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जीवन संगिनी

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जीवन संगिनी

इस कविता का आधार है एक ऐसा पति जिसकी पत्नी की अचानक से मृत्यु हो जाती है, तब उसके मन की जो संकल्पनाऐं जन्म लेती हैं उनका वर्णन किया है, !

सब सन्न हैं ,
सब मौन हैं ,
स्तब्ध हैं सब कोई यहाँ
है गिरी बिजली सी कोई,
या गिर पङा पहाड़ है
आत्मा का है ग़मन,
अब
ये जिस्म भी बेजान है
थी ,
कल चहकती सी , महकती सी
जैसे हो कुमुदुनी की कली ,
छोङकर मुझको अकेला ,
वो अकेली ही चली ,
जन्मों की खाई थीं कसमें,
फेरे सात जन्मों के लिये,
साथ देंगे एक दूसरे का ,
फिर क्या हुआ? मेरी प्रिये ,
कुछ अनौखी अटपटी सी ,
तेरी वो नादानियां ,
एक फिल्म जैसी रील चलती ,
हैं झलकतीं झलकियां,
क्या हुआ? कैसे हुआ?
कब हुआ ये हादसा ?
कुछ न,
समझ में आ रहा है,
जिंदगी का इम्तहान,
हंसती खेलती जिंदगी में ,
हो गया बिखराव है ,
दो दिलों के मिलन में,
हो गया एक घाव है ,
दर्द इसका है अजब सा ,
टीस दिल में ही रहे
सब दिखेंगे चलते फिरते ,
न तुम दिखोगी हे प्रिये ,
बात किससे में कहूँगा,
अपने दिल ए जजबात की ,
प्यार किससे में करूँगा,
ये तुम नहीं हो जानती ,
हूँ अकेला में तेरे बिन,
इस भरे संसार में,
लङ सके सबसे अकेला ,
शक्ति है वो प्यार में ,
न दिखेगा रूप तेरा ,
जो मुझे इठलाऐगा ,
सोच कर हर बार तुमको ,
दिल मेरा भर आएगा ,
क्यों अकेला रह गया मैं,
संग मुझको क्यों न ले चली ,
लग रही हो सेज पर,
लेटी हुई भी सुंदरी ,
क्या कहूँ, किसकी सुनूं मैं,
सब कुछ मेरा बेकार है ,
आदमी की जिंदगी में,
पत्नी ही संसार है ,
इस दर्द को ,
अपने मैं कैसे ,
तुमको बांटूँ , हे प्रिये
एक पल ही बिन तेरे , यूं लगता ,
जैसे वर्षों से तन्हा जिये ।

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