सारा का सारा समाज ही ढह रहा है : ‘घासीराम कोतवाल’नाटक की प्रासंगिकता का संदर्भ

हरदीप सिंह, प्रोफेसर, 
दूरभाष: 09417717910

‘घासीराम कोतवाल’नाटक को देखते समय अथवा पढ़ते समय दर्शक और पाठक के मन में सहज ही यह बात उतर जाती है कि ‘सारा का सारा समाज ही ढह रहा है, चुक रहा है |’(1) प्रस्तुत शोध पत्र में इसी कथन कि पुष्टि की गई है और विशेष रूप से राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्र में नैतिक मूल्यों के क्षरण का आकलन किया गया है| विजय तेंदुलकर के अनुसार,

“‘घासीराम कोतवाल’एक विशिष्ट समाज स्थिति की ओर संकेत करता है | वह समाज स्थिति न पुरानी है और न नई | न वह किसी भौगोलिक सीमा रेखा से बंधी है, न समय से ही | वह स्थल कालातीत है, इसलिए ‘घासीराम’और ‘नाना फड़नवीस’भी स्थल कालातीत हैं | समाज स्थितियां उन्हें जन्म देती हैं, देती रहेंगी |”(2)

इस विशिष्ट स्थल कालातीत स्थिति को ‘जब्बार पटेल’ने निर्देशक का वक्तव्य में और अधिक स्पष्ट है :

“इस नाटक में घासीराम और नाना फड़नवीस का वयक्ति संघर्ष प्रमुख होते हुए भी तेंदुलकर ने इस संघर्ष के साथ – साथ अपनी विशिष्ट शैली में तत्कालीन सामाजिक एवं राजनैतिक स्थिति का मार्मिक चित्रण किया है। परिणामतः सत्ताधारी एव जनसाधारण की सम्पूर्ण स्थिति पर काल – अवस्थापन के अंतर से विशेष अंतर नहीं पड़ता। घासीराम हर काल और समाज में होते है और हर काल और समाज में उसे वैसा बनाने वाले और बनाकर मौका ताक उसकी हत्या करने वाले नाना फड़नवीस भी होते ही है – वह बात तेंदुलकर ने अपने ढंग से प्रतिपादित की है। ” (3)

इसकी प्रासंगिकता की पुष्टि निम्नलिखित बातों से सिद्ध होती है :-

  1. समाज की अधोगति : आम जनता में झूठ बोलने की प्रवृत्ति:

‘घासीराम कोतवाल ‘नाटक में गिरते हुए मानव मूल्यों को दिखाया गया है। समाज में भोग विलास और व्यभिचार की प्रवृत्ति जब अपने चरम शिखर पर पहुँचती है तो झूठ बोलना आम बात हो जाती है । जिस समाज में लोग कोठे पर जा कर नाच देखने के लिए अपनी घरवालियों से यह कर झूठ बोलते हैं कि हम मंदिर जा रहे हैं उस समाज के नैतिक मूल्यों के पतन का अंदाज़ सहज ही लगाया जा सकता है । एक हिंदी फ़िल्म आई थी जिसमें पुलिस को पुख्ता जानकारी मिलती है कि किसी स्थान पर देह व्यापार का कारोबार चल रहा है । इस जानकारी के आधार पर पुलिस जब वहाँ रेड मरने पहंचती है तो वहाँ सब लोग पहले से ही भगवान् की आरती कर रहे होते हैं । क्योंकि उस देह व्यापार के अड्डे की दीवारों पर पहले से ही धार्मिक चित्रकारी की हुई थी इसलिए पुलिस के आने की सूचना मिलते ही सभी वेश्याएं सर पर पल्लू डाल कर पूजा करने का ढोंग करती हैं । इस नाटक में भी मंदिर जाने का ढोंग करके पुरुष लोग बाबनीखानी के कोठे पर नाच देखने जाते हैं | नाटक के पूर्वार्ध के शुरू में सारे ब्राहम्ण मंदिर जाने के बहाने बावनखनी में गुलाबी का लावणी नाच देखने जाते है, जबकि उनकी पत्नियां घरों में मन मसोस कर रह जाती हैं।

उदाहरण :

“बाम्हन बावनखनी कौं धायौ अरु बाम्हनी घरै रही । बाम्हनी घरै रही, घरई घर में सूल रही । बाम्हनी बात जोवै, आँखिन में रैन नसावै |” (4)

सूत्रधार : ” बावनखनी में बाम्हनी घरें रहबू करै,बाम्हन रमि रह्यौ भजन कीर्तन मैं, जहानम मसान मैं। बाम्हन चितचाव सों दरसन – परसन करैं, तहाँ बाम्हनी वाकी एकांत – सेवन करैं।”

कोठे पर लोग किस प्रकार की चेष्टाएँ करते हैं वह निम्न उधाहरण से स्पष्ट हो जाता है :

‘लोग श्रृंगारिक चेष्टाएँ करते हुए निचली सतह पर उतर आए हैं।’(5) ‘नाच समाप्त होते ही जोर- जोर से सीटियाँ बजाते हैं और पगड़ी उछालते हैं|’(6)

इस प्रकार नाटक में गिरते हुए मानव मूल्यो को दिखाया गया है, यह आम जीवन में नैतिकता के पतनशील समाज का जीवंत चित्रण है |

  1. पुलिस का भ्रष्टाचार, उत्पीड़न और राक्षसी चेहरा-

‘सेवा, सुरक्षा, शांति’; ‘आपके साथ, आपके लिए, सदैव’; ‘courage, care, commitment’, ‘आपकी सेवा में तत्पर’, पोलिस की हक़ीक़त इन आदर्श वाक्यों से कोसों दूर है । आए दिन पुलिस की ज्यादती से आम नागरिकों का सामना होता है । चाहे मामला निजी न्याय पाने का हो या राजनैतिक, पुलिस मानो एक दमनकारी ताक़त के रूप में अपने ज़ालिम बल प्रयोग की साड़ी हदें पार करती हुई नज़र आती है । विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में पुलिस का खौफ इस कदर हावी है कि एक हमदर्द और न्यायपरायण पुलिस का सपना ख़्वाबों सा दूर लगता है ।

पुलिस देश के आम आदमी के साथ कैसा व्यवहार करती है अपने नाटक में विजय तेंदुलकर इसे सिद्धहस्तता से दर्शाते हैं | घासीराम कन्नौज से पूना नगरी में रोज़गार की तलाश में आया एक आम आदमी है जो गलती से पुलिस के हत्थे चढ़ जाता है । पुलिस उस पर चोरी करने का झूठा आरोप मढ़ती है और उसके साथ दुरव्यवहार करती है | इस बात की पुष्टि निम्न उदाहरण से होती है –

“ब्राहम्ण : आदमी नहीं हजूर,जेबकतरा हता। राँड की औलाद, जिसने मेरी दच्छिना चुराए ली। बिसके हाथ झड़ जाएँ,कीड़े पड़े,बिसके मक्खियाँ भिनके,बिसके—“ (7)

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घासीराम का बहुत अधिक अपमान किया जाता है, मारपीट भी की जाती है ‘लहुलुहान घासीराम को दो सिपाही घसीट कर लाते है और पटक देते है।

पहला सिपाही : मर स्साले इसी कुठरिया में –

दूसरा सिपाही : चुप्पचाप ! नहीं तो बना देंगे गठरिया -पुटरिया हड्डियों की। लगाऊँ हरामी की जाँघो के बीच,खस्सी -सा बिबियाएगा स्साला – ‘ (8)

घासीराम को सूअर की औलाद कहकर तिरस्कृत किया जाता है :

“ सिपाही :- चलो स्साला ! चोर कहीं का ,सूअर की औलाद ! फिर कभी इस पवित्तर पुन्न नगरी की तरफ रुख करेगा तो गर्दन उड़ा देंगे,समझा? ले जा काला मूँ हिया से। खबरदार जौ लौट के आया पूना। तेरा साया तक न पड़े इस नगरी पै -चल हट निकल –।“ (9)

पुलिस कर्मियों द्वारा आम जनता का अपमान किया जाता है। किसी भी व्यक्ति को पकड़कर उसे तंग कर मार-पीट करना आदि सब कार्य आज भी होते हैं। अतः यह इस रूप से भी प्रासंगिक प्रतीत होता है।

‘बिला परमिट मुर्दा फूँकना बंद !’(10)

‘नीच जातवारे की रोटी खाना गुन्हाय है — !’(11)

” बिला परमिट खस्सी चीरना, पेट गिराना, खानदानी औरत का छिनाली करना, छिनाल की भड़ुआगिरी करना, बाम्हन का बदकारी करना, कोऊ सो छेड़छाड़ करना, चोरी चपाटी करना, तल्लाकबारी जोरू के साथ घोरबा करना, खसम जीता होय तो यार को घर में घुसाना, अपनी जात छिपाना, जाल सिक्का ढालना, जान देना – सब गुन्हाय है – ” (12)

घासीराम कोतवाल बनने के बाद पूना शहर की परिक्रमा करने लगता है । आम जनता को टोकने, ठोकने, मुश्कें बाँधने, परमिट जांचने का काम शुरू हो जाता है । आम जनता प्रताड़ित होती है । कोई रात को घर से बहार नहीं निकल सकता है :

” घासीराम : कहाँ जा रहा है?

सूत्रधार : ऐसेई सरकार ।

घासीराम : चोरी करने?

सूत्रधार : ने S ई S सिरकार

घासीराम : तो फिर रंडीबाजी करने?

सूत्रधार : नई सिरकार ।

घासीराम : ( तमाचा मारकर ) सच बोल ! ” (13)

औरतों की कोई इज्जत नहीं रहती, महिला उत्पीड़न एक आम बात हो जाती है । एक खानदानी औरत को जबरन घर से बाहर निकाल कर प्रताड़ित किया जाता है :

“ घासीराम : (पैनी आँख से देखकर ) खानदानी हो न ! ( औरत होंठ चबाकर सर झुकाकर ‘हाँ’कहती है )

मंगलसूत्र तो दिखाना । ( वह दिखाती है । ) असली है, या दिखावे का? इसका मालिक यही है या कोई और?”(14)

जहां एक ओर नाना और गौरी रस में आकंठ डूबे हैं वहाँ घासीराम फरमान जरी करता है,

” अपनी बीबी और अपने शौहर को छोड़ कर अगर कोई दीगर मर्द औरतों के साथ रंग खेलता हुआ दिखाई दे तो फ़ौरन हिरासत में ले लो । नैतिकता की रक्षा करनी होगी, हर सूरत में करनी होगी ।” (15)

नाटक में वर्णित सामाजिक स्थिति की अराजकता की इन्तहा तब दिखाई पड़ती है जब किसी की अर्थी की चिता जलाने के लिए भी परमिट माँगा जाता है । और असली परमिट को जाली कह कर झूठ को सच सिद्ध किया जाता है और कहीं भी सुनवाई नहीं होती |

बेगुनाह को चोरी के झूठे आरोप में जेल में डाल दिया जाता है और अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए जबरन अग्नि परीक्षा ली जाती है । यहाँ नाटककार ने पुलिस को क्रूरता की सभी हदें पार करते हुए दिखाया है :

” लाओ जी वो तप हुआ लोहे का गोला । हाथ पकड़ना इसके । कसके । चिल्लाये तो भी न छोड़ना । सिंकने देना पक्का । खाल के जलने की गंध आनी चाहिए, गंध !

ब्राह्मण बिबियाता है …। वह एकदम आर्ट स्वर में चीखता है । गोला छिटकाकर अलग गिराया जाता है । ब्राह्मण लुँज-पुँज होकर गिर पड़ता है, अधमरा-सा । घासीराम यह सब बड़ी दिलचस्पी से देख रहा है, हँस रहा है, मुस्कुरा रहा है, मूँछों पर ताव दे रहा है |” (16) इस तरह पुलिस अपनी कारगुज़ारी दिखने के लिए बेगुनाहों से ज़बरन गुनाह क़ुबूल करवाती है । घासी राम उस ब्राह्मण के दोनों हाथ काट कर पूना शहर के बाहर फिंकवाने का हुकुम जारी करता है । इस तरह घासीराम के खौफ से पूना नगरी थर थर कांपती है |

‘इण्डिया करप्शन एंव ब्राइवरी रिर्पोट’के अनुसार भारत में रिश्वत मांगे जाने वाले सरकारी कर्मचारियों मे 30 प्रतिशत की भागीदारी पुलिस तन्त्र की है। ज्यादातर पुलिस द्वारा रिश्वत प्रथिमिकी  दर्ज करवाने, आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज करने मे कोताही बरतने या मामला न दर्ज करने तथा जाँच करते समय सबूतों को नजरदांज करने सम्बन्धी मामलों मे ली जाती है। रसूखदारों के दबाव मे काम करना तथा अवांछित राजनैतिक हस्तक्षेप को झेलना पुलिस अपना कर्तव्य समझने लगी है। हांलाकि पुलिस तन्त्र की स्थापना कानून-व्यवस्था को कायम रखने के लिये की गई थी तथा आज भी सामाजिक सुरक्षा तथा जनजीवन को भयमुक्त एंव सुचारू रूप से चलाना पुलिस तन्त्र का विशुद्ध कर्तव्य है। इस क्षेत्र में पुलिस को पर्याप्त लिखित एंव व्यवहारिक अधिकार भी प्राप्त है। भारत के राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक विकास, बढती जनसख्या, प्रौद्योगिकी का विकास, अपराधों का सफेद कॉलर होना इन तमाम परिस्थितियों के कारण पुलिस तन्त्र की जबाव देही के साथ जिम्मेदारी भी बढने लगी है। लेकिन भारतीय समाज में पुलिस की तानाशाहीपुर्ण छवि, जनता के साथ मित्रवत ना होना तथा अपने अधिकारी के दुर्पयोग के कारण वह आरोपो से घिरती चली गई। आज स्थिति यह है कि पुलिस बल समाज के तथा कथित ठेकेदारों, नेताओं तथा सत्ता की कठपुतली बन गई है। समाज का दबा-कुचला वर्ग तो पुलिस के पास जाने से भी डरने लगा है पुलिस वर्ग को तमाम बुराइयों तथा कुरीतियों ने घेर लिया है पुलिस में भ्रष्टाचारी और अपराधी करण के कई मामलें हमारे सामान्य जीवन में सामने आते रहते है। चूंकि पुलिस के पास सिविल-समाज से दूरियाँ बनाये रखने और उनके ऊपर असम्यक प्रभाव बनाये रखने की तमाम व्यवहारिक शक्तियाँ है तो साधारण वर्ग आवाज उठाने की जहमत नही रखता। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार में तो पुलिस भर्ती प्रक्रिया में ही भ्रष्टाचार का बढ़ा मामला सामने आया था तथा बिहार में भी आरोप लगे थे कि कुछ अधीनस्थ पुलिस कर्मचारी प्रोन्नति के लिये अपने उच्च अधिकारियों को खुश करने में रिश्वत का सहारा ले रहे थे।

  1. पदलोलुप्ता :
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पदलोलुप व्यक्ति अपने चरित्र से कितना गिर सकता है इसे दिखने के लिए नाटककार ने घासीराम को अपनी फूल सी बेटी को नाना की हवस का शिकार बनाते हुए दिखाया है । वह कोतवाल के पद की प्राप्ति के लिए अपनी बेटी ललिता गौरी का सौदा नाना के साथ करता है | वह पद प्राप्त करने के लिए इस हद तक गिर जाता है कि अपनी बेटी ललिता गौरी को नाना फड़नवीस के आगे चारे के रूप में इस्तेमाल करता है। वह नाना फडनवीस को अपनी बेटी देने के बदले कोतवाल का पद प्राप्त करता है। इस बात की पुष्टि निम्न उदाहरण से होती है –

“घासीराम :’‘ठीक ! श्रीमान,रिआया का मुँह बंद करने के वास्ते मुझे शहर पूना का कोतवाल मुकर्रर कर दें।“ (17)

नाना : कोई और तरकीब बताओ –

घासीराम : तरकीब हो या तरतीब,जो है,यही है; अगर ये नहीं है तो ललिता गौरी भी नहीं है। वो आइंदा आने वाली नहीं है। ‘‘(18)

पदलोलुप्ता की दृष्टि से भी यह नाटक प्रासंगिक प्रतीत होता है क्योंकि आधुनिक समय में भी वयक्ति पद के लालच में किसी भी हद तक गिर जाता है। अपनी बेटी,पत्नी आदि की इज्ज्त की परवाह नहीं करता।

  1. नैतिकता का पतन :

नाना फड़नवीस घासीराम की बेटी ललित गौरी को प्राप्त करना चाहता है। जो कि बहुत ही कम उम्र की है। वह कहता है –

‘अरी, तू हमारे लिए बेटी की तरह है,पडोसी की।’(19)

“हमें तुझ पे प्यार आ रहा है। आहाहा ! ये तुम्हारा शरमाना – जान तुम पर निसार है; ये बन्दा तावेदार है वस्ल का तलबगार हूँ; तेरे इश्क में प्यारी बेकरार हूँ. मुझसे बेकली सही ना जाए, आ ! मेरे सीने से लग जा। ” (20)

वह घासीराम को उस लड़की के विषय में पूछता है कि –

“वो मिलेगी? मिलेगी वो? आह क्या कहने है उस पुख्ता ठोस ईमारत के रे ! तूने देखा था उसे? उभारदार, मुलायम,रसभरी और नरम – ओहोहोहो ! इतनी छुई अंग्रेजी पर ऐसी एक नही। इसकी सानी नहीं रे ! कोन थी?

घासीराम कहता है – ‘कोई हो, हुकुम दे तो खिदमत में पेश कर दूँ।“ (21)

इससे घासीराम के चरित्र की नैतिक पतन दृष्टिगोचर होती है। वह पद प्राप्त करने के लिए अपनी बेटी को ज़रिया बनाता है। वह अपने बारे में कहता भी है –

” गौर से देखो, कैसे अपनी लाड़ली बेटी ललिता गौरी को इस दरिन्दे की दावत बनाया है मैंने देखो इस बाप को, जो अपनी पेटजोई बेटी से पेशा करता है। देख लो, कैसे मेरी बिटिया हरजाई हुई जाती है। वो ठूँठ खूसट देखो; कैसे उसकी नरम जवानी को चीथ – चीथकर चांभ रहा है। – थूको- मुंझ पे – मेरे मूँ में पेशाब करो ! चीर के दो कर दो मुझे – मगर मैं छोड़ूगा नहीं। इस पूना शहर में सूअर का राज कायम कर ही दम लूँगा।

” घर फूँक तमाशा देखो, सब लोग ताली बजाओ, ताली बजाओ।” (22)

इस प्रकार बदले की भावना घासीराम को इस कदर अँधा कर देती है कि वह सही – गलत सब जानते हुए भी अपनी बेटी को नाना के हवाले करता है। आज भी इसी प्रकार नाना एवं घासीराम जैसे अनेक वयक्ति है जो इस प्रकार के कार्य करते है नैतिकता का पतन आज भी उसी स्तर पर हो रहा है जैसा पहले हुआ करता था, अतः इस पक्ष से भी यह नाटक प्रासंगिक प्रतीत होता है।

5- राजनेताओं की कामवासना का खुला चित्रण :

नाना आज के राजनेता का प्रतीक है क्योंकि आज भी भारत के कितने ही राजनेता बलात्कार और नारी के शोषण के आरोप में जेल में सजा भुगत रहे हैं लेकिन सजा पाने वालों की संख्या आटे में नमक जितनी है | इस नाटक में नाना की छह पत्नियां होती है। फिर भी वह कम उम्र की ललिता गौरी को अपनी अवश हवस का शिकार बनाता है और अंत में उसे मार देता हैं फिर वह सातवां विवाह करवाता हैं:

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यों तो नाना कर चुके छै शादियां,

किस्मत बुरी फलती नहीं छै बीबीयाँ

करना पड़ा है सातवां उनको वियाह

दिल नहीं भरता करें क्या, आह ! (23)

नाना की कामुतरता का इन पंक्तियों से पता चलता है –

उदहारण – ‘‘नाना की वधु एक किनारे कांपती हुई खड़ी हैं।

नाना सदरी उतारता है। कुरते की बांह मोड़ता है।

कामातुर है। वधु के पास जाकर छेड़छाड़ करता है। वह बहुत

डर जाती है। ‘‘(24)

नाना ‘’आऒ प्यारी,आऒ / हमारे पास आऒ, हमारे पहलू में समा

जाओ। (वह नजदीक नही आती ) कितना इंतज़ार कराओगी? वह डर

जाती है,ऒहों,तुम तो बेवजह शरमाती हो,यकीनन हम पै बिजलियां

गिराती हो। नाजुक बदन हो,लाज क्यों ओढ़े फिरो? हटाओ भी

,उतारकर अलग कर दो। ‘‘(25)

6- कुटिल राजनीती की दुनाली बंदूक

घासीराम कोतवाल नाटक नेताओं की धूर्त्तता की अद्भुत मिसाल पेश करता है । राजनेता अपना उल्लू सीधा करने में कितने माहिर हैं यह घासीराम कोतवाल नाटक से सिद्ध हो जाता है । इस सम्बन्ध में नाटक के पूर्वार्ध के अंत में नाना का निम्नलिखित कथन किसी व्याख्या की अपेक्षा नहीं रखता;

“ जाS, घसियारे, कल के छोकरे, तुझे बना दिया हमने कोतवाल ! जाS, नंगा होक नाच, बजा गाल, मगर इस नाना की चाल तू नहीं जानता । अरे मरदूद ! हमने भरी है बंदूक, राजनीतिवाली, दुनाली । पहले धमाके में चित्त हो जाएगी लज़ीज़ लौंडिया तेरी; दूसरे धमाके के साथ नाच उठेगी पुण्यनगरी पूरी । अबे घसिये ! तू बाहरी, परदेसी, हमने तुझे बख्शी है याँ की सबसे ऊंची कुर्सी । जानता है क्यों? ताकि तमाम साजिशें खुद ब खुद कट जाएं, बलबाईयों की धज्जियाँ उड़ जाएं ! अव्वल तो तुम उनमें शामिल हो नहीं सकते, हो भी जाओ तो काबिले एतबार नहीं हो सकते । क्यों? तुम बाहरी आदमी हो, हमारी दहलीज़ के टुकड़खोर कुत्ते हो । तुम्हरी जंजीर हमारे हाथ होगी; तुम्हें भी तो हमारी जरूरत होगी । घासीराम तुम चित्तपावन बम्हनों से बढ़कर ऐंठू होंगे, रॉब गांठोगे, धाक जमाओगे । पुख्ता बंदोबस्त करोगे, यों हमारी फ़िक्र मिटाओगे । हमारी गलतियां, भूलें तुम्हरे नाम होंगी, हम महफूज़ रहेंगे बदनामियाँ तुम्हरी होंगी । करने को हम भुगतने को हमारा कोतवाल |”

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नाटक के अंत में घासीराम के वध का हुकुम पुलिस एनकाउंटर जैसा है –

“ घासीराम का सर मूंड कर सिन्दूर छिड़का जाएगा । उसके बाद ऊँट पै उल्टा बिठाके जुलुस निकला जाएगा, पस्चात हाथी के पाँव से बांधकर घुमवाया जाएगा और सबके अंत में सूली पै चढ़ाया जाएगा |” (27)

इसके बाद नाना का सम्बोधन, ” इस पापी घासीराम की लाश को यहीं पड़ी रहने दो, सड़ने दो । गिद्धों को, कुत्तों को उसे चीथने दो । कीड़ों को खाने दो । उसकी लाश को जो उठाएगा उसे सख्त सजा दी जाएगी |….. इसलिए आज से, अभी से, तीन दिन तलाक शहर पूना में जश्न मनाया जाए, उत्सव मनाया जाए । यह हमारी आज्ञा है – ! ” (28)

निष्कर्ष रूप में यह सामने आता है कि आज के समाज में नाटक लिखने के समय से कोई फर्क नहीं आया है और ही घासीरामों की संख्या और ननाओं की संख्या में तीव्र वृद्धि हो रही है । समाज में तमोप्रधान वृत्तियों का बोलबाला है । ऐसा लगता है कि ईश्वर नहीं अपितु भ्रष्टाचार सर्व व्यापक है । हवा में कामवासना की तीखी ज़हरीली गंध व्यापक है । राजनेताओं की आँखों पर धृतरास्ट्र की तरह पट्टी बंधी है । जिस समाज स्थिति का अंकन तेंदुलकर ने एक अंकुर के रूप में प्रस्फुटित किया था वह अब कलकत्ते के बनियान ट्री की तरह फ़ैल गई है जिसकी जड़ें खोजने का कार्य अब असम्भव है । आज एक दिन भी ऐसा नहीं होता जब कोई दुष्कर्म या किसी भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ नहीं होता । यह स्थिति बहुत ही चिंताजनक है । इसी के लिए कहा गया है कि ‘विनाशकाले विपरीतबुद्धि विनश्यन्ति ‘

references

  1. ज़ब्बार पटेल, निर्देशक का वक्तव्य, घासीराम कोतवाल, अनुवादक वसंत देव, नई दिल्ली : विद्या प्रकाशन, 2004, पृष्ठ 8
  2. विजय तेंदुलकर, घासीराम कोतवाल, अनुवादक वसंत देव, नई दिल्ली : विद्या प्रकाशन, 2004, पृष्ठ 6
  3. ज़ब्बार पटेल, निर्देशक का वक्तव्य, घासीराम कोतवाल, अनुवादक वसंत देव, नई दिल्ली : विद्या प्रकाशन, 2004, पृष्ठ 7
  4. विजय तेंदुलकर, घासीराम कोतवाल, अनुवादक वसंत देव, नई दिल्ली : विद्या प्रकाशन, 2004, पृष्ठ 30
  5. वही, पृष्ठ 30
  6. वही, पृष्ठ 30
  7. वही, पृष्ठ 39
  8. वही, पृष्ठ 39
  9. वही, पृष्ठ 41
  10. वही, पृष्ठ 57
  11. वही, पृष्ठ 58
  12. वही, पृष्ठ 58
  13. वही, पृष्ठ 60
  14. वही, पृष्ठ 63
  15. वही, पृष्ठ 65
  16. वही, पृष्ठ 71
  17. वही, पृष्ठ 52
  18. वही, पृष्ठ 52
  19. वही, पृष्ठ 45
  20. वही, पृष्ठ 45
  21. वही, पृष्ठ 46
  22. वही, पृष्ठ 48-49
  23. वही, पृष्ठ 77
  24. वही, पृष्ठ 79
  25. वही, पृष्ठ 79-80
  26. वही, पृष्ठ 53
  27. वही, पृष्ठ 95
  28. वही, पृष्ठ 98
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