डायरी लेखन और हिन्दी साहित्य-मनोज शर्मा

डायरी लेखन और हिन्दी साहित्य

मनोज शर्मा

हिन्दी साहित्य के गद्य साहित्य की अन्यविधाओं में डायरी लेखन के प्रति शोध क्षेत्र में बहुत अल्प कार्य हुआ है।इसलिए मैंने पीएच लेख हेतु इस विधा को अपने विषय के रुप में चयन किया है।उम्मीद है इस क्षेत्र में नये प्रशिक्षुओं के लिए मेरा यह लघु लेख लाभदायक होगा

हिंदी साहित्य और डायरी लेखन का आरंभ

भाम्ह नाम के आचार्य ने सहित शब्द का प्रयोग 6 वी शताब्दी में पहली बार किया हथा,उनके अनुसार जो कुछ भी रचनाएं कविता,पद्य,गद्य हैं,उनकों काव्य कहा जाता था।शब्द और अर्थ का सहित भाव ही साहित्य है।शब्द और अर्थ की अवधारना किसी भी रचना को सुन्दर बनाती है।साहित्य में शब्द की सुन्दरता भी अनिवार्य है,शब्दों का बहुत गहरा प्रभाव हमारी मनोरचना पर पड़ता है।

मानस के समस्त भावों,मानसिक वेगों,अनुभूति,विचारों को व्यक्त करने का सशक्त माधूयम साहित्य है।हिन्दी साहित्य में अनेक गद्य विधाओं का सूत्रपात आनुनिक युग में हुआ इसमें निबंध,नाटक,उपन्यास,कहानी,यात्रा-साहित्य,रेखाचित्र,रिपोर्ताज,पत्र-पत्रिकाओं के साथ साथ डायरी लेखन आदि प्रमुख हैं।डायरी लेखन हिन्दी साहित्य में मुख्यतः छायावादोत्तर युग की आत्मपरक विधा है।किसी भी घटना के प्रति व्यक्ति की तात्कालिक उद्वेग या अभिव्यक्ति का माध्यम डायरी बनती है वैसे तो डायरी एक निजी सम्पत्ति मानी जाती है जो किसी व्यक्ति की अपनी मानसिक सृष्टि और अंतदर्शन है।परन्तु व्यापक दृष्टि में डायरी भी प्रकाश में आकर साधारणीकृत हो जाने के कारणसाहित्य जगत की सम्पत्ति बन जाती है।डायरी में लोग अपने कुछ या बहुत सेअनुभवों का दैनिक विवरण लिखते हैं और यही डायरी जब किसी साहित्यकार की कलम से किंचित कलात्मक शैली में लिखी जाती है तो प्रकाशित होकर पाठकों तक पहुंचती है तो वह साहित्य की एक प्रतिष्ठित विधा का हिस्सा बन जाती है।

डायरी भी एक शोध का विषय बन सकती है यह कदाचित आश्चर्य का विषय नहीं क्योंकि हिन्दी साहित्य में बहुत साहित्यकारों ने डायरी लेखन को प्रमुखता दी जिसमें जमनादास बिड़ला,रामृवृक्ष वेनीपुरी,महादेवी वर्मा,हरिवंशराय बच्चन,अजित कुमार ,मोहन राकेश,रामधारी सिहं दिनकर आदि प्रमुख रहे।समकालीन साहित्य में डायरी लेखन प्रगति पथ पर है मैं डायरी को शोध का विषय  बनाकर स्वयं को गौरवांवित महसूस कर रहा हूं।

इसका कारण इस विधा पर अल्प शोध कार्य है।वास्तव में डायरी लेखन एक ऐसी विधा है जिसमें लेखक स्वयं की रोज़मर्रा ज़िंदगी और जीवन से जुड़े लोगों के प्रति अगाध प्रेम,द्वंद्व व संवेदन आदि को अपने शब्दों में डायरी में लिखता है।निश्चित ही यह एक अनूठी साहितायिक विधा है जिसपर अब तक शोध विशेषज्ञों की नज़र नही गयी या कुछ कार्य हुआ भी तो बहुत अल्प मात्रा में।इसमें आरंभ से अंत तक जिज्ञासा बनी रहती है।

डायरी शब्द की उत्पत्ति लैटिन के ‘DIARIUM’ शब्द से हुई है जिसका अर्थ है’DIES’ अर्थात्  ‘DAY’यानि दैनिक भत्ता इससे यह स्पष्ट होता है कि डायरी का संबंध दैनिक कार्य ये दिनचर्या से है परंतु शब्दकोशों के अंतर्गत इसे दैनिकी,दैनंदिनी,परामर्श पुस्तिका, रोजनामचा आदि कहा जाता है।इसी प्रकार संस्कृत में इसे ‘दिन पत्रिका’ या दैनिक वृत पुस्तक कहा जाता है परंतु प्रचलन में डायरी शब्द ही सर्वविदित है।जैसा कि हम जानते हैं कि डायरी को दैनंदिनी,रोजनामचा,दैनिकी कार्य आदि पर्याय शब्दों से माना जाता है।

जैसा कि हम जानते है कि डायरी को दैनन्दिनी, रोजनामचा दैनिकी कार्य आदि पर्याय शब्दों से माना जाता है परंतु कुच डायरी लेखक इसे कुछ भिन्न संज्ञाए देते हैं। अजित कुमार डायरी लेखन को ‘ अंकित (अंकित होने दो ) करने के संदर्भ में लेते हैं , कृष्ण बलदेव वैद इसे इन्द्रराज कहकर पुकारते हैं , गोपाल सहर इसे राजदां ( तिनका-तिनका सपने ) मानते हैं और ये पर्याय इस दृष्टि से सार्थक भी हैं कि डायरी में लेखक का अनुभव उसके सबसे निकट रहकर अंकित होता है।

रामधारी सिंह दिनकर डायरी शब्द को इस प्रकार स्पष्ट करते हैं कि ‘ डायरी वह चीज़ है जो रोज लिखी जाती है और जिसमे घोर रुप से व्यक्तित्व बातें भी लिखी जा सकती है। इसी रूप में अनिता राकेश भी डायरी के स्वरुप को स्पष्ट करते हुए कहती है – डायरी एक बहुत ही वैयक्तिक चीज़ है जो बिना लाग लपेट के व्यक्त होता है।

डायरी का संबंध मूलत: लेखक से होता है अत: यह उन्के ही विचार और अनुभव की शब्द सृष्टि है। यह अनुभव और विचार कही न कही उनकी कृतियों में भी झलकते है। अर्थात् एक सर्जक अपने सर्जन से जुड़े घटना तथ्यों का संग्रह भी डायरी में करता चलता है। यहां यह स्पष्टत: कहा जा सकता है कि जब कोई लेखक अपने जीवन में घटित होने वाली घटनाओं का यथार्थ चित्रण क्रमबद्ध और लिपिबद्ध करता है तो उसे डायरी कहते है।डायरी में लेखक के सपने होते हैं किसी प्रिय के प्रति प्रेम होता है क्षोभ के साथ साथ दुख  व आंसू

होते हैं जहां रोज़ नया दिन होता है नयी बाते होती हैं जो उसके व्यक्तित्व को प्रकाशित करती है इस तरह यह स्वयं को नित् नवीन रूप में स्थापित करने वाली विधा है जो कोतुहलता से भरपूर है।

साहित्य में डायरी लेखन दूसरी गद्य विद्याओं की भातिं विस्तृत रूप में तो नहीं है पर डायरी लेखन से मैं बहुत प्रभावित रहा हूँ और इस विधा के प्रति अल्प शोध कार्य ने मुझे काफी उत्साहित किया। हिन्दी साहित्य में डायरी लेखन में प्रमुख रूप से हरिवंश राय बच्चन , मोहन राकेश दिनकर , अजित कुमार व प्रेमचंद जैसे दिग्गज साहित्यकार लिखते रहे है जिनका डायरी लेखन के प्रति अगाध प्रेम व आस्था स्पष्ट झलकती है। मुझे इस विधा पर शोध करना एक अतुलनीय कार्य लग रहा हैं क्योंकि इस विधा में लेखक के वो अनछुए पहल हैं।

 जिनसे परिचित होना एक आनन्द का विषय है। श्री रामवृक्ष वेनीपुरी बहुमुखी प्रतिभा के लेखक थे। उन्होंने गद्य की अनेक विधाओं में लेखन कार्य किया। हिन्दी गद्य साहित्य जगत में डायरी विधा की समूह होती परम्परा में श्री रामवृक्ष वेनीपुरी ने लगभग 13 वर्ष(1950-63) तक डायरी ( डायरी के पन्ने ) लिखी।

शोध प्रबंध का प्रथम अध्याय ‘ सहित्य का स्वरूप और डायरी लेखन का स्थान होगा।हिन्दी साहित्य में हजारो सालों से प्राचीन विधाओं का लिखना आरंभ हो गया जिसका मुख्य उद्देश्य मनोरंजन के साथ साथ समाज को जागऽत करना है।अनेक विधाओं के साथ साथ एक नई विधा डायरी लेखन का सूत्रपात नये युग में हुआ।

‘ डायरी लेखन की परम्परा ‘ शोध प्रबंध का द्वितीय अध्याय होगा जिसमे डायरी का उद्भव एवं विकास व हिन्दी सहित्य – डायरी साहित्य का परिचय स्पष्ट किया जाने का प्रयास होगा।यद्यपि साहित्य में डायरी लेखन की परंपरा पाश्चात्य समाज की देन है किंतु हिन्दी साहित्य में आधुनिक युग में डायरी लिखने का प्रचलन आरंभ हुआ था।यह वैयक्तिक व आत्मपरक विधा है।

शोध प्रबंध के तृतीय अध्याय में डायरी लेखन के प्रमुख डायरी विद् और उनका डायरी लेखन होगा।डायरी लेखन के लिए जमनालाल बजाज,रामृक्ष वेनीपुरी,हरिवंशराय बच्चन,मोहन राकेश,दिनकर,अजित कुमार आदि लेखक है जिन्होने अपने स्पंदित पलों का ब्यां डायरी लेखन के द्वारा व्यक्त किया गया।इसमें लेखकों ने अपने अनुभव दिनचर्या व ज़िन्दगी को दर्ज किया इसमे खट्टे मिट्ठे अनुभवों के साथ साथ वो खास बाते हैं जिनके द्वारा उनकी निजी जिन्दगी को करीब से देखा जा सकता है।

चतुर्थ अध्याय में डायरी लेखकों के साहित्य के विश्लेषणात्मक व तुलनात्मक अध्ययन से होगा।इस अध्याय में साहित्यकारों की डायरी की मुख्य विशेषताएं व उनके कला कौशल को देखा जा सकता है।वैयक्तिक जीवन की

विशेष पल व दूसरे डायरी लेखक से भिन्नता देखी जा सकती है जैसे अजित कुमार की ‘अंकित होने दो ‘व हरिशंकर परसाई की व्यग्य प्रधान डायरी मोहन राकेश की डायरी व रामधारी सिहं दिनकर की एक साहित्यिक की डायरी एक दूसरे से भिन्न है पर आत्मपरक हैं।शोध का एक अन्य पक्ष डायरी लेखन के शिल्प विधान से होगा जहाँ डायरी लेखकों के शब्द शिल्प व भाषा शैली संबंधी प्रयोग पर विचार किया जायेगा।

डायरी लेखन अब हिंदुस्तान में एक जानी पहचानी विधा है। इसे हमारे साहित्य जगत ने भी स्वीकार कर लिया है। एक डायरी घटनाओं,अनुभवों,विचारों और अवलोकनों का व्यक्तिगत रिकार्ड है। यह एक अनुपम विधा है जिस पर शोध किया जाना अत्यंत आवश्यक है ताकि यह साहित्य प्रशिक्षु, जिज्ञासु विदों तक पहुंच सके और साहित्यिक विधाओं में डायरी लेखन को भी प्रमुखता दी जा सकती है यद्यपि इस विधा के लेखन में सहित्यिक विद्वानों ने उतनी प्रमुखता नहीं दी जितनी अन्य विधाओं में अपितु यह दिल को छू जाने वाली अन्यत्त्म विधा हैं।

मनोज शर्मा

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कैसे हो तुम?-गौरव गुप्ता

कैसे हो तुम?

गौरव गुप्ता

जब तुमने वर्षो बाद मैसेज कर के पूछा था, कि कैसे हो तुम? मैं घण्टो निहारता रहा था मोबाइल स्क्रीन। शायद ये सवाल सहज हो तुम्हारे लिये,लेकिन मेरे लिये इसका उत्तर दे पाना बहुत कठिन था । समझ नही पा रहा था कि क्या कहूँ। क्या मेरा यह कह देना की मैं बिल्कुल ठीक हूँ, खुद से झूठ बोलना नही होगा। या यह कह देना की ” मैं तुम्हारे बिना कैसे ठीक रह सकता हूँ” मेरे अहंकार को चोट पहुचाने जैसा नही होगा। मै घुट रहा था।तुम्हारे सवाल से नही, खुद के ढूंढे गये जबाब से…ऐसा पहली दफा था जब खुद के ढूंढे गये जबाब, खुद से नये सवाल पैदा कर रहे थे। यह सवाल जबाब का गुणात्मक प्रकिया मेरे गले के बीचों बीच अटका था। मैं फेफड़ो में साँसे भरने की बार बार कोशिश कर रहा था। इस सवाल का  जबाब हमारे रिश्ते को नया जन्म दे सकती है ” ऐसी सम्भावनाओ से मैं जितना आशान्वित था उतना ही डरा हुआ भी कि ” मेरे किसी जबाब से” यह आखिरी संवाद न बन कर रह जाये। फिर कही अफ़सोस मुझे पूरी जिंदगी ना चिढ़ाये। मैं रिश्तों की शुरुआत जितनी कम अक़्ली से शुरू करता हूं, उस रिश्ते को बचाने में अपनी पूरी तरकीबे लगा देता हूँ। क्योकि मैं किसी भी रिश्ते को इतनी आसानी से नही जाने देता। पहली दफा तुमने हराया था मुझे सालों पहले, मेरे गलतियों को बिना बताये जाना कितना आसान था ना तुम्हारे लिये। खैर, इस घुटन से बाहर आने की जल्दी में, मैंने कमरे की खिड़कियों दरवाजे को खोल देना उचित समझा।पर कोई हवा इस कमरे में क्यूँ नही आ रही। कमरे के इस सन्नाटे में, मैं अपनी धड़कनों को साफ साफ सुन पा रहा था। मैं अपने अंदर उठे इस खालीपन को किसी भी तरकीब से भर लेना चाहता था। मैंने पास पड़े सिगरेट को जला लिया। मैं मोबाइल में लिख लिख कर मिटाने लगा… ठीक हूँ, नही नही…. मैं बिलकुल अच्छा हूँ… नही … तुम कैसी हो…. ओह्ह ये भी नही… hi जैसे कई शब्द उँगलियो और कीपैड के बीच जगह बना रहे थे। पर मैं कुछ  और लिखना चाह रहा था, यह “कुछ और ” मेरे कंठ के बीचों बीच अटका था। मैं कमरे के एक कोने में पड़े हुए कुर्सी पर जा कर बैठ गया। मैंने सोचा ये सवाल क्या तुमने भी अपने अंदर इतनी ही बेचैनी महसूस करते हुये पूछा होगा। तुम्हारी सहज तस्वीर उभर आयी, जिसमे मेरे महत्वहीनता की कोरी कल्पना थी। मैं चिढ गया.. सिगरेट का कश लेते हुये अंततः मैंने तुम्हारे उस सवाल का कोई जबाब नही देने का सोचा। सिगरेट की आग फिल्टर के जितना करीब जा रही थी मैं उतना ही खुद को ठंडा महसुस करने लगा। और  मैंने उस बोझ को हमेशा खत्म कर देने का चुनाव किया। मैंने तुम्हारा नम्बर ब्लॉक कर दिया था।

डायरी 2

(परछाई)

मुझे मेरे परछाई से शिकायत है,वह मेरी ठीक ठीक आकृति नही बनाती। वह कभी मेरे कद से छोटा तो कभी मेरे कद से बड़ा तो कभी कभी मेरे दोनों पैरों के इर्द गिर्द एक गोला घेरा बना लिया करती है। मैं उससे छुपने के लिये पेड़ो की ओट में चला जाता हूँ तो कभी दीवारों का सहारा लेता हूँ। नजर घुमा कर देखता हूँ वो मेरे सहारा को मुझसे जोड़ कर एक नई आकृति गढ़ रही होती है। मैं भागता हूँ, बेतहाशा, उससे कोसो दूर निकल जाना चाहता हूँ, पर उसकी जिद मेरे पैरों में लिपटी हुई मिलती है।

मैंने उससे कई बार कहा, ठीक ठीक हिसाब क्यूँ नही लगा लेती, तुम मुझे ठीक वैसा ही क्यूँ नही पेश करती, जैसा मैं हूँ। वो कुछ नही बोली, कभी नही बोली, चुप चाप मेरी आकृतियां बनाती रही।

 मैं एक दिन गुस्से से घर से नही निकला। मैं खुश था कि आज उससे मुलाकात नही होगी। तभी खिड़की से झांकती रौशनी का एक टुकड़ा मेरे शरीर से आ लगा। पलट कर देखा तो परछाई , दिवार पर एक आकृति लिये हुये। अचानक मैं उसके करीब जाने लगा, और करीब, जितना करीब गया वो गायब होने लगी। मेरे अंदर एक अजीब से टीस उठी, उसके खो जाने का। मैं समझ नही पा रहा था, जिससे मैं इतने दिनों से भागता रहा, उसके दूर जाने पर मुझे खुश होना चाहिये, पर ऐसा नही था। मेरे चेहरे पर दुःख की रेखाये उभर आई, एक गहन उदासी घिरने लगा था।

 मुझे लगने लगा, मैंने किसी को खो दिया। “क्या मैं उससे प्यार करने लगा हूँ?” जैसे ख्याल अपनी जगह बनाने लगे थे। मैं गुणा भाग नही करना चाहता था, मुझे महसूस हुआ, उसका जिद्दीपन मुझे अच्छा लगने लगा है,और  मेरा भागना , खुद से भागना है। मैं फुट फुट कर रोने लगा… बिल्कुल एक बच्चे की तरह… मैं अक्सर बच्चे की तरह रोना चाहता हूँ.. मैं अपने अंदर किसी बोझ को स्थान नही देना चाहता। मैं बिलकुल खाली हो जाना चाहता था, उस रोज…

गौरव गुप्ता

(जी के गौरव)

मानसरोवर हॉस्टल

कमरा संख्या- 203

नार्थ कैंपस

(दिल्ली विश्विद्यालय)

110007

8826763532 Gaurow.du@gmail.com

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