कोविड-19 नामक भीषण महामारी ने लगभग पूरे विश्व को अपने आगोश में ले लिया है।इस महामारी के कारण वैश्विक सामाजिक,आर्थिक जीवन पूरी तरह बेपटरी हो गया है।भारत जैसे देश में जहां अधिकांश मजदूर असंगठित क्षेत्र से जुड़े हुए हैं उनके लिए रोजगार, भुखमरी, शहरों में रहने जैसी अनेक समस्याएं उनके समक्ष आन पड़ी है।
जब इस महामारी के शुरुआती लक्षण विश्व में दिखाई देने लगे थे यथा- साउथ कोरिया, चीन ,ताइवान जैसे देश इसको गम्भीरता से ले रहे थे उस समय भारत सरकार के द्वारा इस बीमारी को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाये गए ।यहीं नहीं प्रवासी श्रमिकों को ध्यान में रखे बगैर लॉकडॉउन को लागू किया गया।जिससे श्रमिकों की जिंदगी पूरी तरह से चौराहे पर आ गयी अर्थात श्रमिकों को व्यापक रूप से मानसिक, आर्थिक, समाजिक क्षति का सामना करना पड़ रहा है।
लॉकडॉउन 4.0 के लागू होने के बाद भी प्रवासी मजदूर अपने सुरक्षित आशियानों(गॉव) पर नहीं पहुंच सके हैं। प्रतिदिन सड़क हादसों, ट्रेनों के समय सारणी में परिवर्तन तथा ट्रेनों के रास्ता भटक जाने की वजह से होने वाली मौतों ने सत्ता की तैयारियों के पोल खोल दिया है।
सरकारी लालफीताशाही और ठोस दिशा निर्देशों के अभाव के कारण देश का भाग्यविधाता (मजदूर )अमानवीय स्थितियों को झेलने के लिए बाध्य हैं।
भारतीय संस्कृति ‘सेवा परमो धर्मः’ के लिए जानी जाती है।अतः आवश्यकता है इस विपदा की घड़ी में सरकरों को मजदूरों के हित को सर्वोपरि रखकर कुछ कदम उठाए जाएं जैसे राहत पैकेज के तहत मजदूरों के खातों में पैसों का स्थानांतरण, मनरेगा में मजदूरी दरों का बढ़ाया जाना आदि।
साथ ही सामाजिक संगठनों , स्वयं सहायता समूहों और व्यक्तिगत स्तर पर भी सहायता कर मजदूरों पर इस महामारी के प्रभाव को कम किया जा सकता है।

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