामाजिक हूँ। मैं जितना ज्यादा ब्रेख्त से अनुप्रेरित हुई हूँ किसी से नहीं हुई।मैं ब्रेख्त के टेक्स्ट का बहुत ही सम्मान और पसंद करती हूँ। यही कारण है कि मैंने उनके विचारों को अपनाया है।

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बेनूर और स्याह चेहरों की दास्तान ‘ब्यूटी ऑफ़ लाइफ़’- तेजस पूनिया

35-40 चेहरे और शरीर की सर्जरी। 20-30 लाख और इससे भी ज्यादा का खर्च। बावजूद उसके आप पहले जैसा चेहरा या शरीर ना पा सकें तो क्या गुजरेगी आप पर। इसी कहानी को कहती है यह डॉक्यूमेंट्री- ‘ब्यूटी ऑफ़ लाइफ़’।

चार अविश्वसनीय लोग मोहिनी, गौरव कुमार, चंद्रहास मिश्रा, सोनाली मुखर्जी, और अर्चना ठाकुर फ़िल्म ब्यूटी ऑफ लाइफ में महज ये चार नाम हैं और उनकी कहानी। लेकिन हकीकत इससे बहुत परे है। आए दिन अखबारों,न्यूज चैनलों के कॉलम इस बात से अटे पड़े रहते हैं कि फलां लड़की पर तेज़ाब डाला गया। इनमें अधिकांश केस प्रेम के होते हैं। ऐसे तथाकथित युवा लड़के जो प्रेम की परिभाषा तक नहीं समझते। और उनका मकसद केवल लड़कियों को बिस्तर तक लाने का होता है। वो भला प्रेम को कैसे समझ पाएंगे और वे जब इसमें कामयाब नही। हो पाते तो उस लड़की की जिंदगी तबाह कर देते हैं।
2013 के बाद हमारे देश के सुप्रीम कोर्ट ने एसिड अटैक सर्वाइवर के लिए कानून बनाए, उनके लिए 3 लाख से 50 लाख तक की आर्थिक मदद का एलान किया। इन सबके चक्करों में देश में हजारों एनजीओ खुले लेकिन मदद के नाम पर निल बट्टे सन्नाटा ही हासिल हुआ।

सिनेमा प्रेन्योर के पर्दे पर एसिड अटैक हुए इन लोगों की कहानी उनकी मुँह जबानी सुनकर रूह कांप उठती है। बेनूर और स्याह हो चुके उनके चेहरे और जिंदगियों में उनके अपने भी झांकना तक पसन्द नहीं करते। ऊपर से उन्हें कह दिया जाए कि आप 6 महीना 1 साल अपना चेहरा ना देखें। तो क्या गुजरेगी। एक आम इंसान दिन में 10 बार अपना चेहरा आईने में निहारता है और अपने को दुनिया का सबसे खूबसूरत इंसान समझता है। तिस पर लड़कियां चेहरे पर एक दाना भी निकल आए तो कई कई दिनों तक घरों से बाहर नहीं निकलती। जरा उनके दर्द , दुःख और तकलीफ़ को समझने की कोशिश करें जो इस कांड के बाद कभी अपना चेहरा नहीं देख पाएंगे और देखेंगे भी तो उन्हें खुद से घृणा होने लगेगी।

लेखक, निर्देशक, निर्माता , कई एड फ़िल्मों के मेकर आशीष कुमार की 47 मिनट की डॉक्यूमेंट्री फिल्म भारत में तेजाब हमलों की चौंकाने वाली सच्चाइयों और सच्ची घटनाओं को गहराई से दर्शाती है। चार आत्माओं की आंखों के माध्यम से जिन्होंने न केवल पश्चाताप कृत्यों का सामना किया है, लेकिन फिर अवसाद, भावनात्मक और शारीरिक पीड़ा, उनके आसपास के समाज की निष्क्रियता, और आशा के साथ दूसरी तरफ आने के लिए अन्य अपमानों से जूझ रहे हैं, एक तरफ उनका भविष्य और दूसरी तरफ इन शातिर हमलों का अंत देखने के लिए एक अथक दृढ़ संकल्प। प्रत्येक दृश्य के बैकस्टोरी को बताने के लिए संक्षिप्त एनिमेटेड खंडों के साथ चार लोगों के साथ वास्तविक जीवन के साक्षात्कार के माध्यम से शक्तिशाली दृश्य इस फ़िल्म में दिखाए गए हैं। ये चार लोग भयावहता के सतह के निशान की लगातार याद दिलाते हैं। लेकिन ये लोग अपने जीवन में नए प्यार और मूल्य की खोज करने के लिए काफी हद तक प्रभावित करते हैं। एक समान लक्ष्य के साथ जागरूकता बढ़ाने में मदद करना और इसी तरह की परिस्थितियों से प्रभावित अन्य लोगों की सहायता करना इनका उद्देश्य बन जाता है।

कुल मिलाकर, अपने बहुत जरूरी संदेश के साथ, इस विषय पर कुंद सम्बोधन, प्रभावशाली साक्षात्कार और जागरूकता के लिए कॉल और बाद में इन एसिड हमलों को देश से मिटते देखने के लिए कार्रवाई करती फ़िल्म “ब्यूटी ऑफ लाइफ एक आंदोलन के रूप में दिखाई देती है

अपनी रेटिंग 4 स्टार

चित्र साभार-ourtitbits.com

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मधुबनी लोककला के विविध रंगों में मैथिल स्त्री की संवेदना – डॉ.प्रियंका कुमारी

मधुबनी लोककला के विविध रंगों में मैथिल स्त्री की संवेदना

  • डॉ.प्रियंका कुमारी

मधुबनी लोककला में मैथिल स्त्री की अद्वितीय प्रतिभा

प्राचीन काल से ही विदेह राजा जनक की जन्म भूमि मिथिला की लोकसंस्कृति समृद्ध रही है। मिथिला क्षेत्र भारत और नेपाल दोनों देशों में विस्तारित है। लोकभाषा, खान-पान,रहन-सहन, वेश-भूषा, संस्कार, लोककला, लोकगीत, लोकनाट्य, लोकसाहित्य आदि मिथिला की  लोकसंस्कृति के अनेक अंग- उपांग हैं।   मधुबनी लोककला इसी लोकसंस्कृति का एक सोपान है। मधुबनी लोककला का उद्भव स्थल मधुबनी है, जो बिहार राज्य की उत्तरी सीमा में स्थित है। मधुबन का शब्दार्थ है ‘शहद का वन’। मैथिल स्त्री के ओजस्वी हृदय का उद्गार है मधुबनी लोककला। इसमें वह सीमित साधन में अपनी आकांक्षा को साकार रुप देती है। यह कला मैथिल स्त्री के असाधारण प्रतिभा का प्रतीक है। मैथिल स्त्रियो की यह प्रतिभा राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सराही गई है। इस कला से मैथिल स्त्री की न केवल पहचान निमिर्त हुई, बल्कि यह कला वर्तमान में उनके उन्नत व्यवसाय के साधन का पर्याय भी बन गया है। मधुबनी लोककला के दो प्रकार हैं- मधुबनी चित्रकला और मधुबनी शिल्पकला। मधुबनी चित्रकला मिथिलांचल की प्रसिद्ध चित्रकला शैली है। मधुबनी चित्रकला शैली मिथिलांचल की वह सांस्कृतिक धरोहर है, जो पीढ़ी दर पीढी महिलाओं से महिलाओं को प्राप्त होती आ रही है। स्त्री साहचर्य और सशक्तिकरण का सर्वोत्तम उदाहरण है मिथिला की ‘मधुबनी चित्रकला’। यह   मधुबनी चित्रकला, मधुबनी पेंटिग तथा मिथिला की लोककला आदि पर्याय के रुप में विख्यात है। मैथिल स्त्रियों द्वारा सूत्रपात की गई  मधुबनी शिल्पकला मिथिला की प्रसिद्ध   लोककला है। मधुबनी शिल्पकलाओं में मृण्मूर्ति (terracotta), मूँज और सिक्की की हस्तनिर्मित रंग-बिरंगी वस्तुएँ-सिक्की के मौनी, चंगेरी (खर से बनाई गई कलात्मक डिजाईन वाली उपयोगी वस्तुएँ) ,सुजनी, बुनाई, कढ़ाई, बाँस के वस्तुएँ, लकड़ी पर नक्काशी, कपड़ों पर रंगाई, सूत कातना और लहठी का निर्माण प्रमुख हैं। मधुबनी लोककला स्वयं में इतना कुछ समेटे हुए है कि पुरुषों द्वारा उपेक्षित इस कला को वर्तमान में उन्होंने ही अपने व्यवसाय के उन्नत साधन के रुप में स्वीकार् कर लिया है।

मधुबनी चित्रकला का  उद्भव

इस लोककला के उद्भव के संर्दभ में ऐसी लोकमान्यता है कि विदेह राजा जनक ने राम-सीता के विवाह के मनोरम दृश्यों को महिला कलाकारों को भित्ति रुप में अंकित करने को कहा। तब से इस अदिवतीय चित्रकला की परंपरा चल पड़ी। मधुबनी में विकसित होने के कारण इस कला को मधुबनी चित्रकारी शैली भी कहा जाता है। मधुबनी चित्रकला का उद्भव सत्रहवी सदी में मधुबनी के जितवारपुर (ब्राह्मण बहुल) और रतनी (कायस्‍थ बहुल) गाँव में मैथिल स्त्रियों द्वारा हुआ था।1935 के भीषण आकाल के समय विदेशी विद्वान डब्ल्यू जी आर्चर ने यत्र-तत्र गाँवों की भित्ति पर सामित साधन में मैथिल स्त्रियों की उकेरी गई इस उपेक्षित चित्रकला को देखा, और उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर मधुबनी चित्रकला (Mithila painting) की संज्ञा से सम्मानित किया और प्रश्रय दिया। आर्चर महोदय के प्रश्रय के कारण ही यह उपेक्षित कला आज जीवित ही नहीं सम्मानित भी है। वैश्वीकरण के इस युग में अशिक्षित मैथिल स्त्री के उर्वर मष्तिष्क की इस असाधारण प्रतिभा को देश ही नहीं विदेशों में भी सराहा गया।

मधुबनी चित्रकला शैली

मधुबनी चित्रकारी का विषय समाज, संस्कृति, धर्म एवं प्रकृति होता है। सामाजिक परिवेश के अन्तर्गत पुरुष-स्त्री, विवाह, कोहबर, शाही अदालत के दृश्य ; प्रकृति के अन्तर्गत सूर्य, चंद्रमा, पेड़-पौधे, फूलों, जानवरों, पशु-पक्षियों ; धार्मिक परिवेश के अन्तर्गत प्राचीन महाकाव्यों के दृश्य, शिव-पार्वती विवाह, राम-जानकी स्वयंवर, कृष्ण लीला, सूर्य, चंद्रमा और धार्मिक पेड़-पौधे जैसे- तुलसी, पीपल, वट आदि को ज्यामितीय आकृति में व्यापक और गहन रूप से चित्रित किया जाता है।1960 के दशक में भर्णी, कच्छनी और तांत्रिक शैली मुख्य रूप से उच्च कुल की स्त्रियों (ब्राह्मण और कायस्थ) द्वारा बनायी जाती थी। उनके विषय मुख्य रूप से धार्मिक होते थे। उनके चित्रकारी में देवी-देवताओं, वनस्पतियों और जीवों को चित्रित किया जाता था। कालान्तर में इस लोककला का निर्माण सभी वर्ग की (निम्न वर्ग) महिलाओं में लोकप्रिय हो गया। जहाँ उच्च वर्ग की स्त्रियों के चित्रकारी विषय भर्णी, कच्छनी, तांत्रिक, गोदा और कोहबर था, वहीं निम्न वर्ग की महिलाओं के चित्रकारी का विषय दैनिक जीवन तथा राजा शैलेश [गांव की रक्षा] से संबद्ध कहानी और उनका चित्र।

मैथिल स्त्रियों की विशेषता यह है कि मधुबनी चित्रकला में प्रयोग किए जाने वाले रंग कागज, कैनवस का निर्माण वे स्वयं करती हैं। गाय के गोबर को महीन सूती कपड़े पर डालकर तथा उसे घूप में सुखाकर कैनवस का निर्माण, पौधों की पत्तियों, फलों तथा फूलों से रंगों का निर्माण जैसे पीले रंग के लिए हल्दी, हरे रंग के लिए केले के पत्ते, लाल रंग के लिऐ पीपल की छाल प्रयोग करती है। इस चित्रकला में चटख रंगो- जैसे लाल, हरा, नीला, काला, पीला, गुलाबी और नींबू रंगो का प्रयोग किया जाता है। कागज पर बनी कलाकृतियों के पार्श्व में महीन कपड़ा लगा कर इन्हें पारिवारिक धरोहर के रूप में सहेज कर रखा जाता है। यही कारण है कि हर परिवार में मधुबनी कलाकृतियों के आकार, रंग संयोजन और विषय वस्तु में भिन्नता के दर्शन होते हैं। प्रारम्भ में रंगोली के रूप में रहने के बाद यह पेंटिंग गांवों की मिट्टी से लीपी गई झोपड़ियों में देखने को मिलती थी, परन्तु वर्तमान में यह चित्रकला कपड़े या पेपर के कैनवास पर उतर आई है और वैश्विक बाजार की शोभा बन चुकी है।

मधुबनी चित्रकला का बाजार

पारंपरिक रूप से विशेष अवसर पर घर में बनाई जाने वाली यह कला आज विश्व बाजार में लोकप्रिय है। वर्षो से उपेक्षित रहने के पश्चात मधुबनी कला को १९६२ में व्‍यावसायिक रुप से प्रतिष्ठा प्राप्त हुआ। जब एक कलाकार ने इन गाँवों का भ्रमण किया तो उन्होंने महिला कलाकारों को अपनी चित्रकला कागज पर उतारने के लिए प्रेरित किया। यह प्रयोग व्‍यावसायिक रूप से सर्वाधिक कारगर प्रमाणित हुई। आज मधुबनी कला शैली में अनेक उत्‍पाद बनाए जा रहे हैं, जिनका बाजार विस्तृत होता जा रहा है। वर्तमान में इस चित्रशैली का उपयोग कार्ड, बैग, दरी परिधानों पर किया जाता है। इस कला की मांग न केवल भारत के घरेलू बाजार में बढ़ रही है, वरन विदेशों में भी इसकी लोकप्रियता बढ़ती जा रही है। आज मधुबनी कलाकृति दीर्घाओं, संग्रहालयों और हस्तकला की दूकानों के साथ विश्वजाल पर भी खरीद-विक्री हेतु उपलब्ध है।

मधुबनी चित्रकार

मधुबनी चित्रकला के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने वाली अन्यतम चित्रकारों में प्रमुख है – पद्मश्री से सम्मानित बौआ देवी, जगदम्बा देवी, गंगा देवी, कुमुदिनी देवी, सीता देवी, गोदावरी देवी, चन्द्रप्रभा देवी, यमुना देवी आदि तथा राष्ट्रपति सम्मान से सम्मानित चन्द्रकला देवी, राष्ट्रपति सम्मान और बिहार राज्य श्रेष्ठ शिल्प पुरस्कार से सम्मानित महासुन्दरी देवी आदि। बौआ देवी को मधुबनी कला में उत्कृष्ट अवदान के लिए 2017 में पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा अपने विदेश यात्रा के दौरान, हैनोवर के मेयर स्टीवन स्कॉस्टक को, बौआ देवी द्वारा निर्मित चित्र उपहार स्वरुप दिया जाना, मैथिल स्त्री समाज को गौरवान्वित करता है।

मधुबनी चित्रकला के प्रकार

• भूमिचित्र

• भित्ति चित्र

• पट चित्र

भूमिचित्र या अल्पना

अल्पना (अलि-पन) देशज शब्द है। अलि का अर्थ है बांध और अंकन का अर्थ है कला। अर्थात अल्पना का शाब्दिक अर्थ हुआ बांधने की कला। मैथिली में इसे अरिपन या ऐपन भी कहा जाता है। अरिपन में अध्यात्म प्रधान होता है। इसमें तंत्र-मंत्र को विशेष रुप से बनाये जाने की परंपरा है। अल्पना संपूर्ण भारत में लोकप्रिय है। बंगाल में इसे अल्पना, उड़ीसा में ओसा, गुजरात में सठिया, बिहार और उत्तरप्रदेश में चाक या चाकपूरन, राजस्थान में मेंहदीमंडन या मंडन और महाराष्ट्र सहित संपूर्ण दक्षिण भारत में इसे रंगोली कहा जाता है। अल्पना को घर के बैठक या मुख्य दरवाजे के बाहर शुभ कार्यों यथा यज्ञ, पूजा, व्रत, मुडंन, विवाह के अवसर पर तथा खेतों में उन्नत फसल के लिए ज्यामितीय और वृत्ताकार आकृति में व्यापक और गहन रूप से बनाया जाता है। कोई भी कोना रीता नहीं रह पाता है। अरिपन निर्माण के मुख्य विषय होते हैं – मनुष्य, पशु-पक्षी, मत्सय, शेषनाग, कछुआ, वृक्ष, फूल-फल, पत्ता, पर्वत, नदी, यंत्र, बिन्दु, स्वास्तिक, गणेश, विष्णु, विष्णुपद, शंख, त्रिशुल शिव-पार्वती विवाह, राम-जानकी स्वयंवर, कृष्ण लीला सूर्य, चंद्रमा और धार्मिक पेड़-पौधे जैसे – तुलसी, पीपल, वट। अरिपन के विविध प्रकार हैं – अष्टदल अरिपन, षडदल अरिपन, स्वास्तिक अरिपन, सर्वतोभद्र अरिपन। अरिपन को त्रिकोण, समकोण, समचतुर्भुज वृत और वृताकार आकृति में भूमि पर बनाया जाता है। समचतुर्भुज वृत में किए जानेवाले चित्रण को मंडल कहा जाता है। मंडल दो प्रकार का होता है – रेखांकन मंडल, व्रत मंडल। रेखांकन मंडल में तंत्र-मंत्र चित्र तथा अलौकिक दृश्यों की प्रधानता होती है, व्रत मंडल का विषय समान्य होता है। मिथिला में वृताकार तथा त्रिकोणात्मक अरिपन सर्वाधिक लोकप्रिय है। चित्र बनाने के लिए माचिस की तीली व बाँस की कलम का प्रयोग किया जाता है। स्त्रियाँ स्वयं पिसे हुए चावल से श्वेत, ज्वार के बीज में बेल, कनैल तथा गोबर मिलाकर काला, पीपल की छाल और कुसुम के फल से लाल, हल्दी से पीला, पलाश के फल से नारंगी, बेल तथा केले के पत्तों से हरा रंगों का निर्माण करती हैं। रंग की पकड़ बनाने के लिए बबूल वृक्ष के गोंद को मिलाया जाता है। महिलाएँ कुची या तुलिका के स्थान पर अपनी उँगली, माचिस की तीली और बाँस की कलम का प्रयोग करती है।

 

भित्ति चित्र

भित्ति चित्र मधुबनी चित्रकारी की अति प्रसिद्ध अर्थमूलक तथा वर्णनात्मक शैली है। इसका उद्येश्य मनोरंजक, आह्लादपूर्ण तथा क्रीड़ामय जीवन का चित्रण है। भित्तिचित्र को घर के तीन विशेष स्थानों पर ज्यामितीय आकारों में बनाये जाने की परंपरा है, जैसे- पूजास्थान, कोहबर कक्ष (नवविवाहितों का कमरा) या किसी विशेष उत्सव पर घर की बाहरी दीवारों पर। मानव, देवी- देवता, पशु-पक्षी, पेड़-पौधा, मनोहर प्राकृतिक दृश्य आदि भित्ति चित्र के मुख्य विषय होते हैं- देवी-देवताओं में दुर्गा, काली, सीता-राम, राधा-कृष्ण, शिव-पार्वती, गौरी-गणेश और विष्णु के दस अवतार; पशु-पक्षियों में तोता, कछुआ, मछली, हाथी, घोड़ा, शेर; पेड़-पौधों में बाँस, कमल, फूल, लताएँ, फूल-पत्तियाँ आदि; प्राकृतिक दृश्यों में सूरज,चांद आदि। समृद्धि के लिए स्वास्तिक के चित्र को बनाया जाता है। इस चित्रकारी के निर्माण के लिए आवश्यक सामग्री की व्यवस्था स्त्रियाँ स्वयं सीमित साधन और प्राकृतिक संसाधनों से करती हैं। भित्तिचित्र की आवश्यक सामग्री भित्ति होती है। इस चित्रकारी शैली में कैनवस दो प्रकार के बनाने की परंपरा है- एक भित्ति की तो दूसरी कागज की। चित्रकारी के पूर्व महिलाएँ कैनवस का निर्माण दीवार को चूने से पोतकर या मिट्टी और गाय के गोबर के मिश्रण में बबूल की गोंद मिलाकर दीवारों पर लिपाई कर के करती है। कैनवस के निर्माण के लिऐ कागज, गाय का गोबर तथा बबूल के गोंद का प्रयोग   किया जाता है। गाय के गोबर में एक खास तरह का रसायन पदार्थ होने के कारण दीवार तथा कागज पर विशेष चमक आ जाता है। भित्ति चित्रकारी में चटख रंगों – गुलाबी, हरा (सुगापंखी), पीला, श्वेत, श्याम, नीला एवं सिन्दुरी लाल आदि रंगों का प्रयोग किया जाता है। महिलाएँ पिसे हुए चावल से श्वेत, ज्वार के बीज को जलाकर उसमें बेल, कनैल तथा गोबर मिलाकर या दिये की कालिख को गोबर के साथ मिला कर काला रंग, पीपल की छाल और कुसुम के फूल से लाल, हल्दी और चूने को बरगद की पत्तियों के दूध में मिला कर पीला, पलाश या टेसू के फूल से नारंगी, केले तथा बेल की पत्तियों से हरा रंगों का निर्माण करती हैं। रंगों को स्थायी और चमकदार बनाने के लिये बकरी का दूध या बबूल के गोंद का प्रयोग किया जाता है। महिलाएँ चित्रांकन के लिए कुची या तुलिका के स्थान पर अपनी उँगली, माचिस की तीली और बाँस की कलम, बाँस की तीलियों में रूई लपेट कर अनेक आकारों की तूलिकाओं का प्रयोग करती हैं। मिथिलांचल में भित्तिचित्र की तीन शैलियाँ अति प्रसिद्ध है-

• हरिसौन पूजा शैली

  • कोहबर चित्र शैली

• सरोवर चित्र शैली

हरिसौन पूजा शैली

हरिसौन पूजा भित्ति चित्र शैली मिथिलांचल में सर्वाधिक लोकप्रिय है। यह हास्य प्रधान चित्र शैली है। इसे सिन्दूर से बनाने की परंपरा है। इस शैली में मुख्यतः स्त्री के वैवाहिक जीवन के सुख-दुख को चित्रित किया जाता है।

कोहबर चित्रकला शैली

कोहबर (विवाहोपरान्त पति-पत्नी के प्रथम मिलन का कमरा) भित्ति चित्र शैली अत्यन्त ही चमकदार, भव्य एवं संवेदनशील चित्र शैली है। विश्व प्रसिद्ध अजन्ता के नवम तथा दसम गुफा के प्रारंभ की चित्रकला तथा मिथिला के कोहबर चित्रकला में समानता लक्षित होता है। इसका उद्देश्य विवाहोपरान्त नवसृष्टि के संरचना का संदेश है। कोहबर चित्रकारी में सौन्दर्य, आनंद और कामवासना का अदभुत मिश्रण होता है। इस चित्राकृति में बाँस, कमल का पत्ता, दही, मछली को ढ़ोते हुए भरिया (भाड़ ढ़ोनेवाला) भित्ति के चारों कोनों पर, मस्तक पर विभिन्न सामग्री या कलश लिए महिलाएँ जिसे जनसाधारण में नैना-जोगिन कहा जाता है, सर्वाधिक लोकप्रिय है। मैथिल संस्कृति में वैवाहिक अवसर पर भरिया और नैना-जोगिन को बनाना अत्यधिक शुभ माना जाता है। मयूर और मछली दीर्घ जीवन के साथ-साथ उर्वरता का भी प्रतीक है। भित्ति पर शिव-पार्वती विवाह, राम-जानकी स्वयंवर, बाँस की झाड़ी में विविध पक्षी, कबूतर, तोता, आम, कटहल और फलों के पेड़, खिले फूल के साथ गुलाब का पौधा के उपर मानव रुप में चाँद की आकृति, वधू के घर से दही, मछली, केला, भोजन परोसती स्त्री, प्रेम विभोर हो नृत्य करते मयूर, नदी में स्नान करती गोपियों के वस्त्र-हरण करते कृष्ण, राधा के संग बाँसुरी बजाते कृष्ण, नृत्य करते गोपी कृष्ण के नृत्य करते शारीरिक और आध्यात्मिक प्रेम के पौराणिक चित्र, नवदंपति के यौन संबंध तथा संतानोत्पत्ति के अतिरिक्त नवयुगल दंपति के अनंदातिरेक करने वाले विविध मनोहारी दृश्य कोहबर चित्रकारी की विशेषता है।

सरोवर चित्र कला शैली

सरोवर भित्ति     चित्र शैली में विभिन्न प्रकार के पशु-पक्षी (कबूतर, मछली, गाय), समुद्री जीव-जन्तु, मछली और सर्प के मानवी रुप, विविध प्रकार के फूल, लताएँ, पूजा-घर के प्रवेश द्वार के चारों दिशाओं का भव्य शैली में चित्रांकन किया जाता है। यह चित्र शैली उल्लास एवं प्रणय भावना को मूर्त रुप देती है।

 

मधुबनी शिल्पकला

मृण्मूर्ति (terracotta)

यह कला मिथिला की महिलाओं द्वारा पोषित और संचालित है। मृण्मूर्ति में मिट्टी की मूर्तियाँ, रंग-बिरंगे आर्कषक खिलौने तथा अनेक घरेलू वस्तुओं का निर्माण किया जाता है। कार्तिक मास में कृष्ण की बहन श्यामा के जीवन पर मनाया जाने वाला पर्व     सामा-चकेवा के अवसर पर महिलाएँ मिट्टी के मनोहारी खिलौने (सामा-चकेवा) का निर्माण करती है। मिट्टी के घरेलू उपयोग में     आने वाले वस्तुओं में प्रमुख है – कोठी (अनाज को रखने के लिए मिट्टी का गोदाम), बोरसी (शरद ऋतु में आग को जलाकर कमरे में रखने वाला मिट्टी का वृताकार पात्र),     मटकूड़ (घरे की आकृतिवाला मिट्टी का पात्र), चूल्हा (दो मुँह या एक मुँह वाला), आदि।

    मूँज, सिक्की और बाँस की हस्तनिर्मित रंग-बिरंगी वस्तुएँ

मैथिल स्त्रियों की प्रतिभा का अन्यतम उदाहरण मूँज और सिक्की की हस्तनिर्मित रंग-बिरंगी वस्तुएँ है, जो घर-घर में अत्यंन्त उत्साह और मनोयोग से सीमित साधन में बनाये जाते हैं। मूँज और सिक्की की हस्तनिर्मित रंग-बिरंगी वस्तुओं में प्रमुख है – चटाई, चंगेरी, मौनी, पौती, डाला, पिटारी आदि। बाँस से निर्मित वस्तुओं में चटाई, सुप, सुपली, डाली, टोकड़ी, मौनी, पौती प्रमुख है। इसके निर्माण के लिए सितम्बर-अक्टूबर मास में मूँज और सिक्की को काटकर, उपर के फूल को तोड़कर सुखाती है, फिर हरा और लाल रंगों को घोलकर उसे चूल्हे पर एक बर्तन में रखकर गर्म कर उसमें मूँज और सिक्की को कुछ समय के लिए भिंगो दिया जाता है। तत्पश्चात इसे सुखाया जाता है और फिर टेकुली के सहारे इन रंग-बिरंगी मूँज और सिक्की को अपने कल्पना को मूर्त रुप देकर हस्तनिर्मित अतीव सुन्दर और आर्कषक चटाई, चंगेरी, मौनी, पौती, डाला, पिटारी का निर्माण किया जाता है।

सुजनी – गृह शिल्पकला में सुजनी का महत्वपूर्ण स्थान है। इस शिल्पकला का निर्माण मुख्यतः बिहार में किया जाता है। पर मिथिलांचलकी बनी सुजनी की कोई तुलना नहीं है। इसका सामग्री पुराना कपड़ा होता है। सुजनी बनाने के लिए सर्वप्रथम एक बड़ा कपड़ा को भूमि पर बिछा दिया जाता है। फिर उसपर पुराने कपड़ों को करीने से कई तहों में बिछाया जाता है। अन्त में इसे श्वेत कपड़ा से ढ़क दिया जाता है। चारों कोनों को हाथों से सुई धागा से सिलते हुए आरा, तिरछा और मध्य में अत्यन्त करीने के साथ सीलाई की जाती है, ताकि सिलवट न पड़े। इसके पश्चात महिलाओं को अपनी प्रतिभा को अपने हाथों से बिखेरने का अवसर आता है और वे अपनी आंतरिक सौन्दर्य को सुजनी पर उकेर देती है। रंग-बिरंगे धागों से तितली, तोता, मैना, मयूर, हाथी, घोड़ा, बाघ, साँप, गमला सहित फूल के पौधे, जल में मछली के साथ तैरता साँप, पतंग उड़ाता बालक, पालकी पर बैठी वधू, तीर्थाटन के लिए जाती वृद्धा आदि का अति सुन्दर और मनोहारी चित्र सुजनी पर बनाया जाता है। सुजनी के निर्माण से बचे कटे-फटे कपड़ों से महिलाएँ कनियाँ-पुतरा अर्थात रंग-बिरंगी तीखे नाक-नक्शे वाले अति लुभावने और मनभावन गुड्डा-गुड़ियाँ को बनाती हैं।

सूत कातना – यज्ञ, जनेउ तथा खादी के वस्त्र के निर्माण के लिए मैथिल स्त्रियों द्वारा टकुरी तथा चरखा पर सूत कातने की हस्तकला अति प्राचीन काल से विख्यात है। यह शिल्पकला उच्च वर्ग (कायस्थ और ब्राह्मण) की महिलाओं में, सर्वाधिक प्रचलित था।

लहठी का निर्माण

मिथिला की एक अन्यतम और महत्वपूर्ण शिल्पकला लहठी चुड़ी का निर्माण भी है। इसके शिल्पकार को लहेरी कहा जाता है। मिथिला में यह शिल्पकला इतनी प्रसिद्ध है कि इसके निर्माण के प्रमुख केन्द्र का नामकरण ही लहेरी से लहेरियासराय कर दिया गया। लहठी के निर्माण में उत्तम कोटि के लाह और रंग की आवश्कता होती है। लहठी बनाने के लिए चटख लालरंग का प्रयोग किया जाता है। लहठी को तिसीफूल, चगोटवा तथा कंगना भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त लाह की सिन्दूरदानी बनाने की भी परंपरा है। विवाह, व्रत-त्योहार के अवसर पर नवविवाहिता और महिलाएँ द्वारा लहठी पहनने की परंपरा है।

बुनाई और कढ़ाई – मिथिला की गृहकला सुई-शिल्प को कसीदा या कढ़ाई कहा जाता है, जिसे विवाहित, अविवाहित सभी मैथिल स्त्रियाँ बनाती हैं। वे सुई और रंग-बिरंगे धागे से दैनिक जीवन के व्यवहार में आनेवाली वस्तुएँ – चादर, तकिया का खोल, रूमाल, मेजपोश, थालपोश, साड़ी आदि पर अत्यन्त उत्साह और उमंग के साथ साधारण कपड़े पर ही विविध प्रकार की ऐसी अति आर्कषक और नयनाभिराम आकृति बनाती है कि उस कपड़े और परिधान की आभा अतुलनिय और कीमत दोगुनी हो जाती है। इस कसीदाकारी का विषय फूल, पत्ता, तितली, सूर्य, चाँद, तारे आदि होते है। अविवाहित लड़कियाँ इस प्रकार के कढ़ाई किए गए कपड़े और परिधान को विवाहोपरान्त अपने ससुराल में दिखाने के लिए ले जाती है, जिससे उनका सम्मान बढ़ता है। कढ़ाई के अतिरिक्त मिथिला की महिलाओं में बुनाई की परंपरा अत्यन्त ही उत्साह के साथ शरद ऋतु में लक्षित होती है। क्रोशिए एवं काँटे के सहयोग से वे ऊन के भाँति-भाँति के विविध चित्ताकर्षक आकृति वाले रंग-बिरंगी स्वेटर, शॉल, मफलर, स्कार्फ, दस्ताना, मोजे, मुख्य द्वार पर रखे जानेवाले पैरपोछ, टेबुल क्लॉथ आदि की बुनाइ अपने हाथों से करती है। महिलाओं द्वारा रस्सी से बुनाई की जाने वाली वस्तुओं में सिकहर या सिक्का अति महत्वपूर्ण है। गाँवों में आज भी सिकहर को छप्पर पर बाँधकर दूध-दही रखने की परंपरा है।

मधुबनी लोककला और मैथिल स्त्री

मधुबनी चित्रकला पारंपरिक रूप से भारत और नेपाल के मिथिलांचल के विभिन्न समुदायों की महिलाओं द्वारा बनाई जाने वाली प्रमुख चित्रकला है। प्रथमतः यह कला उच्च वर्ग (कायस्थ और ब्राह्मण) की महिलाएँ ही किया करती थीं। अतः इसे कायस्थ चित्रकला तथा ब्राह्मण चित्रकला कहा जाता था। पर अब यह सभी वर्ग की महिलाओं की प्रतिभा और गर्व का प्रतीक है। भित्ति से प्रारंभ होनेवाली यह चित्रकला कागज़, कैनवास होते हुए मिट्टी के पात्रों, पंखों और विवाह के अवसर पर प्रयुक्त होने वाली थालियों पर भी की जाने लगी है। इस कला से मैथिल स्त्री की न केवल पहचान निमिर्त हुई है, बल्कि यह कला वर्तमान में उनके उन्नत व्यवसाय का साधन भी बन गया है। हँसते-हँसते अपने हृदय की पीड़ा को कुची के द्वारा भित्ति पर उतारने की कला में मैथिल स्त्रियाँ प्रवीण हैं। यह चित्र शैली पितृप्रधान मैथिल समाज में हुए स्त्री के दमन, शोषण और उत्पीड़न को व्यक्त करने का सर्वोत्तम साधन है। विवाह स्त्री जीवन के सुख और दुख दोनों का कारण है। परन्तु, यह ध्रुवसत्य है कि अधिकांश स्त्रियों के जीवन में विवाह दुख का ही प्रतीक होता है। बींसवी शताब्दी के उतरार्ध में मैथिल स्त्रियाँ बाल-विवाह, बहु-विवाह, बेमेल-विवाह एवं विधवा समस्या से पीड़ित थीं, जिसके परिणामस्वरुप उनका वैवाहिक जीवन त्रासदीपूर्ण था। एक चित्रकार की वाणी उसकी कुची होती है और कुची के माध्यम से उनके हृदय के चित्र को भित्ति पर उतारना पुरुष वर्चस्व से आहत स्त्री की पीड़ा को दर्शाता है। सीमित प्राकृतिक संसाधन में इस कला के माध्यम से वे अपने जीवन के दुख-सुख, हर्ष-आनंद, और अन्य इच्छाओं को चित्रकारी में उड़ेलकर, पुरुष प्रधान समाज के समक्ष अपने समग्र जीवन की दमित भावनाओं को मूर्त रुप देने में सफल हो जाती है, जो किसी न किसी कारणवश दमित रह गई हो। पद्म श्री से सम्मानित जगदम्बा देवी कोहबर चित्रकला की अन्यतम चित्रकार है। कोहबर के अन्तर्गत उनकी राधा-कृष्ण की रासलीला कोने-कोने में सर्वाधिक प्रशंसित हुई है। रासलीला के अति गुढ़ और क्लिष्ट चित्रण में उन्हें अपूर्व आनंद की अनुभूति होती थी। ध्यातव्य हो कि जगदम्बा देवी मधुबनी के जितवारपुर की ब्राह्मणी थी, जो दुर्भाग्यवश युवावस्था में ही संतानहींन विधवा हो गयी थीं। मिथिलांचलके ब्राह्मण परिवार में सिर्फ स्त्रियों के लिए यह अति कठोर प्रथा है कि ब्राह्मण स्त्री का जीवन में एक ही बार विवाह हो सकता है, चाहे वह बाल विधवा ही क्यों न हो। उसका पुर्नविवाह असंभव है। मिथिलांचल के पितृसत्तात्मक ब्राह्मण परिवार की असमानता के कारण जगदम्बा देवी के दमित हृदय की उद्गार कोहबर के रासलीला चित्रकला के रुप में प्रबल वेग से फूट पड़ी और वे इस चित्रकला को अपनी संतान की भाँति आजीवन सहेजती रही।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि मधुबनी चित्रकला सिर्फ कला के लिए नहीं है, वरण यह कला जीवन के लिए है। सीमित प्राकृतिक संसाधन में इस कला के माध्यम से वे अपने जीवन के सुख-दुख, हर्ष-विषाद और अन्य इच्छाओं को चित्रकारी में उड़ेलकर, पुरुष प्रधान समाज के समक्ष अपने समग्र जीवन की दमित भावनाओं को मूर्त रुप देने में सफल हो जाती है, जो किसी न किसी कारणवश दमित रह गई हो। स्त्रियों के बुलन्द हौसले के कारण उत्पन्न, स्त्री द्वारा परंपरा के धरोहर के रुप में चलाई जानेवाली इस लोककला की सूत्रधार, कर्णधार और विश्व स्तर पर अपनी अतुलनीय प्रतिभा का लोहा मनवाने वाली मैथिल स्त्री ही है।

संदर्भः

1. डॉ. उपेन्द्र ठाकुर, मिथिलाक चित्रकला ओ शिल्पकला, मैथिली अकादमी,पटना।

जन्मः 12.02.1971,पटना (बिहार)।
शिक्षाः एम.ए.(हिन्दी),यू.जी.सी नेट,पी.जी.डि.एफ.टी,पी.एच.डी.।
प्रकाशितः   राष्ट्रीय/अन्तर्राष्ट्रीय विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में शोध प्रपत्र प्रकाशित।
सम्पर्कः 5 ए,टाइप-3 क्वार्टर्स,ब्लॉक-20,नेयवेली-607803,तमिलनाडु।
मोः 9443057237
ईमेलः

pkcney@gmail.com

  1. www.hi.mithila.org.
  2. www.en.m.wikipedia.com

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हिंदी सिनेमा में जातिः एक अनछुआ पहलू- शानू कुमार

हिंदी सिनेमा में जातिः एक अनछुआ पहलू

भारत एक बहुसंस्कृति वाला देश है, इसकी यह विशेषता इसके गौरव का एक महत्त्वपूर्ण पहलू है। लेकिन इसके साथ ही यह बहुत अफसोस की बात है कि भारत एक जाति आधारित समाज है। जातियों के आधार पर यह पदानुक्रम में बंटा हुआ है। जाति प्रथा भारतीय समाज की सबसे बड़ी बुराइयों में से एक है। भारतीय समाज की यह जाति व्यवस्था हजारों वर्ष पुरानी है और यह गंभीर सामाजिक भेदभाव और शोषण का सबसे अच्छा उदाहरण है। जाति का विचार देखने में बहुत स्पष्ट प्रतीत होता है लेकिन यह बहुत से प्रश्न खड़े करता है जिनके जवाब इतने आसान और सरल नहीं हैं।

अतः प्रस्तुत लेख हिंदी सिनेमा में जाति से संबंधित प्रश्नों को ढूँढ़ने का प्रयास करता है। जाति व्यवस्था भारतीय सामाजिक संरचना की बहुत ही महत्त्वपूर्ण विशेषता है। समाज का कोई भी पहलू इसके प्रभाव से अछूता नहीं रहा है। लेकिन क्या जाति के प्रश्न को हिंदी सिनेमा में पर्याप्त स्थान मिला? यही प्रस्तुत लेख का मुख्य प्रश्न है। यहाँ प्राकल्पना के रूप में मेरा मानना यह है कि हिंदी सिनेमा में जाति, एक अनछुआ पहलू है।

मुख्य शब्द – जाति, सिनेमा, पदानुक्रम, भारतीय समाज, शौषण, उच्च और निम्न जातियाँ।

सिद्धांत रूप में जाति व्यवस्था चार-वर्ण, गुण-कार्य के अनुसार है। ब्राह्मण का कार्य ज्ञान-दान, क्षत्रिय का रक्षा, वैश्य का व्यापार और शुद्र का श्रम है। किंतु यथार्थ व्यवस्था इतनी सरल नहीं है। वास्तविक स्थिति बहुत जटिल है। जाति जन्मजात होती है और विवाह संबंध जाति के अंदर ही होता है। इसे अम्बेड़कर ने जाति व्यवस्था का मुख्य लक्षण भी माना है। भारत में ज्यादातर जातियाँ स्थानीय या एक क्षेत्र में सीमित हैं। यद्यपि अनेक जातियाँ दूर-दूर तक भी फैली हैं। इस प्रकार जातियों की संख्या चार नहीं हजारों में है। हर जाति की अपनी पंचायत होती है, जो जाति के नियम और आचार-विचार का नियमन करती है। ऊँची जातियों से भिन्न, निम्न स्तर का कार्य करने वाले लोग अछूत समझे जाते हैं जो अनुसूचित जातियों से संबंधित हैं।

भारत में जाति व्यवस्था का प्रारंभ से ही सत्ता और वर्चस्व की अवधारणा से घनिष्ठ संबंध रहा है जिसे औजार बनाकर हजारों वर्षों तक उच्च जातियों ने निम्न जातियों का शोषण कर उनके श्रम पर एक आनंदमय जीवन व्यतीत किया है। ये उच्च जातियाँ जाति के आधार पर अपना सामाजिक प्रभुत्व बनाये रखने में कामयाब रहीं, इसे हाल ही में प्रदर्शित आर्टिकल-15 फिल्म के संदर्भ में अच्छे तरीके से समझा जा सकता है। इस पर व्यापक चर्चा हम आगे करेंगे। इस स्थिति से आधुनिक युग में भी जाति व्यवस्था के महत्त्व का पता चलता है। उच्च जातियाँ आज भी अपना सामाजिक प्रभुत्त्व कायम रखना चाहती हैं और इसके लिए वे आज भी निम्न जातियों को निचले पायदान पर ही रखना चाहती हैं कि कहीं उनका वर्चस्व समाप्त न हो जाए। अतः यह कहा जा सकता है कि जाति प्रथा का प्रभाव भारतीय समाज में काफी व्यापक रूप में रहा है। इस व्यवस्था में उच्च जातियों की स्थिति काफी सुदृढ़ है, वहीं निम्न जातियों की बहुत ही दयनीय।

भारत में जाति व्यवस्था में संसाधनों के आबंटन की सामाजिक प्रक्रिया धार्मिक व सांस्कृतिक आधार पर रही है। संसाधनों के आबंटन की इस प्रक्रिया को समाज के तीन वर्गों को केंद्र में रखकर योजनाबद्ध किया गया था। ब्राहमण, क्षत्रिय, व वैश्य। इन तीन वर्गों का ज्ञान, राजशक्ति एवं वाणिज्य इन तीन महत्त्वपूर्ण सामाजिक संपत्ति पर आधिपत्य था। प्राचीन काल में जब से यह व्यवस्था अस्तित्व में आई तभी से समाज के इन तीन प्रमुख वर्गों में आपसी प्रतियोगिता नहीं थी, बल्कि पारस्परिक अंत-निर्भरता थी। तीनों ही वर्ग अपनी-अपनी सामाजिक संपत्ति के स्वामित्व के अनुसार एक-दूसरे पर निर्भर थे। इस व्यवस्था में चौथा वर्ग संपत्तिहीन होने के कारण इन तीनों वर्गों का सेवार्थी रहा। इस व्यवस्था में चौथे वर्ग को सदैव सेवार्थी बनाये रखने के लिए उपरोक्त तीनों वर्गों ने आपस में गठबंधन स्थापित किया जिसके अंतर्गत उपरोक्त वर्गों की आपसी अंतर्निर्भरता की अंतर्क्रिया से एक उच्च वर्ग की प्रधानता बन गई और यह तीनों वर्ग सामाजिक प्रभुत्त्व कायम कर अन्य वर्ग पर शासन करते रहे। फलस्वरूप तीनों वर्गों की यही प्रधानता सांस्कृतिक व धार्मिक श्रेष्ठता के आधार पर पीढ़ी दर पीढ़ी वैधता प्राप्त करती जाने लगी।

वर्तमान में लोकतंत्र, आधुनिकीकरण व औद्योगिकरण के दौर में भी यह व्यवस्था अपने उसी स्वरूप को बनाए रखना चाहती है।

अतः साधन सम्पन्न तथा शक्ति सम्पऩ्न ऊच्च जातियों द्वारा साधनहीन निम्न जातियों का शोषण आरंभ से ही होता आया है। समाज के निचले पायदान पर रहने के कारण निम्न जातियाँ प्रत्येक स्तर पर शोषण का शिकार रहती हैं। उदाहरण के लिए, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक। धार्मिक आधार पर उन्हें हिन्दू समाज में सबसे निम्न दर्जे पर रखा गया है। उन्हें मंदिर, हवन-कीर्तन, पर्व-त्यौहार मनाने की छूट अवश्य मिल गई है किंतु आज भी ऐसा समझा जाता है कि ये इन कार्यों के योग्य नहीं हैं। आर्थिक आधार पर देखा जाए तो निम्न जातियों की अर्थव्यवस्था मजदूरी पर आधारित होती है लेकिन उन्हें उनकी जाति के कारण उचित मजदूरी नहीं दी जाती। इस कारण उनका आर्थिक शोषण होता है। काम के अभाव में वे अपने श्रम का मोल-तोल नहीं कर पाते। अपने अस्तित्व को बचाने के लिए उन्हें जो कुछ भी मिलता है उसी पर काम करना पड़ता है। राजनीतिक क्षेत्र में भी उत्पीड़ित ही रहे हैं, अधिक संख्याबल होने के बावजूद समाज में प्रबल जाति के रूप में इन्हें मान्यता नहीं मिलती। उनके ऊपर समाज में प्रबल स्थान वाली जातियों का शासन रहा है। राजनीतिक दृष्टि से निर्बल तथा शक्तिहीन होने के कारण निम्न जातियाँ अभी भी उत्पीड़न का शिकार होती हैं। सांस्कृतिक रूप से अभी भी उन पर उच्च जातियों का प्रभुत्व बना हुआ है, उच्च जातियाँ अपने इसी प्रभुत्त्व को निरंतर बनाए रखने के लिए प्राचीनकालीन वर्णव्यवस्था को पुनर्जीवन प्रदान करने के लिए भरपूर प्रयासरत्त हैं।

अब यहाँ यह देखना बहुत ही महत्त्वपूर्ण होगा कि सिनेमा जो हमारे समाज के वास्तविक स्वरूप को प्रदर्शित करता है, जो हमारे समाज का एक आईना है उसमें जाति के प्रश्न को कहाँ तक उठाया गया है। इस प्रश्न पर चर्चा करने से पहले सिनेमा पर थोड़ा प्रकाश ड़ालना सार्थक रहेगा कि सिनेमा की समाज में क्या भूमिका है, यह किस प्रकार से समाज को प्रभावित करता है।

भारतीय लोकतांत्रिक संस्कृति में हिंदी सिनेमा का योगदान सबसे प्रमुख रहा है। हिंदी सिनेमा भारतीय समाज में सबसे ज्यादा अनुगमन किया जाने वाला दृश्य संस्कृति का हिस्सा है। हिंदी सिनेमा भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक, पारम्परिक और ऐतिहासिक आयामों को दर्शाने का एक मुख्य माध्यम है। आज सिनेमा जनसंचार और मनोरंजन का एक लोकप्रिय माध्यम है। जिस तरह साहित्य समाज का दर्पण होता है, उसी तरह सिनेमा भी समाज को प्रतिबिंबित करता है। सिनेमा और समाज में दोहरा सम्बंध होता है। समाज सिनेमा को प्रभावित करता है, सिनेमा समाज को। ये एक-दूसरे से प्रभावित होते हैं और एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं।

सिनेमा एक ऐसा प्रभावकारी माध्यम है, जिसके बारे में सुनते ही व्यक्ति विभिन्न परिकल्पनाओं, आकांक्षाओं तथा सपनों में खो जाता है। सिनेमा ने आरंभ से लेकर वर्तमान तक दर्शकों को उत्साहित करने का काम किया है। सिनेमा समाज का एक अहम् हिस्सा बन चुका है।

भारतीय समाज पर सिनेमा की गहरी छाप देखने को मिलती है। सिनेमा को समाज का दर्पण कहा जाता है क्योंकि लोग सिनेमा में अभिनेताओं और अभिनेत्रियों द्वारा निभाए गए किरदारों में स्वयं की तथा समाज की छवि देखते हैं, समाज उसी रंगरूप में ढ़लने का प्रयास करने लगता है।

भारतीय युवाओं में प्रेम के प्रति आकर्षण उत्पन्न करने की बात हो या सिनेमा के कलाकारों के पहनावे के अनुरूप फैशन का प्रचलन, ये सभी समाज पर सिनेमा के ही प्रभाव हैं। सिनेमा की शुरूआत से ही इसका समाज के साथ गहरा सम्बंध रहा है। प्रारंभ में इसका उद्देश्य मात्र लोगों का मनोरंजन करना भर था। अभी भी अधिकतर फिल्में इसी उद्देश्य को लेकर बनाई जाती हैं, इसके बावजूद सिनेमा का समाज पर गहरा प्रभाव रहा है। अतः कहा जा सकता है कि सिनेमा भारतीय संस्कृति का परिचायक रहा है क्योंकि सिनेमा ने हमेशा ही संस्कृति के विषयों को पर्दे के माध्यम से चित्रित किया है।

सिनेमा समाज को परिवर्तन की दिशा देता है। यह समाज में क्रांति लाने का महत्त्वपूर्ण उपकरण है। जब से सिनेमा का प्रादुर्भाव हुआ है इसने समाज में विद्मान बुराइयों का, जैसे- महिला असमानता, दहेज प्रथा, बहुविवाह, भ्रष्टाचार आदि को आधार बनाकर फिल्मों का निर्माण किया है। इस प्रयास में फिल्मकारों ने सच्ची घटनाओं पर आधारित फिल्मों का निर्माण भी किया है और क्रूर से क्रूर घटनाओं को बड़ी सहजता से पर्दे पर उतारकर फिल्मों द्वारा यथार्थता दिखाने की कोशिश की है। इस संबंध में छपाक फिल्म जो हाल में प्रकाशित हुई है एक उदाहरण है। ऐसी फिल्मों के निर्माण का उद्देश्य यही है कि समाज पर इनका सकारात्मक प्रभाव पड़े। समाज की गंभीर बुराइयों के प्रति लोगों का दृष्टिकोण भी सकारात्मक हो।

ज्वलंत सामाजिक विषयों को पर्दों पर दिखाने का यह प्रयास कोई नया नहीं है, बल्कि पहले भी ऐसे प्रयास किये जाते रहे हैं। 1933 में शांताराम की फिल्म अमर ज्योति एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है, जिसमें स्त्री-पुरूष के अधिकारों की समानता के विषय को प्रमुखता से उठाया गया था। हालाँकि आरम्भिक दौर में भारत में पौराणिक एवं ऐतिहासिक फिल्मों का बोल-बाला रहा, परंतु समय के साथ-साथ सामाजिक, राजनीतिक एवं साहित्यिक फिल्मों ने समाज पर अपना गहरा प्रभाव ड़ाला।

पिछले कुछ दशकों से भारतीय समाज में राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक भ्रष्टाचार में वृद्धि हुई है, इसका असर इस दौरान निर्मित फिल्मों पर भी दिखाई पड़ा है। गुलाल (2009), नायक (2001), राजनीति (2010), डर्टी पोलिटिक्स (2015), सत्याग्रह (2013) आदि प्रमुख फिल्में हैं जिनमें राजनीति की वास्तविकता को प्रदर्शित किया गया है।

यहाँ यह महत्त्वपूर्ण है कि हिंदी सिनेमा ने समाज की लगभग सभी बुराईयों को प्रदर्शित किया है जिससे समाज में उन बुराइयों के प्रति जागरूकता भी आई है लेकिन यह बहुत अफसोसजनक है कि हिंदी सिनेमा में भारतीय समाज की प्रमुख बुराई जाति, जिसके कारण समाज में एक वर्ग सदैव शोषण का शिकार रहा और दयनीय जीवन जीने को मजबूर रहा है, उसे पर्याप्त स्थान नहीं दिया गया। सिनेमा का इतिहास है कि वह कभी समाज के संवेदनशील मुद्दों पर आधारित फिल्मों से दूर नहीं भागा है। समय-समय पर सामाजिक मुद्दों पर आधारित फिल्में दर्शकों के लिए पेश की गई हैं और आज भी ऐसी फिल्मों का निर्माण जोरों पर है जिसके जरिए देश के लोगों को जागरूक कर उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया गया है।

हिंदी सिनेमा में राष्ट्रभक्ति, बेरोजगारी, मजदूर आंदोलन, नारी उत्पीड़न, नारी सशक्तिकरण, राजनीतिक बुराई, आतंकवाद जैसे विषयों को पर्याप्त स्थान दिया गया है। आये दिन इन विषयों पर फिल्में बनती रहती हैं। इन विषयों पर फिल्मों की कोई कमी नहीं है, जैस- राष्ट्रभक्ति पर बहुत सी फिल्में हैं, जिनमें बार्डर (1997), द लेजेंड आफ भगत सिंह (2002), रंग दे बसंती (2006), चक दे इंडिया (2007), लगान (2001), मंगल पांडे (2005), 1942 ए लव स्टोरी (1994), स्वदेश (2004), लक्ष्य (2004), प्रहार (1991), क्रांतिवीर (1994), दीवार (1975), हकीकत (1995), पूरब और पश्चिम (1970), नेताजी सुभाष चन्द्र बोस (2004), मदर इंडिया (1957), नया दौर (1957), हिंदुस्तानी, सात हिंदुस्तानी (1969), गदरः एक प्रेम कथा (2001), पुकार (2000) प्रमुख हैं।

इसी प्रकार हिंदी सिनेमा में बेरोजगारी जैसे विषय को भी खूब जगह मिली है, जैसे- दोस्त (1974), बी.ए.पास (2012), नौकरी (1978), प्यासा (1957), श्री420 (1955), अंकुश (1986), रोटी, कपड़ा और मकान (1974), आज का दौर (1985), फेरी (2000) ये फिल्में प्रदर्शित करती हैं कि स्वतंत्रता के बाद भी भारत बेकारी, बेरोजगारी और भूख से जूझ रहा था।

भारत की आबादी का एक बड़ भाग मजदूर है जो घोर परिश्रम करता है और देश के निर्माण में बहुमूल्य भूमिका निभाता है। मजदूरों के बिना किसी भी औद्योगिक ढ़ाँचे के खड़े होने की कल्पना नहीं की जा सकती। इसलिए श्रमिकों का समाज में अपना ही एक स्थान है, लेकिन, ये बड़े पैमाने पर शोषण का शिकार रहे हैं जिसे हिंदी सिनेमा ने बखूबी पेश किया है। सत्तर के दशक में ऐसी बहुत सी फिल्में बनी जो मजदूरों के शोषण और उनकी समस्याओं को दर्शाती हैं। इनमें नया दौर (1957), पैगाम (1959), नमक हराम (1973), दीवार (1975), काला पत्थर (1979), कूली (1983), मजदूर (1983), लाड़ला (1974), मजदूर जिंदाबाद (1976), कोयला (1997) प्रमुख स्थान रखती हैं। इन फिल्मों ने मजदूरों की समस्याओं को बड़े पर्दे पर उकेरा। उनकी रोजी-रोटी से लेकर पारिवारिक परेशानियों को इन फिल्मों ने बड़ी ही खूबसूरती से दिखाया। इसका प्रभाव समाजवाद के रूप में दिखाई दिया। मजदूरों के कल्याण के लिए कई नीतियाँ व कानून बने।

उपरोक्त विवरण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि हिंदी सिनेमा में समाज में फैली समस्याओं, चाहे वह बेरोजगारी हो या मजदूरों से जुड़ी हो, राजनीतिक भ्रष्टाचार हो या आतंकवाद। हर विषय पर फिल्मों की भरमार है। महिलायें प्राचीन समय से ही शोषण का शिकार रही हैं। उनके अधिकारों को महत्व नहीं दिया जाता। महिलाओं से जुड़े इस पहलू पर भी फिल्मों की भरमार है और इन फिल्मों की वजह से समाज में सकारात्मक बदलाव भी आया है। महिलाओं में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता आई है, साथ ही समाज ने भी उन्हें बेहतर ढ़ंग से स्वीकार किया है। आज समाज में उन्हें अधीनस्थ के रूप में नहीं देखा जाता। अब महिलाओं की रचनात्मक भूमिका को स्वीकारा व सराहा जाता है।

अतः यहाँ मुख्य बिंदु यह है जिस प्रकार हिंदी सिनेमा के माध्यम से महिलाओं की स्थिति में सुधार आया है उसी प्रकार अगर हिंदी सिनेमा जाति के प्रश्न पर भी उत्साह दिखाता तो क्या पता हमारे समाज से जाति समाप्त ही हो जाती।

सामाजिक सरोकारों को लेकर स्वाधीनता आंदोलन और इसके बाद नेहरू की मृत्यु तक भारत में ढेरों फिल्में बनी, परंतु इनमें सदियों से प्रचलित वर्ण एवं जाति व्यवस्था का चित्रण नहीं के बराबर हुआ है।

जाति सवर्णों का एक हथियार है जिसका उपयोग कर इन्होंने दलितों और पिछड़ों के प्रति सदैव उपेक्षा और अपमान का व्यवहार किया है। उन्हें कभी भी अपने बराबर का मनुष्य नहीं माना। गैर-बराबरी के प्रति मुखरित होने वाला भारतीय जाति के प्रश्न पर मौन साध लेता है। जबकि इसी जाति व्यवस्था के कारण निम्न तबका शोषित व अधिकार रहित रहा है। प्राचीन काल से लेकर अब तक उनकी स्थिति वैसी की वैसी है। वे कल भी शोषण का शिकार थे और आज भी शोषण का शिकार हैं, और हिंदी सिनेमा का नजरिया भी इसी संदर्भ में दलितों के प्रति कुछ खास भिन्न नहीं है। समाज की ही तरह हिंदी सिनेमा ने भी इनके साथ उपेक्षित व्यवहार किया है। दलितों के प्रति करूणा दिखाकर वह अछूत कन्या (1936), आदमी (1993), अछूत (1940), सुजाता (1959), बूटपालिस (1954), अंकुर (1974), और सदगति (1981) जैसी फिल्मों का निर्माण तो करता है किंतु जिस तल्खी और सिद्दत से जाति के प्रश्न को उठाए जाने की जरूरत है, उस तरह से नहीं उठाता।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् ऐसा समझा गया था कि संविधान में अस्पृश्यता का अंत, जिसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद-17 में शामिल किया गया है, उससे जाति भारतीय समाज में अदृश्य हो जाएगी, किंतु यह एक कटु सच्चाई है कि आजादी के इतने साल बाद भी जाति हमारे समाज की प्रमुख विशेषता बनी हुई है। अभी तक जाति का पूरी तरह से सफाया नहीं हो सका है। आज भी समाचार-पत्रों में जाति-आधारित वैवाहिक विज्ञापन देखने को मिलते हैं। हिंदी सिनेमा में जाति का प्रश्न हाशिये पर ही रहा है। हालाँकि यहाँ बैंडिट क्विन और गोड़ मदर फिल्में प्रमुख रहीं, जिसमें जाति के प्रश्न को पर्याप्त स्थान दिया गया और दलित चेतना भी दिखाई दी। इस संदर्भ में एक अन्य फिल्म शायद वेलकम टू सज्जनपुर भी एक अहम् फिल्म है, जिसमें शायद पहली बार किसी नायक का नाम महादेव कुशवाहा है और नायिका का नाम कमला कुम्हारन है। इस फिल्म में जाति का चित्रण देखने को मिलता है। वह इस संदर्भ में, नायक की माँ जाति नाम के अनुरूप सब्जी कि दुकान चलाती है और नायिका के यहाँ मिट्टी के बर्तन बनाने का काम होता है।

लेकिन अफसोस की बात यह है कि हिंदी सिनेमा में इस प्रकार की फिल्मों का निर्माण केवल नाम-मात्र का ही मिलता है। हिंदी सिनेमा ने समाज के हर हिस्से को अपनी आवाज दी, तो फिर क्यों यह जाति के प्रश्न पर मौन है। क्यों जाति सम्बंधित फिल्मों का निर्माण नहीं किया जाता। इन सवालों के जवाब क्या हैं। क्या सवर्ण समाज इस विषय पर बनी फिल्मों को स्वीकृति नहीं देता? क्या इस प्रकार की फिल्मों के निर्माण से समाज में स्थापित उनका प्रभुत्त्व खतरे में पड़ जायेगा? ये सब कुछ ऐसे अहम् सवाल हैं जिन पर विचार किया जाना चाहिए। लगान व मंगल पांड़े फिल्म में कचरा व नैनसुख किरदार जाति प्रथा के स्वरूप को अवश्य प्रकट करते हैं लेकिन सिर्फ कुछ ही क्षणों के लिए। आखिर कब तक हिंदी सिनेमा ऐसी फिल्मों के निर्माण से बचता रहेगा।

नंगेली क्रूर और अमानवीय मूलाकरम के खिलाफ कुर्बानी देने वाली एक नीची जाति की महिला थी जिसके बलिदान से समाज में एक आंदोलन शुरू हो गया और आखिरकार विवश होकर मूलाकरम को हटाना पड़ा। जहां आज जीवनी आधारित इतनी फिल्मों का निर्माण हिंदी सिनेमा में हो रहा है वहां इस बेहद वीर महिला को केंद्र में रखकर एक भी फिल्म अभी तक नहीं बनी है।

निष्कर्ष- भारत दुनिया में सबसे अधिक फिल्मों का निर्माण करने वाला देश है और हिंदी सिनेमा अपनी भारतीय संस्कृति को केंद्र में रखकर फिल्मों का निर्माण करने के लिए प्रसिद्ध है। हिंदी सिनेमा में प्रत्येक वर्ष हजारों फिल्मों का निर्माण होता है जिसमें भारत के इतिहास व संस्कृति से संबंधित फिल्में भी शामिल हैं। अभी हाल ही में भारतीय इतिहास पर कई फिल्में बनी हैं, जैसे- तानाजी, पद्मावत, पानीपत, भारत, बाजीराव मस्तानी, मणिकर्णिकाः द क्वीन आफ झाँसी और केसरी, लेकिन इन सबके बीच जाति के प्रश्न पर केवल एक ही फिल्म आई, आर्टिकल-15।

आर्टिकल-15 में आयुष्मान खुराना प्रमुख भूमिका में हैं। यह फिल्म अनुभव सिन्हा के निर्देशन में जाति के विषय पर बनी फिल्म है। इन घटनाओं में 2014 में बदायूँ सामूहिक बलात्कार और 2016 में ऊना में हुई दलित अत्याचार तथा अन्य घटनाएं शामिल हैं। लेकिन यह फिल्म चर्चा के साथ-साथ विवाद का विषय भी बन गई। सवर्णों के एक संगठन ने इसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। जयपुर में भी ब्राह्मण समाज ने इस फिल्म का विरोध किया। डीएनए की खबर के अनुसार उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों के एक संगठन ने इल्जाम लगाया है कि फिल्म के ट्रेलर में उन्हें बुरा दिखाया जा रहा है। ब्राह्मण, पशुराम सेना ने फिल्म को लेकर अपनी नाराजगी प्रकट की है और आरोप लगाया कि फिल्म के मेकर्स ने बदायूँ रेप केस के तथ्यों को बदलने और अपराधियों को ब्राह्मण समाज का दिखाने का प्रयास किया है। उनका कहना है कि इस फिल्म के तथ्यों को इसलिए बदला गया ताकि ब्राह्मण समाज को दुनिया के सामने बुरा दिखाया जा सके।

उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि सवर्ण समाज नहीं चाहता कि जाति के प्रश्न पर कोई फिल्म बने क्योंकि इससे उनकी प्रतिष्ठा और सम्मान को ठेस पहुँचती है। साथ ही अनेक सदियों से स्थापित सामाजिक प्रभुत्त्व पर भी खतरा मंड़राने लगता है। सवर्णों ने सदियों तक दलितों का शोषण किया है जिसके परिणामस्वरूप दलित आज तक भी उस उत्पीडन से उभर नहीं पाये हैं और न ही पूर्ण रूप से अपना विकास कर पाऐं है। उनकी वास्तविक स्थिति को सवर्णों ने हमेशा नजरअंदाज किया है। समाज में वह हाशिये पर पड़े अपना जीवन गुजार रहे हैं।

हिंदी सिनेमा उनकी इस स्थिति में सुधार लाने का एक अच्छा माध्यम बन सकता है, लेकिन फिल्म निर्माता ऐसी फिल्मों के निर्माण से बचते हैं। केवल कुछ ही ऐसे फिल्म निर्माता हैं जिन्होंने समाज के इस वर्ग को ध्यान में रखकर फिल्मों का निर्माण किया है। उस पर भी सवर्ण समाज विरोध जताने लगता है, क्योंकि इस प्रकार की फिल्मों से समाज में उनकी प्रतिष्ठा का ग्राफ प्रभावित होता है।

संदर्भ सूची-

1.Ghurey, G.S. (1961) ‘Caste, Class and Occupation’, Popular Prakashan Bombay.

2.Spivak, G. Chakravorty, Can the subaltern speak.

3.Jodhka, S.S. (2015) ‘Caste in Contemporary India’, Routledge, Delhi.

4.Sharma, Renu. ‘History of Indian cinema’, Diamond Books.

5.Saxena, A. (2014) ‘Indian cinema society and culture’, Kanishka Pulishing House.

6.https://aajtak.intoday/lite/story/ayushmann-khurrana-reacts-on-article- 15-being-called-antibrahmin.

शानू कुमार

पीएच.डी.

बौद्ध अध्ययन विभाग

दिल्ली विश्वविद्यालय

 

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