अवधी सम्राट पं. बंशीधर शुक्ल को याद करते हुए

 राहुल देव

अवधलोक की वृहद्त्रयी में से एक जनकवि बंशीधर शुक्ल का जन्म उत्तर प्रदेश के लखीमपुर (खीरी) जिले के मन्यौरा गाँव के एक कृषक परिवार में वसंतपंचमी के दिन सन 1904 ई. को हुआ था | इनके पिता पं. छेदीलाल शुक्ल कर्म से कृषक और हृदय से कवि थे | वह अपने क्षेत्र में आल्हा गायक के रूप में प्रसिद्द थे | अपने आसपास के इस अनुकूल परिवेश का प्रभाव बालक बंशीधर शुक्ल पर भी पड़ा | सन 1919 में पिता की मृत्यु हो जाने के बाद पारिवारिक ज़िम्म्मेदारियों का भार अल्पायु में ही उनके कन्धों पर आ पड़ा | पिता की असामयिक मृत्यु से शुक्ल जी की वद्यालयीय शिक्षा कक्षा आठ तक ही हो सकी | बाद में घर पर ही उन्होंने स्वाध्याय से संस्कृत-उर्दू-हिन्दी-अंग्रेजी भाषाओँ का ज्ञान प्राप्त किया | जीविका के लिए कुछ समय के लिए उन्होंने पुस्तक व्यवसाय का कार्य भी भी किया। इसी बीच वह कविताएं भी लिखने लगे। पुस्तक व्यवसाय से जुड़ने के कारण उनका अक्सर कानपुर आना-जाना होता था। इसी दौरान वह गणेश शंकर विद्यार्थी के संपर्क में आए और उन्हीं की प्रेरणा से वह सन 1921 में राजनीति में सक्रिय हुए। सन 1938 में आप ने लखनऊ में रेडियों में नौकरी भी की | जीवनसंघर्षों ने कवि बंशीधर शुक्ल के व्यक्तित्व और कृतित्व को धीरे-धीरे जीवंत और जीवट बना दिया | शुक्ल जी ने बापू के नमक आंदोलन से लेकर आजाद भारत में लगाई गयी इमेर्जेन्सी में भी जेल यात्रायें की। खूनी परचा, राम मड़ैया, किसान की अर्ज़ी, लीडराबाद, राजा की कोठी, बेदखली, सूखा आदि रचनाये उस दौर में जनमानस में खूब प्रचलित रही। आजादी के बाद 1957 में पं. बंशीधर शुक्ल लखीमपुर क्षेत्र से विधायक बने। अपनी राजनीतिक दौर में भी वह बेहद सादगी के साथ रहे | 1978 में शुक्ल जी को उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान ने उन्हें ‘मलिक मोहम्मद जायसी पुरस्कार’ से सम्मानित किया। बाद में संस्थान ने इस जनकवि को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनकी रचनाओं का समग्र संकलन रचनावली के रूप में भी प्रकाशित किया | आज़ादी के सिपाही और अवधी साहित्य के अनन्य उपासक बंशीधर शुक्ल ने 76 वर्ष की आयु में अप्रैल सन 1980 में इस दुनिया को अलविदा कह दिया |

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समाजवादी रुझान के शुक्ल जी की रचनाओं में विषयगत विविधता है | गरीब और किसान वर्ग की व्यथा-कथा से तो इनका काव्य भरा पड़ा है । ऐसी ही उनकी एक मार्मिक कविता ‘अछूत की होरी’ को देखें तो,

“हमैं यह होरिउ झुरसावइ। 
खेत बनिज ना गोरू गैया ना घर दूध न पूत।
मड़ई परी गाँव के बाहर, सब जन कहैं अछूत॥
द्वार कोई झँकइउ ना आवइ।
..
हमैं यह होरिउ झुरसावइ।
ठिठुरत मरति जाड़ु सब काटित, हम औ दुखिया जोइ।
चारि टका तब मिलै मजूरी, जब जिउ डारी खोइ॥ 
दुःख कोई ना बँटवावइ।
..
हमैं यह होरिउ झुरसावइ।
नई फसिल कट रही खेत मा चिरइउ करैं कुलेल।
हमैं वहे मेहनत के दाना नहीं लोनु न तेल॥
खेलु हमका कैसे भावइ।
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हमैं यह होरिउ झुरसावइ।
गाँव नगर सब होरी खेलैं, रंग अबीर उड़ाय।
हमरी आँतैं जरैं भूख ते, तलफै अँधरी माय॥
बात कोई पूँछइ न आवइ।
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हमैं यह होरिउ झुरसावइ।
सुनेन राति मा जरि गइ होरी, जरि के गई बुझाय।
हमरे जिउ की बुझी न होरी जरि जरि जारति जाय॥
नैन जल कब लैं जुड़वावइ।
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हमैं यह होरिउ झुरसावइ।
हाड़ मास जरि खूनौ झुरसा, धुनी जरै धुँधुवाय।
जरे चाम की ई खलइत का तृष्णा रही चलाय॥
आस पर दम आवइ जावइ।
..
हमैं यह होरिउ झुरसावइ।
यह होरी औ पर्ब देवारी, हमैं कछू न सोहाइ।
आप जरे पर लोनु लगावै, आवै यह जरि जाइ॥
कौनु सुखु हमका पहुँचावइ।
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हमैं यह होरिउ झुरसावइ। 
हमरी सगी बिलैया, कुतिया रोजुइ घर मथि जाय।
साथी सगे चिरैया कौवा, जागि जगावैं आय॥
मौत सुधि लेइउ न आवइ।
..
हमैं यह होरिउ झुरसावइ।“

कवि के सामाजिक सरोकारों और उसकी जनपक्षधर सोच को दर्शाती यह कविता 1936 में लिखी गयी थी | ध्यातव्य है कि हिंदी साहित्य जगत में वह समय प्रगतिशील चेतना के उभार का दौर था | ऐसे में शुक्ल जी अवधांचल में इस तरह की कविता लिख रहे थे | यानि कि उन्हें अपने समय का भलीभांति ज्ञान था तभी उनकी रचनाएँ लोगों को प्रभावित कर सकने में सफल हो पातीं थीं | दुखद है कि इस सन्दर्भ में उनका समग्र मूल्यांकन न हो सका | आलोचकों द्वारा उनकी रचनाधर्मिता को लेकर लगातार उपेक्षा की गयी | प्रश्न यह है कि क्या क्षेत्रीयता आलोचना में रूकावट डालने का कोई मपदंड थी, विचार करें तो हम पाते हैं कि ऐसा नहीं है | सोचिये अगर ऐसा होता तो तुलसी बाबा साहित्य जगत में आज कहाँ पर होते ? हिंदी पट्टी के कई प्रतिभाशाली कवियों के साथ यह दोहरा व्यवहार हुआ | अवधी, ब्रज, मैथिली, राजस्थानी, मगधी, छत्तीसगढ़ी, भोजपुरी, बुन्देलखंडी आदि हिंदी की तमाम सारी बोलियाँ हैं | फिर आलोचकों का यह पूर्वाग्रह समझ से परे है | उन्हें समझना होगा कि हिंदी भाषा अगर एक वृक्ष है तो उसकी बोलियाँ उसकी शाखाएं हैं जिसे उससे अलग नहीं किया जा सकता | अन्य लोगों की तो छोड़ दीजिये अब तो अंचलों के लोग भी अपनी भाषा के प्रति जागरूक नज़र नहीं आते | वैश्वीकरण और भाषाई दुराग्रह से आज बोलियाँ भी अपने अस्तित्व से जूझ रही हैं | हमारी अस्मिता पर मंडराता यह संकट गंभीर है इसे सभी को समझना होगा |

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इसके अतिरिक्त उठो सोने वालों सबेरा हुआ है..जैसी पंक्तियाँ हों या उठ जाग मुसाफिर भोर भई..जैसी कालजयी कविता । ‘उठ जाग मुसाफ़िर भोर भई’ कविता से मेरा पुराना नाता है क्योंकि बचपन में अक्सर सुबह सुबह घर पर माता जी या पिता जी इस गीत को गाया करते थे | शुक्ल जी अपने समय में बहुत लोकप्रिय कवि रहे थे | उनके इसी योगदान को लेकर आज भी हम उन्हें सम्मान के साथ याद करते हैं | जनमानस में उनकी लोकप्रियता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता था कि अवध के गाँव-गाँव में लोगों को उनकी रचनाएँ जबानी याद थीं |

जीवन-जगत की तमाम स्थितियों-परिस्थितियों ने उनमें व्यवस्था के प्रति विद्रोही स्वर पैदा किया था | उस समय देश में स्वतंत्रता आन्दोलन अपने चरम पर था | इस सबका प्रभाव कवि बंशीधर शुक्ल पर भी पड़ा और उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन में अपनी सक्रिय भागीदारी करते हुए अनेक बार जेल गये | शुक्ल जी वैचारिक स्तर पर कहीं न कहीं गाँधी जी से भी बहुत प्रभावित थे | गाँधी जी को याद करते हुए लिखी गयी उनकी ‘गाँधी बाबा के बिना’ शीर्षक यह कविता दृष्टव्य है,

हमरे देसवा की मँझरिया ह्वैगै सूनि,

अकेले गाँधी बाबा के बिना।

कौनु डाटि के पेट लगावै, कौनु सुनावै बात नई,

कौनु बिपति माँ देय सहारा, कौनु चलावै राह नई,

को झँझा माँ डटै अकेले, बिना सस्त्र संग्राम करै,

को सब संकट बिथा झेलि, दुसमन का कामु तमाम करै।

सत्य अहिंसा की उजेरिया ह्वैगै सूनि,

अकेले गाँधी बाबा के बिना।

उन्होंने स्वतंत्रता से पहले अगर अंग्रेजों की खिलाफत की तो वहीँ स्वतंत्रता मिलने के बाद लोकतंत्र के समाजवादी विरोधी चेहरे को देखकर उन्होंने यह भी कहा, ओ शासक नेहरु सावधान/ पलटो नौकरशाही विधान/ अन्यथा पलट देगा तुमको/ मजदूर, वीर, योद्धा, किसान |” उनकी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि व साफगोई यहाँ स्पष्ट है |

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शुक्ल जी ने हिंदी और अवधी दोनों में लेखन किया | अवधी उनकी मातृभाषा थी | उन्हें भान था कि

लोगों के बीच अपनी बात रखने का सर्वश्रेष्ठ माध्यम उनकी अपनी भाषा-बोली में ही संभव है इसीलिए उन्होंने एक सच्चे जनकवि की भांति अपना अधिकतर लेखन लोकभाषा अवधी में ही किया |

उनकी एक प्रसिद्द कविता ‘महेंगाई’ को देखें,

“हमका चूसि रही मंहगई।
रुपया रोजु मजूरी पाई, प्रानी पाँच जियाई
पाँच सेर का खरचु ठौर पर, सेर भरे माँ खाई। 
सरकारी कंट्रोलित गल्ला हम ना ढूँढे पाई
छा दुपहरी खराबु करी तब कहूँ किलो भर पाई।
हमका चूसि रही मंहगाई।“

बंशीधर शुक्ल की लम्बे लेखन सफ़र (1925 से लेकर 1980 तक) के पीछे एक वृहद् अनुभव संसार था | अपने परिवेश से उन्हें जो कुछ भी मिला उसे उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से वे लगातार अपनी पूरी ईमानदारी और प्रतिबद्धता के साथ अभिव्यक्त करते रहे | वर्ष 2014 में आपकी जन्मशती पर ‘अवध ज्योति’ पत्रिका के द्वारा विशेषांक निकाला जा रहा है | यह कार्य बहुत ही सराहनीय है | इस तरह के प्रयासों को और गति मिलनी चाहिए | कुल मिलाकर कहा जाय तो  शुक्ल जी लोकचेतना से संपृक्त एक राष्ट्रवादी कवि हैं | उन्हें मालूम है कि लोक से विमुख रहकर साहत्य रचने का कोई मतलब नहीं | उनका सम्पूर्ण साहित्य समाज को नई राह दिखाने वाला साबित हुआ | ऐसे रचनाकारों को साहित्य में आज उनका उचित स्थान न दिया जाना हिंदी साहित्य की कृतघ्नता ही कही जाएगी |

संपर्क सूत्र- 9/48 साहित्य सदन, कोतवाली मार्ग, महमूदाबाद (अवध) स.प्र.) ईमेल- rahuldev.bly@gmail.com

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