सुनसान कमरे के कोने में
जीर्ण-शीर्ण
धूल-धूसरित
अंतिम सांसें गिनती
किताबें,
झाँक रही है-
अंतिम दौर के आशिक को
स्तब्ध, आशाहीन, बेतरतीब
और भावहीन होकर;
किताब भावों का सुरभित सामंजस्य है,
किताब जीवन विकास का प्रतिबिंब है,
यह मौजूद है
विविध रूप में अब
किताबें,बस अलमारी में नहीं है ।

लेखनी से – सत्यम भारती

परास्नातक द्वितीय वर्ष छात्र
जेएनयू; नई दिल्ली

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