हर किसी के हाथ में
गाण्डीव है अब
आँख चिड़िया की दिखे
तो बात भी है ।

आदमी के हाथ में
बाजार है या
बिक रहा है आदमी
ये कौन जाने
भोर होते नापता है
सड़क या
नाप लेती उम्र खुद,
सड़क ही
ये कौन माने

बिक रही है चापलूसी
थोक में अब
सत्य फुटकर में बिके
तो बात भी है ।

हर धजी को
साँप में तब्दील करके
लेखिनी गतिमान है
ये कौन बोले
अक्षरों की आँख में
घी-शहद भरकर
पा रहे सम्मान हैं
तह कौन खोले

लिख रहे हैं रात-दिन भी
खास को ही
आमजन को भी लिखे
तो बात भी है ।

कल्पना मनोरमा
31.5.2020

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