गोदान और मैला आँचल

गोदान और मैला आँचल की तुलना करते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि प्रेमचंद और रेणु के अपने अपने युग संदर्भ रहे। प्रेमचंद के किसान-मजदूर खासकर किसान, साम्राज्यवादी और सामंती दोनों ताकतों से पीड़ित होने की वजह से दोहरे शोषण का शिकार हैं तो वहीं रेणु के किसान-मजदूरों को साम्राज्यवादी शक्तियों का शिकार नहीं होना पड़ता।

 11 total views

magnifying glass on white table

कोश विज्ञान की उपादेयता

कोश विज्ञान सिर्फ शब्दों का बेतरतीब भंडार या संग्रह नहीं है बल्कि उसे व्यवस्थित बनाकर ही संपूर्ण भाषा को जाना जा सकता है। अतः कोश निर्माण भी अपने आप में अत्यंत श्रमसाध्य प्रक्रिया है अंग्रेजी में केाश विज्ञान को (lexicology) कहा जाता है । कुछ विद्धान इसे (lexicography) भी कहते है।

 115 total views,  42 views today

grayscale photo of human face

आदिवासी कथा साहित्य में स्त्री

योगेन्द्रनाथ सिन्हा, राजेन्द्र अवस्थी, शानी, मेहरुनिशा परवेज आदि लेखक-लेखिकाओं ने इस समाज को लेखनी का विषय बनाया| बंगला लेखिका महाश्वेता देवी के आदिवासी लेखन और उड़िया लेखक गोपीनाथ महंती ने आदिवासी लेखन के हिंदी अनुवादों से भी आदिवासी समाज की तरफ पाठक वर्ग का ध्यान खींचा,लेकिन आदिवासी समाज तथाकथित मुख्यधारा के साहित्य में हाशिये पर ही बना रहा|

 59 total views,  2 views today

आत्मकथा : हिंदी साहित्य लेखन की गद्य विधा- डॉ. प्रमोद पाण्डेय

आत्मकथा हिंदी साहित्य लेखन की गद्य विधाओं में से एक है। आत्मकथा यह व्यक्ति के द्वारा अनुभव किए गए जीवन के सत्य तथा यथार्थ का चित्रण है। आत्मकथा के केंद्र में आत्मकथाकार या किसी भी व्यक्ति विशेष के जीवन के विविध पहलुओं तथा क्रिया-कलापों का विवरण होता है। आत्मकथा का हर एक भाग मानव की जिजीविषा तथा हर एक शब्द मनुष्य के कर्म व क्रिया-कलापों से जुड़ा हुआ होता है। “न मानुषात् श्रेष्ठतर हि किंचित्” अर्थात मनुष्य से बढ़कर कुछ भी नहीं है। आत्मकथा के अंतर्गत आत्मनिरीक्षण, आत्मपरीक्षण, आत्मविश्लेषण, आत्माभिव्यक्ति यह आत्मकथा के द्वारा की जाती है।

 20 total views,  1 views today

dalit sahitya

दलित स्त्री लेखन की उपलब्धियां और सम्भावनाएँ

दलित महिलाओं का शोषण सर्वाधिक हुआ है लेकिन साहित्य की मुख्यधारा में उनका जीवन अनुपस्थित रहा है, मुख्यधारा की बात छोडिए दलित साहित्य में भी वह पर्याप्त प्रतिनिधित्व की भागीदार नहीं बन पाई है।

 48 total views,  2 views today

२१वी सदी की ‘सुशीला’ को चाहिए ‘अनंत असीम दिगंत…..’-प्रो. डॉ. सौ. रमा प्र. नवले

मेहतर समाज की एक छोटी सी लड़की ‘सुशीला’ का अदम्य साहस अचंभित करता है| अत्यंत दरिद्र और सात भाई-बहनों के साथ एक बड़े परिवार में जीनेवाली यह लड़की, पिता के पढ़ाई बंद करने के निर्णय के विरुद्ध उपोषण करती है| एक ओर दरिद्रता और दूसरी ओर निम्न जाति में भी निम्न समझी जानेवाली मेहतर जाति के दंश की पीड़ा लगातार वह भुगतती रही है | ना वह अपनी सहेलियों के साथ बैठ पाई न खेल पाई और ना ही पीएच. डी. जैसी उच्चतम उपाधि पाने के बाद भी ‘झाडूवाली’ शब्द से छुटकारा पा सकी; पर ताज्जुब यह है कि जाति और लिंग भेद के अंधे कुँए के अँधेरे को चीरकर सतरंगी सपने बराबर वह देखती रही है|

 8 total views,  4 views today

silhouette of woman near window blinds

दलित महिला रचनाकारों की आत्मकथाओं में अभिव्यंजित व्यथा- विजयश्री सातपालकर

महिला आत्मकथाकारों में कौशल्या बैसंत्री की ‘दोहरा अभिशाप’ एवं सुशीला टाकभौरे की ‘शिकंजे का दर्द’ उल्लेखनीय है। पुरुष लेखक की तुलना में दलित लेखिकाओं की आत्मकथाएं उतनी मात्र में उपलब्ध नहीं है। भारतीय वर्ण व्यवस्था के तले दलित स्त्रियाँ ने मानसिक एवं शारीरिक पीड़ा की दोहरी मार सही है। प्रस्तुत लेख में कौशल्या बैसंत्री कृत ‘दोहरा अभिशाप’ और सुशीला टाकभौरे कृत ‘शिकंजे का दर्द’ आत्मकथाओं में अभिव्यक्त व्यथा का चित्रण किया गया है।

 13 total views,  1 views today

people standing on stage with lights turned on during nighttime

हिंदी कहानी का नाट्य रूपांतरण – कथानक के स्तर पर: चंदन कुमार

कहानियों में भाव बोध को अपनी भाव भंगिमा के साथ प्रस्तुत करना उसका नाट्य रूपांतरण है । विभिन्न प्रकार से घटना, कथा अथवा कहानी कहने की शैली रूपांतरण की जननी है । वर्तमान समय में रूपांतरण एक अनूठी कला की तरह है जो वर्तमान समय में खूब हो रहा है । कविताओं और कहानी का नाटक में, कहानी और नाटक का फिल्मों में रूपांतरण तेज़ी से हो रहा है । अभिव्यक्ति और कथानक को नए रूप में परिवर्तित कर के मंच पर लाया जा रहा है । ध्यातव्य हो कि एक विधा से दूसरी विधा में परिवर्तित होने पर भाषा, काल, दृश्य, संवाद भी बदल जाते हैं । यह बदलने के साथ मर्म को उसी अभिव्यक्ति से साथ प्रस्तुत करना ही नाट्य रूपांतरण को सही अर्थ देता है ।

 113 total views,  3 views today

लोकप्रिय साहित्‍य की अवधारणा- सुशील कुमार

साहित्‍य के दो रूप मिलते हैं- एक, लोकप्रिय साहित्‍य और दूसरा, कलात्‍मक साहित्‍य। कलात्‍मक साहित्‍य को गंभीर साहित्‍य माना जाता है, जबकि लोकप्रिय साहित्‍य को सतही साहित्‍य। साधारणत: माना जाता है कि जो साहित्‍य व्‍यापक जनसमुदाय के बीच सहज रूप में स्‍वीकृत और ग्राह्य हो, वह लोकप्रिय साहित्‍य है। सहजता, सरलता और सुबोधता ऐसे साहित्‍य के अनिवार्य गुण माने जाते हैं। लेकिन कोई साहित्‍य व्‍यापक जनसमुदाय के बीच सिर्फ सहजता, सरलता और सुबोधता के कारण लोकप्रिय नहीं होता। वह साहित्‍य व्‍यापक जनसमुदाय के बीच लोकप्रिय तभी होगा, जब उसका जुड़ाव आम जन से होगा।

 15 total views,  2 views today

तेजेन्द्र शर्मा की कहानियों का विशिष्ट एवं नवीन अनुभव संसार

समकालीन हिन्दी लेखको में तेजेन्द्र
शर्मा अपनी अलग पहचान बनाने में सफल रहे है। उनकी कहानियों की विशिष्टता का कारण सिर्फ
उनका प्रवासी परिवेश से युक्त होना ही नहीं, बल्कि विदेश प्रवासरत आम लोगों के जीवन को नए दृष्टिकोण से देखना है।

 5 total views,  2 views today