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भूमंडलीकरण के परिप्रेक्ष्य में हिंदी भाषा और अनुवाद: डॉ. अनवर अहमद सिद्दीक़ी

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भूमंडलीकरण के परिप्रेक्ष्य में हिंदी भाषा और अनुवाद

डॉ. अनवर अहमद सिद्दीक़ी, प्रभारी- अनुवाद अध्ययन विभाग,
महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा- 442 001

भूमंडलीकरण के परिप्रेक्ष्य में आज अनुवाद केवल एकल इकाई के रूप में सीमित न होकर एक विस्तृत पटल के रूप में स्थापित हो गया है. अनुवाद के इतिहास पर यदि दृष्टिपात किया जाए तो ज्ञात होगा कि प्रारंभिक दौर में भी भारतीय परिप्रेक्ष्य में अनुवाद की स्थिति को काफ़ी संतोषजनक न रही. लेकिन मुगलकालीन दौर में दाराशिकोह के द्वारा 52 उपनिषदों का अनुवाद “सीर-ए” अकबर में किए जाने का उल्लेख देखने को मिलता है. दाराशिकोह के अनुवाद कर्म को इस्लाम और वेदांत के एकीकरण में महत्वपूर्ण योगदान माना जा सकता है। दाराशिकोह ने सर्वप्रथम संस्कृत का अध्ययन किया तत्पश्चात उपनिषद, गीता और योग वशिष्ठ का फ़ारसी भाषा में अनुवाद किया. यह भी उल्लेखनीय है कि इस महती कार्य हेतु बनारस के पंडितों की सहायता ली गई।

प्राचीन समय में विस्तृत पैमाने पर पवित्र बाइबल  के अनुवाद किए गए. जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. बावजूद इसके अनुवाद कर्म को मुख्य धारा से पृथक दोयम दर्जे का माना जाता रहा है. ठीक उसी तरह अनुवादक की स्थिति भी आरंभिक दौर में उतनी सुदृढ़ दिखाई नहीं देती बल्कि अनुवाद के इतिहास पर गौर करने पर यह दिखाई देगा कि अनुवादक को एक सज़ा-ए-आफ़ता के रूप में अपनी भूमिका एवं दायित्वों का निर्वहन करना पड़ता था. कालांतर अनुवाद की स्थिति में शनै-शनै सुधार होता गया और आज ‘पश्चिम में अनुवाद अध्ययन का क्षेत्र बहुत विस्तृत हो चुका है. वहाँ अब यह एक स्वतंत्र अनुशासन है.’[1] लेकिन आज अनुवाद न केवल भारतीय परिप्रेक्ष्य में ही स्थापित हो पाया है बल्कि अनुवाद ने आज वैश्विक परिदृश्य में अपनी महती भूमिका और उपस्थिति को दर्ज करने में उल्लेखनीय सफलता अर्जित की है.

वर्तमान दौर में अनुवाद विधा सृजनात्मक साहित्य के क्षेत्र के साथ-साथ ज्ञान-साहित्य के क्षेत्र में भी प्रमुख उपकरण के रूप में स्थापित हो गई है. आज ज्ञान-विज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र में अनुवाद की उपयोगिता और महत्ता बढ़ती जा रही है. विभिन्न ज्ञानानुशासनों के भीतर अनुवाद ने अपनी उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज की है. विभिन्न विश्वविद्यालयों में अंतरानुशासनिक अध्ययन के माध्यम से अध्ययन, अध्यापन और नित नए-नए विषयों पर शोध हो रहे हैं. ऐसी स्थिति में आज अनुवाद अंतरानुशासनिक अध्ययन के अंतर्गत विभिन्न विषयों को आपस में जोड़ने के लिए एक मुख्य सेतु की भूमिका को अदा कर रहा है. आज भारतीय भाषाओं में रचित प्रतिनिधि साहित्यिक कृतियों का तेज़ी के साथ अनुवाद हो रहा है. ऐसा कहना अन्योक्ति न होगी कि न केवल साहित्य के क्षेत्र में अनुवाद का हस्तक्षेप है बल्कि आज विदेशी भाषाओं में रचित साहित्यिक कृतियों का अनुवाद कार्य भी धड़ल्ले हो रहा है. इतना ही नहीं अनुसंधान के क्षेत्र में भी अनुवाद की विशिष्ट भूमिका दृष्टिगत हो रही हैं. नित नए अनुसंधान चाहे वे किसी भी भाषा के माध्यम से होते जा रहे हैं उनके तत्काल अनुवाद की व्यवस्था हिंदी भाषा के माध्यम से हिंदी पाठकों, अध्येताओं को, शोधार्थियों को, जिज्ञासुओं आदि को सहज रूप से उपलब्ध हो रही हैं.

हर्ष का विषय है कि आज संसार की श्रेष्ठ प्रतिनिधि कृतियों का हिंदी में अनुवाद सहज उपलब्ध है. साहित्य की विभिन्न विधाओं के माध्यम से जो भी चर्चित-बहुचर्चित या पुरस्कृत कृति बाज़ार में उपलब्ध हो जाती है. ठीक उसी समय उस कृति-विशेष का अनुवाद सहज संभाव्य होता जाने लगता है. ‘मौलिक श्रेष्ठ साहित्य के निर्माण से हिंदी अनुवाद की भाषा से अनुवादनीय भाषा बन जाएगी. भावनात्मक साहित्य के क्षेत्र में हिंदी एक सीमा तक अनुवादनीय भाषा मानी गई क्योंकि उसमें रामचरित्रमानस या गोदान जैसी महान रचनाओं का निर्माण हुआ.’[2]2 अभी हाल ही में चर्चित व प्रसिद्ध कथाकार चित्रा मुद्गल के  ‘पोस्ट बॉक्स नं- 203 नाला सोपारा’  नामक हिंदी उपन्यास को साहित्य अकादमी पुरस्कार-2018 से सम्मानित किया गया. जिसका मराठी अनुवाद प्रो. वसुधा सहस्त्रबुद्धे, मुंबई द्वारा किया गया. ‘पोस्ट बॉक्स नं- 203 नाला सोपारा’  उपन्यास के मराठी अनुवाद का लोकार्पण प्रसिद्ध कथाकार चित्रा मुद्गल के हस्ते दिनांक 25 फरवरी, 2019 वर्धा के महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के अनुवाद अध्ययन विभाग के सभागार में सम्पन्न हुआ. कहने का तात्पर्य भूमंडलीकरण के इस दौर में जहाँ वैश्विक भाषा के रूप में हिंदी स्थापित हो गई है ठीक उसके बरक्स एक बेहतर विकल्प के रूप में हिंदी अनुवाद भी अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में स्वयं को स्थापित करने हेतु अग्रसर है.

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मशीनी-अनुवाद के क्षेत्र में भी आशातीत प्रगति परिलक्षित हो रही है. मशीन-साधित अनुवाद के रूप में अनुवाद की भूमिका को आज किसी रूप में कमतर आका नहीं जा सकता है. हालांकि मशीन-साधित अनुवाद की अपनी तकनीकी सीमाएँ हैं. जबकि मानव-साधित अनुवाद ‘लक्षणा और व्यंजनायुक्त साहित्यिक कृतियों के अनुवाद के लिए मानव अनुवाद ही श्रेष्ठ है.[3] बावजूद इसके मशीन-साधित अनुवाद का प्रयोग काफ़ी क्षेत्रों में दिखाई देने लगा है. ‘मशीनी अनुवाद कंप्यूटर के द्वारा होता है. कंप्यूटरों में निरंतर सुधार होने से मशीन अनुवाद की तकनीक में भो सुधार हो रहा है, तथा अधिकाधिक कार्य कंप्यूटर द्वारा किए जा रहे हैं.’[4] इस तथ्य का प्रमाण ऑनलाइन उपलब्ध अनुवाद उपकरण जैसे गूगल ट्रांसलेशन, सिस्टरोन प्रोग्राम, मंत्रा प्रोग्राम आदि के माध्यम से प्रचूर मात्रा में दिखाई देता है. मशीन-साधित अनुवाद के लिए विभिन्न प्रकार के साफ्टवेयर आज बाज़ार में बड़े पैमाने पर उपलब्ध हो रहे हैं. अतः तकनीकी और प्रौद्यौगिकी के क्षेत्र में अनुवाद की प्रगति सराहनीय है.

इसके अतिरिक्त गूगल ट्रांसलेशन व गूगल लिप्यंतरण की विधि का अनुसरण भी मशीन-साधित अनुवाद का मुख्य टूल बनता जा रहा है. आज वैश्विक स्तर पर हो रही आपसी प्रतिस्पर्धा के चलते प्रत्येक राष्ट्र स्वयं को परमाणु शक्ति संपन्न घोषित करने की होड़ में हैं. ऐसी स्थिति में रक्षा-सौदे आदि के क्षेत्र में नई शब्दावलियाँ इजाद हो रही है. इन विविध शब्द-संपदा को प्रत्येक राष्ट्र स्वयं के हित व स्वार्थ को साधने के लिए अपनी भाषा में परमाणु क्षेत्र में प्रयुक्त शब्दों को सर्वप्रथम लाना चाहता है. युद्ध से निपटने की कुशल नीति, परस्पर दो राष्ट्रों के मध्य तनाव के समय डिप्लोमेसी अर्थात कूटनीति में पारंगत होने और युद्ध विराम या आपस में संधि प्रस्थापित करने के लिए अनुवाद नामक तंत्र की ही एकमेव सहायता ली जा सकती है. अतः अनुवाद से बेहतर कोई अन्यत्र हथियार उसके पास फ़िलहाल मौजूद नहीं है.

आज प्रत्येक राष्ट्र नाना प्रकार के परमाणु व रासायनिक शस्त्रों की वह निरंतर खरीद-फ़रोख्त करने में संलिप्त हो रहा है. और अनुवाद के माध्यम से वह इन शस्त्रों की प्रणाली, विधि, प्रयोग, उपयोग आदि की पारिभाषिक शब्दावली को स्वभाषा में अनूदित पारिभाषिक शब्दावली के माध्यम से जानने हेतु आतुर है, जिससे कि वह अन्य आश्रित राष्ट्रों के मध्य आसानी से अपना व्यापार कर सके. केवल इतना ही नहीं दो देशों के मध्य युद्ध से निपटने की कुशल नीति, परस्पर दो राष्ट्रों के मध्य तनाव के समय डिप्लोमेसी अर्थात कूटनीति में पारंगत होने और युद्ध विराम या आपस में संधि प्रस्थापित करने के लिए अनुवाद नामक तंत्र की ही एकमेव सहायता ली जा सकती है. ‘आज व्यावसायिक प्रतियोगिता का दौर है और इस व्यावसायिक प्रतियोगिता में कोई भी देश पिछड़ना नहीं चाहता है, वह प्रतियोगिता में बना रहकर शीर्ष पर रहने की आशा व्यक्त करता है. शीर्ष पर रहने में उसे अनुवाद का सहारा लेना ही होगा. बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अपने समझौतों के तहत अनुवादों पर विश्वास करते हुए संधियाँ कर रही हैं.’[5] अतः अनुवाद से बेहतर कोई अन्यत्र हथियार उसके पास उपयुक्त विकल्प के रूप में फ़िलहाल मौजूद नहीं है. परस्पर दो भाषाओँ, बोलियों, संस्कृतियों, रीति-रिवाजों, खान-पान, परिवेश आदि के प्रति अनभिज्ञता व अज्ञानता को दूर करने में अनुवाद नामक माध्यम के द्वारा जानने व समझने का अवसर प्राप्त होता है, ऐसे समय निश्चय ही अनुवाद की अधिक उपयोगिता और आवश्यकता अनुभूत होती है.

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इतना ही नहीं वैश्विक स्तर पर अनेक प्रकार के भयावह स्थितियों, गंभीर संकटों, संक्रामक बीमारियों, प्राकृतिक आपदाओं, विविध प्रदूषणों आदि को ध्यान में रखते हुए उनकी रोक-थाम के लिए उचित समाधान प्रस्तुत किए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन यह निराकरण केवल विकसित राष्ट्रों तक उन्हीं की अपनी भाषाओं में निहित हैं. जिसकी वजह से अर्ध-विकसित, अल्प-विकसित व अविकसित राष्ट्र ऐसी उपलब्ध ज्ञान-संपदा से सर्वथा वंचित हैं. अतः उन राष्ट्रों द्वारा इस ज्ञान-संपदा को अपनी भाषा में अनुवाद के माध्यम से लाने का पुरजोर प्रयास किया जा रहा है. ताकि भावी संकट का यथोचित व योग्यरूपेण निराकरण किया जा सके. भूमंडलीकरण के इस दौर में जहाँ एक और हिंदी भाषा को वैश्विक पहचान मिली है तो वहीँ दूसरी ओर हिंदी भाषा के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय बाज़ार भी तेज़ी से अपनी पकड़ बनाए हुए है.

विदेशी वस्तुओं के प्रति उपभोक्ताओं के मध्य आकर्षण उत्पन्न करने के लिए लुभावने विज्ञापन भी अलग-अलग तरीके के अपनाए जा रहे हैं. होर्डिग्स, पोस्टर, साइन बोर्ड, फ़लक आदि की सहायता से प्रदर्शन किया जा रहा है. कहने का तात्पर्य है कि विज्ञापन के विविध माध्यमों ने भी ग्राहकों को लालायित करने की दिशा में कोई कसर नहीं छोड़ी है. विज्ञापन की भाषा में नित नए प्रयोग किए जा रहे हैं जिससे कि उत्पाद और विक्रय विपुल प्रमाण में कर अधिकाधिक लाभ हासिल किया जा सकें. अतः इन बहुरंगी भाषाओं के बीच मात्र हिंदी में विज्ञापनों के स्लोगनों को विविध माध्यमों के द्वारा प्रचारित व प्रसारित किया जा रहा है. जिससे कि न केवल भारतीय अधिकाधिक प्रभावित हो रहे हैं बल्कि अप्रवासी भारतीयों के मध्य भी आकर्षण उत्पन्न हो रहा है. ठंडा मतलब कोका-कोला, यह स्लोगन अब न केवल भारतीयों को आकृष्ट व लालायित कर रहा है बल्कि इस स्लोगन ने अंतरराष्ट्रीय पटल पर विदेशियों के बीच अपनी विशिष्ट पहचान बना ली है.

आज हिंदी भाषा केवल साहित्य क्षेत्र के विषय की भाषा न होकर प्रत्येक क्षेत्र के विषय की भाषा बनती जा रही है. आज प्रयोजनमूलक हिंदी के माध्यम से हिंदी प्रत्येक विषय-क्षेत्र प्रविष्ट हो गई है. आजीविका साधक हिंदी या जीविकोपार्जन हिंदी अथवा कार्यात्मक या कार्यमूलक हिंदी के रूप में कामकाजी हिंदी ने प्रत्येक क्षेत्र में अपनी मज़बूत पकड़ बना ली है. ‘हिंदी को केवल साहित्य का विषय बनाकर देखना अब बंद करना होगा. साहित्य या विषय के साथ-साथ हिंदी को जन-जन से जोड़ने का आंदोलन चलाना अब बहुत ज़रूरी है.’[6]6 अतः ऐसी स्थिति में प्रयोजनमूलक हिंदी की आवश्यकता दिन-प्रतिदिन अनुभूत हो रही है.

आज हिंदी भाषा को व्यापक रूप में माध्यम के रूप में अपनाया जा रहा है लेकिन अनुवाद के संदर्भ में योग्य प्रशिक्षण के अभाव में उपयुक्त अनुवाद या गुणवत्ता की कसौटी पर खरा उतरने की गति अपेक्षाकृत न्यून है– ‘विशेषज्ञों का मत है कि अनुवाद मूलतः सिद्धांत का विषय न होकर व्यवहार का ही विषय है- और इस बारे में दो राय नहीं हो सकती. शिक्षा के क्षेत्र में हिंदी को माध्यम के रूप में स्वीकार किए जाने के बाद अंग्रेज़ी के मानक ग्रंथों के अनुवाद विपुल संख्या में प्रकाशित हो रहे हैं और इस दिशा में व्यावसायिक प्रकाशन-संस्थाएँ तथा राजकीय अभिकरण निरंतर सक्रिय है. विषयों के अंग्रेज़ी-ग्रंथों के हिंदी-अनुवाद आज उपलब्ध हैं किंतु इन सभी को साधु अनुवाद के नमूने नहीं माना जा सकता.’[7] अतः अनुवाद को एक ज्ञानुशासन के रूप में शिक्षा के क्षेत्र में समाविष्ट किए जाने की नितांत आवश्यकता है. महारष्ट्र के वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय द्वारा संचालित अनुवाद एवं निर्वचन विद्यापीठ इस दिशा में कार्य कर रहा है जहाँ एम. ए. एम. फिल. और पीएच. डी. अनुवाद अध्ययन और अनुवाद में स्नातकोत्तर डिप्लोमा जैसे पाठ्यक्रमों को सम्मिलित कर अध्ययन व अध्यापन से लेकर उच्च स्तर का शोध का कार्य हो रहा है.

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निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि आज हिंदी भाषा को विविध रूपों में देखा जा रहा है. प्रयोजनमूलक हिंदी न केवल सरकारी महकमों में प्रयुक्त हो रही है बल्कि जीवनानुभवों के प्रत्येक क्षेत्र में भाषा के प्रयोजनमूलक पक्ष अर्थात कार्यात्मक पक्ष को सर्वथा अनुभूत किया जा रहा है इसके लिए पारिभाषिक शब्दावली का निर्माण भी किया जा रहा है- ’भाषा के प्रयोजनमूलक रूपों में प्रयुक्त क्षेत्रगत विशिष्ट पारिभाषिक शब्दावली की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. अतः प्रयोजनमूलक भाषा के विशिष्ट पारिभाषिक शब्दों का ज्ञान संबंधित क्षेत्र की भाषा के अनुवाद के लिए आवश्यक है. पारिभाषिक शब्दावली के अभाव में अनुवाद निरस्त्र महसूस करेगा.’[8] निश्चय ही उक्त ज्ञान के बिना अनुवाद की उपयोगिता कारगर सिद्ध न होगी भूमंडलीकरण के इस युग में भाषिक दृष्टि से अभूतपूर्व बदलाव दृष्टिगोचर हो रहे हैं. जो विश्व साहित्य की दृष्टि से हितकारी है जिससे न केवल साहित्य प्रभावित हुआ है अपितु संस्कृति और कला भी लाभान्वित हुए हैं-‘कहना न होगा कि इधर अनुवाद के क्षेत्र में भाषिक अंतरावलंबन बढ़ा है, जो विश्व साहित्य के हित में भी है. इसलिए अनुवाद के महत्व को ध्यान में रखते हुए यह कहा जा सकता है कि पिछले कुछ वर्षों में साहित्य, संस्कृति और कला के क्षेत्रों में अपूर्व वैश्विक विकास हुआ है. इससे हिंदी का भूमंडलीकरण भी प्रमाणित हुआ है, इसमें संदेह नहीं.’[9] इससे यह सिद्ध होता है कि हिंदी का अनुवाद के साथ सम्मिलन हो जाने के कारण हिंदी भाषा का आधुनिकीकरण हुआ है ऐसा कहना अतिश्योक्ति न होगी. उक्त तथ्य की पुष्टि इस कथन से प्रमाणित होती है-‘हिंदी भाषा का आधुनिकीकरण हुआ है और हो रहा है और इस आधुनिकीकरण में ‘अनुवाद’ की भूमिका प्रधान रही है.[10] संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि हिंदी के इस आधुनिकीकरण के फलस्वरूप वैश्विक धरातल पर अनुवाद की महत्ता और भूमिका को अधिकाधिक प्रमाण में बल मिला है अतः यह कहना समीचीन होगा कि भूमंडलीकरण के इस युग में हिंदी भाषा के साथ-साथ अनुवाद के योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता है.


संदर्भ :

  1. अनुवाद और रचना का उत्तर-जीवन, डॉ. रमण सिन्हा वाणी प्रकाशन नई दिल्ली, पृ. 27
  2. विश्व भाषा हिंदी की अस्मिता : स्वप्न और यथार्थ, प्रो. जी. गोपीनाथन, पृ. 54, महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा का प्रकाशन
  3. अनुवाद का समकाल, कैप्टन डॉ. मोहसिन ख़ान, लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ. 173
  4. कंप्यूटर के भाषिक अनुप्रयोग, विजय कुमार मल्होत्रा, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.117
  5. अनुवाद सिद्धांत की रूपरेखा, डॉ. सुरेश कुमार, विद्यानिधि, दिल्ली, पृ. 74
  6. अनुवाद के विविध आयाम, डॉ. पूरनचंद टण्डन, हरीश कुमार सेठी, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. 317
  7. भाषा (भारतीय भाषाओँ एवं साहित्य की पत्रिका), मार्च-अप्रैल,2001, पृ.197
  8. शैली विज्ञान और अनुवाद, डॉ. राम गोपाल सिंह, शांति प्रकाशन, दिल्ली, पृ.90
  9. अनुवाद अंक-116 भारतीय अनुवाद परिषद, नई दिल्ली, पृ.
  10. अनुवाद क्या है, सं. डॉ. राजमल बोरा,वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. 68

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  1. अनुवाद और रचना का उत्तर-जीवन, डॉ. रमण सिन्हा वाणी प्रकाशन नई दिल्ली, पृ. 27
  2. विश्व भाषा हिंदी की अस्मिता : स्वप्न और यथार्थ, प्रो. जी. गोपीनाथन, पृ. 54, महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा का प्रकाशन
  3. अनुवाद का समकाल, कैप्टन डॉ. मोहसिन ख़ान, लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ. 173
  4. कंप्यूटर के भाषिक अनुप्रयोग, विजय कुमार मल्होत्रा, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.117
  5. अनुवाद सिद्धांत की रूपरेखा, डॉ. सुरेश कुमार, विद्यानिधि, दिल्ली, पृ. 74
  6. अनुवाद के विविध आयाम, डॉ. पूरनचंद टण्डन, हरीश कुमार सेठी, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. 317
  7. भाषा (भारतीय भाषाओँ एवं साहित्य की पत्रिका), मार्च-अप्रैल,2001, पृ.197
  8. शैली विज्ञान और अनुवाद, डॉ. राम गोपाल सिंह, शांति प्रकाशन, दिल्ली, पृ.90
  9. अनुवाद अंक-116 भारतीय अनुवाद परिषद, नई दिल्ली, पृ.
  10. अनुवाद क्या है, सं. डॉ. राजमल बोरा,वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. 68

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