सुबह होने को है साहब – सोने का टाइम हो रहा है

देर रात – तक जब नींद नहीं आती
चुपचाप टेरेस में बैठ
दूर तक सुनसान सड़क को देखता हूँ

सड़क के किनारे – वो बिजली के खम्भे
कुछ रोशन और कुछ बुझे बुझे
बड़ा ही अन्धेरा है उन चौराहों पर

वहीं वो रेड़ी वाला भी
अपनी चाय की रेड़ी लगाता था
उसको भी शायद नींद नहीं थी आती

सोचता हूँ – वो लोग ना होते अगर
तो उन घने रात में – देर से लौटते कामगार
स्टेशन की सवारी की बारी की बाद का ऑटो ड्राइवर
वो रिक्शा वाला – या फिर हम जैसे निशाचर
जो सड़कों और फुटपाथ की जिंदगी की
तस्वीर खैंचने का बाद –
एक कप गरम चाय की प्याली
को तरस जाते – कहाँ जाते

सांस को समेटने का वख्त भी ना मिलता
और ना मिलता पल भर भी आराम थके पॉवों को

चाय की सिगड़ी से एक सिगरेट जला कर
हम भी तो पूछते थे – कइसन हो भईया – का हाल है?
और साथ ये भी कहता – चाय बड़ी अच्छी है
वो मुस्कुरा के कहता – अब सुबह होने को है साहब
सोने का टाइम हो रहा है

खैंच के रख ली हैं वो तस्वीरें -उसकी भी
यही एक जरिया है
सालों बाद भी – उन रात के लम्हों और यादों को
अकेले में फिर से जीने का
देर रात तक – जब नींद नहीं आती

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