जनता कर्फ्यू

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जनता-कर्फ्यू
पात्र
माँ
पुंडू (10 -12 वर्ष का एक बालक)
(मंच सज्जा : ड्राइंग रूम का दृश्य : एक सोफे पर बैठी माँ, सामने रखी सेंटर-टेबल पर बिछे अख़बार पर फैला कर रखी सब्जियों को साफ़ कर रही है. बीच बीच में सोफे पर रखा मोबाईल उठाकर उसको ऐसे देखती है मानों किसी के व्हाट्स-अप संदेश पढ़ रही हो. तभी मंच पर पुंडू आता है. उसके हाथ में क्रिकेट खेलने का बैट है, जिससे वह हवा में ही किसी अदृश्य गेंद को मारने का अभ्यास कर रहा है.)
पुंडू : माँ! आज मेरी छुट्टी है.
माँ : हाँ बेटा! आज सबकी छुट्टी है.
पुंडू : पापा की भी ?
माँ : हाँ..
पुंडू : पर पापा तो रोज ऑफिस जाते हैं.
माँ : पर अब सब अपने घर पर रहेंगे.
पुंडू : वाह ! तब तो मजा आ जायेगा. अभी तो मैं अपने दोस्तों के साथ खेलने बाहर जा रहा हूँ.
( कहकर पुंडू बाहर जाने को उद्धत होता है . माँ उसे जाने से रोकने के लिए कहती है.)
माँ : नहीं ! आज घर पर ही खेलो.
(पुंडू थोड़ा ठहरकर)
पुंडू : मैं अभी आ ही रहा हूँ. बस, थोड़ी देर राहुल के साथ क्रिकेट खेलने के बाद सीधा घर आ जाऊँगा.
(कहकर पुंडू फिर बाहर जाने लगता है, मगर माँ फिर उसे जाने से मना कर देती है.)
माँ : नहीं बेटा! आज घर से बाहर नहीं जाना..
पुंडू : मगर क्यों… आज तो छुट्टी है ना..
माँ : छुट्टी तो है मगर फिर भी…
पुंडू : फिर क्यों ?
(कहते हुए पुंडू अपनी माँ के पास ही सोफे पर बैठ जाता है.)
माँ : क्योंकि आज जनता-कर्फ्यू है .
पुंडू : जनता-कर्फ्यू … मतलब..
माँ : तुम्हें पता है अभी एक बीमारी पूरी दुनिया में फैली हुई है..
पुंडू : हाँ, वो तो मुझे पता है..
माँ : क्या नाम है उसका ..
पुंडू : कोरोना ..कोरोना नाम है …रोज तो टीवी पर आता है…
माँ : ये कोरोना बड़ी खतरनाक बीमारी है.
पुंडू : हाँ, यह तो हमारे सर भी बता रहे थे.
माँ : क्या बताया है सर ने …
पुंडू : वो बता रहे थे कि यह बीमारी चीन की वुहान नामक जगह के बहुत से लोगों को मारने के बाद धीरे-धीरे पूरी दुनिया में पहुँच गयी है.
माँ : बिल्कुल ठीक ! सही कहा तुम्हारे सर ने..
पुंडू : हाँ , सर कह रहे थे कि जब तक कोरोना रहेगा, तुम्हारी छुट्टी है..
माँ : अच्छा ! तुम ही बताओ, कोई बीमार होता है तो छुट्टी कौन लेता है ?
पुंडू : जो बीमार होता है..
माँ : और बाकी लोग ?
पुंडू : वो तो स्कूल आते हैं…
माँ : फिर तुम्हारी छुट्टी क्यों की गई ?
पुंडू : ये तो मुझे नहीं पता..
माँ : इसलिए कि जो स्वस्थ हैं वे बीमार न् पड़ें..
पुंडू : अच्छा मम्मी, अभी तो मैं खेल के आता हूँ , फिर सारी बातें सुनूंगा ..
(कहकर पुंडू एक बार फिर बाहर जाने के लिए सोफे से उठने लगता है तो उसकी माँ उसका हाथ पकड़ कर उसे फिर सोफे पर बिठा देती है.)
माँ : नहीं ! बताया तो है कि जनता-कर्फ्यू है…
पुंडू : फिर वही जनता-कर्फ्यू ? ये है क्या ?
माँ : कोरोना जैसी भयानक बीमारी एक व्यक्ति से दूसरे में न फैले, इसके लिए हर व्यक्ति का एक दूसरे से दूर रहना बहुत जरूरी है. हम सब लोग अपने-अपने घरों में रहकर बीमारी को फैलने से रोकेंगे.
पुंडू : पर मम्मी ! मेरा दोस्त तो बिल्कुल ठीक है. उसके साथ खेलने से मैं बीमार नहीं हो सकता.
माँ : तुम्हारी बात ठीक है पर यह जो कोरोना है ना, इसके वायरस बहुत ही जिद्दी किस्म के हैं. यह किसी भी वस्तु पर पहुँच जाते हैं तो वहाँ 10-12 घंटे तक जिंदा रह सकते हैं और उस जगह को जरा सा भी छू लेने वाले व्यक्ति को भी यह बीमार कर सकते हैं. लेकिन 12 घंटे तक कोई जीवित प्राणी इन्हें न् छुए तो यह वायरस स्वयं ही खत्म हो जाता है.
पुंडू : तो मम्मी मैं तो बाहर बस खेलूँगा. किसी और चीज को मैं बिल्कुल भी नहीं छुऊँगा…
(पुंडू फिर से उठने का उपक्रम करता है. इस बार माँ उसका क्रिकेट-बैट उससे लेकर सोफे के किनारे रख देती है.)
मम्मी : नहीं ! गार्डन में, पार्क की बेंच, दरवाजे, फेंसिंग और रेलिंग में कहीं भी यह वायरस हुआ तो वहाँ जाने वालों के साथ उनके घर जा सकता है. इसीलिए तो सबने मिलकर निश्चय किया है कि सब 14 घंटे तक अपने घरों में ही रहेंगे. अपने-आप सारी जनता का अपने घरों में बन्द रहना ही जनता-कर्फ्यू है.
पुंडू : अब मैं सब समझ गया. मैं अपने दोस्तों को अभी फोन करता हूँ….
(पुंडू मम्मी के पास रखा मोबाईल उठा लेता है.)
माँ : किसलिए…
पुंडू : उन्हें भी घर पर रहकर जनता-कर्फ्यू को सफल बनाना होगा.
(सभी दर्शकों को संबोधित करते हुए पुंडू हाथ की मुट्ठी बंधकर हवा में लहराते हुए नारा लगता है.)
कोरोना तब नहीं रहेगा जब बच्चे खेलें घर के भीतर .
जनता-कर्फ्यू के प्रभाव से भाग जाये कोरोना डरकर …
(पुंडू फोन पर नंबर मिलाने लगता है, और पर्दा गिर जाता है.)

गंगा धर शर्मा ‘हिन्दुस्तान’
472 बी के कौल नगर, अजमेर (राज.)
मोबाईल नं. : 9414368582

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नाट्यशास्त्रोक्त लक्षण एवं नाटक में उसकी उपादेयता: आशुतोष कुमार

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नाट्यशास्त्रोक्त लक्षण एवं नाटक में उसकी उपादेयता

आशुतोष कुमार

पी. एच. डी., शोधार्थी

संस्कृत विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय

दिल्ली – 110007

मो० – 9013271218

Email:  ashutoshjnu64@gmail.com

 

सारांश

नाट्य में वाचिक अभिनय का महत्त्वपूर्ण स्थान है इसे नाट्य का शरीर कहा गया है, क्योंकि नाटककार इसी के माध्यम से अपनी कथावस्तु को दर्शकों के सम्मुख प्रस्तुत करता है। नाट्यशास्त्र में  वाचिक अभिनय के अन्तर्गत ही षट्त्रिंशत् लक्षण वर्णित है। इनकी संयोजना से वाणी में वैचित्र्य की सृष्टि होती है, जिससे प्रेक्षागृह में बैठे दर्शक विस्मित तथा आनन्द विभोर हो जाते हैं। भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र के 16 वें अध्याय में 36 लक्षण बताया है। इन्हीं लक्षणों से परवर्ती काल में अलंकारों का भी विकास हुआ। अलंकार काव्य के बाह्य सौन्दर्य को बढाता है तो लक्षण उसके आन्तरिक सौन्दर्य में वृद्धि करता है। प्रस्तुत शोध प्रपत्र के माध्यम से नाट्यशास्स्त्र में निरूपित लक्षण एवं इसके स्वरूप तथा नाट्य में इसकी उपयोगीता को बताया गया है।

 

कूटशब्द

वाचिकाभिनय, लक्षण, काव्यबन्ध, भूषणसम्मित, भावार्थगत

 

आमुख

नाट्यशास्त्र काव्य एवं कला कला का विश्वकोश है साथ ही सिद्धान्त एवं व्यवहार दोनों पक्षों की विराट चेतना का अप्रतिम संग्रह है। नाट्यशास्त्र कोपंचम वेदभी कहा जाता है।[1] इसमें नाट्य सम्बन्धी ज्ञान के अतिरिक्त प्राचीन भारत की कला एवं संस्कृति का विस्तृत परिचय प्राप्त होता है। नाट्य में प्रयुक्त अभिनय , संगीत, नृत्य, वाद्य, वास्तु, मूर्ति, चित्र, पुस्तक आदि विविध कलाओं एवं अनेक प्रकार के शिल्पों का भी परिनिष्ठित एवं व्यापक विवेचन नाट्यशास्त्र में हुआ है। साथ ही प्रसंगानुसार नाट्याभिनय एवं नाट्यलेखन के साधनभूत, सौन्दर्यशास्त्र, काव्य तथा व्याकरण इन विषयों पर भी विचार हुआ है। भरतमुनि कृत नाट्यशास्त्र में चार प्रकार के अभिनय[2] बताये गये हैं- (i) आङ्गिक, (ii) वाचिक, (iii) सात्त्विक तथा (iv) आहार्य।[3] इनमें वाचिक अभिनय के प्रसङ्ग में ३६ लक्षण वर्णित हैं। नाट्य में वाणी के माध्यम से संवादों का कथन और काव्य की प्रस्तुति को वाचिक अभिनय कहते हैं। यह अभिनय पूरी अभिनय कला का प्राण है। वाचिक अभिनय काव्यार्थ या नाट्यार्थ की सम्पूर्ण अभिव्यक्ति में सहायक होता है। आचार्य भरतमुनि का कथन है कि कवि के द्वारा काव्यादि निर्माण तथा अभिनेता के द्वारा प्रयोग के अवसर पर शब्दों पर विशेष प्रयत्न करना चाहिए क्योंकि यही सम्पूर्ण नाट्य प्रदर्शन का कलेवर है। अंग, नेपथ्य रचना तथा सत्वाभिनय वाक्यार्थों को ही अभिव्यक्त करते हैं। वाचिक अभिनय में रस और भावों के अनुरूप वाणी का अनुकरण किया जाता है। भरतमुनि ने वाचिक अभिनय के सन्दर्भ में पाठ्य पर विशेष ध्यान दिया है। उन्होंने वाचिक अभिनय के आरम्भ में दो प्रकार के पाठ्य बताया है- i) संस्कृत पाठ्य एवं ii)  प्राकृत पाठ्य। संस्कृत पाठ्य के अन्तर्गत वर्ण निरूपण, व्यञ्जन और उनके स्थान स्वर तथा उनका परिमाण, शब्दों के विभेद, छन्द, अलङ्कार, नाट्य रचना के अङ्गीभूत छत्तीस लक्षण और काव्य के गुण, दोष का विस्तृत विवेचन किया गया है। वाचिक अभिनय के प्रसंग में ही काव्यबन्ध के स्वरूप का विवेचन किया है। काव्यबन्ध का तात्पर्य नाट्यकृति से है, जिसे पाठ्य नाम से भी अभिहित किया जाता है। यह पाठ्य (नाट्यकृति) वस्तुत: कविकृत एक प्रसिद्ध या कल्पित वर्णन होता है, जिसे संवाद के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। दर्शकदीर्घा (Auditorium) में बैठे हुए प्रेक्षकवर्ग (Audience) का इस पाठ्य (नाटक) के प्रति अनुराग हो, अथवा पाठ्य के माध्यम से उनके हृदय में आनन्दातिरेक की सृष्टि की जा सके, उसके लिए पाठ्य का सुसज्जित एवं सुसंगठित होना अत्यावश्यक है। पाठ्य को सुसज्जित एवं उत्कृष्ट बनाने के लिए काव्य के उत्कर्षक तत्त्वों का निर्देश दिया गया है। ये संख्या में मुख्यत: तीन बताये गये हैं- (i) लक्षण, (ii) अलंकार एवं (iii)गुण।

नाट्यशास्त्रकार आचार्य भरतमुनि की दृष्टि में काव्यलक्षण काव्यबन्ध के अति महत्त्वपूर्ण तत्त्व हैं। काव्यबन्ध अर्थात् नाटक को लक्षणों से युक्त होना ही चाहिए।[4] उन्होंने काव्यलक्षण की कोई निश्चित परिभाषा प्रदान नहीं की, किन्तु नाट्यशास्त्र के 16 वें अध्याय के आरम्भ में षट्त्रिंशत् लक्षणों के नाम परिगणना के पश्चात् इसे “भूषणसम्मित” एवं “भावार्थगत” कहकर इसके रसानुकूल प्रयोग का प्रतिपादन किया है।[5] अर्थात् ये लक्षण नाटक में रस मे बाधक न हों अपितु रसनिष्पत्ति में सहायक हों।

नाट्यशास्त्र के टीकाकार आचार्य अभिनवगुप्त काव्यलक्षण की महत्ता बताते हुए कहते हैं कि- “लक्षण काव्यरूपी भवन की भित्तियां हैं। छन्दोयोजना इस भवन की आधार भूमि है, गुण और अलंकार इस भित्ति के चित्र हैं तथा दशरूपक इसकी खिडकियां हैं।”[6] उनके अनुसार लक्षण काव्यभवन के भित्तिस्वरूप हैं। इस पर गुण एवं अलंकार भित्तिचित्र की भांति हैं। स्पष्ट है कि लक्षण का अलंकार से पूर्व वर्णन किया जाना, लक्षण की प्रमुखता को प्रदर्शित करता है। आधुनिक संस्कृत विद्वान प्रो० रेवाप्रसाद द्विवेदी ने अभिनवगुप्त के विचार की समीक्षा करते हुए कहा है कि “लक्षण को भित्ति न मानकर भित्ति पर किया गया सुधालेप मानना चाहिए। यह लेप ही चित्र का मूल आधार होता है। इसके बिना चित्र फलक चित्र रचना के योग्य नहीं बन पाता है”।[7]

जिस प्रकार अलंकार से सुसज्जित रमणी सुन्दर एवं आकर्षक होती है उसी प्रकार इन लक्षणों से युक्त काव्य सुन्दर एवं रोचक होता है। इनकी संयोजना से वाणी में वैचित्र्य की सृष्टि होती है, जो सामाजिक को विस्मित और आनन्द विभोर कर देता है। नाट्यशास्त्रकार ने वाचिक अभिनय के इन्हीं विशेषताओं को ध्यान में रखकर नाट्यशास्त्र के 14 से 19 वें अध्याय तक वाचिक अभिनय का वर्णन किया है। पूरे 16वें (कतिपय संस्करणों में 17 वें) अध्याय में सिर्फ लक्षण ही वर्णित है। नाट्यशास्त्र में वर्णित षट्त्रिंशत् लक्षण निम्नलिखित हैं[8]

1.विभूषण, 2.अक्षरसंघात, 3.शोभा, 4.अभिधान, 5.गुणकीर्तन, 6.प्रोत्साहन, 7.उदाहरण, 8.निरुक्त, 9.गुणानुवाद, 10.अतिशय, 11.हेतु, 12.सारूप्य, 13.मिथ्याध्यवसाय, 14.सिद्धि, 15.पदोच्चय, 16.आक्रन्द, 17.मनोरथ, 18.आख्यान, 19.याञ्चा, 20.प्रतिषेध, 21.पृच्छा, 22.दृष्टांत, 23.निर्भासन, 24.संशय, 25.आशी:, 26.प्रियवचन, 27.कपटसंघात, 28.क्षमा, 29.प्राप्ति, 30.पश्चाताप, 31.अनुवृत्ति, 32.उपपत्ति, 33.युक्ति, 34.कार्य अर्थापत्ति, 35.अनुनीति तथा 36.परिवेदन।

शोभा’ नामक लक्षण

सिद्धैरर्थै:   समं कृत्वा ह्यसिद्धोऽर्थ: प्रसाध्यते।

यत्र श्लक्ष्णविचित्रार्था: सा शोभेत्यभिधीयते॥[9]

अर्थात् जहां सिद्ध पदार्थों से तुलना कर असिद्ध पदार्थ को भी सिद्ध किया जाता है, तदनन्तर उससे जो आह्लादक व विचित्र अर्थ निकलता है वह शोभा नामक लक्षण है। जैसे अभिज्ञानशाकुन्तलम् नाटक के द्वितीय अङ्क में मृगयाविहार के अवसर पर सेनापति राजा दुष्यन्त से कहता है-

मेदश्छेदकृशोदरं        लघु भवत्युत्थानयोग्यं   वपु:,

सत्त्वानामपि    लक्ष्यते  विकृतिमच्चितं  भयक्रोधयो:

उत्कर्ष: स च धन्विनां यदिषव: सिध्यन्ति लक्ष्ये चले,

मिथ्यैव व्यसनं  वदन्ति  मृगयामीदृग्विनोद: कुत:[10]

अर्थात् (मृगया के श्रम से) व्यक्ति चर्बी कम हो जाने के कारण पतले उदर वाला शरीर हल्का और फुर्तीला होकर उद्योग करने योग्य हो जाता है। जीवों के भय और क्रोध में विकृत हुये मन का भी परिज्ञान हो जाता है(अर्थात् निरन्तर देखते रहने से जीवों की चेष्टाओं को देखकर उनकी भय युक्त अथवा क्रोध युक्त अवस्था का ज्ञान हो जाता है)। धनुर्धारियों के लिये यह उत्कर्ष की बात है कि उनके बाण चल लक्ष्य पर भी सफल होते हैं अर्थात् चुकते नहीं (और यह निपुणता मृगया के अभ्यास से ही आती है)। अत: लोग व्यर्थ ही मृगया को व्यसन कहते हैं; भला ऐसा मनोरञ्जन अन्यत्र कहां। परिश्रम से लाभ सिद्ध है, उसके योग से मृगया रूप व्यसन को भी सिद्ध रूप में दिखलाया गया है। इस प्रकार यहां परिश्रम सिद्ध कर्म से मृगया (शिकार करना) असिद्ध (त्याज्य) कर्म की तुलना करके असिद्ध को भी सिद्ध किया गया है। यहां किसी अलंकार के कारण नहीं अपितु कवि ने शब्द-व्यापार योजना इस प्रकार की है जिससे मनोरम हृदय आह्लादक अर्थ निष्पन्न हो रहा है।[11] अतएव स्पष्ट है कि उक्त पद्य में शोभा नामक लक्षण के अनुप्रयोग से ही चारूता उत्पन्न हुई हैं।

            आचार्य भरतमुनि के उक्त विवेचन से स्पष्ट है कि लक्षण काव्य और नाट्य दोनों के महत्त्वपूर्ण अङ्ग थे। ये काव्यलक्षण प्रारम्भ में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण थे किन्तु शनै: – शनै: अलंकार, गुण, रीति, वृत्ति आदि के प्रभाव में धूमिल होते चले गये। अभिनवगुप्त के अनुसार रीति, वृत्ति, गुण, अलंकार  आदि जिस रूप में काव्य के अंग है लक्षण उस रूप में नहीं आते हैं। भोज, शारदातनय, शिंगभूपाल, विश्वनाथ, और राघवभट्ट जैसे अनेक प्रमुख काव्याचार्यों ने भी इन लक्षणों के महत्त्व को स्वीकार किया है, इनसे भरतोक्त छत्तीस काव्य लक्षणों का महत्त्व और अधिक बढ जाता है। आचार्य अभिनवगुप्त ने अपने पूर्ववर्त्ती दस आचार्यों का मत इस सम्बन्ध में उद्धृत किया है[12], जो  संक्षेप में इस प्रकार हैं-

  • लक्षण काव्य का शरीर है। इनके द्वारा कथावस्तु के शरीर में वैचित्र्य का प्रादुर्भाव होता है। ये लक्षण गुण और अलंकार के बिना ही अपने सौभाग्य से सुशोभित होते हैं। यह अलंकार के समान सौन्दर्य के अधायक तत्त्व है। यही काव्य शरीर की निसर्ग सुन्दरता है। लक्षण अलंकार की निरपेक्ष सौन्दर्य का प्रसार करते हैं।
  • नाट्यकथा के संध्यंग रूप अंश ही ये काव्यलक्षण हैं। लक्षण का संबन्ध नाटकादि के इतिवृत्त से है, काव्य मात्र से नहीं।
  • अभिधा का त्रिविध व्यापार ही लक्षण का विषय होता है। कवि किसी विशिष्ट विचार और कल्पना को दृष्टि में रखकर काव्य की रचना करता है। यह आवश्यक नहीं कि काव्य का भरत सम्मत प्रत्येक लक्षण प्रत्येक दशा में या प्रत्येक काव्य रचना का लक्षण बने। क्योंकि नारी के स्तनों की स्थूलता उसका सौन्दर्यधायक लक्षण है, किन्तु जब यही मोटाई कटि में हो तो वह कुलक्षणा हो जाती है।

आगे इन छत्तीस लक्षणों पर विचार करते हुए अभिनवगुप्त ने कहा है कि ये लक्षण काव्य या नाट्य के अंगभूत हैं। जैसे महापुरुष के अंगों में महानता के लक्षण होते हैं उनसे पुरुष का स्वाभाविक सौन्दर्य निखरता है, जो पुष्पमाला आभूषणादि से भिन्न होते हैं।

            इस प्रकार स्पष्ट है कि नाट्यशास्त्र मे  बताये गये 36 लक्षण काव्य या नाट्य के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। इसी के द्वारा काव्य में सौन्दर्य की वृद्धि होती है जो नाटक को सहृदय आह्लादकारी बनाती है। वर्तमान नाट्ककार या काव्यकार के लिए भी आज उतना ही प्रासङ्गिक है यदि इन ३६ लक्षणों को ध्यान में रखकर नाटकादि लिखा जाए तो अवश्य ही विशिष्ट रचना होगी जिससे पाठक अथवा दर्श आनन्द-विभोर होंगे। अतएव भरतमुनि द्वारा प्रतिपादित ३६ लक्षण वर्तमान में भी अत्यन्त उपयोगी है।

सन्दर्भ ग्रन्थसूची

  • कुमार, कृष्ण. अलंकारशास्त्र का इतिहास. मेरठ: साहित्य भण्डार, 2010
  • द्विवेदी, दशरथ, संस्कृत काव्यशास्त्र में अलंकारों का विकास. नई दिल्ली: राधा पब्लिकेशन्स, 2003
  • दीक्षित, सुरेन्द्रनाथ. भरत और भारतीय नाट्य परम्परा. दिल्ली: नेशनल पब्लिशिंग हाउस, 1973
  • नारायण, जयप्रकाश. नाट्यशास्त्र में काव्यलक्षण. दिल्ली: अमर ग्रन्थ पब्लिकेशन्स, 2014
  • भरतमुनि, नाट्यशास्त्र. सम्पा. रविशंकर नागर, दिल्ली: परिमल पब्लिकेशन्स, 1984
  • भरतमुनि, नाट्यशास्त्र. सम्पा. बाबुलालशुक्ल शास्त्री, वाराणसी: चौखम्बा संस्कृत सीरिज, 1978
  • भरतमुनि, नाट्यशास्त्र. अभिनवभारती टीका सहित. सम्पा. पारसनाथ द्विवेदी, वाराणसी: सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, 2001
  • विश्वनाथ, साहित्यदर्पण. हिन्दी व्या. शालिग्राम शास्त्री, दिल्ली: मोतीलाल बनारसी दास, 1977

[1] न वेद व्यवहारोऽयं संश्राव्य: शूद्रजातिषु।

  तस्मात् सृजापरं वेदं पञ्चमं सार्ववर्णिकम्॥ नाट्यशास्त्र, १.९२

[2] अभिपूर्वस्य णीञ् धातुराभिमुख्यार्थनिर्णये।

 यस्मात् प्रयोगं नयति तस्मादभिनय: स्मृत:॥ नाट्यशास्त्र, 8.6

[3] आङ्गिको वाचिकश्चैव ह्याहार्य: सात्विकस्तथा।

  चत्वारोऽभिनया ह्येते विज्ञेया नाट्यसंश्रया:॥ वही, 6.24

[4] काव्यबन्धास्तु कर्त्तव्या: षट्त्रिंशल्लक्षणान्विता:।

[5] षट्त्रिंशदेतानि तु लक्षणानि प्रोक्तानि भूषणसम्मितानि।

  काव्येषु भावार्थगतानि तज्ज्ञै: सम्यक् प्रयोज्यानि यथारसं तु॥ नाट्यशास्त्र, 16.42

[6] नाट्यशास्त्र, अभिनवभारती टीका, 15.227

[7] नारायण, जयप्रकाश, नाट्यशास्त्र में काव्यलक्षण, पृ० 54

[8] विभूषणञ्चाक्षरसंहितश्च शोभाभिमानौ गुणकीर्तनञ्च।

प्रोत्साहनोदाहरणे निरुक्तं गुणानुवादोऽतिशय: सहेतु:॥१॥

सारूप्य-मिथ्याध्यवसायसिद्धि-पदोच्चयाक्रन्दमनोरथाश्च।

आख्यानयाञ्चाप्रतिषेधपृच्छादृष्टान्तनिर्भासनसंशयाश्च॥२॥

आशी: प्रियोक्ति: कपट: क्षमा च प्राप्तिश्च पश्चात्तपनं तथैव।

अथानुवृत्तिर्ह्युपपत्तियुक्ती कार्योऽनुनीति: परिवेदनञ्च॥३॥

षट्त्रिंशदेतानि तु लक्षणानि प्रोक्तानि वै भूषणसम्मितानि।

काव्येषु भावार्थगतानि तज्ज्ञै: सम्यक्प्रयोज्यानि यथारसं तु॥४॥नाट्यशास्र् १६.१-४

[9] नाट्यशास्त्र, 16.6

[10] अभिज्ञानशाकुन्तलम्, 2.5

[11] न चात्रालङ्कार: कश्चिदपि तु कविव्यापारेण य: शब्दार्थव्यापारादेवार्थघटनात्मा तत्कृतं हृद्यं लक्षणमेव। अशोभनोऽप्यर्थोऽमुना न्येन शोभेत इति शोभेयमुक्ता। अभिनवभारती, 16.7

[12] नाट्यशास्त्र, अभिनवभारती टीका- 16.1

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महात्‍मा जोतीराव फुले द्वारा रचित मराठी रंगमंच का पहला नाटक – ‘तृतीय रत्‍न‘: डॉ. सतीश पावड़े


महात्‍मा जोतीराव फुले द्वारा रचितमराठी रंगमंच का पहला नाटक – ‘तृतीय रत्‍न‘

— डॉ. सतीश पावड़े 
महात्‍मा जो‍तीराव फुले की रचनाओं में ‘तृतीय रत्‍न’ नाटक की चर्चा कई बार होती थी। किंतु प्रत्‍यक्ष में इस नाटक की ‘संहिता’(script) उपलब्‍ध नहीं थी। फुले के चरित्रकार पंढरीनाथ पाटील के निजी संग्रह से यह नाट्यकृति आखिरकार फुले के साहित्‍य के अनुसंधानकर्ताओं ने प्राप्‍त की। महात्‍मा फुले के हस्‍ताक्षरों में लिखी गयी इस पांडुलिपि ने सही मायने में नाटककार फुले का परिचय करवाया। महात्‍मा फुले समता प्रतिष्‍ठान के मुखपत्र ‘पुरोगामी सत्‍यशोधक’ में अप्रैल-जून 1979 के अंक में पहली बार यह नाट्यकृति प्रकाशित की गयी। अखंड, पवाडे, वैचारिक साहित्‍य के साथ फुले द्वारा लिखित इस नाटक ने भी सामाजिक जन-जागरण में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई है। 
महाराष्‍ट्र में सामाजिक-सांस्‍कृतिक परिवर्तन के लिए संघर्ष करने वाले, जीवन के अंतिम क्षणों तक ‘बहुजन हिताय- बहुजन सुखाय’ इस बुद्धवचन के अनुसार अपना जीवन समर्पित करने वाले इस महामानव के मानवीय मूल्‍यों का दृष्टिकोन ‘तृतीय रत्‍न’ इस नाटक में भी दिखाई देता है। शुद्रातिशूद्र समाज के जागरण हेतु, उनमें चेतना जगाने के लिए इस नाटक की रचना फुले ने की। इस नाटक के माध्‍यम से उन्‍होंने ब्राह्मणवर्ग द्वारा किए जा रहे शोषण का वास्‍तव प्रस्‍तुत किया है। धर्म के नाम पर विविध आडंबर, खोखली परंपराएं तथा धार्मिक मूल तत्‍वों की गुलामी आदि पर फुले ने इस नाटक द्वारा तीखा प्रहार किया है। 
‘तृतीय रत्‍न’ नाटक का विषय, आशय, रचना, पात्र, शैली, आकृतिबंध, संवाद आदि सभी एकक चिकित्‍सा का विषय बनना स्‍वाभाविक था। मराठी रंगमंच के उदय के इतिहास को इस नाटक ने चुनौती दी है। डेढ़ सौ साल के वनवास के पश्‍चात इस नाटक ने अपनी क्रांतिकारी छवि सिद्ध की है। मराठी रंगमंच का पहला नाटक, आद्य नाटक इस रूप में कई अनुसंधानकर्ताओं ने इस नाटक को लाकर खड़ा कर दिया है। इतना ही नहीं तो उसके समर्थन में कई पुरजोर दलीलें, सबूत भी प्रस्‍तुत किए हैं। 


मराठी रंगमंच का उदय
कर्नाटक के उत्तरी क्षेत्र में स्थित ‘भागवत मंडली के खेल’ 1840 के आसपास पश्चिम महाराष्‍ट्र में खेले जाते थे। यह खेल कनार्टकी यक्षगान शैली से निर्मित थे। यह खेल उबड़खाबड़ तथा ठेठ गवार के स्‍वरूप में थे। इन खेलों को उस समय ‘तागडथोमऽऽऽ’ अथवा ‘अललर्डुरऽऽऽ’ खेल भी कहा जाता था। मनोरंजन हेतु दूसरा कोई पर्याय न होने के कारण यह खेल बहुत ही लोकप्रिय थे। सांगली संस्‍थान के तत्‍कालीन संस्‍थानिक श्रीमंत आप्‍पासाहब पटवर्धन के दरबार में इन खेलों का प्रदर्शन होता था। किंतु यह खेल उनको संतुष्‍ट नहीं कर पाते थे। उन्‍हें ऐसा खेल चाहिए था जो उनका अच्‍छा मनोरंजन कर सके। 
श्रीमंत के दरबार में भावे नामक सरदार थे। उनके सुपुत्र विष्‍णुदास भावे एक कलाकार थे। वे कविताएं लिखते, आख्‍यानों की रचना करते, उसे गाते भी थे। साथ ही वे कठपुतलियों का खेल भी करते थे। श्रीमंत ने विष्‍णुदास को दरबार में बुलाकर नया खेल प्रस्‍तुत करने का आदेश दिया और साथ में इस कार्य के लिए राजाश्रय भी। विष्‍णुदास ने उन्‍हीं पुराने खेलों का अध्‍ययन कर यक्षगान, भागवत का मिश्रण कर 5 नवंबर 1843 को ‘सीता स्‍वयंवर आख्‍यान’ का खेल श्रीमंत के दरबार में प्रस्‍तुत किया1 आज यही दिवस मराठी रंगमंच के स्‍थापना दिन के रूप में मनाया जाता है। 
‘सीता स्‍वयंवर’ यह आख्‍यान पौराणिक विषय पर आधारित था। यह खेल बहुत लोकप्रिय हुआ। विष्‍णुदास भी रुके नहीं, इन पौराणिक नाटकों की परंपरा आगे चलती रही। विष्‍णुदास के कार्य से प्रेरित होकर अन्‍य कई मंडलियाँ स्‍थापित की गयी। 1861-62 साल तक पौराणिक आख्‍यान नाटकों की लोकप्रियता चरम सीमा पर थी। यक्षगान, भागवत और दशावतारी खेलों का ही यह परिष्‍कृत स्‍वरूप था, जिसे विष्‍णुदास ने परिष्‍कृत किया था। राजाश्रय होने के कारण विष्‍णुदास अठ्ठारह-बीस सालों तक अपने खेलों का प्रदर्शन करते रहे। इसी समय 1855 में महात्‍मा ज्‍योतीबा फुले ने गरीब खेतिहर किसान के शोषण पर ‘तृतीय रत्‍न’ नाटक लिखा। एक और पुराणों पर आधारित आख्‍यान खेल नाटकों की भरमार जो समाज को वास्‍तविकता से दूर ले जा रहे थे। दूसरी ओर आम आदमी धार्मिक शोषण को, अज्ञान को, अशिक्षा को महात्‍मा फुले हाशिए पर ला रहे थे। इन दो घटनाओं की पार्श्‍वभूमि तथा उसके अर्थ को समझना निहायत आवश्‍यक है। 
तत्‍कालीन-राजनीतिक-सामाजिक परिस्थिति
1818 वर्ष में पेशवाई का अस्‍त हुआ। छत्रपति शिवाजी महाराज ने कडे परिश्रम, लगन और समर्पित भावनाओं से निर्माण किया। हिंदवी स्‍वराज्‍य भी ध्‍वस्‍त हो गया। ‘पेशवाओं ने देश डूबा दिया’ इस शब्‍दों में लोकहितवादी जैसे महामना ने पेशवाओं के कुकर्मों को उजागर किया। अंग्रेजों का आगमन, वसाहतवादी सुधारणाओं की भरमार, शिक्षा का तेजी से हो रहा प्रचार, सामाजिक कुरितियों पर मानवीय दृष्टि से हो रहा प्रहार, ऐसे एक नए वातावरण की नीव रखी जा रही थी। किंतु तत्‍कालीन मराठी रंगमंच को इससे कोई सरोकार नहीं था। राजाश्रय प्राप्‍त इस पौराणिक खेलों ने वर्तमान को छोड़कर दर्शकों को पुराण काल में बांधे रखा। 
उस समय चार वर्णो की व्‍यवस्‍था में सबसे अंतिम छोर पर स्थित शुद्रातिशुद्र वर्ग सामाजिक, सांस्‍कृतिक एवं आर्थिक शोषण में पिस रहा था। धर्म, जाति उस शोषण का सबसे बड़ा आधार थी। ब्राह्मणी व्‍यवस्‍था का वर्चस्‍व कायम था। सामाजिक विषमता, छूत-अछूत का भेद, धार्मिक पाखंडता, मानवीय मूल्‍यों की सुरक्षा इस पार्श्‍वभूमिवर महात्‍मा फुळे को ‘तृतीय रत्‍न’ नाटक लिखने की प्रेरणा मिली। ‘तृतीय रत्‍न’ उनके विचारों की एक सशक्‍त अभिव्‍यक्ति थी। 
मराठी रंगमंच के उदय की इस पार्श्‍वभूमि पर ‘तृतीय रत्‍न’ की भूमिका परखी जा सकती है। आम आदमी से जुड़ी यह नाट्यकृति थी। समकालीन वास्‍तव को फुले ने पुरजोर रूप में रखा। और शिक्षा की आवश्‍यकता को अग्रिम स्‍थान दिया। बहुजन समाज के उन्‍नति के लिए, धर्म, परंपरा और दकियानूसी विचारों ने वंचित रखे, शिक्षा के अधिकारों को उन्‍होंने आम आदमी को सौंपा, 1813 में पहला स्‍कूल खुला। 1824 में पूना में पहला स्‍कूल शुरू किया गया। 1840 में एजुकेशन बोर्ड (शिक्षा मंडल) स्‍थापित किया गया। 1833 में लड़कियों को शिक्षा प्रदान करने की आवश्‍यकता पर विचार होना शुरू हुआ। इस प्रकार शिक्षा को एक महत्‍वपूर्ण सामाजिक सुधार का दर्जा दिया गया। शिक्षा के उपलब्धि की हवाएं बहने लगी। मात्र इस समय में धर्मांध, ब्राह्मणी विचार परंपराओं के सिपहसालारों ने ही शिक्षा का विरोध करना शुरू किया। 
1854 तक यह प्रतिगामी दृष्टिकोन बरकरार था। 1854 के ‘ज्ञान प्रकाश’ में एक सनातनी कवि ने तो यहाँ तक लिख डाला कि अगर तुम अपने बच्‍चों को इन स्‍कूलों में भेजोगे तो आपके बच्‍चे अछूत हो जाएंगे और उसके कारण आपके खानदान को कालिख लगेगी। शिक्षा के प्रति खास बहुजन शिक्षा के प्रति यह सनातनी, धर्मांध, जातीयवादी शक्तियाँ भ्रम फैला रही थी। शुद्रातिशूद वर्ग को, बहुजन वर्ग को वे शिक्षा से दूर रखना चाहते थे। इस पार्श्‍वभूमिवर इस वर्ग के लिए शिक्षा की जरूरत है। उसी द्वारा उसकी उन्‍नति होगी। यह बात फुळे उन्‍हें बहुत गंभीरतापूर्वक बता रहे थे। अपनी यही भूमिका उन्‍होंने ‘तृतीय रत्‍न’ इस नाटक के माध्‍यम से रखी। शिक्षा पद्धति कैसी होनी चाहिए? शिक्षा के लाभ, उसकी जरूरत इन सारी बातों को उन्‍होंने ‘तृतीय रत्‍न’ में प्रभावी रूप से रखा है। यह भारत का पहला ‘एजुकेशन ड्रामा’ है। तात्‍पर्य ‘भारतीय शिक्षाप्रद नाटक’ के जनक के रूप में हम महात्‍मा फुले का उल्‍लेख कर सकते हैं। 
1848 के अगस्‍त माह में फुले ने पुणे में पाठशाला शुरु की। 03 जुलाई 1851 में उन्‍होंने ‘कन्‍याशाला’ शुरू की। 1845-1855 यह काल फुले द्वारा की गयी ज्ञानक्रांति, शिक्षाक्रांति का काल था और मात्र इस समय मराठी रंगमंच पुराणकथाओं के प्रदर्शन में मश्‍गूल था। किसी भी प्रकार के सुधार, परिवर्तन, न्‍याय, समकालीन वास्‍तविकता, सामाजिक परिवर्तन के साथ उसका कोई संबंध नहीं था। क्‍योंकि मराठी रंगमंच के उदय की प्रेरणा ही किसी एक राजा की जो अपना राजापद खो चुका है। गतस्‍मृतियों के अलावा उसके पास कुछ नहीं, उसके मनोरंजन की, जरूरत में थी। जो एक प्रकार का निजी मनोरंजन था। इस प्रक्रिया में आम दर्शकों का प्राथमिक विचार नहीं था। प्रारंभ में इस नाटक का औचित्‍य केवल एक दरबारी जरूरत का था। 
1826 में हुआ उमाजी नाईक का विद्रोह, पुना जिला में हुआ मछुआरों का विद्रोह, 1831 से 1842 तक अंग्रेज सरकार के खिलाफ हुए संघर्ष, यह सारी घटनाएं समाज को प्रभावित कर रही थी। आजादी का जुनून धीरे धीरे छा रहा था। दूसरी ओर अंग्रेजी हुकूमत अपने पैर शैने…शैने… जमा रही थी। इन समकालीन घटनाओं का कोई असर मराठी रंगमंच पर होता दिखाई नहीं दिया। मराठी रंगमंच के उदय से जुड़ा वह वर्ग था, जिसका न अंग्रेजों से लेना-देना था, न आजादी से था। सुधार, परिवर्तन, समाज जागरण की गतिविधि तो दूर की बात थी। शिक्षा का महत्‍व, सामाजिक विषमता, छूत-अछूत भेद, इन प्रश्‍नों का उनके लिए कोई महत्‍व नहीं था। क्‍योंकि यह वर्ग ब्राह्मणी शोषण व्‍यवस्‍था की आधार थी। समकालीन वास्‍तविकता से बहुत दूर ही था यह वर्ग। 
प्रसिद्ध नाटककार प्रा. गो.पु. देशपांडे ने मराठी रंगमंच का उदय तथा इस उदय के साथ जुडे ‘सीता स्‍वयंवर आख्‍यान’ तथा अन्‍य आख्‍यान नाटकों के बारे में अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण बाते रखी है। वे कहते हैं ‘अपना इतिहास, अपनी संपन्‍नता, कल्‍पनाओं से निर्मित माध्‍यम द्वारा ही क्‍यों न हो, उसे खड़ा करने का यह प्रयास था। वास्‍तविकता एवं अपेक्षा इस बीच झूल रहे अभिजनवर्ग की स्‍वप्‍नपूर्ति ही इन नाटको ने की’। गो.पु. देशपांडे ने मराठी रंगमंच के उदय घटना को सटीक ढंग से विश्‍लेषित किया है। अपने व्‍यक्तिगत मनोरंजन के लिए अभिजन वर्ग द्वारा नाट्यकला का इस तर उपयोग किया गया। प्रारंभ में ‘लोकदर्शक’ का कोई विचार इस कृति में नही था। यह एक दरबारी प्रयास था। किंतु महात्‍मा फुले का ‘तृतीय रत्‍न’ यह नाटक की प्रेरणा सामाजिक थी। लोकदर्शक के जागरण की थी। जिसमें आम आदमी के शोषण से, उन्‍नति से, सामाजिक न्‍याय से जुड़े सवाल थे और जवाब भी। यह एक उद्देश्‍यपूर्ण, कृतिपूर्ण नाट्यकृति थी। इसीलिए मराठी रंगमंच का उदय, इसी नाटक से माना जाना चाहिए, यह विचार महत्‍वपूर्ण है। इसलिए महात्‍मा फुले ही सही अर्थों में मराठी रंगमंच के जनक कहलाने के हकदार हैं। 
‘तृतीय रत्‍न’ इस नाटक का विषय, आशय, शैली, आकृतिबंध, पात्ररचना, संवाद, भाषा, रूप, स्‍वरूप आदि नाट्य एककों के आधार पर पहला सामाजिक, पहला प्रायोगिक, पहला शिक्षापरक, पहला वैचारिक, पहला गद्य नाटक, पहला स्‍वतंत्र, पहला पथनाटक, पहला मुक्‍त नाट्य, पहला बहुजन, पहला दलित नाटक, पहला प्रबोधन नाटक, पहला जननाट्य, पहला समांतर, पहला विद्रोही, पहला देशीय नाटक, पहला वास्‍तववादी, पहला मूल्‍यनाटक, पहला नवनाट्य, पहला टोरस थिएटर, पहला संवादनाट्य, पहला थिएटर फॉर डिप्रेस्‍ड, पहला मासिकल नाटक, कृषि संस्‍कृति का, वैज्ञानिक दृष्टिकोण का पहला नाटक हम कह सकते हैं। कालसापेक्ष पहला आधुनिक नाटक भी हम उसे कह सकते हैं। ‘व्‍ही-इफेक्‍ट’ नाट्यतंत्र की धारणाएं भी उसमें निहित है। ऐसी कई संज्ञा एवं संकल्‍पनाओं के धरातल पर ‘तृतीय रत्‍न’ की विशेषताएँ परखी जा सकती है। 
आख्‍यान खेलों का स्‍वरूप
‘आख्‍यान’ यह कविता का ही एक प्रकार है। इसे हम ‘पद्य’ भी कह सकते हैं। विष्‍णुदास भावे ने पुराणों में से कुछ लोकप्रिय कथाएं चुनी। इन कथाओं को आख्‍यान स्‍वरूप कविताओं में पिरोया। भावे इस आख्‍यान खेलों को ‘नाट्यकविता’ भी कहते हैं। आमतौर पर इन कविताओं को नाटक कहना अनुचित लगता है। भावे के इन आख्‍यान नाटको में संवाद नहीं, पात्रों द्वारा की जाने वाली कृतियों के निर्देश नहीं, अभिनय से संबंधित कोई सूचनाएं नहीं। आख्‍यानों के विषय भी पुराणों में लिए गए हैं। आशय का कोई नया ‘कथ्‍य’ नहीं। ‘भावे द्वारा निर्मित नाटक’ कहने का कोई ठोस कारण भी नहीं मिलता। इसे हम संकलन या कारागिरी कह सकते हैं। अभंग, ओवी, गणवृत्तात्‍मक काव्‍य गाकर अभिनय करने की चेष्‍टा इन खेलों में की जाती थी। भावे खुद यह आख्‍यान गाते थे। आशय के अनुरूप, नाम निर्देश के अनुसार चरित्र रंगमंच पर आते थे। उबड़-खाबड़ हात, पैर, शरीर से कृति करते और मंच से चले जाते। क्‍या इसे हम नाटक की व्‍याख्‍या में रख सकते हैं। यह प्रश्‍न सही मायने में चर्चा का विषय है। 
मराठी रंगमंच के इतिहासकार श्री ना. बनहटटीने इन आख्‍यान खेलों को ‘नाट्य साहित्‍य’ में सम्मिलित करने से इंकार कर दिया1 आंतरराष्‍ट्रीय ख्‍याति के नाटककार गिरीश कर्नाड, अ.भा. मराठी नाट्य सम्‍मेलन के पूर्वाध्‍यक्ष प्रा. दत्ता भगत, विदुषी नाट्यालोचक प्रा. पुष्‍पा भावे, दलित तथा लोकनाट्य के विद्वान डॉ. रुस्‍तम अचलखांब, नयी पीढ़ी के समालोचक डॉ. पुरुषोत्तम मालोदे, डॉ. प्रवीण बन्‍सोड आदि ने महात्‍मा फुले को मराठी के आद्य नाटककार तथा तृतीय रत्‍न को आद्य मराठी नाटक के रूप में परिभाषित किया है।
सामाजिक रंगमंच का जन्‍म
भारतीय समाज व्‍यवस्‍था चार वर्णों पर आधारित है। जातिप्रथा या इस व्‍यवस्‍था का मुख्‍य लक्षण है। जाति भेद के साथ छुआछूत जैसी बीमारियों से शुद्रातिशूद्र समाज पीडित था। किंतु शोषक अभिजनवर्ग के लिए यह व्‍यवस्‍था ईश्‍वर का, धर्म का आदेश थी। शुदातिशूद्र होना मतलब उनके पूर्व जन्‍मों के पाप हैं और यह पाप भोगना ईश्‍वरादेश है। इसलिए शुद्रातिशूद्र का शोषण, उनकी प्रताड़ना भी धार्मिक, ईश्‍वरीय मानी जाती थी। ‘शोषण’ यह समस्‍या के रूप में देशने की कोई वजह अभिजनवर्ग के पास नहीं थी। किंतु ईश्‍वर तथा धर्म के इस पाखंडी कवच को ध्‍वस्‍त करने का कार्य महात्‍मा फुळे ने किया। चातुर्वर्ण, जातिभेद, छुआछूत आदि परंपरा के विरोध में उन्‍होंने रचनात्‍मक विद्रोह खड़ा किया। शिक्षा की जरूरत, वैज्ञानिक दृष्टिकोण का प्रचार, सामाजिक समानता के लिए संघर्ष, शुद्रातिशूद्रों का जनजागरण करने का कार्य उन्‍होंने किया। इन शोषण की जड़े ‘अज्ञान’ में होने के कारण ‘शिक्षा’ को उन्‍होंने अपना हथियार बनाया। ‘शिक्षा’ यह आदमी का ‘तीसरा नेत्र’ है। यह मंत्र उन्‍होंने पीडित-शोषित समाज को दिया। ‘तृतीय रत्‍न’ यह नाटक में पिछड़े समाज को शिक्षित करने की आवश्‍यकता पर उन्‍होंने बल दिया है। 
‘तृतीय रत्‍न’ में सामाजिक प्रश्‍नों को रखकर, न्‍याय प्राप्‍त करने की कोशिश की। इसलिए सामाजिक रंगमंच का प्रारंभ भी ‘तृतीय रत्‍न’ इस नाटक से ही होता है। किंतु मराठी रंगमंच की अभिजन धारा यह श्रेय उन्‍हें न देकर ‘मनोरमा’ नाटक के लेखक म.वा.पितले या फिर ‘शारदा’ के लेखक गोविंद बल्‍लाळ देवल को देती है। किंतु यहाँ यह बात गौरतलब है कि महात्‍मा फुले ने ‘तृतीय रत्‍न’ लिखा तब देवल पैदा भी नहीं हुए थे। किसी भी प्रकार से फुले को यह श्रेय न दिए जाने के प्रयास थे। जिस प्रकार ‘सीतास्‍वयंवर’ आख्‍यान नाटक दरबारी जरूरत से जन्‍मा था। उसी प्रकार शारदा नाटक की प्रेरणा भी ब्राह्मण परिवार से थी। ‘तृतीय रत्‍न’ की उपेक्षा हमारी वर्ण, धर्म, जात, पंथ प्रणित अभिजन विचारों की फलश्रृति थी। अभिजन वर्ग के जिस अभिरुचि को प्रमाण माना जाता था। उसमें बहुजन वर्ग के प्रश्‍न और बहुजन समाज के लेखक को कैसे सम्‍मान मिलता? “तत्‍कालीन मराठी नाटककारों के पास सामाजिक वास्‍तविकता को देखने की दृष्टि नहीं थी। साथ ही उनमें इच्‍छा का भी अभाव था।
दक्षिणा प्राईज कमेटी द्वारा उपेक्षा
दक्षिणा का मतलब होता है, दान देना। खासतौर पर ज्ञान में प्रवीण, ज्ञान साधाना में लीन विद्वानों के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज के शासनकाल में यह योजना शुरु की गयी। छत्रपति संभाजी महाराज तदपश्‍चात् ताराराणी, शाहू महाराज के शासनकाल तक यह योजना चलती रही। किंतु पेशवाकाल में यह योजना केवल ब्राह्मणवर्ग तक सीमि‍त होती गयी। बहुजन, शुद्रातिशूद्र विद्वानों के लिए उसके दरवाजे बंद होते गए। 
महात्‍मा फुले द्वारा भी अपना ‘तृतीय रत्‍न’ नाटक दक्षिणा प्राईज कमेटी को ‘प्राईज’ हेतु प्रस्‍तुत किया गया। किंतु उसे इस कमेटी ने खारीज कर दिया। तत्‍कालीन अभिरुचि के यह नाटक होने का आरोप उनपर जड़ा गया। ब्राह्मण सदस्‍यों की इस कमेटी पर खासी पकड़ थी। एक शुद्र लेखक की, वह भी विद्रोही रचना का स्‍वागत वे कैसे कर पाते? उच्‍च जा‍तीय, उच्‍च वर्णीय संस्‍कृति, उसे शक्तिशाली बनाने वाली अभिरुची, इस अभिरुची की बनी परंपरा यह तत्‍कालीन ब्राह्मण प्रवृत्ति का सूत्र थी। और इस परंपरा, अभिरुचि तथा संस्‍कृति के विरोध में संघर्ष करना यह शूद्रातिशूद्र समाज के संघर्ष का सूत्र था। इस संघर्ष के परिणति के स्‍वरूप ‘तृतीय रत्‍न’ को नकारा गया। उसकी उपेक्षा की गयी। तत्‍कालीन प्रसार माध्‍यम पर भी इसी प्रतिगामी तत्‍वों की हुकूमत होने के कारण ‘तृतीय रत्‍न’ पर कहीं भी चर्चा नहीं हुई। आखिरकार सौ सालों की गुमनामी ‘तृतीय रत्‍न’ को झेलनी पड़ी। जून 1979 को पहली बार ‘तृतीय रत्‍न’ पुरोगामी सत्‍यशोध में प्रकाशित हुआ और चर्चा का, अनुसंधान का विषय बना। 
डॉ. सतीश पावडे
असिस्‍टेंट प्रोफेसर
नाट्यकला एवं फिल्‍म अध्‍ययन विभाग
महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय
वर्धा (महाराष्‍ट्र) 442001

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