भारतीय भाषाओं का हिंदी में अनुवाद : स्वप्न और संकट  (गुजराती के संदर्भ में)- डॉ. नयना डेलीवाला

अनुवाद रचना का पुनर्जीवन है। साहित्य और कला में जीवन के यथार्थ अनुभवों का लेखा-जोखा अभिव्यक्ति पाता है। यूं देखा जाय तो हमारा जीवन राजनीति एवं विचारधाराओं के तहत ही जिया जा रहा है। हमारे आस-पास जो गूंथा-बुना जा रहा है उस प्रभाव से हम अछूते नहीं रह पाते। कला में जो अभिव्यक्त होता है, अनुवाद के द्वारा उसी संवेदना को अन्यान्य तक संप्रेषित किया जा सकता है। भाषा  विचारों की संवाहिका है तो अनुवाद विविध भाषाओं एवं विविध संस्कृतियों से साक्षात्कार करानेवाला साधन। अनुवाद अपने भगीरथ प्रयास से दो विभिन्न एवं अपरिचित संस्कृतियों,परिवेशों एवं भाषाओं की सौंदर्य चेतना को अभिन्न और परिचित बना देता है। पॉल एंजिल का यह कथन पूर्णतया सही है कि— “ इक्कीसवीं सदी में प्रत्येक देश में दो साहित्य उपलब्ध हो सकेंगे। पहला, उसके अपने लेखकों का रचा गया साहित्य और दूसरा विश्व भाषाओं से अनूदित साहित्य। “

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गुजराती कहानी-भैयादादा (लेखक: स्वर्गीय धूमकेतु)-अनुवादक: डॉ.रजनीकांत एस.शाह

गुजराती कहानी-भैयादादा (लेखक: स्वर्गीय धूमकेतु)-अनुवादक: डॉ.रजनीकांत एस.शाह

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तेलुगु लघुकथा ‘हस्ताक्षर (दस्तकत)’-जाजुला गौरी

तेलुगु लघुकथा ‘हस्ताक्षर’ हस्ताक्षर  (दस्तकत) लेखिका- जाजुला गौरी  अनुवादक- के. कांचन           सुबह के समय नौ बजे, लोतुकुंटा प्राथमिक पाठशाला …

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ओड़िया कहानी-बिना मिट्टी के पृथ्वी: भूपेन महापात्र (अनुवादक- स्मृतिरेखा नायक)

सूखी खुद एक किलोमीटर दूर नदी से पानी लाती है। अस्पताल भी आठ किलोमीटर दूरी पर है और उसी आठ किलोमीटर दूर में लगी बाजार को शाल पत्र, दातुन, जंगली चीजें आदि बैचने के लिए जाती है। इसलिए उसके लिए दो किलोमीटर की दूरी कुछ भी नहीं है। असल बात तो यह है कि वह रास्ता सही नहीं है। रास्ता जंगल से होते हुए बाजार तक जा पहुँचती है। इतना घना जंगल है कि उसमें भेड़ से लेकर शेर तक सभी की संख्या बहुत अधिक है। कभी-कभी तो हाथियों की झुंड अचानक से रास्ते पर आ पहुँचती है। वह चईना को एक-दो बार बताई है कि —“चलो हम शहर को चले जाते हैं। यहाँ तो जंगल से कुछ खास जंगली चीजें नहीं मिल रही है।

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दयानंद कनकदंडे जी की अनुदित कविताएँ-अनुवाद :प्रेरणा उबाळे

मराठी के लेखक, समीक्षक, कवि एवं “सगुणा” पत्रिका के संपादक दयानंद कनकदंडे जी एक जीवनदानी सामाजिक कार्यकर्ता हैं l सामाजिक तथा अन्य विषयों पर उनका लेखन और अनुवाद अनेक मराठी पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ है l

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पुल पर बैठा बूढ़ा: मूल कथा : अर्नेस्ट हेमिंग्वे- अनुवाद : सुशांत सुप्रिय

अब उसके लिए कुछ भी नहीं किया जा सकता था । वह ईस्टर के रविवार का दिन था और फ़ासिस्ट फ़ौजें एब्रो की ओर बढ़ रही थीं । वह बादलों से घिरा सलेटी दिन था । बादल बहुत नीचे तक छाए हुए थे जिसकी वजह से शत्रु के विमान उड़ान नहीं भर रहे थे । यह बात और यह तथ्य कि बिल्लियाँ अपनी देख-भाल खुद कर सकती थीं — उस बूढ़े के पास अच्छी किस्मत के नाम पर केवल यही चीज़ें मौजूद

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हिंदी में स्त्री विमर्श और अनूदित उपन्यास-आकांक्षा मोहन

विमर्श व स्त्री-विमर्श की अवधारणा को समझते हुए प्रस्तुत शोध आलेख हिंदी में स्त्री-विमर्श के स्वरूप को उद्घाटित करता है तथा हिंदी में स्त्री विमर्श के विकास में अनुवाद की भूमिका को विश्लेषित करता है। हिंदी के मूल रचनाकार जैसे नासिरा शर्मा, कृष्‍णा सोबती, चित्रा मुद्गल, मैत्रेयी पुष्‍पा, मृदुला गर्ग, अनामिका, सूर्यबाला आदि की रचनाओं से हिंदी में स्त्री-विमर्श का स्वरूप स्पष्ट होता है। ये रचनाकार स्त्री को पाठ रूप में स्वीकार कर स्त्री जाति का मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, आर्थिक, एतिहासिक रूप में विश्लेषण कर स्त्री-विमर्श की विभिन्न समस्याओं पर बात कर रही है, परंतु साथ ही साथ हिंदी में इस विमर्श तथा विचारधारा को स्वरूप प्रदान करने में हिंदीतर भाषाओं से हिंदी में स्त्री पाठ विषयक अनुवादों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। भारतीय भाषाओं से हिंदी में अनूदित उपन्यासों की चर्चा प्रस्तुत शोध आलेख में की गई है, जो हिंदी साहित्य में मूलतः नहीं है, परंतु अनुवाद के माध्यम से इन उपन्यासों में उठाई गयी समस्या हिंदी के स्त्री-विमर्श को न केवल विकसित करती है, अपितु सुदृढ़ भी करती है।

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भूमंडलीकरण के परिप्रेक्ष्य में हिंदी भाषा और अनुवाद- डॉ. अनवर अहमद सिद्दीक़ी

वर्तमान दौर में अनुवाद विधा सृजनात्मक साहित्य के क्षेत्र के साथ-साथ ज्ञान-साहित्य के क्षेत्र में भी प्रमुख उपकरण के रूप में स्थापित हो गई है. आज ज्ञान-विज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र में अनुवाद की उपयोगिता और महत्ता बढ़ती जा रही है. विभिन्न ज्ञानानुशासनों के भीतर अनुवाद ने अपनी उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज की है. विभिन्न विश्वविद्यालयों में अंतरानुशासनिक अध्ययन के माध्यम से अध्ययन, अध्यापन और नित नए-नए विषयों पर शोध हो रहे हैं. ऐसी स्थिति में आज अनुवाद अंतरानुशासनिक अध्ययन के अंतर्गत विभिन्न विषयों को आपस में जोड़ने के लिए एक मुख्य सेतु की भूमिका को अदा कर रहा है.

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भूमंडलीकरण के परिप्रेक्ष्य में हिंदी भाषा और अनुवाद: डॉ. अनवर अहमद सिद्दीक़ी

भूमंडलीकरण के परिप्रेक्ष्य में आज अनुवाद केवल एकल इकाई के रूप में सीमित न होकर एक विस्तृत पटल के रूप में स्थापित हो गया है. अनुवाद के इतिहास पर यदि दृष्टिपात किया जाए तो ज्ञात होगा कि प्रारंभिक दौर में भी भारतीय परिप्रेक्ष्य में अनुवाद की स्थिति को काफ़ी संतोषजनक न रही. लेकिन मुगलकालीन दौर में दाराशिकोह के द्वारा 52 उपनिषदों का अनुवाद “सीर-ए” अकबर में किए जाने का उल्लेख देखने को मिलता है.

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राष्ट्रीय अनुवाद पुरस्कार से सम्मानित डोगरी साहित्यकार यशपाल निर्मल से बंदना ठाकुर की बातचीत (साक्षात्कार)

यशपाल निर्मल डोगरी एवं हिंदी भाषा के युवा लघुकथाकार, कथाकार, कवि, आलोचक,लेखक, अनुवादक, भाषाविद् एवं सांस्कृतिककर्मी  यशपाल निर्मल का जन्म …

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