मज़दूर की मज़दूरी….

मुझे सूरज नहीं
अलार्म नहीं
कोई बांग व आजाननहीं साहेब…
मुझे तो मेरी भूख जगाती हैं !

सूरज तो बस मेरे चमड़े पर
कोड़े बरसाकर चला जाता हैं
मौसम भी तो मुझे ही आजमाते हैं
अपने हर कोहराम से मुझे ही…

मेरे दिन की शुरुवात
काली चाय से होती हैं
बच्चों के होठों पर उगते हुए प्रश्न
को दफना कर ही कहीं
निकल पाता हूँ किसी दिहाड़ी पर…

बनाता हूँ इमारात के लिए मसाला….
पर ये मसाला सीमेंट से ही थोडा कड़क बनता हैं !!
अजी मैं घुट-घुट कर
घोटता हूँ जो इसमें
इसमें अपने अधूरे सपने !
पत्नी की दहलीज पर धरी आँखे
..और बेटी की शादी का लाल जोड़ा
तब जाकर कहीं !!
कंकड़ और सीमेंट में सम्बन्ध बनता हैं
फिर धरता हूँ ईट
जिसका सुर्ख रंग चूस लेता हैं
मेरे सपनों को
मेरे जिंदगी में केवल तारीख बदलती हैं
मेरे दिन नहीं !!

ईटों से दीवार बनती हैं
और दीवारों से नया घर
पर ये बढती हुई दीवारे मेरे किरदार को
बौना बनाती जाती हैं….

हर रोज़ खाली टिफिन में भर लेता हूँ …
अपनी बेबसी और लाचारी को
मेरी दिहाड़ी रोज़ तुलती हैं
बनिए के तरुजू में
जिसके बाद भी भूख बड़ी बेरहमी से
मेरे परिवार को बरीबी के
सिल्बटे पर पिसती हैं !!
यही तो मजदूरी हैं मेरी
भूख-भूख और…..
सिर्फ बेरहम व बेशर्म भूख

कटे हाथ ही तो मजूरी मिली थी
मुझे ताजमहल बनाकर भी !!
अजी जनाब आप नहीं जानते हैं अरे छोडो….

क्योंकि हमारी गरीबी में तो
ताजमहल के समय से छेद हैं
जिसमे से झांकते हैं
हमारे समाज के जिम्मेदार लोग
तेपथ्य के उस
तरफ खड़े होकर

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पंकज कुमार ‘वेला’ उर्फ़ दशकंठी’देशद्रोही’
एम.फिल. गाँधी और अहिंसा अध्ययन विभाग,
महात्मा गाँधी अन्तर्राष्टीय हिंदी विश्वविद्यालय
वर्धा,महाराष्ट्र.
सत्र:-2019-21

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