‘वैकल्पिक विकास में जैविक कृषि की भूमिका’

*आशीष कुमार

सारांश

संसाधनों के उपयोग द्वारा आजीविका की आवश्यकताओं की पूर्ति करना ही विकास होता है। समाज में व्याप्त बेरोजगारी और पलायन की समस्या के समाधान की आज आवश्यकता है। भारतीय कृषि पद्धति में सदैव ही जल, जंगल, जमीन पर महत्व दिया गया है। वैकल्पिक विकास में जैविक कृषि के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है। जिस प्रकार से जैविक कृषि में रोजगार के नए-नए सृजन हो रहे है। जैविक कृषि में लागत कम तथा उत्पादन अधिक प्राप्त होता है। उत्पादों में गुणवत्ता अधिक होने कारण अनेक प्रकार की बीमारियों से बचाव होता है। इससे किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार आता है। पिछले कुछ वर्षों में तो जैविक कृषि क्षेत्र में लगातार बढ़ोत्तरी भी दर्ज की गई है। यही स्थिति रही तो आने वाले समय में जैविक कृषि रोजगार का महत्वपूर्ण साधन होगी। इस प्रकार कहा जा सकता है कि जैविक कृषि की वैकल्पिक विकास में अहम भूमिका होती है।

की-वर्ड : जैविक कृषि, बाजार, वैकल्पिक विकास, कृषि क्षेत्र।

भूमिका

भारत कृषि प्रधान व ग्राम्य प्रधान देश है। इसकी आत्मा गांवों में बसती है। और गांव का विकास कृषि पर निर्भर रहता है। भारत देश की लगभग 70% जनसंख्या गांवों में निवास करती है। (2011 की जनगणना के अनुसार) हालांकि इस आंकड़े में वर्तमान में कुछ कमी आई है इसका कारण है तेजी से हो रहा शहरीकरण। इसके बावजूद देश का समुचित विकास बिना कृषि के संभव नहीं है। कृषि को बेहतर और वैकल्पिक विकास में सहायक हो इसके लिए एक सुनियोजित कृषि पद्धति की आवश्यकता है। जैविक कृषि ऐसी पद्धति है जिसमें समग्र लाभ (कृषकों की दृष्टि से, पर्यावरण की दृष्टि से, मृदा की दृष्टि से, मानव की दृष्टि से) अर्जित हो जाते हैं। जैविक कृषि पद्धति से कम लागत में अधिक उत्पादन प्राप्त होता है। जैविक उत्पादों की बाजार में मांग अधिक होती है, जैविक उत्पादों की कीमत रासायनिक उत्पादों की अपेक्षा अधिक प्राप्त होती है। जब कृषि में उत्पादन अच्छा प्राप्त होता है, तथा कीमत अधिक मिलती है तो किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार आता है। जिससे किसी भी देश के विकास में गति प्रदान होती है। स्वास्थ्य लाभ के साथ जैविक कृषि में कम लागत आती है। कम लागत और अधिक उत्पादन से किसान समृद्ध होता है तो गांव का विकास होता है। इस प्रकार गांव के विकास से देश के वैकल्पिक विकास में सहायता प्राप्त होती है। अतः किसी भी देश के आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए सबसे पहले गांव और गांव के किसानों को विकसित करने की आवश्यकता होती है। क्योंकि गांव का विकास ही देश के वास्तविक विकास को प्रदर्शित करता है। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका का प्रमुख साधन कृषि है, इसके बारे में महात्मा गांधी ने एक बार कहा था कि “भारत की वास्तविक प्रगति का तात्पर्य शहरी औद्योगिकरण केंद्रों के विकास से नहीं, बल्कि गांवों के विकास से है।”

“मिट्टी की जुताई करने वाले ही अधिकार के साथ जीते हैं, शृंखला के शेष लोग उनके आश्रय की रोटी खाते हैं”। (थिरूवलूवर)

वैकल्पिक विकास की आवश्यकता

सतत विकास “वह विकास है जो भविष्य की आने वाली पीढ़ियों की क्षमताओं और बेहत्तरी से समझौता किए बिना वर्तमान समय की आवश्यकता को आसानी से पूरा किया जा सके, दूसरे शब्दों में कहा जाए एक ऐसा आर्थिक विकास जिसमें हमारे प्राकृतिक संसाधनों को किसी प्रकार की हानि न पहुंचाई जाए या प्राकृतिक संसाधनों के बर्बाद होने की गुंजाइश ना के बराबर हो”।

किसी भी देश के सतत विकास के लिए या वैकल्पिक विकास के लिए ग्रामीण विकास सबसे अनिवार्य होता है। ग्रामीण विकास की आवश्यकता इसलिए महसूस की गई क्योंकि भारत की ज्यादातर जनसंख्या गांवों में निवास करती है। इसलिए ऐसे विकल्पों की आवश्यकता थी जिससे ग्रामीण लोग समाज के साथ सामंजस्य बिठा सके। भारत जैसे देश में समतामूलक समाज की अवधारणा का विकास हो सकता है। एक तरफ जहां गांव में निवास करने वाले लोगों की खुशहाली एवं विकास जरूरी है वही प्राकृतिक संसाधनों का सदुपयोग एवं संरक्षण भी बहुत आवश्यक है।

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गांधी जी जब भी विकास की बात करते हैं उनकी बातों के केंद्र में हमेशा गांव रहा है गांव के विकास व गांव के पुनर्निर्माण की बात को मुख्य मुद्दा मानते थे गांधीजी भी मानते थे कि गांव के विकास के बिना भारत देश का विकास संभव नहीं है इसलिए गांधीजी आदर्श गांव की मांग करते हैं और भारत के हर गांव को आदर्श ग्राम बनाने की अपनी मंशा भी जाहिर करते हैं। हरिजन सेवक में 1926 में वह इसको लेकर लिखते हैं “ग्रामीणों श्रम के इस प्रकार उठ जाने से ग्रामवासी कंगाल हो रहे हैं और अमीर लोग अमीर हो रहे हैं अगर यह क्रम ऐसे ही चलता रहा तो किसी प्रत्यय के बगैर ही गांवों का नाश हो जायेगा।”

प्राचीन काल से ही भारत कृषि प्रधान देश रहा है और यहां के लोग सदैव प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर रहते आए हैं। भारत में आज भी प्रकृति की पूजा का विधान है जिसका जिक्र वेद पुराणों के साथ-साथ अनेक रचनाओं में भी किया गया, परंतु जिस प्रकार से पिछले कुछ दशकों में प्रकृति के साथ लूट मचा रखी गई है और सतत विकास के महत्व को बिल्कुल ही नकार दिया गया है, मौजूदा पीढ़ी सिर्फ प्राकृतिक संसाधनों की रखवाली है और यह उसकी जिम्मेदारी भी है कि वह आने वाली पीढ़ी को बिना किसी प्रकार के हानि पहुंचाए यह प्राकृतिक संपदा अगली पीढ़ी को सौंपे और देश को एक बेहतर भविष्य प्रदान करें इस जिम्मेदारी को हम सबको मिलकर उठाना होगा और एक संकल्प के साथ आगे बढ़ना होगा।

सच्चिदानंद सिन्हा के अनुसार- “वैकल्पिक विकास के मॉडल की बात करना आज उसी तरह अर्थहीन है जैसे कभी यूटोपिया की बात करना समाजवादी आंदोलन के प्रारंभिक काल में था। कोई भी व्यवस्था सामने की हकीकत के संदर्भ में ही बनती है बनी बनाई कल्पना के अनुरूप नहीं”।

जैविक खेती एवं वैकल्पिक विकास

इसमें किसी भी भारतवासी को संदेह नहीं होना चाहिए कि भारत देश के विकास के लिए ग्रामीण विकास और कृषि विकास सबसे आवश्यक है। इसका प्रमुख कारण है भारत एक कृषि प्रधान व ग्राम प्रधान देश है। यहाँ लोगों की आजीविका का साधन मुख्य रूप से कृषि है। अतः ग्रामवासी जैविक कृषि को अपनाकर बहुत सी समस्याओं का सामना उचित प्रकार से कर सकते है। जनसंख्या में लगातार जिस प्रकार से बढ़ोतरी हो रही है। उससे जैविक कृषि पद्धति में खाद्यान्न समस्या का सामना करना पड़ सकता है ऐसा अनुमान बहुत से समाज शास्त्रियों और अर्थशास्त्रियों का है। जबकि यह एक भ्रम के शिवाय कुछ नहीं है। साथ ही अक्सर यह भी सुना जाता है कि जैविक कृषि कम उत्पादन देती है, लागत अधिक आती है। जबकि जैविक कृषि खाद्य समस्या से जुड़ी प्रत्येक समस्या का एक बेहतर विकल्प है। जैविक कृषि से जलवायु परिवर्तन में स्थिरता प्राप्त होती है। जैविक कृषि पानी की कमी को दूर करती है, मृदा की जल धारण क्षमता का विकास करती है, किसानों की गरीबी और कुपोषण जैसी समस्याओं का समाधान करती है। अतः जैविक कृषि से संबंधित पहलुओं और मिथकों पर विस्तार से चर्चा करने की आवश्यकता है। यह एक बेहतर विकल्प साबित हो सकती है वैकल्पिक विकास में। आवश्यकता है इसे सुनियोजित तरीके से अपनाने की।

जैविक खेती का परिदृश्य

आज विश्व के लगभग 181 देशों में 698 लाख हेक्टेयर भूमि पर जैविक खेती की जा रही है। पूरे विश्व में जैविक कृषि किसानों की संख्या 30 लाख के आसपास है। अगर भारत देश में जैविक कृषि के विस्तार की बात की जाए तो बीते कुछ वर्षों में बहुत तेजी से हुआ है। वर्ष 2017-18 में लगभग 36 लाख हेक्टेयर में प्रमाणित जैविक कृषि क्षेत्र था। 2017-18 में 17 लाख टन जैविक उत्पादों का उत्पादन किया गया। इस उत्पादन के मुख्य सहयोगी राज्य रहे, सिक्किम, असम, मध्य प्रदेश, केरल, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक आदि राज्य थे। वर्तमान में भारत से जैविक उत्पादों का निर्यात भी किया जा रहा है। इससे निश्चित तौर पर वैकल्पिक विकास में सहायता प्राप्त होगी और भविष्य में जैविक कृषि क्षेत्र को बढ़ावा मिलेगा।

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इस सत्य से नकारा नहीं जा सकता है कि विश्व को जैविक कृषि भारत की देन है और जब भी जैविक कृषि का इतिहास टटोला जाएगा तो भारत और चीन ही इसके केंद में आएंगे। भारत और चीन की कृषि परंपरा 4000-5000 वर्ष पुरानी है। इस कारण यहां के किसानों का ज्ञान भी लगभग 5000 वर्ष पुराना है। जब से कृषि का आरंभ हुआ है तभी से भारत में खेती का स्वरूप मानव स्वास्थ्य के अनुकूल तथा प्राकृतिक वातावरण के लिए हितकारी हो इसका विशेष ध्यान रखा गया है। जब इन सभी विषयों पर ध्यान रखकर कृषि की जाती है तो जैविक और अजैविक पदार्थों के बीच आदान-प्रदान निरंतर चक्र चलता रहता है। जिसके कारण जल, मृदा, वायु तथा वातावरण प्रदूषित नहीं होता है।

भारतीय कृषि के इतिहास को देखने से पता चलता है कि यहाँ कृषि के साथ-साथ गोपालन भी किया जाता था जिसके प्रमाण हमारे धर्म ग्रंथों से प्राप्त होते हैं। महाभारत में वर्णित श्री कृष्ण और बलराम जिन्हें गोपाल वह हलधर के नाम से संबोधित किया जाता है। परंतु जैसे-जैसे कृषि का परिवेश बदलता गया वैसे-वैसे गोपालन भी कम होता गया तथा रासायनिक खादों और जहरीले कीटनाशकों के प्रयोग को महत्व बढ़ गया। जिसके कारण संपूर्ण विश्व के जैविक और अजैविक पदार्थों का संतुलन बिगड़ता गया। इसके परिणाम वर्तमान में सभी के सम्मुख हैं।

भारत में जैविक कृषि से रोजगार की संभावनाएं

आज भले ही देश के सीमित कृषि क्षेत्र में जैविक खेती की जा रही हो। परंतु यह संभव है कि आने वाले कुछ वर्षों में देश की कृषि योग्य मृदा पूर्ण रुप से जैविक कृषि में परिवर्तित हो जाए। क्योंकि खाद्य सुरक्षा की निरंतरता बनाए रखने के लिए परंपरागत कृषि पद्धति भी आवश्यक है। आज कुछ खास क्षेत्रों में ही जैविक कृषि की जा रही है। लेकिन समय के साथ इसको बढ़ावा मिलेगा। जैविक कृषि का यही बढ़ावा एक तरह के रोजगार का अवसर उत्पन्न करता है। आने वाले समय में जैविक कृषि से संबन्धित रोजगार के अवसर कुछ इस प्रकार होंगे-

  • जिस प्रकार से जैविक कृषि को विश्व भर में बढ़ावा मिल रहा है उसके अनुसार बीजों की उपलब्धता में कमी है। इसलिए किसान बीजों का उत्पादन कर अच्छी कीमत पर बेच सकते हैं। इससे किसानों की आय में वृद्धि होगी साथ ही रोजगार की भी प्राप्ति होगी। जिससे रोजगार के और नए अवसर उत्पन्न होंगे।
  • जैविक रेस्टोरेंटस खोलना, जैविक कृषक पाठशाला चलाना आदि।
  • जैविक फार्म तथा प्राकृतिक रूप से रखरखाव के स्थानों पर इको भ्रमण में लोगों की रुचि बढ़ रही है जहां लोग जैविक खाद्य पदार्थ आदि व्यवस्थाओं को पसंद करते हैं। भारत में जैविक कृषि फार्म भ्रमण का प्रचलन बढ़ रहा है।
  • जैविक कृषि संबंधी समझ विकसित करने के लिए विशेष कौशल विकास केंद्र खोले जा सकते हैं।
  • जैविक कृषि में बाजार अनुसंधान, उपभोक्ता सर्वे, प्रीमियम मूल्य, सरकारी प्रोत्साहन कार्यक्रम आदि कि सूचना कृषकों तक जल्दी पहुंचाने के लिए विशेषज्ञ सेवाओं की जरूरत है। इच्छुक एवं निपुण व्यक्तियों के लिए यह एक नया एवं अच्छा व्यवसाय हो सकता है।
  • जैविक दूध संबंधी उत्पादों के क्षेत्र में व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से रोजगार के नए अवसर उत्पन्न किए जा सकते हैं।
  • जैविक कृषि की अच्छी समझ रखने वाला व्यक्ति या संगठन एपीडा से प्रशिक्षण प्राप्त कर जैविक कृषि क्षेत्र में सेवादाता का कार्य कर सकते हैं।
  • जैविक रूप से उत्पादित वस्तुओं के प्रमाणीकरण में भी अनेक व्यक्तियों को रोजगार प्राप्त होगा।
  • जैविक कृषि में फसल चक्र को अपनाया जाता है इससे कृषि क्षेत्र में वर्ष भर रोजगार के अवसर बने रहते हैं।
  • ग्रामीणों को जैविक कृषि पद्धति के उपयुक्त प्रशिक्षण दिए जाएं जिससे उनके कौशल का विकास हो। तथा बाद में इसी कौशल से किसान रोजगार के नए अवसरों का सृजन कर सकें।
  • जैविक कृषि में अनेक प्रकार की जैविक खादों का प्रयोग होता है, इन खादों के उत्पादन कार्यों से रोजगार के अनेक नए सृजन होते हैं।

जैविक कृषि के उत्पादों की गुणवत्ता

यह तो सर्वविदित सत्य है की जैविक कृषि उत्पादों की गुणवत्ता रासायनिक कृषि उत्पादों की गुणवत्ता से अधिक होती है। अनेक अनुसंधान से भी यह सिद्ध हो गया है। जैविक कृषि से उत्पादित उत्पादों में शुद्ध पदार्थ, खनिज और ऑक्सीकारक विरोधी तत्व पाए जाते हैं। जो मानव स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में सहायक सिद्ध होते हैं। जैविक कृषि उत्पादित वस्तुओं में अम्लीय तत्व कम मात्रा में प्राप्त होते हैं, नाइट्रेड की मात्रा रासायनिक कृषि की अपेक्षा जैविक कृषि में 50% कम होती है जो मानव और पशु-पक्षियों के स्वास्थ्य के लिए हितकारी होती है। जैविक रूप से उत्पादित उत्पादों में स्वाद अधिक होता है। इस प्रकार यह प्रमाणित हो चुका है कि जैविक कृषि उत्पाद रासायनिक कृषि उत्पाद से बेहतर और लाभकारी है।

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निष्कर्ष-

भारत प्राचीन काल से कृषि प्रधान देश रहा है, यहाँ पर परंपरागत कृषि या जैविक कृषि प्रारम्भ से होती आ रही है। वर्तमान समय में जैविक कृषि वैकल्पिक विकास में अहम भूमिका का निर्वहन कर रही है, जहां एक तरफ जैविक कृषि के माध्यम से नए-नए रोजगार का सृजन हो रहा है, वहीं जैविक कृषि से उत्पादित उत्पादों की गुणवत्ता रासायनिक कृषि की अपेक्षा श्रेष्ठ होती है। जिससे मानव, पर्यावरण और मृदा स्वास्थ्य के लिए बेहतर है। जब सभी क्षेत्रों में उचित वृद्धि होती है तो वैकल्पिक विकास को एक प्रकार की गति प्राप्त होती है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि जैविक कृषि वैकल्पिक विकास में सहायक होती है।

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* पी-एच.डी. (शोध छात्र)

गांधी एवं शांति अध्ययन विभाग

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय

वर्धा, महाराष्ट्र- 442001

E-mail: ashishpatel3135@gmail.com

Mob. 9839853135

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