कैसे बनेगा स्वदेशी से आत्मनिर्भर भारत

ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के परिणामस्वरूप भारतीय समाज में जो परिवर्तन आया वह उन सभी परिवर्तनों से भिन्न था जो इससे पहले देखने को मिल रहे थे । शक, हूण, कुषाण, तुर्क, मंगोल, यवन एवं मुगल इत्यादि विदेशी आक्रान्ताओं ने भारत पर आक्रमण किए और महत्वपूर्ण बात यह हैं कि इनमें से कई शासकों ने भारत पर शासन भी किया।
इन विदेशी आक्रान्ताओं के शासन से भारतीय समाज पर कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ा और न ही उसने अपना मूल चरित्र एवं आत्मविश्वास खोया।

यह विदित हैं कि इनमें से कई शासक अंतिम रूप से भारत में ही बस गए और इन शासकों ने भारतीय सभ्यता, संस्कृति एवं परंपरा को पूर्ण रूप से अपना लिया परंतु अंग्रेज जो प्रगतिशील जाति के होने पर गर्व करते थे, भारतीय समाज के आत्मविश्वास को तोड़ दिया और भारतीयों को यह अहसास दिलाया कि वह स्वशासन के योग्य नहीं हैं एवं ईश्वर ने भारतीयों को सभ्य बनाने के लिए सभ्यता में अग्रगामी अंग्रेज जाति का चुनाव किया है।

भारत का सामना एक ऐसे आक्रांता से हुआ जो न केवल रंग में श्वेत था अपितु अपने आप को सामाजिक तथा सांस्कृतिक रूप से अधिक श्रेष्ठ समझता था।
ऐसा प्रतीत होता था कि भारत पश्चिमी विचारों से पूर्ण रूप से पराजित हो जाएगा …………ऐसा प्रतीत होता मानो भारत सभ्यता की दौड़ में बहुत पीछे रह गया है………….और यह सभी तथ्य भारतीय समाज के कमजोर आत्मविश्वास का बखूबी परिचय देते हैं।

मैकाले का यह मानना था कि एक ऐसा वर्ग पैदा किया जाए जो रक्त और रंग से तो भारतीय होगा परन्तु अपनी प्रवृति, विचार, बुद्धि से अंग्रेज होगा।
निश्चय ही मैकाले का यह स्वप्न शीघ्र ही पूरा हो गया और जिसकी स्पष्ट झलक आधुनिक भारतीय समाज में दृष्टिगोचर होती है। और मैकाले की इस साम्राज्यवादी मानसिकता का समूल नाश करने के लिए हाल ही में प्रधानमंत्री ने जिस आत्मनिर्भर भारत का सपना लगभग 130 करोड़ भारतीयों को दिखाया है, अगर हमें उस सपने को पूरा करना हैं तो सर्वप्रथम हमें मैकाले के इस “ब्राउन रंग के अंग्रेज की मानसिकता” से बाहर आना होगा अन्यथा हम शीघ्र ही इस लक्ष्य से भटक जाएंगे।

इसी मैकाले के मानस पुत्र ने न केवल अंग्रेजों की भारतीय प्राकृतिक साधनों से अनुचित लाभ उठाने में मदद की अपितु वह इंग्लैंड में बने माल का उपभोक्ता भी बन गया और यह प्रवृति आज भी लगातार भारतीय समाज पर हावी होती जा रही हैं जिसको दूर करने के लिए और अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने के लिए प्रधानमंत्री ने देश के नागरिकों से स्वदेशी अपनाने का आग्रह किया।

इसके लिए सरकार और समाज दोनों को मिलकर प्रयास करने होंगे और विदेशी ब्रांड की चकाचौंध वाली मानसिकता से बाहर निकलकर आना होगा।

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इसे स्पष्ट रूप में समझने के लिए मैकाले का यह उद्धरण काफी सहायक साबित होगा जो उसने 1833 में हाउस आॅफ काॅमन्स में व्यापारिक लाभों के संदर्भ में दिया था।
उसने कहा कि साम्राज्य का विस्तार ही अनिवार्य रूप से लाभकारी नहीं है………..यदि हम अत्यधिक स्वार्थी पक्ष से भी देखें तो भी यह स्पष्ट है कि यदि भारत के लोग हमारे अधीन तो हैं परन्तु वहाँ कुशासन हों, वे निर्धन और अज्ञानी रहें और इंग्लैंड की बनीं वस्तुएं न खरीद सकें और वे अंग्रेज क्लक्टरों और मजिस्ट्रेटों को सलाम करते रहें, तो इस के विपरीत हमारे लिए यह बहुत अधिक अच्छा होगा कि उनका शासन अच्छा हो, वे स्वतंत्र हों; उनके अपने राजे राज करें और उनके पास धन और ज्ञान दोनों हों ताकि वे इंग्लैंड का बना बनात का कपड़ा पहनें और यहां के बने छुरी और कांटे का प्रयोग कर सकें।

इससे स्पष्ट होता हैं कि उस समय की ईस्ट इंडिया कंपनी का एक ही हित था – अधिकाधिक व्यापारिक लाभ । जो आज की बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विषय में भी सत्य साबित होता दिखाई पड़ रहा है।

प्रधानमंत्री ने जिस आत्मनिर्भर भारत की बात की हैं उसका एकमात्र तात्पर्य यह नहीं है कि केवल और केवल स्वदेशी वस्तुओं को ही प्रयोग में लाया जाया बल्कि उसकी व्याखा कहीं अधिक व्यापक है।
इसका तात्पर्य यह हैं कि स्वदेशी से जुड़े प्रत्येक तत्व को चाहे वह सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक किसी भी स्तर का क्यों न हो व्यवहारिक उपयोग में लाया जाए।

स्कूली स्तर पर स्वदेशी से जुड़े पाठ्यक्रम और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को लागू किया जाए जिससे विद्यार्थियों में प्राथमिक स्तर पर स्वदेशी की गौरवपूर्ण भावना का विकास किया जा सकें और भविष्य में वह आत्मनिर्भर भारत कार्यक्रम में बिना किसी बाधा के अपना योगदान देने में सफल साबित हों।

गांधी जी की ग्राम स्वराज की अवधारणा से सीख लेते हुए ग्रामों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए जाने चाहिए । क्योंकि गांधी जी के अनुसार भारत की आत्मा गांवों में बसती हैं और भारत की खुशहाली गांवों की खुशहाली पर निर्भर करती है।

इसके लिए गांवों में संसाधनों की उपलब्धता के आधार पर लघु उधोग स्थापित किए जा सकते है । इससे दो फायदे होंगे – एक, लोगों का रोजगार की तलाश में शहर की ओर प्रस्थान रूक जाएगा । दूसरे, लोगों के पास बचत अधिक होगी जिससे वह अपनी सुविधा को बढ़ाने के लिए खर्च करेंगे इससे देश की जीडीपी में वृद्धि होगी और जीडीपी में वृद्धि से देश की विकास दर में वृद्धि होना निश्चित है।

इसका अन्य लाभ यह भी हैं कि जो लोग केवल रोजी-रोटी की तलाश में शहरों में आकर स्लम बस्तियों में नारकीय जीवन गुजारते हैं, इससे न केवल उन्हें ऐसे अमानवीय जीवन से छुटकारा दिलाया जा सकता हैं बल्कि शहरों में लगातार बढ़ती जा रही स्लम बस्तियों की संख्या को भी कम करने में सहायता मिलेगी।

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इसके लिए सरकार को कृषि के वाणिज्यकरण पर भी बल दिया जाना चाहिए क्योंकि भारत एक कृषि प्रधान देश हैं और भले ही देश की जीडीपी में 70 प्रतिशत योगदान सर्विस सेक्टर का क्यों न हो लेकिन आज भी देश की कुल आबादी में से लगभग 49 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है । इसीलिए सरकार को कृषि क्षेत्र को मजबूती प्रदान करने पर सर्वाधिक ध्यान देना चाहिए ।
कृषि की मजबूत स्थिति से न केवल देश की विकास दर में वृद्धि होगी बल्कि इस पर आश्रित करोड़ों लोगों की आर्थिक स्थिति में भी सुधार होगा।

कृषि का विकास सरकार को देश की वाइब्रेंट डेमोग्राफी को ध्यान में रखकर करना होगा जिससे कि हम एक ही समय में अनेक फसलों को प्राप्त कर सकें।

इस संदर्भ में किसानों को सस्ती दर और उचित समय पर ॠण उपलब्ध कराना, उन्नत किस्म के बीज उपलब्ध कराना, फसल की लागत को देखते हुए लाभकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य जारी करना, कोल्ड स्टोरेज और स्टोरेज की क्षमता बढ़ाना इत्यादि कदम उठाए जा सकते है ।
इसके लिए राज्य और केंद्र सरकार को मिलकर कार्य करना होगा।

शिक्षा के क्षेत्र में सरकार को व्यवसायिक शिक्षा पर बल प्रदान किया जाना चाहिए जिससे कि अधिकाधिक लोगों को रोजगार प्रदान किया जा सकें । सरकारी नौकरी पर बढ़ती निर्भरता को कम किये जाने की आवश्यकता हैं । हाल ही में ऐसा देखने को मिल रहा हैं कि प्रोफेशनल जाॅब को छोड़कर अधिकतर लोग अपने जीवन को आसान बनाने के लिए सरकारी नौकरी की ओर लगातार उन्मुख होते जा रहे है । युवाओं में बढ़ती ऐसी प्रवृति को कम किये जाने की आवश्यकता हैं तभी हम आत्मनिर्भर भारत बनने का सपना देख सकते है।

प्राथमिक और माध्यमिक स्तर की शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण बनाए जाने की आवश्यकता हैं और इसके लिए क्षेत्रीय / स्थानीय भाषा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए क्योंकि किशोरावस्था में मातृभाषा में सीखने की प्रवृति ज्यादा नज़र आती है।

देश के सभी सरकारी स्कूलों की शिक्षा के प्रति बढ़ती उदासीनता को ध्यान में रखते हुए ठोस उपाय किए जाने की आवश्यकता हैं ताकि इन स्कूलों पर किए जाने वाले एक बड़े व्यय का समुचित उपयोग में लाया जा सके और विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान की जा सकें।

इस स्तर पर पब्लिक प्राइवेट माडल एक अच्छी पहल हो सकती है । यानी प्राथमिक और माध्यम स्तर पर सरकार प्राइवेट स्कूलों के साथ मिलकर शिक्षा प्रदान करने का कार्य करें । इससे कमजोर एवं वंचित वर्ग के विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण एवं लाभकारी शिक्षा प्रदान करने में सहायता मिलेगी और देश में शिक्षा के स्तर को उच्चता प्रदान करने में सहायता मिलेगी।

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बिना शिक्षा का विकास किए आत्मनिर्भर भारत को सफल नहीं बनाया जा सकता हैं । इसके लिए केंद्र और राज्य सरकार को मिलकर युद्ध स्तर पर कार्य किए जाने की आवश्यकता हैं क्योंकि शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है इसीलिए दोनों सरकारों का सहयोग आवश्यक है।

एक अन्य सुझाव यह हैं कि पूरे देश में प्राथमिक स्तर से लेकर माध्यमिक स्तर तक पाठ्यक्रम को एकीकृत किया जाए और जहां तक हो सके राज्यों को एक निश्चित सीमा में पाठ्यक्रम को बढ़ाने या घटाने की अनुमति दी जाए।

दैनिक जीवन में उपयोग में लायी जाने वाली स्वदेशी वस्तुओं का उत्पादन उचित कीमत के अंदर किया जाना चाहिए ताकि वह आम जन को सहज मूल्य में उपलब्ध करायी जा सकें।

इसके अलावा विदेशी वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ाए जाने की आवश्यकता हैं ताकि वह स्वदेशी वस्तुओं से कम कीमत पर बाज़ार में उपलब्ध न हो अन्यथा लोग स्वदेशी के स्थान पर विदेशी वस्तुओं का उपयोग करना ही उचित समझेंगे।
आत्मनिर्भर भारत कार्यक्रम को सफल बनाने की दिशा में सरकार को इस पर विचार किए जाने की आवश्यकता है।

वैज्ञानिक शोध एवं अनुसंधान को बढ़ावा दिए जाने की आवश्यकता हैं ताकि स्वदेशी तकनीक के बल पर गुणवत्तापूर्ण और टिकाऊ वस्तुओं का उत्पादन किया जा सकें जिससे न केवल अपने देश की मांग को पूरा किया जा सकें बल्कि अन्य देशों को भी भरोसे में लेकर निर्यात करके विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाया जा सकें।

आत्मनिर्भर भारत के अन्तर्गत स्वदेशी वस्तुओं से संबंधित एक अन्य महत्वपूर्ण बात यह भी हैं कि केवल वही वस्तुएं स्वदेशी नहीं कहलाएगी जिसका निर्माण देशी तकनीक और भारत के लोगों द्वारा किया गया अपितु वे सभी वस्तुएं भी स्वदेशी ही होगी जिनका निर्माण भारत में किया गया।
यह स्वदेशी की एक व्यापक अवधारणा है और इसकी आवश्यकता भी हैं क्योंकि इससे एक ओर देश के लोगों को बेरोजगारी की समस्या से छुटकारा एवं रोजगार प्रदान करने में सहायता मिलेगी,दूसरी ओर सरकार के राजस्व में भी वृद्धि होगी जिससे वित्तीय घाटे को कम करने और विकास दर को बढ़ाने में मदद मिलेगी।

गांधी जी के स्वदेशी आंदोलन से सीख लेकर, जिसमें न केवल स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग में लाने पर बल प्रदान किया गया था अपितु बहिष्कार कार्यक्रम के तहत विदेशी वस्तुओं, संस्थानों, सेवाओं इत्यादि का पूर्ण बहिष्कार किया गया था, सरकार को आत्मनिर्भर भारत कार्यक्रम को सफल बनाने की दिशा में युद्ध स्तर पर कार्य किए जाने की आवश्यकता हैं तभी लोकल से वोकल की पहल संभव हो सकेगी अन्यथा उचित नीति के और ठीक रूप में कार्यान्वयन के अभाव में यह मात्र एक राजनैतिक नारा बनकर रह जाएगा।

   - मोहित कुमार उपाध्याय 
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