नक्सलवादी आन्दोलन और हिंदी की प्रमुख लघु पत्रिकाएं (1950 से 1980 के विशेष संदर्भ में)

डॉ. निकिता जैन

अम्बेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली में अध्यापन।

फ़ोन नंबर -9953058803

ईमेल-nkjn989@gmail.com

शोध सारांश

प्रस्तुत शोधालेखनक्सलवादी आन्दोलन और हिंदी की प्रमुख लघु पत्रिकाएं (1950 से 1980 के विशेष संदर्भ में)’ में मुख्य रूप से उन लघु पत्रिकाओं को शामिल किया गया है जिनको नक्सलवादी आन्दोलन को हिंदी जगत से रूबरू कराने का श्रेय जाता है। प्रस्तुत शोधालेख में ‘लघु पत्रिकाओं’ का ज़िक्र किया गया है अर्थात ऐसी पत्रिकाएं जो व्यक्तिगत साधनों के आधार पर निकाली जा रही थीं जो किसी सरकारी या गैर सरकारी संगठन से जुड़ी हुई नहीं थी और जिनका केवल एक ही उद्देश्य था समाज और सत्ता में व्याप्त अनीतियों के खिलाफ जमकर लिखना जो उस समय की बड़ी पत्रिकाएं (सरकारी या गैर सरकारी संगठन से जुड़ी पत्रिकाएं ) नहीं कर पा रहीं थीं। यह शोधालेख केवल लघु पत्रिका के आईने से ‘नक्सलवाद’ का छोटा सा चित्र प्रस्तुत करने की कोशिश करता है। न तो इसमें तत्कालीन समय में निकलने वाली नक्सलवादी सम्बन्धी सभी पत्रिकाओं का ज़िक्र है न ही ये दावा पेश किया जा रहा है कि यह शोधालेख ‘नक्सलवाद’ की नयी व्याख्या प्रस्तुत कर रहा है अपितु इस शोधालेख द्वारा लघु पत्रिकाओं की महत्ता का आंकलन प्रस्तुत करने की कोशिश की गयी है कि कैसे वह सीमित संसाधनों के दायरों में रहते हुए भी अपनी सामाजिक एवं राजनीतिक भूमिका का निर्वाह भलीभांति कर रहीं थीं। प्रस्तुत शोधालेख में ‘फिलहाल’, ‘आमुख’ एवं अन्य पत्रिकाओं  का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि ‘नक्सलवाद’ को साहित्यिक आईने से किस तरह देखा जा रहा था और लघु पत्रिकाओं की उसमें क्या भूमिका थी।

बीज शब्द

नक्सलवाद, सामाजिक, राजनीतिक, लघु पत्रिका, संग

आमुख

नक्सलवादी आन्दोलन पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के एक छोटे से गाँव ‘नक्सलबाड़ी’ से शुरू हुआ था। सन् 1967 में इस आन्दोलन की शुरुआत  किसानों और मजदूरों की मुक्ति के लिए की गयी थी। सामन्तवाद के खिलाफ किसानों और मजदूरों के इस विद्रोह ने धीरे-धीरे बुद्धजीवियों को अपनी ओर आकर्षित करना शुरू किया| धीरे-धीरे शिक्षित युवा-वर्ग का समर्थन भी इस आन्दोलन को प्राप्त होने लगा । एक तरफ बंगला साहित्य को इस आन्दोलन ने प्रभावित किया तो दूसरी तरफ हिंदी साहित्य भी इस आन्दोलन के प्रभाव से अछूता न रहा। डॉ. गोपाल प्रधान अपने आलेख ‘नक्सलवाद और हिंदी साहित्य’ में इस पहलू पर और रोशनी डालते हुए लिखते हैं कि –“नक्सलवाद को आमतौर पर राजनीतिक आन्दोलन की हिंसक धारा के साथ जोड़ा है लेकिन असल में यह स्वातन्त्र्योतर भारत में किसानों-मजदूरों की मुक्ति का उग्रपंथी आन्दोलन है|……पहले बंगाल के साहित्यिक जगत पर इसका प्रभाव पड़ा। फिर हिंदी साहित्य भी इसके प्रभाव में आया| हिंदी कवि धूमिल की एक कविता में इसका सबसे पहले उल्लेख मिलता है।”1.  भले ही नक्सलवादी आन्दोलन का प्रभाव हिंदी साहित्य पर थोड़ी देर से पड़ा हो लेकिन यहाँ के प्रगतिवादी लेखक, कवि हमेशा से इस आन्दोलन को लेकर सजग एवं सचेत रहे हैं।  कुछ  लघु पत्रिकाएँ तो केवल इस आन्दोलन के समर्थन के लिए ही निकाली गयीं ताकि जनता और साहित्य जगत के अन्य लोगों को यह बताया जा सके कि वास्तव में ‘नक्सलवादी आन्दोलन’ है क्या और  क्यों शुरू किया गया है, क्यों किसान और मजदूर को अपने हल, खेत और औजार छोड़कर हाथ में हथियार लेने पर मजबूर होना पड़ा , क्यों एक मुक्ति आन्दोलन सरकार ने हिसंक धारा का रूप दे दिया।  प्रशासन के चेहरे से नकाब उतारने के लिए और नक्सलवादी आन्दोलन के समर्थन के लिए उस समय कई लेखक और साहित्यकार आगे आये और उन्होंने पत्रिकाओं के ज़रिये साहित्य में एक नयी चेतना को जन्म देने का प्रयास किया जो मजदूर और किसान की आवाज़ बन सके। इनमें सबसे चर्चित पत्रिका वीर भारत तलवार द्वारा सम्पादित ‘फिलहाल’ है। ‘फिलहाल’ नक्सलवादी आन्दोलन केन्द्रित पत्रिका थी। आन्दोलन से जुड़ने के उद्देश्य से यह पत्रिका निकाली गयी थी ताकि मजदूरों और  किसानों की आन्दोलन में वास्तविक भूमिका का क्या है, इसका पता लगाया जा सके, सरकार द्वारा उनका जो दमन किया जा रहा है उसकी सच्चाई से लोगों को रूबरू कराया जा सके तथा अधिक से अधिक युवाओं और बुद्धिजीवी वर्ग के साथ संपर्क स्थापित किया जा सके। यहाँ हम ‘फिलहाल’ में नक्सलवाद के परिप्रेक्ष्य में जो साहित्य प्रकाशित किया गया है उसका मूल्यांकन प्रस्तुत करेंगे ताकि यह पता लगाया जा सके कि साहित्य से जुड़े विद्वान किस प्रकार अपनी कलम के द्वारा इस आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे थे| इसके अलावा अन्य साहित्यिक लघु पत्रिकाओं में ‘नक्सलवाद’ को लेकर कोई चर्चा की गयी है या नहीं, इसका भी आंकलन प्रस्तुत किया जाएगा|

फ़िलहाल –  फिलहाल पत्रिका का प्रकाशन सन् 1972 से वीर भारत तलवार के संपादन में शुरू हुआ था। यह वे  दौर था जब नक्सलवादी आन्दोलन बंगाल के अलावा देश के अन्य हिस्सों में धीरे-धीरे फ़ैल रहा था और सरकार इस आन्दोलन के दमन के लिए भरसक प्रयास कर रही थी। नक्सलवादी आन्दोलन को सही दिशा देने के लिए और सरकारी नीतियों को विफल करने के उद्देश्य से ही ‘फिलहाल’ जैसी पत्रिकाएँ आगे आयीं और इन्होंने अधिक से अधिक लोगों को अपने साथ जोड़ने की ज़िम्मेदारी उठायी ताकि लोगों को ‘नक्सलवाद’ के बारे में जो भ्रांतियां हैं उनसे दूर रखा जा सके और इस आन्दोलन को गलत राह पर भटकने से बचाया जा सके। वीरभारत तलवार नक्सलवादी आन्दोलन के तहस-नहस होने की वजह को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं – “चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने अगर उस वक़्त चारू मजुमदार की एम.एल. पार्टी को अपनी मान्यता न दी होती तो कई ग्रुपों के लोग उसकी ओर उस तरह न लपकते। चारू मजुमदार अपने पत्र में लिखते थे कि जब तक तुम जमींदार का सिर नहीं काटते, तुम क्रांतिकारी नहीं हो सकते,जो जितना अध्ययन करता है, वह उतना बड़ा ही गधा है …… हमारा ग्रुप इस विचारों का सख्त विरोध करता था…..इन्हीं विचारों के कारण नक्सलवादी आन्दोलन सही रास्ते से भटककर तहस-नहस हो रहा था।”2.  उपर्युक्त कथन से स्पष्ट है कि नक्सलवादी आन्दोलन कहीं न कहीं अपनी राह भटक रहा था क्योंकि इस आन्दोलन का वास्तविक उद्देश्य यही था की उन नीतियों के खिलाफ लड़ना जो वर्षों से किसानों और मजदूरों का शोषण कर रही हैं। केवल जमींदार का गला काटने से यह समस्या हल नहीं होने वाली थी और हुई भी नहीं। लेकिन यह ज़रूर है कि 70 के दशक में किसानों और मजदूरों के इस सशस्त्र आन्दोलन का समर्थन करने वाली एक लेखकीय पीढ़ी ज़रूर तैयार हो गयी थी। डॉ. प्रधान के अनुसार सबसे पहले हिंदी में खासकर ‘गोली दागो पोस्टर’  कविता में किसान और मजदूर की सशस्त्र संघर्ष चेतना के दर्शन होते हैं।3.  यह कविता ‘फिलहाल’ में जुलाई 1972 में प्रकाशित हुई थी। इस कविता में किसान की उस संघर्ष यात्रा का वर्णन है जिस को न जाने वह कितनी सदियों से झेलता आ रहा है। लेकिन अब उसे ये एक तरफ़ा संघर्ष नहीं चाहिए। अब उसे उन लोगों को गोली मारने का अधिकार चाहिए जिन्होंने उससे उसकी आज़ादी, उसकी हंसी, उसका बचपन छीन लिया –

“बहन के पैरों के आसपास पीले रेंड़ के पौधों की तरह

उगा था जो मेरा बचपन-

उसे – दारोगा का भैंसा चर गया।

आदमियत को जीवित रखने के लिए अगर

एक दरोगा को गोली मारने दागने का अधिकार है

तो मुझे क्यों नहीं ?”4.

जो किसान दिन-रात एक करके जमींन में हल चला रहा है,बीज बो रहा है, अनाज पैदा कर रहा है उसी किसान की जमीन सूद के नाम पर जमींदार हड़प लें तो वो किसान कहाँ जाए क्या करे ? क्या अब भी सरकार और पुलिस की मिलीभगत के आगे घुटने टेक दे या फिर अपने हक़ के लिए  लड़े औए सशस्त्र विद्रोह करे –

“जिस जमींन पर मैं चलता हूँ,

जिस जमीन को मैं जोतता हूँ

जिस जमीन में मैं बीज बोता हूँ और

जिस जमीन से अन्न निकालकर मैं

गोदामों तक ढोता हूँ-

उस जमीन के लिए मुझे गोली दागने का अधिकार है या

दोगले जमींदारों को – जो इस पूरे देश को सूदखोर का कुत्ता बना चुके हैं ?”5.

पूरे देश को सूदखोर का कुत्ता बनाने के पीछे केवल जमींदार नहीं बल्कि वे नेता भी हैं जो अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए गरीब जनता का खून चूसते हैं और सामंतवादियों और जमींदारों के घर भरते हैं। शंकर शैलेन्द्र की कविता ‘नेता को न्यौता’ ऐसे ही ईमानदार नेताओं की पोल खोलती है जो खादी का कुर्ता पहनकर, हाथ जोड़कर किसानों और मजदूरों की बस्तियों में जाकर उनकी आज़ादी के नाम पर उनसे वोट मांगते हैं, लेकिन असलियत में किसानों और मजदूरों की आवाज़ को दबाने के लिए उन पर गोली भी यही चलवाते हैं –

“यह कैसी आज़ादी है,

वही ढाक के तीन पात हैं, बर्बादी है ;

तुम किसान मजदूरों पर गोली चलवाओ,

और पहन लो खद्दर, देश भक्त कहलाओ !

तुम सेठों के संग पेट जनता का काटो,

तिस पर आज़ादी की सौ-सौ बातें छांटो !

हमें न छल पाएगी यह कोरी आज़ादी,

उठ री, उठ; मजदूर किसानों की आबादी !”6..

दरअसल नक्सलवादी आन्दोलन गरीब मजदूर के भीतर वर्षों से पनप रहा वो आक्रोश है जो अब एक ज्वाला में तब्दील हो चुका है। यह आन्दोलन केवल ज़मींदारों के खिलाफ नहीं बल्कि उन सरकारी नीतियों और नेताओं के खिलाफ भी शुरू हुआ था जो किसानों मजदूरों को दो जून की रोटी तक मुहैया नहीं करवा पाते और जमीदारों का घर भरते जाते हैं। किसान-मजदूर नेताओं के झूठे वादों से, साहूकारों और जमीदारों के शोषण से तंग आ चुका था इसलिए उसने इस आन्दोलन की शुरुआत की ताकि वह यह बता सके कि उसे किसी की दया या रहम की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि यह दया और रहम दरअसल एक छलावा है, धोखा है किसान और मजदूर की आज़ादी को कैद करने का। लालसिंह दिल की कविता ‘शीशे की कैद’ में इस छलावे पर रोशनी डालते हुए एक साधारण मजदूर कहता है –

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“किसी की दया पर

हमें कुछ भी स्वीकार नहीं

कोई स्वर्ग, किसी धर्मराज का राज्य

अथवा कोई ‘समाजवाद’

x-x-x

तुम्हें बहुत चिंता है

हमारे खून बहने की

तथा इस रक्त की सुरक्षा के लिए

जिस ‘मर्तबान’ का तुम संकेत करते हो

लोगों ने उन्हें ठोकरों से तोड़ देना है”7.

दरअसल किसान-मजदूर अब यह समझ चुके हैं कि उनकी चिंता न तो सरकार को है न ही समाज को। जिस झूठी आज़ादी के मर्तबान का लालच देकर उन्हें इस आन्दोलन से पीछे हटने को कहा जा रहा है वह भी एक चाल है। हथियार डालते ही उनसे शायद पहले से भी ज्यादा बदत्तर सलूक किया। पुलिस की गोली से मरना या जमींदार का क़र्ज़ चुकाते-चुकाते मरना अगर दोनों ही सूरतों में मरना है तो फिर आजीवन शोषण का शिकार होने ने क्या फायदा?

यह बात तय है कि किसानों और मजदूरों ने जिस आन्दोलन की शुरुआत की थी उसका उद्देश्य या लक्ष्य एक ही था अपने पर हो रहे ज़ुल्मों के खिलाफ विद्रोह ताकि उनकी आने वाली नस्लों को वो सब सहना न पड़े जो उनको सहना पड़ा। लेकिन आगे जाकर कुछेक लोगों ने अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए इस आन्दोलन का इस्तेमाल हिंसक रूप में करके पूरे विद्रोह के प्रारूप को ही बदल दिया। कोई भी आन्दोलन केवल हिंसा के आधार पर अपने उद्देश्य की प्राप्ति नहीं कर सकता, यही वजह है कि आज नक्सलवादी आन्दोलन अपने लक्ष्य से भटक चुका है और ऐसी अंधी गली में प्रवेश कर चुका है जहाँ से निकलने के लगभग सभी रास्ते बंद हैं। ‘फिलहाल’ पत्रिका में नक्सलवादी आन्दोलन के शुरू होने के पीछे जिन कारणों को स्पष्ट किया गया है उसे देखकर कहीं से भी यह एहसास तो नहीं होता कि इस आन्दोलन का मकसद गलत था। एक लोकतान्त्रिक देश में व्यक्तिगत स्वतंत्रता हर नागरिक का अधिकार है। लेकिन जब कुछेक एक वर्ग मिलकर दूसरे वर्गों की स्वतंत्रता को छिनने की कोशिश करें तो क्रांति होना लाज़मी है जो ‘नक्सलवाद’ के रूप में हुई। लेकिन इस क्रान्ति को कैसे सरकार के कुछ लोगों और जमींदारों ने मिलकर हिंसक आन्दोलन में परिवर्तित कर दिया इसका उदाहरण अरुण रंजन के नाटक ‘परदे के पीछे’ में प्रस्तुत किया गया है। दरअसल आम जनता के आगे तो नक्सलवादी आन्दोलन का आधा सच ही पाया है, आधा सच जो पूरे झूठ से अधिक खतरनाक होता है इसलिए नक्सलवाद का नाम सुनते ही आम जनता विद्रोह करने वालों को कसूरवार मानने लगती है लेकिन असल में परदे के पीछे की सच्चाई क्या है, कैसे जनता को सरकार गुमराह कर रही है और किसान-मजदूरों का खून चूस रही है यह नाटक इस सच्चाई से पाठकों को रूबरू करवाता है। प्रस्तुत नाटक में अकालग्रस्त राज्य की स्थिति का जायज़ा लेने के लिए प्रधानमंत्री पहुँचते हैं जहाँ उनके इंतज़ार में पहले से ही राज्य की मुख्यमंत्री, पुलिस फ़ोर्स और जमींदार स्वागत –सत्कार के लिए खड़े हैं। देश के प्रधानमंत्री जब मुख्यमंत्री से राज्य में अकाल की स्थिति के बारे में पूछते हैं तो मुख्यमंत्री का जवाब सरकार, पुलिस, सबकी पोल पट्टी खोलकर रख देता है – “ इधर भूखी जनता देशी-विदेशी विघटनकारियों के बहकावे में आकर विद्रोह करने पर उतारू है। (प्रधानमंत्री के कान के पास फुसफुसाकर) ‘डुमरी गाँव’ के वर्ग-संघर्ष को हमने बड़ी मुश्किल से पुलिस-नक्सलवादी भिड़ंत प्रचारित करके टाला है, लेकिन …..मालिक ! इन परिस्थितियों में मेरी गद्दी का क्या होगा ? सरकार ! मुझे बचा लीजिये। यह गद्दी आपकी दी हुई चीज़ है। इसकी हिफाज़त कीजिये हुजूर| मैं अभी की तरह आजन्म आपकी वफादार दासी बनी रहूंगी ! सबूत के तौर पर …….(फिर वह एक टांग पर उचक कर प्रधानमंत्री को नरमुंडों की एक माला पहना देती है|) गदगद स्वर में आई.जी. ने आपको किसानों की माला पहनाई। यह विद्यार्थियों की माला है ! खुशबूदार ! सूंघ कर देखिये।”8.  देश के आधे से अधिक नेताओं की सच्चाई यही है जो परदे के सामने कुछ और परदे के पीछे कुछ और हैं। नक्सलवाद को हिंसात्मक आन्दोलन का रूप देने में ऐसे ही राजनीतिज्ञों का हाथ है जो अपने स्वार्थ के लिए गरीब किसान का पेट और युवा विद्यार्थी की जुबान दोनों काट सकते हैं। देश में अकाल कैसे पड़ता है, अकाल के समय केवल गरीब जनता ही इसका शिकार क्यों बनती है, सारा अनाज कहाँ जाता है, अकाल के समय जमींदार, साहूकार और अमीर क्यों हो जाते हैं ? इन सब सवालों के जवाब प्रधानमंत्री और धन्ना सेठ के इन संवादों के द्वारा मिलते हैं –

“ प्रधानमंत्री : (धन्ना सेठ को गुरेर कर ) और कहो, खूब कमा रहे हो न धन्ना सेठ ! इस बार चुनाव-कोष में कितना दे रहे हैं आप लोग ? सुना है, राज्य में गेहूं, कोयला, डालडा, चीनी, किरासन तेल, बिजली, पानी, कुछ नहीं मिलता। आप लोग खूब कमा रहे हैं !

भयभीत धन्ना सेठ : आपकी कृपा रही तो क्या नहीं हो सकता माईबाप ? आप ज़रा एकांत में मुख्यमंत्री जी को समझा देंगे कि कम से कम एक साल यही स्थिति रहने दें ; तो हम पिछली बार से दुगना चुनाव फंड देंगे

मुख्यमंत्री : (उछल कर) बाप रे ! एक साल ? असंभव ! तब तक तो भूखी जनता हमें कच्चा खा जाएगी; वह भी बिना नमक लगाए ! फिर कहाँ चुनाव का खेला होगा। देखिये (आवाज़ दबाकर ) दो महीने में जो करना है, कर डालिए !

…………………..

धन्ना सेठ- (रोते हुए ) हमारा क्या होगा सरकार…. हमारा क्या होगा।

प्रधानमंत्री – (ऊब कर बीच-बचाव करते हुए ) चलिए ‘चार’ पर मामला पक्का रहा। चार महीने तक अकाल को जारी रहा जाएगा। बदले में नगरश्रेष्ठ दुगना नहीं, चार गुना चुनाव कोष देंगे।”9.

    सरकारी नेता जो अपने आपको जनता का सेवक कहते हैं असल में वह ही सबसे बड़े जनता के भक्षक हैं। चुनाव फंड के लिए राज्य में अकाल जैसी स्थिति उत्पन्न कर देना और गरीब जनता को भूखे मरने के लिए छोड़ देना, विद्रोह करने पर उसे पुलिस-नक्सलवादी भिड़ंत बताकर हिंसात्मक रूप देना यह सरकार की साजिश नहीं है तो और क्या है और ऐसी स्थिति में एक आम किसान हथियार न उठाये तो क्या करे ? सरकार की इन्हीं गैर-जिम्मेदाराना नीतियों का परिणाम हम सब के समक्ष नक्सलवादी आन्दोलन के रूप में प्रस्तुत है। दरअसल गौर से देखा जाए यह आन्दोलन केवल किसानों या मजदूरों पर हो रहे शोषण के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाता बल्कि यह उस ‘जनतंत्र’ पर भी सवाल उठाता है जिसका प्रयोग हम अपने देश के लिए बड़े गौरव के साथ करते हैं कि –‘यहाँ तो लोकतंत्र है, जनता जिसे अपना नेता चुनेगी वही जनता की सेवा के लिए आयेगा’ लेकिन क्या वाकई में जनता को पता भी है उसे किसे चुनना है और किसे नहीं चुनना ? और जनता द्वारा चुना हुआ नेता क्या वाकई में जनता की सेवा में लगा हुआ है या नहीं ? क्या वाकई में हम ‘जनतंत्र’ शब्द का वास्तविक अर्थ जानते हैं ? अज़गर वजाहत अपने लेख ‘चम्बल घाटी के डाकुओं से एक अपील’ में ‘जनतंत्र’ पर व्यंग्य करते हुए लिखते हैं कि – “आज़ादी के बाद एक विशेष प्रकार के हथियार का जन्म हुआ है जिसे जनतंत्र कहते हैं।…. मैं तुम्हें सच कहता हूँ कि मित्रों, यदि ‘जनतंत्र’ से मेरा सही परिचय न कराया गया होता तो मैं भी आज चम्बल घाटी में होता। तुमने परमाणु बम का नाम सुना होगा।…. ‘जनतंत्र’ और ‘परमाणु बम’ में अंतर केवल इतना है कि परमाणु बम से सभी  जीवित वस्तुएं समाप्त हो जाती हैं, जबकि ‘जनतंत्र’ का प्रभाव क्षेत्र केवल मनुष्य तक सीमित है। ‘जनतंत्र’जंगली जानवरों, पेड़-पौधों आदि पर अपना घातक प्रभाव छोड़ पाने में असमर्थ है।…. मैंने इस शस्त्र का यथासंभव और यथास्थान खूब प्रयोग किया है।”10.  अज़गर वजाहत यहाँ साफ़ तौर पर ‘लोकतंत्र’ पर कटाक्ष करते हुए यह कहने का प्रयास कर रहे हैं कि भारत में जिस जनतंत्र की बात की जाती है वास्तविकता में वह ‘जनतंत्र’ है ही नहीं बल्कि बड़े-बड़े नेता और अधिकारी अपनी मर्ज़ी से, अपनी सहूलियत के अनुसार इस जनतंत्र के हथियार का इस्तेमाल करके लाचार जनता को लूटने का काम करते हैं। और हैरानी की बात यह है कि उनकी यह लूट की प्रक्रिया सालों साल ऐसी ही चलती रहती ही। न कोई कानून, न कोई मुक़दमा। कभी-कभार फंस भी गए तो बीसियों साल लग जाते हैं अदालत को दोषी को सजा सुनाने में। डाकुओं को  ‘जनतंत्र’ के फायदे समझाते हुए अजगर वजाहत आगे लिखते हैं – “तुम लोग यदि चम्बल घाटी से निकल आओ तो मेरे साथ मिलकर आयात-नियात का कारोबार कर सकते हो……..यदि कुछ न हुआ तो निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव तो जीत ही सकते हो। डकैती का लम्बा अनुभव लड़ने में बहुत सहायक होगा। जिस तरह तुम लोग डकैती में गाँव को चारों ओर से घेर लेते हो, …… उसी तरह उम्मीदवार भी एक बड़े इलाके को चारों ओर से घेर लेता है। तुम लोग केवल सोना-चांदी लूटते हो, परन्तु उम्मीदवार इतना नादान नहीं होता। वह लोगों से उन पर शासन करने का अधिकार लूट ले जाता है और उम्मीदवार अपने क्षेत्र के वर्तमान और भविष्य को बांधकर अपने साथ ले जाता है।”11.  ज़ाहिर है कि यहाँ लेखक चम्बल घाटी के डाकुओं से अधिक देश के नेताओं को खतरनाक बता रहा है जो इंसान से उसकी स्वतंत्रता, उसके जीने का अधिकार, उसकी इंसानियत सब छीन लेता है और इसके बाद भी भारत विश्व का सबसे बड़ा ‘जनतांत्रिक’ देश कहलाता है। दरअसल लेखक ने चम्बल के डाकुओं से अपील के बहाने देश के युवा वर्ग को यह बताने का प्रयास किया है कि ‘जनतंत्र’ के नाम पर किस तरह देश के नेता, सरकारें आम जनता को बेवकूफ बना रहे हैं। असल डाकू तो वो हैं जिन्होंने इस पूरे देश को चम्बल घाटी में परिवर्तित कर दिया है। इसलिए लेखक अंत में चम्बल के डाकुओं से यह अपील करते हैं कि तुम्हें भी वहां रहने की कोई आवश्यकता नहीं है राजधानी आओ ‘जनतंत्र’ का इस्तेमाल करके संसार का सुख लूटो।

      ‘फिलहाल’ पत्रिका ने  कविताओं, नाटकों एवं लेखों के माध्यम से नक्सलवादी आन्दोलन की तत्कालीन तस्वीर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने के साथ-साथ उन गतिविधियों पर भी प्रकाश डालने का प्रयास किया जो इस आन्दोलन के दौरान चर्चा का विषय बनी हुईं थीं और जिन्होंने केवल साहित्य में ही नहीं बल्कि समाज में भी एक नयी बहस शुरू कर दी थी। नक्सलवादी आन्दोलन धीरे-धीरे शिक्षित युवा वर्ग पर अपना गहरा प्रभाव छोड़ रहा था। स्कूल-कॉलेजों में पढ़ने वाले विद्यार्थी भी अब सड़कों पर आकर किसान-मजदूरों के अधिकारों के लिए प्रशासन से लोहा ले रहे थे। पढ़ाई का बहिष्कार, पुलिस, प्रशासन आदि से छात्रों की मुठभेड़ आम बात हो गयी थी। लेकिन छात्रों का आक्रोश दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा था। इसी आक्रोश में आकर एक दिन कुछ छात्रों ने जाकर रवीन्द्रनाथ की मूर्ति को तोड़ दिया। इसके बाद केवल साहित्यिक गलियारों में ही नहीं बल्कि पूरे भारत वर्ष में यह चर्चा का विषय बन गया कि छात्रों के द्वारा रवीन्द्रनाथ की मूर्ति को तोड़ना सही था या गलत। ‘फिलहाल’ में ‘रवीन्द्रनाथ की मूर्ति’ के सम्बन्ध में सबसे पहला लेख प्रसिद्ध अभिनेता उत्पल दत्त का प्रकाशित हुआ। हालांकि उत्पल दत्त का यह आलेख, आलेख कम कहानी अथवा नाटक के अधिक निकट जान पड़ता है क्योंकि उत्पल दत्त पात्रों के माध्यम से पूरी परिस्थिति का विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। इस कहानी/नाटक में तीन पात्र हैं पहला, स्वयं उत्पल दत्त जिन्होंने रवीन्द्रनाथ को ज्यादा नहीं पढ़ा इसलिए मूर्ति भंजन के सम्बन्ध में उनकी कोई स्पष्ट राय नहीं है, दूसरे जपेन दा जो रवीन्द्रनाथ की मूर्ति टूटने से अचंभित हैं और उन्हें दुःख है कि आज के विद्यार्थी रवीन्द्रनाथ को केवल एक सामन्तवादी लेखक/विचारक के रूप में देख रहे हैं और तीसरा,राजेन जो उस विद्यार्थी वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है जिन्होंने उस मूर्ति को तोड़ा। राजेन जैसे विद्यार्थी वर्तमान शिक्षा प्रणाली से खुश नहीं हैं। उसे ऐसा लगता है किताबों में जो लिखा है वह झूठ है, शासन द्वारा हम पर थोपा हुआ है इसलिए वह शिक्षा प्रणाली को बदलना चाहता है। स्कूल-कॉलेज के आंगन में खड़ी रवीन्द्रनाथ या विद्यासागर की मूर्ति को विद्यार्थी केवल इसलिए नहीं तोड़ रहे क्योंकि वह पूंजीपति या जमींदार वर्ग से आ रहे हैं बल्कि वह पुराने आदर्शों और व्यवस्था को समाप्त करके नए का आह्वान करना चाहते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो राजेन रवीन्द्रनाथ की मूर्ति को तोड़कर उनके विचारों और सिद्धांतों से आज़ाद होना चाहता है जो उसे बरसों से कैद किये हुए हैं। इसलिए वो मूर्ति पर हुए आक्रमण को सही ठहराते हुए कहता है – “यह तो मार्क्सवाद में सत्य है कि साहित्य,दर्शन, कानून आदि उत्पादन के संबंधों की नींव पर ही खड़े हैं| अगर नींव बदलती है तो उस पर खड़े विचार भी बदलते हैं। नयी समाज-व्यवस्था में पुराने विचार नष्ट हो जाते हैं, इसलिए तो रवींद्रनाथ पर ऐसा आक्रमण है।”12.  लेकिन जपेन दा राजेन की बातों से सहमत नहीं हैं। वह राजेन को डांटते हुए कहते हैं कि –“नींव बदलने से पुराने विचारों की इमारत भी बदल जाती है ? भाषा विचारूपी इमारत का एक मुख्य खम्भा है। तो क्या क्रान्ति के बाद भाषा भी बदल जाती है? फ़्रांस की क्रांति के बाद क्या वहां भाषा बदल गयी ? अक्टूबर क्रांति के बाद क्या लेनिन रुसी भाषा में बात नहीं करते थे ? स्तालिन ने बताया था कि मनुष्य की रचना जो उस युग को प्रतिबिंबित करती है, हर युग के लिए होती है| इसलिए तो नींव बदलजाने पर भी शेक्सपीयर और होमर भुला नहीं दिए गए बल्कि और भी ज्यादा सामने आये|”13.  जपेन दा के द्वारा लेखक यहाँ यह कहना चाह रहा है कि नयी व्यवस्था की स्थापना के लिए यह आवश्यक नहीं कि पुरानी व्यवस्था को जड़ से मिटा दिया जाए। अर्थात रवीन्द्रनाथ के विचारों से लोगों का  व्यक्तिगत तौर पर विरोध हो सकता है यह भी हो सकता है कि समाज की बदलती हुई परिस्तिथियों के साथ उनके कुछ विचार मेल नहीं खाते हों या पुराने हो गए हों लेकिन इसका यह अर्थ तो नहीं कि रवीन्द्रनाथ की मूर्ति को तोड़कर या उन्हें जमींदार वर्ग का साहित्यकार घोषित करके आप उनके सम्पूर्ण साहित्य से मुंह मोड़ लेंगे। किसी भी विचारक या साहित्यकार का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि वह किस वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं बल्कि उनके सम्पूर्ण साहित्य का बारीकी से विश्लेषण करना भी आवश्यक है। रवीन्द्रनाथ की कुछ कविताओं का उदाहरण देते हुए जपेन दा राजेन से कहते हैं – “उनके लिखे हुए स्वदेशी गाने हमारी कीमती संपदा हैं : ऐसी सहज भाषा में जनता के दिल की बात क्रान्ति के लिए और कोई नहीं कह पाया।…..शान्ति और अहिंसा को भूलते हुए उन्होंने ही तो कहा –

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भीषण प्रलय संगीत जगाओ

जगाओ रे, जगाओ इस भारत में

क्या तुम बहरे हो ? नहीं सुना तुमने ?

रिक्त है जो सर्वहारा

है विश्व में सर्वजयी,

गर्वमयी भाग्यदेवी के क्रीतदास नहीं।”14.

उत्पल दत्त ने अपनी इस नाटिका/ कहानी में रवीन्द्रनाथ की कविताओं के कई उदाहरण प्रस्तुत कर यह प्रमाणित करने का प्रयास किया है कि  नक्सलवादी आन्दोलन के दौरान रवीन्द्रनाथ के लेखन और व्यक्तित्त्व पर जो आरोप लगाये गए हैं वो निराधार हैं। जो लोग यह कहते हैं कि रवींद्रनाथ ने अपने साहित्य में कभी किसानों की या उनकी क्रान्ति की बात नहीं की दरअसल वह सभी न तो रवीन्द्रनाथ को समझ पाए और न ही उनके विचारों का सही रूप में मूल्यांकन कर पाए। जहाँ तक बात शिक्षा प्रणाली की है तो रवीन्द्रनाथ तो स्वयं इस परम्परागत शिक्षा प्रणाली के विरुद्ध रहे हैं| उन्होंने कभी-भी किताबी ज्ञान को पूर्ण शिक्षा माना ही नहीं, वह बेसिक शिक्षा-प्रणाली के खिलाफ थे और इसलिए उन्होंने विश्वभारती जैसे संस्थान की स्थापना की ताकि भविष्य में विद्यार्थी केवल किताबों पर आश्रित न रहें बल्कि व्यावहारिक ज्ञान के बल पर अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकें।

उत्पल दत्त के इस नाटिका/कहानी के सन्दर्भ में कुछ समीक्षाएं ‘फिलहाल’ में प्रकाशित हुईं थीं। इन समीक्षात्मक लेखों में लेखकों ने उत्पल दत्त के विचारों पर अपनी असहमति व्यक्त करते हुए रवीन्द्रनाथ के लेखन को और मूर्ति तोड़ने के आन्दोलन को एक अलग रूप में व्याख्यायित करने की कोशिश की है। एन. के. सेनगुप्ता अपने लेख ‘रवि ठाकुर की मूर्ति और उत्पल दत्त’ में मूर्ति तोड़ने के अभियान पर अपने विचार प्रकट करते हुए लिखते हैं –“जो लोग इन जन-विरोधी मनीषियों के प्रति एक भक्तिमूलक दृष्टिकोण रखते हैं, मूर्ति तोड़ने के आन्दोलन से और उसके साथ ही सूक्ष्म विश्लेषण और आलोचना और उसके प्रचारकार्य से उनके भी मन में भी एक प्रश्नचिह्न खड़ा हो जाएगा।”15.  उक्त कथन से स्पष्ट है कि रवीन्द्रनाथ या अन्य व्यक्तियों की मूर्तियों के भंजन के पीछे केवल विद्यार्थियों का आक्रोश नहीं था बल्कि इस अभियान का अपना एक अलग ही लक्ष्य था। जो लोग इस आन्दोलन का समर्थन कर रहे थे उनका मानना था कि समाज ने जिन मनीषियों को बड़ी-बड़ी पदवी देकर समाज-सुधारक घोषित किया है असल में वे सभी जन-विरोधी हैं क्योंकि ऐसे समाज-सुधारकों ने कभी-भी किसानों को क्रान्ति के लिए प्रेरित नहीं किया। इसके अलावा मूर्तिभंजन अभियान को बढ़ावा इसलिए दिया गया ताकि जो लोग इन जन विरोधियों को समाज-सुधारक मानते भी हैं उनके मन में भी यह प्रश्न उत्पन्न हो कि आखिर क्यों रवीन्द्रनाथ, राजा राममोहन राय, विद्यासागर जैसे व्यक्तियों की मूर्ति को तोड़ा जा रहा है ? और वजह का पता लगाने के लिए  उनके द्वारा किये गए कार्यों का विश्लेषण किया जाए, उसे नए रूप में व्याख्यायित किया जाए  ताकि नए तथ्य उभरकर सामने आयें और उनपर विचार-विमर्श के नए रास्ते खुलें और जो अंधभक्त इन समाज-सुधारकों की प्रशंसा में लिप्त रहते हैं उनकी आँखें भी सच्चाई देख सकें। ए.के सेनगुप्ता अपने लेख में राजा राम मोहन राय तथा विद्यासागर जैसे व्यक्तियों की छवि एवं कार्य पर प्रश्नचिह्न खड़े करते हुए कहते हैं – “भारत के प्रथम स्वातंत्र्य संग्राम में, जिसे उपनिवेशवादियों ने सिपाही विद्रोह कहा, ….उसमें ‘राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग’ के इन प्रतिनिधियों की क्या भूमिका थी? उस समय का इतिहास गवाही देता है कि उस समय इनकी भूमिका चरम विश्वासघातक और देशद्रोहपूर्ण थी।….. जपेन दा (उत्पल दत्त की नाटिका/कहानी के पात्र) जिस राजा राममोहन राय को भुलाने के लिए राजेन की भर्त्सना करते हैं, उसी राजा राम मोहन राय की रचनाओं से एक-दो उदाहरण देना निश्चय ही अप्रसांगिक नहीं होगा –

राममोहन के अनुसार – ‘किसान और ग्रामीण लोग नितांत मूर्ख होते हैं।’ इसलिए हमारे देश के अभिजात और व्यवसायी वर्ग के लोगों को ‘क्षमता और गुणों के अनुसार ऊँचे पद देकर उन्हें मर्यादा प्रदान करने से ब्रिटिश सरकार के प्रति उन लोगों की भक्ति और बढ़ेगी’। – Ram Mohan Ray works, pp.300.

‘भारतवासियों का सौभाग्य है कि भगवतकृपा से अंग्रेज उनकी देखभाल कर रहे हैं’|”16.

 

           ए. के. सेनगुप्ता राजा राम मोहन राय की तरह ही रवीन्द्रनाथ को भी जमींदार वर्ग का साहित्यकार घोषित करते हुए कहते हैं – “हम लोग क्या रवीन्द्रनाथ की किसी ऐसी रचना से परिचित हैं जो गरीब किसानों से उनके परिचय को ज़ाहिर करती हो ? अथवा रवीन्द्रनाथ का यह दावा, ‘एक समय जब मैं बंगलादेश की नदियों पर घूमते हुए उनके प्राणों की लीला का अनुभव कर रहा था, तब मेरी आंतरिक अनुभूतियों ने अपने आनंद से उन सबके सुख-दुःख के विचित्र आभास को अपने अंतर में संगृहीत करके महीने के बाद महीने लगाकर बंगाल के जिन ग्रामीण चित्रों की रचना की, वैसी पहले किसी ने नहीं की थी|’ (साहित्य-विचार,पृष्ठ-61)

               बेशक, जमींदार रवीन्द्रनाथ के मुंह से हम क्रांतिकारी किसानों की बात सुनेंगे –यह उम्मीद ही गलत है। स्वयंघोषित मानवतावादी जो व्यक्ति नदी-नदी घूमकर ही एक इलाके के लोगों के प्राणों की लीला को अनुभव करने की धृष्टता भरी बात कहता हो उसके मन को क्रांतिकारियों की गतिविधियां कैसे स्पर्श करेंगी ? क्योंकि क्रांतिकारी तो नदियों पर नहीं रहते हैं, वे रहते हैं जनसाधारण के बीच में, गरीब वर्गों के बीच में। अपनी इन सब धारणाओं से ही रवीन्द्रनाथ यह प्रकट कर देते हैं कि विचारों के क्षेत्र में वे किस वर्ग के प्रतिनिधि थे।”17.  ए.के. सेनगुप्ता ने जिस रूप में राजा राम मोहन राय एवं रवीन्द्रनाथ को व्याख्यायित किया है उससे स्पष्ट है कि वह इन दोनों विचारकों को सामंतवादी वर्ग के प्रतिनिधि से अधिक कुछ और नहीं मानते। लेकिन यह यहाँ सवाल उठता है कि उत्पल दत्त ने अपनी कहानी/नाटिका में रवीन्द्रनाथ की जिन कविताओं के अंश उद्धृत किये हैं- उनके संदर्भ में ए.के. सेनगुप्ता ने कुछ क्यों नहीं लिखा या उन कविताओं के अंशों को भी क्यों  व्याख्यायित करके यह साबित नहीं किया कि रवींद्रनाथ द्वारा रचित यह कवितायें भी किसान विरोधी हैं या इनमें भी किसान क्रान्ति की कोई बात नहीं है। ए.के. सेनगुप्ता रवीन्द्रनाथ और राजा राम मोहन राय के जिन पंक्तियों को उद्धृत करके उन्हें सामन्तवादी वर्ग का प्रतिनिधि घोषित कर रहे हैं वह पंक्तियाँ किस संदर्भ में लिखी गयी हैं इसकी विवेचना सेनगुप्ता अपने लेख में नहीं करते। किसी भी व्यक्ति का दृष्टिकोण तब तक स्पष्ट नहीं हो सकता जब तक उसके द्वारा विवेचित विचारों का मूल्यांकन सही संदर्भ में न किया जाए और यहाँ तो सेनगुप्ता कुछेक पंक्तियों का सहारा लेकर दो विचारकों की मानसिकता पर ही प्रश्नचिह्न खड़े कर रहे हैं। यहाँ यह नहीं कहा जा रहा है कि उत्पल दत्त ने जिस रूप में रवीन्द्रनाथ को प्रस्तुत किया है वह सही है और ए.के.सेनगुप्ता ने जिस तरह व्याख्यायित किया है वह गलत। यहाँ प्रश्न है स्पष्टता का। उत्पल दत्त की नाटिका/कहानी में रवीन्द्रनाथ को सीधे जनसाधारण का साहित्यकार घोषित नहीं कर दिया। लेखक ने स्वयं रवीन्द्रनाथ के विचारों को लेकर कई सवाल उठाये। उत्पल दत्त शुरुआत में रवीद्रनाथ को स्वयं एक बुर्जुवा कवि घोषित करते हैं उसके बाद बारी-बारी से रवीन्द्रनाथ की रचनाओं का उदाहरण देते हुए इस सच्चाई से पर्दा उठाते हैं । लेकिन सेनगुप्ता ने अपने समीक्षात्मक लेख की शुरुआत में ही रवीन्द्रनाथ और उन जैसे अन्य सामन्तवादी वर्ग से आने वाले विचारकों को सीधे-सीधे जन-विरोधी घोषित कर दिया जो किसी भी दृष्टि से सही इसलिए नहीं कहा जा सकता क्योंकि ‘जन’ में केवल मजदूर और किसान नहीं आते हैं। उनमें स्त्री.दलित हर वर्ग शामिल है। इसलिए यह कहना कि रवीन्द्रनाथ या राजा राम मोहन राय की मूर्ति इसलिए तोड़ी गयीं क्योंकि वह जन विरोधी थे या जन-साधारण के लेखक/विचारक नहीं थे, यह दृष्टिकोण पूरी तरह से एकांगी है। मूर्ति तोड़ो अभियान दो विचारधाराओं का आपसी टकराव है लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि इस टकराव में एक विचारधारा को पूरी तरह नष्ट करके उसे जन-विरोधी ही घोषित कर दिया जाए। टकराव कुछेक पहलुओं पर हो सकता है जो जायज़ है लेकिन कुछेक मुद्दों को लेकर पूरी विचारधारा या दृष्टिकोण को ही मिटा देना यह किसी भी से न्यायपूर्ण नहीं हो सकता।

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उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि हिंदी साहित्य में नक्सलवादी आन्दोलन की सही एवं स्पष्ट तस्वीर प्रस्तुत करने में ‘फिलहाल’ पत्रिका का विशेष योगदान रहा है। ‘फिलहाल’ उन चुनिन्दा लघु पत्रिकाओं में से एक थी जिन्होंने पत्रिका को अपनी व्यक्तिगत उपलब्धि का साधन न बनाकर उसे जनमानस और साहित्य की सेवा के लिए उपयोग किया। जैसा कि विदित है ‘फिलहाल’ का उद्देश्य था अधिक से अधिक लोगों के साथ जुड़कर उनके सामने ‘नक्सलवादी आन्दोलन’ की वास्तविक तस्वीर पेश कर उन्हें जागरूक करना। जैसे ही ‘फिलहाल’ अपने इस लक्ष्य को साधने में सफल हुई उसका प्रकाशन बंद कर दिया गया।

अन्य लघु पत्रिकाओं में ‘नक्सलवादी आन्दोलन’ की तस्वीर –  ‘फिलहाल’ के अलावा हिंदी की कुछेक ऐसी पत्रिकाएं और थीं जो ‘नक्सलवादी आन्दोलन’ के परिप्रेक्ष्य में अपने विचारों को प्रस्तुत करने में पीछे नहीं थीं| इनमें से ही एक पत्रिका थी वाराणसी से कंचन कुमार के संपादन में निकलने वाली ‘आमुख’। आमुख की शुरुआत सन् 1965 में हुई थी। आमुख के पहले ही अंक में कंचन कुमार ने स्पष्ट तौर पर ज़ाहिर कर दिया था कि यह पत्रिका समाज, साहित्य एवं सभ्यता का अन्धानुकरण करने वाली पत्रिकाओं में से नहीं बल्कि उन प्रतिरोधी आवाज़ों का संकलन है जिनके स्वर को कभी समाज के नाम पर तो कभी सभ्यता के नाम पर हमेशा से कुचला गया है। ‘आमुख’ ने किसान-मजदूरों द्वारा शुरू की गयी क्रांति का पुरज़ोर समर्थन किया। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ‘आमुख’ ने नक्सलबाड़ी के किसान जन उभार के बाद मानो मकसद पा लिया था।18.   कंचन कुमार अपनी पत्रिका के ज़रिये ‘नक्सलवादी आन्दोलन’ का समर्थन करने वाली प्रतिरोधी आवाजों का चित्रण करके न केवल सरकार के खोखले जनतंत्र को बेनकाब कर रहे थे बल्कि  उनकी जनविरोधी नीतियों, आन्दोलन को दबाने के उनके प्रयासों का भी पर्दाफाश कर रहे थे। आमुख के सन् 1969 के अंक में सत्राजित मजुमदार का एक लम्बा नाटक प्रकाशित हुआ था जिसमें उन विद्यार्थियों और अध्यापकों की दशा का वर्णन किया गया जो ‘नक्सलवादी आन्दोलन’ का समर्थन कर रहे हैं। सरकार, विश्वविद्यालय प्रशासन तथा राज्य के पुलिस तीनों मिलकर किस प्रकार आन्दोलन का दमन कर रहे थे और बेकसूरों को गुंडों की संज्ञा देकर कैसे उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा था  इसका सशक्त चित्रण उप-कुलपति और अध्यापक के बीच हुए इन संवादों में हुआ है –

“अध्यापक : (उप-कुलपति से ) उस दिन उन्होंने (पुलिस ने) हमारे कॉलेज में घुसकर अध्यापकों को पीटते हुए बाहर निकाल दिया। उनमें से एक बूढ़े अध्यापक और अध्यापिका भी थीं।

पुलिस अधिकारी – आप भी कैसी बातें करते हैं। मेरी पुलिस कभी-भी इस तरह का काम नहीं कर सकती। भला, अध्यापक और गुंडों को नहीं पहचानते !

            (प्रॉक्टर ने उपकुलपति के कान में कुछ कहा )

अध्यापक – लेकिन वो बूढ़े अध्यापक और अध्यापिका अभी- भी अस्पताल में हैं।

उपकुलपति – देखो, यह मामला मैं अच्छी तरह समझ गया। ये अगर नहीं होते तो हमारा जाने क्या हाल होता ? मुझे विश्वस्तर-सूत्र से पता चला है कि वे सारे गुंडे लड़के पुलिस की वर्दी पहनकर तुम्हारे अध्यापकों को पीट आये हैं। यह बड़े दुःख की बात है, मगर क्या किया जाये ? इन गुंडों को मारने के लिए ही तो यह सब किया जा रहा है। और यह लोग इतना स्वार्थ त्याग कर रहे हैं। तुम लोग भी थोड़ा सा कर लो तो हर्ज़ क्या है।”19.

    स्पष्ट है कि ‘नक्सलवादी आन्दोलन’ की चिंगारी को दबाने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन और राज्य की पुलिस ने सच पर झूठ का मुखौटा चढ़ाकर सर्वप्रथम उन बेगुनाहों को अपना निशाना बनाया जिनका इस आन्दोलन से दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं था ताकि लोगों के मन में इस आन्दोलन का समर्थन करने वालों के प्रति संदेह उत्पन्न हो जाए और वह इस आन्दोलन की वास्तविकता को जाने बिना इससे दूर हो जाएँ। और ऐसा हुआ भी लेकिन ‘आमुख’ जैसे प्रतिरोधी संकलनों ने शिक्षित युवा वर्ग को ‘नक्सलवादी आन्दोलन’ के वास्तविक परिदृश्य से परिचित कराकर उनके मन में उत्पन्न कई भ्रांतियों को दूर कर उन्हें नयी राह प्रदान की।

‘आमुख’ के अलावा कुछेक पत्रिकाएँ ऐसी भी थीं जिन्होंने प्रत्यक्ष रूप से तो कभी ‘नक्सलवादी आन्दोलन’ के सम्बन्ध में अपने स्पष्ट विचार प्रस्तुत नहीं किये लेकिन साहित्य विशेषकर, कविताओ के ज़रिये नक्सल क्रांति को विवेचित करने का प्रयास किया है। इन पत्रिकाओं में प्रमुख हैं – युवा, लहर, नई धारा आदि। ‘युवा’ में प्रकाशित कविता का उदाहरण कुछ इस प्रकार है –

“कारागार में….

हथकड़ी पड़े हाथ आकाश में उठेंगे

अत्याचारी शासन के विरुद्ध

कारागार में

प्रकाश के गर्जन से तिमिर का होगा नाश

सबकी मुक्ति के लिए

कारागार में

अन्नहीन बच्चों के लिए

रोटी का युद्ध शुरू

भूख और रोग से ग्रस्त

बच्चों के लिए ….”20.

प्रस्तुत कविता जेलों में बंद उन आन्दोलनकारियों का आह्वान है जो अब मुक्ति के लिए एक नयी क्रांति की शुरुआत करने जा रहे हैं। दरअसल यह कविता एक क्रांतिकारी के उस संकल्प को दर्शा रही जो कभी प्रशासन के सामने घुटने नहीं टेकता बल्कि हर हालत में उसके खिलाफ लड़ने के लिए तैयार रहता है। यह कविता उन हजारों विद्यार्थियों, अध्यापकों के संघर्ष को प्रतिबिंबित कर रही है जिन्होंने जेल में रहते हुए प्रशासन के खिलाफ अपने आन्दोलन को जारी रखा।

 निष्कर्ष –  उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि नक्सलवादी आन्दोलन के प्रकृति से हिंदी पाठकों को अवगत कराने में हिंदी की कुछेक पत्रिकाओं (फिलहाल,आमुख, युवा) ने सराहनीय योगदान दिया है। लेकिन इस विश्लेषण के दौरान यह बात भी सामने आई कि लघु पत्रिका आन्दोलन के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली अधिकतर पत्रिकाओं (कल्पना, अणिमा, संचेतना आदि ) ने इस विषय पर अपनी चुप्पी को बनाये रखा। इस चुप्पी को बनाये रखने एक कारण यह हो सकता है कि यह पत्रिकाएं ‘नक्सल क्रान्ति’ के पीछे जो विचारधारा हो उससे सहमत न हों। लेकिन अगर यह पत्रिकाएं वाकई में ‘नक्सल क्रान्ति’ के किसी पहलू को लेकर आशंकित थीं या उससे असहमत थीं तो इन्हें उस असहमति से पाठकों को रूबरू कराना चाहिए था न कि उस पर चुप रहकर लघु पत्रिका आन्दोलन के विज़न पर सवालिया निशान खड़े करने चाहिए थे। कोई भी क्रान्ति या आन्दोलन एक विशेष वर्ग द्वारा शुरू अवश्य किया जाता है लेकिन उसकी चिंगारी पूरे देश को अपने में समेट लेती है इसलिए यह आवश्यक है कि पत्रिकाएँ खासकर लघु पत्रिकाएँ जो जनसाधारण के हित के लिए कार्य करने का दावा करती हैं वह अपनी भूमिका को निष्पक्ष तरीके से निभाएं। ज़ाहिर है कि समाज में होने वाली प्रत्येक गतिविधि की बात यहाँ नहीं की जा रही लेकिन जो गतिविधि पूरे राष्ट्र को प्रभावित कर रही है उन पर पत्रिकाओं में बात होना आवश्यक है|

संदर्भ

  1. http://gopalpradhan.blogspot.com/2016/03/blog-post.html
  2. तलवार,वीर भारत, ‘नक्सलबाड़ी के दौर में’, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण -2007, पृष्ठ संख्या – 15.
  3. http://gopalpradhan.blogspot.com/2016/03/blog-post.html
  4. तलवार,वीर भारत, ‘नक्सलबाड़ी के दौर में’, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण -2007, पृष्ठ संख्या – 564.
  5. वही.
  6. वही, पृष्ठ संख्या- 586.
  7. वही, पृष्ठ संख्या – 593.
  8. वही, पृष्ठ संख्या – 605.
  9. वही, पृष्ठ संख्या – 606-607.
  10. वही, पृष्ठ संख्या – 589-590.
  11. वही, पृष्ठ संख्या – 590.
  12. वही, पृष्ठ संख्या – 546.
  13. वही, पृष्ठ संख्या – 546-547.
  14. वही, पृष्ठ संख्या – 549-550.
  15. वही, पृष्ठ संख्या – 558.
  16. वही, पृष्ठ संख्या – 559.
  17. वही, पृष्ठ संख्या – 560-561.
  18. http://sanhati.com/wp-content/uploads/2015/08/aamukh_intro.pdf
  19. ‘आमुख’, संपा. कंचन कुमार, संकलन-6, वर्ष-1969, पृष्ठ संख्या – 8-9. (पत्रिका का लिंक-http://sanhati.com/wp-content/uploads/2015/10/vol006.pdf).
  20. उद्भ्रांत, ‘लघु पत्रिका आन्दोलन और युवा की भूमिका’, जवाहर पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण -2009, पृष्ठ संख्या –285
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