एक लघुकथा……”हिन्दी”
एक विश्विद्यालय में पी.एच.डी. के छात्रों का एक सेमिनार था। विषय था- “हिन्दी में कहानी लिखने की कला”। देश के अलग-अलग राज्यों से पी.एच.डी. के छात्र कहानी लिख कर आए थे। विदेश से हिन्दी के एक विख्यात कहानीकार भी पहुंचे थे, सेमिनार में। कहानियां पढ़ी गई, कुछ को सही, कुछ को गलत बताया गया। सभी ने छात्रों को कहानी लिखने की कला पर कुछ- न – कुछ बताया। सेमिनार अपने समापन की ओर ही बढ़ रहा था कि अचानक एक सज्जन प्रोफेसर मंच पर पहुंचे और बोले- “मैं शर्मिन्दा हूं, ऐसे छात्रों को देखकर……”।
पूरे हॉल में सन्नाटा। और कुछ देर बाद चारों तरफ़ से प्रश्नों की बौछार…….”क्यों? क्या हुआ?” बच्चे हैं, सीख जायेंगे, बड़े-बड़े लेखकों ने भी ऐसे ही शुरुआत की होगी। ऐसे तमाम तरह के जवाब उन्हें दिए जाने लगे, बिना यह जाने कि वे क्यों शर्मिन्दा हैं?
…….. वे शर्मिन्दा थे यह देखकर कि पी.एच.डी. के छात्र हिन्दी भी सही से नहीं लिख पा रहे थे और भाषा के सही प्रयोग का तो खैर कहीं अता- पता ही नही था। वे शर्मिन्दा थे, यह जानकर कि- राष्ट्रभाषा “हिन्दी”वाला देश, हिन्दी भाषा में अपनी पूरी शिक्षा ग्रहण करते हुए पी.एच.डी. तक पहुंचने वाले छात्रों को वर्तनी के विषय में कोई ज्ञान नहीं दे पाया।
इससे पहले कि वे अपनी पूरी बात कह पाते, एक अन्य प्रोफेसर गुस्से से तिलमिलाते हुए बोले- “अरे! जानता हूं कि आप फलां विश्विद्यालय से आए हैं और यह भी जानता हूं कि आपके विश्विद्यालय के छात्र कितनी हिन्दी जानते हैं। अमुक राज्य में पढने के कारण इन बेचारों की हिन्दी अच्छी नहीं है तो आप इनका मनोबल तोड़ रहे हैं”।
………. इसके बाद वे सज्जन प्रोफेसर सदमे में थे कि जब ये बेचारे छात्र हिन्दी के प्रोफेसर बनेंगे तब हिन्दी का क्या हाल होगा!!

Sending
User Review
( votes)
यह भी पढ़ें -  निमंत्रण: लालित्य ललित जी के तीन कविता संग्रह का लोकार्पण

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.