हिमकर श्याम की कविताएं /लक्ष्मीकांत मुकुल

“युद्धरत हूँ मैं” युवा कवि हिमकर श्याम का एक बहुरंगी कविता संकलन है, जिसमें कविता लेखन की विविध शैलियों प्रयुक्त हुई हैं – गीत, गजल, छंदबद्धता, अलंकारिकता, मुक्तक, दोहे एवं गद्य कविताएँ। ये सभी कविताएँ कवि के अवसाद ग्रस्त मन के विभिन्न कोणों में उत्पन्न मनोगत द्वंद, जीवन के संघर्ष एवं सामाजिक यथार्थ से टकराती हुई मानसिक संवेदनाओं को कविता के माध्यम से प्रकट करती हैं। कवि तमाम शारीरिक-मानसिक-सामाजिक पीड़ाओं को आत्मसात करता हुआ दुनिया को और अधिक खुशहाल, समृद्धि और संवेदनशील होने की कामना करता है। कविता के माध्यम से कवि अपनी अर्जित ज्ञानात्मक पूंजी को समाज में बांटना चाहता है। अपनी कठिनाइयों, अपने दुखों, अपने अभावों को अपने स्वत्व में समेटत हुआ अपने सर्वोच्च उत्स को दुनिया के साथ साझा करना चाहता है। यही इन कविताओं का प्रेरक संदर्भ है।

शमशेर अपनी एक कविता में कहते हैं कि – ‘काल तुझसे होड़ है मेरी’। कवि हिमकर श्याम अपनी कविताओं के द्वारा अपराजित योद्धा की तरह कविता- कथनों को इसी प्रकार प्रकट करते हैं। पेशे से पत्रकार, स्वभाव से कवि और शारीरिक रूप से कैंसर जैसे विषाक्त रूप से लड़ती उनकी काया और हृदय में पसरा उनका कवि मन कविता सृजन, कविता वाचन को एक औषधि के रूप में अपनाता है। हिंदी के वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने अपनी एक कविता में कहा है कि – ‘पंछियों के उड़ान में शामिल होते हैं पेड़, क्या मुसीबत में भी कविताएँ होंगी हमारे साथ?’ परंतु सच तो यह है कि हिमकर श्याम की कविताएँ फलीभूत हुई हैं, उनका आत्मबल बढ़ा है, उनकी जिजीविषा विस्तार पायी है और उनके तन-मन पर इसका सार्थक एवं सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

हिंदू धर्म शास्त्रों में एक कथा आती है कि कि कभी मारकंडेय नामक एक ऋषि हुए थे, जिन्होंने मृत्यु पर विजय प्राप्त करने के लिए महामृत्युंजय नामक एक मंत्र कविता का सृजन किया था, जिसके अद्भुत वाचन से वे स्वयं मरण क्रिया पर जीत ही नहीं हासिल किए थे, अपितु ब्रह्मापुत्र राजा दक्ष के शाप से शापित चंद्रमा को भी मृत्यु की सेज से जिंदा कर पाए थे, दूसरी ओर दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य के पास ऐसी संजीवनी विद्या थी, जिससे वे मर चुके अपने शिष्यों को जीवित कर चंगा कर देते थे। पुराण वर्णित ये कथाएँ हमें सुनने में भले ही अतिशयोक्ति पूर्ण लगे, परंतु हिमकर श्याम की कविताओं से गुजरते हुए वे पूरी कथाएँ सच के करीब प्रतीत होती हैं। कवि की ये कविताएँ महामृत्युंजयी बोध की कविताएँ हैं -अपने को सार्थक मनुष्य बनाने और दुनिया को सर्वथा जीवंत, गतिशील और उदार बनाए रखने को संकल्पित…! तो वहीं ये कविताएँ संजीवनी का कार्य भी करती हैं, पाठकों के मर्म को और ज्यादा उद्वेलित एवं उसे झकझोरती हुई।

विश्व कविता के प्रमुख नाम पाब्लो नेरुदा भी कैंसर की रोग से पीड़ित थे, परंतु अपने जुझारूपना में उन्होंने कभी कमी आने न दी। ठीक ऐसी ही स्थिति कवि हिमकर श्याम की है। कवि ने अपनी किताब का नाम भी वैसा ही रखा है। मैदान जंग में जूझ रहे साहसिक योद्धा की तरह, उत्ताल समुद्री लहरों से मुकाबला कर रहे अविचल नाविक की तरह और गर्मी लू के थपेड़े झेलते अनजान राहों की खोज में निकले पग – यात्री की मानिंद ! कवि का मत है –

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यह तो फिरता है मारा – मारा
पल भर का है साथ हमारा
आज यहाँ कल और कहीं
मत बांधो यह दिल बंजारा

यह संग्रह पांच भागों में श्रेणीबद्ध हैं, जिनमें ‘’कहनी है कुछ बातें मन की”, ” झड़ते पारिजात” एवं “सबकी अपनी पीर” छंदबद्ध रचनाएं हैं। छंदबंध गेय के लिए आवश्यक उपकरण होता है, जिसमें आंतरिक संघटन, रचना प्रक्रिया में संयम और रूपबद्धता अनिवार्य होती है। गीत कविता के स्वभाव उसकी बनावट और बुनावट की बुनियादी विधानों से प्रकट होते हैं। इसमें सरलता, गेयता, गणितीय कलात्मकता और संगीत के बोध का समायोजन होता है। गीत काव्य में जब समाजार्थिक तत्व शामिल हैं, तो नए प्रतीकों और मिथकों का वर्तमान में कवि उपयोग करते हैं तो वे सूक्ष्म सौंदर्यानुभूति पर बल देते हैं, जिसे आलोचकों ने नवगीत कहा है। हिमकर श्याम की आरंभिक कविताएँ इन्हीं भावभूमि पर आधारित है। संग्रह का प्रारंभ ईश वंदना से होता है, परंतु वह वहीं तक सीमित नहीं रहता। कवि प्रकृति, मौसम, परिवेश, समुदाय एवं व्यवस्था से गुजरता हुआ समय की विडंबनाओं की से पड़ताल भी करता है। वह इस युग की आपाधापी, छीजती मनुष्यता का बोध और पसरते अंधकार पर कुपित होता है, परंतु अपने दिलो दिमाग में वह सब कुछ अच्छा हो जाने की चाहत को भी जगाए रखता है। “समय की नदी” शीर्षक कविता में कवि अपने मनोभावों को इस प्रकार प्रकट करता है –

बीतेगा जब निष्ठुर पतझड़
छाँव लुटायेगा फिर अम्बर
मरुस्थल में बरसेगी बदली

रात ढलेगी, दिन बदलेगा
सघन अंधेरा छंट जाएगा
भोर सुनहरी अब द्वार खड़ी

“सबकी अपनी पीर” स्तंभ में कवि ने दोहा शैली में अपने कथनों को व्यक्त किया है । दोहा हिंदी कविता की परंपरागत शैली है। मध्यकलीन कवियों ने इस पर अपनी कलम की नोक चलाई है, परंतु आधुनिक कवियों ने अपने युग की जटिलता और धुंधले पड़ते जा रहे जीवन मूल्यों को धारदार स्वर देने के लिए इस विधा को अपनाया है। कवि हिमकर श्याम हमारे दौर के एक नामी गजलकार भी हैं और छंद विधान और शब्द सामर्थ्य के सजग अधिकारी भी। इनके प्रस्तुत दोहे समय के गंभीर और अनसुलझे सवालों से टकराते हैं और व्यंग्य बोध का सहारा लेकर हमारे युग की स्थितियों को प्रश्नांकित भी करते हैं। इनके दोहे मखान के कांटों की तरह चुभते हैं तो बनबेर की कटीली टहनियों की तरह सवालों के बीच में समझ को स्थिर करने के लिए फांसते भी हैं –

अपनी-अपनी चाकरी, उलझे सब दिन रात ।
बूढी आंखें खोजतीं, अब अपनों का साथ ।।

उजड़ गई सब बस्तियाँ, घाव बना नासूर ।
विस्थापन का दंश हम, सहने को मजबूर ।।

संग्रह के भाग “आखिर कब तक” में कवि द्वारा लिखित आधुनिकता के बोध से संपृक्ति समकालीन कविताएँ संग्रहित हैं, जिसमें उन्होंने समकाल के उभरते सवालों को बड़ी ही शिद्दत के साथ उठाया है। आधुनिक विकास के नाम पर खंडित होती मनुष्यता, जल -जीवन- जंगल से विस्थापित समाज, बेहाल बहुसंख्यक आबादी, पूंजीवाद का पसारता पांव, लोकतांत्रिक शक्तियों द्वारा जन सामान्य को दिया जा रहा छलावा, प्रशासनिक तंत्र का संवेदनहीन रवैया और बाजार तंत्र का बढ़ता प्रभाव इन कविताओं में बहुलता से मुखरित है। कवि ने एक ऐसी युग में अपनी कविताओं का संवेदनात्मक ताना-बाना बुना है जहाँ चारों ओर भयंकर अंधकार है। उजियाला फैलाने वाले नायकों की भूमिका परिदृश्य से गायब है। सामाजिक वैमनस्य, जातीय भेद की प्रभाव और धार्मिक कट्टरता के फैले जाल से पूरा देश एवं समूचा ढांचा ही दम तोड़ रहा है। ऐसी स्थिति में कवि अपनी कविता के माध्यम से समाज और समुदाय में मानसिक संवेदना के भाव- बोध को बचाना चाहता है। कवि की कामना है कि मनुष्यता के बोध से भरा विश्वास समाज में कायम रहे-

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सामर्थ्य हीन
उस दिन भी छिड़ी थी
एक जंग
हालात के विरुद्ध आत्मा की।
पर आज –
जब आत्मा की विरुद्ध हालात
ने छेड़ी है जंग, तो
मेरी मुट्ठी में जादू बन
आ गई है जीने की सामर्थ्य।

इस संग्रह की कुछ कविताएँ “तुम आए तो”, “हमसफर सपने”, ” चांदनी’, आदि प्रेम कविताएं हैं। “मृगतृष्णा जाल”, “खानाबदोशी का रंग” अपने परिवेश को अभिव्यक्त करती कविताएँ हैं तो “नदी की व्यथा” प्रकृति पर बरसते मानव की क्रूरता पर आधारित है। प्रेम मनुष्य का आदिम स्वभाव रहा है। प्रेम की दायरे विस्तृत हैं। समय के द्वंद और समाज की अंधी भागमभाग के विकल्प में व्यक्ति प्रेम और प्रकृति में ही विराम पाता है। प्रेम की निष्छलता और प्रकृति की रमणीयता में मनुष्य स्वच्छता, निर्मलता और एकांत प्रियता पाता है। इस आधुनिक जमाने में जहां रिश्तो में बाजार घुस गया हो और प्राकृतिक उपादान के सारे अवयव सौदागर की हवस में जाने को विवश हों, वहां कोमलता, लालित्य, सौंदर्य, सहजता के बोध को बचाए रखना कितना मुश्किल हो गया है। बावजूद इसके, कवि इस सीमित हो जा रहे संबंधों के दायरे में प्रेम – तत्व को बचा लेने को आतुर दिखता है –

जैसी आते हैं
वसंत में शाखों पर पत्ते
तुम आए तो
कुसमित हो उठा चौखट -आंगन

जैसे आती है
चंदनवन से गुजर कर हवा
तुम आए तो
सुभाषित हो उठा सारा घर

अपना वजूद खोती नदी और उसके साथ सहचर रहा मानव सभ्यता के वर्तमान की दुखती नस पर कवि अपनी उंगली इस प्रकार रखता है –

भूल गए हैं लोग
नदी से अपने रिश्ते
जिसके किनारों पर
मिलता था मोक्ष
बांटा करती थी जो नदी
छोटी-छोटी परेशानियां
क्षणभंगुर लालसाओं की
बन गई है शिकार।

इस संग्रह के “युद्धरत हूँ मैं” भाग की कविताएँ पढ़ते समय कवि के भयंकर अवसाद और असहज पीड़ा और क्रूरतम जीवनानुभवों से गुजरना पड़ता है। मेडिकल साइंस की दृष्टि से कैंसर एक जानलेवा रोग है, जो धीरे-धीरे रोगी की सभी प्रतिरोधी शक्तियों को क्षीण कर देता है। लोक मिथक के शब्दों का सहारा लें, तो यह एक भयंकर पिचाश है, जो किसी भी व्यक्ति को पकड़ लेता है तो उसे गलाकर ही छोड़ता है। कवि जो इस रोग से लंबे समय से पीड़ित है, वह इस रोग की अवस्था, उससे उभरते शारीरिक-मानसिक तनाव और चिकित्सा क्रम में प्राप्त अनुभवों को कविता के माध्यम से पाठकों से साझा करना चाहता है। इन कविताओं को पढ़ना तपती आग में अंगारों के ऊपर नंगे पांव चलना है। इन कविताओं को समझना किसी वर्फीली अंधड़ में अपने आप को तड़पते हुए महसूस करना है। कवि ने अपनी कुछ कविताओं की पंक्तियों में ऐसा भाव बोध व्यक्त किया है, जिसे पढ़कर आपका हृदय तड़पने लगेगा और आंखें भर आएंगी –

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जम रहा है थक्का
खून के भीतर
बचे खुचे खून में भर
रहा है जहर

कतरा कतरा मर रहा
कतरा कतरा जी रहा
किस्तों की मौत है
किस्तों की जिंदगी।

“जिद्दी- सी धुन” में जहाँ कवि मन जीवन के पतझड़ से आकुल है, वहीं “काला सूरज” कविता में अपनी असहज पीड़ा को व्यक्त करता हुआ वह जीवन जीने की तमन्ना से आश्वस्त भी होता है। कवि अस्पताल में पड़े रोगी के रूप में ही केवल अपने हाले हालात को वर्णित ही नहीं करता, वरन् वह उपचारिकाओं के दुखद जीवन की विभिन्न परतों को भी अभिव्यक्त करता है। इस पुस्तक की शीर्षक कविता “युद्धरत हूँ मैं” कवि मन अपनी रोग ग्रसित देह पर अपनी मानसिकता जिजीविषा व अपने धैर्य बल को एक विशिष्ट प्रतिरोध के रूप में इस्तेमाल करता है, जो मानव जीत की विजय गाथा के रूप में प्रकट होती है-

डरता नहीं हूँ छणिक आतंक से
झुकूँगा नहीं जुल्म -अत्याचार से
आबद्ध हूँ, कटिबद्ध हूँ
डटा हुआ हूँ योद्धा बन महासमर में
भेद कर रहूँगा चक्रव्यूह
हार नहीं मानी है
जंग अभी जारी है
हौसला है, हिम्मत है
लड़ने की ताकत है
युद्धरत हूँ मैं
कैंसर के साथ, कैंसर के खिलाफ।

इनकी कविता “विष पुरुष” रोग ग्रस्त कवि की करुण व्यथा का एकालाप है, तो “शेष है स्वप्न” उस भयंकर अंधकार में भी दिखती रोशनी की एक लकीर है। “पुनर्जन्म” शीर्षक कविताएं कवि की उम्मीद और विश्वास से भरी जीवन की उद्दात अग्निशिखाएँ हैं। कवि अपने को उस फिनिक्स पक्षी की तरह पाता है जो आग में जलकर /भयंकर रोग से ग्रसित होकर भी बार-बार आपकी जीवन को बचा पाता है। हिमकर श्याम की ये कविताएँ महामृत्युंजयी कविताएँ हैं, जो कवि के स्वजीवन की असीम पीड़ाओं से उत्पन्न हुई हैं, जिसके बल पर कवि अपनी जीत के प्रति आश्वस्त है। जिसका एक अनूठा उदाहरण उनकी इस कविता में प्राप्त होता है –

मुश्किलों को हौसलों से पार कर
जिंदगी दुश्वार लेकिन प्यार कर
एक दुश्मन जो छुपा अंदर तेरे
डर नहीं, जिंदादिली से वार कर।

हिमकर श्याम का यह कविता संकलन जिसमें 154 छोटी -बड़ी कविताएँ और अनेक दोहे शामिल हैं। वह कवि के जीवन- बोध के प्रति अदम्य जिजीविषा की अकथ गाथाएं है। मृत्यु शैया से सकुशल लौट तो आया है पर कैंसर से युद्ध जारी है। कवि अपनी दुखद क्षणों में भी सुखद दुनिया के कविता संसार को अपनी लेखनी से रचता रहा। कवि के रचना कौशल, अप्रतिम लेखकीय जीवटता और बर्बर युग में बची हुई मनुष्यता के संवेदनात्मक स्वर को बहुत सहायता से महसूस किया जा सकता है।


युद्धरत हूं मैं (कविता संकलन)
कवि – हिमकर श्याम
प्रकाशक – नवजागरण प्रकाशन , दिल्ली
प्रकाशन वर्ष – 2018
मूल्य – ₹ 275


संपर्क :-
ग्राम – मैरा, पोस्ट – सैसड,
भाया – धनसोई ,
बक्सर,
(बिहार) – 802117

ईमेल – kvimukul12111@gmail.com
मोबाइल नंबर-
6202077236

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