याद तो होगी आपको
उन दिनों की लम्हे
तितलियों जैसी
पंख फैलाए दूर-दूर
नीले गगन से उडकर
रंग-बिरंगे फूलों की
वादियों में खोजाना ।

याद तो होगी आपको
हम दोनों की नैन में नैनों को
अपलक डूबकर
खो गए थे
सपनों की दुनिया के
काल्पनिक भावनाओं में
जहाँ से लौट भी आ नहीं पाए हम ।

याद तो होगी आपको
मधुर होंठ की जादुई मुस्कान से
हमें मदहोश कर दी थी
मधुशाला की मदिरा नशे जैसे
कहाँ लौटा होश आजतक
इतने दिनों से ।

याद तो होगी आपको
हमने लिखीं थी
कितनी कविताएँ
आपके खातिर
जमीन से लेकर
चाँद पर बैठाया था हमने ।

मनजीत मोहन ‘मयंक’

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