जीवन का मर्म है ‘सपनों के क़रीब हों आंखें
कविता होगी तो ‘
हर लड़ाई के बाद/सिर्फ मनुष्य बच रहेगा/मनुष्य के कुछ स्वप्न होंगे/जिसमें होगी अधिक चहचहानेवाली चिड़िया/और चिड़िया के साथ खिलखिलाती सुबह/कविता होगी तो /बची रहेंगी सारी संभावनाएं/
असीम आशाओं , संभावनाओं  स्वप्न और यथार्थ के बीच समन्वय स्थापित करते हुए सीधे सरल शब्दों की कविताएं हैं ”सपनों के क़रीब हों आंखें‘संग्रह
‘रश्मि प्रकाशन’  लखनऊ से प्रकाशित इस कविता संग्रह को पढ़ते समय कवि कीभाषा की सरलता मनमोहक लगती है ।कविता के शब्द तो बिल्कुल आपके जाने पहचाने हैं पर कविता के भाव में जो दार्शनिकता है ,जो चित्रकारी है वह कवि के कविकर्म को सराहने को मजबूर करती है।इनकी कविताएं पढ़ते समय अशोक वाजपेयी जी की कही कुछ बातें याद आती हैं कि” कविता कोई ख़बर नहीं जो सुनते ही समझ में आ जाए या प्लेट में रखा समोसा भी नहीं कि उठाया और गप से खा लिया।कविता में हर सच अधूरा सच होता है।वह पूरा ही तब होता है जब उसे सुननेवाला या पढ़नेवाला या कविता का रसिक थोड़ा सच अपना  उसमें मिला दे ।”मानस जी की कविताओं के शब्द  बिल्कुल सभी की पकड़ के हैं।वे बहुत कम शब्दों में आपको ऐसी जगहें दिखा देंगे जो पहले आपने देखी तो हैं पर महसूस नहीं की है।इसे महसूस करने के लिए आपको अपना थोड़ा सा सच मिलाना होगा तभी आप कविमन और कविता के मर्म को समझ पाएंगे।
कवि मानस के इस कविता संग्रह में कुल 82 कविताएं नदी की कलकल छलछल की भांति जीवन के हर संघर्ष, हर मनोभाव से,हर हरियाली से,हर गांव,हर घर,हर खेत ,हर रिश्तों, समकालीन सामाजिक , आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक परिस्थितियों के सानिध्य और सरोकारों से होकर गुजरती है।पीछे छूट  गई यादों के कारवां,जीवन संघर्षों को व्यक्त करती आशाओं ,अपेक्षाओं के बीच उलझती सुलझती आगे बढ़ती है।
काव्य संग्रह का मुखपृष्ठ भी संग्रह के नाम  को भली-भांति न्याय देता प्रतीत होता है।जिस तरह व्यक्ति स्वप्न में उलझन को सुलझाने का प्रयत्न करता दिखाई देता है,जिस तरह टूटी कड़ियों को जोड़ने की जद्दोजहद में लगा रहता है , बिल्कुल उसी तरह की उलझन,एक फटे हुए पृष्ठ के कुछ टुकड़े, उसमें नज़र आती नदी व पेड़ की छाया,काले रंगों से बनी कुछ उलझी ,एक दूसरे से मिलती बिछुड़ती आकृतियां,बैंगनी,सफेद ,काले आसमानी और लाल रंग के असमान  चतुर्भुज जैसे जीवन की विसंगतियों का वर्णन कर रहे हों और कह रहे हों कि जीवन कभी भी   पूर्णता को प्राप्त नहीं होता, इन्हीं असमान चतुर्भुजों के बीच आशाओं ,अपेक्षाओं और संभावनाओं का अहसास कराती नियोन रंग की तीन मोटी रेखाएं हैं ,स्वप्न के अहसासी नीले- बैंगनी रंगों से बना मुखपृष्ठ बिल्कुल सपनों की  तरह ही कुछ घटित -अघटित,कल्पना-अतीत और भविष्य का रंग ऊंड़ेलता सा प्रतीत होता है।
  संग्रह के सबसे प्रथम पृष्ठ पर ही कवि ने लिख दिया है  “हर वक़्त मुझे पुकारती गांव की माटी के लिए” इस पंक्ति से ही कविमन की मूल संवेदना, गांव के प्रति आस्था ,प्रतिबद्धता, संस्कृति की याद, गांव के प्रत्येक सजीव -निर्जीव  के प्रति लगाव का भाव उजागर होता है।कवि स्वयं छत्तीसगढ़ की माटी में पैदा हुए हैं इसलिए छत्तीसगढ़ राज्य के गठन पर उनकी कविता उनके मन के उल्लास  का वर्णन करती नजर आती है।
‘अब जो दिन आएगा’/सिर्फ़ एक ही अर्थ होगा/धान की पकी बालियों के झूमने का/ आंखों में जाग उठेगी/नदी की मिठास/पर्वतों की छातियों में/उजास और पूरी-पूरी सांस/आम्र-मंजरियों की हुमक से जाग उठेंगी दिशाएं/
”तरतीब ‘ के अंतर्गत कविताओं के क्रम और उसके पश्चात वरिष्ठ कवि चंद्रेश्वर द्वारा लिखा आमुख है।जो कि अपने आप में कविता संग्रह का आईना है। यहां कवि चंद्रेश्वर ‘कविता संग्रह के मूल भावों को व्यक्त करते हैंऔर लिखते हैं  कि,”आम आदमी की फ़िक्र में लिखी गई कविताएं हैं।मानस की कविताओं के सरोकारके केंद्र में उनके आसपास का मामूली आदमी है।’
 मानस  जी को लोकमन का कवि कहना काफी उचित लगता है क्योंकि वे साधारण मानव मन की सूक्ष्म से सूक्ष्म बातों को जानते हैं और हर उस बात का जिक्र अपनी कविता में करते हैं जिससेआम आदमी किसी न किसी तरह प्रभावित होता है।
”निहायत छोटा आदमी/नयी सब्जी का स्वाद पड़ोस में बांट आता है/निहायत छोटा आदमी/सिरहाने रखता है पुरखों का इतिहास/बूझता है सारा भूगोल/जितना दिखता है/उतना छोटा नहीं होता है/निहायत छोटा आदमी/लहूलुहान पांवों से भी नाप लेता है अपना रास्ता/निहायत छोटा आदमी के छोटे होते हैं  पांव,पर डग भरता है बड़े-बड़े/जैसी पंक्तिया आम आदमी के दमखम को अभिव्यक्त करती हैं।
मानस के कविता संग्रह में कई  आयाम  अभिव्यक्त हुए हैं ।उसी में से एक है सत्ता के प्रति जागरूक होने की आवश्यकता ।उनकी कविताओं से एक बात तो स्पष्ट होती है कि वे भारतीय प्रजा को आंखें खोलने की सलाह देते हैं ।कविता  ‘ आत्महत्या ‘में लिखते हैं-  जो आत्महत्या नहीं करते /हो सकता है,वे दुनिया से रंचमात्र भी परेशान न हों/पर यह कतई नहीं हो सकता कि/वे दुनिया से नाराज़ और दुखी न हों/
एक दूसरी कविता है ”कुछ लोग सुसायडल नोट नहीं लिख छोड़ते’/कुछ लोग आत्महत्या से पहले/सुसायडल नोट नहीं लिख छोड़ते/इसलिए नहीं/ कि उन्हें लिखना नहीं आता/इसलिए भी नहीं/ कि वे सच के साथ नहीं होते/बल्कि इसलिए/ कि उन्हें पता होता है /पुलिस बड़ी चाव से जांच करती है/लोग गवाहियां भी देते हैं/दोषी को कटघरे में खड़ा किया जाता है/इधर वह जेल की चक्की पीसता है/उधर सारी दुनिया में उसकी जग हंसाई होती है/सिर्फ और सिर्फ इसलिए/कि अचानक एक दिन यही दुनिया/फिर किसी को/आत्महत्या के लिए मजबूर कर देती है।/
इस तरह की कविताएं पढ़ते समय आप ये महसूस करेंगे कि मानस जी को मनोविकारों को पढ़ने की कला आती है।इन कविताओं को पढ़ते हुए आप ये भी महसूस कर सकते हैं कि मानसशास्त्र का कोई पद्यात्मक चैप्टर पढ़ रहे हैं।
मानस जीवन की नश्वरता और शाश्वतता  पर अटूट आस्था रखते हैं और अपनी धरोहरों और संस्कृति के प्रति एक श्रद्धा का भाव रखते  हुए पुरखे कविता में  लिखते हैं कि’हम बहुत पहले से हैं/बहुत बाद तक हमी झिलमिलाते रहेंगे/
”कुछ बचे या न बचे’ में लिखते हैं कुछ संभले या न संभले/कुछ बचे या न बचे/टूटता -बिखरता ढाई आखर जरूर सम्हले/धूप -छांही रंग में संभाल रखना ही है /फिर-फिर उजड़ने के बाद भी/बसती हुई दुनिया को/
‘बचे रहेंगे’ में लिखते हैं- नहीं चले जाएंगे समूचे/बचे रहेंगे कहीं-न-कहीं/बची रहती हैं दो-चार बालियां/पूरी फसल कट जाने के बावजूद/भारी-भरकम चट्टान के नीचे/बची होती हैं चींटियां/बचे रहेंगे ठीक उसी तरह/बच नहीं पाए फिर भी बचे रहेंगे/अनसुने शब्द हवा में स्पंदित/
‘बचे रहेंगे सबसे अच्छे’ में लिखते हैं- अच्छे मनुष्य बचे रहेंगे/उनके हिस्से की दुनिया से/चले जाने के बाद भी/लोककथाओं की असमाप्त दुनिया के/राजकुमार की तरह/
 कवि सच्चाई,अच्छाई, ईमानदारी और खूशबू को बहुमोल बताते हुए कहते हैं कि दुनिया कितनी भी परिवर्तित हो जाए और नश्वरता से टकरा जाए तब भी अच्छाई अनश्वर है वह बची रहेगी और लोगों को प्रेरित करती रहेगी।
कवि आशावादी हैं भविष्य के प्रति वे सकारात्मकता  से लबालब भरे हुए हैं।सपने देखते हैं और सिर्फ इंसानी सपनों की बात नहीं करते तो अन्य सजीवों     के सपनों का भी उल्लेख करते हैं।’सपना’ कविता  में लिखते हैं-कुछ घास/कुछ झाड़ियां/पीठ पर बैठकर गुनगुनानेवाली कुछ चिड़िया/कुछ पोखरियां/कुछ छांवदार पेड़/इससे ज्यादा कुछ भी नहीं/बकरियों के सपनों में/
बिल्कुल एक सर्वहारा वर्ग की तरह सीमित आवश्यकताओं का उल्लेख दिखाई देता है यहां।
कविता’ एक जरूरी प्रार्थना’ में एक पुष्ट बीज के सपने को वर्णित करते हैं-मौत से पहले एक बार जरूर/बीज देख सके भरा -पूरा वृक्ष/
जाग्रत अवस्था में हम अपने क्रियाकलापों, व्यवहार,आचरणों को संनियंत्रित करते हैं परंतु,स्वप्न में ऐसा कोई दबाव कोई बाध्यता नहीं रहती। इसीलिए सपनों में मन स्वतंत्र विचरण करता है।इसी आधार पर प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक फ्रायड ने यह सिद्धांत प्रतिपादित किया कि”प्रत्येक स्वप्न अतीत की अनुभूतियों और दैहिक संवेदनाओं,विकारों का संयुक्त परिणाम होता है।स्वप्न यह स्पष्ट करता है कि हमारा चेतन मन,हमारी भावनाओं के हाथ का एक खिलौना मात्र है।”कवि मानस भी  स्वप्न में स्वतंत्र विचरण करते  हैं और अपने अचेतन मन में बसी यादों को विभिन्न  भावनाओं द्वाराअभिव्यक्त करते हैं  और इन भावनाओं का स्रोत है’ गांव’।हर वक़्त पुकारती गांव की माटी को समर्पित इस  काव्य संग्रह में कवि ‘कविता ,पत्थर,पानी ‘में  लिखते हैं -ज्यादा दिन  हुए नहीं/कविता में होता था गांव/और गांव में जलाशय/बरगद के नीचे पत्थर/
 गांव की याद
आने के विभिन्न कारण भी हैं ।’मां की रसोईं में’ लिखते हैं -सारे पड़ोस को पता चल जाता है/कौन -सी सब्जी पक रही /यहां आकर /हम भाइयों की भूख एकाएक जाग उठती /गोल घेरे में बैठ जाते पिता और दादा भी/बिना मुंह फुलाए किउन्हें अपने बेटों से कुछ शिकायत है/
कवि यहां गांव, घर,रिश्तों की अहमियत पर बल देते हैं और सहज खुशी और संयुक्त परिवार के महत्व को भी उजागर करते दिखाई देते हैं और ‘एक अदद घर’में लिखते हैं  –जब/मां/नींव की तरह बिछ जाती है/पिता /तने रहते हैं हरदम छत बनकर/भाई सभी/ उठा लेते हैं स्तंभों की मानिंद/बहन/हवा और अंजोर बटोर लेती है जैसे झरोखा/बहुएं/मौसमी आघात से बचाने तब्दील हो जाती हैं दीवाल में/तब/नयी पीढ़ी के बच्चे खिलखिला उठते हैं आंगन-सा/
गांव की धरोहरों को याद करते हुए’खुदाई में आसमान ‘में  लिखते हैं-पितरों की अनझुकी रीढ़ के अवशेष/माखुर की डिबिया/चोंगी सुपाचने वाली चकमक/मूर्ति में दैत्य/देवता के हाथों में त्रिशूल खड्ग वाण/नाचा के मुखौटे/खुदाई में कुछ और चौड़ी होती है धरती /कुछ और ऊंचा उठता है आसमान/
‘याद’ कविता में लिखते हैं याद एक गांव है/पुरखे,रिश्ते-नाते,संगी-साथी हंसते गाते/भरी दोपहरी में महुए की छांव है/
गांव के प्रति उनका लगाव पूरे संग्रह में बिखरा नजर आता है ।भिन्न -भिन्न कविताओं में  भिन्न -भिन्न भाव हैं। गांव से पलायन का दुख है,अकाल में गांव है,बेटी की बिदाई में रीति रिवाजों की जंजीरों में जकड़ा गांव है  ,कर्ज में डूबा गांव है,निरक्षरता गरीबी ,छल-कपट में सिर तक डूबा गांव है,गांव के गीत हैं ,लोकधुन,लोककथा,गांव की नदी,पुरखे,कर्ज में डूबे किसान के खेत वापसी को देखकर हुआ खुशगवार मौसम है, पगडंडियां
हैं ,वनदेवता है।
कवि अपने गांव के किसान की खुशी के सपने देखते हैं।साथ ही यह भी समझते हैं कि आखिर किसान की आत्महत्या के पीछे की  साजिश क्या है। सामाजिक-राजनैतिक घटनाओं और हत्याओं को प्रकृति द्वारा बखूबी प्रस्तुत करते हैं-‘तोते को किसने किया विवश’ में लिखते हैं-तोते को किसने किया विवश/आत्महत्या के लिए/सारे पक्षी जानते हैं/झुरमुट की आड़ में/रचे गए षडयंत्रों की कानाफूसी/सबने सुनी है/तोते के चेहरे पर पसरा/ अंतर्द्व न्द्व/सबने देखा है/कहां पड़े हैं कटे हुए पंख/किस सरोवर में धोए गये हथियार/सबको पता है।/
 सत्ता के षड्यंत्रों और उनमें फंसी जनता की मूर्खता और अंधविश्वास पर  भी ‘बस्तर’ कविता द्वारा बड़ी सरल भाषा में चोट करते नजर आते हैं-मुद्दा यह नहीं /वहां पहले नक्सली पहुंचे या पुलिस/मुद्दा यह है कि/इन दोनों की वहां कभी भी/ कोई जरूरत नहीं थी/
जब विवश हो जाते हैं तो लिखते हैं-आप किधर जाना चाहेंगे ?जब आपके पास सिर्फ दो ही रास्ते बचे हों/पहला हत्या/दूसरा आत्महत्या का/सच -सच बताना/तब/आप किधर जाना चाहेंगे?
कविता ‘दरअसल ‘ में  सत्ता पक्ष और सामान्य जनता की जरूरतों को  ध्यान में रखते हुए कहते हैं  कि ,बहुत नजदीक से ही/ दिखते हैं गांव,खेत और अन्न के दाने/सिर हिलाते बैल,खुर रोपती बकरी,लवठी धरे चरवाहे/धरती से बहुत दूर ऊपर से/केवल मरे हुए जानवरों की सड़ी – गली देह/नि:संदेह/तथ्य अपनी जगह ,अपनी जगह तर्क है/दरअसल/गौरेये और गिद्ध में ज़मीन आसमान का फर्क है/
मानस जी के कविता संग्रह में कुछ बहुत ही छोटी नौ शब्दों की कविता भी अपने आप में गहराई लिए हुए है।’अंतत:’-बाहर से लहू-लुहान/आया घर/मार डाला गया/अंतत:
मानस जी की कविताओं की सूक्ष्म दृष्टि  उनके मानवीय संवेदनाओं को उजागर करती है।
कविता ‘याद न आये जिसे ‘अपने आप में पूरी कहानी है।एक ऐसी कहानी,  एक ऐसा इतिहास है जिससे उसकी प्रगति का अवरोही क्रम दिखाई देता है
।पानी देखते ही नदी/नदी  देखते ही नाव/ नाव  देखते ही नाविक/नाविक देखते ही पतवार/पतवार देखते ही पेड़/पेड़ देखते ही गांव/गांव देखते ही  बढ़ई/बढ़ई देखते ही बसूला/बसूला देखते ही लुहार/लुहार देखते ही धार/धार देखते ही पानी/सबको जोड़ती कोई एक कहानी/याद न आये बरबस जिसे/क्या-क्या याद दिलायें उसे?
सपनों के क़रीब हों आंखें‘काव्य संग्रह में हर वह दृश्य कल्पना है जिसके बीच होकर आपकी आंखें गुजरी होंगी ।इस संग्रह में पत्थर,पानी,मां की रसोई,घर, बाजार,नदी,तीज-त्योहार,रस -रंग-प्यास,मौसम, ,गांव,सपना,पुरखे,प्रार्थना ठूंठ,चिरैया,कुदाल है,आत्महत्या,गोली, चौपाल है,भाव,यादें, तालिबान ,ऊहापोह,श्रद्धांजलि,गीत, तरकीब  और मनोकामना है।
कवि मानस कविता लिखते समय बड़ी ईमानदारी से अपनी प्रेरणा का उल्लेख भी करते हैं।
कवि मानस की पुस्तक की कीमत काफी कम है।पाठक इसे पढ़कर हाथों हाथ लेंगे।पुस्तक पाठक के मानस में एक स्थाई स्थान बना लेगी पाठक प्रेरित होंगे।कवि को उनके कविकर्म हेतु ढेर सारी शुभकामनाएं।
भारती संजीव श्रीवास्तव
शोधार्थी , मुंबई यूनिवर्सिटी
समीक्षक , कवयित्री, शिक्षाविद्
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