समर कहां ‘ अब तक शेष है ,
सकल देश ही हलाहल का वेश है ।
भरा भुवन का अंग कुमकुम और केसर से ,
मरघट भी सज रहा है सफेदी के रेशे से ।।
तड़प रही हैं आंखें अब तो भूखे के नंगे लोगों की ,
आंख ,कान मूंद बह रही है नदियां भी खून की ।।
देख दृश्य हिल रहा है हृदय अन्त स्थल से ,
जी भी पसीज रहा है हिंदुस्तान का इस काले जंजीर से ।।
ठान लो अब तो , गुरबंदी में ही रहकर लड़ेंगे इस काल से ,
फिर से जीवन को प्रकाशित करेंगे गृहबंदी के ढाल से ।।

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