#भुख

जिनके पेट भरे होते हैं, अपनी धुन में वो जीते हैं
जो बचपन बेचकर कमाते हैं, बच्चे वही भूखे होते हैं ।
जो किस्मत के मारे होते .. कमजोर नहीं .. बेचारे होते हैं।

निकल आते हैं सड़कों पर बाजारों में, कभी चौराहों पर
पेट के लिये दर-दर भटकते हैं,
एक-एक निवाले की कीमत समझते हैं
भूख के बदले,भूख खाकर,
सोते नहीं, पर सोते हैं .. बच्चे जो भूखे होते हैं ..

किसान की मजबूरी है परिवार पालना
झूठा वरन् लगता है , अधिकार पालना
धूल, कंकड़, मिट्टी, रोटी सब उनके लिए है मिट्टी
मिलती नही है सही कीमत .. फिर भी कभी उन्हें फसल की
तभी तो बेचारे, फाँसी लगाकर,
फंदों में झूले होते हैं, और ..
हुक्मरां अपनी मौज में,
नींद चैन की खूब सोते हैं

साहब! ..इनके पेट भरे होते हैं,
हाँ ! इनके पेट भरे होते हैं ..

कोई उम्रभर इत्र की खुशबू में जीता है
कोई उम्रभर गरीबी की बदबू में जीता है
अमीर लोग जमीं पर नही होते,
कारों,बंगलों,हवाई जहाजों में होते हैं
और गरीब सिर्फ जमीं पर होता है..

यहीं घिसता है, यहीं पर मरता है
जिंदगी भर जो गम ढोते हैं
जिंदगी नहीं जीते, वो तो बस किस्मत पे रोते हैं
प्यार-व्यार वही करते हैं, जिनके पेट भरे होते हैं

जो सपनों में खोये होते हैं,
मजबूरी की बोझ से दबे होते हैं..
लोग वही अक्सर भूखे होते हैं ..

- ✍️मेरी कलम से " नम्रता सोनी "..

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