हिंदी सिनेमा में जातिः एक अनछुआ पहलू

भारत एक बहुसंस्कृति वाला देश है, इसकी यह विशेषता इसके गौरव का एक महत्त्वपूर्ण पहलू है। लेकिन इसके साथ ही यह बहुत अफसोस की बात है कि भारत एक जाति आधारित समाज है। जातियों के आधार पर यह पदानुक्रम में बंटा हुआ है। जाति प्रथा भारतीय समाज की सबसे बड़ी बुराइयों में से एक है। भारतीय समाज की यह जाति व्यवस्था हजारों वर्ष पुरानी है और यह गंभीर सामाजिक भेदभाव और शोषण का सबसे अच्छा उदाहरण है। जाति का विचार देखने में बहुत स्पष्ट प्रतीत होता है लेकिन यह बहुत से प्रश्न खड़े करता है जिनके जवाब इतने आसान और सरल नहीं हैं।

अतः प्रस्तुत लेख हिंदी सिनेमा में जाति से संबंधित प्रश्नों को ढूँढ़ने का प्रयास करता है। जाति व्यवस्था भारतीय सामाजिक संरचना की बहुत ही महत्त्वपूर्ण विशेषता है। समाज का कोई भी पहलू इसके प्रभाव से अछूता नहीं रहा है। लेकिन क्या जाति के प्रश्न को हिंदी सिनेमा में पर्याप्त स्थान मिला? यही प्रस्तुत लेख का मुख्य प्रश्न है। यहाँ प्राकल्पना के रूप में मेरा मानना यह है कि हिंदी सिनेमा में जाति, एक अनछुआ पहलू है।

मुख्य शब्द – जाति, सिनेमा, पदानुक्रम, भारतीय समाज, शौषण, उच्च और निम्न जातियाँ।

सिद्धांत रूप में जाति व्यवस्था चार-वर्ण, गुण-कार्य के अनुसार है। ब्राह्मण का कार्य ज्ञान-दान, क्षत्रिय का रक्षा, वैश्य का व्यापार और शुद्र का श्रम है। किंतु यथार्थ व्यवस्था इतनी सरल नहीं है। वास्तविक स्थिति बहुत जटिल है। जाति जन्मजात होती है और विवाह संबंध जाति के अंदर ही होता है। इसे अम्बेड़कर ने जाति व्यवस्था का मुख्य लक्षण भी माना है। भारत में ज्यादातर जातियाँ स्थानीय या एक क्षेत्र में सीमित हैं। यद्यपि अनेक जातियाँ दूर-दूर तक भी फैली हैं। इस प्रकार जातियों की संख्या चार नहीं हजारों में है। हर जाति की अपनी पंचायत होती है, जो जाति के नियम और आचार-विचार का नियमन करती है। ऊँची जातियों से भिन्न, निम्न स्तर का कार्य करने वाले लोग अछूत समझे जाते हैं जो अनुसूचित जातियों से संबंधित हैं।

भारत में जाति व्यवस्था का प्रारंभ से ही सत्ता और वर्चस्व की अवधारणा से घनिष्ठ संबंध रहा है जिसे औजार बनाकर हजारों वर्षों तक उच्च जातियों ने निम्न जातियों का शोषण कर उनके श्रम पर एक आनंदमय जीवन व्यतीत किया है। ये उच्च जातियाँ जाति के आधार पर अपना सामाजिक प्रभुत्व बनाये रखने में कामयाब रहीं, इसे हाल ही में प्रदर्शित आर्टिकल-15 फिल्म के संदर्भ में अच्छे तरीके से समझा जा सकता है। इस पर व्यापक चर्चा हम आगे करेंगे। इस स्थिति से आधुनिक युग में भी जाति व्यवस्था के महत्त्व का पता चलता है। उच्च जातियाँ आज भी अपना सामाजिक प्रभुत्त्व कायम रखना चाहती हैं और इसके लिए वे आज भी निम्न जातियों को निचले पायदान पर ही रखना चाहती हैं कि कहीं उनका वर्चस्व समाप्त न हो जाए। अतः यह कहा जा सकता है कि जाति प्रथा का प्रभाव भारतीय समाज में काफी व्यापक रूप में रहा है। इस व्यवस्था में उच्च जातियों की स्थिति काफी सुदृढ़ है, वहीं निम्न जातियों की बहुत ही दयनीय।

भारत में जाति व्यवस्था में संसाधनों के आबंटन की सामाजिक प्रक्रिया धार्मिक व सांस्कृतिक आधार पर रही है। संसाधनों के आबंटन की इस प्रक्रिया को समाज के तीन वर्गों को केंद्र में रखकर योजनाबद्ध किया गया था। ब्राहमण, क्षत्रिय, व वैश्य। इन तीन वर्गों का ज्ञान, राजशक्ति एवं वाणिज्य इन तीन महत्त्वपूर्ण सामाजिक संपत्ति पर आधिपत्य था। प्राचीन काल में जब से यह व्यवस्था अस्तित्व में आई तभी से समाज के इन तीन प्रमुख वर्गों में आपसी प्रतियोगिता नहीं थी, बल्कि पारस्परिक अंत-निर्भरता थी। तीनों ही वर्ग अपनी-अपनी सामाजिक संपत्ति के स्वामित्व के अनुसार एक-दूसरे पर निर्भर थे। इस व्यवस्था में चौथा वर्ग संपत्तिहीन होने के कारण इन तीनों वर्गों का सेवार्थी रहा। इस व्यवस्था में चौथे वर्ग को सदैव सेवार्थी बनाये रखने के लिए उपरोक्त तीनों वर्गों ने आपस में गठबंधन स्थापित किया जिसके अंतर्गत उपरोक्त वर्गों की आपसी अंतर्निर्भरता की अंतर्क्रिया से एक उच्च वर्ग की प्रधानता बन गई और यह तीनों वर्ग सामाजिक प्रभुत्त्व कायम कर अन्य वर्ग पर शासन करते रहे। फलस्वरूप तीनों वर्गों की यही प्रधानता सांस्कृतिक व धार्मिक श्रेष्ठता के आधार पर पीढ़ी दर पीढ़ी वैधता प्राप्त करती जाने लगी।

वर्तमान में लोकतंत्र, आधुनिकीकरण व औद्योगिकरण के दौर में भी यह व्यवस्था अपने उसी स्वरूप को बनाए रखना चाहती है।

अतः साधन सम्पन्न तथा शक्ति सम्पऩ्न ऊच्च जातियों द्वारा साधनहीन निम्न जातियों का शोषण आरंभ से ही होता आया है। समाज के निचले पायदान पर रहने के कारण निम्न जातियाँ प्रत्येक स्तर पर शोषण का शिकार रहती हैं। उदाहरण के लिए, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक। धार्मिक आधार पर उन्हें हिन्दू समाज में सबसे निम्न दर्जे पर रखा गया है। उन्हें मंदिर, हवन-कीर्तन, पर्व-त्यौहार मनाने की छूट अवश्य मिल गई है किंतु आज भी ऐसा समझा जाता है कि ये इन कार्यों के योग्य नहीं हैं। आर्थिक आधार पर देखा जाए तो निम्न जातियों की अर्थव्यवस्था मजदूरी पर आधारित होती है लेकिन उन्हें उनकी जाति के कारण उचित मजदूरी नहीं दी जाती। इस कारण उनका आर्थिक शोषण होता है। काम के अभाव में वे अपने श्रम का मोल-तोल नहीं कर पाते। अपने अस्तित्व को बचाने के लिए उन्हें जो कुछ भी मिलता है उसी पर काम करना पड़ता है। राजनीतिक क्षेत्र में भी उत्पीड़ित ही रहे हैं, अधिक संख्याबल होने के बावजूद समाज में प्रबल जाति के रूप में इन्हें मान्यता नहीं मिलती। उनके ऊपर समाज में प्रबल स्थान वाली जातियों का शासन रहा है। राजनीतिक दृष्टि से निर्बल तथा शक्तिहीन होने के कारण निम्न जातियाँ अभी भी उत्पीड़न का शिकार होती हैं। सांस्कृतिक रूप से अभी भी उन पर उच्च जातियों का प्रभुत्व बना हुआ है, उच्च जातियाँ अपने इसी प्रभुत्त्व को निरंतर बनाए रखने के लिए प्राचीनकालीन वर्णव्यवस्था को पुनर्जीवन प्रदान करने के लिए भरपूर प्रयासरत्त हैं।

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अब यहाँ यह देखना बहुत ही महत्त्वपूर्ण होगा कि सिनेमा जो हमारे समाज के वास्तविक स्वरूप को प्रदर्शित करता है, जो हमारे समाज का एक आईना है उसमें जाति के प्रश्न को कहाँ तक उठाया गया है। इस प्रश्न पर चर्चा करने से पहले सिनेमा पर थोड़ा प्रकाश ड़ालना सार्थक रहेगा कि सिनेमा की समाज में क्या भूमिका है, यह किस प्रकार से समाज को प्रभावित करता है।

भारतीय लोकतांत्रिक संस्कृति में हिंदी सिनेमा का योगदान सबसे प्रमुख रहा है। हिंदी सिनेमा भारतीय समाज में सबसे ज्यादा अनुगमन किया जाने वाला दृश्य संस्कृति का हिस्सा है। हिंदी सिनेमा भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक, पारम्परिक और ऐतिहासिक आयामों को दर्शाने का एक मुख्य माध्यम है। आज सिनेमा जनसंचार और मनोरंजन का एक लोकप्रिय माध्यम है। जिस तरह साहित्य समाज का दर्पण होता है, उसी तरह सिनेमा भी समाज को प्रतिबिंबित करता है। सिनेमा और समाज में दोहरा सम्बंध होता है। समाज सिनेमा को प्रभावित करता है, सिनेमा समाज को। ये एक-दूसरे से प्रभावित होते हैं और एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं।

सिनेमा एक ऐसा प्रभावकारी माध्यम है, जिसके बारे में सुनते ही व्यक्ति विभिन्न परिकल्पनाओं, आकांक्षाओं तथा सपनों में खो जाता है। सिनेमा ने आरंभ से लेकर वर्तमान तक दर्शकों को उत्साहित करने का काम किया है। सिनेमा समाज का एक अहम् हिस्सा बन चुका है।

भारतीय समाज पर सिनेमा की गहरी छाप देखने को मिलती है। सिनेमा को समाज का दर्पण कहा जाता है क्योंकि लोग सिनेमा में अभिनेताओं और अभिनेत्रियों द्वारा निभाए गए किरदारों में स्वयं की तथा समाज की छवि देखते हैं, समाज उसी रंगरूप में ढ़लने का प्रयास करने लगता है।

भारतीय युवाओं में प्रेम के प्रति आकर्षण उत्पन्न करने की बात हो या सिनेमा के कलाकारों के पहनावे के अनुरूप फैशन का प्रचलन, ये सभी समाज पर सिनेमा के ही प्रभाव हैं। सिनेमा की शुरूआत से ही इसका समाज के साथ गहरा सम्बंध रहा है। प्रारंभ में इसका उद्देश्य मात्र लोगों का मनोरंजन करना भर था। अभी भी अधिकतर फिल्में इसी उद्देश्य को लेकर बनाई जाती हैं, इसके बावजूद सिनेमा का समाज पर गहरा प्रभाव रहा है। अतः कहा जा सकता है कि सिनेमा भारतीय संस्कृति का परिचायक रहा है क्योंकि सिनेमा ने हमेशा ही संस्कृति के विषयों को पर्दे के माध्यम से चित्रित किया है।

सिनेमा समाज को परिवर्तन की दिशा देता है। यह समाज में क्रांति लाने का महत्त्वपूर्ण उपकरण है। जब से सिनेमा का प्रादुर्भाव हुआ है इसने समाज में विद्मान बुराइयों का, जैसे- महिला असमानता, दहेज प्रथा, बहुविवाह, भ्रष्टाचार आदि को आधार बनाकर फिल्मों का निर्माण किया है। इस प्रयास में फिल्मकारों ने सच्ची घटनाओं पर आधारित फिल्मों का निर्माण भी किया है और क्रूर से क्रूर घटनाओं को बड़ी सहजता से पर्दे पर उतारकर फिल्मों द्वारा यथार्थता दिखाने की कोशिश की है। इस संबंध में छपाक फिल्म जो हाल में प्रकाशित हुई है एक उदाहरण है। ऐसी फिल्मों के निर्माण का उद्देश्य यही है कि समाज पर इनका सकारात्मक प्रभाव पड़े। समाज की गंभीर बुराइयों के प्रति लोगों का दृष्टिकोण भी सकारात्मक हो।

ज्वलंत सामाजिक विषयों को पर्दों पर दिखाने का यह प्रयास कोई नया नहीं है, बल्कि पहले भी ऐसे प्रयास किये जाते रहे हैं। 1933 में शांताराम की फिल्म अमर ज्योति एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है, जिसमें स्त्री-पुरूष के अधिकारों की समानता के विषय को प्रमुखता से उठाया गया था। हालाँकि आरम्भिक दौर में भारत में पौराणिक एवं ऐतिहासिक फिल्मों का बोल-बाला रहा, परंतु समय के साथ-साथ सामाजिक, राजनीतिक एवं साहित्यिक फिल्मों ने समाज पर अपना गहरा प्रभाव ड़ाला।

पिछले कुछ दशकों से भारतीय समाज में राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक भ्रष्टाचार में वृद्धि हुई है, इसका असर इस दौरान निर्मित फिल्मों पर भी दिखाई पड़ा है। गुलाल (2009), नायक (2001), राजनीति (2010), डर्टी पोलिटिक्स (2015), सत्याग्रह (2013) आदि प्रमुख फिल्में हैं जिनमें राजनीति की वास्तविकता को प्रदर्शित किया गया है।

यहाँ यह महत्त्वपूर्ण है कि हिंदी सिनेमा ने समाज की लगभग सभी बुराईयों को प्रदर्शित किया है जिससे समाज में उन बुराइयों के प्रति जागरूकता भी आई है लेकिन यह बहुत अफसोसजनक है कि हिंदी सिनेमा में भारतीय समाज की प्रमुख बुराई जाति, जिसके कारण समाज में एक वर्ग सदैव शोषण का शिकार रहा और दयनीय जीवन जीने को मजबूर रहा है, उसे पर्याप्त स्थान नहीं दिया गया। सिनेमा का इतिहास है कि वह कभी समाज के संवेदनशील मुद्दों पर आधारित फिल्मों से दूर नहीं भागा है। समय-समय पर सामाजिक मुद्दों पर आधारित फिल्में दर्शकों के लिए पेश की गई हैं और आज भी ऐसी फिल्मों का निर्माण जोरों पर है जिसके जरिए देश के लोगों को जागरूक कर उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया गया है।

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हिंदी सिनेमा में राष्ट्रभक्ति, बेरोजगारी, मजदूर आंदोलन, नारी उत्पीड़न, नारी सशक्तिकरण, राजनीतिक बुराई, आतंकवाद जैसे विषयों को पर्याप्त स्थान दिया गया है। आये दिन इन विषयों पर फिल्में बनती रहती हैं। इन विषयों पर फिल्मों की कोई कमी नहीं है, जैस- राष्ट्रभक्ति पर बहुत सी फिल्में हैं, जिनमें बार्डर (1997), द लेजेंड आफ भगत सिंह (2002), रंग दे बसंती (2006), चक दे इंडिया (2007), लगान (2001), मंगल पांडे (2005), 1942 ए लव स्टोरी (1994), स्वदेश (2004), लक्ष्य (2004), प्रहार (1991), क्रांतिवीर (1994), दीवार (1975), हकीकत (1995), पूरब और पश्चिम (1970), नेताजी सुभाष चन्द्र बोस (2004), मदर इंडिया (1957), नया दौर (1957), हिंदुस्तानी, सात हिंदुस्तानी (1969), गदरः एक प्रेम कथा (2001), पुकार (2000) प्रमुख हैं।

इसी प्रकार हिंदी सिनेमा में बेरोजगारी जैसे विषय को भी खूब जगह मिली है, जैसे- दोस्त (1974), बी.ए.पास (2012), नौकरी (1978), प्यासा (1957), श्री420 (1955), अंकुश (1986), रोटी, कपड़ा और मकान (1974), आज का दौर (1985), फेरी (2000) ये फिल्में प्रदर्शित करती हैं कि स्वतंत्रता के बाद भी भारत बेकारी, बेरोजगारी और भूख से जूझ रहा था।

भारत की आबादी का एक बड़ भाग मजदूर है जो घोर परिश्रम करता है और देश के निर्माण में बहुमूल्य भूमिका निभाता है। मजदूरों के बिना किसी भी औद्योगिक ढ़ाँचे के खड़े होने की कल्पना नहीं की जा सकती। इसलिए श्रमिकों का समाज में अपना ही एक स्थान है, लेकिन, ये बड़े पैमाने पर शोषण का शिकार रहे हैं जिसे हिंदी सिनेमा ने बखूबी पेश किया है। सत्तर के दशक में ऐसी बहुत सी फिल्में बनी जो मजदूरों के शोषण और उनकी समस्याओं को दर्शाती हैं। इनमें नया दौर (1957), पैगाम (1959), नमक हराम (1973), दीवार (1975), काला पत्थर (1979), कूली (1983), मजदूर (1983), लाड़ला (1974), मजदूर जिंदाबाद (1976), कोयला (1997) प्रमुख स्थान रखती हैं। इन फिल्मों ने मजदूरों की समस्याओं को बड़े पर्दे पर उकेरा। उनकी रोजी-रोटी से लेकर पारिवारिक परेशानियों को इन फिल्मों ने बड़ी ही खूबसूरती से दिखाया। इसका प्रभाव समाजवाद के रूप में दिखाई दिया। मजदूरों के कल्याण के लिए कई नीतियाँ व कानून बने।

उपरोक्त विवरण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि हिंदी सिनेमा में समाज में फैली समस्याओं, चाहे वह बेरोजगारी हो या मजदूरों से जुड़ी हो, राजनीतिक भ्रष्टाचार हो या आतंकवाद। हर विषय पर फिल्मों की भरमार है। महिलायें प्राचीन समय से ही शोषण का शिकार रही हैं। उनके अधिकारों को महत्व नहीं दिया जाता। महिलाओं से जुड़े इस पहलू पर भी फिल्मों की भरमार है और इन फिल्मों की वजह से समाज में सकारात्मक बदलाव भी आया है। महिलाओं में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता आई है, साथ ही समाज ने भी उन्हें बेहतर ढ़ंग से स्वीकार किया है। आज समाज में उन्हें अधीनस्थ के रूप में नहीं देखा जाता। अब महिलाओं की रचनात्मक भूमिका को स्वीकारा व सराहा जाता है।

अतः यहाँ मुख्य बिंदु यह है जिस प्रकार हिंदी सिनेमा के माध्यम से महिलाओं की स्थिति में सुधार आया है उसी प्रकार अगर हिंदी सिनेमा जाति के प्रश्न पर भी उत्साह दिखाता तो क्या पता हमारे समाज से जाति समाप्त ही हो जाती।

सामाजिक सरोकारों को लेकर स्वाधीनता आंदोलन और इसके बाद नेहरू की मृत्यु तक भारत में ढेरों फिल्में बनी, परंतु इनमें सदियों से प्रचलित वर्ण एवं जाति व्यवस्था का चित्रण नहीं के बराबर हुआ है।

जाति सवर्णों का एक हथियार है जिसका उपयोग कर इन्होंने दलितों और पिछड़ों के प्रति सदैव उपेक्षा और अपमान का व्यवहार किया है। उन्हें कभी भी अपने बराबर का मनुष्य नहीं माना। गैर-बराबरी के प्रति मुखरित होने वाला भारतीय जाति के प्रश्न पर मौन साध लेता है। जबकि इसी जाति व्यवस्था के कारण निम्न तबका शोषित व अधिकार रहित रहा है। प्राचीन काल से लेकर अब तक उनकी स्थिति वैसी की वैसी है। वे कल भी शोषण का शिकार थे और आज भी शोषण का शिकार हैं, और हिंदी सिनेमा का नजरिया भी इसी संदर्भ में दलितों के प्रति कुछ खास भिन्न नहीं है। समाज की ही तरह हिंदी सिनेमा ने भी इनके साथ उपेक्षित व्यवहार किया है। दलितों के प्रति करूणा दिखाकर वह अछूत कन्या (1936), आदमी (1993), अछूत (1940), सुजाता (1959), बूटपालिस (1954), अंकुर (1974), और सदगति (1981) जैसी फिल्मों का निर्माण तो करता है किंतु जिस तल्खी और सिद्दत से जाति के प्रश्न को उठाए जाने की जरूरत है, उस तरह से नहीं उठाता।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् ऐसा समझा गया था कि संविधान में अस्पृश्यता का अंत, जिसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद-17 में शामिल किया गया है, उससे जाति भारतीय समाज में अदृश्य हो जाएगी, किंतु यह एक कटु सच्चाई है कि आजादी के इतने साल बाद भी जाति हमारे समाज की प्रमुख विशेषता बनी हुई है। अभी तक जाति का पूरी तरह से सफाया नहीं हो सका है। आज भी समाचार-पत्रों में जाति-आधारित वैवाहिक विज्ञापन देखने को मिलते हैं। हिंदी सिनेमा में जाति का प्रश्न हाशिये पर ही रहा है। हालाँकि यहाँ बैंडिट क्विन और गोड़ मदर फिल्में प्रमुख रहीं, जिसमें जाति के प्रश्न को पर्याप्त स्थान दिया गया और दलित चेतना भी दिखाई दी। इस संदर्भ में एक अन्य फिल्म शायद वेलकम टू सज्जनपुर भी एक अहम् फिल्म है, जिसमें शायद पहली बार किसी नायक का नाम महादेव कुशवाहा है और नायिका का नाम कमला कुम्हारन है। इस फिल्म में जाति का चित्रण देखने को मिलता है। वह इस संदर्भ में, नायक की माँ जाति नाम के अनुरूप सब्जी कि दुकान चलाती है और नायिका के यहाँ मिट्टी के बर्तन बनाने का काम होता है।

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लेकिन अफसोस की बात यह है कि हिंदी सिनेमा में इस प्रकार की फिल्मों का निर्माण केवल नाम-मात्र का ही मिलता है। हिंदी सिनेमा ने समाज के हर हिस्से को अपनी आवाज दी, तो फिर क्यों यह जाति के प्रश्न पर मौन है। क्यों जाति सम्बंधित फिल्मों का निर्माण नहीं किया जाता। इन सवालों के जवाब क्या हैं। क्या सवर्ण समाज इस विषय पर बनी फिल्मों को स्वीकृति नहीं देता? क्या इस प्रकार की फिल्मों के निर्माण से समाज में स्थापित उनका प्रभुत्त्व खतरे में पड़ जायेगा? ये सब कुछ ऐसे अहम् सवाल हैं जिन पर विचार किया जाना चाहिए। लगान व मंगल पांड़े फिल्म में कचरा व नैनसुख किरदार जाति प्रथा के स्वरूप को अवश्य प्रकट करते हैं लेकिन सिर्फ कुछ ही क्षणों के लिए। आखिर कब तक हिंदी सिनेमा ऐसी फिल्मों के निर्माण से बचता रहेगा।

नंगेली क्रूर और अमानवीय मूलाकरम के खिलाफ कुर्बानी देने वाली एक नीची जाति की महिला थी जिसके बलिदान से समाज में एक आंदोलन शुरू हो गया और आखिरकार विवश होकर मूलाकरम को हटाना पड़ा। जहां आज जीवनी आधारित इतनी फिल्मों का निर्माण हिंदी सिनेमा में हो रहा है वहां इस बेहद वीर महिला को केंद्र में रखकर एक भी फिल्म अभी तक नहीं बनी है।

निष्कर्ष- भारत दुनिया में सबसे अधिक फिल्मों का निर्माण करने वाला देश है और हिंदी सिनेमा अपनी भारतीय संस्कृति को केंद्र में रखकर फिल्मों का निर्माण करने के लिए प्रसिद्ध है। हिंदी सिनेमा में प्रत्येक वर्ष हजारों फिल्मों का निर्माण होता है जिसमें भारत के इतिहास व संस्कृति से संबंधित फिल्में भी शामिल हैं। अभी हाल ही में भारतीय इतिहास पर कई फिल्में बनी हैं, जैसे- तानाजी, पद्मावत, पानीपत, भारत, बाजीराव मस्तानी, मणिकर्णिकाः द क्वीन आफ झाँसी और केसरी, लेकिन इन सबके बीच जाति के प्रश्न पर केवल एक ही फिल्म आई, आर्टिकल-15।

आर्टिकल-15 में आयुष्मान खुराना प्रमुख भूमिका में हैं। यह फिल्म अनुभव सिन्हा के निर्देशन में जाति के विषय पर बनी फिल्म है। इन घटनाओं में 2014 में बदायूँ सामूहिक बलात्कार और 2016 में ऊना में हुई दलित अत्याचार तथा अन्य घटनाएं शामिल हैं। लेकिन यह फिल्म चर्चा के साथ-साथ विवाद का विषय भी बन गई। सवर्णों के एक संगठन ने इसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। जयपुर में भी ब्राह्मण समाज ने इस फिल्म का विरोध किया। डीएनए की खबर के अनुसार उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों के एक संगठन ने इल्जाम लगाया है कि फिल्म के ट्रेलर में उन्हें बुरा दिखाया जा रहा है। ब्राह्मण, पशुराम सेना ने फिल्म को लेकर अपनी नाराजगी प्रकट की है और आरोप लगाया कि फिल्म के मेकर्स ने बदायूँ रेप केस के तथ्यों को बदलने और अपराधियों को ब्राह्मण समाज का दिखाने का प्रयास किया है। उनका कहना है कि इस फिल्म के तथ्यों को इसलिए बदला गया ताकि ब्राह्मण समाज को दुनिया के सामने बुरा दिखाया जा सके।

उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि सवर्ण समाज नहीं चाहता कि जाति के प्रश्न पर कोई फिल्म बने क्योंकि इससे उनकी प्रतिष्ठा और सम्मान को ठेस पहुँचती है। साथ ही अनेक सदियों से स्थापित सामाजिक प्रभुत्त्व पर भी खतरा मंड़राने लगता है। सवर्णों ने सदियों तक दलितों का शोषण किया है जिसके परिणामस्वरूप दलित आज तक भी उस उत्पीडन से उभर नहीं पाये हैं और न ही पूर्ण रूप से अपना विकास कर पाऐं है। उनकी वास्तविक स्थिति को सवर्णों ने हमेशा नजरअंदाज किया है। समाज में वह हाशिये पर पड़े अपना जीवन गुजार रहे हैं।

हिंदी सिनेमा उनकी इस स्थिति में सुधार लाने का एक अच्छा माध्यम बन सकता है, लेकिन फिल्म निर्माता ऐसी फिल्मों के निर्माण से बचते हैं। केवल कुछ ही ऐसे फिल्म निर्माता हैं जिन्होंने समाज के इस वर्ग को ध्यान में रखकर फिल्मों का निर्माण किया है। उस पर भी सवर्ण समाज विरोध जताने लगता है, क्योंकि इस प्रकार की फिल्मों से समाज में उनकी प्रतिष्ठा का ग्राफ प्रभावित होता है।

संदर्भ सूची-

1.Ghurey, G.S. (1961) ‘Caste, Class and Occupation’, Popular Prakashan Bombay.

2.Spivak, G. Chakravorty, Can the subaltern speak.

3.Jodhka, S.S. (2015) ‘Caste in Contemporary India’, Routledge, Delhi.

4.Sharma, Renu. ‘History of Indian cinema’, Diamond Books.

5.Saxena, A. (2014) ‘Indian cinema society and culture’, Kanishka Pulishing House.

6.https://aajtak.intoday/lite/story/ayushmann-khurrana-reacts-on-article- 15-being-called-antibrahmin.

शानू कुमार

पीएच.डी.

बौद्ध अध्ययन विभाग

दिल्ली विश्वविद्यालय

 

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