आँख चिड़िया की दिखे

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हर किसी के हाथ में
गाण्डीव है अब
आँख चिड़िया की दिखे
तो बात भी है ।

आदमी के हाथ में
बाजार है या
बिक रहा है आदमी
ये कौन जाने
भोर होते नापता है
सड़क या
नाप लेती उम्र खुद,
सड़क ही
ये कौन माने

बिक रही है चापलूसी
थोक में अब
सत्य फुटकर में बिके
तो बात भी है ।

हर धजी को
साँप में तब्दील करके
लेखिनी गतिमान है
ये कौन बोले
अक्षरों की आँख में
घी-शहद भरकर
पा रहे सम्मान हैं
तह कौन खोले

लिख रहे हैं रात-दिन भी
खास को ही
आमजन को भी लिखे
तो बात भी है ।

कल्पना मनोरमा
31.5.2020

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श्रमिक वेदना

*विधा – नवगीत
मापनी – 16/14


श्रमिक वेदना

गृह दर से निकला मैं यूंही
कई ऋणों का भार लिए।
गर्म पसीना तन से बहता
निर्मम हाहाकार लिए।।

उदर भूख से जकड़ा मेरा
नहीं देह पर आच्छादन
फ़टा हुआ इक वस्त्र शीश पर
वैर लोभ का निष्पादन
बिन धन किस्से नहीं सुलझते
आंसू नयनों का भार लिए
गृह दर से निकला मैं यूंही
कई ऋणों का भार लिए।

अल्प दोष ना कोमल हृदय में
पुल , सड़क निर्माण मेरे
कड़क दुपहरी अनंत परिश्रम
ये भवन के सोपान मेरे
ज्यों आया त्यों जाना मैंने
दुःखी प्राण का सार लिए
गृह दर से निकला मैं यूंही
कई ऋणों का भार लिए

कठोर हाथ फ़टे पग छाले
हर्ष सब कुर्बान मेरे
मेरा जीवन मेरी मुश्किल
मुझसे तो अंजान मेरे
बिन संदेह के निशंक खड़ा मैं
कष्टों का अम्बार लिए
गृह दर से निकला मैं यूंही
कई ऋणों का भार लिए
परमजीत सिंह कहलूरी
हिमाचल प्रदेश
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पिया परदेश में है ए सखी उनको मनाऊँगी

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नवगीत…

पिया परदेश में है ए सखी
उनको मनाऊँगी
न वे आए तो उनके बिन
न इक दीपक जलाऊंगी
उन्हें यह क्या पता कि
हमने कैसे दिन गुजारे हें
की उनकी याद में व्याकुल
हुए आँसू बहाए हैं
दिवाली आ गई आ जाओ
न तुमको सताऊंगी
पिया परदेश में है
ए सखी उनको मनाऊँगी
गए व्यापार करने को वे
अपना छोड़कर घर द्वार
कबूतर ले गया है खत
कि वे बैठे हुए उस पार
में वादा करती हूँ साजन
न अब तुमको सताऊंगी
पिया परदेश में है ए सखी
उनको मनाऊँगी ।
कटी है रात विरहन में
सपन उस पर भी देखें है
बताऊं कैसे उनको उनके
बिन हम कितना तड़पे है
मेरा मन बार बार
द्वार की साँकल बजाता है
मेरी बैचेनी का किस्सा
उन्हें सपनों में आता है
मेरा दिल रो रहा है
फिर भी मै उनको हँसाउंगी
पिया परदेश में है ए सखी
उनको मनाऊँगी
तुम्हे यह क्या पता
हिचकी हमारी कैसे रुकती है
सजल आँखों से अश्रु धार
बालम कितनी बहती है
विरह की आग में झुलसे है
अब हमको न तड़पाओ
अरज है तुमसे ओ सरताज
अपने घर चले आओ
करो विश्वास मेरा
में तुम्हे दिल मे बसाऊंगी बसाऊंगी
पिया परदेश में है ए सखी
उनको मनाऊँगी ।
नही आए तो में तुम बिन
नही दीपक जलाऊँगी
पिया परदेश में है ए सखी
उनको मनाऊँगी ।
……
अनिल गुप्ता
8, कोतवाली रोड़ उज्जैन

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