कितना अच्छा होता यदि जीवन का महासमर द्वंद्व मुक्त हो जाय और चिरंतन दुःख की छाया उससे दूर-दूर तक चली जाय। उसे किसी भी प्रकार की पीड़ा छू भी न सके। मनुष्य जीवन के अंतीम दौर में पहुंचकरअगर इस प्रकार की तपन सहने के लिए जब बाध्य हो जाता है तो हमें अपना इलाज जरूर कर लेना चाहिए। बदलते समय के साथ मानवीय समाज आगे बढ़ रहा है। नित्य नए तथ्यों से अवगत हो रहा है। आज की जीवन शैली, बढ़ते सुख-सुविधाओं की लत ने मनुष्य को मनुष्य होने की चेतना से वंचित करने का सतत प्रयास किया है। येन केन प्रकार से मनुष्य सुख की तलाश में अधिक बेचैन होता जा रहा है। अपने सुख के लिए उसने यंत्र मानव का भी सृजन किया है। लेकिन इस प्रक्रिया में वह स्वयं यंत्र बन रहा है। जिस प्रकार यंत्र में किसी प्रकार की भावनाओं को कोई स्थान नहीं है ठीक उसी प्रकार मनुष्य भी अपनी पहचान भूलकर यंत्र के समान वर्तन अपना रहा है। किसी भी स्थिति में वह दूसरों के कष्ट समझने की जरूरत नहीं समझता। दिलचस्प बात यह है कि वह यंत्र को संवेदनशील बनाने की कोशिश में स्वयं ही अपनी पहचान को धूमिल कर रहा है। जो चीजे वह बनाना चाहता है वहीं चीजे भूल रहा है। एक पिता अपने बेटे को बडे लाड़-प्यार से पालता है। उसकी प्रत्येक गलती प्रिय लगती है। वही बेटा बड़ा होने के बादअपने पिता के प्रति संवेदनशून्य हो जाता है। उसकी संवेदन शक्ति बूढ़े माता पिता के दुखों की अनुगूंज को सुन नहीं पाती। बेटे (समाज)का इस प्रकार का स्मृति भ्रंश आज से पहले कभी देखा नहीं गया। वर्तमान में बढ़ती असहिष्णुता के बीच पारिवारिक माहौल का बिगड़ता स्वरूप हमें किस दिशा की ओर ले जाएगा निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। यही कारण है कि वृद्ध जनों की चिंता आज विमर्श के रूप में प्रस्तुत हो रही है। अपने ही घर से वृद्धों को बाहर का रास्ता दिखाने का आग्रह कौनसा आदर्श स्थापित करना चाहता है ?
भारतीय समाज में एक कहावत प्रचलित है कि जिसने ‘जैसा बोया है वैसा ही पाया है’ यद्यपि यह तर्क सर्वथा उचित मालूम पड़ता है किंतु कई सारे ऐसे भी तथ्य प्राप्त होते है कि जो इन कथनों की परिपुष्टि नहीं करते हैं। सबका कल्याण चाहनेवाला, दूसरों के दुःख को अपना समझने वाला भी अपने घर-परिवार (समाज) से बेदखल कर दिया जाता है। घर से बाहर निकलने के लिए विवश हो जाता है। उसके मन की वेदना, पीड़ा समझने वाला भी उसके पास नहीं रहता। वह असहाय सबकुछ रहने के बावजूद लॉज,आश्रम (घर) की तलाश में अपनी आंतरिक पीड़ा लिए हुए आसरा खोजता है। वस्तुतः यही वर्तमान समाज की एक सच्चाई है जिसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता। कोरोना के भीषण दौर में यह और भी भयावह रूप ले रही हैं। ऐसे दौर में जहाँ स्त्रियों पर अत्याचार के मामले बढ़ रहे हैं वहाँ बूढ़े व्यक्ति की क्या स्थिति होगी? एक और पैदल चलने के लिए विवश हैं तो दूसरी ओर पेट के भूगोल में उलझा हुआ है। उसकी आंतरिक व्यथा को एसी में बैठा व्यक्ति कैसे समझ सकता है। वर्तमान की बड़ी विडंबना यह है कि जो पीड़ा से जूझता है वह अपने जीवन से संबंधित निर्णय नहीं ले सकता। कोई तीसरा आदमी सदैव उसके जीवन के साथ खेलता है। न्याय उसकी सीमा से दूर है। इस प्रकार की तमाम तरह की विसंगतियों के बाद भी वह कुकुरमुत्ते की तरह अदम्य जिजीविषा के साथ उठ खड़ा होता है। संघर्ष करता है।

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