इक्कीसवीं सदी की पहले दशक की कहानियाँ और मुस्लिम जीवन

ज्योतिष कुमार यादव

एम.फिल. पीएच.डी. (शोध छात्र)

हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद

ई-मेल -jyotishyadav1990@gmai।.com

हिन्दी साहित्य में बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध का समय विमर्शों के उभरने का समय रहा है, जिसमें क्रमशः स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श आदि प्रमुख हैं । इक्कीसवीं सदी के प्रारम्भ होते ही एक नए विमर्श के रूप में अल्पसंख्यक विमर्श भी सामने आता है । अल्पसंख्यक विमर्श में विशेष रूप से मुस्लिम-समुदाय की बात की जाती है ।

आज जबकि मुस्लिम समुदाय का एक तबका अच्छी स्थिति में है तो वहीं दूसरा तबका जिसे ‘पसमांदा समाज’ के नाम से जाना जाता है, वह हाशिये पर है । ‘पसमांदा’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है-‘पस’ और ‘मांदा’, ‘पस’ का अर्थ -पीछे और ‘मांदा’ का अर्थ है-जो छूट गया, अर्थात वह समाज जो पीछे छूट गया है । मुस्लिम समुदाय में उच्च वर्ग (अशरफ) और निम्न वर्ग (अरजाल) के बीच बहुत बड़ी दीवार है । उच्च वर्ग अपने लाभ के लिए निम्न वर्ग की समस्याओं को सामने न रखकर ऐसी समस्या रखते हैं, जिनसे निम्न वर्ग का कोई लेना-देना नहीं रहता है, जैसे-बाबरी कांड, हिन्दी, उर्दू की समस्या, धर्म आदि ।

मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिति को इक्कीसवीं सदी की पहले दशक के कहानीकारों ने बेजोड़ ढंग से सम्प्रेषित किया है, जिनमें अब्दुल बिस्मिल्लाह, असगर वजाहत, अनवर सुहैल, शमोएल अहमद, नासिरा शर्मा, मंजूर एहतेशाम, नीलाक्षी सिंह, गीतांजलि श्री, नसरीन बानो, रशीद जहाँ, हसन जमाल, अलिफा रियात, हबीब कैफ़ी, जेबा रशीद, नीला प्रसाद, शकील, रंजन जैदी, विजय, रणेंद्र, अनुज आदि चर्चित हैं । इन कहानीकारों की कहानियों में मुस्लिम जनजीवन की पूरी झलक परिलक्षित होती है । अब्दुल बिस्मिल्लाह की कहानी ‘जीना तो पड़ेगा’ प्रमुख रूप से मुस्लिम समाज में मनुष्य की पीड़ा को उकेरती है । कहानी का एक प्रसंग है -“ अक्किल मामा उर्फ़ आकिल साहब उर्फ़ अब्दुल गफ्फार एक झिलगी-सी खटिया पर पड़े थे । पूरे जिस्म में सूजन थी और आवाज़ बैठी हुई । गुड्डन मियाँ को देखते ही उन्होंने उठने की कोशिश की मगर गुड्डन मियाँ ने उन्हें दोनों हाथों का सहारा देकर लिटा दिया ! “तबियत कैसी है मामू ?” गुड्डन मियाँ ने बातचीत शुरू की ! “देख ही रहे हो गुड्डन ! अब आखिरी है ।”1 ‘अरजाल’ जिसे ‘पसमांदा समाज’ के नाम से भी जाना जाता है, उनकी समाज में अच्छी स्थिति न होने के बावजूद भी उनके अंदर जिजीविषा देखने को मिलती है । हिन्दू समाज में जहाँ निचले तबके के लोगों को ‘अस्पृश्य’ कहा जाता है, वहीं मुस्लिम समाज में ‘अरजाल’ के नाम से शुमार किए जाते हैं । फ़र्क है तो सिर्फ़ धर्म का, लेकिन इन दोनों में कोई भेद नहीं है, अली अनवर के शब्दों में -“मैला वो भी फेका करते, मैला हम भी साफ़ करते । अंतर सिर्फ़ इतना था कि उन्हें डोम और भंगी कहा जाता और हमें मेस्तर और खाकरोब या हलालखोर नाम से जाना जाता । इस तरह लालबेगी, हलालखोर, मोची, पासी, भांट, भटियारा, पमरिया, नट, बक्खो, डफाली, नालबन्द, धोबी, साईं वगैरह दर्जनों जातियाँ ऐसी हैं, जिसका धर्म भले अलग-अलग (हिन्दू-मुस्लिम) हो लेकिन पेशा तथा सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति एक जैसी है ।”2

असगर वजाहत की कहानियों में राजनीतिक व्यंग्य ज्यादा मिलता है । वे एक अलग शैली के माध्यम से कहानियों को गढ़ते हैं । ‘मैं हिन्दू हूँ’ कहानी-संग्रह की सारी कहानियाँ व्यंग्य प्रधान कहानियाँ हैं । इस संग्रह की कुछ कहानियाँ मुस्लिम जीवन पर भी आधारित हैं l इनकी ‘वस्ताद जमूरा बदकही’ शीर्षक कहानी में व्यंग्य के माध्यम से मुस्लिम-समाज की सच्चाईयों को सम्प्रेषित किया गया है । अनवर सुहैल की कहानियों में कथावस्तु के तौर पर अल्पसंख्यक मनोग्रंथि से ग्रस्त मुस्लिम परिदृश्य, समाज में स्त्री और वृद्धों के प्रति अमानवीय व्यवहार, मनुष्य का लोभी होना, उपभोक्तावादी संस्कृति का आम-आदमी पर पड़ता प्रभाव, निर्मम संवेदनाएँ आदि को देखा जा सकता है । इनकी ‘दहशतगर्द’ शीर्षक कहानी में साम्प्रदायिकता की समस्या को उकेरा गया है । गुजरात के गोधरा कांड से जोड़कर इस कहानी को देखा जा सकता है । इस कहानी में मुस्लिम समाज में व्याप्त अंधविश्वास की प्रवृत्ति को भी उद्घाटित किया गया है । कहानी का एक प्रसंग है -“लड़कियाँ कम उम्र में ब्याह दिए जाने के कारण रक्ताल्पता, टीवी और अन्य असाध्य रोगों से पीड़ित हो जाती हैं । हारी-बीमारी की दशा में मेडिकल जाँच न कराकर मियां भाई झाड़-फूंक, गंडा-तावीज़, मन्नत-मनौतियों के चक्कर में बर्बाद हो जाता है ।”3

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शमोएल अहमद की कहानियों के विषय में बहुत ही वैविध्य नहीं है । इनकी कहानियों का विषय प्रमुख रूप से नारी-शोषण, साम्प्रदायिकता और मज़हबी आड़ में हो रहे गलत कार्य के इर्द-गिर्द रहता है । मुस्लिम समुदाय में व्याप्त नारी शोषण पर आधारित कहानियों में ‘बदलते रंग’, ‘ऊँट’, ‘मृगतृष्णा’, ‘मिश्री की डली’, ‘बहराम का घर’ आदि महत्वपूर्ण हैं । ‘बदलते रंग’ शीर्षक कहानी वेश्या स्त्री पर आधारित है । ‘ऊँट’ कहानी में एक ऐसी स्त्री का चित्रण है, जो आर्थिक तंगी के कारण इमाम के हवस का शिकार बन जाती है । ‘मृगतृष्णा’ कहानी दम्पत्ति के बीच के टकराव को सम्प्रेषित करती है । ‘मिश्री की डली’ कहानी में मुस्लिम समाज में स्त्री शोषण को उकेरा गया है । नासिरा शर्मा का रचना-संसार बहुत ही विस्तृत है । इन्होंने उपन्यास, कहानी, आलोचना, रिपोर्ताज, नाटक, अनुवाद, सीरियल-टेली फ़िल्म आदि क्षेत्रों में लेखनी की है । नासिरा शर्मा बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं । सृजनात्मक लेखन के साथ ही साथ उन्होंने स्वतंत्र पत्रकारिता के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है । हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी व पश्तो भाषा का ज्ञान इनके पास है । इनकी 2001 में प्रकाशित कहानी-संग्रह ‘इंसानी नस्ल’ की सारी कहानियाँ स्त्री विमर्श से संबंधित हैं । इन कहानियों में बहु-विवाह की समस्या, मेहर की समस्या, बाँझ स्त्री की समस्या, प्रेम-विवाह, दम्पत्ति के बीच टूटन आदि समस्याओं को देखा जा सकता है । इनकी कहानियों के बारे में प्रो. वीरेंद्र मोहन ने इस प्रकार टिप्पणी की है -“दिक्-काल के परिवर्तित होते रूपों और बदलते मूल्यों से बनने वाले समाज को भीतर से पहचानने का प्रयत्न यदि नासिरा शर्मा की कहानियों की एक विशेषता है तो नारी मन और जीवन की अनेक-अनेक पर्तों को खोजने का उपक्रम भी इन कहानियों की एक विशेषता कही जाएगी ।”4

मंजूर एहतेशाम की 2001 में प्रकाशित कहानी-संग्रह ‘तमाशा तथा अन्य कहानियों’ का विषय मुस्लिम परिवेश की सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक समस्या है । इस संग्रह में संकलित ‘घेरा’ कहानी एक वृद्ध पुरुष और उसकी नव युवती पत्नी के बीच संबंधों को लेकर लिखी गई है । आज मनुष्य के पास धन है लेकिन वह ख़ुश नहीं है, वह धन से सब कुछ हासिल कर ले रहा है, परन्तु सुखी नहीं है । मंजूर एहतेशाम ने इस कहानी के माध्यम से मुस्लिम समाज में व्याप्त अवैध-सम्बन्धों की पोल को खोला है, जो कि एक यथार्थ है । ‘पुल पुख्ता’ कहानी सरकार की दोहरी नीति की पोल खोलती है । ‘तमाशा’ कहानी मुस्लिम समाज में व्याप्त बेरोजगारी की समस्या पर केन्द्रित है । कहानी का एक प्रसंग है -“आलम ने अपनी दुल्हन के लिए सात कोठरियों से एक कोठरी किसी किरायेदार को उसकी मुंहमांगी रकम देकर, खाली करा ली थी, उसके कहे अनुसार, आरा मशीन के मालिक से एडवांस लेकर ।”5 इस कहानी में मुस्लिम समाज में छोटी उम्र की लड़कियों पर किस तरह धर्म को उड़ेल दिया जाता है, उसकी ओर भी संकेत किया गया है -“दरअसल जमीला के फ़ौरन बाद शादी के लायक तो घर में शकीला थी, लेकिन उस ज़माने में उस पर अल्लाह मियाँ की गाय बनने और कहलाने का भूत सवार था । एक छोटी-सी कोठरी में भी उससे जितना बन सकता, वह पर्दा भी करती और इबादत भी । उसके सिर से दुपट्टा, सोते-जागते, इस तरह बंधा रहता जैसे आमतौर पर औरतें नमाज़ पढ़ने वक्त कसकर बांधती हैं ।”6

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गीतांजलि श्री की कहानियों में एक ख़ास सिग्नेचर ट्यून मिलता है । इनकी कहानियों में एक अलग तरह का फक्कड़पन, एक अजीब तरह की दार्शनिकता और एक अजीब तरह की भाषा मिलती है । उन्होंने मुस्लिम जीवन को केन्द्र बनाकर कई कहानियाँ गढ़ी हैं । इनकी ‘आजकल’ शीर्षक कहानी साम्प्रदायिकता को केन्द्र बनाकर लिखी गई है । इस कहानी में साम्प्रदायिकता के चलते मुस्लिम समाज कितना भयभीत हो जाता है, उसका सजीव चित्रण किया गया है । इस कहानी को गुजरात दंगे से जोड़कर देखा जा सकता है । इनकी एक और कहानी है -‘बेलपत्र’ । इस कहानी में दम्पत्ति के ऊपर धर्म के प्रभाव को रेखांकित किया गया है । पत्नी मुस्लिम और पति हिन्दू है, दोनों प्रेम विवाह करते हैं । लेकिन कुछ ही समय बीतने के बाद दोनों में दरार पड़ जाती है, कारण मज़हब । “यह हमारी हार है फ़ातिमा ! कोई वजह नहीं कि हम हारें …तुम…तू…त…तुम…”ओम घोर निराशा में हकलाने लगा । “मैं अब कुछ नहीं जानती । बंद करो ।” फ़ातिमा त्रस्त हो चुकी थी । ओम का ह्रदय कराह उठा, फ़ातिमा, डूब जाओगी । हम दोनों मिट जाएँगे ।”7

भारत में साम्प्रदायिकता के चलते मुस्लिम समाज को बहुत ही परेशानियों का सामना करना पड़ता है । हालाँकि हिन्दू और मुस्लिम दोनों कौमों को हानि पहुँचती है । भारत में इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में प्रमुख रूप से सन् 2002, सन् 2006, सन् 2007, सन् 2008, सन् 2009 में बड़े पैमाने पर दंगे हुए । उदाहरण के तौर सन् 2007 पर में निम्नलिखित जगहों पर दंगे हुए -18 जनवरी, जयपुर, 21 जनवरी, इंदौर, 27 जनवरी, गोरखपुर, 12 फरवरी, इंदौर, 16 फरवरी, जयपुर, 24 मार्च, जम्मू कश्मीर, 28 मार्च, गुजरात (जामनगर), 1 अप्रैल, मध्यप्रदेश, 12 अप्रैल, नांदेड़, 13 मई, शाहजहांपुर, 14 जून, अहमदाबाद, 1 सितम्बर, इलाहाबाद, 17 सितम्बर, महाराष्ट्र , 19 सितम्बर, सूरत, 27 सितम्बर, बड़ौदा आदि । साम्प्रदायिकता पर असग़र अली इंजीनियर ने इस प्रकार टिप्पणी की है -“अगर धर्मनिरपेक्ष पार्टियाँ हिम्मत और धैर्य से काम लें तो कोई कारण नहीं कि हमारे देश से साम्प्रदायिक हिंसा का दानव हमेशा के लिए विदा हो जाए ।”8

नसरीन बानो की कहानियों का विषय अधिकांश हिन्दू समाज ही रहा है, लेकिन कुछ कहानियाँ मुस्लिम स्त्री समाज पर भी आधारित हैं -‘बाबुल का द्वार’ कहानी मुस्लिम स्त्री पीड़ा को व्यंजित करती है । कहानी में एक माँ अपनी चार लड़कियों का किसी तरह पालन पोषण करती है । एक दिन एक लड़की आर्थिक तंगी के चलते गैर लड़के के साथ भाग जाती है । इस कहानी की भाषा-शैली बहुत ही मार्मिक है ।

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इधर बीच एक बहस चली है- ‘अल्पसंख्यकवाद के खतरे की’ । दुनिया की हर सरकार अल्पसंख्यक को अपनी क्षमता अनुसार सुविधाएँ प्रदान करती हैं । यदि अल्पसंख्यक, अल्पसंख्यक बनकर रहें तो किसी भी देश की सरकार को कोई आपत्ति नहीं होगी, लेकिन अल्पसंख्यक अपनी विचारधारा को सरकार पर जबरदस्ती थोपने लगते हैं तब मामला गड़बड़ा जाता है । अल्पसंख्यक की विचारधार जब एक राजनीतिक रूप पकड़ लेती है, तब वह देश की एकता को खतरा पैदा करती है, यही वह जड़ है जहाँ से अल्पसंख्यकवाद के खतरे सामने आने लगते हैं । मुजफ्फर हुसैन ने अल्पसंख्यकवाद के खतरे पर इस प्रकार टिप्पणी की है -“अल्पसंख्यकों का एक चरित्र यह भी देखा जाता है कि वे राजनीतिक रूप से बड़े सतर्क और जागरूक होते हैं । इसलिए हर देश में उनके अपने समाचार-पत्र और मीडिया के अन्य साधन हैं । किसी भी देश को किसी समाज की भाषा, वेशभूषा और त्योहार से भला क्या आपत्ति हो सकती है; लेकिन जब आपकी यह पहचान राजनीतिक स्वरूप लेने लगती है तब अल्पसंख्यकवाद के खतरे खड़े हो जाते हैं ।”9 हबीब कैफ़ी की कहानी ‘मार-मारकर’ धर्मान्तरण के प्रश्न को उजागर करती है । जेबा रशीद की कहानी ‘तपती रेत’ स्त्री विमर्श को उकेरती है, कहानी का एक प्रसंग है -“हालात ने अन्नो को तन्हा ज़िन्दगी जीने को मजबूर कर दिया । अगर किसी औरत को पति से दबते देखती तो उसे शेरनी बनने को उकसाती, लेकिन खुद बशीरा के आगे दब्बू बन जाती ।”10

नीला प्रसाद की कहानी ‘एक दुनिया समानांतर’ गोधरा कांड को कथ्य बनाकर लिखी गई है । कहानी में गोधरा कांड से भयभीत मुस्लिमों की पीड़ा का चित्रण किया गया है । शकील की ‘तहारत’ कहानी में मज़हब की आड़ में हो रहे खून खराबे, दंगे का सजीव चित्रण है । अनुज की कहानी ‘अनवर भाई नहीं रहे’ में मुस्लिम समुदाय में युवाओं में भटकाव, पीड़ा, कुंठा और रोष आदि को सम्प्रेषित किया गया है । कहानी में पीड़ा से दम तोड़ते मनुष्य का बहुत ही सूक्ष्म चित्रण है -“ऐसे में हम सब ये तो जानते थे की किसी भी दिन अनवर भाई की मौत की ख़बर आ सकती है, लेकिन यह ख़बर इतनी जल्दी आ जाएगी इसकी उम्मीद नहीं थी ।”11

विवेचन के बाद कहा जा सकता है कि इक्कीसवीं सदी की पहले दशक की कहानियों में मुस्लिम जीवन का यथार्थ अंकन किया गया है । इस दशक के कहानीकारों ने अलग-अलग शिल्प के माध्यम से कहानियाँ गढ़ी हैं । मुस्लिम समुदाय का एक तबका तो अच्छी स्थिति में है, लेकिन इस समुदाय का निचला तबका जिसे ‘पसमांदा मुसलमान’ के नाम से जाना जाता है उसकी हालत दयनीय है । जिसके कारण ‘पसमांदा समाज’ हाशिये का जीवन यापन कर रहा है । इस दशक की कहानियों की भाषा बेजोड़ रही है ।

सन्दर्भ

  1. अब्दुल बिस्मिल्लाह-रफ़-रफ़ मेल, पृ.20

  2. अली अनवर-मसावात की जंग पसेमंजर: बिहार के पसमांदा मुसलमान, पृ.24

  3. अनवर सुहैल-चहल्लुम, पृ.124

  4. एम.फिरोज अहमद (सं.)-नासिरा शर्मा: एक मूल्यांकन, पृ.251

  5. मंजूर एहतेशाम-तमाशा तथा अन्य कहानियाँ, पृ.140

  6. वही, पृ.139

  7. गीतांजलि श्री-प्रतिनिधि कहानियाँ, पृ.38

  8. असगर अली इंजीनियर-धर्म और साम्प्रदायिकता, पृ.146

  9. मुजफ्फर हुसैन-खतरे अल्पसंख्यकवादके, पृ.114

  10. हरिनारायण(सं.)-कथादेश, वर्ष-14,अंक-5, जुलाई, 2004, पृ.79

  11. रवीन्द्र कालिया(सं.)- वागर्थ, जून,2006, पृ.73

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