जीवन को पुनः देखने का नजरिया है आत्मकथा

Description: E:\Picture vikal 1.jpgविकल सिंह (शोधार्थी)

आत्मकथा हिन्दी गद्य साहित्य की प्रमुख विधाओं- कहानी, उपन्यास, नाटक और निबंध इत्यादि में अपना विशेष स्थान रखती है। आत्मकथा लिखना समाज में अपने अनुभव से दूसरों को लाभान्वित करना है, क्योंकि अपने ‘स्वत्व’ की सहज अभिव्यक्ति ही आत्मकथा है। इसमें लेखक अपनी जीवन कथा को स्वयं वर्णित करता है। इस प्रकार आत्मकथा का लेखक स्वयं नायक के रूप में उपस्थित होता है। अपने जीवन के क्रमिक विकास, जीवनानुभूतियों एवं अपनी स्मृतियों से टकराते विभिन्न पक्षों को वह आत्मकथा में प्रस्तुत करता है। आत्मकथा को जीवन-यथार्थ के रूप में भी देखा जा सकता है, क्योंकि इसमें लेखक अपने जीवन के विभिन्न पक्षों, अपने परिवेश एवं अपने समय की परिस्थितियों से पाठक वर्ग को परिचित कराता है। कह सकते हैं कि आत्मकथा एक समय विशेष की परिस्थितियों से टकराती हुई किसी व्यक्ति विशेष का जीवन-ब्यौरा है। आत्मकथा शब्द के लिए अनेक शब्द कोशों में अलग-अलग अर्थ दिए गए हैं। बृहत् हिन्दी कोश’ में आत्मकथा का अर्थ ‘अपनी जीवन-कहानी’ या ‘स्वलिखित जीवन चरित’ माना गया है।1 डॉ. हरदेव बाहरी लिखित ‘हिन्दी शब्द कोश’ ने आत्मकथा को ‘आपबीती’ या ‘अपने जीवन की कथा’ माना है।2 जबकि भार्गव आदर्श हिन्दी शब्द कोश’ ने आत्मकथा को ‘स्वलिखित जीवनी’ माना है।3 यहाँ इन सब पक्षों के बरक्स आत्मकथा शब्द पर विचार करना आवश्यक हो जाता है। आत्मकथा शब्द ‘आत्म’ और ‘कथा’ से मिलकर बना है। आत्म को यदि हम ‘मैं’ (मेरा, अपना, मेरी, निजी) और कथा को ‘कहानी’ से संदर्भित करें तो हम इन दोनों शब्दों को विश्लेषित करने पर पाते हैं- ‘मेरी कहानी’ या ‘अपनी कहानी’ अर्थात् अपने जीवन के जिये हुए पहलुओं की कथा। ईमानदार अभिव्यक्ति और तटस्थता इसकी अनिवार्य शर्त होती है। अतः ‘आत्मकथा’ शब्द का सम्यक् मूल्यांकन करने पर जो अर्थ सबसे उपयुक्त जान पड़ता है, वह है- ‘आत्मसाक्ष्य’ या ‘आत्मसत्व’। इस आधार पर कहा जा सकता है कि अपने जीवन के साक्ष्यों को वास्तविकता एवं तटस्थता के साथ प्रस्तुत करना ही आत्मकथा है।

आत्मकथा की कथावस्तु आत्मकथाकार के जीवन के गुजरे हुए समय पर आधारित होती है। साहित्यिक क्षेत्र में इस विधा का सृजन करना रचनाकार के लिए साहित्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा कठिन ही जान पड़ता है। बहुत ही कम लोग ऐसे हैं, जो सच्चाई के साथ अपनी जीवन-कथा लिखने का साहस रखते हैं। आत्मकथा को कठिन लेखन स्वीकारते हुए शिवपूजन सहाय अपने एक लेख ‘मतवाला कैसे निकला’ में लिखते हैं- “मेरी आत्मकथा, आरम्भ से आज तक, इतनी भयावनी है कि सचमुच यदि मैं ठीक-ठाक लिख दूँ, तो बहुत-से लोग विष खाकर सो रहें, या नहीं तो मेरे ऊपर इतने मान-हानि के दावे दायर हो जायँ कि मुझे देश छोड़कर भाग जाना पड़े। इसलिये मैं सब बातों को छिपाकर आत्मकथा नहीं लिखूँगा।”4 आत्मकथा लेखन में जिस सत्यता की आवश्यकता होती है, उसे प्रस्तुत करने के लिए लेखक को अपने प्रति निर्मम और निर्वैयक्तिक होना पड़ता है। यही कारण हो सकता है कि आत्मकथा जीवन के ऐसे मोड़ पर लिखी जाती है- “जब व्यक्ति अपनी भरपूर जिन्दगी जी चुकता है। जिया जा रहा समय उसे बोनस लगता है और उसे लगता है, अब उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा। उसकी कलम बेबाक हो जाती है और सच बोलने से उसे न खौफ होता है, न परहेज।”5 सुधा अरोड़ा के इस कथन के आधार पर कहा जा सकता है कि साहित्य की यह विधा किसी लेखक की सबसे परिपक्व अवस्था में लिखी जाने वाली विधा है।

साहित्यिक क्षेत्र में आत्मकथा एक ऐसी विधा है जिसे अन्त तक वास्तविकता के अधीन रहना पड़ता है। इसमें आत्मकथाकार अपने जीवन के सुख-दुःख, भोगे हुए क्षणों एवं जीवन के तमाम गूढ़ रहस्यों को प्रस्तुत करता है। इस प्रकार आत्मकथा अपने रचनाकार को उसके जीवन-अतीत से जोड़ती है। इस संदर्भ में डॉ. नगेन्द्र का यह कथन दृष्टव्य है- “आत्मकथाकार अपने सम्बन्ध में किसी मिथ की रचना नहीं करता, कोई स्वप्न दृष्टि नहीं रचता। वरन् अपने गत जीवन के खट्टे-मीठे, उजले-अंधेरे, प्रसन्न-विषण्ण, साधारण-असाधारण सरंचना पर मुड़कर एक दृष्टि डालता है, अतीत को पुनः कुछ क्षणों के लिए स्मृति में जी लेता है और अपने वर्तमान तथा अतीत के मध्य सम्बन्ध सूत्रों का अन्वेषण करता है।”6 यही कारण हो सकता है कि इसके अंतर्गत किसी के जीवन की कार्य-प्रणाली एवं भोगे हुए सुख-दुःख के अनुभवों का तटस्थ विश्लेषण देखने को मिलता है। आत्मकथाकार के जीवन की बुराइयाँ हमें आने वाले समय में उनके दुष्परिणामों से आगाह तो करती ही हैं, साथ ही उसके जीवन की अच्छाइयाँ हमें प्रेरित भी करती हैं। इस प्रकार आत्मकथा को हिन्दी साहित्य की एक उपदेशपरक विधा या जीवन की सच्चाइयों से रूबरू कराने वाली विधा के रूप में देखा जा सकता है। कहा जा सकता है कि आत्मकथा एक प्रेरणादायी विधा है। आत्मकथा में लेखक अपने जीवन का स्वयं निरीक्षण करता है। इसलिए उसे तटस्थ होकर ईमानदारी के साथ अपनी जीवन कथा लिखनी चाहिए। कई बार लेखक अपने जीवन के कमजोर पक्षों को छिपा लेता है और ऐसा भी हो सकता है कि आत्मप्रशंसा में लेखक कुछ प्रसंगों को बढ़ा-चढ़ाकर बताए। आत्मकथा लेखन के लिए यह सही नहीं हो सकता। इस संदर्भ में चन्द्रकिरण सौनरेक्सा का यह कथन “जीवन-यात्रा (आत्मकथा) तभी समाज के लिए उपयोगी होगी जब उस यात्रा कथा में पाठक को समाज, या युग या मनुष्य का वर्णन रसमय और वास्तविक रूप से प्रतिबिम्बित मिले। उसे पढ़कर पाठक उन बुराइयों के प्रति सचेत हो जो समाज को पिछड़ापन देती हैं।”7 अतः लेखक को तटस्थतापूर्वक ईमानदारी के साथ अपने जीवन-साक्ष्यों को प्रस्तुत करना चाहिए। यह तटस्थता और निरपेक्षता आत्मकथा लेखन की सबसे बड़ी चुनौती है। आत्मकथाकार को आत्मकथा लेखन में यह ध्यान रखना चाहिए कि उसकी आत्मकथा आत्म-प्रदर्शन तक सीमित न रहकर आत्मनिरीक्षण एवं आत्मविश्लेषण के रूप में सामने आए।

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हिन्दी साहित्य में आत्मकथा एक महत्वपूर्ण विधा है। हिन्दी साहित्य में आत्मकथा के बीज वीरगाथा काल या आदिकाल से देखे जा सकते हैं। चंदबरदाई कृत महाकाव्य ‘पृथ्वीराज रासो’ में कवि ने मुख्य रूप से पृथ्वीराज के जीवन वृत्त का वर्णन किया है, किन्तु गौण रूप से वह पूरे महाकाव्य में स्वयं भी उपस्थित रहा है। कवि चंद के सन्दर्भ में रामचन्द्र शुक्ल के इस कथन को देखा जा सकता है- “इनका जीवन पृथ्वीराज के जीवन के साथ ऐसा मिला-जुला था कि अलग नहीं किया जा सकता । युद्ध में, आखेट में, सभा में, यात्रा में, सदा महाराज के साथ रहते थे और जहाँ जो बातें होती थीं, सब में सम्मिलित रहते थे।”8 कवि ने अपने जीवन के जो क्षण पृथ्वीराज के साथ बिताए, जो कुछ देखा-सुना वह सब इस महाकाव्य में उद्घाटित हुआ है। इस प्रकार आत्मवृत्त कहने का कुछ अंश या बीज हमें आदिकाल से दिखाई देता है। ब्रजभाषा में रचित बनारसीदास जैन की आत्मकथा ‘अर्द्ध कथानक’ (1641 ई.) जब हिन्दी की प्रथम आत्मकथा के रूप में सामने आई, तब आत्मकथा का स्वरूप इतना विकसित नहीं था। हिन्दी गद्य साहित्य की यह प्रथम आत्मकथा ब्रज भाषा में पद्यात्मक रूप में आई थी। धीरे-धीरे इसके स्वरूप में परिवर्तन होता गया और यह विधा गद्य में लिखी जाने लगी। प्रारम्भ में साहित्यिक क्षेत्र में इस विधा को संदेह की नज़र से देखा जाता था, क्योंकि आत्मकथा अपने जीवन की सच्ची अनुभूतियों, घटनाओं एवं सुख-दुःख इत्यादि का तटस्थ ब्यौरा होती है। इस आधार पर लेखक द्वारा अपने कमज़ोर पक्षों को छिपाना या अनेक पक्षों को अलंकृत कर बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करने की आशंका पाठक एवं आलोचक वर्ग में उत्पन्न होना स्वाभाविक ही था। परन्तु धीरे-धीरे इसका विकास होता गया और आत्मकथा हिन्दी गद्य साहित्य की एक स्वतंत्र एवं विश्वसनीय विधा के रूप में स्थापित हो गई।

आत्मकथा सिर्फ़ किसी के जीवन का ब्यौरा मात्र नहीं होती है, बल्कि वह उस व्यक्ति के परिवेश एवं उस समय की परिस्थितियों को भी जानने का एक माध्यम हो सकती है । मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, उसके सारे क्रिया-कलाप समाज में ही सम्पन्न होते हैं। इसलिए किसी भी व्यक्ति की आत्मकथा नितांत व्यक्तिगत होते हुए भी उस समय की सामाजिक परिस्थितियों एवं उसके परिवर्तनों से जुड़ती है। विमर्शों के सन्दर्भ में तो यह बात और भी स्पष्ट हो जाती है। पाठक इन आत्मकथाओं को पढ़ते हुए उसमें अभिव्यक्त पीड़ा की बेचैनी से गुजरता है और उसे यह आभास होता है कि ये पीड़ा व्यक्तिगत न होते हुए उस समय की सामाजिक परिस्थितियों की देन है। इस प्रकार आत्मकथा लेखक द्वारा पाठक वर्ग को अपने जीवनानुभव से जोड़ना भी आत्मकथा को महत्त्वप्रदान करता है। इसके माध्यम से किसी चर्चित व्यक्ति के जीवन के अत्यंत व्यक्तिगत पक्षों को भी पाठक जान लेता है। साथ ही उसके जीवन के अच्छे-बुरे तथा प्रेरणादाई कारणों और जीवन-संघर्षों से भी परिचित होता है। इस अनुभव से जुड़कर पाठक वर्ग लाभान्वित होता है, क्योंकि वह किसी चर्चित व्यक्ति की सफलता और असफलता के पीछे छिपे कारणों को आत्मकथा के माध्यम से जानकार प्रेरणा ले सकता है। अतः आत्मकथा नितांत व्यक्तिनिष्ठ होते हुए भी सर्वनिष्ठ-सर्वहित का भाव रखती है, जो इस विधा की एक प्रमुख विशेषता है।

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वर्तमान समय में साहित्यिक क्षेत्र में विमर्शों का सबसे तटस्थ और सूक्ष्म विश्लेषण करने वाली विधा के रूप में भी ‘आत्मकथा’ को देखा जा सकता है, क्योंकि समाज में उपेक्षित, शोषित, सताए हुए दबे-कुचलों की पीड़ा एवं उनकी वेदना को सबसे सशक्त रूप में आत्मकथा ही प्रस्तुत करती है । इस संदर्भ में बलवंत कौर अपने एक लेख ‘खांटी घरेलू औरत की कहानी’ में लिखती हैं- “जितने भी पीड़ित समुदाय हैं चाहे वह दलित हों या स्त्री उनके लिए अपनी पीड़ाओं को, आत्मानुभूतियों को अभिव्यक्त करने का सबसे सरल व प्रथम माध्यम आत्मकथाएँ ही हैं।”9 इसका कारण यह भी है कि आत्मकथा को लिखने वाला स्वयं भुक्तभोगी होने के कारण अपनी पीड़ा को बहुत प्रमाणिकता के साथ प्रस्तुत कर सकता है, क्योंकि भूख की पीड़ा क्या है? यह वही बता सकता है, जो भूखा हो। किसी भूखे को देखकर उसकी पीड़ा का समुचित आकलन नहीं किया जा सकता है। अतः आत्मकथा सहानुभूति से परे स्वानुभूति का लेखा-जोखा है, जिसे आत्मकथा की एक प्रमुख विशेषता के रूप में देखा जा सकता है।

समकालीन परिवेश में आत्मकथा लिखने का बहुत ही सशक्त दौर प्रारम्भ हुआ है। आज सिर्फ़ साहित्यकार ही नहीं, समाजसेवी, खिलाड़ी, राजनेता एवं अनेक चर्चित व्यक्ति अपनी आत्मकथा लिख रहे हैं। पाठक वर्ग में किसी चर्चित व्यक्ति जो अपने जीवन के किसी विशेष मुकाम तक पहुँच गया हो, की आत्मकथा पढ़ने के लिए अधिक उत्सुकता होती है। जब व्यक्ति अपने जीवन के तमाम वर्षों की अनुभव साधना से अपनी आत्मकथा लिखता है तो लोगों को उसकी सफलता और उसके पीछे छिपे प्रेरणादाई कारणों को जानने का अवसर मिलता है। यही कारण हो सकता है कि लोगों में किसी चर्चित या प्रतिष्ठित साहित्यकार की आत्मकथा को पढ़ने की उत्सुकता अधिक होती है, क्योंकि वह उन पक्षों को भी जानना चाहता है जिनसे वह अब तक अनजान था। संभवतः तभी तो आत्मकथा अपने नाम से कम उसके लेखक के नाम से अधिक जानी जाती है। चाहे वह ‘सचिन की आत्मकथा’ हो या ‘नेहरू जी की आत्मकथा’ या फिर किसी और की, पाठक वर्ग उसके लेखक के नाम द्वारा ही उससे अधिक जुड़ता है।

आत्मकथा विधा इतिहास को जानने-समझने का भी एक माध्यम हो सकती है। किसी व्यक्ति विशेष की आत्मकथा पढ़कर उस समय विशेष की परिस्थितियों को भी जाना जा सकता है। इतिहास को पढ़ना-समझना भले ही बोझिल लगे, परन्तु आत्मकथा सहज रूप में ही इतिहास से हमारा साक्षात्कार करा देती है। इस सन्दर्भ में ज्योति चावला अपने एक लेख ‘पिंजरे से बाहर मैना’ में लिखती हैं- “इतिहास चाहे कितना ही ज्ञानवर्धक तथा तथ्यपरक क्यों न हो, उसे पढ़ना उतना ही बोझिल है। लेकिन आत्मकथा उसी इतिहास को किस्से-कहानी की तरह आपके सामने खोलकर रख देती है, और वह किसी उपन्यास या कहानी की तरह कल्पनाश्रित नहीं होती, इसलिए उसकी प्रामाणिकता भी बनी रहती है। जर्मनी का इतिहास चाहे जितना बोझिल हो, हिटलर की आत्मकथा ‘मेन कैम्फ’ पढ़ना तत्कालीन जर्मनी के इतिहास को जानना कहीं ज्यादा रोचक और सरल हो सकता है।”10 इस प्रकार आत्मकथा अपनी प्रामाणिकता के कारण इतिहास को जानने का एक माध्यम हो सकती है।

आत्मकथा लेखन कार्य में साहित्यिक दृष्टिकोण से उतना पारंगत होने की आवश्यकता नहीं होती है, जितना कि अन्य विधाओं- उपन्यास, कहानी और कविता इत्यादि में होती है। इसमें लेखक अपने जीवन की घटनाओं के क्रमिक विकास को प्रस्तुत करता है। इस प्रकार आत्मकथा लेखन के लिए जीवनानुभव अत्यंत आवश्यक होता है। एक नीरस एवं असफल जीवन की कथा एक सफल आत्मकथा बन सकती है तथा एक सफल जीवन की कथा भी एक असफल आत्मकथा बन सकती है। सफल जीवन से आशय उस व्यक्ति से है, जिसने अपने जीवन में बड़ा मुकाम या कोई विशेष उपलब्धि हासिल की हो। परन्तु कई बार ऐसा होता है कि उस व्यक्ति की आत्मकथा को उतना महत्त्व नहीं मिल पाता, जितना कि एक असफल जीवन जीने वाले व्यक्ति की आत्मकथा को मिलता है। यह पाठक एवं आलोचक वर्ग पर निर्भर करता है कि वह किसे कितना महत्त्व देते हैं।

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आत्मकथाकार को आत्ममुग्धता और ईर्ष्या-प्रतिशोध इत्यादि भावों से बचना चाहिए। भोगा हुआ समय कभी-कभी मस्तिष्क पर ऐसी छाप छोड जाता है कि लेखक उसे अभिव्यक्त कर देने के लिए लालायित हो उठता है। रहस्योद्घाटन की लालसा जितना लेखक को आत्मकथा लिखने के लिए प्रेरित करती है उतनी ही पाठक वर्ग को पढ़ने के लिए उत्सुकता प्रदान करती है। यही सब कारण पाठक को आत्मकथा पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। पाठक जब किसी चर्चित या असाधारण व्यक्ति की आत्मकथा को पढ़कर उसके जीवन-संघर्षों को जानता है तो वह यह सोचकर रोमांचित हो जाता है कि वह व्यक्ति भी कभी उसकी ही तरह साधारण था, उसके भी जीवन-संघर्ष उसी के समान थे। यह रोमांच, उत्सुकता और जिज्ञासा ही आत्मकथा को महत्त्व प्रदान करते हैं।

आत्मकथा लेखन में जो बात सबसे कमज़ोर कड़ी के रूप में सामने आती है वह यह है कि आत्मकथा को उसके लेखक द्वारा पूर्ण किए जाने के पश्चात् भी वह कई वर्षों तक जीवित रह सकता है। उसके पश्चात् उसके जीवन के क्रिया-कलापों से हमारा परिचय कम ही हो पाता है। जबकि पाठक वर्ग उस लेखक की आत्मकथा से उसके प्रति एक दृष्टिकोण या धारणा बना लेता है जो कहीं-न-कहीं उसके बाद के जिए हुए जीवन से परिवर्तित भी हो सकती है पर हम अक्सर उस आत्मकथा को उसके लेखक के संपूर्ण जीवन की कथा मान लेते हैं। इस प्रकार भले ही आत्मकथा में कल्पना जैसी अभिव्यक्ति न होकर वह यथार्थपरक होती हो, लेकिन आत्मकथाकार का मूल्यांकन हम जरूर कल्पना से ही करते हैं कि अमुक व्यक्ति की आत्मकथा में वह ऐसा है तो आगे भी वह वैसा ही रहा होगा। इस आधार पर आत्मकथा को जीवन का पूर्ण सत्य न मानकर अर्द्ध सत्य मानना ही अधिक उपयुक्त होगा। संभवतः तभी तो प्रथम आत्मकथाकार बनारसीदास जैन ने अपनी आत्मकथा को ‘अर्द्धकथानक’ नाम दिया था।

निष्कर्षतः कह सकते हैं कि आत्मकथा, उसके लेखक के गुजरे हुए समय और स्मृतियों पर आधारित होती है। उसकी कथावस्तु गुजरे हुए समय की कथावस्तु होती है। इसलिए इस विधा का सृजन लेखक अपने जीवन के अंतिम दिनों में करना पसन्द करता है, क्योंकि उस समय उसके समूचे जीवन की स्मृतियाँ कैद होती हैं। साहित्य की अन्य विधाएँ जीवन के किसी भी मोड़ पर लिखी जा सकती हैं, लेकिन आत्मकथा आमतौर पर अपने जीवन के अंतिम समय में ही लिखी जाती है। इस प्रकार साहित्य की यह विधा किसी भी लेखक की सबसे परिपक्व अवस्था में लिखी जाने वाली विधा है। कह सकते हैं कि आत्मकथा जीवन को पुनः देखने का एक नजरिया है।

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सन्दर्भ सूची

  1. प्रसाद, कलिका (सं.), एवं अन्य, बृहत् हिन्दी कोश, ज्ञानमण्डल प्रकाशन, वाराणसी, संस्करण- 2012, पृष्ठ संख्या- 123
  2. बाहरी, हरदेव, हिन्दी शब्द कोश, राजपाल एण्ड सन्ज़, दिल्ली, संस्करण- 2012, पृष्ठ संख्या- 81
  3. पाठक, प्रो. रामचन्द्र (सं.), भार्गव आदर्श हिन्दी शब्द कोश, भार्गव बुक डिपो, वाराणसी, संस्करण- 2010, पृष्ठ संख्या- 73
  4. सहाय, शिवपूजन, मतवाला कैसे निकला, हंस आत्मकथा अंक, जन-फर. 1932, (सं).- प्रेमचंद, विश्‍वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, द्वितीय आवृत्ति संस्करण- 2010, पृष्ठ संख्या- 11
  5. पिंजरे की तीलियों से बाहर आती मैना की कुहुक- सुधा अरोड़ा, 06/27/2015 http://www.abhivyaktihindi.org/sansmaran/2013/chandrkiran_.htm
  6. डॉ. नगेन्द्र, (सं.), हिन्दी साहित्य का इतिहास, मयूर प्रकाशन, नोएडा, संस्करण- 2011, पृ. सं.- 579
  7. सौनरेक्सा, चन्द्रकिरण, पिंजरे की मैना, पूर्वोदय प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण- 2010, पृष्ठ संख्या- 06
  8. शुक्ल, आचार्य रामचन्द्र, हिन्दी साहित्य का इतिहास, अनुपम प्रकाशन, पटना, सं.- 2013, पृ. सं.- 24
  9. कौर, बलवंत, खांटी घरेलू औरत की कहानी, हंस, मासिक, जुलाई- 2009, दिल्ली, (सं).- राजेन्द्र यादव, पृष्ठ संख्या- 84
  10. चावला, ज्योति, पिंजरे से बाहर मैना, पुस्तक-वार्ता, द्वैमासिक पत्रिका, अंक- जनवरी-फरवरी, 2009, (सं).- भारद्वाज, भारत, वर्धा, पृष्ठ संख्या- 30

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