Home साहित्य कविता वसुंधरा वंदन: विश्वरुप साह ‘परीक्षित’

वसुंधरा वंदन: विश्वरुप साह ‘परीक्षित’

वसुंधरा वंदन: विश्वरुप साह ‘परीक्षित’
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  1. **वसुंधरा वंदन**
    तिरंगें में रंगा है जन,
    तन,मन और जीवन।
    कोटि-कोटि नमन तुम्हें,
    हे! वसुंधरा जग वंदन।।
    नील गगन कृति गाए,
    मधुर मलय ध्वजा लहराए।
    यश की गाथा गान सुनाए,
    गीत-राग में वन्दे मातरम।
    कोटि-कोटि नमन तुम्हें,
    हे! वसुंधरा जग वंदन।।
    हिमालय बन रक्षक प्रहरी,
    सागर निशदिन चरण पखारे।
    अविरल,कल-कल गंगा धारा,
    तुम्हारे मंत्र का स्वर पुकारे,
    माँ! तुम्हारे पद धूलि से,
    मैं करूं तिलक चंदन।
    कोटि-कोटि नमन तुम्हें,
    हे!वसुंधरा जग वंदन।।
    सिंह की दहाड़ कानों में पड़ते ही,
    रोम-रोम में जोश जगे।
    हुंकार भरी बदरी ,
    जब जब प्रलयंकर राग रचे,
    मानो तेरे लोचन में लग रही हो अंजन।
    कोटि-कोटि नमन तुम्हें,
    हे! वसुंधरा जग वंदन।।
    कोटि-कोटि नमन तुम्हें,
    हे!वसुंधरा जग वंदन।

विश्वरुप साह ‘परीक्षित’

भारत के पश्चिम बंगाल प्रान्त से एक नवोदित कवि

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