हिंदी नवजागरण और स्त्री

*सुमित कुमार

इतिहास साक्षी है कि स्त्रियों का शोषण विभिन्न कालों में भिन्न-भिन्न रूपों में होता आया है। यही कारण है कि आज 21वीं सदी में पूरे विश्व में नारी मुक्ति के आंदोलन जोर-शोर चल रहे हैं। भारत जैसे देश में परंपरागत रूप में यह देखा जाता है कि स्त्रियाँ आर्थिक रूप से पुरुषों पर निर्भर करती हैं और इस कारण वे स्वयं को प्राप्त अधिकारों से भी वंचित हो जाती हैं। साथ ही वे पुरुषों के अधीन होकर उनके अनुरूप ही जीवन निर्वाह करने पर विवश हो जाती हैं, चाहे वह उचित हो या अनुचित। एक पितृप्रधान समाज की यह विडंबना है कि वो स्त्रियों को अपने अधीन बनाए रखने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाता है। जैसे कि समाज में स्त्रियों पर कई प्रकार की पाबंदी लगाना, घर से बाहर न निकलने देना, उनके आचार-विचार और व्यव्हार पर पुरुषों की तुलना में कई नियम-कानून लागू करना। शिक्षा, जो सबके लिए अनिवार्य होनी चाहिए उससे भी स्त्रियों को वंचित करना और यदि शिक्षा दी भी जाए तो यह सिखाना कि वे एक आदर्श और पतिव्रता स्त्री कैसे बने आदि। हालाँकि समय के प्रवाह और स्त्री के अधिकार के संघर्ष से परिस्थितियाँ बदली हैं और यह बदलाव विशेषकर नवजागरण काल से शुरू होता है। जिसमें स्त्रियों के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक आदि क्षेत्रों में उनके अधिकार और योगदान को लेकर कई आंदोलन हुए। इस लेख में नवजागरण काल की विभिन्न स्थितियों पर नजर डालते हुए यह जानने की कोशिश की जाएगी कि स्त्रियों की दशा कैसी थी और उसमें सुधार किस प्रकार हुए और विशेषकर साहित्य का योगदान क्या रहा। सबसे पहले यहाँ भारतीय नवजागरण और हिंदी नवजागरण को जानना महत्त्वपूर्ण होगा।

पाश्चात्य से आए हुए शब्द ‘रेनेसां’ का हिंदी रूपांतरण ‘नवजागरण’ या ‘पुनर्जागरण’ है जिसका अर्थ है ‘फिर से जागना’। भारतीय नवजागरण की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कर्मेंदु शिशिर लिखते हैं, “भारतीय नवजागरण की शुरुआत के संकेत काफी पहले से मिले हैं, लेकिन सन् 1857  के बाद इसका तार्किक और व्यवस्थित स्वरूप स्पष्ट होने लगा। भारतीय भाषाओं में गद्य का विकास तेजी से हुआ और अपेक्षित आधुनिक विचारों के लेखन की शुरुआत हुई। इसकी मुख्य अवधारणा है, हिन्दू मुसलमानों की एकता, धार्मिक रूढ़ियों, पाखंडों का पर्दाफाश, भारतीय भाषाओं के वर्चस्व का आंदोलन, किसानों, देशी उद्योगों और कारीगरों की पक्षधरता, साम्राज्यवादी शोषण और लूट का विरोध, नारियों के उत्थान, दमन का विरोध, सामाजिक जड़ता के विरुद्ध प्रगतिशील और आधुनिक विचारों का वरण, विज्ञान, नई तकनीक और नए उद्योगों का आमंत्रण, भारतीय इतिहास की वास्तविक गरिमा की प्रतिष्ठा, व्यापक शिक्षा, अछूतोद्धार, भारतीय ज्ञान-विज्ञान की मीमांसा, औपनिवेशिक संस्कृति का विरोध। ”1

ये वो समय था जब भारत औपनिवेशिक सत्ता के अधीन था और विभिन्न आंतरिक समस्याओं से जूझ रहा था। समाज में बाल-विवाह, सती प्रथा जैसी क्रूर और अमानवीय व्यवस्थाएँ थीं। छोटी उम्र में शादी हो जाने की वजह से स्त्रियाँ पूर्ण रूप से पराश्रित होती थीं। उनका मानसिक विकास एक सीमा में बंधा हुआ था। उन्हें अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तक नहीं थी। कम उम्र में शादी होने की वजह से वे कभी अपने स्वयं के आर्थिक उन्नति के बारे में सोच तक नहीं सकती थी। कभी किसी स्त्री का पति मर जाता तो उसे सती होने के नाम पर जबरन अग्नि में प्रवेश करवाया जाता था। इस तरह की अमानवीय कार्यों के विरोध के लिए कई समाज सुधारकों ने आन्दोलन चलाए। स्त्रियों की शिक्षा की बात की और उन्हें आदर-सम्मान और स्वाभिमान से जीने के लिए संघर्ष की प्रेरणा दी। उस समय भारत ही नहीं पूरे विश्व में स्त्रियों की स्थिति और उसमें सुधार करने के बारे में चर्चा करते हुए लेखिका राधा कुमार अपनी पुस्तक ‘स्त्री संघर्ष का इतिहास’ में लिखती हैं, “उन्नीसवीं सदी को स्त्रियों की शताब्दी कहना बेहतर होगा क्योंकि इस सदी में सारी दुनिया में उनकी(स्त्री) अच्छाई-बुराई, प्रकृति, क्षमताएँ एवं उर्वरा गर्मागर्म बहस का विषय थे। यूरोप में फ्रांसीसी क्रांति के दौरान और उसके बाद भी स्त्री जागरुकता का विस्तार होना शुरू हुआ और शताब्दी के अंत तक इंग्लैंड, फ्रांस तथा जर्मनी के बुद्धिजीवियों ने नारीवादी विचारों को अभिव्यक्ति दी। 19वीं सदी के मध्य तक रूसी सुधारकों के लिए ‘महिला प्रश्न’ केंद्रीय मुद्दा बन गया था जबकि भारत में खासतौर से बंगाल और महाराष्ट्र में समाज सुधारकों ने स्त्रियों में फैली बुराइयों पर आवाज उठाना शुरू किया।”2 इसके साथ ही श्रीमती धर्मा यादव जी अपने लेख ‘स्त्री विमर्श और हिंदी लेखन’ में लिखती हैं, “1975ई. पूरे विश्व में अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष के रूप में मनाया गया, जिसके परिणाम स्वरूप कोपहेगन में पहला अंतर्राष्ट्रीय महिला सम्मेलन, नैरोबी में दूसरा अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन 1985 में और शंघाई में तीसरा 1995 में संपन्न हुआ। भारत में इस सम्मेलन की शुरुआत नवजागरण के साथ हुई। राजा राम मोहन राय ने 1818ई. में सती प्रथा का विरोध किया और उनके प्रयत्नों के फलस्वरूप 1829 में लॉर्ड विलियम बैंटिक ने सती प्रथा को गैरकानूनी घोषित किया। बाल-विवाह, विधवा-विवाह हो और बहुपत्नी प्रथा के विरुद्ध लड़ते हुए राजा राममोहन राय स्त्री के पक्षधर नजर आते हैं। स्वामी विवेकानंद और स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी स्त्री शिक्षा पर जोर दिया। इस प्रकार अमेरिका से शुरू हुआ यह आंदोलन भारत में स्त्री जाति की चेतना का स्वर बन गया।”3

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उस काल में स्त्री का स्वयं अपने अधिकार के लिए जागना भी एक महत्वपूर्ण घटना थी, “बंगाल में राजा राममोहन राय ने ब्रह्म समाज की (सन् 1822ई.) स्थापना की। दूसरी ओर गुजरात में दयानंद सरस्वती का जन्म हुआ (सन्1824-83 ई.) और बम्बई से उन्होंने सन् 1875 ई. में ‘सत्यार्थ प्रकाश’ निकाला और सन् 1877ई. में लाहौर पंजाब में आर्य समाज की स्थापना की। बंगाल में ही श्री रामकृष्ण परमहंस (सन्1834-86) और विवेकानंद (सन् 1866 ई.) का जन्म हुआ। महाराष्ट्र में गोविंद रानाडे का प्रार्थना समाज (सन् 1867 ई.) प्रभावशाली था। कहना नहीं होगा कि यह सभी मूलतः धार्मिक-सांस्कृतिक आंदोलन थे। राष्ट्रवाद इनकी बनावट में शामिल था। लगभग-लगभग एक ही समय में इन महान विचारकों को केंद्र में रखे ये आंदोलन जन्मे और विभिन्न अंचलों में फैल गए। एक महत्वपूर्ण रेखांकित करने योग्य बात यह है कि इन सभी आंदोलनो ने ‘स्त्री विमर्श’ को मुख्य मुद्दा बनाया। सती प्रथा निषेध हो या विधवा विवाह प्रारंभ, सभी ने स्त्री गरिमा और स्वतंत्रता की बात की। इसका परिणाम यह हुआ कि स्त्री ने स्वयं को अपनी और अपने परिदृश्य के बारे में सोचना शुरू किया।”4

इसका प्रत्यक्ष उदाहरण ‘सीमंतनी उपदेश’ की लेखिका (एक अज्ञात हिन्दू औरत),पंडिता रमाबाई और ताराबाई शिंदे के रूप में हमारे समक्ष है। ताराबाई शिंदें जैसी लेखिका के बारे में आलोक श्रीवास्तव लिखते हैं, “आज जब उन्नीसवीं सदी के संपूर्ण सांस्कृतिक आलोड़न के स्वरूप और उसकी प्रकृति पर प्रश्न चिन्ह लग रहे हैं, उसकी ब्राह्मणवादी सीमाओं और बुर्जुआ हितों की परिधि स्पष्ट हो चुकी है, तब एक ऐसी रचना (स्त्री-पुरुष तुलना) दिखाई देती है, जिसने समाज के एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर उसी युग में इस वर्ग की सांस्कृतिक जागरण के अंतर्विरोधों की, इस वर्ग के नारी-संबंधी दृष्टिकोण में स्पष्ट शिनाख्त की, उसे चुनौती दी और उसकी भर्त्सना की।”5 ताराबाई शिंदे के बारे में वीरभारत तलवार जी लिखते हैं, “स्त्री-पुरुष तुलना किताब की लेखिका ताराबाई शिंदे उस दौर की दूसरी महत्वपूर्ण स्त्री थीं जिन्होंने भद्रवर्गीय पुरुष-सुधारकों के आन्दोलन की सीमाओं को न सिर्फ पार किया बल्कि उसकी कड़ी आलोचना भी की।”6 स्वयं ताराबाई शिंदे के क्रांतिकारी विचार कुछ इस तरह हैं जिसमें वे विधवा विवाह के बारे में लिखती हैं, “पुराणों में पुत्रहीन राजा की मृत्यु के उपरांत वंश वृद्धि के लिए उसकी रानी को पर पुरुष से नियोग की सम्मति दी गई है। क्या यह परद्वार नहीं ? व्यभिचार नहीं ? ऐसी सम्मति के बजाय पुनर्विवाह की अनुमति ही क्यों न दे दी गई ?”7 जहाँ एक और ताराबाई शिंदे अपने क्रांतिकारी विचारों को इस तरह व्यक्त करती हैं वहीं ‘सीमंतनी उपदेश’ की लेखिका अपना विरोध कुछ इस प्रकार जाहिर करती हैं, “हम सिवाय  चारदिवारी मकान के और कुछ नहीं देखतीं और हम चाहे  इसी को तमाम दुनिया ख्याल करें, चाहे इसी को हिंदुस्तान समझें। इसी जेल खाने में पैदा हुई हैं और इसी में मर जाएंगी।”8

उपर्युक्त बातों में भारतीय नवजागरण की मुख्य रूप से चर्चा की गई और अब हिंदी नवजागरण और उसमें स्त्रियों की स्थिति को जानने की कोशिश की जाएगी। हिंदी नवजागरण में भारतेंदु हरिश्चंद्र का स्थान महत्वपूर्ण माना जाता है। उस काल में भारतेंदु द्वारा किये गये कार्यों की सराहना करते हुए डॉ. नगेन्द्र लिखते हैं, “भारतेंदु हरिश्चंद्र ने जनता को उद्बोधन प्रदान करने के उद्देश्य से ‘जातीय संगीत’ अर्थात लोकगीत की शैली पर सामाजिक कविताओं की रचना पर बल दिया। मातृभूमि-प्रेम, स्वदेशी वस्तुओं का व्यव्हार, गोरक्षा, बालविवाह, निषेध, भ्रूण-हत्या की निंदा आदि विषयों को कविगण (भरतेंदु मंडल ) अधिकाधिक अपनाने लगे थे। राष्ट्रीय भावना का उदय भी इसी काल की अन्य विशेषता है।”9

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हिंदी नवजागरण में भारतेंदु की अहम् भूमिका को बताते हुए कर्मेंदु शिशिर लिखते हैं, सन 1857 में जिस संक्षिप्त आक्रोश का विस्फोट हुआ उसी के गर्भ से नवजागरण का उदय हुआ। इसकी गूंज न सिर्फ भारतीय भाषाओं में बल्कि लोक भाषाओं तक में सुनाई पड़ती है। हिंदी में इस नवजागरण का नेतृत्व भारतेंदु हरिश्चंद्र ने किया जब वह सन 1873ई. में हिंदी के नए चाल में चलने की बात करते हैं, तो वस्तुतः भारतीय मानस के नए करवट की चर्चा करते हैं। यह करवट भाषा का ही नहीं, विचारों की भी थी। यह भारत में चिंतन का ऐसा संधिकाल था जब एक ओर आधुनिकता का प्रवेश हो रहा था तो दूसरी ओर पुरानी परम्पराएँ टूट रही थीं। आधुनिकता, वैज्ञानिकता और नए राष्ट्रीय विचारों का तेजी से प्रसार हुआ। जिस बदलते समय में लेखकों के सामने नई चुनोती थी कि वह आगे बढ़ कर रूढ़िवादी विश्वासों का विरोध करते तथा नए परिवर्तनों का अलख जगाते। भारतेंदु ने अपने मंडल के तमाम लेखकों के साथ इन चुनौतियों से सार्थक संवाद किया। इस सार्थक संवाद का आधार था परंपरा का विवेक सम्मत विरोध और विवेक सम्मत स्वीकार।”10

भारतेंदु स्त्री शिक्षा के पक्षधर थे और इसी कारण उन्होंने कई प्रयास भी किये, जिससे स्त्री शिक्षा को बढ़ावा दिया जाए। उदाहरण के तौर पर उन्होंने ‘बालाबोधानी’ नामक पत्रिका स्त्रियों के लिए निकली थी। परन्तु भारतेंदु जिस स्त्री शिक्षा की बात करते थे उनकी आलोचना करते हुए वीर भारत तलवार जी ने अपनी पुस्तक ‘रस्साकशी’ में भारतेंदु और हंटर कमीशन के बीच हुए बातचीत को बताते हैं, “भरतेंदु ने लड़कियों की शिक्षा के लिए आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की जगह चरित्र निर्माण, धार्मिक और घरेलू प्रबंध के बारे में बताने वाली किताबें पाठ्यक्रम में लगाने के लिए कहा।”11 तलवार जी आगे लिखते हैं, “सिर्फ शिक्षा के प्रसंग में ही नहीं, विधवा विवाह के सवाल पर, पुरानी विवेकहीन रूढ़ियों को तोड़ने के प्रश्न पर और धार्मिक सुधारों के मामले में भी समाज में ऐसी ही उथल-पुथल मची थी, तीखा असर छोड़ने वाली तनावपूर्ण घटनाएँ घटी थीं जिससे इन घटनाओं और उथल-पुथल में भाग लेनेवाले मानवीय चरित्रों के अपार साहस और दृढ संकल्प का पता चलता है। अपने बलिया वाले भाषण में सुधारों के लिए साहस भरे संघर्ष की ज़रूरत पर जोर देते हुए भारतेंदु ने कहा था कि जब तक सौ दो सौ मनुष्य बदनाम न होंगे, जात से बहार न निकाले जाएंगें, दरिद्र न हो जाएँगे, वरंच जान से न मारे जाएँगे, तब तक कोई भी देश न सुधरेगा।”12

जहाँ एक ओर नवजागरण काल में स्त्रियों को लेकर लेखकों में कई रूढ़ियाँ दिखी, वहीं कुछ ऐसे सकारात्मक परिणाम भी दिखे जिसने स्त्री संघर्षों को और मजबूती प्रदान की। इन सकारात्मक पहल को हम श्रीमती धर्मा यादव के इन शब्दों में देख सकते हैं जो स्त्रियों के लिए सकारात्मक पहल थी उस काल की। वे लिखती हैं , “स्त्री मुक्ति का अर्थ पुरुष हो जाना नहीं है। स्त्री की अपनी प्राकृतिक विशेषताएँ हैं, उनके साथ ही समाज द्वारा बनाए गए स्त्रीत्व के बंधनों से मुक्ति के साथ, मनुष्यत्व की दिशा में कदम बढ़ाना, सही अर्थों में स्वतंत्रता है। स्त्री को अपनी धारणाओं को बदलते हुए, जो भी घटित हुआ, उसे नियति मानने की मानसिकता से उबरने की आवश्यकता है, लेकिन साथ ही पुरुष वर्ग को ही दोषी मानकर कटघरे में खड़े करने वाली मनोवृत्ति बदलनी होगी। स्त्रियों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले तथा अपने लेखन व प्रकाशन के द्वारा स्त्री हित विचारने वाले पुरुषों के अमूल्य योगदान को हम विस्मृत नहीं कर सकते।”13 वे कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हुए आगे लिखती हैं, “हिंदी में पहला स्त्री काव्य संकलन ‘मृदुवाणी’ (1905) शीर्षक से मुंशी देवी प्रसाद ने प्रकाशित करवाया। इसमें 35 कवित्रियों की कविताएँ शामिल थीं। इसके बाद गिरिराज दत्त शुक्ला और ब्रजभूषण शुक्ल ने ‘हिंदी काव्य कोकिलाएँ’ (1933) कृति संपादित कर प्रकाशित की। ज्योति प्रसाद मिश्रा निर्मल के प्रकाशन में ‘स्त्री कवि संग्रह’ (1938) में प्रकाशित हुआ। यह संभवतः ‘स्त्री साहित्य’ पाठ्यक्रम के लिए तैयार किया गया था। इनके अतिरिक्त नामवर सिंह के प्रधान संपादकत्व में हिंदी कथा लेखिकाओं की ‘प्रतिनिधि कहानियाँ’ (1984) एवं रमणिका गुप्ता संपादित ‘आधुनिक महिला लेखन’ (1985) महत्वपूर्ण कृतियाँ हैं। स्त्री चेतना में पत्र-पत्रिकाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। पहली पत्रिका 1874 में भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा प्रकाशित ‘बाला-बोधनी’ थी। इसके अतिरिक्त ‘अर्पणा’, ‘आम-आदमी’, ‘हंस’, ‘मानुषी’, ‘निमित्त’, ‘उत्तरार्ध’, ‘उद्भावना’, ‘साक्षात्कार’ आदि पत्रिकाओं में स्त्री अंक प्रकाशित हुए।”14

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हिंदी नवजागरण काल स्त्रियों के लिए, उनकी मुक्ति के संघर्ष के लिए एक शुरुआत थी जिसे पिछले सौ वर्षों से अधिक में देखा गया है। स्वयं स्त्रियाँ भी इसके लिए प्रयासरत रहीं। यही कारण है कि आज नारीवादी साहित्य महिलाओं के हर अधिकारों की मांग करता है जो उसे मिलना चाहिए। हिंदी की कुछ प्रमुख नारी-विमर्श की पुस्तकें तथा लेखिकाएँ इस प्रकार हैं, “बाधाओं के बावजूद नयी औरत’ (उषा महाजन,2001), ‘स्त्री सरोकार’(आशारानी व्होरा,2002), ‘उपनिवेश में स्त्री’ (प्रभा खेतान 2003 ), ‘हम सभ्य औरतें’ (मनीषा, 2002), ‘स्त्रीत्व विमर्श : समाज और साहित्य’ (क्षमा शर्मा, 2002), ‘स्वागत है बेटी’ (विभा देवसरे , 2002), ‘स्त्री-घोष’ (कुमुद शर्मा, 2002 ), ‘औरत के लिए औरत’ (नासिर शर्मा, 2003 ), ‘खुली खिड़कियाँ’, (मत्रेयी पुष्पा, 2003 ), ‘हिंदी साहित्य का आधा इतिहास’(सुमन राजे ) इत्यादि।”15

इन सभी लेखिकाओं ने नारीवादी साहित्य को पुष्ट किया है तथा विभिन्न विषयों पर इनकी रचनाएँ हैं जो स्त्री के मंगल की कामना करती हैं। इन समकालीन लेखिकाओं के अलावे हिंदी साहित्य में कई ऐसी स्त्रियाँ हुईं जिन्होंने अपनी लेखनी द्वारा दिखाया कि वे भी सृजन की क्षमता रखती हैं और नवजागरण कालीन पुरुषवादी मानसिकता को चुनौती दी। इनमे राजेंद्र बालाघोष (बंग महिला ), सुभद्रा कुमारी चौहान, महादेवी वर्मा तथा कई ऐसी लेखिकाएँ शामिल हैं और आज लेखिकाओं की बड़ी संख्या पुरुषों से कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं, और अपनी भागीदारी न सिर्फ साहित्य में बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में दर्ज करा रही हैं।

उपर्युक्त व्याख्या में हिंदी नवजागरण काल में स्त्रियों की स्थिति को जानने की कोशिश की गई। जिसमें भारतीय नवजागरणकालीन समाज में मुख्यतः ब्रह्मसमाज, प्रार्थनासमाज, आर्यसमाज, रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद के विचारों तथा थियोसॉफिकल सोसाइटी के सिद्धांतों का प्रभाव भी जनजीवन पर पड़ रहा था, और समाज में एक बड़े बदलाव लाने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। आर्थिक, औद्योगिक और धार्मिक क्षेत्रों में पुनर्जागरण की प्रक्रिया आरंभ होने लगी थी। पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली ने शैक्षिणिक क्षेत्र में भी वैयक्तिक स्वतंत्रता की प्रेरणा प्रदान की। स्त्रियों से जुड़ी विभिन्न समस्याएँ जैसे सामाजिक, आर्थिक और राजनितिक समस्याओं को समझने का प्रयास किया गया कि किस तरह स्त्रियाँ एक गुलामी की ज़िन्दगी जी रही थीं। उस समय में भारतन्दु जैसे लेखक भी रूढ़िवादिता से ग्रस्त नज़र आते हैं। साहित्यकार तक नारी के भलाई की बात तो करता था, परन्तु उसे परतंत्र ही रखना चाहता था। लेकिन स्त्रियाँ स्वयं ही अपने अधिकारों की मांग करने लगीं तथा उनके द्वारा पुरुषवादी सत्ता का विरोध भी उस काल में देखने को मिलता है। सती प्रथा, विधवा विवाह, बाल विवाह जैसे अनेकों मुद्दे उस काल के प्रमुख विषय थे जिसने आगे स्त्री मुक्ति के आन्दोलन का रूप लिया।

सन्दर्भ :-

  1. शिशिर, कर्मेंदु (संपादक), ‘हिंदी नवजागरण’ (राधाचरण गोस्वामी), स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली , प्रथम संस्करण 2013, पृष्ठ– 12.
  2. कुमार, राधा, ‘स्त्री संघर्ष का इतिहास’, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2002, आवृति– 2011, पृष्ठ- 23.
  3. यादव, श्रीमती धर्मा, ‘स्त्री विमर्श और हिंदी लेखन’ (लेख), www.strivimarsh.blogspot.in
  4. राजे, सुमन, ‘हिंदी साहित्य का आधा इतिहास’. भरतिय ज्ञानपीठ , नई दिल्ली , चौथा संस्करण– 2011, पृष्ठ-227.
  5. शिंदे, ताराबाई, ‘स्त्री-पुरुष तुलना’, संवाद प्रकाशन, शास्त्रीनगर, मेरठ, प्रथम संस्करण2002, पृष्ठ-8.
  6. तलवार, वीरभारत, ‘रस्साकशी’, (19 वीं सदी का नवजागरण और पश्चिमोत्तर प्रान्त, सारांश प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण 2002, पृष्ठ- 236.
  7. शिंदे, ताराबाई, ‘स्त्री-पुरुष तुलना’, संवाद प्रकाशन, शास्त्रीनगर, मेरठ, प्रथम संस्करण2002, पृष्ठ-8.
  8. डॉ. धर्मवीर(संपादक), ‘सीमंतनी उपदेश’ (एक अज्ञात हिन्दू औरत ), वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम मूल संस्करण 1982, लुधियाना से, वर्त्तमान आवृति-2006, पृष्ठ-44.
  9. डॉ. नगेन्द्र, डॉ. हरदयाल (संपादक), ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 1973, आवृति- 2012, पृष्ठ-439.
  10. शिशिर, कर्मेंदु (संपादक), ‘हिंदी नवजागरण’ (राधाचरण गोस्वामी), स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2013, पृष्ठ – 13.
  11. तलवार, वीरभारत, ‘रस्साकशी’, (19 वीं सदी का नवजागरण और पश्चिमोत्तर प्रान्त, सारांश प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण 2002, पृष्ठ- 42.
  12. वही , पृष्ठ-54.
  13. यादव, श्रीमती धर्मा, ‘स्त्री विमर्श और हिंदी लेखन’ (लेख) www.strivimarsh.blogspot.in
  14. वही
  15. डॉ. नगेन्द्र, डॉ. हरदयाल (संपादक), ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 1973, आवृति- 2012, पृष्ठ-432.

*पीएच.डी., हिन्दी अध्ययन केंद्र

गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय, गांधीनगर

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