गुजराती कहानी-भैयादादा (लेखक: स्वर्गीय धूमकेतु)-अनुवादक: डॉ.रजनीकांत एस.शाह

गुजराती कहानी                            

भैयादादा

लेखक: स्वर्गीय धूमकेतु

अनुवादक: डॉ.रजनीकांत एस.शाह

रंगपुर के छोटे स्टेशन पर तीन लोग अधिकारी सहज गुस्ताख से खड़े थे। दूर से आये हुए देहाती लोग,अन्य गाँवों के यात्री और पहली बार ही गाड़ी में मुसाफ़री करने आयी हुई स्त्रियाँ, हुजूम में भी अलग थलग नजर आनेवाले तीन गृहस्थों की ओर बारबार देखकर, आपस में कुछ चोरी छिपे बातचीत कर लेती थीं।

पर उस जगह पर पॉइंट्समेन कौन है? अपनी साहबनुमा टोपी को हाथ में घुमाते हुए एक युवक ने सवाल किया। उसकाकी सवाल करने का अंदाज कहा रहा था कि वह उन सब से बड़ा अधिकारी था।

लम्बे सूखे हुए मुँहवाले एक प्रौढ़ (वयस्क) ने विनयपूर्वक उत्तर दिया:` साहब! वहाँ पच्चीस वर्ष से एक ही आदमी रहता है।’

`पच्चीस वर्ष!’

तीसरा आदमी जो न तो कारकून था और न ही अधिकारी सा- मध्यम पदाधिकारी सा लगता था, उसने मुस्कुराकर हाँ कहा।

`और उस आदमी से आप नियमित काम की अपेक्षा रखते हैं?’ युवा अधिकारी ने अपनी बेंत की छड़ी को जमीं में खोंसकर उसे मोडते हुए कहा।

दोनों में से किसी ने जवाब नहीं दिया। अंत में वह कारकुन सा आदमी बोला:`साहब! बुढा आदमी है। अब वह नौकरी के पच्चीसवें वर्ष में कहाँ जायेगा?’ अब उसका निबाह कर लेने में ही हम सबकी भलाई है।’’

युवा अधिकारी ने अपने होंठ सख्ती के भाव सहित दबाये। अपनी छड़ी से एक कंकड़ दूर तक उडाकर उसने कहा: `आदमी से हमारी कोई निस्बत नहीं है। काम से काम है। उसे जहाँ जाना है जाये। हमें तो मात्र यही देखना है कि वह काम कैसा करता है।

कारकुन का फीका चेहरा कुछ और फीका पड़ा। उसका हृदय निखालिस था। पंद्रह वर्ष की अवस्था से वह कारकुन रहा है। उसने कुछ काली करतूतें करके नहीं पर अनेक अधिकारियों की अधीनता में मृदुल स्वभाव रखकर शिरस्तेदारी प्राप्त की थी। अत: उसमें अपना कोई तेज या प्रभाव तो नहीं था तथापि अच्छा स्वभाव होने के कारण कुछ अच्छा करने का उसका अभिगम रहता था। साहब के होठों की सख्ती को देखकर उसने बहुत नरमी के साथ कहा: `भैया बद्रीनाथ वहां पच्चीस साल से नौकरी कर रहा है।’

`और उसकी अभी क्या उम्रह है?’

`होगी कोई अंदाजन सत्तावन –अट्ठावन की।’

तब तो वह काम के लायक नहीं है!’ साहब ने फैसला सुनाया। साहब के मन में अभी अधिकारी का मद भी है। चतुर शिरस्तेदार ने इस बात को समझ लिया। अत: फिर कभी समझायेंगे,ऐसा सोचकर वह चूप रहा।

हुआ कुछ ऐसा था कि रंगपुर स्टेशन से करीब दो–एक मिल की दूरी पर रेल की पटरियाँ सड़क को काटकर जा रही थी। इसलिए उस क्रोसिंग के पास रेलवे सत्ताधीशों ने एक छोटा सा कमरा बांधकर एक आदमी को वहां रखा था। बद्रीनाथ भैया आज पच्चीस वर्ष हुए, उसी जड़ और जबरदस्त लकडे को गाड़ी के आने-जाने के समय नीचे रख देता था और गाड़ी के चले जाने के बाद उठा लेता था। कुछ समय पहले उसकी असावधानीवश एक दुर्घटना होते होते रह गई। रंगपुर स्टेशन पर ट्राफिक सुप्रिन्टेंडंट,ट्राफिक इन्स्पेक्टर और शिरस्तेदार आज उसकी बात कर रहे थे।

ऐसे में स्टेशन पर गाड़ी आई और साहब अपने डिब्बे में बैठ गए। बैठते हुए भी अपने बदमिजाज स्वभाव को ख़ुशी हो रही हो ऐसे कारकुन के साथ वही बात बारबार कर रहे थे: `उस जगह पर किसी अनुभवी या किसी हुशियार व्यक्ति को नियुक्त करना पड़ेगा।’

उनके आखिरी शब्द गाड़ी की सिटी में डूब गए। दोनों कनिष्क अधिकारियों ने सलामी दी और गाड़ी रवाना हो गई।

शिरस्तेदार विनायकराव हमेशा गाँव की उस सड़क पर दो-तीन मिल सैर करता था। उसकी रुपे के हत्थेवाली छड़ी, पुराना सम्हालकर रखा हुआ रेशमी दुपट्टा, दक्षिणी पगड़ी और चप्पल इस रास्ते पर विगत दस वर्ष से नियमित यात्रा करते थे। बद्रीनाथ के कमरे तक जाकर वे दो घडी बैठकर सुस्ता लेते थे। रावसाहब को आया हुआ देखकर भैया भी अपनी छोटी सी बाडी(बगिया) से बाहर निकलकर ठंडा पाणी भरकर रखता था,बाद में दोनों परदेशी अपने अपने सुख-दु:ख की बातें करते रहते थे और इस प्रकार शाम गुजर जाती थी।

आज भी विनायकराव के धीमे कदम उस तरफ मुड रहे थे। धीर धीरे वह वहां पहुंचे पर भैया को नहीं देखकर, कुछ आश्चर्य अनुभव करते हुए, अपनी हमेशा की चौकी पर बैठा। गहन विचार करते हुए वह वह भैया की सुन्दर कृति को निहार रहा था।-भैया ने अपने कमरे के पीछे बाड़े(बगिया) जैसा बनाकर उसमें गेंदा,कनेर,केल और पपीते लगाये थे। करेली और एक सेम का ऐसे दो लतामंड़प भी बनाये थे। कमरे के दरवाजे के पास कुछ मिर्ची की पौध,अजवाईन,धनिया और तुलसी की क्यारियां थी। आगे के हिस्से में दो-चार छोटे छोटे फूलबेलें चढ़ाकर मंडप जैसा बना लिया था। उसके इर्दगिर्द कुछ बांस लगाकर खपाचें बांधकर दीवार बनायीं थी और नीचे जमीन एकदम स्वच्छ बना रखी थी। उसमें भैया की एक बकरी बंधी रहती थी। विनायकराव,भैया का घर और उसका कलाविधान देखता रहा।

ऐसे में भैया के घर से आठ-दस वर्ष की एक लड़की बाहर आई। विनायकराव को देखकर तुरंत वापस लौटी और भैया से कहा:`भैयादादा! बाहर कोई बैठा हुआ है!’

`कौन है?’-ऐसा कहते हुए भैया बाहर आया।

आज आठेक दिन हुए,वह कुछ अस्वस्थ सा था। तो इस तरफ विनायकराव भी एकाध हप्ता हुआ,

इस तरफ आये नहीं थे। अत: विनायकराव होंगे, यह बुढऊ को याद रहा नहीं। बाहर आकर उन्होंने विनायक

-राव को देखा।

`ओहो! पानी बेटा! यह तो हमारे रावसाहब हैं। ठंडा पानी लाओ,चलो’। भैया अपनी नित्य आदत के अनुसार विनायकराव के पास जा बैठा। दोतीन बिलौटे उसके शरीर से सटते हुए घुमने लगे।

विनायकराव को दिल फटा जा रहा था। भैया को इस जगह से कितना प्यार है, इस बात का सही अंदाज तो उसे आज ही हुआ। आसपास थूअर की बाड हो,बबुल का पेड़ हो या बेर का पौधा हो पर प्रत्येक पेड़ को उस कलाविधान में अपना योगदान करनेवाला बनाकर भैया ने दो चार पल बीताने को मन कर जाये ऐसी छोटी सी सुन्दर बाड़ी(बगिया) बनायीं थी।

पर आज तो उसने कुछ नया ही नजारा देखा। भैया ने,किसी बाड़ीवाले की लड़की को पुत्रीवत लाड़ से बुलाया, राव को यह दृश्य नया लगा, क्योंकि पानी को उसने आज ही देखा था।

`भैयादादा! यह लड़की किसकी है?’आज विनायकराव `भैया’ बोल नहीं सका।

यह तो बाडीवाले की है। बेचारी आठ दिन हुए,वह बकरी दूह देती है। ईश्वर उसका कल्याण करे!’

पानी ठंडे पानी का चमकता-दमकता हुआ लोटा लेकर आई थी। छोटी सी आठ-दस वर्षीया लड़की

की आँख में काजल ऐसा तो सुरेख ढंग से निकला हुआ था कि विनायकराव की दृष्टि वहां जमी की जमी रह गई।

`भैयादादा! अब जाती हूँ,हाँ।’

‘टिलाडी को दूह लिया?’

 टिलाडी भैया की बकरी का नाम था। भोले भैया ने टीका देखकर उसका नाम टिलाडी रखा था।

यदि इन्सान के ऐसे नामकरण हों तो इन्सान भी पशु से बेहतर लगे और शब्द भी यथार्थाक्षर: हो जाये।

`हाँ,भैयादादा!’

`ठीक है। जाओ,कल जल्दी आ जाना हाँ।’

पानी चल दी,पर कुछ देर हुई नहीं कि वह वापस लौटी:

`भैयादादा! चार दिन बाद दीवाली है। क्या आपको लपसी पिसवाना नहीं है?’

वृद्ध भैया हर्षित हुआ। उसने मीठी हंसी बीखेर दी: मुझे और लपसी?’

`ऐसे थोड़े ही होता है? सब लोग खायेंगे-जूठायेंगे और क्या आप नहीं खायेंगे?’

विनायकराव ने नि:श्वास छोड़ा।

`ठीक है, ले, थोड़े से गेहूं ले जा लेकिन बहुत मोटा नहीं पिसना।’

`ना,दादा! मैं तो झीना ही दलती हूँ।’

पानी बिदा हुई। किसान की वह लड़की भैया को इतनी ममतापूर्वक चाह रही थी- विनायकराव को आज ही इस बात का पता चला। उसने धीरे से कहा :`भैयादादा! आप यह नौकरी अब छोड़ दीजिये। अब उम्र भी हुई है।’

अब मुझे कितने वर्ष निकालने हैं? भैया ने जवाब दिया,`ज्यादा से ज्यादा पांच।’

`इसीलिए कहता हूँ कि अब भजन करो!’

`अब इस उम्र में मैं किसका सहारा थामूं! लड़का प्लेग का शिकार हुआ; उसकी बहु भाग गई, अब तो एक मात्र पेट ही है तो भगवान जब तक चलाये तब तक काम करते रहना है और खाना है।’ बद्रीनाथ ने जवाब दिया। विनायकराव का अंत:करण भैया के जवाब से और अधिक आर्द्र होता जा रहा था। वह जाने के लिए खड़ा हुआ तब उसे अचूक लगा कि भैया को उसकी बाड़ी के प्रति माँ से अधिक प्यार था।

दूसरे दिन ट्राफिक इन्स्पेक्टर बराबर नियम से ऑफिस में उपस्थित हुए थे; सामने अपना माथा झुकाए विनायकराव खड़ा था।

`क्यों राव! आप उस भैया बद्रीनाथ की जगह पर किसे बदल रहे हो?मैंने देखा है कि वह बुढा सारा वक्त पेडपौधों को निराने के पीछे बीताता है!’ साहब ने अपनी अवलोकन शक्ति से आश्चर्य अनुभव करने से शुरुआत करके बाघ की सी तीखी नजर से उस विनायकराव की ओर देखते रहे।

राव के मन में कुछ उलझन चल रही थी। एकबार तो उसे अपनी जेब से त्यागपत्र का कागज भी कुछ बाहर आया हुआ नजर आया; पर तुरंत उसके हाथ-पैर कांपने लगे और उसने साहब की ओर झुककर सलाम की।

`विनायकराव!’ बिल्ली जैसे चूहे से खेलती है ऐसे साहब ने पासा फेंका।`आपने क्या सोचा?’

विनायकराव ने विचार करके कुछ जोश तो कुछ रोष करते हुए कहा: `यह नहीं होगा!’

साहब ने होठ चबाये:`क्या?’

हमेशा की गुलामी–कमजोरी अपना जोर ज़माने लगी। राव ने होशोहवास खों दिया। उतायली में भूल हो गई-इस बात को वह समझ गया। वह कही गई बात को बदलने में माहिर होने के कारण तुरंत बोला;` साहब! यह तो मैं किसी और विचारों में उलझा हुआ था। भैया बद्रीनाथ की जगह पर कालू को रखना बेहतर होगा!’

`हाँ,और बद्रीनाथ भैया को चौबीस घंटे का नोटिस दे दो!’

`बहुत बेहतर!’शिरस्तेदार झुककर सलामी देकर बाहर चला गया।

फिरभी विनायकराव ने वृद्ध भैया को कुछ तो मदद की। दूसरे दिन भैया को साहब की हुजुर में लाने के लिए उसने एक खबर भेजी बुढा हाजिर हुआ। साहब अपने कमरे में अधिकारी के रुआब से उतने ही अकड़कर बैठे हुए थे। भैया को देखते ही कहा;`तुम्हारा नाम भैया बद्रीनाथ?

`जी हाँ,साहब!’

`तुम बड़े बूढ़े हो गए हो सरकार की नौकरी की,अब तो आराम लीजिये!’

`जी हाँ,साहब! यह सफेदी नौकरी में ही आयी है।’

`अच्छा!’

भैया तो इस उम्मीद में था कि साहब लम्बी नौकरी के लिए कुछ इनाम देने की सोच रहे होंगे। ऐसे में साहब ने कागज से मुंह उठाकर उसकी तरफ रुख करके समाचार दे दिए:`अच्छा। तुम विनायकराव कूं मिलो। तुम्हारा हिसाब करने के लिए हुक्म दे दिया है,अब तुम आराम करो!’

वज्रपात हुआ हो ऐसे भैया मूढ़ की तरह साहब के सामने खड़ा रहा। अपनी हद में दुर्घटना होने से रह गई,वह बात उसे याद आई। साहब इसलिए उसे बरतरफ कर रहे हैं। आख़िरकार यह बात उसकी समझ में आ गई। वह आर्द्र होगया,`साहब! आज अब…’

साहब बद्रीनाथ की ओर देखता रहा। बद्रीनाथ ने कुछ आगे बढ़कर कहा;` साहब! आप मेरा बुढ़ापा  क्यों बिगाड़ रहे हैं?अब मुझे कौन रखेगा?’

`बूढ़े,बेटा तो है ना?’

`जी,ना! प्लेग…’बद्रीनाथ ज्यादा बोल नहीं सका।`मेरा झोंपड़ा और पेड़-पौधे ही मेरे बच्चे है, अब आखिरी दो-चार वर्ष वहां गुजार लेने दीजिये।’

`अ फुलिश सेंटीमेंटलिस्ट!(मूर्ख रोतल(रो पड़नेवाला) साहब ने उस बुढऊ के शब्दों को मानसशास्त्र में तौलकर देखा।

`ठीक ,ठीक,सोचेंगे,अभी तो जाओ।’

पर भैया बद्रीनाथ तो विनायकराव से मिले बिना धीमी चाल से अपने झोंपड़े पर गया। जिस जमीन के साथ वह बालक की भांति पच्चीस वर्ष तक खेला था,उस जमीन को अब कुछ दिन के लिए छोड़ते हुए उसका दिल कांप रहा था।

दूसरे दिन विनायकराव टहलने के लिए गया। बद्रीनाथ की नौकरी का वह आखिरी दिन था। भैया चौकी पर ही विनायकराव का रास्ता देख रहा था।

`का?काय होईल का? उसने बड़ी आतुरता के साथ विनायकराव से पूछा।

`नहीं,तुमाला जावें लागेल। दूसरा मनुष्ययांची नेमणुंक ढाली।’

बद्रीनाथ भावुक हो गया,लेकिन साहस करके बोला:कल सुबह?’

`हाँ।’

विनायकराव तुरंत भैया के पैरों में गिर पड़ा!

`अरे,अरे! रावसाहब,यह क्या?’

`भैयादादा! यहाँ से सीधे मेरे घर आ जाना। मुझे अपने बेटे जैसा समझकर मेरे साथ रहिये।’

`अरे रावसाहेब!’ भैया फीका हंसा,`यह आपकी उदारता है पर मैं तो यहीं कहीं इस जमीन के पास रहूँगा।’

विनायकराव ने सोचा कि दूसरे दिन भैयादादा को समझायेंगे। दोनों जब उठे तब भैया ने अश्रु सहित विनायकराव को गले से लगा लिया। दो-तीन बिलौटे तो उसके बूढी देह पर खेल रहे थे।

`रावसाहब! मैं इन्हें आपको सौंप रहा हूँ हाँ!;’बुढा इतना ही कहा सका और दोनों विलग हुए।

दूसरे दिन सबेरे दिन उगा नहीं उगा कि विनायकराव आ गया था। पानी भी बकरी को दुहने के लिए उपस्थित हो गई थी। विनायकराव चौकी पर बैठा क्योंकि भैया अभी तक बाहर नहीं आया था। अंतत: थककर पानी ने दरवाजा खटखटाया। किंवाड तो खुला ही था।

`भैयादादा! ओ भैयादादा! किसान की बेटी का स्नेहिल स्वर एकांत खेत में स्पष्ट रूप से चीख रहा था।

`भैयादादा! चलिए,चलिए टिलाडी को दुह रही हूँ!’

पर भैयादादा ने जवाब दिया नहीं।

पानी ने अपनी आवाज को थोडी ऊँची करके कहा,` और यह रही आपकी दीवाली की लपसी,दादा!’

अब विनायकराव उठकर वहां गया। झोंपड़े में अडिग और खड़े होकर वृद्ध भैयादादा ओढ़कर आराम से सोये हुए थे। बिलौटे उसकी देह से सटकर खेल रहे थे। मेमने तो उसके बिछौने के पास बैठकर करुण स्वरों में मिमिया रहे थे।

विनायकराव की आँखें डबडबा आई और भीतर गया।

पानी दादा की देह को हिलाकर हंस रही थी। अभी भैयादादा `रुक,अभी पकड़ता हूँ’ कहकर ऊठेंगे ऐसे विनोद की आश के साथ खुश होती हुई हंस रही थी। विनायकराव ने पास जाकर शरीर को खूब टटोला और जोर से चिल्लाये:`भैयादादा!’

झोंपड़ी से कोई निकाले नहीं इसलिए भैयादादा अडिग सोये रहे।

विनायकराव की आवाज फट गई और उसकी आँखें चूने लगी। उसने पानी की ओर मुड़कर कहा,

`पानी! अब भैयादादा नहीं बोलेंगे।’और कभी मान नहीं सकते छोटी लड़की ने भैयादादा की देह के पास जो रुदन किया, वह आज भी मुझे जब याद आता है तब मेरे जीवन में बिजली जैसे झटके लगते हैं। अनंत समय और अगाध आकाश को भेदकर वह स्वर बारबार सुनाई देगा।

+ + +

भैयादादा की बाड़ी में अब कभी भी ऐसी सफाई रहती नहीं है। फाख्ता, बैठते थे,गोरैया गातीं और कोयल बाड और बेलों के अन्दर चली जाती रहती थी -ऐसी सृष्टि अब वहां नहीं है। काम करनेवाली आत्मा के बदले काम करनेवाली काया है। बीसवीं शताब्दी को काव्यमय जीवन से क्या लेना-देना?संस्था…को व्यक्ति के निजी भव्य जीवन से क्या निस्बत? यंत्रवाद नियमित जड़त्व के बदले में रसमय चैतन्य का क्या करे? इस यंत्रवाद में एक दिन यह जगत भी यन्त्र जैसा होकर रहेगा।

संपर्क:2-`शील-प्रिय’,विमलनगर सोसायटी,नवाबजार,करजण.जिला.वड़ोदरा.गुजरात.पिनकोड:३९१२४०. मोबाईल:९९२४५६७५१२.E.Mail Id : navkar1947@gmail.com

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ओड़िया कहानी-बिना मिट्टी के पृथ्वी: भूपेन महापात्र (अनुवादक- स्मृतिरेखा नायक)

 ओड़िया कहानी                                     

बिना मिट्टी के पृथ्वी

                                                                  मूल लेखक- भूपेन महापात्र

अनुवादक- स्मृतिरेखा नायक

सूखी खुद एक किलोमीटर दूर नदी से पानी लाती है।  अस्पताल भी आठ किलोमीटर दूरी पर है और उसी आठ किलोमीटर दूर में लगी बाजार को शाल पत्र, दातुन, जंगली चीजें आदि बैचने के लिए जाती है। इसलिए उसके लिए दो किलोमीटर की दूरी कुछ भी नहीं है। असल बात तो यह है कि वह रास्ता सही नहीं है। रास्ता जंगल से होते हुए बाजार तक जा पहुँचती है। इतना घना जंगल है कि उसमें भेड़ से लेकर शेर तक सभी की संख्या बहुत अधिक है। कभी-कभी तो हाथियों की झुंड अचानक से रास्ते पर आ पहुँचती है। वह चईना को एक-दो बार बताई है कि —“चलो हम शहर को चले जाते हैं। यहाँ तो जंगल से कुछ खास जंगली चीजें नहीं मिल रही है। अब तो हर बात में नियम कानून बना दी गयी है। पेड़ में हाथ देते ही पुलिस आँख दिखाने लगती है। चलो ! शहर को चले जाते हैं। अंतत: वहाँ हम दोनों को काम तो मिलेगा। मैं घर-घर में जाकर काम कर लूँगी। वहाँ पर बाबू लोगों के घर में काम करने को मिल जाती है। और तुझे भी काम की कमी नहीं होगी। इसमें क्या परेशानी है ?”

            शुक्रा को भी पढ़ा पायेंगे। सुना है वहाँ हर बस्ती में स्कूल है। स्कूल की संख्या इतनी अधिक है कि पढ़ने के लिए बच्चे नहीं मिलते। यह बात सुनकर चईना का सिर फिर जाता है। वह गुस्से में आकार कहता है, तेरे दिमाग पर यह सब बातें कौन डालता है ? पढ़ाई क्या है ? इंसान कैसे जियेगा उसके बारे में कोई चिंता नहीं, बोल रही है बच्चा पढ़ेगा कैसे ? तू मुझे बस इतना बता दे कि अगर सभी पढ़ने में ही जुट जायेंगे तब गाय कौन रखेगा ? जंगल को कौन संभालेगा ? हम यहाँ है तभी तो जंगल है, नहीं तो यह पुलिस वाले क्या इसे रहने देते ? जंगल न हो तो हम कैसे जियेंगे ?

            सूखी कभी-कभी सोचती है कि इन परूषों को कौन कैसा बनाया किया ? कुछ भी नहीं समझते हैं। अगर पढ़ाई जरूरी नहीं है तब ऐसे हजार-हजार बच्चे क्यूँ पढ़ते हैं ? उनके माँ-बाप क्या मूर्ख हैं ? दूसरे गाँव के बच्चे तो साइकिल से स्कूल जाते हैं।

            वह चईना को समझाने की कोशिश में लगी रहती है। पढ़ाई की भी अपना महत्व है। अगर नहीं है तो सरकार बच्चों को किताब, कपड़े, मध्यान्ह भोजन की योजना, साइकिल आदि क्यूँ देता ? कभी-कभी उसे दु:ख भी होता है कि उसकी और एक-दो बच्चे होते तो कितना अच्छा होता ? स्कूल से एक वक्त की खाना तो मिलती है। जितने दिन चाहते स्कूल जाते, उसके बाद जमीन की देख-रेख करते और कहीं मजदूरी करते। पर चईना वह सब बातें बिलकुल भी नहीं समझता है। कहता है, पढ़ाई से बेकार और कुछ नहीं है और  इस बारे में मुझसे बिलकुल बात नहीं करना।

            हर दिन की तरह उस दिन भी सूखी चईना को हाथ जोड़कर कहने लगी— “बेटे को जरा जंगल के उस पार छोड़ आओ, ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। मैं तुम्हारे गाय-बकरी को लेकर जंगल जाती हूँ ।”

            स्थिर होकर चईना सूखी को देखना लगा। उसके बाद बोला –“तू तो पढ़ाई को जोंक जैसे पकड़ के रखी हो। उससे सारा रक्त क्या तू अकेले ही चूस लेगी ? ज्यादा मत चूस। जोंक जैसे फूलकर मोटि हो जाएगी।” उसने सूखी की बात अनसुना कर दिया। सूखी ने देखा कि दूसरे टोली वाले बच्चे चले गए हैं। उनके साथ जाता तो चला जाता। पुआल की बने हुए छप्पर में घुसाये हुए लकड़ी की डांडा को निकालकर वह खुद तैयार हो गयी। चईना भी अपने काम को जाने के लिए तैयार है। उसने सूखी को पूछा —“तू कब तक लौटेगी ? मैं आज साहूकार के घर जाऊँगा। साला, आज को तीन महीना हो गये मगर तलाब खुदाई करने का पैसा अब तक नहीं दिया है। बोल रहा है कि सरपंच नहीं दे रहा है। और सरपंच बोल रहा है ब्लॉक से नहीं मिला है। साला कौन यहाँ सही है ?”

            अरे! तू थोड़ा धीरे से बोल, रास्ते से जा रहे लोगों में से अगर कोई सून ले तो खैर नहीं। मैं क्या गलत कह रहा हूँ ? अब तक गंदी गाली तो नहीं बका है न ? मैं तुझे गाली देने की बात नहीं कह रही हूँ , तो तू क्या कह रही है ? मैं अभी आती हूँ।

            सूखी बेटे को लेकर चली गयी। रास्ते में बेटे को समझाती है – “मास्टर जी किताब और पेंट –सर्ट देंगे, वह सब लेते आना। हाँ, और एक बात भात खाने समय कुछ भी नहीं छोड़ना। बाद में भूख लगेगी।” जंगल पार होने के बाद भी और कुछ रास्ता बेटे को पैदल चलना है। अब उसे कोई डर नहीं। सूखी उस जंगली रास्ता पार कराकर बेटे को दूसरी गाँव के रास्ते तक पहुँचने तक खड़ी होकर वहाँ से देखने लगी। आते समय ओर कोई डर नहीं, बाकि बच्चों के साथ वापस आ जायेगा।

            सूखी की लौटने तक चईना वैसे ही घर के सामने बैठा हुआ था। हैरानी की बात है, तू तो साहूकार के घर जाने बाला था ?

            ‘क्या हुआ तूझे ?’

            ‘नहीं गया ?’ सूखी पूछने लगी।

            “जाने से क्या होगा ? साला दृष्ट कहीं का ? घनिआ गया था उसके घर, बोल रहा है स्वतन्त्रता दिवस के दिन आए हुए मंत्री जी के लिए जो दावत हुई थी उसमें खर्च हुए पैसा हमारा मजदूरी का पैसा है। हिसाब लगाने के बाद जितना बचेगा उसे हम सब में बांट देगा।” यह सुनकर सूखी कहती है “उसमें से हमें कितना मिलेगा ? हम तो किसी खाने में शामिल नहीं हुए थे, न कहीं खाये थे। हम तो ये भी नहीं कहे थे कि हमारे पैसों से दावत दी जाए ?”

            “मैं क्या ऐसे ही गुस्सा हो रहा था ? मौज – मस्ती तुम करोगे और पैसे हम देंगे ? यह कैसा न्याय है ?  तुम इतना गुस्सा होकर भी क्या कर लोगे ? मार-पीट करोगे क्या ? गुस्सा करने से अपना ही नुकसान है। भलाई इसमें है कि चूप रहो और देखो क्या नतीजा निकलता है। सब जो करेगें हम भी वही करेगें।”

            घर के अंदर जाकर सूखी फिर वापस आँगन में आ गयी और गहरी सोच में डूब गयी। चईना पूछता है “तू क्या सोच रही है कि बच्चे को जैसे भी हो पढ़ाएगी ? क्यूँ उसके पीछे इतनी लगी हुई है ? पढ़कर क्या तुझे वह पक्का घर में रखेगा ? और तू कुर्सी-मेज पर बैठेगी ?”

            “तू क्यूँ हर वक्त उसी बात को लेकर शुरू हो जाता है ? उसके पढ़ाई में तेरा कौनसा पैसा खर्च हो रहा है ? उसे तो सरकार सब दे रहा है। दिन में चावल-दाल भी मिल रहा है, नहीं तो तू दे पता क्या ?” अब चईना भी गुस्से में आ गया। “मैं दे रहा हूँ तेरे सरकार को ! वह तो देख रहा है न वे लोग कैसे हमारे पैसे से मजा कर रहे हैं ? अब बेटे को सात साल पूरा होकर आठ साल होने को है। धीरे-धीरे वह भी अब सियाना होने लगा है। इस उम्र में उसे काम शिखना चाहिए। घर चलाने में मेरा मदद करना चाहिए , मुझे भी थोड़ा आराम मिल जाता। तू गाँव के दूसरों बच्चों को देख नहीं रही है ? हमारे गाँव के कितने बच्चे स्कूल जा रहे हैं बोल तो ? यह कहकर वह थोड़ा शांत हो गया जैसे आग से लोहे को निकालने के बाद धीरे-धीरे ठंडा होने लगता है।”

            “तू मेरा बात सून ! वह फिर कहने लगा, दीना राऊत मुझे कह रहा था, बेटे को मेरे पास छोड़ दे। मैं उसे शहर में दूध बेचने वाले होटल में रखवा दूँगा। बहुत बड़ा होटल है। एक दिन में कम-से-कम दस हजार रोजगार वहाँ होता है। उधर खा-पीकर दो-चार दिन में ही तगड़ा हो जाएगा। माह की माह तनख्वा भी मिलेगी। बैसे भी क्या काम करना है ? बस बर्तन धोना है और रषोईया की थोड़ी मदद करनी है।”

            सूखी चूप होकर सून रही थी। बेटे की पढ़ाई और नहीं हो पायेगी। यह बात उसे बहुत कष्ट पहुंचाई  थी। एक ही तो बेटा है, भगवान उसे दो भी नहीं दिये हैं। दो अक्षर पढ़ता तो गाँव में उसका इज्जत होता। गाँव के थोड़े बहुत पढ़े-लिखे बच्चों को वह देख रही है। उनमें से कई तो ब्लॉक ऑफिस, पंचायत ऑफिस में काम करके पैसे कमा रहे हैं। पैंट-सर्ट पहन कर साइकिल में आना-जाना करते हैं। जरा-सी कष्ट सहकर बेटे को पढ़ाती तो दस साल बाद उसको अपने बेटे पर फक्र होता। और पढ़ाई का भी सारा खर्च तो सरकार उठा रहा है।

            फिर सूखी सोचने लगी कि दो वक़्त के लिए खाना मिले तो सही, इतवार के दिन तो स्कूल छुट्टी रहती है और रात में तीनों का पेट भूखा रहता है। कुछ समेटना चाहे तो बाकि बिखरा हुआ रहता है। कमाई तो थोड़ा –सा है और खर्च उससे कई गुना ज्यादा। कहाँ से होगा ? दो लोग चाहे जितने भी काम करें पर वहीं सरकार छलकर भूखे रहने के लिए मजबूर कर देता है। “चलो ! हम दोनों तो न खाकर पानी पीकर सो जायेंगे मगर बच्चे का पेट खाली रहेगा तो क्या हम शांति से रह पायेंगे ? खाने के लिए कुछ दो सुनते ही जैसे माथे पर पहाड़ टूट पड़ता हुआ लगने लगता है।”

            बी.पी.एल कार्ड तो है मगर खाली कार्ड रहने से क्या होता है ? सरकार चावल देगा तो उसके लिए भी पैसे चाहिए। अचानक उसकी दिमाग में यह सवाल उमड़ने लगी कि सरकार के घर में तो हमारा ही पैसा है। इसलिए सरपंच को हमें दो रूपये वाली चावल देना चाहिए और हम मुफ़्त में तो मांग नहीं रहे हैं। यह सब सुनकर चईना आश्चर्य से उसे देखने लगता है। तेरे दिमाग में इतनी बुद्धि कहाँ से आती है ? दीना राऊत कि बात सूखी की मन को फिर से उदास कर दिया। पर किसी भी प्रकार वह अपने बेटे को होटल में बर्तन धोने नहीं  देगा। चाहे उसके लिए वह खुद को तैयार कर लेगी पर बेटे को जैसे भी हो पढ़ने देगी। बच्चे का भी पढ़ने में मन है। जितना हो पायेगा उतना पढ़ेगा और बाद में उसके किस्मत में जो होगा उसे वह भुगतना पड़ेगा। वह चईना को यह सब बातें खुलकर बता दी। शूक्रा का पढ़ाई बंद नहीं होगी। चाहे इसके लिए मुझे उसी होटल में काम क्यूँ न करना पड़े ?”

            “धेत ! चईना ज़ोर से चिल्लाने लगा। तू औरत जात ! जाकर होटल में काम करेगी ? होटल में काम कब शुरू होती है और कब खत्म होती है उसके बारे में कुछ पता है ? शुबह के चार बजे से शुरू होकर रात के ग्यारह बजे खत्म होती है। तू मर्दों के साथ रात में काम करेगी ? और तू रहेगी कहाँ ? शहरी मर्दों के बारे में कुछ आता-पता है ?” बोलते-बोलते चईना के मुँह में स्मित अर्थपूर्ण हास्य उभरने लगी। सूखी को यह हँसी सुई जैसे चुभ गई। वह सोची कि यह जान-बूझकर चईना ने कहा है। मर्दों के साथ काम करने से क्या होगा ? क्या यहाँ में मर्दों के साथ काम नहीं करती हूँ ? मिट्टी उठाते समय कितने बार सीना से सीना टकराया है। मदन भोई हो या सपन तंति, जाने या अनजाने में, न जाने कितने बार धक्का हुआ है। यह नहीं हुआ है, कहा नहीं जा सकता। उसके हाथ-पैर भी खूब शक्त एवं मोटा है। बड़े-बड़े पैडों को काटकर जंगल से घर तक सिर के बल पर उठा ला सकता है। लेकिन कभी उसे किसी जानवर जैसे भूखे आँखों में नहीं देखा है।

            हाँ, सरपंच दाम सिंह की बात कुछ अलग है। मिट्टी की खुदाई करने समय वह कई बार सूखी के पास जाकर खड़ा हुआ है, हँसा है और उससे मज़ाक करके बात करने की कोशिश किया है। मगर सूखी उसे कभी सीधे मुँह न कभी देखी है न उसके साथ बात की है। हर साँप जैसे बीन सुनने के लिए नहीं ठहरते हैं, उसी तरह हताश होकर लौटने वाली लहर जैसे हृदय लेकर वह लौट जाता था। हजारों पुरूषों के पास काम करने या जान बूझकर कोई उसके शरीर से घिसने से उसको क्या फर्क पड़ता है ? वह अपने को मजबूत बना ली है। उसके शरीर और मन को काबू में रखी है। लेकिन आज चईना यह क्या कह रहा है ? वह क्या सूखी को आज पहली बार देखा है ? दस साल से घर-संसार करने के बाद यह पहली बार देखा है ?

            ये भी तो एक मर्द है। सब मर्द समान हैं। सिर्फ खूद की औरत को छोड़कर सारे मर्द दूसरें औरतों को देखते रहते हैं। सूखी के अंदर एक नारी सुलभ स्वाभिमान उमड़ पड़ा, जिसके ऊपर थोड़ा सा भी दरार सहन नहीं करेगी।

            तूम क्या मुझे उस तरह की औरत समझते हो ? ऐसे क्यूँ कह रहे हो ? ऐसे क्यूँ कह रहे हो ? मुझे काम करना है और मैं करूँगी भी। मैं मर्दों को दोष नहीं देती हूँ। हम औरतों का भी दोष है। पैर फिसलने से गहरे पानी में जा गिरेगें और उठ नहीं पाएंगे। सूखी वहाँ से चली गई। गुस्से से एक जहरली साँप जैसे वह फाँ-फाँ कर रही थी। इतनी छोटी सी बात पर सूखी इतनी आग बबूला बन जायेगी यह बात चईना को पता नहीं था। वह तो मज़ाक में बोल दिया और चूप हो गया।

            उस दिन दोपहर को चईना खाकर घर के सामने छांव में चटाई बिछाकर सोया हुआ देखकर सूखी चौंक गई। वह तो दोपहर में कभी नहीं सोता है। पिछली रात को भी कुछ नहीं खाया था। तब वह तो कोई सोचने बाली बात नहीं है। इस टोली में कितनों के घर में चूल्हा दो बार जलती है ? हाँ ! दो दिन पहले साहूकार के दुकान से दो केजी चावल उधारी से लाया था तब आज दिन में भात पका था। खाने के बाद चईना को नशे जैसे लगा होगा और अब अभी काम भी तो कुछ करने को नहीं है।

            ‘तू सो गया ?’

‘कहीं जाने का नहीं है क्या ?’

            तबीयत ठीक नहीं लग रहा है। बुखार जैसे लग रहा है। सूखी उसके सिर पर हाथ रखी तो उसे पता चला कि चईना को तेज बुखार है। “तू बाहर क्यों शोया है ? मैं घर के अंदर बिस्तर लगा देती हूँ । वहाँ जाकर सो जा। बारिश भी होने बाली है। सूखी परेशानी में पड़ गयी। घर के मर्द अगर बिस्तर पर आ जाए तब चारों ओर अंधकार दिखाई पड़ती है। वही साहूकार बुखार की दवाई भी देता है और तंत्र-मंत्र के पानी भी। सभी का वह पहला डाक्टर होता है।

            कहता है कि “ईश्वर के नाम पर एक रूपये रखकर प्रणाम करो।” सूखी सोची कि संध्या समय उसके पास जायेगी। पर यह नहीं हो पाया। संध्या से पहले झड़-तूफान होने लगी। बिजली कड़कने लगी। सूखी देवी माँ के पास दीया जलायी और प्रार्थना की। अब वह क्या करेगी, कहाँ जायेगी ?  कौन उसकी मदद करेगा। उसके आँखों से आँसू बहने लगी। सूखी को इस विपत्ति से बचाने के लिए कोई नहीं है। मनुष्य के पास इसी तरह के विपदा कभी-कभार आती है जहाँ सब होते हुए भी कोई नहीं होता है। मनुष्य का भरोसा केवल ईश्वर पर और किसीके ऊपर नहीं। सूखी के जीवन जंजाल में ईश्वर ने कभी कोई सूखी नहीं दिया है। इस बात को सूखी कई बार परखा है। फिर भी वह ईश्वर से गुहार लगाती रहती है। इस जीवन रूपी समुद्र में कहीं कोई सहारा न देने समय अगर वह सहायता कर दें तो उसकी घर बच सकता था।

            चईना को सात दिन से बुखार हुआ है, छूटता ही नहीं। सभी प्रकार के ईलाज करा चुकी है। साहूकार बैदराज से लेकर चमनपूर के तंत्र-मंत्र के साधक भी दो बार झाड़-फूँक किया है पर नतीजा कुछ नहीं। उस दिन सरपंच आया था, कहा कि इन सब देहाती ईलाज को छोड़कर सरकारी अस्पताल जाओ। वह अपने और से कहा “मैं आदमी भेज दूंगा, वह दवाई लेकर आजाएगा।”

            जब सूखी उधारी से लाये हुये दस रूपये सरपंच को दिए तब अचानक से सरपंच खड़ा हो गया और कहने लगा  “अरे! यह क्या बात हुई। सरकारी अस्पताल में मुफ्त की दवाईयां मिलती है। वहाँ पैसों की कोई जरूरत नहीं है। अरे! सुरिया तू चला जा, मेरा नाम डाक्टर बाबू को कहना और दबाई लेते आना। उसके बाद वह घूमकर सूखी से कहा, ठीक है तू उसे दस रूपये दे दे। वापस आने में एक दिन तो चला जाएगा, रास्ते में कुछ खा-पी लेगा। बेचारा वह भी तो गरीब है। अपने से खाने के लिए कहाँ से पैसे लायेगा।”

            रात के करीब दो बजे तक सुरिया खाली हाथ लौट आया। कहा कि वहाँ डाक्टर या कम्पाउंडर कोई नहीं था। सात दिन से बंद है।  वहाँ एक लड़का बैठा था। उसने  दो दिन के बाद आने को कहा है।  तभी डाक्टर से मुलाक़ात हो पायेगी। बुखार ही तो हुआ है, इतना परेशान होने की क्या है ? सूखी की दु:ख पहाड़ जैसे बढ़ती जा रही थी। चईना चित्कार करने लगा। “ओह! मुझे पकड़ो, पकड़ो ! सूखी दौड़ते हुए उसके पास गयी। चईना ज़ोर –ज़ोर से हाथ पैर पटक रहा था और सिर पकड़कर रोता जा रहा था। माँ –बेटे दोनों उसे ज़ोर से पकड़े हुए थे पर उसे संभाल नहीं पा रहे थे।”

            पड़ोश में रहने वाला नरीया चईना के घर गया और कहा कि ‘सूखी, अगर तू कहेगी तो मैं एक खटिया और उसे ढ़ोहने वाले आदमियों को साथ ले आऊँगा। उनके साथ मैं भी चलूँगा। वे कुछ नहीं लेगें। शहर के बड़े अस्पताल को इसे ले जायेंगे। इसके बिना ओर कोई ऊपाय नहीं है। पर इसके लिए भी कुछ चाहिए। मैं एक बात कहूँगा, मानोगी ?’

            सूखी आँसू चाहे जितना पोंछ रही थी लेकिन आँसू खत्म ही नहीं हो रही थी। आँसू क्या कभी खत्म होती है ? शायद भगवान इन आँखों के पीछे एक विस्तृत नदी जोड़ दिये हैं, जिससे हर बात में, काम में और हर समय औरतें आँसू से मुँह धो पायेंगी  ईश्वर द्वार दी गयी यह एक सुंदर वरदान है। इसे कोई बदल नहीं सकता है।

            नरीया ने कहा “तू पैसों की इंतजाम करने चली जा, मैं यहाँ खटिया और बाकि इंतजाम करता हूँ । आज रात में ही इसे अस्पताल ले जाना होगा। रात होने से क्या है ? हम चार लोग तो जा रहे हैं, डरने की कोई बात नहीं है। नरीया की बात मानकर सूखी गाँव के अंदर के तरफ भागने लगी और जाकर साहूकार की पैर पकड़ ली। ‘मुझे बचाओ साईं ! जो कहोगे वही करूंगी। मुझे बस अभी ५०० रूपये उधारी दे दो। मैं चईना को लेकर बड़े अस्पताल को जाऊँगी। नहीं तो मैं आपके पैर नहीं छोडूंगी।

            साहूकार खा चुके थे और खड़े होकर अपने मोटे से पेट पर हाथ फिरा रहे थे। कुछ समय तक शांत हो गये। उसके बाद कहने लगे ‘अरे! तू क्यूँ रो रही है ? इसमें रोने की क्या है ? हाँ, तू विपत्ति के समय में मेरे पास आयी है, इन कुछ रूपये के लिए…क्या मैं नहीं दूँगा ? एक ही गाँव में तो रहते हैं।’

            पर मैं खाली हाथ आयी हूँ। सूखी रो-रोकर कहने लगी। तुम जो कहोगे मैं वह करने के लिए  तैयार हूँ। साहूकार की गला नरम होने लगी और कहा कि “तू तो औरत है, मैं तुझे क्या कहूँगा ? तू कर भी क्या सकती है ? ठीक है, यह ले ! बस यहाँ अपनी उंगली की निशान लगा दे और कुछ करने की जरूरत नहीं है। एक लंबाऔर मोटा –सा कागज उसके सामने रख दिया। उसके बाद सूखी के उंगली में काली लगाकर कागज में प्यार से निशान लगा दी।”

            तब नरीया और शुक्रा भागते हुए वहाँ आ पहुँचे। वे दोनों कुछ नहीं कह पा रहे थे। उनके मुँह से एक शब्द भी नहीं निकल रहा था, जैसे गूंगे हो गए हैं। एकदम चूप होकर खड़ा हुआ शुक्रा ज़ोर से रोने लगा। उसके क्रंदन से सूखी और नरीया के अंदर अज्ञात भय की सिहरण पैदा कर रहा था। शुक्री अपनी माँ को पकड़कर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाकर रो रहा था। बारिश की वह रात अधिक गंभीर और गहरी हो उठी थी। जंगल-पहाड़ सभी उस बारिश के साथ एकात्म हो गए थे।  

                                                                                                                        पता-

स्मृतिरेखा नायक

                                                                                          ग्राम-भीमपुर, पोस्ट-काऊपुर

                                                                                     भाया-बरपदा,जिला-भद्रक

                                                                                        पिन न.-756113, ओड़िशा

                                                                                     Mobile-7749026444

                                                                                                   ई मेल-smruti032@gmail.com 

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पुल पर बैठा बूढ़ा: मूल कथा : अर्नेस्ट हेमिंग्वे- अनुवाद : सुशांत सुप्रिय

( अनूदित अमेरिकी कहानी )

पुल पर बैठा बूढ़ा

मूल कथा : अर्नेस्ट हेमिंग्वे

अनुवाद : सुशांत सुप्रिय

स्टील के फ़्रेम वाला चश्मा पहने एक बूढ़ा आदमी सड़क के किनारे बैठा था । उसके कपड़े धूल-धूसरित थे । नदी पर पीपों का पुल बना हुआ था और घोड़ा-गाड़ियाँ , ट्रक , मर्द , औरतें और बच्चे उस पुल को पार कर रहे थे । घोड़ा-गाड़ियाँ नदी की खड़ी चढ़ाई वाले किनारे से लड़खड़ा कर पुल पर चढ़ रही थीं । सैनिक पीछे से इन गाड़ियों को धक्का दे रहे थे । ट्रक अपनी भारी घुरघुराहट के साथ यह कठिन चढ़ाई तय कर रहे थे और किसान टखने तक की धूल में पैदल चलते चले जा रहे थे । लेकिन वह बूढ़ा आदमी बिना हिले-डुले वहीं बैठा हुआ था । वह बेहद थक गया था इसलिए आगे कहीं नहीं जा सकता था ।

पुल को पार करके यह देखना कि शत्रु कहाँ तक पहुँच गया है , यह मेरी ज़िम्मेदारी थी । आगे तक का एक चक्कर लगा कर मैं लौट कर पुल पर आ गया । अब पुल पर ज़्यादा घोड़ा-गाड़ियाँ नहीं थीं , और पैदल पुल पार करने वालों की संख्या भी कम थी । पर वह बूढ़ा अब भी वहीं बैठा था ।

” आप कहाँ के रहने वाले हैं ? ” मैंने उससे पूछा ।

” मैं सैन कार्लोस से हूँ , ” उसने मुस्करा कर कहा ।

वह उसका अपना शहर था । उसका ज़िक्र करने से उसे खुशी होती थी , इसलिए वह मुस्कराया ।

” मैं तो पशुओं की देखभाल कर रहा था , ” उसने बताया ।

” ओह , ” मैंने कहा , हालाँकि मैं पूरी बात नहीं समझ पाया ।

” हाँ , मैं पशुओं की देख-भाल करने के लिए वहाँ रुका रहा । सैन कार्लोस शहर को छोड़ कर जाने वाला मैं अंतिम व्यक्ति था । “

वह किसी गरड़िए या चरवाहे जैसा नहीं दिखता था । मैंने उसके मटमैले कपड़े और धूल से सने चेहरे और उसके स्टील के फ़्रेम वाले चश्मे की ओर देखते हुए पूछा — ” वे कौन से पशु थे ? “

” कई तरह के , ” उसने अपना सिर हिलाते हुए कहा , ” मुझे उन्हें छोड़ कर जाना पड़ा । “

मैं पुल पर हो रही आवाजाही और आगे एब्रो के पास नदी के मुहाने वाली ज़मीन और अफ़्रीकी-से लगते दृश्य को ध्यान से देख रहा था । मन-ही-मन मैं यह आकलन कर रहा था कि कितनी देर बाद मुझे शोर का वह रहस्यमय संकेत मिलेगा ,

जब दोनों सेनाओं की आमने-सामने भिड़ंत होगी । किंतु वह बूढ़ा अब भी वहीं बैठा हुआ था ।

” वे कौन-से पशु थे ? ” मैंने दोबारा पूछा ।

” उनकी संख्या तीन थी , ” उसने बताया । ” दो बकरियाँ थीं और एक बिल्ली थी और कबूतरों के चार जोड़े थे । “

” और आप को उन्हें छोड़ कर जाना पड़ा ? ” मैंने पूछा ।

” हाँ , तोपख़ाने की गोलाबारी के डर से । सेना के कप्तान ने मुझे तोपख़ाने की मार से बचने के लिए वहाँ से चले जाने का आदेश दिया । “

” और आपका कोई परिवार नहीं है ? ” मैंने पूछा । मैं पुल के दूसरे छोर पर कुछ अंतिम घोड़ा-गाड़ियों को किनारे की ढलान से तेज़ी से नीचे उतरते हुए देख रहा था ।

” नहीं , ” उसने कहा , ” मेरे पास केवल मेरे पशु थे । बिल्ली तो ख़ैर अपना ख़्याल रख लेगी , लेकिन मेरे बाक़ी पशुओं का क्या होगा , मैं नहीं जानता । “

” आप किस राजनीतिक दल का समर्थन करते हैं ? ” मैंने पूछा ।

” राजनीति में मेरी रुचि नहीं , ” वह बोला । ” मैं छिहत्तर साल का हूँ । मैं बारह किलोमीटर पैदल चल कर यहाँ पहुँचा हूँ , और अब मुझे लगता है कि मैं और आगे नहीं जा सकता । “

” रुकने के लिए यह अच्छी जगह नहीं है , ” मैंने कहा । ” अगर आप जा सकें तो आगे सड़क पर आपको वहाँ ट्रक मिल जाएँगे , जहाँ से टौर्टोसा के लिए एक और सड़क निकलती है । “

” मैं यहाँ कुछ देर रुकूँगा , ” उसने कहा । ” और फिर मैं यहाँ से चला जाऊँगा । ट्रक किस ओर जाते हैं ? “

” बार्सीलोना की ओर , ” मैंने उसे बताया ।

” उस ओर तो मैं किसी को नहीं जानता , ” उसने कहा , ” लेकिन आपका शुक्रिया । आपका बहुत-बहुत शुक्रिया । “

उसने खोई और थकी हुई आँखों से मुझे देखा और फिर अपनी चिंता किसी से बाँटने के इरादे से कहा , ” मुझे यक़ीन है ,बिल्ली तो अपना ख़्याल रख लेगी । बिल्ली के बारे में फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं । लेकिन बाक़ियों का क्या होगा ? बाक़ियों के बारे में आप क्या सोचते हैं ? “

” मुझे तो लगता है कि शायद आपके बाक़ी पशु-पक्षी भी इस मुसीबत से सही-सलामत निकल आएँगे । “

” क्या आपको ऐसा लगता है ? “

” क्यों नहीं , ” दूर स्थित नदी के किनारे को देखते हुए मैंने कहा । वहाँ अब कोई घोड़ा-गाड़ी नहीं थी ।

” लेकिन वे तोपख़ाने की मार से कैसे बचेंगे जबकि मुझे तोपख़ाने की संभावित गोलाबारी की वजह से वहाँ से चले जाने के लिए कहा गया था ? “

” क्या आपने कबूतरों का पिंजरा खुला छोड़ दिया था ? ” मैंने पूछा ।

” जी हाँ । “

” तब तो वे उड़ जाएँगे । “

” जी हाँ , वे ज़रूर उड़ जाएँगे । लेकिन बाक़ियों का क्या होगा ? बेहतर होगा कि मैं बाक़ियों के बारे में सोचूँ ही नहीं । ” उसने कहा ।

” अगर आपने आराम कर लिया हो , तो मैं चलूँ , ” मैंने कहा । ” अब आप उठ कर चलने की कोशिश कीजिए । “

” शुक्रिया , ” उसने कहा और वह उठ कर खड़ा हो गया , लेकिन उसके थके हुए पैर उसे नहीं सँभाल पाए , और काँपते हुए वह वापस नीचे बैठ गया ।

” मैं तो केवल पशुओं की देख-भाल कर रहा था , ” उसने निरुत्साहपूर्वक कहा , हालाँकि अब वह मुझसे बातचीत नहीं कर रहा था । ” मैं तो केवल पशुओं की देख-भाल कर रहा था । “

अब उसके लिए कुछ भी नहीं किया जा सकता था । वह ईस्टर के रविवार का दिन था और फ़ासिस्ट फ़ौजें एब्रो की ओर बढ़ रही थीं । वह बादलों से घिरा सलेटी दिन था । बादल बहुत नीचे तक छाए हुए थे जिसकी वजह से शत्रु के विमान उड़ान नहीं भर रहे थे । यह बात और यह तथ्य कि बिल्लियाँ अपनी देख-भाल खुद कर सकती थीं — उस बूढ़े के पास अच्छी किस्मत के नाम पर केवल यही चीज़ें मौजूद

थीं ।

————०————

प्रेषक : सुशांत सुप्रिय

A-5001 ,

गौड़ ग्रीन सिटी ,

वैभव खंड ,

इंदिरापुरम ,

ग़ाज़ियाबाद – 201014

( उ. प्र. )

मो : 8512070086

ई-मेल : sushant1968@gmail.com

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उजास में-भावना सक्सैना

उजास में

भावना सक्सैना

ट्रेन लेट थी। स्टेशन तक छोड़ने आया भाई ट्रेन में बिठाए बिना वापिस जाने को तैयार नहीं था… उसने बहुत कहा अब तुम जाओ, तुम्हें भी अपने घर लौटना है पर वह नहीं माना, वहीं बैठा रहा।

बहुत समय बाद मिलने पर शब्दों में जो अंतराल पसर जाता है वही था दोनों के बीच। दोनों के पास कहने को बहुत कुछ था, लेकिन शब्दों का अपना मन होता है। कभी वे भावों की अभिव्यक्ति का साधन होते हैं तो कभी भाव अधिक हों तो ऐसे शोर मचाने लगते हैं कि उन्हें शांत कर एक ओर बिठाना मुश्किल हो जाता है, फिर कभी अपने ही शोर से घबराकर सारे दुबक जाते हैं।

आज दिन भर भावों और शब्दों की खींचातानी होती रही थी, और होती भी क्यों न? आज बरसों बाद बचपन के बहुत सारे साथी मिले थे। वे सब जो संग खेला करते थे। गुड़ियों के साथी, घर-घर के खेल, गिट्टी, स्टापू, पोशमपा, गिट्टीफोड़, आइस-पाइस के साथी, बाल-कीर्तन मंडली बनाकर गर्मियों की छुट्टियों में बारी-बारी सबके घर कीर्तन करने वाले और जन्माष्टमी पर मिलकर झाँकी सजाने वाले साथी। स्मृतियों में अभी तक फ्रॉक और निक्करों में सजे साथी। वास्तविकता में जो सब अब कुछ और ही हो चुके थे, लेकिन दिल जिनके अब भी वही थे, सबकी दुनिया अलग-अलग थीं, सब मस्त थे अपनी-अपनी दुनिया में। वह भी तो मस्त ही थी अपनी दुनिया में। आसपास की सब दुनियाएं, जो विलीन हो चुकी थीं आज बरसों बाद एक निकट संबंधी के यहाँ से उत्सव के निमंत्रण से पुनः प्रकट हुई थीं, बहुत आग्रह और मनुहार के उस निमंत्रण में कुछ चुंबकीय आकर्षण था, कि वह, जो बरसों से अकेली नहीं गई थी कहीं, आज हिम्मत कर निर्णय लेकर अकेली चली आई थी इन सब के बीच, अपनी यादों के गाँव में, जहाँ मन तो अकसर जाया करता था लेकिन जीवन की भागदौड़ के चलते प्रत्यक्ष जाना न हो पाया था। कल की ही तो शाम थी, आज कितनी पुरानी सी बात लग रही थी, जब वह कितने ऊहापोह में थी, समझ नहीं पा रही थी कि जाना चाहिए या नहीं, फिर जब दिल  ही न माना और बोला – “चली जा, ज्यादा सोचना भी अच्छा नहीं होता”, तो रात को ही सुबह जाकर शाम को लौटने के लिए आरक्षण कराया और सुबह पाँच बजे उठकर चल पड़ी। इस चलने को लौटना तो नहीं कह सकते थे, क्योंकि लौटा तो कहीं जा ही नहीं सकता, जिस राह से, जिस वक्त से एक बार गुज़र गए वह मिटता जाता है, हर पल, हर क्षण। आधे रास्ते में थी तो गाँव में रहने वाले रिश्ते के भाई ने पूछने को फोन किया था कि वह चली है या नहीं और यह जानकर खुशी से उछल गया कि वह वास्तव में चल पड़ी है किंतु उसकी आवाज़ में हैरत भी थी, क्योंकि अनेक बार बुलाए जाने पर भी आज पहली बार था कि वो सच में जा रही थी। गाड़ी पहुँचने का समय पूछकर वह स्टेशन से लेने भी आ गया था और अब वापस पहुँचाने भी।

अच्छा लगा इतने अरसे बाद सबसे मिलकर। बरसों बाद जब किसी से मिलो तो शुरू-शुरू में कहने को कुछ विशेष नहीं होता…. मुस्कुराहट और गले लगने में ही भावों की अभिव्यक्ति होती है, फिर औपचारिक से प्रश्न – आपकी नौकरी सही चल रही है? और सब ठीक है?… खुश हैं? बच्चे कैसे हैं, अपना मकान बना लिया ना? … हाँ अपना ‘घर’ बना लिया कहते हुए वह दो बार मुस्कुराई थी। तू खुद गाड़ी चला लेती है? ‘हाँ’ कहते-कहते गरदन सीधी सी हो गई थी। अपने ऊपर इतराने को जी चाहा था।

कितने अर्से बाद मिले… पहले क्यों नहीं आई इधर?…. संकोच के आप से शुरु हुई बात जब वापिस तू पर आती है, तभी आती है सहजता और शुरू होता है हँसने खिलखिलाने का दौर। इसी दौर में दिन यूँ गुज़रा जैसे चेहरे पर डाला कोई रेशमी रुमाल पल भर में सरक गया हो… रंग-बिरंगा नरम मुलायम, गुदगुदाता हुआ।

पुराने किस्से, शरारतें, पतंग लूटने में बुआ की आँख पर लगी चोट, जूठी पत्तलों को चाटते कुत्ते को भगाने पर एक भाई को उसका काट लेना। कंचों से हंडिया भर लेना, और कितनी ही स्मृतियाँ और स्मृतियों के घर की बातें। वहाँ के पास-पड़ोस के चाचा-चाची, बाबा-दादी, अम्मा के घर में समय-समय पर रहने वाले किराएदार, रामौतार(राम अवतार) चाचा और बहुत कुछ। कितनी ही बातें होती रहीं। स्मृतियों का वह घर है भी बहुत बड़ा, वह गली बहुत चौड़ी है, नीम बहुत सुंदर है और वह तिराहा जिस का नाम होली पड़ गया .. वहां वर्ष में एक बार होली जलती थी और बाकी दिन सबके खेल का मैदान। बाज़ीगरों के तमाशे का स्थल, आज भी वो सारे खेल उसे बहुत याद आते हैं… जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं वो यादें। यूं लगा कितना कुछ घट गया एक दिन में, बचपन का सारा जीवन फिर जी लिया उसने।

साथ-साथ बैठे दो लोग अपनी-अपनी यादों में खोए… भाई बहुत छोटा था उससे, उसका बहुत दुलारा था, इस भाई के लिए सबसे लड़ जाती थी वह, आज रेलवे स्टेशन के छोटे से शैड की बेंच पर बैठे दोनों अपनी-अपनी भावनाओं के ज्वार में बह रहे थे। उसने हौले से भाई के हाथ पर हाथ रख दिया था, दोनों एक दूसरे को देखकर मुस्कुराए, लेकिन बहुत फीकी थी दोनों की मुस्कान मानों वक्त में न लौट पाने का मलाल हो उसमें। भाई का चेहरा खाली बटुए सा निस्तेज लगा था उसे और उसकी आँख में पड़ी उसकी खुद की छवि भी, जैसे कि अचानक यह एहसास हुआ हो कि  कितनी उम्र खर्च कर दी यूँ ही, ऐसे ही उम्र खर्च करते एक दिन बीत जाएँगे सब। बेचैन सा एहसास था लेकिन उस पल भी उसे यह नहीं लगा कि यदि वह अतीत को बदल भी पाती तो उसे किसी और तरीके से जीती।

इन्हीं ख्यालों में खोई थी कि ट्रेन आती दिखाई दी, सामान के नाम पर एक छोटा सा हैंडबैग था जो कंधे पर ही लटका हुआ था सो सामान सहेजने का उपक्रम करने जैसा भी कुछ था नहीं, भाई ने पैर छूकर विदा ली, उस छोटे से स्टेशन पर ट्रेन के रुकने का समय भी तीन मिनट ही था इसलिए वह जल्दी से ट्रेन में चढ़ गई। सीट पर पहुँची तब भी भाई प्लेटफॉर्म पर खड़ा था। नज़रें फिर मिलीं, नज़रों की अपनी भाषा होती है, जिसे शब्दों का सहारा नहीं चाहिए होता। जब तक ट्रेन न चली मौन संवाद बना रहा, जैसे ही गाड़ी चली, एक उदास मुस्कान चेहरे पर फैल गई, “पहुँच कर फोन कर देना”, उसने गरदन हिला दी, गाड़ी आगे सरकने लगी। प्लेटफॉर्म खत्म हुआ और पीछे छूट गया। उदास मुस्कान चेहरे पर चिपकी रही… कच्ची बस्ती से गुज़रकर ट्रेन गाँव की सीमा से बाहर आ गई।

सांझ घिर रही है, शहर से बाहर सरकती ट्रेन की खिड़की से सुंदर दृश्य दिखाई दे रहा है, लालिमा लिए पीछे फैले आसमान के आगे बहुत सारे पत्र-विहीन पेड़ों की कतारें हैं– ऊपर बाहें फैलाए, मानों उनकी एक-एक पत्र विहीन शाखा आसमान छूने की होड़ में हो। आसमान का रंग गहराता जा रहा था, पेड़ सायों में बदलते जा रहे थे। ट्रेन चलती जा रही थी, दृश्य बदलते जा रहे थे, सामने  के चित्र में भी और मस्तिष्क में भी। उसे लगा उजाला बहुत जल्दी सिमट गया अँधेरे के आगोश में, वैसे भी बित्ते भर का फ़ासला होता है अंधेरे और उजाले में।  

अंधेरे में दिखाई नहीं देता,  उजाला ज्यादा हो तो आँखें चुन्धिया जाती हैं और तब भी कुछ दिखाई नहीं देता। उसकी आँखें भी तो यूँ ही चुन्धियाई थीं एक रोज़ उजाले से, कि दिखाई न दिया कुछ, उस उजाले को दामन में भरकर वह आगे निकल आई, पीछे का सब छोड़ दिया…

… छोड़ दिए वो रिश्ते जो हर लम्हा शक में घिरे थे, खुले-खिले बचपन के बाद शहर आकर जो मिले थे, जो हर लम्हा उसे कमतर होने का एहसास कराते थे, कभी छोटी आँखों का कभी चौड़ी नाक का, कभी मुँह टेढ़ा करके अंग्रेजी न बोल पाने का । उसने कभी खुद को सुंदर नहीं समझा पर वो जानती थी वो बदसूरत नहीं है। अच्छा दिखने की कोशिश हमेशा की, लेकिन किशोरावस्था में बैठे इंफेरिओरिटी कॉम्प्लेक्स से कभी पूरी तरह उबर भी नहीं पाई। उसने दुनिया को हमेशा सुंदर देखा…  ऐसा नहीं है कि सब अच्छा है लेकिन फिर भी उसे सदा एक सकारात्मक ऊर्जा का एहसास रहा है। कभी चिड़िया, कभी तितली, ढलती साँझ, मुस्कुराते चेहरे, उसे सभी अच्छे दिखते थे, अच्छे लगते थे। वह उन्हें उनके रूप में देखना चाहती थी, वह दुनिया को सहज जीना चाहती थी, हर पल को छोटी छोटी खुशियों से भरना चाहती थी, और इसीलिए, मुट्ठियों में आत्मविश्वास की किरणें और दामन में उजास भर आगे चली आई थी। निर्णय आसान नहीं था, किंतु दुविधा का दौर लंबा न चला, और ये निर्णय लेने में शायद ईश्वर के भेजे एक शख्स के शब्द एक अहम भूमिका निभा गए। ईश्वर का भेजा इसलिए कि जाने कहाँ से आया जाने कहाँ गया! कभी कभी यूं ही मोड़ पर टकरा जाते हैं कुछ लोग जिनका जिंदगी में कोई महत्व नहीं होता लेकिन फिर भी वे सदा के लिए जीवन बदल जाते हैं। वो ऐसा ही था। बड़े सपाट शब्दों में कह गया था कि यदि आर्थिक और भावनात्मक दोनों ही रूप से वह किसी पर निर्भर नहीं है तो उसे बहुत नहीं सोचना चाहिए, बात उसके ज़हन में घर कर गई थी और सब सोच-विचार कर जल्दी ही उसने सब छोड़ दिया… बढ़ आई आगे, कभी न मुड़ने के लिए।

हाँ उसने सोचा था उसने सब छोड़ दिया, लेकिन छोड़ना आसान है क्या?

यूँ देखा जाए तो छोड़ना तो आसान है लेकिन छूट भी जाए ये मुश्किल है,  सच यह है कि छूटा कुछ भी नहीं करता। जब तक साँस आती है, कहीं भी, कभी भी घटा हुआ घटता नहीं है, स्मृतियों में जीवित रहता है और कभी कभी अपने मूल स्वरूप से भी बड़ा हो जाता है, वह  चिपक जाता है। खाल की तरह चढ़ जाता है, एक परत बन जाता है।

छोड़ने वाला और छूटने वाला दोनों ही अपनी अपनी दुनिया बना लेते हैं… अलग! जिसमें वर्तमान में वे एक दूसरे को जगह दें न दें, एक बड़ा हिस्सा एक दूसरे को समर्पित रहता है। न बातें, न मिलना बस ज़हन में एक याद, एक बात। इन बातों के सूत्र जोड़ने वाले भी होते हैं, दोनों पक्षों के शुभचिंतक, सहृदय, दिल के भोले, प्यारे से, लेकिन थोड़े से कायर। उनमें इतना साहस नहीं होता कि सामंजस्य बिठाने की कोई चेष्टा वो कर पाएं। दोनों पक्षों से मुहब्बत उनकी कमज़ोरी होती है। ये बीच के सारे लोग उसकी कमज़ोरी हैं, एक ऐसा गीत हैं जिसे वह खुलकर गुनगुना भी नहीं सकती और न ही भुला सकती है। इसलिए आज वह उनके साथ कोई फोटो नहीं खिंचाकर आई, उनके भोले विश्वास और निश्छल स्नेह को अपने दामन में भर लाई है, अपने मन में संजो लाई है।

ट्रेन झटके से रुकी तो एहसास हुआ नई दिल्ली स्टेशन पर पहुँच चुकी है। चार घंटे कब गुज़र गए पता भी न चला… सब अपना सामान समेटकर उठ रहे हैं, ऊपर की शेल्फ और सीट के नीचे नज़र मार रहे हैं कि कहीं कुछ छूटा तो नहीं, उसने धीमे से अपने ऊपर चढ़ा खोल उतारा और सीट के नीचे सरका दिया। वह हैरान थी, खोल सहजता से उतर आया और सीट के नीचे जाने से पहले ही गुम हो गया। दिनभर की थकान भी उसके संग उतर गई और वह नई स्फूर्ति से भर उठी। आने वाली कॉल से मोबाइल की स्क्रीन दिपदिपा उठी।

स्टेशन के बाहर उसका वही उजाला उसकी प्रतीक्षा में था जिसे दामन में भरकर वह सब कुछ पीछे छोड़ आई थी। वह जल्दी से ट्रेन से उतर प्लेटफॉर्म लांघती चली गई। बाहर आते ही कार सामने खड़ी मिली। कार के भीतर पड़ती मध्यम स्ट्रीटलाइट में उसकी दमकती मुस्कान देख मन पुनः खिल उठा, गुनगुने नर्म उजास ने भीतर तक ऊर्जान्वित कर दिया। देर तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे, फिर उसके ‘चलें’ कहने पर वह ‘हम्म्’ कहकर पीछे पीठ टिकाकर बैठ गई, सीटबेल्ट बाँधते समय उसे लगा कि जिस तरह सड़क पर दौड़ती गाड़ियों में से हम हर एक में नहीं हो सकते हमें किसी एक में ही होना होता है, वैसे ही जिंदगी के खाँचों में हम अपने को किसी एक ही में फिट कर पाते हैं और जब हम एक में फिट हो जाते हैं तो बाकी सब में सही नहीं बैठ पाते। उसका खाँचा यही है… इस उजास के पुरसुकून वह सोचती रही, जिंदगी कभी पूरी नहीं मिलती कुछ ना कुछ छोड़ना ही पड़ता है। उसे अपने मन से जीने की कीमत होती है, उसका मोल चुकाना पड़ता है। यह मोल चुकाने की हिम्मत सब में नहीं होती। कोई उसका मोल न देकर जिंदगी भर उदासी को ओढ़ लेता है तो कोई उसका मोल कुछ अनमोल देकर चुकाता है, उसने हिम्मत की थी, मोल चुकाया था और सुकून में थी कि उसने जो चुना उसे दिल से अपना सकी। इंसान को ज़रूरत भी तो यही है कि जो भी चुनो उसे पूरे दिल से अपना लो… तभी ज़िंदगी है।

भावना सक्सैना

फोन – 9560719353

परिचय

भावना सक्सैना

जन्म –  जनवरी 1973

जन्म स्थान – नई दिल्ली

प्रमुख कृतियाँ

– सूरीनाम में हिन्दुस्तानी, भाषा, साहित्य व संस्कृति

– नीली तितली (कहानी संकलन)

संपादन

* सूरीनाम का सृजनात्मक हिंदी साहित्य

* प्रवासी हिंदी साहित्य

* एक बाग के फूल

* अभिलाषा

अनुवाद – कलाकारों का जीवन सरनामी (रोमन) से हिंदी

सम्मान – सूरीनाम हिंदी परिषद, सूरीनाम साहित्य मित्र संस्था और ऑर्गेनाइज़ेशन हिंदू मीडिया (OHM), सूरीनाम द्वारा श्रेष्ठ हिंदी सेवाओं और हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए सम्मानित किया गया

हरियाणा साहित्य अकादमी से वर्ष 2014 में कहानी तिलिस्म को प्रथम पुरस्कार प्राप्त।

नवंबर 2008 से जून 2012 तक भारत के राजदूतावास, पारामारिबो, सूरीनाम में अताशे पद पर रहकर हिंदी का प्रचार-प्रसार किया।

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सात फेरों की चुभन- डॉ.वर्षा कुमारी

सात फेरों की चुभन

                                                              -डॉ.वर्षा कुमारी

जीतू- सृष्टि इतना क्यों रो रही हो? चुप भी हो जाओ अब। तुम अकेली ऐसी लड़की नहीं हो न जिसकी शादी हुई है? और तुम कोई पराए घर थोड़ी ना आई हो। यहाँ से तुम्हारा मायका 4घंटे की दूरी पर ही तो है। जब तुम्हारा मन करे चली जाना सबसे मिलने। यहाँ तुम्हे किसी चीज की कोई कमी नहीं होगी।

सृष्टि- जी,माँ-पापा घर में अकेले हैं। उन्हें अब खाना कौन बना कर देगा। उनका ख्याल कौन रखेगा? माँ की आँखों से भी ठीक प्रकार से दिखाई नहीं देता। इन्हीं सब बातों की चिंता हो रही है।

माँ जी- बहू आज तुम्हारा रसोईपुजन कर देते हैं। फिर तुम खाना बनाना शुरू कर देना।

सृष्टि- जी, माँ जी।

जीतू- सृष्टि से, माँ का हमेशा खयाल रखना। वो जैसा बोले वैसा ही करना। उसकी बातों को कभी ना नहीं बोलना।

सृष्टि ने एक दिन सोचा क्यों न माँ-पापा से मिलने चली जाऊँ। बिना माँ-पापा को बताए ही जाऊँगी वो एहसास कितना अलग होगा न? इसी खुशी में एक दिन जीतू से बोलते हुए- मुझे माँ से मिलने का बड़ा मन कर रहा है। मुझे ले चलोगे क्या माँ के पास?

जीतू- अच्छा ठीक है। माँ से पूछता हूँ मैं।

माँ- अभी-अभी तो बहू घर में आई है। मायके जाने की भी सोचने लगी। कुछ दिन के बाद चली जाएगी ।

जीतू- अच्छा ठीक है माँ। जैसा आप उचित समझे। मैं समझा दूँगा सृष्टि को बाद में कभी चलेंगे।

एक माह बाद………….

जीतू- सृष्टि तुमने मुझे आज जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी दी है। मैं पापा बनने वाला हूँ।

माँ- जीतू, अब तो बहू का कहीं आना-जाना बंद हो गया। ऐसी हालत में सफर करना अच्छा नहीं होता है। बच्चे पर बुरी नजर लगती है समझे।

सृष्टि अब अंदर-ही-अंदर घुटती जा रही थी। देखते-देखते चार महिने हो गए। उसे अपने माँ-पापा की बहुत याद आ रही थी।

एक दिन सृष्टि के मायके से फ़ोन आया कि माँ की तबीयत ठीक नहीं है। सृष्टि से मिलना चाहती हैं।

सृष्टि- माँ जी, अगर आपकी इजाजत हो तो एक दिन के लिए मैं जा सकती हूँ क्या माँ से मिलने? घर पास में ही तो है। अगर आप बोलें तो एक दिन में ही माँ से मिलकर वापस भी आजाऊंगी। बहुत दिन हो गए हैं। माँ-पापा को  देखने का बड़ा मन कर रहा है।

माँ जी- बहू मैंने पहले ही कहा है कि ऐसी हालत में कहीं जाना बच्चे के  लिए  खतरे से खाली नहीं होगा। फिर भी तुम मुझसे ऐसी बात पूछ रही हो? खुदा ना खासता अगर बच्चे को कुछ…….ना बाबा ना …….। माँ बीमार हीं तो हैं, ठीक हो ही जाएँगी। तुम मेरे होने वाले वारिस को क्यों मुसीबत में डालने की सोच रही हो।

जीतू- सृष्टि, रो-रो कर तुमने अपनी कैसी हालत बना ली है? अपना नहीं तो बच्चे का ख्याल तो रखो। माँ ने मना किया है तो कुछ सोच समझ कर ही।

सृष्टि को इस बात की चिंता खाए जा रही थी कि घर में उसके बूढ़े माँ -बाप अकेले हैं। माँ बीमार हैं। उनका ख्याल रखने वाला कोई नहीं है। मैं होती तो माँ की देख-रेख करती।

सृष्टि एक दिन विचारती हुई जीतू से बोलती है – क्यों न माँ-पापा को यहीं बुला ले। वहाँ अकेले रहते हैं। माँ भी बीमार है। खाना बनाने वाला भी कोई नहीं हैं।

जीतू अपनी माँ से पूछते हुए- माँ, सृष्टि बोल रही थी माँ-पापा को यहीं बुलाने के लिए।

माँ – ऐसा भी कहीं होता है क्या? जो लड़की के माँ-बाप रहते हों अपनी बेटी के ससुराल में? नहीं बेटा ऐसा नहीं हो सकता। बहू को समझा दो।

सृष्टि- एक दिन माँ जी से विनती करती है। प्लीज आप माँ-पापा को यहाँ आकर रहने दें। यहाँ मैं उनका ध्यान तो रख सकती हूँ। आपलोगों को तो मालूम है कि मेरे सिवाय कोई और नहीं है उनके लिए। मैं ही एकमात्र सहारा हूँ माँ-पापा के लिए ।आपके पास तो बेटा और बहू दोनों है। उनके पास तो बेटे का भी सहारा नहीं है। फिर बहू तो दूर की बात है।

सृष्टि को अपने बूढ़े माँ-बाप की चिंता ने तोड़ कर रख दिया था। बेसहारा महसूस करने लगी खुद को। सोचने लगी कि शादी करके मैंने जीवन की सबसे बड़ी गलती कर दी है। बेटी के माँ-बाप बोझ होते हैं क्या? शादी से पहले तो जीतू ने हाजार बाते बोली थी। पर अब क्या हो गया जीतू को। माँ सझदार नहीं है तो क्या जीतू तो पढ़ा लिखा है। उसे तो माँ को समझाना चाहिए कि जैसे आपलोग मेरे माँ-पिताजी हैं वैसे ही वो लोग भी मेरे माँ-पिता हैं। क्या शादी होने से सिर्फ लड़की की ही ज़िम्मेदारी बढ़ती है। लड़के को भी तो चाहिए कि वो लड़की के माँ-पिता की ज़िम्मेदारी निभाए। ये सब बातें सोचते- सोचते एक दिन वो बड़ा कदम उठाने पर मजबूर हो गई।

माँ- सुबह-सुबह बहू….बहू चिल्लाये जा रही थी। माँ की आवाज सुन कर जीतू भी सृष्टि को आवाज देने लगा। सृष्टि का घर में कहीं पता नहीं चला। सब परेशान हो गए कि सृष्टि ऐसी हालत में कहाँ जा सकती है। जैसे ही जीतू अपने कमरे गया उसे बिस्तर पर रखा एक लिफाफा दिखा। उसमें लिखा था……..

            जीतू, आप माँ जी और पिताजी का ख्याल रखना। उनके खाने का लिस्ट मैंने इसमें लिख दिया है। कौन- कौन सी दवाई कब खानी है ये भी लिखा है। मैं माँ के घर जा रही हूँ। क्योंकि माँ-पापा को मेरी जरूरत है। क्या हुआ कि मैं बेटा नहीं बेटी हूँ। बेटियां क्या किसी से कम होती हैं? बूढ़े माँ-बाप का सहारा उनके बच्चे ही तो बनते हैं। आप भी तो अपने माँ-पिता का सहारा हो। मैं आज वही फर्ज पूरा करने जा रही हूँ। आपलोग मुझे मेरे मायके भेजने के लिए तैयार नहीं थे। मैंने बोला की माँ -पापा को ही बुला लेते हैं। उस बात के लिए भी माँ जी नहीं तैयार हुई। इसीलिए मुझे आज ऐसे कदम उठाने पड़े। पता है आपको, मुझे विदा करते वक़्त माँ- पापा ने क्या कहा था- “ससुराल में सबसे ज्यादा अपने सासु माँ और पिताजी का ख्याल रखना। अब से वही तुम्हारे माँ-बाप हैं। बुढ़ापे की लाठी बनना उनके। सोचना की तुम हमलोगों की सेवा कर रही हो। उनकी बातों को कभी दिल पर नहीं  लेना। हमलोगों की तो जीवन की नैया पार हो गई बेटी। अब तो हमलोग तुझे ससुराल में खुश देखना चाहते हैं।” बोलते-बोलते माँ-पापा की आँखे भर आई थी। मैंने बचपन से सोचा था कि मैं माँ-पापा को हमेशा अपने पास ही रखूँगी। बेटी का घर कोई पराया थोड़ी ना होता है। उन्हें भी पूरा अधिकार है अपनी बेटी के घर रहने का। पर ये मेरे नसीब में नहीं था। अब मैं हमेशा माँ-पापा के साथ ही रहूँगी। माँ-बाप का कर्ज कोई नहीं उतार सकता। क्योंकी अपने बच्चों के प्रति उनका बलिदान निःस्वार्थ होता है। शादी हो जाने से माँ-बाप से रिश्ते खत्म नहीं होते। मैं पहले एक बेटी हूँ,फिर पत्नी, बाद में एक बहू। आज मैं अपने फर्ज को चुन रही हूँ।

                                                मुझे क्षमा कर देना

                                                   सृष्टि

एक वर्ष बाद……….

जीतू बेटा,तेरे नाम का एक रजिस्ट्री आया है। मुझे तो पढ़ना आता नहीं, तेरे कमरे में मैंने रखा है। देख तो क्या है?

जीतू- लिफाफा खोलते हुए रुँधे गले से, तलाक के नोटिस है पापा। सृष्टि मुझसे तलाक चाहती है।

पिताजी- तुमलोगों की बात यहाँ तक पहुँच गई। लड़के होकर एक लड़की को काबू में नहीं कर सके। तुमने उसे ज्यादा ही बढ़ावा और छूट दे रखी थी। अब भुगतो। तलाक नहीं देना। अरे, उसकी चलेगी क्या? बड़ी आई तलाक लेने।

जीतू- नहीं पापा, सृष्टि ने बिल्कुल सही फैसला लिया है। उसके फैसले का मैं सम्मान करता हूँ। तलाक तो मुझे देना ही पड़ेगा। पापा, सृष्टि एक पढ़ी-लिखी और समझदार लड़की है। वो पराधीन होकर नहीं जीना चाहती है। हमारी सोच बहुत पुरानी और छोटी है। ये समाज हम जैसे लोगों के लिए नहीं है पापा। आज लड़कियां स्वावलंबी बनना चाह रहीं है। हमने सृष्टि पर हमेशा अपनी मर्जी सौपीं थी। फिर भी उसने हमारा मान रखा था। उसने कभी हमलोगों को गलत जवाब नहीं दिया। हमें सृष्टि से कुछ सीखने की जरूरत है पापा। मैं आज ही तलाक के नोटिस पर हस्ताक्षर कर के भेज दूँगा। बोलते-बोलते जीतू को सृष्टि के साथ लिए सात फेरे धुंधले नजर आने लगे।

डॉ. वर्षा कुमारी

संप्रति: स्वतंत्र लेखन तथा ब्लॉगर।

मो. 7569961990

मेल- drwarshagupta29@gmail.com 

मेरा ब्लॉग- https://bhawnaonkasansar.blogspot.com

संपर्क : कर्ण विहार पार्ट-4 नई दिल्ली

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हिन्दी कहानी का सौन्दर्य : चिंतन और विश्लेषण – डॉ. प्रवीण कुमार

हिन्दी कहानी का सौन्दर्य : चिंतन और विश्लेषण

डॉ. प्रवीण कुमार
हिंदी विभाग,
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय,
अमरकंटक मध्यप्रदेश-484887
मो- 09424895615/9752916192
ई-मेलः pravinkmr05@gmail.com

सारांशः

प्रस्तुत शोधपत्र हिन्दी कहानी के बदलते सौन्दर्य को रेखांकित करता है। कहानी की संवेदना अपनी आरंभिक काल से जनचेतना को कैसे प्रभावित करती रही है और उसका विकास मौखिक से लिखित होने की प्रक्रिया में कैसे हुआ। इसकी रूपरेखा इस शोधपत्र में दिया गया है। प्रेमचंदपूर्व, प्रेमचंदयुगीन और प्रेमचंदोत्तर हिन्दी कहानी की न केवल संवेदना बदली है बल्कि उसका सौन्दर्यबोध भी बदलता गया है। प्रस्तुत शोधपत्र में इसकी खोज का एक प्रयास किया गया है।

की वर्डः सौन्दर्य, सौन्दर्यबोध, जीवनमूल्य, अनुभूति, संवेदना, प्रेम, आदर्शवाद, यथार्थवाद, मानवतावाद।   

विषय विस्‍तारः

रचना की प्रक्रिया और संवेदना सौन्दर्य की चेतना पैदा करती है। रचना की प्रकृति, संवेदना, स्वरूप और सौन्दर्य समय सापेक्ष समाज में होने वाले सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन और बौद्धिक प्रकृति पर निर्भर करता है। रचना में निजी अनुभव न केवल रचना की प्रामाणिकता को रेखांकित करता है बल्कि उसके सौन्दर्य को प्रौढ़ता प्रदान करता है वहीं संवेदना की निजता सहृयता की भावना पैदा करती है। समय सापेक्ष विकास क्रम में कहानी की संवेदना लगातार बदलती रही है। इसी ऐतिहासिक विकास यात्र में हिन्दी कहानी के सौन्दर्य का अध्ययन किया जा सकता है। कहानी की परंपरा मानव सभ्यता-संस्कृति में आदिकाल से ही है। प्रत्येक देश के साहित्य में यह परंपरा अक्षुण रूप से विद्यमान है। हिन्दी गद्य साहित्य के जन्म के साथ ही हिन्दी कहानी का उदय आधुनिक चेतना के साथ हुआ है। प्रारंभ में हिन्दी कहानी का सौन्दर्य व्यवस्थित नहीं रहा है। हिन्दी कहानी की प्रारंभिक अवस्था के सौन्दर्य को इस बात से भी समझा जा सकता है। जैसा कि गोपाल राय लिखते हैं कि ‘‘उन्नीसवीं सदी के अंत तक साहित्यिक विधा के रूप में कहानी की कोई पहचान नहीं बनी थी। उसके लिए काई निश्चित संज्ञा भी स्थिर नहीं हुई थी।’’1 अर्थात किसी भी विधा की अस्थिरता के कारण उसकी जो संवेदना और सौन्दर्य होता है वही स्थिति कहानी के प्रारंभिक अवस्था में देखी जा सकती है। तदंतर पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से 20वीं शताब्दी के प्रथम दशक में हिन्दी कहानी की लेखन परंपरा शुरू होती है। इसी क्रम में हिंदी कहानी के सौन्दर्य की खोज का एक प्रयास इस शोधपत्र में किया जा रहा है।  

प्रारंभिक हिन्दी कहानी का स्वरूप मनोरंजनात्मक था। इंशा अल्ला खां कृत ‘रानी केतकी की कहानी’, मुंशी नवल किशोर द्वारा सम्पादित ‘मनोहर कहानी’ (1880), और चण्डी प्रसाद सिंह कृत ‘हास्य रतन’ (1886), आदि कहानी संग्रह मनोरंजन प्रधान, स्वप्न कथाओं के रूप में पाठक के सम्मुख आते हैं। इस काल खण्ड (भारतेन्दु युग2) की कहानियों के माध्यम से नीतिप्रद शिक्षा, पाप-पुण्य, पुनःजन्म आदि की व्याख्या की जाती थी। कहानी की संवेदना के विकास और उसकी प्रवृत्तियां का युग सापेक्ष अध्ययन ही किया जा सकता है। ‘‘कथा आनादि काल से ही काल्पनिक और मौखिक होती थी। लिखित रूप प्राप्त करने के बाद उसका यह नाम बना, यद्यपि आख्यान उपाख्यान, चरित, वृतांत, पुराण आदि संज्ञाएं भी प्रयोग में आयीं। बाद में एक ऐसा कथा रूप भी सामने आया, जिसका आधार ख्यात अथवा ऐतिहासिक वृत्त होता था। ऐसे ही कथा रूप को आख्यायिका की संज्ञा दी गयी।’’3 सरस्वती में कथा विधा के लिए इसी ‘आख्यायिका’ शब्द का चयन किया गया था। आख्यायिका की संवेदना प्रेमचन्द के शब्दों में ‘‘प्राचीन आख्यायिका कुतूहल होती थी या अध्यात्म-विषयक।’’4 आख्यायिका की संवेदना संघर्ष का सौन्दर्य नहीं उत्पन्न करती है। ‘‘मौखिक रूप से चली आती कथा का कथ्य केवल केवल कौतूहलजन्य मनोरंजन, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से व्यंजित या कथित उपदेश और यत्किंचित भाव बोध होता था। अख्यायिका संज्ञा से अभिहित और प्रकाशित होने वाली रचनाओं में कौतूहलजन्य मनोरंजन गौण होन लगा और उपदेश के स्थान पर विचार, भावबोध और यथार्थ चित्रण को केन्द्रीयता प्राप्त होने लगी। यह प्रक्रिया एक दो दशक तक ही नहीं बहुत बाद तक चलती रही और आज भी चल रही है। भाव बोध को संवेदना का क्षण बनने में तो और भी देर हुई।’’5 इस प्रकार कहा जा सकता है कि कहानी भावबोध की संवेदना के क्षण की अभिव्यक्ति होती है। यह भावबोध ही वर्तमान कहानी को प्राचीन कहानी से अलग करती है। प्रेमचन्द के अनुसार ‘‘वर्तमान कहानी(आख्यायिका) मनोवैज्ञानिक विश्लेषण और जीवन के यथार्थ और स्वाभाविक चित्रण का अपना ध्येय समझती है। उसमें कल्पना की मात्र कम और अनुभूतियों की मात्र अधिक होती है। इतना ही नहीं बल्कि अनुभूतियां ही रचनाशील भावना से अनुरंजित होकर कहानी बन जाती है।’’6 इसी से कहानी की संवेदना और सौन्दर्य की अवधारण स्पष्ट होती है। हिन्दी में कहानी की ऐसी अवधारणा का स्वरूप प्रेमचन्द और उनके समकालीन कहानीकारों के लेखन में स्पष्ट अभिव्यक्त और परिमार्जित होता है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि प्रथम दो दशक के बीच की कहानियों में कहानी की संवेदनात्मक अवधारणा नहीं थी। वह बनने की प्रक्रिया में सक्रिय थी। इस दशक की कहानियों में साहित्यिक, राजनीतिक और राष्ट्रीय जागरण का स्वर दिखाई देता हैै। इसी दशक में जयशंकर प्रसाद की पहली कहानी ‘ग्राम’ (1911ई) और 1915 में चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की कालजीवी कहानी ‘उसने कहा था’, प्रकाशित हुई। मार्के की बात है कि प्रेमचंद की पहली हिन्दी कहानी ‘सौत’ भी इसी दशक में 1915 में प्रकाशित हुई है। यह दशक भारतीय समाज में बहुत ही उल्लेखनीय है। राजनीतिक में गांधी और डॉ- अम्बेडकर का प्रवेश होता है और हिन्दी साहित्य में प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद का आगमन होता है। राजनीतिक संदर्भ में राष्ट्रीय जागरण की लहर थी। जिसका स्वर हिन्दी साहित्य में भी सुनाई पड़ता है। इस दशक की कहानियां न केवल राजनीतिक दृष्टि से बल्कि साहित्यिक दृष्टि से भी उल्लेखनीय रही है।

समय सापेक्ष विकास क्रम में कहानी की संवेदना लगातार बदलती रही है। कहानी की संवेदना के बदलते स्वरूप में कहानीपन का लोप कभी नहीं हुआ है। वह गंभीरता से साथ उभरती रही है। आधुनिक कहानी से पूर्व कहानी में यथार्थ की अभिव्यक्ति काल्पनिक तौर पर भी हुआ है। पुष्पपाल सिंह के शब्दों में, ‘‘इससे पूर्व के साहित्य में भी यथार्थ-चित्रण के महत्व को एक भिन्न दृष्टिकोण के साथ स्वीकारा गया है। वहां जीवन की वास्तविकता यथार्थ न होकर कल्पित है।’’7 अर्थात विकासक्रम में कहानी की संवेदना समय-सापेक्ष बदलती चली गई और उसका सौन्दर्य यथार्थवाद से संबद्ध होता चला गया। कहानियां कहानीकार की निजी और विशिष्ट दृष्टि के अनुरूप अपना स्वरूप बदलती रही। अब वह ‘‘मनुष्य के सामने कल्पना के बल पर आदर्शों का लोक एवं तिलस्म का कुतूहल खड़ा नहीं करती, अपितु वह जीवन-संघर्ष में समस्याओं से जूझते मनुष्य की सहगामिनी अथवा सहयात्री है। आधुनिक कहानी मनुष्य की जिंदगी की संपूर्ण विसंगतियों, भावनाओं एवं विवशताओं के साथ अपने पाठक का साक्षात्कार कराती है।’’8 इस प्रकार कहानियां यथार्थवाद की ओर झुकती चली गई। कहानी यथार्थ की प्रामाणिक अनुभूति की उपज बनती चली गई। यथार्थ के प्रामाणिक चित्रण पर बल देने के कारण जीवन के शाश्वत मूल्यों और आस्थाओं की प्रस्थापनाओं की कमी नई कहानी के सफर तक में देखने को मिलने लगी। अपितु केवल वर्तमान और जीवन की तत्कालिक स्थितियों से साक्षात्कार कराना ही कहानी का ध्येय हो गया। ‘‘आज वह हमें आदर्श का पाठ पढ़ाकर एक नया मनुष्य बनाने का उपक्रम नहीं करती अपितु यह जीवन की समस्त विसंगतियों एवं भयावह यथार्थ से गहरी पहचान कराकर उन स्थितियों पर चोट करती है, जो इन विसंगतियों एवं यथार्थ की भयावहता के लिए उत्तरदायी हैं और अपने इसी रूप में वह जीवन को या मनुष्य को बेहतर बनाने, उदात्त की ओर ले जाने का प्रयत्न सिद्ध होती है।’’9 अर्थात कहानी का सौन्दर्य लगातार विकास क्रम में परिमार्जित व परिष्कृत होता रहा है।

‘‘प्रेमचंद पूर्व युग की आधुनिक हिन्दी कहानी गुण और परिमाण, दोनों ही दृष्टियों से विशेष महत्वपूर्ण नहीं है। इस युग की कहानी आदर्शवादी रही है। वह कहानी में संस्कृत कथाओं के समान ही उपदेशात्मक वृति और नीति कथाओं जैसे निष्कर्ष और आदर्श प्रस्तुत करने की चेष्टा करता है। किंही निश्चित सिद्धांतों, उपदेशों और निष्कर्ष की संपूर्ति और संपुष्टि के निमित्त ही कहानी गढ़ी जाती थी। यहां किसी आदर्श को निश्चित करके उसी को सिद्ध करने के लिए कहानी का निर्माण होता था, सृजन नहीं।’’10 इस सृजन और गढ़ने की प्रक्रिया के कारण हिन्दी कहानी में सौन्दर्य का स्वरूप भिन्न रहा है। वह यथार्थवादी न हो कर आदर्शवादी रहा है। कल्पना से गढ़ा हुआ रहा है, अनुभूति की प्रामाणिक अभिव्यक्ति का सृजन नहीं। हरा ‘‘संस्कृत कथाओं और लोककथाओं के अनुकरण पर लिखी इन कहानियों में अलौकिक और आकस्मिक संयोग, अद्भुत तत्व और कुतूहल का प्राधान्य है। निश्चित सिद्धांतों और आदर्शों की पूर्ति के निमित्त कहानी गढने के कारण कल्पना का प्राधान्य होता था। कल्पना के इसी प्राधान्य के कारण कहानी में विश्वसनीयता नहीं थी, अपितु झूठ की हद तक कल्पना का प्रयोग होता था।’’11 वहीं परमानंद श्रीवास्तव ‘हिन्दी कहानी की रचना प्रक्रिया’ में लिखते हैं कि ‘‘वस्तुतः सामाजिक यथार्थ का वह बोध इन कहानियों में है ही नहीं, जो सामयिक जीवन-मूल्यों की प्रतिष्ठा कर सकता है।’’12 यथार्थबोध की कमी के कारण हिन्दी कहानी में जीवन मूल्यों की प्रतिष्ठा नहीं हो सकी। जिसकी दरकार कहानी में होती है।

साहित्य जगत में प्रेमचंद के आगमन ने हिन्दी साहित्य के स्वरूप और उसकी संवेदना के साथ-साथ उद्देश्य तथा सौन्दर्य को भी परिवर्तित किया है। साहित्य सामाजिक यथार्थ के साथ-साथ मानव मन की वृत्तियों से जुड़ने लगा। दूसरे शब्दों में साहित्य और मनोविज्ञान का समन्वय होने लगा। यही समन्वय कहानी को पूर्व से अलग करता है। डॉ- रामचन्द्र तिवारी के अुनसार ‘‘हिन्दी की प्रारंभिक कहानियों में कथानक का विकास आकस्मिक एवं दैवी घटनाओं पर निर्भर करता था। विकास-युग में यह कथा विकास चरित्रें की मनोवैज्ञानिक विशेषताओं द्वारा होने लगा। मनोवैज्ञानिक कथानकों का सूत्रपात प्रेमचंद की प्रथम कहानी ‘पंचमेश्वर’ से होता है।’’13 सन् 1925 ई तक हिन्दी कहानियों की दो स्पष्ट धाराएं परिलक्षित होने लगीं। प्रथम धारा यथार्थवादी दृष्टिकोण को स्पर्श करती हुई जीवन के व्यावहारिक पक्ष को भी लेकर विकसित हुई। इस धारा के अंतर्गत प्रेमचंद, सुदर्शन, विश्वभरनाथ शर्मा ‘कौशिक’, ज्वालादत्त शर्मा तथा चंद्रधर शर्मा गुलेरी प्रमुख हैं। दूसरी धारा आदर्श प्रधान प्रवृत्ति से प्रेरित होकर भाव-सत्य को लेकर आगे बढ़ी। इस धारा के अंतर्गत जयशंकर प्रसाद, चंडीप्रसाद ”दयेश तथा राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह आदि प्रमुख हैं।

प्रेमचन्द युग में आकर कहानी की सवंदेना और स्वरूप दोनों बदल गया। प्रेमचन्द ने सर्वप्रथम कहानी को काल्पनिकता से मुक्त कर सामाजिकता से संसिक्त किया। इस कारण हिन्दी कहानी का रूख अपने परिवेश और यथार्थ की ओर उन्मुख हुआ। अब कहानी में कल्पना या स्वर्णिम अतीत के इतिहास का लोक नहीं अपितु कहानीकार के चारों ओर फैला लोक, समाज और परिवेश चित्रित होने लगा। साहित्य में बौद्धिकता का प्रवेश होने लगा। बौद्धिकता के कारण कहानी स्वतः ही पूर्णतः काल्पनिक पात्रें एवं चरित्रें को अस्वीकृत करने लगी। उसमें मनोवैज्ञानिक विश्लेषण अनुभूति, प्रवणता और यथार्थ के तत्वों का समाहार होने लगा। प्रेमचन्द यथार्थ को कहानी में पूर्णतः यथावत रूप में उतार देने के पक्ष में बिल्कुल नहीं हैं। वे यथार्थ को निजत्व की परिधि में लाकर पुनर्सृजित करने की बात प्रकारांतर से कहते हैं।, ‘‘अगर हम यथार्थ को हू-ब-हू खींचकर रख दें तो उसमें कला कहां है? कला केवल यथार्थ की नकल का नाम नहीं है। कला दिखती तो यथार्थ है, पर यथार्थ होती नहीं। उसकी खूबी यही है कि वह यथार्थ न होते हुए भी यथार्थ मालूम हो।’’14 बाद के वर्षों में प्रेमचन्द की कहानी में आदर्श से मोहभंग दिखता है। आदर्श से यथार्थ की जमींन की अभिव्यक्ति होती है। यही से कहानी में ‘नई’ की शुरूआत होती है। यह नई अलग दुनिया की नहीं है, बल्कि इसी समाज में नवीनता का बोध है। जहां एक था राजा से एक है आदमी का सफर दास्तान शुरू होता है।

आधुनिक कहानी की संवेदना प्राचीन कहानी की संवेदना से बिल्कुल भिन्न है। आधुनिक कहानी की संवेदना उद्देश्य, कथावस्तु, रचनातंत्र, शैली, ढंग, सभी कुछ बदल चुका है। अब कहानी का क्षेत्र अतीत में ‘क्या हुआ था’ की जगह आज हमारे बाह्य और आंतरिक जीवन में क्या हो रहा है, कैसे हो रहा है, क्यों हो रहा है आदि हो गया है। मुख्य रूप से कथा कहना और यत्किंचित उपदेश देना या किसी भाव को व्यक्त करना ही प्रथम और दूसरे दशक की कहानियों का लक्ष्य रहा है। गोपाल राय के शब्दों में 20वीं सदी के प्रथम दशक की हिन्दी कहानी का सौन्दर्य इस प्रकार है। ‘‘किसी विधा के आरंभिक दौर में कथ्य और शिल्प विषयक जो अस्थिरता हो सकती है, वह इस दशक की कहानियों में भी देखने को मिलती है। कहानीकारों के सामने अंग्रेजी की छोटी कहानी का आदर्श तो शायद था, पर उसके अनुरूप न तो कथा भाषा विकसित हुई थी न ही यथार्थ की संवेदना।’’15 औपनिवेशिक काल में हिन्दी कहानी का सौन्दर्य राजनीतिक मुक्ति की आकांक्षा की रही है। प्रेमचन्द और उनके समकालीन रचनाकारों में औपनिवेशिक शासनव्यवस्था से मुक्ति की संघर्ष देखा जा सकता है। इसी मुक्ति की अवधारणा के तहत रचनाकारों ने नाम बदलकर रचना कर रहे थे। औपनिवेशिकसत्ता व्यवस्था में शायद यही एक तरीका था मुक्ति के लिए। क्योंकि औपनिवेशिक सत्ता यह चाहती थी आम जनता में मुक्ति की अवधारणा किसी भी हालत में न पहुंच सके। 20वीं सदी के दूसरे और तीसरे दशक के बीच की कहानियों में राष्ट्रीय चेतना का भाव दिखाई पड़ता है। प्रेमचन्द का ‘सोजेवतन’ इसका उदाहरण है। गोपाल राय के अनुसार ‘‘यहां प्रेमचन्द राष्ट्रीय भावना की अभिव्यक्ति के लिए उस प्रच्छन्न तरीके का इस्तेमाल करने लगते हैं, जिसे अंग्रेजी में विकेरियन नेशनलिज्म कहा जाता है। दमन और आतंक के सहारे चलनेवाले औपनिवेशिक शासन में लेखकों के लिए अपनी राष्ट्रीय भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए यही रास्ता बचा रहता है।’’16 जनमानस को जागृत करना इस काल की कहानियों का मुख्य लक्ष्य रहा है।

मुक्ति की अवधारणा में मानव मात्र की कल्पना अतिआवश्यक था। भारत में पुनर्जागरण ब्रिटिश शासन व्यवस्था के साथ शुरू होता है। जिसमें एक तरफ राजा महाराजाओं, जमींदार, महाजन और उस समय के बुद्धिजीवियों आदि के अपने स्वार्थ जरूर था लेकिन औपनिवेशिक सत्ता से मुक्ति की आंकाक्षा में आमजन का स्वर भी निहित था। वे भी अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहे थे। ‘‘प्रेमचन्द भारतीय पुनर्जागरण को उसके व्यापक संदर्भ में देखते थे। वे समझते थे कि देश को औपनिवेशिक गुलामी से तभी मुक्ति मिल सकती है, जब पूरा देश सामाजिक दृष्टि से, लिंग-भेद, धर्म-भेद, जाति-भेद आदि के अंतर्विरोधों से मुक्त हो। उस समय के समाज में स्त्री, पुरुष की तुलना में, हर प्रकार से हीनतर स्थिति में जीवनयापन करती थी। पारिवारिक सम्पत्ति में अधिकार की दृष्टि से, शिक्षा की दृष्टि से, अपने बारे में निर्णय लेने की दृष्टि से, नैतिक संहिता की दृष्टि से, उसकी स्थिति पुरुष की तुलना में दासों जैसी थी। वही स्थिति दलितों की सवर्णों की तुलना में थी। हिन्दू-मुसलमान का साम्प्रदायिक भेद भी अपने चरम पर था। औपनिवेशिक शासन अपनी सुदृढ़ स्थिति के लिए भारतीय समाज के इन अंतर्विरोधों को बरकरार ही नहीं रखना चाहता था, बल्कि इन्हें और भी बढ़ाने में प्रयत्नशील था।’’17 

प्रेमचन्द्र आदर्शोन्मुख यथार्थवादी रचनाकार रहे हैं। जीवन के यथार्थ सत्य की शोध करना और उसका कलात्मक आकलन करना ही उनका उद्देश्य रहा है। वह समग्र जीवन के चितेरा हैं, इसलिए उन्होंने हर वर्ग और सामाजिक स्थिति के लोगों की कहानियां लिखी हैं। हर शैली का प्रयोग किया है लेकिन मनुष्य के अंतर्बाह्य जीवन की मार्मिक स्थितियों का चित्रण उन्होंने यथार्थवादी प्रणाली के अनुसार ही किया। उनकी पंच परमेश्वर, आत्माराम, बड़े घर की बेटी, शतरंज के खिलाड़ी, बज्रपात, रानी सारंधा, अलग्योझा, ईदगाह, सद्गति, अग्नि-समाधि, कामना-तरु, पूस की रात, सुजान भगत, कप़फ़न आदि अधिक विख्यात कहानियां हैं। इन कहानियों में उनकी संवेदना आदर्श से चल कर वर्ग संघर्ष के यथार्थ की ओर बढ़ती रही है। शिवदान सिंह चौहान के शब्दों में, ‘‘आर्यसमाजी समाज-सुधारक से बढ़ते-बढ़ते वह अपने अंतिम दिनों में वर्ग संघर्ष की अनिवार्यता को पहचानने लग गए थे और पूंजीवादी समाज और संस्कृति की निस्सारता और प्रतिगामिता के बारे में उनके मन में कोई भ्रम या संदेह न रहा था। उनकी अपनी प्रगति की छाप उनकी कहानयिों पर भी अंकित होती गई है।’’18 रामविलास शर्मा के अनुसार ‘‘उनकी सबसे सफल कहानियां वे हैं जिनमें उन्होंने किसानों के जीवन का चित्रण किया है।’’19 

प्रेमचन्द ने कहानी को जिस मनोविज्ञान से संबद्ध कर जीवन की व्याख्या की है। उसका विकास एक स्वतंत्र प्रवृत्ति के तौर पर हिन्दी कहानी के इतिहास में होता है। जैनेन्द्र कुमार, इलाचंद्र जोशी, अज्ञेय आदि की कहानियां मानव मन के सत्य का उद्घाटन करती हैं। इसलिए जैनेन्द्र कुमार, इलाचन्द्र जोशी और अज्ञेय को हिन्दी साहित्य में मनोविश्लेषणात्मक रचनाकार कहा जाता है। लेकिन तीनों की मनोवैज्ञानिकता में पफ़र्क है। ‘‘जैनेन्द्र की मनोवैज्ञानिक चित्रण की प्रणाली अपने जीवनानुभव और भाव-चेतन मानस की उपज है जबकि इलाचन्द्र जोशी और अज्ञेय में मनुष्य की मनोगत दिशाओं और अंतर्द्वंद्वों का चित्रण कम, फ्रायड की प्रणाली से किया गया मनोविकारों का विश्लेषण अधिक है। इसलिए जैनेन्द्र जहां उच्च मानसिक भूमि पर मनुष्य की चारित्रिक विशेषताओं का अंकन और अंतर्द्वंद्वों के माध्यम से उसकी उदात्त, मानवीय सहानुभूतियों और मनोभावनाओं को जीवन की गहराई में उतरकर अभिव्यक्ति देने की कोशिश करते हैं, वहां ये दोनों कहानीकार अपने कुंठाग्रस्त पात्रें के विक्षिप्त मानस को मनोवैज्ञानिक औचित्य प्रदान करके उनके जघन्य और असामाजिक कृत्यों को अपनी ओर से महिमा-मंडित करने का प्रयत्न करते हैं_ साथ ही पाठकों से भी उनके प्रति सहानुभूतिशील होने की अपेक्षा करते हैं। इसके अतिरिक्त, इन लेखकों में मनोविश्लेषण के प्रति इतना प्रबल आग्रह है कि वे मानसिक रुग्णताओं को ही मानवीय सत्य मानकर, अपने पात्रें के कृत्यों का यथातथ्य प्रकृतिवादी आकलन करते हैं जिससे उनकी रचनाओं का अंतःस्वर तो कैशोर-उद्धत, अविवेकी, अनुदात्त और अहम्मन्यतापूर्ण होता ही है, उनके पात्र भी अपनी असामाजिकता, स्वार्थपरता और आत्मकेन्द्रित उत्तरदायित्वहीनता को ही सामाजिक विद्रोह और क्रांतिकारी जीवनदर्शन का पर्याय मान लेते हैं। पर कहानी कभी ही साधारणता के तल से ऊपर उठ पाती है। क्रांति और सामाजिक भावना का ऐसा विद्रूप हिन्दी में अन्यत्र नहीं मिलता। अपनी उदात्त मानवीय संवेदना के अभाव और जीवन सत्य की कलात्मक प्रतीति से वंचित होने की पूर्ति ये लेखक अपनी अपनी क्षमता के अनुसार उक्ति-वैचि=य, संकेत-कथन, भाषा के बनाव-सिंगार और अभिनव रूपविन्यास से करते हैं। परंतु उनके पात्र सजीव नहीं हो पाते, फ्रायड की स्थापनाओं के दृष्टांत स्वरूप गढे़ गए, कृत्रिम और बनावटी लगते हैं और मनुष्य और मनुष्यता का उपहास मात्र प्रतीत होते हैं। इन लेखकों की कहानियों में शैली-भेद चाहे कितना हो, किंतु जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण मूलतः एक सा है और जैनेन्द्र से भिन्न है।’’20 शिवदान सिंह चौहान के अनुसार ‘‘अब तक हिन्दी कहानी की परंपरा मूलतः मानववादी थी। समाज के वैषम्य से कुंठित-पीडि़त मनुष्य के अंतःकरण में मनुष्य और मनुष्यता का निवास है, मानव जीवन में इस विश्वास को लेकर ही कहानीकार सामाजिक विषमताओं पर आक्रमण करते थे और मनुष्य की समाज-खंडित प्रतिमा को पुनःपूर्णत्व देने के लिए उसके अंतःसत्य और अंतःसौन्दर्य, यानी उसकी अखंडित मानवीयता का उद्घाटन करते थे। परंतु ये लेखक इस परंपरा के विपरीत फ्रायडी अर्धसत्यों को कबूल करके मनुष्य को परिस्थितियों का ही नहीं, स्वयं अपनी अर्धचेतन काम-वासनाओं का निरुपाय दास और सभ्यता के बाह्यावरण में ढके-छिपे पर मूलतः हिंस्र, पाशविक और स्वार्थी ही चित्रित करते हैं।’’21 तत्पश्चात हिन्दी कहानी का सौन्दर्य मार्क्सवाद से प्रभावित दिखाई देता है। हिन्दी में मार्क्सवाद की अवधारणाओं को लेकर प्रगतिशील साहित्य की रचना की जाती रही। जिसमें यशपाल का नाम प्रमुख है। यशपाल ने हिन्दी कहानी की सामान्य मानववादी परंपरा को नई सामाजिक राजनीतिक चेतना देकर ऊंचे धरातल पर उठाया है। अपनी कहानियों में सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन के विविध चित्रें द्वारा मौलिक समस्याएं उठाते हैं और एक कलाकार की रीति से उनका समाधान भी खोजते हैं। ये समस्याएं मौलिक हैं क्योंकि मनुष्य-जीवन के व्यापक सत्य से उद्भूत हैं। उनका मार्क्सवादी दृष्टिकोण इन समस्याओं के मूल कारणों तक पहुंचने में सहायक होता है और उनकी विशेषता यह है कि वे आद्यंत कलाकार बने रहते है, परिस्थितियों और उनके मध्य संघर्ष करने वाले चरित्रें के कार्य व्यापार के स्वाभाविक उद्घाटन से वह सामाजिक जीवन और मनुष्य के मनोगत भावों और द्वंद्वों का चित्रण करते हैं। ‘‘यशपाल की मूल समस्या यह है कि समाज के विषम संगठन ने मनुष्य जाति को ही दो विरोधी वर्गों में नहीं बांटा है, बल्कि मनुष्य के विचार और व्यवहार या आचरण में भी एक द्वैत या वैषम्य पैदा कर दिया है। इस द्वैत या वैषम्य के प्रति पाठकों को सचेत करना ही यशपाल का प्रधान उद्देश्य है। यह चेतना जनता में उस सामाजिक क्रियाशीलता को जन्म देगी जो सामाजिक वैषम्य का तो अंत करेगी ही, ऊंचे विचार नीच करतूती के वैषम्य का भी अंत कर देगी। तभी मनुष्य का बाह्य और आंतरिक जीवन पूर्ण स्वास्थ्य का लाभ कर सकेगा। इस समस्या का उन्होंने विविध ढंगों से अपनी कहानियों में उठाया है और साधारण अथवा शिष्ट समाज की ऊंचे विचारों में आवेष्टित नीच करतूतों पर तीखे प्रहार किए हैं।’’22 समस्याओं को प्रगतिशील दृष्टिकोण से उठाने वाले कहानीकारों में से चंद्र किरण सौनरेक्सां, उपेन्द्रनाथ अश्क आदि का नाम प्रमुखता से लिया जाता  सकता है।

प्रेमचन्द और उनके समकालीन कहानीकारों की कहानियों की खासियत यह रही है कि वे समसामयिकता से दूर नहीं होते है। समकालीनता की गतिविधियों को उजागर करने का काम कहानियां करती रही हैं। इसी संदर्भ में देखा जाए तो आद्यतन अस्मितावादी विमर्श का स्वर भी प्रेमचन्द और उनके समकालीन कहानियों में देखा जा सकता है। उस समय की कहानियां अपने अंदाज में इसका बयान करती रही हैं। प्रेमचन्द ने स्त्री और दलित दोनों समाजों के जीवन को करीबी से पहचानने का काम किया है और अपनी रचनाओं में उसे उठाया है। डॉ- सुभाष चन्द्र के अनुसार ‘‘उनकी रचनाओं में दलितों के प्रति सहानुभूति, करुणा एवं संवेदना के साथ शोषण, अन्याय, उत्पीड़न से मुक्ति और मानवीय गरिमा व पहचान के लिए संघर्ष है। वे दलित जीवन के विभिन्न पक्षों के अन्तःसूत्रें को पहचाना व प्रतिबद्धता से व्यक्त किया है।’’23 प्रेमचन्द की कहानियां -‘दूध का दाम’, मंदिर, गुल्ली डंडा, ठाकुर का कुंआ, मंत्र, सद्गति, कफन आदि में दलित जीवन के चित्र प्रस्तुत करती हैं। प्रेमचन्द किस प्रकार दलित जीवन के त्याग को दर्शाते हैं। यह उनकी कहानी ‘दूध का दाम’ में अभिव्यक्त होता है। इस कहानी में ‘भुंगी भंगिन महेश बाबू के बेटे सुरेश को अपना दूध पिलाती है जिस कारण उसका अपना बेटा मंगलू भूखा भी रहता है।’24 इस दूध का दाम किस रूप में दलित समाज को मिलता है। इसे भी प्रेमचन्द ने दिखाया है। ‘दूध का दाम’ कहानी में मंगल और टम्मी के संवाद में इसे समझा जा सकता है। ‘‘देखा, पेट की आग ऐसी होती है। यह लात मारी हुई रोटियां भी न मिलतीं, तो क्या करते? —लोग कहते हैं, दूध का दाम कोई नहीं चुका सकता और मुझे दूध का यह दाम मिल रहा है।’’25 इसके बाद भी ब्राह्मणवादी मानसिकता कभी भी अपनी निर्जिविता से अलग नहीं होती है। इस संदर्भ में ‘दूध के दाम’ के महेशनाथ का यह कथन द्रष्टव्य है- ‘‘दुनिया में और चाहे जो कुछ हो जाए, भंगी, भंगी ही रहेंगे। इन्हें आदमी बनाना कठिन है।’’ क्या सचमुच में ऐसा है? इसका प्रत्युत्तर भी कहानी में बयान है। भुंगी कहती है- ‘‘मालिक, भंगी तो बड़ों-बड़ों को आदमी बनाते हैं, उन्हें कोई क्या आदमी बनाए। यह गुस्ताखी करके किसी दूसरे अवसर पर भला भुंगी के सिर के बाल बच सकते थे? लेकिन आज बाबू साहब ठठाकर हंसे और बोले-भुंगी बात बड़े पते की कहती है।’’26 इस प्रकार प्रेमचन्द दलित जीवन और भारतीय समाज का चित्रण करते हैं। जिसमें एक तरफ मानवता है तो दूसरी तरफ ब्राह्मणवाद है। भुंगी के बातों में जहां दलित समाज की मानवता है, वहीं महेशनाथ के माध्यम से ब्राह्मणवाद को पहचाना जा सकता है। महत्वपूर्ण बात है कि जिस प्रकार से महेशनाथ भुंगी की बातों को स्वीकार करते हैं। क्या भारतीय समाज दलितों की इस मानवता को स्वीकार कर पाए हैं? रामविलास शर्मा के शब्दों में कहा जा सकता है कि प्रेमचन्द के यहां देश की जनता के प्रति प्र्रेम और सहानुभूति की गहरी संवेदना है। वे गरीबी और अंधविश्वासों को आदर्श कह कर नहीं चित्रित करते। वह दिखलाते हैं कि इतने अंधेरे में भी मनुष्यता का दीपक कैसे जल रहा है, उनकी लौ धनी आदमियों के घर से यहां कितनी ऊंची उठ रही है।27

हिन्दी कहानी में प्रेम की संवेदना का मार्मिक चित्रण मिलता है। प्रेम का यह सौन्दर्य विभिन्न रूपों में व्याप्त है। प्रेम के इस विविध रूपता में राष्ट्रप्रेम से लेकर स्त्री-पुरुष का प्रेम सौन्दर्य भी निहित है। स्वयं प्रेमचन्द की कहानियां प्रेम सौन्दर्य का चित्रण करती है। गोपाल राय प्रेमचन्द की प्रेम संवेदना को रेखांकित करते हुए लिखते हैं कि प्रेमचन्द की कहानियां ‘‘उस प्रेम का चित्रण करती हैं जो नैतिकता बोध से नियंत्रित होता है। यह प्रेमचन्द पर आर्य समाज के प्रभाव का द्योतक भी हो सकता है।’’28 प्रेम सौन्दर्य का रोमांनियत स्वरूप चित्रण जयशंकर प्रसाद की कहानियों में मिलता है। प्रसाद की कहानियां ‘अतीत स्तुत्य’ की सांस्कृतिक पक्ष पर आधारित होते हुए भी रोमानित भाव से लबरेज है।29 प्रेम की संवेदना का चित्रण चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की कहानियों में देखा जा सकता है। ‘उसने कहा था’ प्रेम की संवेदना के साथ युद्ध की पृष्ठभूमि आधारित कहानी है। ‘‘युद्ध और प्रेम की साथ साथ चलनेवाली संवेदना के चित्रण की दृष्टि से यह कहानी हिन्दी में आज भी अकेली है। दोनों ही संवेदनाओं के चित्रण में कहानीकार ने अद्भुत अवलोकन क्षमता और प्रामाणिक अनुभव का परिचय दिया है।—यद्यपि इस कहानी की केन्द्रीय संवेदना प्रेम ही है, पर इसका एक पाठ युद्धविरोधी संवेदना के रूप में भी संभव है। युद्ध आदमी को कितना नृशंस बना देता है, फिर भी मानवीय संवेदनाएं उसमें किस प्रकार जीवित बची रहती है, यह कहानी इसकी पुष्टि करती है।’’30 thee

औपनिवेशिक सत्ता की क्रूरता का चित्रण भी हिन्दी कहानियों मिलता है। इसमें औपनिवेशिक नीतियों का विरोध कहानी का मुख्य ध्येय रहा है और हृदय परिवर्तन की संवेदना हिन्दी कहानी का सौन्दर्य रहा है। औपनिवेशिक शासन व्यवस्था में किसानों, जमींदारों और महाजनों का ऐसा त्रिकोणीय संबंध निर्मित किया गया, जिसमें फंसी आम जनता, किसान आदि का निकलना मुश्किल था। किसानों से जमीन की लगान, जो बेहद ऊंची थी, वसूल करने के लिए जमींदार वर्ग का सृजन किया गया था और लगान चुकाने के लिए असमर्थ किसानों को कर्ज लेकर लगान चुकाने के योग्य बनाने के लिए साहूकारों को अनेक सुविधाएं प्रदान की गई थीं। इसके फलस्वरूप किसान कर्ज के बोझ से लदते जा रहे थे, जिसका अंतिम परिणाम उनके भूमिहीन कृषक मजदूर बदलने में होता था। इसके फलस्वरूप ‘अनुपस्थित जमींदारों’ की एक अलग श्रेणी पैदा हो गयी थी, जो किसानों के लिए और भी तकलीफदेह थी। ऐसे शहरी जमींदारों की गांव में जमींदारी होती थी, जो कभी कभार गांव जाते थे और किसानों पर कारिन्दों और पुलिस के अत्याचार की अनदेखी कर देते थे। जो छोटे जमींदार गांव में किसानों के बीच रहते थे, उनके यहां किसानों पर ऐसा अत्याचार नहीं होता था। प्रेमचन्द युग की कहानियों में किसानों की दयनीय स्थिति का चित्रण है। साथ ही औपनिवेशिक सत्ता के साथ-साथ देशी साम्राज्यवाद के अत्याचार का वर्णन मिलता है। प्रेमचन्द की कहानी ‘सवा सेर गेहू’ और जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘ग्राम’ में इसे सहज ही समझा जा सकता है। ‘‘सवा सेर गेहूं’ में कर्ज की वजह से गुलामी करने वाले शंकर की करुण कथा है। वह एक बार सवा सेर गेहूं उधार लेता है और उसे पाटते-पाटते बीस साल लग जाते हैं, फिर भी वह गुलामी करता हुआ मरता है। कहानी के अंत में प्र्रेमचन्द कहते हैं -पाठक! इस वृतांत को कपोल कल्पित न समझिए। यह सत्य घटना है। ऐसे शंकरों और ऐसे विप्रों से दुनिया खाली नहीं है।’’31 इसके साथ ही उस युग की कहानियों में हृदय परिवर्तन की बात हुई है। गोपाल राय लिखते हैं कि ‘‘प्रेमचन्द बुर्जुआ जमींदारों का हृदय परिवर्तन भी दिखाने से बाज नहीं आते। कदाचित वे चाहते थे कि ऐसा हो पाता। जमींदारों के प्रति उनका मोहभंग अभी नहीं हुआ था।’’32 इस संवेदना को प्रेमचन्द की कहानियां, ‘उपदेश’, बलिदान, बैंक का दिवाला’ में सहज ही देखा जा सकता है। वहीं ‘पशु से मनुष्य’ कहानी प्रेमचन्द की समाजवाद या सहयोगवाद में आस्था को रेखांकित करती है।  इसी प्ररिप्रेक्ष्य में गोपाल राय प्रेमचन्द के वैचारिक सौन्दर्य को रेखांकित करते हुए लिखते हैं कि प्रेमचन्द आदर्शवाद की स्थापना करते हैं जिसमें एक तरफ गांधीवाद है तो दूसरी तरफ समाजवाद है। ‘‘प्रेमचन्द गांधीवादी और समाजवादी विचारधारा के द्वंद्व में फंसे हुए हैं।’’33 

दलित संवेदना के साथ-साथ स्त्री संवेदना भी हिन्दी कहानी का सौन्दर्यबोध रहा है। प्रेमचन्द की कहानियों में यह अशिक्षित, रूढि़यों और अंधविश्वासों में जकड़ी, सदियों से पुरुष-व्यवस्था की मार झेलती, स्वाभाविक मानवीय अधिकारों से भी वंचित, किसी प्रकार की भी स्वतंत्रता से रहित, मूक-बधिर और दशक के अंत में अपनी सीमाओं को तोड़ती, मनुवादी व्यवस्था से विद्रोह करती स्त्री बार-बार सामने आती है। ग्रामीण सामाजिक संरचना का बहुत ही प्रामाणिक अंकन उनकी कहानियों में देखने को मिलता है। इस संरचना की नींव संयुक्त परिवार के परम्परागत मूल्यों पर आधारित थी। दाम्पत्य संबंध, दहेज प्रथा, विधवा विवाह, बहुविवाह, बिरादरी, कुल मर्यादा आदि इस संरचना की नींव थे। आत्मसमर्पण और सेवा धर्म को प्रेमचन्द दाम्पत्य जीवन का मूल तत्व मानते हैं। ‘दो सखियां’ कहानी द्वारा प्रेमचन्द आदर्श दाम्पत्य जीवन की एक रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं। प्रेमचन्द विवाहित जीवन में स्वतंत्रता की छूट नहीं देते। विवाह जैसी संस्था या प्रथा पर उनकी अलग ही द्दृष्टि है। ‘‘दाम्पत्य मूल्य को प्रेमचन्द की कहानियों में पारिवारिक संरचना का आधार के रूप में देखा जा सकता है।’’34 यह दाम्पत्य जीवन ‘शारीरिक सौन्दर्य की तुलना में आत्मिक सौन्दर्य’ के प्रेम पर आधारित है। प्रेमचन्द समाज में इसी प्रेम सौन्दर्य को स्थापित करना चाहते थे। भारतीय समाज में इसी प्रेम सौन्दर्य पर बल भी दिया गया है। ‘अलग्योझा’, ‘घरजमाई’ आदि कहानी में संयुक्त परिवार की परस्पर प्रेम पर आधारित संरचना का और ग्रामीण समाज की संरचना में घरजमाई की स्थिति मान-सम्मान आदि का चित्रण बहुत ही मार्मिक है। लोकमत का सम्मान, निम्नवर्गीय समाज की आर्थिक और नैतिक अंधविश्वासों, सामाजिक नैतिक रूढि़यों, धार्मिक विश्वासों, यहां तक कि ईश्वर के अस्तित्व में भी संदेह प्रकट हुआ हैं, वहीं उनकी कुछ कहानियों में भूत प्रेत, पुनर्जन्म, तर्कहीन अलौकिकताओं के प्रति स्वीकार का भाव लक्षित होता है। विध्वंस, मूठ, गुप्त धन, नाग पूजा, भूत, खूनी, पिसनहारी का कुआं, मंत्र, प्रतिशोध आदि कहानियां इस दृष्टि से उल्लेखनीय हैं।’’35 

सेक्युलर मूल्यों की स्थापना हिन्दी कहानी का सौन्दर्यबोध रहा है। हिन्दू मुस्लिम सद्भाव प्रेमचन्द की रचना का केन्द्रीय विषय रहा है। तत्कालीन औपनिवेशिक शासन व्यवस्था में समय की ऐसी मांग थी। ‘मंदिर और मस्जिद’, ‘हिंसा परमो धर्म आदि कहानियों में हिन्दू मुस्लिम सद्भाव का विचार व्यक्त हुआ है। ‘शुद्धि’, ‘जिहाद’ आदि भी अंधधार्मिकता के विरोध में लिखी गई कहानियां है। ‘शुद्धि’ का कहानी का यह कथन ही भारतीय समाज की धर्मनिर्पेक्षता को रेखांकित है। ‘‘मैं शुद्धि का हामी नहीं हूं। हिन्दू समाज में अब भी ऐसे बेशुमार आदमी पड़े हुए हैं जिनके हाथ का पानी पीना गवारा न होगा। हमारा समाज ऐसे ही आदमियों से भरा हुआ है’’। इसलिए गोपाल राय लिखते हैं कि प्रेमचन्द सच्चे अर्थों में सेक्युलर मूल्यों के समर्थक लेखक थे।’’36 प्रेमचन्द की यह धर्मनिर्पेक्षता उस समय की अन्य कहानीकारों की कहानियों में व्यक्त हुआ है। बेचनशर्मा ‘उग्र’ ने सांप्रदायिकता के विभिन्न पक्षों पर मानवीय संवेदना से विचार किया गया है। ‘दोजख!नरक!’ नामक उनकी कहानी में सेक्युलर मूल्यों की स्थापना की गई है-‘‘जो जामा मस्जिद में है, वही विश्वनाथ मंदिर में। वही खुदा, वही गॉड, वही ईश्वर।—मस्जिद, मंदिर, गिरजाघर आदि मनुष्य की कल्पना हैं। मनुष्य की कल्पना के लिए ईश्वर की कल्पना का नाश करना इतना बड़ा पाप है, जिसका कोई पर्याप्त दंड नहीं है।’’37 इस प्रकार कहा जा सकता है कि हिन्दी कहानी का सौन्दर्य एक धर्मनिर्पेक्ष मूल्यों की स्थापना करता है। यह दीगर बात है कि समाज में यह मूल्य आज भी विघटित हो रहा है।

प्रेमचन्द के समकालीन उग्र की कहानियों का सौन्दर्य भी औपनिवेशिक दासता के प्रति विद्रोह और मुक्ति की है। गोपाल राय के अनुसार ‘‘प्रेमचन्द और उग्र की कहानियां फ्रैंक ओ कॉनर की उस परिभाषा पर एकदम खरी उतरती हैं, जिसके अनुसार कहानी की प्रकृति दबे, उपेक्षित और अल्पसंख्यकों के, वर्चस्वसम्पन्न और बहुसंख्यकों के विरूद्ध, छापामार युद्ध की है। वह चाहे उपनिवेशवाद के विरूद्ध पराधीन देश की, पुरुषवादी व्यवस्था के खिलाफ स्त्री समाज की, उच्चवर्ग के विरूद्ध दलित वर्ग की अथवा जड़ नैतिक व्यवस्था के विरूद्ध अल्पसंख्यक रचनाकार का विद्रोह हो, कहानी उसकी आवाज बनकर प्रकट होती है। प्रेमचन्द और उग्र की कहानियां इसकी पुष्टि करती हैं।’’38 वहीं संवेदना और प्रवृत्ति की दृष्टि से विश्वम्भरनाथ शर्मा कौशिक, बद्रीनाथ भट्ट सुदर्शन, उपेन्द्रनाथ अश्क, रशीदुल खैरी और अली अब्बास हुसैनी आदि की कहानियों का विशेष महत्व है। गोपाल राय के अनुसार ‘‘यद्यपि इनकी कहानियां न तो व्यवस्था के विरूद्ध छापामार युद्ध की दृष्टि से और न ही संवेदना और शिल्प प्रयोग की दृष्टि से बहुत उल्लेखनीय है, पर साहित्य के इतिहास में उल्लेखनीयता की दृष्टि से कमजोर कहानियों का भी स्थान होता है।’’39

हिन्दी कहानी के इतिहास में स्त्री जीवन को लेकर कई कहानीकारों ने कहानी की रचना की है। इसी संदर्भ में वेश्या के जीवन से भी संबंधित रचनाएं मिलती है। प्रेमचन्द की कहानियों में स्त्री जीवन के विविध रूपों को सहज ही देखा-समझा जा सकता है। उनका जीवन ‘संघर्ष प्रायः प्रेम की प्राकृतिक संवेदना और समाज की रूढि़यों मान्यताओं के बीच होता है_ पर प्रसाद की कहानियों में यह संघर्ष शुद्ध परस्पर विरोधी संवेदनाओं का होता है।’ ‘आकाशदीप’ जो प्रसाद की सर्वोत्तम कहानियों में से एक है, इसका अनोखा उदाहरण है। ‘‘प्रेम और घृणा का ऐसा द्वंद्व और परस्पर स्पर्द्धिता शायद ही हिन्दी की किसी और कहानी में मिले। इस कहानी में विसंवादी संवेदनाओं के संघर्ष से करुणा की जो चिनगारी निकलती है, वह किसी भी सहृदय पाठक को अभिभूत करने के लिए पर्याप्त है। कहानी का वातावरण पूर्णतः रूमानी, साहसिक अभियान, कल्पना प्रसूत परिवेश और वैसे ही कल्पनालोक के प्राणियों से भरा हुआ है।’’40 वहीं ‘चूड़ीवाली’ में एक वेश्या पुत्री को कुलवधू बनने के स्वप्न को दिखाया गया है। पर सफलता उसे तब मिलती है, जब वह एक आदर्श प्रतिव्रता हिन्दू स्त्री और तपस्विनी की दिनचर्या ग्रहण कर लेती है। ‘रमला और बिसाती’ में प्रेम की संवेदना सामाजिक परिस्थितियों के संघात से टकराकर प्रेमी प्रेमिका के अनन्त वियोग का रोमानी स्वरूप ले लेती है। गोपाल राय के अनुसार ‘‘प्रसाद समकालीन जीवनधारा से बिलकुल कटे हुए नहीं थे, पर उनकी कम ही कहानियों ऐसी हैं जो उनकी यथार्थपरक संवेदना को कलात्मक प्रौढ़ता के साथ व्यक्त करती हों।’’41 ‘घीसू, ‘ग्रामगीत’, ‘पुरस्कार’ आदि कहानियों में प्रेम के विविध रूप देखने को मिलता है। अतीत एवं वर्तमान के समसामयिकता के संदर्भ में प्रेम की संवेदना प्रकट हुई है। ‘‘प्रसाद जी की कहानियों में प्रेम का आदर्श आध्यात्मिक स्तर पर उठ जाता है। उनकी आरंभिक कहानियों में प्रेम का भावुकतापूर्ण और अत्यधिक रोमानी रूप मिलता है, किन्तु धीरे धीरे उनमें औदात्य और गरिमा का समावेश होता गया है। उनकी दृष्टि त्याग और समर्पण की भावना से दीप्त, कल्पना से रंगीन और सूक्ष्म आदर्श से मंडित है। वह एकांगी नहीं है। उसमें दूसरी भावनाओं के साथ द्वंद्वात्मकता की स्थिति भी है। उनकी सर्वश्रेष्ठ कहानियां तो वे ही हैं जिनमें प्रेम की भावना का टकराव दूसरी भावनाओं के साथ होता है और इस टकराहट में पात्र बुरी तरह से झकझोर जाते हैं।’’42 गिरमिटिया मजदूर और शूद्र समाज के ऊपर पर भी कहानियां लिखी गई। प्रसाद की ‘नीरा’ और प्रेमचन्द की ‘शूद्रा’ कहानी ऐसी ही कहानी है। ‘‘नीरा की पृष्ठभूमि गिरमिटिया मजदूरों के मॉरिशस जाने की ऐतिहासिक घटना से जुड़ी हुई है, पर कथ्य उससे एकदम अलग हो गया है। अनास्था पर आस्था की जीत इस कहानी का मुख्य प्रतिपाद्य हो गया है।’’43 देहज प्रथा और उससे जुड़ी समस्याओं को प्रेमचन्द ने अपनी कहानियों में सशक्त रूप में उठाया है। यह संवेदना शिवपजून सहाय की कहानी ‘कहानी का प्लॉट’ में भी देखी जा सकती है। इस कहानी का कथ्य तत्कालीन समाज में प्रचलित दहेज प्रथा के कारण किसी प्रौढ़ पुरुष का किशोरी कन्या से विवाह है, जो अंततः स्त्री विवशता और सामाजिक अनाचार में परिणत होता है।’

हिन्दी कहानी की संवेदना इतिहास की सांस्कृति विरासत को भी रेखांकित करती है। आचार्य चतुरसेन शास्त्री की कहानियां भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ को ऐतिहासिक दंत कथाओं के माध्यम से चित्रित करती है। ‘‘कथ्य की दृष्टि से उनकी अधिकतर कहानियां ऐतिहासिक दंतकथाओं और अर्धप्रामाणिक घटनााओं या प्रसंगो पर आधारित हैं।—जिनका समय गौतम बुद्ध से लेकर 1857 के विद्रोह तक फैला हुआ है। तर्कसंगत ऐतिहासिक दृष्टि और वैज्ञानिक इतिहासबोध के अभाव में ये कहानियां प्रबुद्ध पाठक को प्रभावित करने में असमर्थ है।—सांस्कृतिक चेतना के नाम पर शास्त्री जी ने प्राचीन हिन्दू संस्कृति और परम्परागत सामाजिक नैतिक मूल्यों के प्रतिपादन पर अधिक जोर दिया है। परम्परा पर इनकी दृष्टि आलोचनात्मक नहीं है। कहीं-कहीं तो इन्होंने अपने तथाकथित सांस्कृतिक विचारों का प्रतिपादन सपाट वर्णन या पात्रें के संवादों के रूप में करने का प्रयास किया है।’’44

जैनेन्द्र हिन्दी कहानी संसार में एक अलग कथ्य को लेकर कहानी की रचना करते हैं। ‘‘जैनेन्द्र के कथा संसार में प्रवेश करते ही हमें महसूस होने लगता है कि वह प्रेमचन्द की तुलना में बिल्कुल बदला हुआ है_ वह गांव से नगर में और किसानों-मजदूरों की जिंदगी से उच्च मध्यवर्ग और अभिजात वर्ग की जिंदगी में आ गया है  उसमें किसान मजदूर वर्ग के पात्र मुश्किल से मिलते हैं।’’ समाज के प्रति जैनेन्द्र की प्रतिबद्धता अलग तरह की है। गोपाल राय के शब्दों में, ‘‘जैनेन्द्र प्रेमचन्द की यथार्थवादी कथा परम्परा से अलग एक भाववादी कथा परम्परा के पुरस्कर्ता बन जाते हैं। यह तनिक आश्चर्य की बात है कि राजनीतिक पृष्ठभूमि होते हुए भी जैनेन्द्र की कहानियों में स्वाधीनता आंदोलन की कोई साफ झलक नहीं दिखाई देती है।’’45 जैनेन्द्र के यहां मध्यवर्ग की आर्थिक मजबूरियां और नैतिक अंतर्विरोध सबसे ज्यादा जगह ली है। प्रेम के लिए आत्मबलिदान देने वाली स्त्री जैनेन्द्र की कहानी की खास विशेषता रही है। उनकी ‘जाह्नवी’ कहानी ऐसी है जिसमें ‘दो नैना मत खाइयो—पिया मिलन की आस’ की संवेदना रची-बसी है और उसी इंतजार में वह आजीवन शादी नहीं करती है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है एक अंतहीन प्रेेम की कहानी है। वह पारंपरिक विवाह नामक संस्था का विरोध प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष विरोध करती है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि जैनेन्द्र की कहानियों का सौन्दर्य प्रेमपरक है खासकर मध्यवर्ग के प्र्रेम जो पारंपरिक विवाह संस्थान को चुनौती देता है। हिन्दी कहानी का सौन्दर्य इस प्रकार एक विकासक्रम में विविध फलक को प्राप्त करता है। गोपाल राय ने सही ही लिखा है कि ‘‘संरचना की दृष्टि से चौथे दशक में हिन्दी कहानी प्रौढ़ता पर पहुंच गयी, जिसका श्रेय प्रेमचन्द के साथ जैनेन्द्र और अज्ञेय को है। पांचवे दशक में मंटो और बेदी ने और छठे दशक मे अमरकांत, मोहन राकेश, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, शेखर जोशी, इंतिजार हुसैन, निर्मल वर्मा, रेणु आदि ने कहानी की संरचना को अपेक्षित ऊंचाई पर पहुंचा दिया।’’46 अर्थात हिन्दी कहानी एक क्रमिक विकासक्रम में विकसित होती रही है। समय सापेक्ष उसके मूल्यों में परिवर्तन होता रहा है। डॉ नंद किशोर नीलम के शब्दों में कहें तो, ‘‘हिन्दी कहानी में प्रेमचन्द के आस-पास जो सौन्दर्यबोध विकसित हो रहा था वह बहुत कुछ सौंदर्यशास्त्र की आत्मवादी, भाव-वादी और आध्यात्मिक विचारणा पर आधारित था। आशय यह कि वह सौन्दर्यबोध अधिकांशतः भारतीय काव्यशास्त्र और दरबारी मानसिकता का पोषक करने वाला था।—कहना न होगा कि इन कहानियों का सौन्दर्यशास्त्र भी निष्क्रिय और कुंठित जीवन दशर्न का पर्याय बन गया। अगर कोई इजाफा आगे जाकर हुआ तो वह यह कि कलावाद, रूपवाद और रीतिवाद नए अभिजनीय स्वरूप में सामने आ गए। उनका यह नया अभिजनीय स्वरूप था आधुनिकतावादी।’’47 

साहित्य की बदलती संवेदना के आधार पर ही प्रेमचन्द ने ‘साहित्य की कसौटी48 बदलने की बात की थी। ‘‘जब से भारतीय साहित्य में, विशेषकर हिन्दी साहित्य में जातीय अस्मिता की खोज की बात उठी, जनजीवन से गहरे सरोकार और सहकार वाली साहित्य चिंता की बात उठी तथा मार्क्स के सौन्दर्य-कला चिंता के प्रतिमानों का प्रभाव हमारे साहित्य पर पड़ा तब से सौन्दर्यशास्त्र के आयाम भी बदले और सौन्दर्यशास्त्र की भाववादी, आत्मवादी, अलौकिक, अतिमानवीय और अवैज्ञानिक निष्पत्तियों की पुनर्व्याख्या भी की जाने लगी।—आज सौन्दर्य के उद्घाटन का तात्पर्य रचना के संपूर्ण मूल्यों और गुणों का उद्घाटित करना है। किसी भी रचना (कलाकृति) के सुंदर आनंदकारी या उजले पक्ष को ही नहीं उसके करूणा, जुगुप्सा, वीभत्सता में डूबे काले पक्ष को उद्घाटित करना और उसके प्रतिकार के लिए जन सामान्य के भीतर क्षोभ और संघर्ष की भावना उत्पन्न करना भी सौन्दर्य का उद्घाटन ही है।’’49 डॉ नंदकिशोर नीलम के अनुसार ‘‘भारतीय परिवेश, परिस्थितियों, विवके परंपरा और चिंता धारा के अनूकूलन में हिन्दी कहानी का एक खाका निर्मित होना चाहिए। जातीय अस्मिता की खोज, पहचान और विकास उसके केन्द्र में रहना चाहिए। कहानी की स्थापत्य, नक्शा, रूप, शिल्प और विषय-वस्तु यानी उसका संपूर्ण कहानी के विन्यास में ही खोजा जाना चाहिए। वह आरोपित, थोपा हुआ और पूर्व निर्धारित नहीं होना चाहिए। इस तरह कहानी का एक जातीय चरित्र प्रस्तुत किया जा सकता है। कहना न होगा कि मेरा यह प्रयास लोक जीवन और लोक प्रकृति से जुड़े उस जातीय और जनवादी सौन्दर्य बोध के आधार पर विकास पाता है जो समकालीन कहानी की मूल धारा है।’’50 ‘हिस्ट्री आफ माइंड’ और इतिहास दशर्न ही साहित्य-कहानी का सौन्दर्यशास्त्र है और इसी सौन्दर्यशास्त्र की जरूरत हिन्दी साहित्य की आलोचना के लिए सबसे अधिक है। ‘‘सौन्दर्य भाव, विचार और इन्द्रियबोध की संगति से उत्पन्न होता है। भाव, विचार और इन्द्रियबोध से ही रचना का मूल्य और वैिशष्ट्य निरूपित होता है। आलोचक को इसी आधार पर रचना का मूल्यांकन भी करना चाहिए। सौन्दर्यशास्त्र का साहित्य में विवेचन करने के लिए आलोचक की गहरी पकड़ यथार्थवाद पर होनी चाहिए। साहित्य में यथार्थ का चित्रण कितना सटीक और कितना सजीव रूप में हुआ है इस पर ध्यान देना अत्यंत आवश्यक है। यही कृति के सौन्दर्य की कसौटी भी है। सौन्दर्य का स्रोत जनजीवन है और उसका उत्कर्ष है जीवन संग्राम।’’51 

सौन्दर्य का उत्कर्ष जीवन संग्राम में ही देखा जा सकता है। संकीर्ण दृष्टि को बदले बिना वास्तविक सौन्दर्यबोध की अनुभूति संभव नहीं है। जीवन-जगत के प्रत्यक्ष अनुभव का सशक्त माध्यम है इन्द्रियबोध। समकालीन कहानी में इन्द्रियबोध की व्यापकता स्पष्टतः देखी जा सकती है। इन्द्रियबोध और भाव दो अलग अलग चीज है समस्या तब होती है जब दोनों को एक समझ लिया जाता है। भावों का आशय भीतर के सौन्दर्य से है, उनका उदय मन में होता है जबकि इन्द्रिय बोध तक बाह्य, प्रत्यक्ष जगत का अनुभव है, इन्द्रियों से इस जगत का बोध होता है। भाव जगत और इन्द्रिय बोध एक ही यथार्थ के दो पक्ष हैं जो पूर्णतः स्वतंत्र न होकर परस्पर संबद्ध हैं। सौन्दर्यबोध भावबोध को प्रभावित करता है और भावबोध से विचार बनते हैं। यह प्रक्रिया दोहरी मिश्रित और संश्लिष्ट है।

स्वाधीन भारत में समाज का परिदृश्य बदला है। समाज का बदलता परिदृश्य साहित्य से अछूता नहीं रहा है। कहानी का यथार्थ और यथार्थ की काल्पनिक जमीन समय सापेक्ष जमीन की हकीकत और यथार्थ में बदल गयी। कहानी की संवदेना का बदलता हुआ यह स्वरूप आंदोलनधर्मिता का रूप ग्रहण किया है। ‘नई कहानी’ में इसी अवधारणा के तहत यथार्थ की प्रामाणिकता और अनुभूत यथार्थ की अभिव्यक्ति हुई है। ‘‘नयी कहानी का अभिप्राय यह है कि इसने कहानी को वस्तु और शिल्प की दृष्टि से एक नया रूप दिया जिसमें नयेपन का सचेत आग्रह था। यह परिवेश और रचनाशीलता के द्वंद्व से उपजा था क्योंकि स्वतंत्रता के बाद कथाकार जीवन के बदलते यथार्थ को एक नये परिवेश में देख रहा था और यह अभिव्यक्ति की नई भंगिमाओं को तलाशने की भी कोशिश कर रहा था। कहानी में परिवर्तन की आवाजें आ रही थी।’’52 परिवर्तन की इसी आवाज में नई कहानी आंदोलन की शुरूआत होती है और कहानी की प्रवृतियां आंदोलनधर्मी होती जाती है।

कहानी या किसी भी विधा का कोई भी आंदोलन विकास की एक प्रक्रिया से जुड़ा होता है और उसकी एक पृष्ठभूमि भी होती है। यह पृष्ठभूमि हिन्दी कहानी में भी मिलती है जिसमें सामाजिक और व्यक्तिवादी चेतना दोनों का ही आधार रहा है। प्रेमचन्द ने वर्ग संघर्ष को समन्वय कर उसे भारतीय दर्शन से जोड़ा है और उनके सामाजिक यथार्थ की परंपरा में यशपाल, रांगेय राघव, भैरवप्रसाद गुप्त, उपेन्द्रनाथ अश्क, अमृतराय और अन्य प्रगतिवादी मार्क्सवादी रचनाकार वर्ग चेतना के संदर्भ में वर्ग विशेषता पर प्रहार करते हुए दिखते हैं। इसी प्रकार व्यक्तिवादी या मनोवादी चेतना के संदर्भ में जैनेन्द्र, इलाचंद्र जोशी और अज्ञेय तथा अन्य कहानीकार भी हैं। जिन्होंने व्यक्ति मन की अतल गहराईयों को मनोवैज्ञानिक धरातल पर आत्मसंघर्ष के रूप में व्यक्त किया है। स्वतंत्रता के बाद देश में अनेक घटनाएं घटी हैं और स्वतंत्रता एक राजनैतिक मूल्य से भी बढकर नयी विचार क्रांति के रूप में सामने आयी है। स्वतंत्रता में जो स्वप्न देखे गये थे वे कलांतर में बिखर कर टूटे हैं और जीवन में अनेक समस्याओं का विकास हुआ है। महंगाई के बढ़ने से जीना कठिन हुआ है और देश की बहुत बड़ी जनसंख्या अब भी बेरोजगारी और बेकारी के बीच जी रही है। समाजवादी अर्थव्यवस्था में भी पूंजी का कुछ लोगों के हाथों में केन्द्रीकरण हो गया है। भारतीय राजनीति ने सत्ता के लिए प्रांतीयता, जातीयता और क्षेत्रीयता को बढ़ाया है। सबसे अधिक समस्या मध्यवर्ग को आई है और उसका मोहभंग हुआ है। स्वतंत्रता और यांत्रिकाएं, राजनीतिक भ्रष्टाचार और परिवारों का विघटन अनेक प्रकार के भीतरी और बाहरी संकटों से भरा रहा हैै। इस तरह एक और राजनीतिक स्तर पर अनेक प्रक्रार की हलचल और आर्थिक विकास और समाजिक निर्माण की तेज प्रक्रिया के बीच नई पीढ़ी ने नैतिकता के इस पतन को देखा है। नई पीढ़ी के जो भी कहानीकार हैं वे इन समस्याओं के बीच व्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल उठाते हैं।

नई कहानी में यथार्थ की प्रामाणिकता पर बल दिया गया है। यह भोगे हुए यथार्थ तक ही सीमित नहीं है बल्कि अनुभूति की प्रामाणिकता और प्रामाणिकता की यथार्थवादी प्रस्तुती है। कहानी अब जीवन का प्रतिबिंब नहीं, जीवन की एक फांक, अनुभव या खंड मात्र बन गई है। इसलिए कमेलश्वर ‘नई कहानी की भूमिका’ में लिखते हैं कि ‘‘पूर्व कहानी जीवन का चित्र मात्र थी, चित्र में जीवन की वास्तविकता नहीं होती, थोड़ी कृत्रिमता या बनावटीपन होता है। नई कहानी इस बनावटीपन और चित्र की जीवनगत दूरी को मिटाकर जिंदगी के किसी हिस्से के रूप में आती है। यानि नई कहानी पहले और मूल रूप में जीवनानुभव है, उसके बाद कहानी है।’’53 इस प्रकार कहा जा सकता है कि नई कहानी का सौन्दर्य जीवन का अनुभव का सौन्दर्य है। उसमें विश्वसनीयता का संकट नहीं के बराबर रहा है। कहानी के केन्द्र में व्यक्ति और उसका समाज है। सामाजिकता और वैयक्तिकता का समन्वय कहानी की संवेदना में है। यही कारण है कि नई कहानी मानवीय रिश्तों, संबेधों पर बहुत अधिक लिखा गया है। राजेन्द्र यादव के शब्दों में, यह ‘‘व्यक्तिगत सामाजिकता’’54 है। इस सामाजिकता में विविधता और व्यापकता तो बहुत है लेकिन वह मुख्यतः संबंधों के यथार्थ पर आधारित है। मोहन राकेश के अनुसार ‘‘नई कहानी में यथार्थ अपेक्षाकृत ठहरे हुए— पारिवारिक और वैयक्तिक यथार्थ है।’’55 वस्तुतः नई कहानी में विविधता और व्यापकता का कारण व्यक्ति के जीवन के विभिन्न यथार्थ और उसका सामाजिक सरोकार हैं। यह यथार्थ व्यक्ति की निजी अनुभूति और दृष्टिकोण है। पुष्पपाल सिंह के अनुसार ‘‘भोगे हुए या अनुभूत यथार्थ की अभिव्यक्ति में किसी प्रकार के निषेधभाव ( इन्हिबिशन्स) न होने के कारण यह यथार्थ बहुआयामी और अत्यंत व्यापक है। इसीलिए नई कहानी में एक प्रकार का अपूर्व वैविध्य दिखाई देता है।’’56 यह विविधता व्यक्ति की प्रवृत्तियों से लेकर समाज, गांव, शहर, कस्वा और महानगर तक सभी स्तरों पर विद्यमान है। सन् 1950 से लेकर 1960 के बीच की कहानियों को नई कहानी नाम से जाना जाता है, अभिहित किया जाता है। इसमें ‘व्यक्ति के संदर्भ में समाज को देखने की प्रवृत्ति है।’ रामचन्द्र तिवारी के शब्दों में ‘‘कहानी पढ़ते हुए पहले हमारा ध्यान व्यक्ति पर जाता है। व्यक्ति खोया-खोया, टूटा-टूटा या अपने को अजनबी अनुभव करता हुआ दिखाई पड़ता है। उसकी इस मनःस्थिति का कारण सामाजिक विघटन है। इस प्रकार व्यक्ति से हो कर समाज तक पहुंचते हैं।’’57 

हिन्दी कहानी में गांव और आंचलिकता का चित्रण एवं उसका सौन्दर्य बहुत ही मार्मिक ढंग से हुआ है। जहां गांव का मतलब होता है विभिन्न जातियों व समुदायों के जीवन के बारे वर्णन। ‘भारतीय गांव अलग से सामाजिक इकाई है। उसमें भिन्न-भिन्न जातियां होती है।’ इसका विशद वर्णन प्रेमचन्द की रचनाओं में मिलता है। वहीं आंचलिकता की शुरूआत फणीश्वरनाथ रेणु की ‘मैला आंचल’ से होती है। उनकी कहानियों में अंचल विशेष की जिंदगी सचित्र झांकती है। फणीश्वरनाथ रेणु की कहानियां ‘लाल पान की बेगम’ और ‘तीसरे कदम उर्फ ‘मारे गये गुलफाम’ इसकी सशक्त उपस्थिति हैं। शेखर जोशी की कहानी ‘कोसी का घटवार’ और शिवप्रसाद सिंह की कहानी ‘कर्मनाशा की हार’ में गांव की छवि पूरी की पूरी उतर कर आयी है। लेकिन नई कहानी तक आते-आते कहानी का कथ्य गांव से अलग कस्बा, नगर और महानगरीय जीवन का हो जाता है। नगरीय जीवन का चित्रण नई कहानी के केन्द्र में रहा है। मोहन राकेश की कहानी ‘ग्लासटैंक’ और कमलेश्वर की कहानी ‘खोई हुई दिशाएं’ में महानगरीय जीवन का सफल चित्रण हुआ है। जिसमें जीवन को विभिन्न संदभों और स्थितियों में दर्शाया गया है। नई कहानी में चित्रित कथा और पात्रें के जीवन के संदर्भ में राजेन्द्र मिश्र ने लिखा है कि ‘‘नई कहानी में स्थितियों का संदर्भ व्यापक रूप से मिलता है और वे केवल पात्र केंद्रित कथाएं नहीं है। जीवन के व्यापक स्तर पर इन पात्रें को रचा गया है।’’58 अर्थात जीवन के विभिन्न संदर्भों में पात्रें को रचा गया है। वह अपनी कमजोरियों के साथ स्थिति एवं परिस्थितियेां के बीच घिरा होता है। नई कहानी की संवेदना मध्यवर्गीय जीवन की संवदेना है। व्यापक फलक पर नई कहानी के पात्र मध्यवर्गीय जीवन से ताल्लुक रखता है। मध्यवर्गीय जीवन के संघर्ष की कहानी ही नई कहानी की संवेदना में व्यापकता से उजागर होती है।

नई कहानी की प्रवृत्तियों को इस प्रकार देखा जा सकता है। यह प्रवृत्तियां कथ्यगत और शिल्पगत दोनों है-कथ्यगत विशेषताएं यथार्थ के प्रति नया रूख, संबंधों के बदलाव का बिन्दु, दांपत्यगत दूरियों की ईमानदार स्वीकृति, नारी पुरूष के प्रकृत काम संबंधों का स्पष्ट स्वीकार, मध्यवर्गी य जीवन और व्यक्ति कहानी के केन्द्र में, महानगरीय जीवन बोध, मूल्यों और मान्यताओं में परिवर्तन, विद्रोह भाव, विदेश से आयातित विचारदर्शनों का प्रभाव मार्क्सवाद, अस्तित्ववाद, पूंजीवाद, व्यक्तिवाद आदि, वैयक्तिक चेतना का प्रकाशन, वैज्ञानीकरण, औद्योगिकीकरण और तकनीकी उन्नति के प्रभाव, विदेशी सभ्यता और संस्कृति का प्रभाव, परिवेश के प्रति जागरूकता, प्रत्येक स्तर पर रोमानीबोध से मुक्ति आदि हैं। वहीं शिल्पगत विशेषताएं भाषा की समर्थ अभिव्यंजना, भाषा का स्वाभाविक अलंकरण, सशक्त बिंब विधान, प्रतीकात्मकता, कथानक के स्थान पर वातावरण परिवेश चित्रण का महत्व, पूर्व दीप्ति पद्धति, समानांतर एवं दुहरे कथानक, पात्रें के नाम और वर्ग का लोप (व्यक्तिवाची संज्ञाओं के स्थान पर सर्वनामों का प्रयोग), निष्कर्षहीन कहानियां(नीति कथाओं जैसे निष्कर्ष नहीं है), कहानी में गद्य की अन्य विधाओं की अंतर्भुक्ति, कहानी में लघुता या दीर्घता (आकार-सीमा) का निषेध आदि हैं।59

नई कहानी के संदर्भ में कमलेश्वर का यह कथन मार्मिक है कि ‘‘स्वतंत्रता के बाद पहली बार नई कहानी ने आदमी को आदमी के संदर्भ में प्रस्तुत किया है, शाश्वत मूल्यों की दुहाई देकर नहीं, बल्कि उस आदमी को उसी के परिवेश में सही आदमी या मात्र आदमी के रूप में अभिव्यक्ति देकर।’’60 अर्थात नई कहानी में व्यक्ति आदमी किसी शाश्वत मूल्यों को लेकर उपस्थिति नहीं हुआ है। वह परिस्थिति और परिवेश से बंधा हुआ है। वह ‘‘मनुष्य को उसके परिवेश में अन्वेषित करती है। और मानव नियति एवं उसके संकट के द्वंद्व को व्यक्त करती है।’’61 ‘‘नई कहानी में मात्र सामान्य मनुष्य ही अवतरित हुआ है, अपनी सारी खामियों, कमियों और अच्छाईयों के संदर्भ में।—नई कहानी का व्यक्ति (या मनुष्य)इन सब विविध अनुभवों के संदर्भ में ज्यादा प्रौढ़ और संयत है, ज्यादा सही और सच्चा औसत आदमी है।’’62 कमलेश्वर के अनुसार ‘‘नई कहानी आग्रहों की कहानी नहीं है, प्रवृत्तियों की हो सकती है और उसका मूल स्रोत है-जीवन का यथार्थबोध और इस यथार्थ को लेकर चलने वाला वह विराट मध्य और निम्न वर्ग है जो अपनी जीवन शक्ति से आज के दुर्दांत संकट को जाने-अनजाने झेल रहा है। उसका केन्द्रीय पात्र है (अपने विविध रूपों और परिवेशों में) जीवन को वहन करने वाला व्यक्ति।’’63 इस प्रकार कहा जा सकता है कि जटिल जीवन यथार्थ की व्यापक स्वीकृति नई कहानी की केन्द्रीय प्रवृत्ति है। जिसमें व्यक्ति की प्रतिष्ठा, छिछली भावुकता का ह्रास, मध्यवर्गीय जीवन चेतना, आधुनिकता बोध, सांकेतिकता आदि को सहज ही पहचान की जा सकती है।

किसी भी विषय वस्तु का सौन्दर्य उसकी सार्थकता में निहित होता है। हिन्दी कहानी की सार्थकता की बात करते हुए नामवर सिंह लिखते हैं कि ‘‘कहानी का यह दुर्भाग्य है कि वह मनोरंजन के रूप में पढ़ी जाती है और शिल्प के रूप में आलोचित होती है। मनोरंजन उसकी सफलता है तो शिल्प सार्थकता। यदि शास्त्रीय आलोचक कहानी को केवल साहित्य रूप समझते हैं तो मूल्यवादी आलोचक उसे जीवन की सार्थक अनुभूतियों के लिए असमर्थ मानते हैं।—आज कहानी की सफलता का अर्थ है कहानी की सार्थकता। आज किसी कहानी का शिल्प की दृष्टि से सफल होना ही काफी नहीं है बल्कि वर्तमान वास्तविकता के सम्मुख उसकी सार्थकता भी परखी जानी चाहिए। जीवन के जिन मूल्यों की कसौटी पर हम कविता, उपन्यास आदि साहित्य रूपों की परीक्षा करते हैं, उन्हीं पर कहानी की भी परीक्षा होनी चाहिए। इससे कहानी समीक्षा का एक ढांचा तो तैयार होगा ही_ साथ-साथ मानवीय मूल्यों के संबंध में हमारा ज्ञान भी बढेगा और संपूर्ण साहित्य के मानों की अपर्याप्तता भी क्रमशः कम होगी।’’64 

हिन्दी कहानी की आलोचना में कहानी के भाषा-शिल्प सौन्दर्य पर लगातार बल दिया जाता रहा है। नामवर सिंह के अनुसार, ‘‘कहानी शिल्प संबंधी आलोचनाओं ने कहानी की जीवनी शक्ति का अपहरण कर उसे निर्जीव ‘शिल्प’ ही नहीं बनाया है बल्कि उस शिल्प को विभिन्न अवयवों में काटकर बांट दिया है। लिहाजा, हम कहानी को ‘कथानक’, ‘चरित्र’, वातावरण’, भावनात्मक प्रभाव’, विषयवस्तु’, आदि अलग-अलग अवयवों के रूप में देखने के अभ्यस्त हो गये है।’’65 वर्तमान कहानियों में जहां कहीं शिल्पवादी प्रवृत्ति का अतिरेक दिखाई पड़ता है, उसका संबंध किसी न किसी रूप में कहानी की विभक्त धारणा से अवश्य है। ‘‘यदि कोई कहानीकार शिल्प के किसी विशेष अवयव की रचना करके सफलता का ढोल पीटता है तो यही समझना चाहिए कि वह कहानी को एक शिल्प समझता है।’’66 नामवर सिंह के अनुसार ‘‘कहानी का मूल तत्व कहानीपन है। लय की तरह कहानी कहना मनुष्य की काफी पुरानी कलात्मक वृत्ति है और इसकी रक्षा अपने आप में स्वयं भी एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक कार्य है और इतिहास से प्रमाणित होता है कि नीति, लोक-व्यवहार, धर्म, राजनीति आदि विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए इस कला का उपयोग करते हुए भी मानव-जाति ने आज तक इसकी रक्षा की है। निःसंदेह इस कला का चरम विकास आधुनिक युग में हुआ जब उद्देश्य और कहानीपन दोनों घुल-मिलकर इस तरह हो गये कि उद्देश्य से अलग कहानी के रूप की कल्पना भी कठिन हो गई।’’67 अर्थात कहानी के उद्देश्य में ही उसका सौन्दर्य छिपा होता है। कहानीपन उसका अनिवार्य तत्व है। ‘कहानी की कहानीपन की सफलता का अर्थ है उनकी अर्थवत्ता या सार्थकता।’ कहानियों का अध्ययन केवल सोद्देश्यकता की पृष्ठभूमि में ही किया जा सकता है।68 अंतर्विरोध को उसकी संपूर्ण तीव्रता में ग्रहण करके ही किसी कहानी को सफल और सार्थक बनाया जा सकता है।69 

नई कहानी में संप्रेषणीयता का सवाल महत्वपूर्ण सवाल बन कर उभरा है। संप्रेषणीयता’ की कठिनाई केवल भाषा या साहित्यिक माध्यम की कठिनाई नहीं है, बल्कि किसी गहरे सांस्कृतिक संकट का लक्षण है। नामवर सिंह के अनुसार ‘‘नई कहानी का समूचा रूपगठन(स्ट्रक्चर) और शब्द गठन(टैक्स्चर) ही सांकेतिक है।’’70 ‘प्रभावान्विति’ कहानी में उतनी पुरानी है जितनी स्वयं आधुनिक कहानी। किंतु प्रभाव की संपूर्ण अन्विति को सांकेतिक बनाने का श्रेय एकदम नई कहानी को है। नई कहानी संकेत करती नहीं, बल्कि स्वयं संकेत है।’ नई कहानी में वातावरण अंतःकरण है। वातावरण निर्माण में नये कहानीकार प्रायः बिम्ब विधान का सहारा लेते हैं। नामवर सिंह के अनुसार ‘‘नई कहानी के प्रसंग में यदि ‘संप्रेषणीयता’ का कोई अर्थ हो सकता है, तो रस-बोध के विविध स्तरों की प्रेषणीयता।’’71 ‘कहानी में प्रतीक और संकेत का एक दूसरा पहलू यह भी है कि वह कहानी को विचार शून्य करता है। यह एक बड़ा संकट है साहित्य में कहानी के लिए।’72 ‘प्रतीक संकेत की पद्धति से भाषा में जहां एक ओर अर्थवत्ता आयी है, वहां दूसरी ओर उस पर अनावश्यक काव्यात्मकता का लदाव भी हुआ है।’’73 

इस प्रकार हिन्दी कहानी में नई कहानी के बाद आंदोलन के तौर पर, अकहानी, सहज कहानी, सक्रिय कहानी, जनवादी कहानी और समकालीन आदि की अवधारणा आती है। राजेन्द्र मिश्र के अनुसार ‘‘वस्तुतः 1950 से नयी कहानी का स्वरूप सामने आया है। 20वीं शताब्दी के अंतिम 50 वर्षों में कविता के समान कहानी के भी अनेक आंदोलन चले हैं। यदि गहराई से देखा जाये तो वे सभी नयी कहानी का ही अलग-अलग रूपों में विस्तार है। सामाजिक स्थितियों और व्यक्ति मनोविज्ञान के आधार पर उन्हें रचा गया है। भारत जैसे गरीब देश में आर्थिक विषमता बहुत गहरी है और कहानियों के माध्यम से उसे विभिनन आंदोलनों का नाम देकर भी वर्ग संघर्ष को उभारा गया है। रोमानी भाव की वजाय कहानियों में वर्ग संघर्ष को अधिक चित्रित करने का प्रयास उसे सामाजिक यथार्थवाद से जोड़ने का ही उपक्रम है। कहानी के आंदोलनों का आधार शिल्पगत उतना नहीं है जितना कि वह विचारगत है। कहानी का विषय भी व्यापक होता गया है और निम्न-से-निम्न वर्ग के जीवन पर भी कहानी लिखी जाती है। आभिजात्य की बजाय वह यथार्थ से जुड़ी है। अतः कहानी के विभिन्न आंदोलन अलग-अलग न होकर उस नयी कहानी का ही विस्तार हैं जिसे हम आज की कहानी भी कह सकते हैं।’’74

समकालीन कहानी आंदोलन के पृष्ठभूमि में 1965 की राजनैतिक चेतना है और उसकी चुनौतियां हैं। समकालीन कहानी का उद्देश्य ‘‘समाजवाद की स्थापना के लिए वर्तमान चरण में मजदूर किसान की मित्रता के आधार पर सच्चे जनतंत्र की स्थापना। समकालीन कहानी इसे समझते हुए इसके लिए संघर्षरत है। यह साम्प्रदायिक संकीर्णता, जातिवाद, विघटनवाद और अंध राष्ट्रवाद और भाषा तथा क्षेत्रीयता के नाम पर हमारी जनता और राष्ट्र की एकता को तोड़नेवाली शक्ति का पूरी शिद्दत से विरोध करता है।’’75 समकालीन भारतीय समाज धर्म, जाति, उपजाति, नस्ल जैसे संकीर्ण खानों में बांटता जा रहा है। इन खानों को मिटाने की कोशिश हम सालों से कर रहे हैं। इसका प्रत्यक्ष उत्तरदायी हमारे राजनीतिक एवं धार्मिक नेताओं की स्वार्थता और तंग दृष्टि ही है। ‘‘समकालीन कहानी के केंन्द्र में जो आम आदमी है, उनकी दुनिया धर्म और साम्प्रदायिकता की राजनीति करने वालों से अलग है, उनसे घृणा करती है, उनकी नैतिकता पर शक करती है, उनके देशप्रेम की वास्तविकता की पड़़ताल करती है और साथ ही उनकी ईमानदारी की धज्जियां उड़ाती है।’’76 अर्थात समकालीन विमर्श के दौर में धर्म और साम्प्रदायिकता की राजनीति की पड़ताल करती है हिन्दी कहानी का सौन्दर्य और एक मानुषसत्य की ओर बढ़ने की चाहत पैदा करती है।

निष्कर्षः

इस प्रकार देखा जा सकता है कि हिन्दी कहानी का सौन्दर्य एक विकास प्रक्रिया में लगातार बदलता रहा है। इस बदलाव की प्रक्रिया में प्रेमचन्द की संवेदना और रचनात्मक कला की भूमिका अहम रही है। लेकिन उसके बाद कहानी की संवेदना मध्यवर्गीय जीवन से जुड़ती गई। उनकी इच्छा, आकांक्षाओं को ही व्यक्त करती है। ‘‘प्रेमचन्दोत्तर कहानी विशेषकर नई कहानी मूलतः मध्यवर्गीय नगरीय जीवन के यथार्थ से जुड़ी रही है। इस कहानी का संसार मानव-मानव के बनते बिगड़ते संबंधी और उनके बदलते मूल्यों की तलाश, परंपराबोध और आधुनिकता की टकराहट, सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियों से उत्पन्न मानवीय विकृतियों को भोगे हुए यथार्थ के धरातल पर चित्रित करता है। इतना होते हुए भी दलित इन कथाकारों द्वारा नजर अंदाज कर दिया गया। सातवें दशक की कहानी में भी दलित चेतना को उभारने का प्रयास नहीं किया गया। हिन्दी कथा साहित्य में दलित चेतना की अभिव्यक्ति के दृष्टिकोण से आठवां दशक महत्वपूर्ण है।’’77 अर्थात हिन्दी में दलित चेतना का लेखन सन् 1980 के आस-पास से शुरू होता है। दलित जीवन से संबंधित रचनाएं हिन्दी साहित्य में मिलती रही हैं लेकिन उसकी संवेदना सहानुभूति की रही है दलित चेतना की नहीं। दलित जीवन से संबंधित रचनाएं जिसकी विरासत प्रेमचन्द ने आने वाली पीढ़ी को सौंपा उसका वहन परवर्ती हिन्दी लेखकों की रचनाओं में नहीं के बराबर मिलती हैं। राजनीति स्तर पर दलितों की समस्याएं उजागर होती रही हैं लेकिन हिन्दी में रचनात्मक स्तर पर दलितों की समस्याओं का चित्रण मुकम्मल तौर पर नहीं हुआ है। यदि कहीं हुआ भी है तो सहानुभूति के स्तर पर उसका चित्रण हुआ है। उनमें चेतना की कमी है। दलित लेखन दलित चेतना और आंदोलन की उपज है। प्रेमचन्द साहित्य में जिस सौन्दर्य की कसौटी बदलने की बात कर रहे थे, उसकी कमी हिन्दी कहानी लेखन में है, उसका सौन्दर्य जरूर बदल गया है लेकिन उसकी तीव्रता प्रेमचन्द की साहित्य की कसौटी नहीं रही है। प्रेमचन्द साहित्य में जिस सौन्दर्य मूल्यों की स्थापना करते रहे और साहित्य की कसौटी को बदलने की बात करते रहे हैं। जिन साहित्यिक मूल्यों को आने वाली पीढ़ी को सौपा, वह वहीं के वहीं रह गया। प्रेमचन्द की विरासत उनकी लेखनी की अंतिम सांसों के साथ ही थम गई। आने वाला समय अपने ढंग से साहित्य की संवेदना और सौन्दर्य को रेखांकित करने लगा। उसे संचित करने लगा। कहानी का सौन्दर्य जिस व्यापकता में प्रेमचन्द की रचना में रचा-बसा है। उसका विकास हिन्दी में नहीं हो सका। सौन्दर्य की जिन कसौटी को प्रेमचन्द ने साहित्य में जगह दी थी, उसका ह्रास प्रेमचन्द युग में देखा जा सकता है। नई कहानी का सौन्दर्य स्वाधीनता के मोहभंग और आर्थिक निर्भरता या फिर स्त्री-पुरुष संबंधों में खो गया। सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों का ह्रास सामाजिक जड़ता की ओर संकेत है और हिन्दी कहानी का सौन्दर्य स्वाधीनता के साथ इसी का शिकार है। नई कहानी का सौन्दर्य वैचारिकता की दृष्टि से बहुत ही कमजोर रही है। राजनीति विचारों का नई कहानी में जगह नहीं मिलना उसी का परिणाम है। सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों एवं विचारों की दृष्टि से नई कहानी और उसके बाद की कहानी का सौन्दर्य सामाजिक फूहड़ता का शिकार रहा है। यही कारण है सामाजिक-सांस्कृतिक संसाधनों पर ब्राह्मणवादी मानसिकता की कब्जा रही है और वे मूल्यों के नियंता रहे हैं। कहानी का सौन्दर्य इस जड़ता, फूहड़ता और नियंता को समाप्त कर सकता था लेकिन ऐसा करने में सक्षम नहीं रहा। समय सापेक्ष कहानी की संवेदना का स्वरूप बदलता रहा है लेकिन सौन्दर्यबोध सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों की सामाजिकता से बाहर रहा है। जिसकी पूरी संभावना थी कि स्वाधीन भारत में समाज के सभी समुदाय की संवेदनाएं, समस्याएं, इच्छाएं, आकांक्षाएं और स्वप्नों की अभिव्यक्ति होगी और उसके मूल्यों का सौन्दर्य भारत को नये क्षितिज पर पहुंचाएगा। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कहानी के सौन्दर्यबोध में इतिहासबद्ध समाज के सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों की स्थापना हो रही है।

 

संदर्भ ग्रंथसूची:

1- गोपाल राय, हिन्दी कहानी का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2011, पृ- 45

2- रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, नागरीप्रचारिणी सभा, वाराणसी, संवत, 2058, पृ- 267 भारतेन्दु मंडल मनोरंजक साहित्यनिर्माण द्वारा हिन्दी गद्य साहित्य की स्वतंत्र सत्ता का भाव ही प्रतिष्ठित करने में अधिकतर लगा रहा।

3- गोपाल राय, हिन्दी कहानी का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2011, पृ- 55

4- प्रेमचन्द, साहित्य का उद्देश्य, हंस प्रकाशन, इलाहाबाद, 2001, पृ- 47

5- गोपाल राय, हिन्दी कहानी का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2011, पृ- 55

6- प्रेमचन्द, साहित्य का उद्देश्य, हंस प्रकाशन, इलाहाबाद, 2001, पृ- 47

7- पुष्पपाल सिंह, समकालीन कहानी: नया परिप्रेक्ष्य, सामयिक बुक्स, नई दिल्ली, 2011, पृ- 83

8- वही, पृ- 80

9- वही, पृ- 81

10- वही, पृ- 83

11- वही, पृ- 84

12- परमानंद श्रीवास्तव, हिन्दी कहानी की रचना प्रक्रिया, ग्रंथम्, कानपुर, 1965, पृ- 207

13- डॉ- रामचन्द्र तिवारी, हिन्दी का गद्य साहित्य, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, 2009, पृ- 294

14- प्रेमचन्द, मानसरोवर भाग -1 प्राकथन, पृ- 6

15- गोपाल राय, हिन्दी कहानी का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2011, पृ- 60

16- वही, पृ- 69

17- वही, पृ- 71

18- शिवदान सिंह चौहान, हिन्दी साहित्य के अस्सी वर्ष, स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली, 2007, पृ- 154

19- रामविलास शर्मा, प्रेमचन्द और उनका युग, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1989, पृ- 118

20- शिवदान सिंह चौहान, हिन्दी साहित्य के अस्सी वर्ष, स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली, 2007, पृ- 158

21- वही, पृ- 159

22- वही, पृ- 160

23- डॉ- सुभाष चन्द्र दलित मुक्ति आंदोलनःसीमाएं और संभावनाएं, आधार प्रकाशन, पंचकूला, 2010, पृ- 30

24- प्रेमचन्द की संपूर्ण कहानियां, (खंड-1), लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ- 342

25- वही, पृ- 347

26- वही, पृ- 343

27- रामविलास शर्मा, प्रेमचन्द और उनका युग, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1989, पृ- 114

28- गोपाल राय, हिन्दी कहानी का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2011, पृ- 74

29- वही, पृ- 76

30- वही, पृ- 77

31- रामविलास शर्मा, प्रेमचन्द और उनका युग, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1989, पृ- 115

32- गोपाल राय, हिन्दी कहानी का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2011, पृ- 85

33- वही, पृ- 89

34- वही, पृ- 135

35- वही, पृ- 137

36- वही, पृ- 141

37- वही, पृ- 152

38- वही, पृ- 155

39- वही, पृ- 156

40- वही, पृ- 167

41- वही, पृ- 168

42- वही, पृ- 169

43- वही, पृ- 170

44- वही, पृ- 175

45- वही, पृ- 181

46- वही, पृ- 31

47- डॉॅ- नंद कि}ाोर नीलम, सौन्दर्य}ाास्त्र के बदलते प्रतिमान और समकालीन कहानी का चरित्र, दस्तक, बारह, पृ- 95

48- प्रेमचन्द, साहित्य का उद्देश्य, हंस प्रकाशन, इलाहाबाद, 2001, पृ- 20

49- डॉॅ- नंद कि}ाोर नीलम, सौन्दर्य}ाास्त्र के बदलते प्रतिमान और समकालीन कहानी का चरित्र, दस्तक, बारह, पृ- 96-97

50- वही, पृ- 98

51- वही, पृ- 100

52- डॉ- राजेन्द्र मिश्र, कहानी आंदोलन और प्रवृत्तियां, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली, 2009, पृ- 11

53- कमलेश्वर, नई कहानी की भूमिका, अक्षर प्रकाशन, दिल्ली 1969, पृ- 32

54- राजेन्द्र यादव, कहानी स्वरूप और संवेदना, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, पृ- 79

55- महोन राकेश, नया बादल, भारतीय ज्ञानपीठ, काशी, 1957, पृ- 7

56- पुष्पपाल सिंह, समकालीन कहानी: नया परिप्रेक्ष्य, सामयिक बुक्स, नई दिल्ली, 2011, पृ- 89

57- डॉ- रामचन्द्र तिवारी, हिन्दी का गद्य साहित्य, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, 2009, पृ- 302

58- डॉ- राजेन्द्र मिश्र, कहानी आंदोलन और प्रवृत्तियां, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली, 2009, पृ- 14

59- पुष्पपाल सिंह, समकालीन कहानी: नया परिप्रेक्ष्य, सामयिक बुक्स, नई दिल्ली, 2011, पृ- 117

60- कमलेश्वर, नई कहानी की भूमिका, अक्षर प्रकाशन, दिल्ली, 1969, पृ 70

61- वही, पृ- 143

62- वही, पृ- 171

63- कमलेश्वर, मांस का दरिया, आत्मकत्य, पृ- 7

64- नामवर सिंह, कहानी नयी कहानी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2002, पृ- 19

65- वही, पृ- 20

66- वही, पृ- 21

67- वही, पृ- 23

68- वही, पृ- 24

69- वही, पृ- 27

70- वही, पृ- 32

71- वही, पृ- 34

72- वही, पृ- 35

73- वही, पृ- 36

74- डॉ- राजेन्द्र मिश्र, कहानी आंदोलन और प्रवृत्तियां, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली, 2009, पृ- 35

75- डॉ राजेन्द्र कुमार साव, समकालीन हिन्दी कहानी में सांप्रदायिकता के प्रतिरोधी स्वर, कथाक्रम, जुलाई सितम्बर 2013, पृ- 62

76- वही, पृ- 65-66

77- एन- सिंह, दूसरी दुनिया का यथार्थ, सं- रमणिका गुप्ता, नवलेखन प्रकाशन, हजारीबाग, 1997 पृ- 15

 

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संस्कार और परिवार फिर तकरार

[संस्कार और परिवार फिर तकरार (एक कथा) लेखक:- अरशद मिर्ज़ा]

संस्कार और परिवार फिर तकरार
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था क्या करूं क्या नहीं ,एक तरफ मेरी प्यारी बीवी और दूसरी तरफ वो जिससे मुझे प्यार हुआ था मै आफिस के काम से बाहर एक शापिंग माल के पास में एक मीटिंग में गया था मीटिंग के बाद मुझे सीधे घर जाना था मीटिंग ख़तम करके मैने सोचा माल में से कुछ शॉपिंग कर लेता हूं मेरी बीवी का बर्थडे ह मै एक लेडीज़ शॉप पर उसके लिए गिफ्ट और ड्रेस देख रहा था तभी मेरी नजर दूसरी शॉप पर पड़ी मैने महसूस किया मुझे कोई लड़की बहुत देर से देख रही है तभी मैने नजर उठाई तो देखा वो तो मेरी प्रेमिका कहूं या बेस्ट फ्रैंड है, उसने मुझे अपने पास आने का इशारा किया मैं उससे मिला तो बाते हुई ओर फिर हम काफी शॉप में गए एक साथ बैठकर प्यार भरी बातें हो रही थी हम बहुत एन्जॉय कर रहे थे हमने एक साथ शॉपिंग भी की और मैने उसके लिए भी गिफ्ट खरीदे और एक साथ फिल्म भी देखी, पूरे दिन हम एक दूसरे के हाथ में हाथ बगल में डालकर एन्जॉय कर रहे थे आपको बता दू मेरी इस प्रेमिका से मेरी मुलाक़ात मेरी शादी होने के तकरीबन 2 साल बाद मेरे आफिस में हुई थी तभी से हम दोनों एक दूसरे में घुल मिल गए थे पूरे दिन एन्जॉय करने के बाद रात के तकरीबन 8 चुके थे हम गले मिलकर बस निकाल ही रहे थे तभी अचानक से मेरी बीवी का भाई मेरे सामने आ गया और वो हमें आज शुरू से ही नोटिस कर रहा था मेरी प्रेमिका और वो मेरे साथ ही खड़ी थी और हम दोनों के हाथ एक दूसरे के हाथ में थे समझ नहीं आ रहा था मै क्या करू खैर वहीं हुआ जिसका डर था मेरी बीवी के भाई की आगे तकरीबन २२ साल थी फिर उसने पूछ ही लिया जीजा जी आप यहां क्या कर रहे हो , मै हिचकिचाते हुए बोला की कुछ नहीं में तो बस ऐसे ही आया था यहां पर ये मिल गई बीवी के भाई ने मुस्कुराते हुए कहा जीजा जी कोई बात नहीं में आपसे नाराज़ नहीं हूं आप टेंशन ना ले में दीदी को कुछ नहीं बताऊंगा उसकी इतनी बात सुनकर मैं पानी पानी हो गया मै उससे बड़ा होने के बावजूद आज अपने आपको उसके सामने खड़ा नहीं कर पा रहा था ,फिर उसने मुझे हिम्मत देकर उसने मुझे संभाला और बोला जीजा जी मेरी दीदी ने आज तक कभी किसी की तरफ आंख उठाकर भी नहीं देखा है में उसका भाई हूं और मुझे ये भी उम्मीद है आपने भी अभी तक दीदी को देख व समझ ही लिया होगा वो कैसी हैं एक बात याद रखना हमारे पास बस यही संस्कार है जो हमारे मा बाप ने हमें दिए है लेकिन आपसे एक गुज़ारिश है मेरी दीदी आप पर इतना भरोसा करती है अगर मै भी दीदी को आपके बारे में बोलूंगा तो वो यकीन नहीं करेंगी। लेकिन आपसे गुज़ारिश है अगर आप सच में एक दूसरे से प्यार करते हो तो शादी कर लीजिए और मेरी दीदी के सामने जाकर सबकुछ सच बता दीजिए अगर आप ऐसा कर सकते हो तो ठीक है नहीं तो आपसे में हाथ जोड़कर विनती करता हूं आप मेरी दीदी को धोखा ना दे जो भी फैसला करना है वो अभी कर लीजिए इसके बाद मैने अपनी प्रेमिका को देखा तो उसका हाथ अभी तक मेरे हाथ में ही था तब मेरी ये समझ में आया जब इतनी बात होने पर मुझे इतनी शर्मिंदगी हो रही है तो मेरी लवर भी अगर मुझसे सच्चा प्यार करती तो शायद उसको मुझे समझना चाहिए था और मेरी बीवी के भाई से माफी मांगकर कहती आज के बाद ये मेरे साथ नहीं रहेंगे जब आपकी आंखों में अपने जीजा जी के लिए इतना प्यार है तो आपकी दीदी सच में इनसे कितना प्यार करती होंगी तब जाकर मुझे समझ आया सच्चा प्यार दिखावे से नहीं दिल से किया जाता है ,उसके बाद मैने अपनी प्रेमिका को हमेशा के लिए भूल जाने के लिए बोला और अपनी बीवी के भाई से माफी मांगी और उसको शुक्रिया भी कहा के मुझे सही राह दिखाने के लिए दिल से धन्यवाद अब कभी भी मै अपनी बीवी और परिवार में किसी का भी दिल दुखाने वाला काम नहीं करूंगा। देखा जाए तो संस्कार भी बहुत बड़ी चीज होती है ,इसलिए कहते है अपने संस्कार कभी भूलने नहीं चाहिए आज हमारा परिवार बहुत खुशहाल है और ये सब खुशहाली सिर्फ मेरी बीवी के अच्छे संस्कार की देन है संस्कार से इंसान की पहचान होती है, संस्कार है तो सबकुछ है। मै सब पुरानी बाते वक़्त के साथ भूल चुका था लेकिन तक़रीबन 5 साल बाद अचानक से मेरी वहीं प्रेमिका एक शादी में दिखी और देखते ही हम दोनों की आंखे टकराई और पुराने वो सब दिन पल भर में सामने आ गए। फिर उसने थोड़ी हिम्मत दिखाई खुश मैने फिर हम दोनों की हाए हेल्लो हुई तभी मेरी पत्नी सामने आ गई और उसके कुछ सेकंड बाद ही मेरी पत्नी का वही भाई भी आकर साथ ने खड़ा हो गया मेरी कुछ समझ नहीं आ रहा था सब एक दूसरे के चेहरे को देख रहे थे मुझे आज सच में बहुत घबराहट हो रही थी जाने आज क्या होगा दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था क्या मेरी बीवी मुख्य छोड़ कर चली जाएगी या मेरी प्रेमिका मेरी ज़िंदगी में आ जाएगी…आगे क्या हुआ मिलते है थोड़े इंतज़ार के बाद आगे बहुत कुछ हुआ मेरी ज़िन्दगी में आपको सब बताऊंगा बस थोड़ा इंतजार करिए क्योंकि अब तकरार की बारी है। ……

जबसे से तुमने मुझे अपने दिल में बसा लिया था
मैने भी तुम्हारे नाम ज़िन्दगी लिखने का इरादा बना लिया था

जब तुमने मुझे पसंद करके दिल में बसा लिया था
मैने भी तुम्हे हमेशा खुश रखने का इरादा बना लिया था

तुम्हे जो पा लिया है मुझे गुरूर सा अब हो गया है
लाखों को छोड़कर तुमने जबसे मुझे कबूल किया है

तुम्हारी चाहत में इतना तो कर ही सकता हूं मैं
तुम्हे पाकर थोड़ा सा गुरूर तो कर ही सकता हूं मैं.!
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मेरे प्यारे दोस्तो इस कहानी के 2 पार्ट संस्कार और परिवार मैने आपको बता दिए है अब तकरार की बारी आने वाली है तकरार वाला पार्ट बहुत रोमांचक होने वाला है दोनों पिछले पार्ट से भी ज्यादा आपको पसंद आएगा,और ध्यान रहे ये सिर्फ एक काल्पनिक कथा है इसमें जो भी लिखा है वो किसी वस्तु या किसी के जीवन आदि से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है अगर इसे पढ़ने के बाद किसी का दिल दुखे या किसी को कोई परेशानी हुई हो तो उसके लिए तहे दिल से माफी चाहता हूं।
धन्यवाद.
#अरशद मिर्ज़ा।
❤️❤️🌹🌹🌹😘😘🌹🌹🌹❤️❤️
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संस्कार और परिवार फिर तकरार* *(एक कथा) लेखक:- अरशद मिर्ज़ा*

संस्कार और परिवार फिर तकरार (एक कथा) लेखक:- अरशद मिर्ज़ा

संस्कार और परिवार फिर तकरार

मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था क्या करूं क्या नहीं ,एक तरफ मेरी प्यारी बीवी और दूसरी तरफ वो जिससे मुझे प्यार हुआ था मै आफिस के काम से बाहर एक शापिंग माल के पास में एक मीटिंग में गया था मीटिंग के बाद मुझे सीधे घर जाना था मीटिंग ख़तम करके मैने सोचा माल में से कुछ शॉपिंग कर लेता हूं मेरी बीवी का बर्थडे ह मै एक लेडीज़ शॉप पर उसके लिए गिफ्ट और ड्रेस देख रहा था तभी मेरी नजर दूसरी शॉप पर पड़ी मैने महसूस किया मुझे कोई लड़की बहुत देर से देख रही है तभी मैने नजर उठाई तो देखा वो तो मेरी प्रेमिका कहूं या बेस्ट फ्रैंड है, उसने मुझे अपने पास आने का इशारा किया मैं उससे मिला तो बाते हुई ओर फिर हम काफी शॉप में गए एक साथ बैठकर प्यार भरी बातें हो रही थी हम बहुत एन्जॉय कर रहे थे हमने एक साथ शॉपिंग भी की और मैने उसके लिए भी गिफ्ट खरीदे और एक साथ फिल्म भी देखी, पूरे दिन हम एक दूसरे के हाथ में हाथ बगल में डालकर एन्जॉय कर रहे थे आपको बता दू मेरी इस प्रेमिका से मेरी मुलाक़ात मेरी शादी होने के तकरीबन 2 साल बाद मेरे आफिस में हुई थी तभी से हम दोनों एक दूसरे में घुल मिल गए थे पूरे दिन एन्जॉय करने के बाद रात के तकरीबन 8 चुके थे हम गले मिलकर बस निकाल ही रहे थे तभी अचानक से मेरी बीवी का भाई मेरे सामने आ गया और वो हमें आज शुरू से ही नोटिस कर रहा था मेरी प्रेमिका और वो मेरे साथ ही खड़ी थी और हम दोनों के हाथ एक दूसरे के हाथ में थे समझ नहीं आ रहा था मै क्या करू खैर वहीं हुआ जिसका डर था मेरी बीवी के भाई की आगे तकरीबन २२ साल थी फिर उसने पूछ ही लिया जीजा जी आप यहां क्या कर रहे हो , मै हिचकिचाते हुए बोला की कुछ नहीं में तो बस ऐसे ही आया था यहां पर ये मिल गई बीवी के भाई ने मुस्कुराते हुए कहा जीजा जी कोई बात नहीं में आपसे नाराज़ नहीं हूं आप टेंशन ना ले में दीदी को कुछ नहीं बताऊंगा उसकी इतनी बात सुनकर मैं पानी पानी हो गया मै उससे बड़ा होने के बावजूद आज अपने आपको उसके सामने खड़ा नहीं कर पा रहा था ,फिर उसने मुझे हिम्मत देकर उसने मुझे संभाला और बोला जीजा जी मेरी दीदी ने आज तक कभी किसी की तरफ आंख उठाकर भी नहीं देखा है में उसका भाई हूं और मुझे ये भी उम्मीद है आपने भी अभी तक दीदी को देख व समझ ही लिया होगा वो कैसी हैं एक बात याद रखना हमारे पास बस यही संस्कार है जो हमारे मा बाप ने हमें दिए है लेकिन आपसे एक गुज़ारिश है मेरी दीदी आप पर इतना भरोसा करती है अगर मै भी दीदी को आपके बारे में बोलूंगा तो वो यकीन नहीं करेंगी। लेकिन आपसे गुज़ारिश है अगर आप सच में एक दूसरे से प्यार करते हो तो शादी कर लीजिए और मेरी दीदी के सामने जाकर सबकुछ सच बता दीजिए अगर आप ऐसा कर सकते हो तो ठीक है नहीं तो आपसे में हाथ जोड़कर विनती करता हूं आप मेरी दीदी को धोखा ना दे जो भी फैसला करना है वो अभी कर लीजिए इसके बाद मैने अपनी प्रेमिका को देखा तो उसका हाथ अभी तक मेरे हाथ में ही था तब मेरी ये समझ में आया जब इतनी बात होने पर मुझे इतनी शर्मिंदगी हो रही है तो मेरी लवर भी अगर मुझसे सच्चा प्यार करती तो शायद उसको मुझे समझना चाहिए था और मेरी बीवी के भाई से माफी मांगकर कहती आज के बाद ये मेरे साथ नहीं रहेंगे जब आपकी आंखों में अपने जीजा जी के लिए इतना प्यार है तो आपकी दीदी सच में इनसे कितना प्यार करती होंगी तब जाकर मुझे समझ आया सच्चा प्यार दिखावे से नहीं दिल से किया जाता है ,उसके बाद मैने अपनी प्रेमिका को हमेशा के लिए भूल जाने के लिए बोला और अपनी बीवी के भाई से माफी मांगी और उसको शुक्रिया भी कहा के मुझे सही राह दिखाने के लिए दिल से धन्यवाद अब कभी भी मै अपनी बीवी और परिवार में किसी का भी दिल दुखाने वाला काम नहीं करूंगा। देखा जाए तो संस्कार भी बहुत बड़ी चीज होती है ,इसलिए कहते है अपने संस्कार कभी भूलने नहीं चाहिए आज हमारा परिवार बहुत खुशहाल है और ये सब खुशहाली सिर्फ मेरी बीवी के अच्छे संस्कार की देन है संस्कार से इंसान की पहचान होती है, संस्कार है तो सबकुछ है। मै सब पुरानी बाते वक़्त के साथ भूल चुका था लेकिन तक़रीबन 5 साल बाद अचानक से मेरी वहीं प्रेमिका एक शादी में दिखी और देखते ही हम दोनों की आंखे टकराई और पुराने वो सब दिन पल भर में सामने आ गए। फिर उसने थोड़ी हिम्मत दिखाई खुश मैने फिर हम दोनों की हाए हेल्लो हुई तभी मेरी पत्नी सामने आ गई और उसके कुछ सेकंड बाद ही मेरी पत्नी का वही भाई भी आकर साथ ने खड़ा हो गया मेरी कुछ समझ नहीं आ रहा था सब एक दूसरे के चेहरे को देख रहे थे मुझे आज सच में बहुत घबराहट हो रही थी जाने आज क्या होगा दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था क्या मेरी बीवी मुख्य छोड़ कर चली जाएगी या मेरी प्रेमिका मेरी ज़िंदगी में आ जाएगी…आगे क्या हुआ मिलते है थोड़े इंतज़ार के बाद आगे बहुत कुछ हुआ मेरी ज़िन्दगी में आपको सब बताऊंगा बस थोड़ा इंतजार करिए क्योंकि अब तकरार की बारी है। ……
धन्यवाद.

जबसे से तुमने मुझे अपने दिल में बसा लिया था
मैने भी तुम्हारे नाम ज़िन्दगी लिखने का इरादा बना लिया था

जब तुमने मुझे पसंद करके दिल में बसा लिया था
मैने भी तुम्हे हमेशा खुश रखने का इरादा बना लिया था

तुम्हे जो पा लिया है मुझे गुरूर सा अब हो गया है
लाखों को छोड़कर तुमने जबसे मुझे कबूल किया है

तुम्हारी चाहत में इतना तो कर ही सकता हूं मैं
तुम्हे पाकर थोड़ा सा गुरूर तो कर ही सकता हूं मैं.!
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मेरे प्यारे दोस्तो इस कहानी के 2 पार्ट संस्कार और परिवार मैने आपको बता दिए है अब तकरार की बारी आने वाली है तकरार वाला पार्ट बहुत रोमांचक होने वाला है दोनों पिछले पार्ट से भी ज्यादा आपको पसंद आएगा,और ध्यान रहे ये सिर्फ एक काल्पनिक कथा है इसमें जो भी लिखा है वो किसी वस्तु या किसी के जीवन आदि से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है अगर इसे पढ़ने के बाद किसी का दिल दुखे या किसी को कोई परेशानी हुई हो तो उसके लिए तहे दिल से माफी चाहता हूं।

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थैंक यू शांता अनामिका अनूप तिवारी

थैंक यू शांता

“शांता..मेमसाहब की तबियत ठीक नही है, चाय के साथ दो बिस्किट दे कर ये दवाई दे देना,मैं ऑफिस जा रहा हूं” गौरव आफिस के लिए निकलतें हुए कहा.
“जी साहब..मैं दे दूंगी, आप फ़िक्र ना करे” शांता ने कहा.
गौरव मेरे पति जिन्हें समाज़ के सामने मेरी फ़िक्र होती हैं वही अकेले में मुझसे बेइंतहा नफ़रत.
तीन साल पहले मैं उन्हें सौंदर्य की देवी लगती थी आज वही रूप उन्हें विकृत लगता है..विवाह के कुछ समय पश्चात तक सब कुछ बहुत सुंदर था ना जाने ज़िन्दगी कब इतनी घृणित हो गयी, उसकी दी हुई शारीरिक पीड़ा की तहम्मुल उठाते उठाते मेरे आँसू सूख गए, चौबीस घंटो में,आठ नौ घंटे मैं डरी सहमी रहती जाने किस बात पर गौरव मुझ पर नाराज़ हो जाए, उसकी एक आवाज़ पर मैं उसके समक्ष खड़ी हो जाती और वो मुझे ऐसी हालात में देख ख़ुश रहता,अपनी मर्दानगी बिस्तर पर जानवर बन कर निकालता…मज़ाल है मैं उफ़्फ़ भी कर लूं, कल रात फिर उसका वहशी रूप दिखा, नशे में नोंचने खसोटने लगा मैंने थोड़ा प्रतिकार क्या किया साइड टेबल पर रखा पीतल का वास मेरे कमर पर दे मारा, मैं दर्द से तड़प उठी, उसको अपने कृत्य का कोई मलाल नही था मेरे दर्द को अनदेखा कर ख़ुद को तृप्त कर कमरे से बाहर निकल गया, मैं निवस्त्र, शून्य, ज़ख्मी, पीड़ित पड़ी थी,उसे मेरी वेदना का अहसास नही था.
“मेमसाहब, चाय पी लो फ़िर ये दवाई खा लेना” शांता चाय, बिस्किट और दवा लेकर खड़ी थी.
“रख दे वही..पी लूंगी” मैंने कहा.
‘मेमसाहब, बुरा ना मानो तो एक बात कहूँ ?
हर सुबह अपने दर्द छिपाती हो.
क्या मैं जानती नही?
सब समझती हूं
क्यों सहती हो ये सब, छोड़ दो साहब को’ शांता को आज पहली बार क्रोध में देखा, वो कभी इधर उधर की बातें नही करती, आती है और अपना निर्धारित कार्य कर के चली जाती है, उसका ये रूप मुझे अचंभित कर रहा था.
“मेमसाहब, अगर तुम्हें लगता है साहब आज नही तो कल बदल जाएगे तो ऐसा कभी नही होगा..वो ऐसे ही रहेंगे बस तुम्हें इसकी आदत हो जाएगी, अब तो गली मुहल्ले वाले भी ये किस्सा जानने लगे है” शांता के सहारे मैं कपड़े बदलने लगी और वो आज अपने दिल का ग़ुबार निकाल रही थी.
“पड़ोसियों के लिए मैं दया के पात्र हो गयी हूं..है ना?” मेरी नज़र उसके चेहरे पर टिक गयी.
“नही मेमसाहब, दया नही आप सब के लिए मज़ाक का केंद्र है, सब हँसते है..कहते है कोई कुछ क्या बोले जब वो ख़ुद मौन रहकर तीन साल से मार खा रही है, गालियां सुन रही है’ शांता ने कहा.
“शांता, अपने माता पिता की असहमति को अनदेखा कर गौरव से मैंने प्रेम विवाह किया था जिस कारण मायके वालों ने मुझसे रिश्ता तोड़ लिया, मैं प्रेम में पागल थी, झूठ को सच समझ अपनो से बैर कर लिया, यहाँ से गयी तो कहाँ जाऊंगी, अब तो जैसे भी हो निभाना तो पड़ेगा आखिरकार ये ज़िन्दगी, ये साथी मैंने ख़ुद चुनी है”मैंने गहरी सांस ली.
“एक बार बात करो, माँ बाप नाराज़ हो सकते है अपनी औलाद से मुँह नही फेर सकते, ये लो मेरा फ़ोन, कोई नही है यहाँ..बात कर लो” शांता ने अपना फ़ोन मेरे हाथों में थमाया.
मैंने कांपते हाथों से नंबर डायल किया..मन में डर था, कही नंबर बदल न गया हो..तीन साल..एक लंबा अरसा हो गया.
“हेलो..कौन बोल रहा है” उधर से आवाज़ आई
माँ की आवाज़ है, अचानक हलक सूख गया, मेरी आवाज़ नही निकल रही थी.
“कौन है, किससे बात करनी है..हेलो”
“हेलो, मैं शांता बोल रही हूं” मेरे हाथ से फ़ोन ले कर शांता कमरे से बाहर निकल गई.
मेरा मन व्याकुल हो उठा, वर्षो पश्चात आज माँ की आवाज़ सुन पीड़ामुक्त हो गयी थी, दर्द छूमंतर हो गया था.
“मेमसाहब, उठने की कोशिश करो..आप के माता पिता ने आपको वापस घर आने को कहा है वो लोग आठ बज़े की ट्रेन का टिकट करा कर मेरे फोन पर भेजेंगे तो ये फ़ोन रख लो और ये कुछ पैसे” शांता के आँखों में आंसू थे जिन्हें वो छुपाने की भरसक कोशिश कर रही थी.
“शांता, तुम्हारा ये अहसान मैं कैसे उतारूंगी” मैंने उसके हाथों को कस कर थाम लिया.
“कोई अहसान नही है,नई ज़िन्दगी शुरू करो, डरने वालो को लोग और डराते है, निर्भीक हो कर अपने बिखरे आत्मविश्वास को समेट कर आगे बढ़ो” आज शांता एक कामवाली नही देवी स्वरूपा लग रही थी.
शाम के छह बज़ गए, गौरव ऑफिस से आ गए थे,
“गौरव, मैं जा रही हूं..इस घर में तुम्हारे साथ सपने संजोए आयी थी आज ज़ख्म लिए जा रही हूं…सोचा था..तुम्हारे घर आने से पहले निकल जाऊंगी लेकिन मैं अपनी ज़िन्दगी का सबसे सही फैसला छुप कर नही लेना चाहती थी, मैंने तो तुमसे सच्चा प्रेम किया था तुमने बदले में नफ़रत दे दिया..ज़ख्म नासूर ना बन जाए इससे पहले मुझे फ़ैसला लेना था, एक ही विनती है तुमसे, फ़िर किसी लड़की की ज़िंदगी तबाह मत करना, याद रखना..अपने बुरे कृत्यों परछाई सदैव साथ रहती है…जो भुलाये नहीं भूलती एक ना एक दिन तुम्हें अहसास होगा…आज मैं ये फ़ैसला नही लेती तो मेरे साथ रह जाता…एक पछतावा..दुख,कायरता, निर्बलता का.
मुझे ज़िन्दगी गुज़ारनी है लेकिन अब अपने शर्तो पर,अपनी ख्वाहिशों के लिए, खुशियों के लिए”
गौरव सोफ़े पर जड़ बैठे थे, अचंभित..मौन
मुझे एकटक देख रहे थे.
लड़खड़ाती कदमों से गर्वित क़दम लिए मैं बाहर निकल गयी..
मैं पुरसुकून थी..
सिर से बोझ उतर गया हो जैसे.
बरसों बाद आज सार्थकता मिली है
मेरी ज़िन्दगी को,मेरे सपनों को.
दिल और दिमाग़ ने एक साथ कहा
थैंक यू शांता।।

लेखिका
अनामिका अनूप तिवारी
नोएडा
anamika77@gmail.com
Phone. 7985221562

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उम्मीद

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                  उम्मीद

दिन भर का थका हारा सुखिया जैसे ही अपनी झोपड़ी में घुस ही रहा था कि पीछे से आवाज़ आयी
“सुखिया, अभी हवेली चल,मुखिया जी के बेटे का जन्मदिन है शहर से बड़े बड़े लोग आ रहे है, बहुत काम है, बाबू ने गांव के सभी मज़दूरों को बुलाया है”
मुखिया के सलाहकार कह लो या उसके कुकर्मो का साथी बाबू का चमचा बसंत खीसे निपोरता हुआ सामने खड़ा था.
“भाई, देख तो रहे हो अभी गारे मिट्टी का काम से आ रहा हूं, कुछ खा पी लूं तो आता हूं”
“अच्छा अच्छा ठीक है, लेकिन देरी मत करना बाबू ने कहा है जल्दी आओ” बसंत कहते हुए निकल गया.
सुखिया की पत्नी धर्मी पानी लेकर सुखिया के मुँह हाथ धुलवाने लगी.
“मना क्यों नही कर देते हवेली वालो को, क्यों जाते हो वहाँ, कुछ मिलता तो है नही”
“बावली जैसी बात मत कर, पानी मे रहकर मगरमच्छ से बैर नही कर सकते और हम पानी मे रहने वाले वो छोटी मछलियां जिनके नसीब में चारा नही सिर्फ पानी की चंद घुट है”
“तो क्या अपनी मेहनत की कमाई भी नही मांग सकते हैं, तुम कुछ बोलते नही इसी का फायदा उठाते है ये लोग” आज धर्मी का गुस्सा सातवें आसमान पर था.
“बोल के क्या कर लेंगे जरा वो भी बता दे, कन्हैया की हालत देख कर भी जब तू बोल रही है तो तू सच्ची में बावली हो गयी है” पिछले बरस सुखिया ने अपने बचपन के दोस्त कन्हैया और उसके पूरे परिवार को खो दिया था, गांव में एक अकेला वही था जिसने मुखिया के जुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई और बदले में उसकी पत्नी जो कुछ ही दिन पहले ब्याह कर आई थी उसे उठा ले गए, माता पिता को इतना मारा की कुछ दिनों में वो दोनों चल बसे, कन्हैया ने माता पिता की हत्या और पत्नी की आत्महत्या कर लेने के बाद विछिप्त अवस्था मे दूर एक गाँव के कुएं में छलांग लगाकर जान दे दिया.
“पिता जी कहते थे हम मज़दूर जन्म लिए और मज़दूर ही मरेंगे, मज़दूर जब काम पर निकलता है तो ये सोच कर निकलता है ईश्वर की कृपा रही तो शाम को सही सलामत घर आ जाएंगे”
सुखिया रोटी खाते हुए पत्नी को समझाया.
“बात तुम्हारी सही है लेकिन सच तो ये भी है गांव का मुखिया पूरे गाँव का माई बाप होता है, तुम देखो इस वसंत का पक्का घर बन गया उसकी घर वाली के नख़रे ही नही खत्म होते, हमारे सामने ऐसे इठला कर चलती जैसे कोई सेठाइन हो” धर्मी ने मुँह बनाते हुए कहा.
“अच्छा तो तू इस लिए परेशान है,ऐसा बोल तुझे बसंत की लुगाई से जलन हो रही है” तनाव भरे माहौल को कम करने के लिये हंसते हुए सुखिया बोला.
“मैं क्यों जलने लगी, जलती नही हूं पर गुस्सा बहुत आता है अगर घर उसकी कमाई से बनता तो कोई बात नही लेकिन उसका घर सरकारी पैसो से बना है जो पूरे गांव वालों के लिए आता है पर मिलता हैं बाबू और मुखिया के चमचो को” धर्मी की ये बात सौ टके सच थी, पर मुखिया के सामने ये बोलने का हक़ किसी को नही था.
“देख.. अपना जी जलाने से कोई फ़ायदा नही है, मजदूर और मज़बूरी एक ही शब्द है, सिर्फ गांव नही हर जगह पैसे हमारे ही काटे जाते है, शहर में ठेकेदार कम पैसो में हमसे काम लेना चाहता है, कितना भी काम करो रोज की मज़दूरी में कुछ पैसे काट कर ही मिलते है, हमारी ये स्थिति सदियों पहले से चली आ रही है ना कल कुछ बदला था ना आज कुछ बदला है, हम सुबह से लेकर रात तक इनकी गालियां और मार खाते है लेकिन हमारी सुनवाई कही नही, ना गांव का मुखिया ना ठेकेदार ना प्रशासन ना सरकार, बस बिना कोई आवाज़ निकाले काम करते रहो, आवाज़ निकाले तो क्या होगा ये तू भी जानती है, जो चूल्हा जल रहा है उसके भी लाले पड़ जायेंगे,मैं काम करूंगा और अपने दोनों बच्चों को पढ़ाऊंगा” सुखिया लंबी सांस भरते हुए कहा.
“सपने देखने की मनाही नही है सपने देखो, हो सकता है मुखिया जैसे लोगो के भगवान की नज़र हम जैसो पर भी पड़ जाए” धर्मी का मानना था भगवान अमीरो के होते है हम जैसो के लिए नही इसलिए वो भगवान को मुखिया के भगवान कहती है.
“चिंता मत कर..अब इस घर मे कोई और सुखीराम सुखिया नही बनेगा” सुखिया कंधे पर गमछा डाल कर अपने सपनों को पूरा करने के पक्के इरादे ले कर मुखिया की हवेली की तरफ़ चल दिया.

लेखिका
अनामिका अनूप तिवारी
anamika77@gmail.com
नोएडा

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